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ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस रोमांचक एपिसोड में जानिए कि कैसे नारद मुनि का अवतार 'उपबर्हण' सांसारिक माया के जाल में फंस गया। क्या गंधर्व राजकुमार की सुंदर पत्नी मालवती के प्रेम में नारद का मूल उद्देश्य खो गया? देखिए कैसे एक दिव्य आत्मा के पतन ने ब्रह्मांड में हलचल मचा दी।

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Transcript
00:00गंधर्व लोग की स्वर्णिम आभा में उपबरहन ने एक राजकुमार के रूप में अपनी आखें खोली, जहां चारों ओर संगीत
00:08और एश्वर्य का सामराज्य था।
00:11स्वय भगवान विश्णु अपने वैकुन्ठ लोग से इस गंधर्व के उदे को देख रहे थे, जहां वे मंद मुस्कान के
00:18साथ आगामी लीला का सूत्रपात कर रहे थे।
00:22उपबरहन ने अपनी वीना के तारों को छेडा, तो गंधर्व लोग की हवाएं मानो थम गई और संगीत की अलौकिक
00:30गूंच पूरे ब्रहमांड में थैल गई।
00:33उसकी कला में ऐसा सम्मोहन था कि गंधर्व लोग की वास्तुशिर्प भी उस दिव्य ध्वनी के साथ स्पंदन करने लगी।
00:42गंधर्व राजाओं ने उपबरहन की प्रतिभा के आगे नत्मस्तक होकर उसे संगीत का अधिपती स्विकार कर लिया।
00:50देवराज इंदर ने स्वर्ग से उपबरहन के संगीत को सुना और वे इस दिव्य प्रतिभा की प्रशंसा करने से स्वयं
00:57को रोक न पाए।
00:59निरित्य और गायन का ऐसा संगम उपबरहन की मंडली ने तैयार किया जो पहले कभी किसी ने नहीं देखा था।
01:08दिव्य सभाओं में उपबरहन का वर्चस्व बढ़ता गया जिससे उसके भीतर अहंकार की एक सुक्ष्मरेखा अंकित होने लगी।
01:16स्वर्ग की अपसराय भी उसके संगीत के सुरों पर मंत्रमुग्ध होकर निरित्य करने के लिए लालायत रहने लगी।
01:25भगवान शिव कैलाश से इस सांसारिक आकर्शन को देख रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि मोह की सीमा अब
01:32निकट है।
01:35उपबरहन ने एक नई धुन की रचना की जिसमें काम और प्रेम के ऐसे तत्व थे जिन्होंने वातावर्ण को भारी
01:42कर दिया।
01:44संगीत की उसमायावी धुन में गंधर्व लोग के सभी जीव अपनी सुधबुधखो बैठे थे।
01:51एश्वर्य के मद में चूर होकर उपबरहन ने स्वय को स्रिष्टिकर्ता से भी श्रिष्ट मानने की भूल कर दी।
01:59गंधर्व लोग के द्वारपालों ने इस अनियंतरित अहमकार के विरुध चेतावनी देने का साहस किया, परंतु उनकी आवास अनसुनी रह
02:07गई।
02:09उपबरहन की संगीत मंडली ने उसकी प्रशंसा के ऐसे गीत गाये जो केवल देवताओं के लिए ही सुरक्षित थे।
02:17वातावर्ण में एक अध्भुत और अप्राकृतिक चमक फैल गई जो उसके मोह के चर्मोतकर्ष को दर्शा रही थी।
02:26गंधर्व लोग की विलासिता ने उपबरहन के आत्मसंयम को पूर्णता नश्ट कर दिया था।
02:33देवलोग के संदेशवाहक नारत के अंश के इस पतन को देखकर स्तब्ध थे और वे सूचना देने के लिए निकल
02:40पड़े।
02:41संगीत के सुरों में अब आध्यात मिक्ता के स्थान पर केवल भोगविलास की गंध समा गई थी।
02:48अंकार की पराकाश्ठा पर पहुँचकर उपबरहन ने ब्रहमांडिय नियमों को चुनोती देने का निरनय ले लिया।
02:56गंधर्व लोक के विस्तृत उध्यान में जहां सुगंधित पुष्पों की माया अब उपबरहन के विवेक को धकने लगी थी, वहां
03:04राजकुमारी मालवती का आगमन हुआ।
03:08देवी सरस्वती अपने वीना के तारों पर विशाद भरी धुन छेड़ते हुए उपबरहन के इस अधोपतन को देखकर व्यथित हो
03:16उठी।
03:17उपबरहन की द्रिष्टी जैसे ही मालवती पर पड़ी, उसकी तपोनिष्ट चेतना एक क्षण में ही कामवासना के गहरे सागर में
03:25डूग गई।
03:27स्वर्ण में पुष्पों के बीच मालवती का सौंदर्य किसी दिव्यभ्रम की भांती चमक रहा था, जो उपबरहन के मन को
03:34पूरी तरह मोह लेने के लिए परियाप्त था।
03:38उपबरहन के चारों ओर का वातावर्ण अब गंधर्व लोग की मर्यादाओं को त्याग कर केवल कामुक संगीत और मदमस्थ हवाओं
