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इस एपिसोड में देवर्षि नारद अपने ब्रह्मलोक के कर्तव्यों को समझकर अपनी पहली ब्रह्मांडीय यात्रा पर निकलते हैं। नारद का लक्ष्य है भक्ति के बीज को संपूर्ण सृष्टि में बोना। क्या देवर्षि अपनी वीणा 'महती' के साथ वैकुंठ का द्वार खटखटा पाएंगे? जानिए इस रहस्यमयी यात्रा के बारे में! #Narada #BrahmavaivartaPurana #LordVishnu #Spirituality #SanatanDharma #Krishna #HinduMythology
Transcript
00:00ब्रहम लोग की स्वर्णमे आभा में देवर्शी नारद खड़े थे, जहां चारों और अनंत आकाश गंगाओं का प्रकाश एक दिव्य
00:07संगीत की भांती गुंजायमान था।
00:30सुगंध से भर गई। समस्त दिशाओं में एक दिव्यस पंदन फैल गया, मानो स्वयं परमात्मा ने स्रिष्टी के कणकण में
00:38अपना नाम अनकित कर दिया हो।
00:41ब्रहमा जी की वानी गुंजी, हे पुत्र, तुम्हारा मार्ग साधारन नहीं है, तुम्हें तो अज्यान के अंधकार में प्रेम का
00:49दीप जलाना है।
00:51नारद ने अपनी आखे मूंद ली और उनके रोम्रोम से नारायन की ध्वनि स्वतह ही उच्चारित होने लगी।
00:59देखते ही देखते वैकुंट की अद्रिश रेखाएं उनके सम्मुख प्रकट होने लगी, जहां का प्रकाश सूर्य के तेज से भी
01:07अधिक दिव्य था।
01:09गरुर देव की गुंजती हुई गर्जना ने नारद का स्वागत किया, मानो स्वय आकाश उनकी भक्ती के सम्मुख नत्मस्तक हो
01:17गया हो।
01:18नारद ने कापते हुए स्वरों में पहली बार वैकुंट के द्वार पर नारायन पुकारा और वह नाम वहां की गलियों
01:26में गुंद उठा।
01:28वैकुंट के स्वर्ण प्रासाद का प्रत्येक कोना उस पवित्र नाम के स्पंदन से कमपायमान हो उठा, जिससे समस्थ चेतनाई जागरित
01:37हो गई।
01:38नारद की वीना से निकली हर लय अब उस सर्वोच पुरुष के गुनगान में विलीन हो चुकी थी।
01:45द्वारपालों ने श्रद्धा से अपना सिर जुका लिया क्योंकि उन्होंने उस ध्वनी में परम्पिता का साक्षात आमंतरन अनुभव किया था।
01:54नारद के भीतर का संशय दूर हो गया और उन्होंने अपने महामिशन की पहली सीधी को सफलता पूर्वक पार कर
02:02लिया था।
02:04आकाश से फूलों की वर्शा हुई और संपूर्ण ब्रहमांड ने उस पहले नारायन उद्गोश का अभिनंदन किया।
02:11ब्रहमाजी ने दूर से ही अपने पुत्र के इस प्रथम पड़ाव को देख संतुष्टी का अनुभव किया।
02:19अब वैकुंट का महादवार धीरे धीरे खुलने लगा, जिससे वह परम प्रकाश बाहर आने लगा जिसने स्वयं विश्नु को भी
02:27जग्मगा दिया।
02:28नारद ने अपनी वीना को कसकर पकड़ा, मानोवे स्वयं को उस महासागर में डुबोने के लिए तैयार हूँ।
02:37वहक्षन एतिहासित था, क्योंकि पहली बार कोई भक्त इस प्रकार भक्ती की प्रतिध्वनी लेकर वैकुंट पहुँचा था।
02:45नारद के मुख से पुना नारायन का नाम निकला और संपूर्ण दिव्य लोक उस स्वर में डूब गया।
