Episode 12 of the Brahmavaivarta Purana series. After the life-altering divine vision, the boy who was once a servant undergoes a complete transformation. Witness the descent of divine wisdom, the dissolution of his past karma, and the emergence of a soul ready to transcend the mortal plane. Will he return to society or merge into the cosmic consciousness? Join us on this journey of enlightenment. #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #HinduMythology #Spirituality #KrishnaBhakti #AncientSecrets #DivineAwakening #PuranicWisdom
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00:00बालक का शरीर उस रहस्यमेई वन के मध्य में एक जीवन्त मूर्ती की भांती स्थिर है, जहां समय का चक्र
00:07भी मानों उसके चर्णों में विश्रान कर रहा है।
00:11बैकुंठ धाम में शेशनाग की शया पर विराजमान भगवान श्री हरी विश्नु अपनी माया के इस अध्भुत विस्तार को देख
00:19मंदमंद मुस्कुरा रही हैं।
01:10जहां भौतिक नियम गौण हैं।
01:16बालक के भीतर समाहित वह दिव्य प्रकाश अब उसके सांसों के साथ मिलकर प्रकृती के कंकन को स्पंदित कर रहा
01:23है।
01:25प्रकृती का नियम अब इस बालक के समीप आकर ठहर गया है और वन की वायू भी अब एक मंत्र
01:32की भांती प्रवाहित हो रही है।
01:35इस गहन सन्नाटे में जो स्वयन स्रिजन का संगीत है बालक के मन की शुन्यता परमात्मा की उपस्थिती का अनुभव
01:43कर रही है।
01:46भगवान विश्णु का सुक्ष्म अंश उसवन की हर पत्ती और हर तिनके में व्याप्थ होकर बालक की रक्षा कर रहा
01:53है।
01:55बालक का भौतिक शरीर अब कठोर धरातल की सीमाओं से मुक्ठ होकर आकाश के समान सुक्ष्म और अलौकिक हो चला
02:02है।
02:04यह वहक्षन है जब मृत्यो लोक का एक साधारन बालक देवर्शी की पात्रता प्राप्त करने की पहली सीही पर खड़ा
02:11है।
02:13वन के अंधकार मै कोनों में भी अब उस दिव्य प्रकाश की किरने प्रवेश कर गई हैं, जहां माया के
02:20प्रभाव सदा के लिए नश्ठ हो चुके हैं।
02:23ब्रह्मा जी अपने सत्यलोक से इस अध्भुत ग्रिशे को देखकर वेदों की रिचाओं का मुख गान कर रहे हैं।
02:32बालक के ललाट पर एक तेज पुन्ष चमक रहा है, जो उसके आगामी देवर्शी स्वरूप की उद्गोशना कर रहा है।
02:41वायु मंडल में ओ तीन मा का नाद स्वतह ही गूँजने लगा है, जिससे पशुपक्षी भी अपनी जड़ता त्याग कर
02:48स्तब्ध खड़े हैं।
02:50स्रिष्टी के नियामक अब इस बालक के माध्यम से मृत्यु लोक में एक नई धर्मक्रांती का सूत्रपात करने जा रहे
02:58हैं।
03:00उसका हरिदय अब धड़कना बंद कर चुका है, क्योंकि अब उसमें परब्रहम का शाश्वत प्रेन धड़क रहा है।
03:07वह सोया नहीं है, अपितु वह उस अनंत सत्य में विलीन हो रहा है, जहां से पूरी स्रिष्टी का उदे
03:14होता है।
03:17बालक के नेत्रों के समक्ष संसार का धूलधूसरित को लाहल धीरे-धीरे पिघल कर एक दिव्य प्रकाश पुझ में विलीन
03:24हो रहा है।
03:26विश्णु लोक के द्वार पर खड़े होकर भगवान नारायन की निल्मनी के समान देदी प्यमान काया मंद मुसकान के साथ
03:34उस बालक की आत्मा को निहार रही है।
03:38बालक के हाथों से उसके फटे हुए वस्त्र जड़कर गिर रहे हैं, मानो माया का वह पुराना आवन अब उसका
03:45भार और अस्तित्व त्यात चुका हो।
03:48उसका हृदय अब केवल नाम नहीं जबता, बलकि ब्रहमान की हर धड़कन उसके भीतर स्वयन को प्रतिध्वनित कर रही है।
03:57समय की धारा ने अपनी गती को पूरी तरह से रोक लिया है, जैसे कोई कलाकार चित्रपूर्ण होने पर अपनी
04:05तूली का थाम लेता है।
04:08नारद मुनी ने वीना के तार को थोड़ा सा हिलाया, और उस ध्वनी से बालक की स्मृती की अंतिम गाठ
04:15भी खुल गई।