03:46में परिवर्तित हो गया।
03:48स्वया भगवान विश्णु ने इस मायावी घटना को देख कर देवर्शी नारत के अंश की विविश्टा पर गहरी चिंता व्यक्त
03:56की।
03:57मालवती ने जब मंद मुस्कान के साथ उपबरहन की ओर देखा, तो ब्रहमांड के सारे नियम उस एक पल के
04:04लिए मौन हो गए।
04:17विश्टूर गगन में स्थित इंद्र की सभाभी इस विचित्र द्रिश्य को देख कर स्थब्ध थी की कैसे एक सिध्ध गंधर्व
04:24अपनी तपस्या से चुत हो रहा है।
04:28इंद्रदेव अपनी दिव्यद्रिश्टी से इस पतन की गंभीर्ता को भांपते हुए संकेट देने लगे की आने वाला समय कितना विनाशकारी
04:36होगा।
04:38उकबरहन ने बिना किसी संकोच के मालवती का हाथ थामा और उसके इस पर्ष के साथ ही उसके पिछले जन्म
04:45की सारी पवित्र स्मृतिया विलीन हो गई।
04:49पवित्र गंधर्व लोग की हवाओं में अब उकबरहन के अहंकार की गूंच सुनाई देने लगी थी जो उसे हर नियम
04:56के परे ले जा रही थी।
04:58ब्रह्मा जी की माया अब उकबरहन के अंतर्मन को पूरी तरहे नियंत्रित कर रही थी जिससे उसका हर कृत्य केवल
05:06विलास में लिप्थ हो गया था।
05:09नारद मुनी के वे अंश जो अब उकबरहन बन चुके थे स्वयं के इस मोह को दिव्य आनंद समझ कर
05:16और अधिक गहराते चले गए।
05:19मालवती के हावभाव में चिपी माया ने उकबरहन को ऐसे चक्रव्यूह में उलजा दिया था जहांसे उसका निकलना अब असंभव
05:27प्रतीत होता था।
05:29वातावर्ण में उपस्थित देवी देवताओं के संदेश वाहक इस मोह को देखकर और भी चिंतित हो उठे क्योंकि पतन का
05:37यह वेग अप्रत्याशित था।
05:40उकबरहन का चित्त अब केवल मालवती के रूप और उसकी वानी के मोह पाश में कैध होकर रह गया था।
05:47स्वर्ण महल की दीवारों पर अंकित गंधर्व विद्या के प्राचीन श्लोक भी अब उपबरहन की कामुक ग्रिष्टी से धुमिल होने
05:55लगे थे।
05:57माया की यह शक्ती इतनी प्रचंड थी कि स्वय देवराज इंद्र भी इसे रोकने में असमर्थता व्यक्त करने लगे।
06:05उपबरहन और मालवती की यह भेंट गंधर्व लोग के उस महाप्तन का सूत्रपात बनी जिसकी चर्चा युगों युगों तक की
06:13जाती रहेगी।
06:15गंधर्व लोग के विस्तृत आकाश में उपबरहन ने अपनी एक आगरता को मायावी सुखों की वेदी पर चड़ाना आरंभ कर
06:23दिया।
06:24वेकुंट के स्वन सिनहासन पर विराजे भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उपबरहन के मन में उठते कामुक जवार को
06:33भांप लिया।
06:34उपबरहन ने मालवती का हाथ थामते ही अपनी आत्मिक शक्ती को एक अद्रिष्य कारागार में कैद कर लिया।
06:43सुगंधित पुष्पों की वर्षा के बीच उपबरहन के भीतर का गंधर्व अंश अपनी मर्यादा की रेखा को धीरे-धीरे मिटाने
06:50लगा।
06:52महल के हर कोने में बज रही वीना की मधुर ध्वनी अब उपबरहन को केबल मालवती की हंसी का आभास
06:59देने लगी।
07:00गरुर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पन्पवन के वेग को भी उपबरहन का मोह विचलित करने में असमर्थ रहा।
07:09मालवती की आखों में डूब कर उपबरहन ने अपनी चेतना को गंधर्व लोक के विलासी वैभव में पूर्णता विलीन कर
07:16दिया।
07:18एक क्षणिक ध्रम ने उस स्वर्ण महल की दीवारों को मानो माया के काले आवर्ण से धकना प्रारंभ कर दिया।
07:26स्रिष्टी के संचालन की परवाह छोड़ कर वह गंधर्व उपबरहन अब केवल इंद्रियों की त्रिप्ती को ही अपना एक मात्र
07:33धर्म मान बैठा।
07:36भगवान शिव ने कैलाश परवत से अपनी तीसरी आख की मंद चमक के साथ इस पतन की ओर सचेत द्रिष्टी
07:43डाली।
07:45उपबरहन के हाथों से छूट कर उसके ध्यान की माला नीचे स्वर्ण फर्ष पर बिखर कर तूटने लगी।
07:52पतन की इस बेला में गंधर्व लोग की आभा धीरे-धीरे फीकी पड़कर राख जैसी धुंध में बदलने लगी।
08:00महल के मुख्यद्वार पर स्थित पहरेदार भी इस मायावी मोह के सम्मोहन से जड़वत खड़े रह गए।