02:53इस प्रकार देवर्शी नारद ने स्रिश्की के इतिहास में भक्ती के एक नए युग का शंखनात कर दिया।
03:00दिव्य वैकुंट के विशाल प्रांगण में खड़े होकर देवर्शी नारद ने अपनी नई महाती वीना के प्रथम तार को जैसे
03:08ही स्पर्ष किया।
03:09संपूर्ण ब्रहमांड में एक अध्भुत कमपन फैल गया।
03:14भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर मंदमंद मुस्कुराते हुए अपने प्रिय भक्त के हाथों में सजी उस दिव्य वीना की
03:21ध्वनी को सुनकर पर्मानंद में डूब गए।
03:25वीना के तारों से उठने वाली हर एक गूंज सीधे भौतिक पदार्थों को भेद कर सीधे शुद्ध दिव्य चेतना के
03:32सागर में विलीन होने लगी।
03:35यह स्वर केवल संगीत नहीं था बलकि यह अज्ञान के अंधकार को चीर कर निकलने वाली पहली आध्यात्मिक किरण थी।
03:44वैकुंट के द्वार पर गूंजने वाली नारायन की इस पहली महीमा ने समस्थ पाताल और स्वर्ग लोक के बीच की
03:51दूरियों को मिटा दिया।
03:53गरुर जी ने अपने विशाल पंखों को समेट कर देवर्शी नारत की इस पावन धुन को अत्यंत श्रधा और आदर
04:01के साथ श्रवन किया।
04:03प्रत्येक तार से निकलती हुई स्वर्लहरी ने ऐसा समा बांधा की वैकुंट के फवारे और रत्नजडित स्तंभ भी जूम उठे।
04:11यह द्रिश देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात भक्ती देवी ने महाती वीना के माध्यम से नया रूप
04:20धारन कर लिया हो।
04:22नारत के मुखमंडल पर अलौकिक तेज था और उनकी आखे प्रेम और भक्ती के आसूँ से सराबोर थी।
04:31भगवान विश्णु ने अपनी कमल जैसी सुन्दर आखें खोल कर नारत की ओर देखा और आशिरवाद मुद्रा में अपने हाथ
04:38उठाए।
04:40महाती वीना की गूंज ने संपून ब्रह्मांड की चेतना को जखजोर कर रख दिया और हर जीव के भीतर भक्ती
04:47का बीज बो दिया।
04:50यह पल इतिहास में दर्ज हो गया जब भौतिक संसार और आध्यात्मिक चेतना के बीच का अंतर हमेशा के लिए
04:57मिट गया।
04:59देवर्शी ने अपनी उंगलियों की थिरकन से ऐसा राग छेडा जिससे समस्त देवताभी मंत्रमुग्ध होकर वैकुंठ की ओर देखने लगे।
05:08नारायन के नाम का यह पहला सार्वजनिक उच्चारन वैकुंठ के प्रत्येक कोने में गूंजता हुआ अलोकिक उर्जा उत्पन्न कर रहा
05:17था।
05:18वीना के हर एक कमपन से निकलने वाले स्वर्ण पुष्प हवा में तैरते हुए भगवान विश्णु के चर्णों में अर्पित
05:25हो रहे थे।
05:27यह वह अद्वितियक शन था जब संगीत ने प्रार्थना का रूप लेकर स्रिष्टी के कंकन को पावन कर दिया।
05:34नारद का यह संगीत केवल ध्वनी नहीं बलकि अद्वैत प्रेम का वह महासागर था जिसमें सब कुछ समाहित था।
05:44भगवान विश्णु ने प्रसन होकर अपने गले से उत्री हुई वैजनती माला को अपनी योगमाया से नारद की और प्रेशित
05:51किया।
05:52उस दिव्य वैजनती माला के नारद के गले में लगते ही उनका वीना वादन और अधिक ओजस्वी और दिव्यहो उठा।