04:17उसके बाल्यकाल के वो कड़वे अनुभव, जिनहें उसने अपनी नेती माना था, अब रेत की तरह उसकी पकड़ से फिसर
04:24रहे हैं।
04:26परब्रहम का वह विराठ स्वरूप अब उसके रोम्रोम में समाया हुआ है, जिससे उसकी काया में दिव्य कांती का संचार
04:34हो रहा है।
04:36मृत्योलोक का वह वन अब उसे एक दिव्य तपोभूमी के समान प्रतीत हो रहा है, जहां स्वयनकाल भी नत्मस्तक खड़ा
04:44है।
04:46गरुर्देव के विशाल पंखों की फड़फडाहट से ब्रहमांड की वायु में एक दिव्यस पंदन उत्पन हुआ है, जो बालक की
04:53चेतना को जगा रहा है।
04:56बालक ने अपनी आखें खोली और उनमें अब कोई शूद्र या दास का भाव नहीं, बलकी अनंत ब्रहमा का महासागर
05:04लहरा रहा है।
05:06उसके चारों और एक सुरक्षा धेरा निर्मित हुआ है, जिसे माया के मायावी दानव भी लांधने का साहस नहीं कर
05:14सकते।
05:15विस्तृत आकाश में नक्षत्र भी अपनी स्थिती बदल कर इस बालक के उदे का नमन कर रहे हैं।
05:24भगवान शिव अपने ध्यान में मुदित हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह बालक अब परब्रहम के अंश के रूप
05:30में जागरित हो चुका है।
05:33बालक ने अब धर्ती को स्पर्श किया, और उसके चर्णों के नीचे के पाशान भी मानो स्वर्ण में परिवर्तित होकर
05:41पुष्ट बरसा रही हैं।
05:43ये क्षण स्रिष्टी के इतिहास में अमर हैं, जब मृत्यों लोग के एक दास ने देवत्व की चरम सीमा को
05:50प्राप्त कर लिया।
05:52संसार के सभी भौतिक बंधन अब उसके अस्तित्व से दूर हो चुके हैं, जैसे सूर्य के ताप से उसकी बूदें
06:00सूख जाती हैं।
06:01वह अब केवल एक बालक नहीं, बलकि ब्रहम वैवर्क पुराण के उस दिव्य अध्याय का केंदर बन चुका है, जो
06:10ब्रहमांड की नीम भिला देगा।
06:11उसके मुख से अब कोई साधारण शब्द नहीं, बलकि साक्षात वेदों की रिचाय स्वतह ही प्रवाहित होने को आतुर हैं।
06:21परव्रहम का वह प्रथम प्रक्टी करण अब पूर्ण हो चुका है, और मृत्य लोक में धर्म का एक नया सूर्य
06:29उदित होने के लिए तैयार है।
06:32शूनी की उस अनंत गहराई में, जहां समय की धारा थम गई थी, आकाश से एक गुंजती हुई दिव्यध्वनी ने
06:40बालक के अस्तित्व को जखजोर कर रख दिया।
06:43स्वय नारायन के रूप में अवतरित श्री कृष्ण की मुखाकृती प्रकाश के पुंच से प्रकट हुई, जिसकी आभाने संपूर्ण लोक
06:51को एक अलोकिक नीले रंग में सराबोर कर दिया।
06:55वह आवाज गूंज रही थी कि कैसे बालक का हर कष्ट, हर आसू और हर अपमान केवल उसकी आत्मा को
07:03कुंदन की तरह तपाने का एक पवित्र अगनिसंसकार था।
07:08ब्रहमांड का स्वामी स्वयन उस बालक के भीतर व्याप्त असीम क्षमता को संबोधित कर रहा था, मानो वह उसके रोमरों
07:16को दिव्य चेतना से अभिसिंचित कर रहा हो।
07:19उस दिव्यस्वर ने समझाया कि शूद्र का जन्म तो केवल एक आवर्ण था, जिसे पहनकर आत्माने मृत्य लोक में धर्म
07:27के पुनृत्थान की कठिन परीक्षा चुनी थी।
07:49सूखी धर्ती वर्षा की पहली बूंद को अपने भीतर समाहित कर लेती है।
07:55वातावर्ण में दिव्य सुगंध भर गई और आकाश से फूलों की ऐसी वर्षा होने लगी, मानो स्वर्ग के देवतास्वय इसक्षन
08:03के साक्षी बन रहे हो।
08:06विस्तरत ब्रह्मांडिय पट पर वह बालक अब केवल एक साधारन मनुष्य नहीं रहा, बलकी एक ऐसा प्रकाश स्तंभ बन गया
08:14जो अंधकार को मिटाने के लिए परियाप्त था।
08:18दिव्यध्वनी ने आदेश दिया कि अब उस बालक को वह ज्ञान प्राप्त करना होगा जो स्रिष्टी के आरंब से ही
08:25केवल कुछ ही महापुरुशों को सुलब हुआ था।
08:29बालक के अंतर्मन में ज्ञान का एक अखंड स्रोत फूट पड़ा, जिससे उसके मुख से स्वतह ही वेदों के मंत्र
08:36निर्जर की भांती प्रवाहित होने लगे।
08:39यह वहक्षन था जब मृत्यु लोग का नियम पूरी तरहे बदल गया, क्योंकि एक शूदर बालक अब वेदों का साक्षात