08:07स्वयन देवराज इंद्र के सभाकक्ष की गूंज अब उपबरहन के कानों तक पहुँचने में अक्षम हो गई थी।
08:15उपबरहन ने अंजाने में ही ब्रहमांडिय मर्यादा की उस रेखा को लांध लिया जो देवताओं और गंधर्वों के मध्य विद्यमान
08:23थी।
08:25आकाश में नक्षत्र भी मानों इस गंधर्व के मोह को देख कर अपनी दिशा बदलने पर विवश होने लगे।
08:33मालवती के आलिंगन में बंधा उपबरहन अब सत्य के उस मार्ग से मीलों दूर जा चुका था, जो कभी कृष्ण
08:40की भक्ती का था।
08:42देवताओं के दूतों ने जब उस स्वर्ण महल में प्रवेश किया, तो उन्हें वहां केवल विलासिता का सन्नाटा सुनाई दिया।
08:51आंकार और वासना की इस संधी ने गंधर्व लोक के पतन की नीम को पत्थर की भांती अटल बना दिया।
08:58जब उपबरहन ने पहली बार मालवती के प्रेम में स्वयन को खोया, तो गंधर्वों का गौरव काल के प्रवाह में
09:06बहने के लिए तैयार हो गया।
09:08गंधर्व लोक के विस्तरित प्रांगण में अब केवल विलासी संगीत की गूंट शेश रह गई है, जहां स्वर्नस तंभो की
09:16चमक भी उपबरहन की कामुक धुन के आगे मध्धम पड़ गई है।
09:22वैकुंठ लोक में भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा के तट पर शांत मुख मुद्रा में विराजमान हैं, किन्तु उपबरहन के
09:30हृदय में जागरित हो रहे मोह के विश्कों वे अपनी दिव्यद्रिष्टी से देख रहे हैं।
09:36उपबरहन अपनी वीना के तारों पर उंदलिया नहीं, अपितु अपनी इंद्रियों को लुभाने वाली तृष्णा के जाल को बुन रहा
09:44है, जिससे संगीत की दिव्यता लुप्थ होती जा रही है।
09:49महल की दिवारों पर अंकित गंधर्वों की पुरानी कीर्टिगा थाए भी मानो आज उपबरहन के इस पतन को देखकर मौन
09:57हो गई हैं।
09:59गंधर्व लोग के चारों और फैली नदिया अब संगीत की लहरे नहीं, बलकि उपबरहन की एकागरता भंग होने के प्रतीक
10:07के रूप में दिशाहीन बह रही हैं।
10:11गरुर देव ने अपनी तीचन द्रिष्टी से गंधर्व लोग की मर्यादा को गिरते देखा और उनके पंखों की फड़फडाहट में
10:19एक चेतावनी का स्वर गूंढ उठा।
10:22मधोश उपबरहन ने अपनी वीना की लएको मालवती के नयनों की मादक्ता में इस प्रकार मिलाया कि उसे नारायन का
10:30स्मरण भी न रहा।
10:32समय का चकरत हमने लगा क्योंकि जिस वीना का नाद ब्रहमांड को जगाता था, आज वह केवल एक स्त्री के
10:39सौंदर्य की स्तुती कर रहा है।
10:43आकाश के गंधर्व अपने राजा के इस व्यवहार से लजजित हैं और उनकी विनाव से निकलने वाला स्वर धीरे-धीरे
10:50फीका पड़ता जा रहा है।
10:53विश्नु के पार्षदों ने अपनी दिव्य जोती को ढख लिया है, क्योंकि गंधर्व लोग की शुचिता अब कामवासना की काली
11:01छाया तले दबी जा रही है।
11:04मालवती का हास्य उपबरहन के कानों में मधू की भांती घोल रहा है, जिसने उसे अपनी कर्तव्य सीमाओ से मीलों
11:12दूर कर दिया है।
11:14पवित्र गंधर्व लोग के स्तंभों पर अब वासना की राख जमने लगी है, जो इसके वैभव के अंत का संकेत
11:21दे रही है।
11:24ब्रहमा के शाप का प्रभाव उपबरहन के मन में इस कदर हावी है कि उसे अपने भीतर का नारदंश एक
11:31भार प्रतीत होने लगा है।
11:34भगवान शिव कैलाश की एकांत उंचाई से इस गंधर्व पतन को अपनी तीसरी आख के सन्निकट महसूस कर रहे हैं।
11:42उनका मौन ही अब सबसे बड़ी चेतावनी है।
11:46उपबरहन के हाथों की गती वीना पर और भी तीवर हो गई है।
11:51मानो वह अपनी वास्तविक्ता से भागने का प्रयास कर रहा हो।
11:55स्वर्ण महल के द्वारों पर लगी दिव्यमूर्तियां भी इस घोर विलासिता को देख कर अपनी आखे मूंदने को विवश हैं।
12:05गंधर्वों का एक समोह उपबरहन को टोकने के लिए आगे बढ़ा, किन्तु उसकी कामुक ग्रिष्टी ने उन्हें वही ठिठकने पर
12:13विवश कर दिया।
12:15विश्नु के पार्षद वहां से मौन प्रस्थान कर रहे हैं, क्योंकि जहां भक्ती नहीं, वहां उनकी उपस्थिती का कोई ओचित्य