06:01इस प्रकार देवर्शी नारद ने महाती वीना के प्रथम स्वर से संपूर्ण वैकुंठ को भक्ती के अनंत सागर में डुबो
06:09दिया।
06:10वैकुंठ के इस अध्भुत आनंद सागर को छोड़ कर देवर्शी नारद ने ब्रहम लोग के सर्वोच शिखर से नीचे की
06:18ओर अपनी पध्यात्रा आरंभ की।
06:21ब्रहम लोग की स्थेरशान्ती और परम वैभव से दूर उन्हें संपूर्ण चराचर जगत में भ्रमन करने का गुरुतर दायत्व संभालना
06:30था।
06:31उनके मन में किसी भी प्रकार के मोह या संसारी बंधन के लिए कोई स्थान नहीं बचा था। क्योंकि वे
06:38अब पूर्णतय भगवान नारायन को समर्पित हो चुके थे।
06:42उनके पगों की हर एक चाल में ब्रहमांड की गती और वैराग्य का वह पावन संदेश समाहित था जो हर
06:49जीव को जगा सकता था।
06:51ब्रहम लोग के स्वर्णिन द्वार पीछे चूटते गए और नारत जी ने अननतेश्वर की इस विशाल स्रिष्टी के पथ पर
06:59अपनी पहली स्वतंत्र पगध्वनी गूंजाई।
07:03देवर्शी भली भानती जानते थे कि उनका यह मार्ग किसी राजमहल की सुख सुविधाव का नहीं बलकि संपूर्ण संसार को
07:11मुक्ती का मार्ग दिखाने का था।
07:13उनकी महिमा मंडित महाती वीना से निकलने वाला प्रत्येक स्वर अब सासारिक बंधनों को काटने वाली एक तलवार के समान
07:22तेजस्वी था।
07:23वह एक ऐसा यात्री बन चुके थे जिसका घर संपूर्ण ब्रहमांड था और जिसका एक मात्र गोत्र भगवान श्री हरी
07:32का नाम था।
07:34नारग ने अपने भीतर उठने वाले किसी भी प्रकार के अहम या विश्राम की इच्छा को अपनी योग साधना की
07:41अगनी में भस्न कर दिया।
07:44पिता ब्रहमा का आशिरवाद और भगवान विश्नों की वैजनती माला उनके इस महामिशन का सबसे बड़ा संबल बन चुकी थी।
07:52वे परवतों, नदियों, जंगलों और आकाश गंगाओं को पार करते हुए निरंतर आगे बढ़ रहे थे बिना किसी गंतव्य की
08:01चिंता किये।
08:02उनके इस अलौकिक वैराग्य को देखकर देवता भी अपनी लोकनगरी से उनके चर्णों में पुश्पवर्शा करने लगे थे।
08:11नारत का यह प्रस्थान कोई साधारन यात्रा नहीं थी, बलकि यह अज्यान के अंधकार में भक्ती का सूर्योदय करने का
08:20शंकनाद था।
08:22जहां भी उनके चरण पड़ते, वहां की भूमी पवित्र हो जाती और वहां के जीवों के मन में नारायन के
08:29प्रती प्रेन जागरित हो उठता।
08:31वे अकेले थे किन्तु उनके साथ संपून ब्रहमांड के आराध्य की शक्ती और करुणा का अनंत भंडार चर रहा था।
08:41न तो धन का लोब न मान सम्मान की चाह और नहीं किसी सुख का आकर्शन उन्हें अपने मार्ग से
08:47दिगा सका।
08:48उनकी वीना की हर एक जंकार ने यह सिद्ध कर दिया था कि एक सच्चा साधक वही है जो सब
08:56कुछ पाकर भी सब कुछ त्याग दे।
08:58ब्रहम लोग की उंचाईयों को अलविदा कहकर देवर्शी अब उन लोकों की ओर बढ़ चले थे जहां उनके महामिशन की
09:06वास्तविक परीक्षा होनी थी।