08:47उद्गोशक बन चुका था।
08:49श्री कृषन की उपस्थिती का प्रभाव इतना प्रबल था कि बालक का भौतिक शरीर भी एक दिव्य तेज से चमकने
08:57लगा था, जैसे वह स्वयन स्वर्ण का बना हो।
09:01नारायन ने उसे अपना हस्तक्मल दिखाया और बालक ने उस पर अपना मस्तक रखकर पूर्ण समर्पन का अंतिम सूत्र पूरा
09:09किया।
09:10जैसे ही बालक का मस्तक भगवान के चर्णों में लगा, उसके सारे पूर्व जन्मों के बंधन एक जटके में भस्म
09:18होकर धूल में मिल गए।
09:20चारो और व्याप्त दिव्य सन्नाटा अब एक दिव्य संगीत में बदल गया, जहां हर स्वर कृष्ण की प्रेमलीला का गान
09:27कर रहा था।
09:29स्रिष्टी का संतुलन अब पुनर सन्योजित हो रहा था, और मृत्यो लोक में पहली बार परब्रहम की कृपा का अमरित
09:36बरसने के लिए तयार हो गया था।
09:40विष्णु का वह रूप धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन होने लगा, किन्तु बालक के भीतर अब वह दिव्य चेतना सदैव
09:47के लिए स्थापित हो चुकी थी।
09:50बालक अब केवल एक पात्र नहीं, बलकी परब्रहम का जीवन्त प्रमान बन चुका था जो आने वाली पीधियों के लिए
09:57धर्म की नई परिभाशा लिखेगा।
10:00सत्य का वह प्रथम सूर्य उदित हो चुका था और मृत्यु लोग का अंधकार अपनी अंतिम सासे गिन रहा था।
10:09बालक का भौतिक शरीर अब एक भारहीन फूल की तरह प्रतीत हो रहा था, जैसे उसके भीतर के सभी सामाजिक
10:16बंधन और पूर्वजन्मों की बेडिया स्वतह तूटकर बिखर गई हो।
10:21स्वया भगवान विश्नु का तेजस्वी स्वरूप जिनकी त्वचा मेगशामल है और नेत्र कमल के समान कोमल हैं, मंदमुसकान के साथ
10:30बालक की स्थिती का सूक्ष्म निरीक्षन कर रहे हैं।
10:35उस बालक ने अनुभव किया कि उसकी देह के कंकन से वह पुराना जर्त्व समाप्थ हो रहा है और उसकी
10:42चेतना एक दिव्य प्रकाश पुंज में विलीन हो रही है।
10:47मृत्योलोक का वह वातावर्ण जहां कभी केवल अंधकार का सामराज्य था, अब परब्रहम की पहली उपस्थिती के कारण एक दिव्य
10:55स्पंदन से थर्थरा उठा है।
10:59वन के उन प्राचीन व्रिक्षों के तनों से अब दिव्य संगीत की ध्वनी गूंजने लगी, जो बालक के भीतर के
11:06मौन को एक नई वानी प्रदान कर रहे थे।
11:09गरुर के पंखों की तीवर फडफडा हटने वायुमंडल में एक अलौकिक उर्जा भरदी, मानोवे परब्रहम के संदेश को संसार के
11:18चारों दिशाओं में प्रसारित कर रहे हूं।
11:21बालक के पैरों के नीचे की धूल अब सामान्य मिट्टी नहीं, अपितु ब्रहमांड के रहस्यमय अक्षरों के रूप में चमकने
11:29लगी थी।
11:31यह वहक्षन था जहां समय की धारा रुप गई और मृत्यु लोग की सीमाएं अनंत आकाश में विलीन हो गई।
11:39विश्नु के स्वरूप से निकला प्रकाश अब बालक के हृदय में समाहित हो रहा था। उसे एक साधारन बालक से
11:46देवर्शी के मार्क पर ले जाने के लिए।
11:50भगवान विश्नु के नेत्रों में करुणा का सागर लहरा रहा था, जो उस बालक की अनंत जन्मों की तडप को
11:56पूर्णता प्रदान कर रहा था।
11:59बालक ने अपनी आखे बंद की और उसे अपने अस्तित्व के हर अनों में स्रिष्टी का स्पंदन सुनाई देने लगा।
12:08आकाश में देवताओं के वाध्ययंत्रों की मधुर ध्वनी गूंज उठी, जो एक नए युग के उदे का संकेत दे रही
12:15थी।
12:17वन की हर लता और पुष्प अब बालक के चर्णों में नत्मस्तक थे, मानों वे भी इस महान रुपांतरण के
12:24साक्षी बन रहे हूं।
12:26गरुर ने एक गौरवशाली गर्जना की, जिससे बालक के आसपास का वायुमंडल एक अभेद्य सुरक्षा कवच से ढख गया।
12:35बालक की देह से उठती हुई दिव्य आभा ने उस चेत्र के सभी विशाक्त तत्वों को शुद्ध कर दिया और
12:42वहां शांती का सामराज जिस्थापित हो गया।
12:46यह संपूर्ण द्रिश एक चित्र की भांती जम गया, जहां काल भी अपनी गती भूल कर उस अलौकिक मिलन को