12:23नहीं बचा।
12:24उपबरहन ने संगीत को अपनी आत्मा का साधन छोड़कर केवल इंद्रे सुख का साधन बना लिया है, जो उसके विनाश
12:32का द्वार है।
12:35समय बीत रहा है, और गंधर्व लोग के आकाश का रंग अब पीतांबर की आभा से बदल कर एक गहरे,
12:42अनिष्टकारी क्रिमजन रंग में परिवर्तित होने लगा है।
12:46गंधर्व लोग के विस्तरित प्रांगण में अब संगीत की धुने विलासी विसंगतियों में बदल गई हैं, जिससे समस्त देवसभा में
12:54एक गहरी बेचैनी फैल गई है।
12:58सभा में उपस्थित अन्य गंधर्व कलाकार अपनी विनाओ को थामे हुए, उपबरहन की बदलती वृत्ती को देख कर आपस में
13:06मूख संकेत कर रही हैं।
13:09उपबरहन अपनी विलासिता में इतने लीन हैं कि उन्होंने अपनी दिव्यकला को त्याग कर केवल इंद्रियों के भ्रामक सुख को
13:17ही अपना सत्यमान लिया है।
13:21आकाश में व्याप्त लालिमा धीरे धीरे नीचे उतर रही है, जो गंधर्वों के पतन और उनके अंतर्मन में पनप्रहे मोह
13:29का प्रतीक बन गई है।
13:32देवस्भा के जेश्ट गंधर्वों ने उपबरहन के व्यवहार को अनुशासनहिंता मानते हुए, उसे चेतावनी देने के लिए समीप आने का
13:40साहस किया है।
13:42व्रिध गंधर्व प्रधान ने उपबरहन के समक्ष जुक कर उसे उसकी मर्यादा और संगीत की परंपरा के खोने के प्रती
13:50सचेत करने का प्रयास किया।
13:53उपबरहन ने अपनी विलासी मुद्रा त्याग कर एक क्रूर हंसी के साथ उनके परामर्ष को ही अपनी स्वतंत्रता पर प्रहार
14:01घोशित कर दिया है
14:04सभामंडप के स्तंभों पर उकेरी गई गंधर्वों की प्राचीन आकृतिया मानो इस अधर्म को देख कर अपनी दिव्य आभाख हो
14:12रही है
14:14उकबरहन का मोह अब इतना विक्राल हो चुका है कि वह स्वयं को गंधर्व लोक का एक मात्र अधिपती मानकर
14:22मर्यादाएं लांधने लगा है
14:25सभा में उपस्थित अन्य गंधर्वों ने उपबरहन के तेज में आई इस विक्रिती को देख कर पीछे हटना ही उचित
14:32समझा है
14:34एक गंधर्व गायक ने अपनी वीना को वही त्याग दिया क्योंकि उपबरहन का स्वर अब संगीत न रहकर केवल विलासिता
14:42का कोलाहल बन गया है
14:45वातावर्ण में एक सन्नाटा पसर गया है जिसे केवल उपबरहन के भारी कदमों की आवाज और आकाश से आने वाली
14:53अनिष्टकारी गडगड़ाहट ही तोड रही है
14:57उपबरहन की द्रिष्टी अब अपने आसपास के सौंदर्य से हटकर केवल स्वयं की तुष्टी और भोग की लालसा में सिमट
15:05गई है
15:07आकाश के गहरे लाल रंग ने अब गंधर्वों के उन सुन्दर बगीचों को भी अपनी चपेट में ले लिया है
15:13जो कभी देवलोग की शोभा थे
15:17एक गंधर्व सुन्दरी ने उपबरहन की ओर देखते हुए अपना मुख फेर लिया है क्योंकि उसे अब वहां संगीत के
15:24स्थान पर केवल विनाश की गंध महसूस हो रही है
15:29सभामंदप की छट से गिर्ती हुई दिव्यधूल अब किसी अभिशाप की तरहे प्रतीत हो रही है जो गंधर्वों के पतन
15:37को और गहरा कर रही है
15:40उपबरहन ने अपने दर्बारियों की उपेक्षा करते हुए स्वयन को उचे स्वर्ण सिनहासन पर स्थापित कर लिया है जो अब
15:48किसी स्वर्ण पिंजरे के समान लग रहा है
15:52गंधर्व लोग के रक्षक और संगीत के साधक अब एक एक करके वहां से पलायन कर रहे हैं क्योंकि इस
15:59स्थान का तेज समाप्त हो चुका है
16:03स्वयन उपबरहन को इस बात का आभास भी नहीं है कि उसका यह भोगविलास गंधर्व लोग के महाप्तन का मुख्यकारण
16:11बन चुका है
16:13अंतिम द्रिश में गंधर्व लोग के चारों और काली परचाईयां और गहरी लालिमा चा गई है जो नारत के अंशके
16:21और अधिक पतन की चेतावनी दे रही है
16:25गंधर्व लोग के वैभवशाली प्रासादों की स्वर्णे का आभा अब धुंधली पड़ने लगी है और चारों और सन्नाटा एक भारी
16:33चादर की तरह फैल रहा है
16:36विष्णू लोक में शेशनाग की शया पर विश्राम करते हुए नारायन ने अपनी योगनिग्रा को त्याग कर चिंतामगन नेत्रों से