09:09उनके गले में सुशोभित वैजन्ती माला और हाथ में गूजती महाती वीना इस बात की गवाही दे रही थी कि
09:17देवर्शी का युग आरंभ हो चुका है।
09:20इस प्रकार समस्त बंधनों से मुक्थ होकर देवर्शी नारद ने वैकुंठ की उर्जा को अपने भीतर समेटे हुए स्रिष्टी के
09:29पत पर अपनी महान यात्रा पूरी द्रिडता से आगे बढ़ाई।
09:34देवर्शी नारद ने जैसे ही भौतिक जगत की सीमा में प्रवेश किया। उन्हें चारों और अज्यानता के अंधेरे में भटकती
09:41अंगिनत आत्माओं की करोन पुकार सुनाई दी।
09:45तभी नारद ने देखा कि एक भटका हुआ जीव मोह के मायाजाल में फंसकर अपनी पहचान खो बैठा है और
09:53निरंतर दुख के चकर में पिस रहा है।
09:57देवर्शी ने अपनी महाती वीना के तारों को जंकृत किया, जिससे उस घोर अंधकार में भी भकती की एक प्रकाश्मई
10:04लकीर खीच गई।
10:06वीना की ध्वनी ने उस स्थान के वातावर्ण को जख जोर दिया, जहां हर दिशा में केवल लोब और क्रोध
10:13की गूंच थी।
10:14आगे बढ़ते हुए देवर्शी का सामना सुकरमुख के द्वारपालों से हुआ, जो कठोर शिलाओं जैसे देहवाले और वराह मुखी थे।
10:25देवर्शी निर्भय होकर उनके सम्मुख खड़े रहे, उनके ललाट पर चमकता चंदन का तिलक और मुख पर दिवेशांती किसी भी
10:33अस्त्र से अधिक प्रखर थी।
10:36उन्होंने अपनी मधुरवानी में नारायन का स्मरण किया, जिससे उनपाशान हृदय वराह मुखी असुरों के भीतर भी एक हलचल सी
10:44मच गई।
10:46चारों और व्याप्त हिंसा के स्थान पर नारत की वीना से भक्ती का एक ऐसा संगीत फूट पड़ा जिसने काल
10:53के चक्र को भी कुछ पल के लिए थाम दिया।
10:56यात्रा आगे बढ़ी और देवर्शी अब क्रिमिभोजन के उस वीभत स्थान पर पहुँचे, जहां कीडों और कीटों का एक अंथीन
11:05समुद्र सा फैला था।
11:06नारद ने वहां तड़पते जीवों की व्यथा को महसूस किया और अपनी महाती को प्रेम के करुन रस में डुबो
11:14कर बजाना प्रारंभ कर दिया।
11:16संगीत के उस प्रवाह ने कीचड और अशुधता के बीच भी एक दिव्य उजाला भर दिया, जिसे देखकर भटकती आत्माय
11:25भी विस्मित थी।
11:28अंधकार में डूबे उन जीवों ने पहली बार प्रेम की गूँच सुनी थी, जो किसी भी कर्म बंधन से अधिक
11:34शक्तिशाली थी।
11:37देवर्शी का अगला पड़ाव अयाहपान था, जहां अगनी की लप्ते लोहे की भांती देहक रही थी और चारों और तप्तप्त
11:45वातावर्ड था।
11:47नारद ने वहां उपस्थित अगनी के ताप को अपनी भक्ती की शीतलता से शांट करने का संकल्प लिया और वीना
11:54पर प्रभु के गुणों का गान किया।
11:57वीना की जंकार से निकलती ध्वनी तरंगे अगनी की लप्तों के साथ निरित्य करने लगी और धीरे धीरे उग्रताप मंद
12:05पड़ने लगा।
12:06यह द्रिश देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात नारायन अपनी कृपा की वर्षा कर रहे हों क्योंकि भक्ती
12:15की शक्ती के सामने कोई भी अगनी नहीं टिक सकती।