12:53निहारने लगा।
12:55विश्नु का वहरूप अब पूर्ण तह बालक के हृदय में विलीन हो चुका था, जिससे उसका आत्मबोध चरम सीमा पर
13:02पहुँच गया था।
13:05दिव्य चेतना के इस आगमन से बालक के चहरे पर एक ऐसी आभा आई, जिसने मृत्य लोग के अंधकार को
13:12सदा के लिए परास्त कर दिया।
13:14सत्य का वह प्रथम सूर्य अब पूरी तरह से उदित हो चुका था, जिसके प्रकाश में धर्म की नई संहिताय
13:22लिखी जानी थी।
13:24मृत्य लोग का अंधकार अपनी अंतिम सासें गिन रहा था और बालक एक दिव्य देवर्शी के रूप में परिवर्तित होकर
13:31अपनी यात्रा के अगले चरण के लिए तयार था।
13:35शुने की इस अनंत गहराई में बालक ने अपने चारों और व्याप्त उस मौन को अनुभव किया जो स्वयं ब्रहमांड
13:43के जन्म से पहले का सन्नाटा था।
13:45श्री विश्नुक शीरसागर के तटपर विराजित उस बालक की अदमय इच्छा शक्ती को देखकर मंद मुस्कान के साथ स्वयं के
13:54अंतरध्यान होने का संकेट देते हैं।
13:58बालक अपने भीतर की अगनी को प्रजवलित करता है, जिससे उसका सुक्ष्म शरीर प्रकाश की किर्णों में बदल कर उस
14:05मौन को भेदने के लिए ततपर होता है।
14:10सन्नाटा एक भारी कपाट की तरह बंध होने लगा, मानो प्रकृती स्वयं उसकी परीक्षा ले रही हो कि क्या वह
14:17शब्दहीन होकर भी भक्ती को जीवन्त रख पाएगा।
14:21वह विस्त्रित मरुस्थल सा आभास होता है, जहां न कोई ध्वनी है, न कोई स्पंदन मात्र बालक की धड़कन ही
14:29उस स्थान का एक मात्र अस्तित्व शेश रह गई है।
14:34भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी आखे बंद करके उस बालक की तपस्या की परीक्षा में अपना मौन योगदान
14:41दे रहे हैं।
14:44बालक ने अपनी श्वासों को रोक कर उस सन्नाटे के साथ एकाकार कर लिया है, जिससे अब उसे ध्वनी का
14:51अभाव भी दिव्य संगीत के समान प्रतीत हो रहा है।
14:56आकाश में बिखरी वे दिव्य ऊर्जाय अब एक वृत्ताकार घेरे में सिमट रही हैं, जो उसकी परीक्षा के अंतिन द्वार
15:04का संकेत हैं।
15:06शुने के विस्तार में अब केवल प्रकाश का सामराज्य है, जहां बालक को अपनी ही छाया से साक्षातकार करना पड़
15:14रहा है।
15:16गरुर देव अपनी विशाल पंखों से उस सन्नाटे को चिर्ते हुए बालक के चारों और एक सुरक्षा घेरा बना रहे
15:23हैं।
15:25बालक अपनी इंद्रियों को पूरी तरह वश में कर चुका है, अब उसके नेत्रों में बाहरी जगत नहीं, बलकी भीतर
15:33का सत्य प्रतिविंबित हो रहा है।
15:36सन्नाटा अब एक प्रचेंड गर्जना में बदल गया है, जो उसकी आत्मा के द्रिड संकल्प की परीक्षा ले रहा है।
15:45वह अनंत्वन जहां समय रुका हुआ था, अब एक स्वर्ण युग के द्वार में परिवर्तित होने लगा है।
15:53श्री कृष्ण की माया, जो अब तक उजल थी, अब उस बालक के हिदय में एक दिव्य जोती के रूप
15:59में धड़क रही है।
16:02बालक ने उस मौन को अपनी प्रार्थना बना लिया है, जिससे पूरा ब्रहमांड अब उस गूँच को महसूस कर पा
16:09रहा है।
16:11ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी इस घटना को देख रहे हैं, क्योंकि एक शूदर बालक अब सृष्टी के रहसियों को सुलजाने
16:19के योग्य हो चुका है।
16:21परीक्षा का हर पल बालक के अस्तित्व को और अधिक शुद्ध और पवित्र बना रहा है, जिससे वह देवर्शी पद
16:29की ओर अग्रसर है।
16:32शुने से निकली एक दिव्य गूंज ने उस मौन को पूरी तरह समाप्त कर दिया, मानो स्वयं पर ब्रह्म ने
16:38बालक की पुकार स्विकार कर ली हो।
16:41बालक के चहरे पर अब एक ऐसी चमक है, जो किसी साधारन मनुष्य की नहीं, बलकी साक्षात देवर्शी की आभा
16:49है।
16:51सत्य के उदे के साथ ही वह बालक अब उस शिखर पर है, जहां से वह मृत्युलोग के भाग्य को
16:58नई दिशा देने के लिए तयार है।