16:44गंधर्व लोक के पतन को देखा
16:47उपबरहन अपनी विलासी सभा में बैठा था तभी अचानक उसे गूंजती हुई वीना के तार एक भयानक चीख में बदलते
16:55हुए सुनाई दिये
16:58उसके चारों ओर की विलास्पून सामगरियां क्षन भर के लिए धुए में बदल कर शुने में विलीन होती हुई प्रतीत
17:04हुई
17:06उसने अपनी भुजाओं की ओर देखा जहां से गंधर्वों के दिव्यतेज के स्थान पर नारत मुनी की पूर्व स्मृतियों का
17:13एक धुंधला सा आभास उभरने लगा था
17:17नारायन ने गरूर को संकेत दिया जिनकी आखों में ब्रह्मांड की गती और स्रिष्टी के पतन का एक गहरा ज्यान
17:25स्पष्ट रूप से जलक रहा था
17:28उपबरहन ने कापते हाथों से अपनी स्वर्णवीना को दूर फेंका क्योंकि अब उस पर नारत के तपका एक काला साया
17:36मंदराने लगा था
17:38स्रिष्टी के इस सुक्ष्म परिवर्तन ने प्रकृती के समस्त नियमों को जखजोर कर रख दिया जिससे आकाश में काले बादलों
17:46की गर्जना सुनाई देने लगी
17:49गंधर्वों की राजधानी के मुख्यद्वार पर स्थित स्तंभ अपनी नीम से दरकने लगे मानों वे उपबरहन के पापों का बोज
17:57और अधिक नहीं सह सकते थे
18:00भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थामते हुए गंधर्व लोक की और एक तीवर द्रिष्टी डाली जिससे वहां के वातावर्ण
18:08में बिजली जैसी कौन्ध दोड़ गई
18:11उपबरहन अपने ही महल के गलियारों में भागने लगा जिसे अब वह अपनी माया का जाल समझ कर उससे मुक्ती
18:18पाने के लिए संधर्ष कर रहा था
18:22दीवारों पर लगे चित्र जो कभी संगीत और उत्सव के साक्षी थे अब दरावनी आकरितियों की भानती उसे घूरते हुए
18:30प्रतीत हो रहे थे
18:32संपूर्ण गंधर्व लोग के उपर एक भयावः चुप पीछा गई जो भविश्य में आने वाले विनाश के महाविस्पोट की एक
18:40शांत चेतावनी थी
18:43नारायन ने एक दीर्गश्वास ली और उनके मुख से निकली उस दिव्यध्वनी ने गंधर्व लोग की मर्यादा को पुनह परिभाशत
18:51करने की चेश्टा की
18:53महल के मध्य में स्थित वह दिव्य कमल जो अब तक खिला हुआ था धीरे धीरे अपनी पंखुडियों को समेट
19:00कर मुर्जाने लगा
19:03उपबरहन ने गिरते हुए कमल की ओर देखा और उसके कानों में नारत की वह शाप्पून वानी एक प्रतिध्वनी की
19:10तरह गूंजूठी
19:12गंधर्वों की दिव्यध्वनिया अब विकृत हो चुकी थी और उनकी विनाव से केवल आर्तनाध ही सुनाई दे रहा था
19:21विष्णू के क्रोध और करुणा के मिश्रित भाव ने ब्रहमांड के उस हिस्से को एक अजीब सी कापती हुई उर्जा
19:28से भर दिया
19:30अत्ता उपबरहन ने अपने घुटनों पर सिर जुका लिया क्योंकि वह जान चुका था कि उसका अहां अब पूरी तरह
19:37तूट चुका है
19:40आकाश के नक्षत्र भी अपनी जगह से विचलित हो गए जैसे गंधर्व लोग के इस पतन ने स्वयंकाल की गती
19:47को भी भ्रमित कर दिया हो
19:50गंधर्व लोग के अवशेशों के बीच मालवती ने उपबरहन के कापते हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर उसे भौतिक
19:57संसार के जाल में पुनह बांधने का प्रयास किया
20:01विश्नु का सुक्ष्म अंश अभी भी वहां उपस्थित था जो इन दोनों के बीच उपजी आसकती की तीवरता को देखकर
20:09मौन साधे हुए था
20:12मालवती ने अपनी आखों के सम्मोहन से उपबरहन के खोए हुए धैर्य को बटोरने की कोशिश की जैसे कोई डूबी
20:19हुई नाव को किनारे खीचता है
20:23वातावर्ण में एक विचित्र शांती व्याप्थ हो गई जो उस महाप्तन के बाद भी उपबरहन के अहंकार को सुलाने की
20:31एक गहरी साजिश लग रही थी
20:34उपबरहन की चेतना अभी भी नारत के उस दिव्य अंश और मालवती के प्रेम के बीच एक दुविधा का शिकार
20:41थी
20:42मालवती ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि संसार की माया ही एक मात्र सत्य है और स्वर्ग का पतन
20:50केवल एक स्वपन के समान है