12:19अंत में देवर्षी पुयोद के उन दुर्गम मार्गों पर पहुँचे जहां दुर्गंध और दुख का एक ऐसा घना कोहरा था
12:27जो आत्मा के विवेक को ढख लेता है।
12:31नारद ने रुपकर महाती वीना को हरिदय से लगाया और संसार के उद्धार के लिए अपनी पूरी उर्जा से नारायन
12:38का नाम पुकारा।
12:40उस एक नाम की गूंज ने पुयोद के कोहरे को भेद दिया और वहां की निरवता में भक्ती का एक
12:47नया संगीत गूंजने लगा।
12:49स्रिष्टी के इन कठिन लोकों में देवर्शी का महामिशन सफल हो रहा था, क्योंकि अब अज्ञान के स्थान पर नारायन
12:57की ध्वनि स्थापित हो चुकी थी।
12:59देवर्शी नारद ने अपनी महाती वीना के तारों पर उंगलिया फेर कर एक ऐसी दैविय धुन छेडी जो सीधे पुलोद
13:08के विशाक्त और धुंधले आकाश में गूंज उठी।
13:11वैकुंट के उचे परिस्रों में विराजित भगवान विश्णु ने उस अनूठी धुन को सुनकर मंद मुस्कान के साथ अपनी कमल
13:20नैनों को बंद कर लिया।
13:21नारद ने वीना के हर एक तार से निकलने वाले स्वर को ब्रहमांडिय कमपन के साथ इस प्रकार साधा की
13:29सन्नाटा चीख उठा।
13:31उस परम आवरित्ती ने अंधकार के उन गहरे गर्तों में सदियों से सोई हुई आत्माओं के भीतर एक नई चेतना
13:39की चिंगारी जगा दी।
13:41पुयोद की इस भयानक सीमा पर जब नारायन का नाम गूंजा तो वहां के विलाप शांत होकर एक दिव्य संगीत
13:49में बदल गए।
13:51कैलास परवत की बरफीली चोटियों पर बैठे भगवान शिव ने भी उस सुक्ष्म कमपन को महसूस कर अपनी तीसरी आख
13:58को खोल दिया।
14:00नारद ने अपनी तरजनी को वीना के मुख्यतार पर टिका कर स्वर के उस सटीक संतुलन को प्राप्त किया जो
14:07भौतिक और आध्यात्मिक लोकों को जोडता है।
14:12संगीत की यह दिव्यतरंग अज्ञान के आवर्ण को चीरती हुई ब्रहमान की सबसे उची गहराईयों तक निर्बात गती से प्रवाहित
14:20होने लगी।
14:22देवर्शी के इस महामिशन ने यह सिद्ध कर दिया कि करुणा और भक्ती की शक्ती सबसे कठोर लोकों को भी
14:29पावन कर सकती है।
14:32शीरसागर के अनंत जल में शेशनाग की शया पर लेटे भगवान विश्णु ने अपने परम भक्त की इस सफलता पर
14:39प्रसन्न होकर आशिरवाद दिया।
14:42नारद ने अपनी वीना के गूँचते हुए स्वर को थामे बिना एक और उच्च स्वर में नारायन के उस अमोद
14:49नाम का उच्चारण किया।
14:51उस ध्वनी के प्रभाव से पुयोद के तटों पर जमा हुआ पुराना अंधकार और विशाद धीरे-धीरे एक सुनहरे प्रकाश
14:59में विलीन होने लगा।
15:02देवर्शी ने महसूस किया कि वीना के तार केवल लकडी और धातु के नहीं बलकि संपून स्रिष्टी की धड़कन का
15:09विस्तार हैं।
15:12ब्रहमाजी ने सत्यलोक से अपने मानस पुत्र की इस अगवितिय साधना को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की और देवर्शी की दीरगायू
15:20की कामना की।