17:01अनंत अंतरिक्ष की लहरें उस बालक के मस्तिश्क में ब्रह्मा के स्वरूप को ऐसे उकेर रही हैं, जैसे शांत जल
17:09में चंद्रमा का प्रतिबिंग उभरता है।
17:13भगवान विश्नु का चतुर्भुज रूप उस बालक के हृदय में प्रकट हुआ, जिसके चार हाथों में शंक, चक्र, गदा और
17:20पद्म का तेज एक दिव्य सुरक्षा कवच बना रहा है।
17:25बालक की उंगलियों से निकले ज्ञान के स्पंदन ने धरा को कमपित कर दिया, मानो वेदों की रिचाएं पहली बार
17:32प्रिथवी की मिक्टी में सांस ले रही हो।
17:35समय का चक्र बालक के चारों और एक सुनहरी आभा के रूप में घूमने लगा, जो उसे अतीत और भविष्य
17:42के मिलन बिंदु पर स्थित कर रहा है।
17:46ब्रहमांड के निर्माता ब्रहमाजी ने उस बालक की गोर अपनी दिव्यद रिष्टी डाली, जिससे स्रिष्टी के सभी रहसियों की चाबिया
17:54उस ननहे मन में समा गई।
17:57देवर्शी नारद का सूक्ष्म स्वरूप बालक के सम्मुख हाया, और उन्होंने अपनी वीना के तार छेड़ कर ज्यान की उस
18:04ध्वनी को गूंजने पर विवश कर दिया।
18:07बालक ने श्वास लीतो ब्रहमांड के नक्षत्र उसके भीतर अपनी कक्षा बदलते प्रतीत हुए, मानो वह स्वयन स्रिष्टी का केंदर
18:16बन गया हो।
18:18शाश्वत सत्य की पहली किरण बालक के मस्तक पर एक तिलक की भांती चमकी, जिसने उसके सांसारिक बंधनों को सदा
18:26के लिए राख कर दिया।
18:28विशाल वटवरिक्ष की छाया में बैठा वह बालक अब न केवल स्वयन को, बलकी समस्त चराचर जगत को एकाकार देख
18:36रहा है।
18:37श्री कृष्ण ने अपनी मुरली की एक ऐसी तान छेडी जिसे सुनते ही बालक के नेत्रों से भक्ती के अश्रुधारा
18:45बह निकली, जो दिव्य ज्यान में परिवर्तित हो गई।
18:48बालक के हाथों में एक अद्रिश्य ग्रंथ प्रकट हुआ, जिसकी लिपी न केवल देवताओं को ग्यात है, बलकी वह स्वयन
18:57स्रिजन का सार है।
18:59समय का प्रवाह रुप गया है और चारों दिशाओं में ब्रहम वैवर्त पुरान के पवित्र मंत्रों की गूंज एक अलौकिक
19:06संगीत की भांती सुनाई दे रही है।
19:10बालक के मस्तक पर स्थित तीसरी आख के स्थान पर ज्यान का एक सुक्ष्म बिंदु चमक उठा, जिसने माया के
19:17परदे को स्थाई रूप से हटा दिया।
19:20अद्रिश देवगन आकाश से पुष्प वर्षा कर रहे हैं क्योंकि मृत्य लोक में ज्यान का एक नया सूर्य उदित हो
19:28चुका है।
19:30बालक ने उठकर अपनी दृष्टी जब च्षितिच पर डाली, तो उसे परवत और नदिया भी परब्रह्म के ही अंग दिखाई
19:37दिये।
19:38उसका हर कदम अब प्रिथवी के लिए एक आशिरवाद है, जो पत्थरों को भी चेतना और सूखी धर्ती को फलदाई
19:46बनाने की क्षमता रखता है।
19:50ब्रहमांड की समस्थ शक्तियां अब उस बालक की एकागरता के संकेत की प्रतीक्षा कर रही हैं, जैसे शांत समुद्र ज्वार
19:58की प्रतीक्षा करता है।
20:00बालक ने मुस्कुरा कर आकाश की ओर देखा, जहां सत्य का पूर्ण प्रकाश अब उसकी आत्मा में समाहित हो चुका
20:08था।
20:09संसार अब तक जिसे केवल एक साधारन बालक समझ रहा था, वह आज से देवर्शी की उपाधी का प्रथम अधिकार
20:17बन चुका है।
20:20परब्रम का पहला साक्षातकार मृत्यू लोग के इतिहास में एक ऐसा स्वर्ण अध्या लिखने जा रहा है, जिसे समय भी
20:27मिटाने में असमर्थ है।
20:30बालक ने अपनी जीन शीन वस्त्रों की गांट को खोलते हुए संसार की नश्वर्ता को सदा के लिए बिदा करने
20:37का संकल्त लिया।
20:40वैकुंट के स्वर्ण सिनहासन पर विराजे श्री विश्नु अपने सुदर्शन चक्र के प्रकाश से बालक के त्याग को देख मंदमंद
20:47मुस्कुरा रहे थे।
20:49बालक ने जैसे ही वस्त्रत्यागने के लिए अपना हाथ उठाया। उसके रोमरोम से दिव्य जोती की रश्मिया फूट कर वन
20:57को आलोकित करने लगी।
20:59यह वहक्षन था जब माया का अंतिम आवन गिरकर धरा की धूल में विलीन हो गया, जैसे पच्छड के बाद