20:53उसके शब्दों के प्रभाव से उपबरहन की आँखों में पुनह सांसारिक का मुकता का अंधकार धीरे-धीरे पनपने लगा
21:02उस गंधर्व लोग की दीवारों पर जमी स्वर्ण धूल मानो मालवती के आकर्शन के आगे जुकने लगी हो
21:10इतने में गंधर्व लोग के द्वारपालों ने एक तीवर जटके के साथ प्रित्वी पर गिरने का आभास अनुभव किया
21:17मानो कोई उन्हें नीचे खीच रहा हो
21:21विष्णू का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने देखा कि मालवती की भक्ती वास्तव में उपबरहन के पतन का एक नया
21:28अध्याय लिख रही है
21:31मालवती ने एक स्वर्ण कलश से दिव्य इत्र उपबरहन पर छिड़का जिसकी सुगंध से वह पूरी तरह से इंद्रियों के
21:39अधीन होने लगा
21:41यह सुगंध एक ऐसी मायावी दीवार बन गई जिसने नारत के ज्यान के सभी द्वार उपबरहन के लिए बंद कर
21:48दिये
21:59दिया था मालवती के प्रेम ने एक मीठे विश्की भानती काम किया जिससे उपबरहन को अब ब्रह्मा का ज्यान नहीं
22:08केवल मालवती का मुखमंडल दिखाई दे रहा था
22:13गंधर्व लोग के कोनों से अब गान की ध्वनी के स्थान पर केवल मालवती की चूडियों की खनक गूंजने लगी
22:19थी
22:20यह विलासिता का एक ऐसा चक्रव्यूह था जिसे स्वयंकाल भी भेदने से कत्रा रहा था
22:28उपबरहन का आध्यात्मिक शरीर अब पूरी तरह से मानविय इच्छाओं के भार से जुप गया था
22:34मानो वह भौतिक्ता का एक भारी पत्थर धो रहा हो
22:39विश्णू ने अपनी दाहिनी आख से एक अश्रु गिराया जो धर्ती पर गिरकर एक नए कालखंड की शुरुवात का संकेट
22:46बन गया
22:48मालवती ने उसे आलिंगन में भर लिया और गंधर्व लोग के आकाश में एक गहरा लाल रंग फैलने लगा
22:56ब्रह्मांड की सीमा पर खड़े होकर उपबरहन ने अंतिम बार पीछे देखा किन्तु वहाँ अब कोई राह नहीं बची थी
23:05गंधर्व लोग के उपर आकाश में अचानक बिजली की तीवर गड़गडाहट के साथ सितारों का एक समुह तूटकर बिखरने लगा
23:13जो आगामी महाविनाश की सूचना दे रहा था
23:18वैकुंट के स्वर्ण कमलों पर विराजमान भगवान विश्णु ने अपनी गंभीर द्रिष्टी उस अशांत गंधर्व लोग की ओर मोडी जहां
23:26प्रकृती के नियम स्वय डग्मगाने लगे थे
23:30आकाश के मध्य में अद्रिष्य सुख्ष्म उर्जाओं ने मिलकर एक प्रचंड भंवर का निर्मान किया जिसने गंधर्व लोग के सभी
23:38पुष्प उद्यानों को अपनी चपेट में ले लिया
23:41ब्रहमांड की शांती के संरक्षक देवतागन इस अनपेक्षित खगोली उथल पुथल को देखकर भयाक्रान्थ हो गए थे
23:49मानो स्रिष्टी का संतुलन किसी अद्रिष्य बोच से दब रहा हो
23:55गंधर्व लोग की वास्तुकला जो सदियों से अचल थी आज उन शक्तिशाली स्पंदनों के कारण थर्थराने लगी थी जो ब्रहमांड
24:03के केंद्र से आ रहे थे
24:06गरुर ने अपनी विशाल पंखों से गंधर्व लोग के उपर मंडराते हुए उन हानिकारक तत्वों को हटाने का प्रयास किया
24:13जो स्रिष्टी के विरुध उत्पन हो रहे थे
24:17अचानक गंधर्व लोग के द्वारों पर लगी दिव्य मनिया बुझने लगी
24:21जिससे वहां का दिव्य प्रकाश मंद पढ़कर गेहन अंधकार में विलीन होने लगा
24:28ब्रहमांड के शूने में एक नीरव सन्नाट आचा गया
24:31जो यह संदेश दे रहा था कि गंधर्व लोग के पतन का समय अब समीप आ चुका है
24:38स्वय भगवान शिव ने कैलाश की उचाईयों से अपनी तीसरी आख की चमक को मंद कर दिया
24:44जैसे वे इस महाविनाश की त्रासदी को देख रहे हो
24:49कैलाश के शिकरों पर विराजमान देवाधिदेव महादेव ने त्रिशूल को भूमी में गाड़ते हुए मौन प्रतिग्याली
24:56क्योंकि उनका ध्यान ब्रहमांडिय मर्यादा के उलंधन पर केंद्रित था
25:02कैलाश की तलहटी में स्थित बरफीली जीलों में भी हलचल मच गई
25:06जिससे वहां के शांत जल में विनाशकारी उर्जा की तरंगे उठने लगी
25:12यह खगोलिय संकेत था कि उपबरहन की मर्यादा हिंता ने देवलोक और गंधर्व लोक के बीच का सेतु सदैव के