15:22नारद ने अपनी उंदलियों की गती को नियंतरित करते हुए संगीत के उस पड़ाव को छुआ जहा द्वैत और अध्वैत
15:30का भेद मिट जाता है।
15:33स्रिष्टी के इन कठिन लोकों की सीमाएं उस गूंज के सामने नत्मस्तक हो गई और वहां केवल भक्ती का अनंत
15:40सामराज शेश रह गया।
15:43नारद ने अपनी वीना को वक्ष से लगाए हुए उस पवित्र भूमी पर एक धीमा और संतोश जनत पच्चाप रखा।
15:51समस्त देवी देवताओं ने गंधर्व लोक से पुष्प वर्शा कर इस महान कार्य के सफल संपादन पर देवर्शी का अभिनंदन
15:59किया।
16:01वीना के हर एक कमपन के साथ नारायन का नाम अब उन लोकों की हर एक दीवार पर अमिट रूक
16:07से अनकित हो चुका था।
16:09इस प्रकार देवर्शी नारद ने अपनी संगीत साधना से अज्यान के सामराज्य में भक्ती का पहला चिरस्थाई सूर्योदय कर दिया।
16:18आगे बढ़ते हुए देवर्शी नारद के मारग में एक अलोकिक किन्तु गेहन आध्यात्मिक अवरोध उत्पन हो गया जो उच्छतर दिव्य
16:27लोकों की ओर जाने वाले मारग को पूरी तरह से घेरे हुए था।
16:33ब्रहमांड के उस रहस्य में प्रवेश द्वार पर प्रकट हुई वह उर्जा की दिवार इतनी सधन थी कि बिना पूर्ण
16:40समर्पन के उसे पार करना असंभव प्रतीत हो रहा था।
16:44नारद ने अपनी दिव्य वीना के तारों को थाम कर यह समझ लिया कि बाहरी शक्तियों या मंत्रों से इस
16:51अद्रिश दीवार को भेदना सर्वथा असंभव है।
16:56वह अद्रिश पर्दा केवल अहंकार के विसर्जन और आराध्य के प्रती अगाध प्रेम की अंतिम परीक्षा ले रहा था।
17:05देवर्शी ने अपनी आखे बंद कर ली और अपने भीतर की समस्थ अहंता को नारायन के चर्णों में पूरी तरह
17:12समर्पित कर दिया।
17:14उनके हृदय की गहरायों से उठने वाला हर एक श्वास अब केवल और केवल अपने इश्टदेव के स्मरण में लीन
17:22हो चुका था।
17:24समर्पन के इस अचल भाव ने उस आध्यात्मिक अवरोध के केंद्र में एक सुक्ष्म कमपन पैदा करना शुरू कर दिया।
17:31वह रहस्य में परदा धीरे धीरे पिघलने लगा, मानो अहंकार की बर्फ पर प्रेम की उष्ण किरने पड़ रही हो।
17:40नारद की अनन्य भक्ती और निश्कलंक समर्पन ने प्रकृती के उस कठोर्तम नियम को भी प्रेमवश जुका दिया था।
17:48द्वार के उस पार से आने वाली दिव्य सुगंध और अनन्त प्रकाश की धारा ने देवर्शी के रोमरों को प्रफुलित
17:56कर दिया।
17:57उन्होंने अपनी वीना का एक और अत्यंत कोमल स्वर्चेडा, जो उस खुले हुए मार्ग से सीधा अनन्त की ओर प्रवाहित
18:05हो गया।
18:07उस छिपे हुए आवर्ण के हटते ही समस्त लोकों में एक नए और उच्चतर सत्य का प्रक्तिकरण हो गया।
18:14देवर्शी ने आगे बढ़कर उस दिव्य सीमा को पार किया, जहां तक पहुँचने का साहस आज तक किसी साधारन प्राणी
18:23ने नहीं किया था।
18:25उनके प्रवेश करते ही उच्च लोकों के सभी देवता और रिशी इस अभूत पूर्व उपलब्धी को देखकर विसमय से भर
18:32गए।