21:07व्रिक्ष स्वयं को पूर्ण कर लेता है।
21:11विशाल वट व्रिक्ष की छाव में खड़ा वह बालक अब किसी शूद्र के रूप में नहीं, बलकी एक तेजपुंजरिशी के
21:18रूप में प्रतिष्थित हो रहा था।
21:21गरुर देव ने आकाश से नीचे उतरते हुए उस बालक के त्याग को नमन किया। उनके पंखों की फड़फडाहट ने
21:29ब्रहमाड में एक पवित्रध्वनी उत्पन्न की।
21:32बालक का शरीर अब काया नहीं, बलकी भक्ती की अगनी में तपा हुआ एक शुद्ध स्वर्ण का कलश बन चुका
21:39था।
21:41माया की जंजीरें, जो अब तक उसके अस्तित्व को बांधे हुए थी, स्वय ही तूटकर आकाश में नक्षत्रों की तरह
21:49बिखर गई।
21:50कैलाश के एकांत में समाधिस्थ शिव की तीसरी आख में एक हलकी सी चमकाई, मानो वे भी इस महान त्याग
21:58के साक्षी बन रहे हुँ।
22:01भगवान शिव ने अपनी जटाओं को समेटा और मंद स्वर में बोले की मृत्यू लोक में आज अधर्म का सबसे
22:08बड़ा अंधकार परास्थ हो गया है।
22:11बालक के चर्णों के नीचे की भूमी पर अब कमल के पुष्प स्वत खिलने लगे थे, जो उसके पूर्ण समर्पन
22:18की गवाही दे रहे थे।
22:20त्याग के इस अंतिन सोपान पर बालक ने अपनी आखे मूंद ली और स्वयं को ब्रहमांड की अनंत चेतना के
22:28चर्णों में अर्पित कर दिया।
22:31उस रहस्यमई वन की वायू भी अब शांत थी, मानो पूरी स्रिष्टी उस बालक के आत्मबोध की प्रतीक्षा कर रही
22:38हो।
22:40स्वयं ब्रहमाजी ने अपने मानस पुत्रों को आदेश दिया कि वे इस नए देवर्शी का स्वागत करने के लिए तत
22:47पर रहें।
22:48बालक का पुराना व्यक्तित्वराख बनकर उड़ गया और उसके स्थान पर एक प्रकाश्मान दिव्य स्वरूप का उदे हुआ।
22:57संसार की माया अब उसे स्पर्श नहीं कर सकती थी क्योंकि उसने स्वयं को सत्य के समुद्र में विलीन कर
23:04दिया था।
23:06पूरे मृत्य लोक में दिव्य शंकनाद की ध्वनी गूज हुठी, जिसे सुनकर सभी सिध्ध और योगियों की समाधी तूट गई।
23:15देवताओं ने पुष्पों की वर्शाकर उस बालक का अभिनंदन किया, जो अब परब्रहम के अंश के रूप में धरापर जीवित
23:22था।
23:24बालक ने अब अपनी दिव्य द्रिष्टी खोली, जिसमें अब केवल प्रेम और करुना का अनंत सागर लहला रहा था।
23:32शूद्र बालक के इस परमत्याग ने इतिहास की धारा बदल दी और आज से ब्रहम वैवर्थ पुराण का एक नया
23:40अध्याय आरंभ हुआ।
23:42ब्रहमांड की शून्यता को चीरती हुई आकाश गंदा के केंद्र में एक दिव्य नक्षत्र समूह ने अपनी आभासे समस्त दिशाओं
23:50को प्रकाशित कर दिया।
23:53श्री हरी विष्णु ने शेशनाग की शया पर लेटे हुए अपनी कमल नयनों को खोला और उस बालक की ओर
23:59संकेत करते हुए मंद मुस्कान बिखेरी।
24:03आकाश के ठीक मध्य में धुरुवतारा के समान एक नया प्रकाश बिंदु उभ्या जो उस बालक के पूर्व जन्म के
24:11अंत और दिव्य उदे का प्रमान बना।
24:14वन की वायू में एक अध्भुत सुगंध घुल गई, मानुस्वयं प्रकृती ने उस बालक के मस्तक पर परब्रहम के अभिशेक
24:22का निमंतरन स्विकार कर लिया हो।
24:25शूद्र बालक ने अपने चारों और व्याक्त मायावी अंधकार को सिमटते हुए देखा, जहां अब केवल दिव्यता का प्रकाश शेश
24:33था।
24:34कैलाश परवत पर बैठे महादेव ने अपनी त्रिनेत्र की ज्वाला को शांत करते हुए बालक के इस अलोकिक परिवर्तन पर
24:42अपनी सहमती व्यक्त की।
24:45नक्षत्रों के उस विशिष्ट विन्यास ने धर्ती की कमपन को रोक दिया, जैसे समय स्वय उस बालक के अगले कदम
24:52की प्रतीक्षा में ठहर गया हो।
24:55प्रकृती के कणकण में अब उस बालक का नाम गूंजने लगा था, जो अब शूदर की पहचान त्याग कर परब्रहम
25:02के अंश के रूप में प्रतिष्थित हो चुका था।
25:06आकाश से उतरती हुई प्रकाश की किरने उस स्थान को घेर रही थी, जहां बालक ने अपनी तपस्या के प्रथम
25:13सोपान को पूर्ण किया था।