25:20लिए तोड़ दिया था
25:22गंधर्व लोक के उचे प्रासादों पर जो स्वन कलश्थित थे वे स्वयन चटकने लगे और उनसे दिव्य उर्जा का निर्गमन
25:30होने लगा
25:32भगवान विश्णों के मुख से एक तेजस्वी मंत्र का उच्चारण हुआ जिससे गंधर्व लोक के आसपास की नकारात्मक उर्जाएं एक
25:41पल के लिए ठिठक गई
25:44देवताग्णों की सभा में हडकंप मच गया क्योंकि वे समझ गये थे कि एक गंधर्व की त्रिष्णा अब ब्रहमांडी अगनी
25:51का कारण बन गई है
25:54ब्रहमांड की सीमा पर व्याप्त उस सन्नाटे को गंधर्व लोक से आती चीखों ने चीर दिया जो उस पतन की
26:01तीवरता को दर्शा रही थी
26:04गंधर्व लोक का आकाश जो कभी सुन्दर संगीत से गूंजता था अब एक भयानक गर्जना से भर गया था जैसे
26:12कोई अद्रिष्य दैत्य अपनी जंजीरें तोड रहा हो
26:16भगवान विश्णु का एक और अश्रुगिरा जिसने गंधर्व लोक के चारों और एक सुरक्षा कवच बनाने के बजाए उसे चेतावनी
26:25के अगनी घेरे में ले लिया
26:27पूरी स्रिष्टी का ध्यान अब उस स्थान पर केंद्रित हो गया था जहां एक भूल ने पूरे लोक के अस्तित्व
26:34को दाफ पर लगा दिया था
26:37अंतिम चेतावनी के रूप में गंधर्व लोक के केंद्र में एक विशाल दिव्य वजर गिरा जिसने समस्त वातावर्ण को एक
26:44क्षण के लिए सफेद प्रकाश से भर दिया
26:48गंधर्व लोक की आधारशिला उस वजरपात से थर्थरा उठी और आकाश में बिखरे हुए तारे जैसे किसी अद्रिश्य बोज तले
26:56दब गए
26:58भगवान विश्नु का दिव्यमुख मंडल इस विनाशकारी द्रिशे को देख कर गंभीर हो गया और उनकी मंद मुस्कान लुप्थ हो
27:06गई
27:08उपबरहन ने अपने राजसी कक्ष में मदिरा और संगीत के बीच विलासिता को त्यागने की चेश्टा की लेकिन काम वासना
27:16ने उसके विवेक पर कड़ा पहरा बिठा दिया था
27:20वातावर्ण में गूंजती वह वजर की गर्जना एक प्रतीक थी की काल अब किसी भी मर्यादा को और अधिक सहने
27:27के पक्ष में नहीं है
27:30गंधर्व लोग के चारों और फैली मायावी सुगंध अब सडन में बदलने लगी थी
27:35क्योंकि उपबरहन का मन कृष्ण के नाम को विस्मृत करने की पराकाश था पर था
27:41देवर्शी नारत का वह अंश जो उपबरहन में बसा था अब तडपने लगा था जैसे कोई प्यासा जल की एक
27:49बूंद के लिए आकाश की ओर ताकता हो
27:52महल की दीवारों पर लगे स्वटिकों ने क्रिश्ण के नाम का जब करना बंद कर दिया और उनकी चमक मंद
27:59पढ़कर राख के समान धूसर हो गई
28:02यह पतन केवल एक गंधर्व का नहीं था बलकि उस आत्म विस्मृती की पराजय थी जो भगवान के नाम को
28:10त्याग कर स्वयन को केंद्र में रखने का दुस्साहस करती है
28:15पूरे गंधर्व लोक में सन्नाटा पसर गया, मानो समय का चक्र ठहर गया हो और प्रकृती अपनी सांसे रोक कर
28:22उपबरहन के अगले निर्नय की प्रतीक्षा कर रही हो
28:27भगवान विश्नु के नेत्रों से एक और अश्रुगिरा, जो इस बार गंधर्व लोक के द्वार पर जाकर एक अटूट शिला
28:34में परिवर्तित हो गया
28:36वह शिला अब इस लोक के बाहर जाने के सभी मारगों को अवरुध करने वाली थी, ताकि उपबरहन अपनी भूल
28:44का प्रायश्चित कर सके
28:47अंधेरी गलियों में गंधर्व सैनिक अपनी विलासिता भूल कर अब भयभीत होकर इधर उधर भाग रहे थे, उनकी चमक्ती त्वचा
28:55अब फीकी पढ़ने लगी थी
28:58उपबरहन के मन में उठ रहे काम के विचार अब एक काली अगनी का रूप ले रहे थे, जो उसके
29:04अंतह करण को धीरे-धीरे भस्म कर रही थी
29:08उस अगनी का ताप इतना अधिक था कि महल के अंदर रखे स्वन पात्र पिघल कर तरल रूप में फर्ष
29:15पर बहने लगे
29:17देवर्षी नारद के अंश ने अंतह अपनी आखें बंद कर ली और पूरी शक्ती के साथ कृष्ण के नाम का
29:24स्मरण करने का अंतिम प्रयत्न किया
29:27किन्तु उपबरहन का मोह इतना गहरा था कि वह कृष्ण का नाम लेने के बजाए केवल अपनी प्रियत्मा का नाम
29:34पुकारने लगा