25:16देवराज इंद्र ने अपने दिव्य रत से उतर कर उस बालक के सामने नत्मस्तक होने का साहस किया क्योंकि अब
25:23बालक की आभा स्वय देवों के तेज को भी परास्त कर रही थी
25:28बालक ने अब अपनी हथेलियों को फैलाया, जिनसे निकलती दिव्य उर्जा ने जंगल के सूखे पत्तों को भी पुनर जीवित
25:36कर दिया
25:38ब्रहमांडिय संगीत की मधुर स्वरलहरिया उसवन की सीमाओं को तोड़ कर संपूर्ण मृत्य लोक में व्याप्थ होने लगी
25:46समस्थ दिशाय अब एक ऐसे प्रकाश पुन्ष से आलोकित थी, जिसकी उष्णता में प्रेम का शितलता भरा संदेश छिपा था
25:55महर्शी नारद ने अपनी वीना को थाम लिया, क्योंकि बालक के मुख से निकलने वाला मौन भी वेदों की रिचाओं
26:02के समान पवित्र हो गया था
26:05वह दिव्य नक्षत्र समोह अब बालक के सिर के ठीक उपर एक मुकुट की भांती स्थिर हो गया, मानो आकाश
26:12स्वयन उसकी पूजा कर रहा हो
26:15उसकी उपस्थिती मात्र से उस वन के मायावी बंधनों का अस्तित्व सदा के लिए समाप्थ हो गया
26:23धर्ती ने उस बालक के चर्णों को स्पर्ष करने के लिए स्वयन को कोमल बना लिया, जैसे वह बालक के
26:29भार को नहीं, बल्कि उसके दिव्य स्वरूप को स्वीकार कर रही हो
26:34श्री कृष्ण के उस अद्रिश्य हाथ ने बालक के मस्तक पर अपना आशिरवाद रखा, जिससे बालक की दिव्यद्रिष्टी और अधिक
26:43तीवर हो गई
26:45स्रिष्टी के इस महान परिवर्तन को देखने के लिए स्वर्ग के द्वार तक खुल गए, जहां से देवताओं ने पुष्प
26:52व्रिष्टी की
26:53शूद्र बालक अब परब्रहम के अवतार के रूप में इस धरा पर उतर चुका था, जिसका उद्देश्य अब केवल धर्म
27:01की स्थापना करना था
27:03बालक के पच्चिनहों से अब वह अलौकिक जोती फूट रही थी, जो काल के चक्र को पीछे छोड़ कर एक
27:10नई सनातन यात्रा का आरंभ कर रही थी
27:14वैकुंट के स्वर्णप दो से विचलित होकर देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा, जिससे निकलने वाले स्वर्श्वयं
27:22ब्रहमा के आगमन की सूचना दे रहे थे
27:26बालक ने अपनी दिव्यद रिष्टी से उन गुप्त कंदराओं को देखा, जहां सदियों से रिशियों ने तपस्या की अगनी को
27:33अपने भीतर संजोया था
27:36आकाश मंडल में देवताओं का मौन गूझ रहा था, जैसे संपूर्ण ब्रहमांड इस शूदर बालक की अगली पच्चाप का इंतजार
27:44कर रहा हो
27:46वन की मूख वनस्पतियां भी उसके स्पर्ष से स्पंदित होने लगी और मार्ग के काटों ने स्वयन को पुष्पों में
27:53रूपांतरित कर लिया
27:55श्री हरी के संकेत पर पवन देव ने शीतल मंद सुगंधित समीर प्रवाहित की, जिसने बालक के श्रम को पूर्णत
28:03हर लिया
28:04वह अब साधारन शूदर नहीं रहा, अपितु उसके प्रत्येक श्वास के साथ वेदों की रिचाएं प्रतिध्वनित होने लगी
28:13उसके चारों और एक सुरक्षा कवच निर्मित हुआ, जिसकी आभा ने काल के घातक प्रभावों को भी व्यर्थ कर दिया
28:21मार्ग में आने वाली नदियां भी उसके सम्मुख नत्मस्तक होकर अपने वेग को शांत कर गई, जैसे वे भी उसके
28:29चर्णों का स्पर्ष चाहती हो
28:32स्वय भगवान शिव ने कैलाश से उस बालक की और अपनी तीसरी आख की दिव्य आभा भेजी, जो उसे मार्ग
28:39दर्शन प्रदान कर रही थी
28:42बालक ने उस अग्रिश्य ज्योती का अनुसर्ण किया, जो उसे घने जंगलों के पार परम रिशियों के गुप्ट आश्रम की
28:50ओर ले जा रही थी
28:52संसार की माया ने उसे भ्रमित करने का अंतिन प्रयास किया, किन्तु उसकी एकागरता परवत के समान अचल बनी रही
29:01आश्रम की सीमा पर पहुँचते ही उसे दिव्यशंखों की ध्वनी सुनाई दी, जो उसके स्वागत में गूज रही थी
29:09श्री ब्रहमा ने स्वर्ग के उपर से अपना आशिरवाद दिया, जिससे बालक के मस्तक पर एक तेजोमय तिलक स्वता अंकित
29:17हो गया
29:18उसने पहली बार स्वयन को उस अनन्त सागर में विलीन होते हुए महसूस किया, जिसे वेदों में परब्रहम कहा गया