29:36आकाश से गिरे वजर के प्रभाव से गंधर्व लोग के आधार भूत स्तंब उखडने लगे जिससे संपून लोग अधर में
29:44लटकने लगा
29:46भगवान विश्णों ने गरूर को संकेत किया परन्तु गरूर भी इस दिव्य न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने में असमर्थ
29:54थे
29:55पूरी स्रिष्टी इस गंधर्व लोग के महाप्तन को देख रही थी जो स्वयं को देवताओं से भी श्रिष्ट समझने का
30:02दंभ पाल बैठा था
30:05अंत्य उपबरहन के मोह का महल पूरी तरह धराशाई हो गया और उसके साथ ही वह गंधर्व लोग का गौरव
30:12सदैव के लिए मिट गया
30:15गंधर्व लोग के पतन के उपरांत चारों और फैली राख और खंड़रों के बीच उपबरहन की विलासिता का मिथक अब
30:23केवल एक काला इतिहास बनकर रह गया है
30:27भगवान विश्णु ने अपने शेशनाग के आसन पर विराज मान होकर इस विभीशिका को देखा और गरुर से कहा कि
30:34मोह का परिणाम सदैव विनाशकारी होता है
30:39उपबरहन के हृदय में अब केवल अपनी प्रियत्मा और विलासी महलों की यादे बची थी जो उसे वैराज्य के मार्ग
30:46से पूरी तरह भटका चुकी थी
30:50पतन की इस घड़ी में वह गंधर्व स्वयं को एक साधारण मनुष्य की भांती असहाय महसूस कर रहा था क्योंकि
30:57उसकी दिव्य शक्तिया उसके अहंकार के साथ ही समाप्त हो चुकी थी
31:03वातावर्ण में अब केवल गंधर्व लोक के उस अंधकार्मय विलाप की गूँच थी जो एक समय स्वर्ग की मधुर धुन
31:10सुनाया करता था
31:13नारद मुनी जो इस पूरी घटना के साक्षी थे उन्होंने दूर से उकबरहन को उस मायाजाल में फसा हुआ देखकर
31:21एक गहरी दिव्य श्वास ली
31:24उकबरहन के महल के स्वर्ण कलश अब मिट्टी में दब चुके थे जो यह संदेश दे रहे थे कि भौतिक
31:30मोह का अंत सदैफ पतन ही होता है
31:34आकाश में व्याप्त उनकाली बादलों की परचाईयों के बीच गंधर्व लोग का अस्तित्व एक धुन्धली स्मृती मात्र बनकर रह गया
31:43था
31:44विष्णू लोग के द्वार से आई दिव्य हवा ने उन खंधरों को चूते हुए उपबरहन के बीते हुए वैभव को
31:51और अधिक दर्धनाक बना दिया
31:54भगवान विष्णू ने गरूर से कहा कि जो जीव ब्रहमा के सत्य को छोड़कर माया के आलिंगन में बंध जाता
32:01है वह काल के चक्र से कभी मुक्त नहीं हो पाता
32:05उपबरहन अपने घुटनों के बल बैठ गया और उन टुकडों को समेटने का व्यर्थ प्रयास करने लगा जिन्हें समय की
32:13गती ने हमेशा के लिए मिटा दिया था
32:16यह द्रिश्य उस अहमकार का साक्षात प्रमाण था जिसने एक महान गंधर्व को स्वर्ख से उतार कर इस घोर अंधकार
32:24में धकेल दिया था
32:26गंधर्व लोग के चारों और फैली उस खामोशी में एक ऐसी चीख दबी हुई थी जो उस उपबरहन के पश्चाताप
32:34की थी जिसे अभी भी मोह का मोह था
32:38नारद मुनी ने अपनी द्रिष्टी गड़ा कर देखा कि किस प्रकार मोह की बेडिया आत्मा को परमात्मा से विमुख कर
32:45उसे अधोगती की ओर ले जाती है
32:49उपबरहन अब अपनी महलों की चमक के बजाए उस दलदल के भयानक रूप को देख रहा था जहां उसका भविष्य
32:57अब एक अनिश्चित संकट में था
33:00प्रकृती के इस महान न्याय चक्र में न कोई उच्च था न कोई नीच केवल कर्मों का फल ही परम
33:06सत्य बनकर उभर रहा था
33:09विष्णू के संकेतों का पालन करते हुए काल की एक अद्रिश्य तरंग ने उस खंडहर में बची-खुची स्मृतियों के
33:16अंतिम अंश को भी मिटा दिया
33:19गरुर ने अपनी तीक्ष्ण ग्रिश्टी से देखा कि कैसे उपबरहन अब एक विवश्च जीव की तरह अपनी ही परचाई से
33:27लड़ने का अस्फल प्रयास कर रहा था
33:30उपबरहन के महल की दीवारों पर अब केवल कालिक और पश्चाताप की रिखाएं अनकित थी जो उसके उस मोह का
33:38अंत लिख रही थी
33:40इस प्रकार गंधर्व लोक का गौरव मिट गया और उपबरहन का मोह उसे उस अंधेरे की ओर ले गया जहां
33:47अब केवल आत्ममंथन का शेश मार्ग बचा था

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