29:26है
29:27चारों और का वातावर्ण दिव्य सुगंध से भर गया, जैसे स्वयन प्रकृती उसका अभिशेक कर रही हो
29:35वह एक प्राचीन द्वार के समक्ष खड़ा था, जिसके पीछे ज्ञान का वह भंडार था जिसे केवल देवर्शी ही प्राप्त
29:43कर सकते थे
29:44द्वार के रक्षकों ने भी बालक की उस दिव्य आभा को पहचान लिया और उसके समक्ष अपना मस्तक जुका दिया
29:53बालक ने द्रेड कदम बढ़ाए और उस पवित्र द्वार के भीतर प्रवेश किया, जहां से लोटने का अर्थ था, संसार
30:01के लिए एक नया युग
30:03ब्रह्म वेवर्त के इस अध्याय ने आज मृत्यु लोग के उस रहस्य को उजागर कर दिया, जो सदियों से धरा
30:10के नीचे दबा हुआ था
30:12प्राचीन गुफा के भीतर प्रवेश करते ही बालक के चर्णों के नीचे की धर्ती स्वर्ण कमलों से सुसज्जित हो उठी,
30:20जो उसके दिव्य परिवर्तन का प्रथम संकेत था
30:24बैकुंठ के परमधाम से स्वया भगवान विश्णु ने अपने चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट होकर बालक की आत्मा को अपनी चेतना
30:32से पूर्ण कर दिया
30:34बालक के मस्तक पर जैसे ही प्रभु की हथेली का स्पर्ष हुआ, उसके रोमरों में ब्रहमज्यान की अगनी प्रजवलित हो
30:42गई
30:43समय का चक्रत हम गया और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी, मानो स्रिष्टी स्वयन एक शूदर बालक के
30:51देवर्षी बनने के उत्सव में सम्मिलित हो रही हो
30:55बालक ने अब अपनी सामान्य देह का त्याग कर एक तेजस्वी दिव्यकाया धारन कर ली, जिसकी आभासे पूरी गुफा प्रकाश
31:03में हो उठी
31:05गरुर देव ने आकाश में अपनी पंक फैला कर उस नूतन देवर्षी का स्वागत किया, जो अब धर्म के मार्क
31:12को प्रशस्ट करने के लिए तैयार थे
31:16बालक के हाथों में एक दिव्यवीना प्रकट हुई, जिससे निकलने वाली ध्वनी संसार के समस्त दुखों को मिटाने की सामर्थ्य
31:24रखती थी
31:25यह वहक्षन था जब मृत्यू लोग की सीमाए समाप्थ हुई और एक नए धर्मयुक का उदे हुआ, जिसकी गूंच तीनों
31:33लोकों में सुनाई दी
31:36शूद्र का वह बालक अब केवल एक नाम नहीं रहा, बल्कि वह ज्यान का एक ऐसा दीप बन गया जो
31:43अंधेरे को सदा के लिए समाप्थ करने वाला था
31:47भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ उसे आदेश दिया कि वह अब इस संसार में जाकर केवल सत्य और
31:54प्रेन का उपदेश दे
31:57बालक ने जुपकर अपने प्रभू के चर्णों को स्पर्ष किया और अपनी दिव्य यात्रा का प्रथम चरण आरंभ किया
32:05जैसे ही उसने अपना पहला कदम बढ़ाया उसके पीछे एक सुनहरी लकीर खिंच गई जो धर्म के मार्ग का प्रतीक
32:13बनी
32:14गुफा के भीतर जमी हुई पुरानी राख और धूल उस दिव्य प्रकाश से पवित्र होकर शुद्ध सोने के कणों में
32:21परिवर्तित हो गई
32:23स्वय इंद्र देव ने स्वर्ग से बालक पर पुष्प वरिष्टी की यह स्विकार करते हुए कि एक नया महापुरुष धरा
32:31पर अवतरित हो चुका है
32:34बालक की द्रिष्टी अब साधारन नहीं रही वह देख सकता था कि किस प्रकार माया का जाल मनुष्यों को दुहक
32:41दे रहा है
32:43उसने अपनी वीना के तारों को छेडा और एक ऐसी ध्वनी निकली जिसने पूरे ब्रहमांड में शांती का संचार कर
32:51दिया
32:52संसार की ओर प्रस्थान करते समय वह बालक अब साधारन मनुष्य नहीं, अपितु ब्रहम वैवर्त का एक सजीव प्रमान बन
33:00गया था
33:02उसका प्रतेक पग इस बात का साक्षी था कि जन्म से कोई छोटा या बड़ा नहीं, केवल कर्म और भक्ती
33:09ही उसे महान बनाते हैं
33:12प्रभु विश्णु ने उसे अपना आशिरवाद दिया और वह अंतरधान होकर संसार के दुहक को दूर करने निकल पड़ा
33:21ब्रह्म वैवर्त का वह अध्याय आज समाप्थ हुआ, जिसने एक शूद्र बालक को देवर्शी के रूप में पूरे संसार के
33:28समक्ष सिध्ध कर दिया