18:33उस पवित्र भूमी पर नारद के चरण रखते ही संगीत और भक्ती की एक नई धारा स्वतह ही प्रवाहित होने
18:41लगी।
18:42वह गुप्ट वेल अब पूरी तरह से समाप्थ हो चुका था और सत्य का स्वर्णिन प्रकाश सर्वत्र फैल रहा था।
18:51नारद ने अनुभव किया कि यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की नहीं बलकि आत्मा के
18:58अनंत विस्तार की थी।
19:00उनके भीतर का हर एक संदेह उस दिव्य प्रकाश में भस्म हो चुका था और उनका मन अब पूर्णत है
19:07शांत और स्थिर था।
19:09उस अद्रिश अवरोध के पार पहुँचकर देवर्शी ने स्रिष्टी के उस परम सत्य का दर्शन किया जो अब तक परदे
19:17के पीछे छिपा था।
19:19इस प्रकार नारद ने समर्पन की शक्ती से उस महारहस्य का भेदन कर भक्ती के मार्ग का एक नया इतिहास
19:27रच दिया।
19:28दिव्य चेतना से उत्प्रोत होकर देवर्शी नारद ने महारहस्य के भेदन के पश्चात अंतरिक्ष की असीम गहराईयों में अपने पहले
19:37चरण रखे.
19:39ब्रहमांड की परिक्रमा करते हुए उनके चारों और तैरते हुए ग्रहों और नक्षत्रों ने इस नवीन दिव्य उर्जा के आगमन
19:47पर विस्मय से अपनी गती धीनी कर ली.
19:50आकाश गंगाओं के मध्य गूंजती हुई उनकी वीना की स्वर लहरियों ने तारों की टिम्टिमाहट को एक नए संगीत में
19:58बदल दिया.
20:00अनंत अंतरिक्ष की इस यात्रा में अंतरिक्ष के गुप्ट प्रहरी भी इस अलौकिक शक्ती के सामने नत्मस्तक हो गए.
20:08विमानों और रथों में सवार गंधर्व और अपसराय भी इस अध्गुत देवर्शी की तेजस्विता को देखकर आश्चर्यच्कित रह गई.
20:17देवराज इंदर के सभासदों ने स्वर्ग लोग की सीमाओं से इस अनूठे यात्री के अग्रिश मार्ग का बड़ी उत्सुकता से
20:25अवलोकन किया.
20:27नारत की गती में वायू की शीतलता और अग्नी का तेज एक साथ समाहित होकर संपून आकाश मंडल को प्रकाशित
20:35कर रहा था.
20:37स्रिष्टी के इस नए दूट के चर्णों के स्पर्ष से नक्षत्र पुंच भी जैसे किसी अग्यात भक्ती भाव में डूपते
20:44चले जा रहे थे.
20:46सब्तरिशियों के मंडलों के समीप से गुजरते हुए उनके तब का प्रकाश और नारत की भक्ती का प्रकाश एक दूजे
20:53में विलीन होने लगा.
20:56तपस्वियों के समान शांत किन्तु एक महाविस्पोटक उर्जा के स्वामी नारद अंतरिक्ष के पत पर निर्भीक आगे बढ़ रहे थे.
21:05उनकी वीना के हर एक तार से निकलने वाला स्वर ब्रहमांड की प्रत्येक दिशा में एक नया संदेश प्रवाहित कर
21:12रहा था.
21:14ब्रहमांडी यह हवाओं ने उनके मार्ग को और अधिक सुगम बनाते हुए उनके चारों और एक सुगंधित प्रकाश पुझ रच
21:21दिया.
21:34देवताओं ने नारद के इस अध्भुत रूप को देखकर एक स्वर में उनकी जैजैकार की. उनकी वीना की गूंच से
21:42अंतरिक्ष के वेकोने भी जागरित हो गए जो अब तक प्रलै की सी गहरी नींद में सोए थे.
21:49आकाश के पट पर खिंची हुई प्रकाश की रेखाए उनके मार्ग को किसी स्वर्णिम राजमार्ग में परिवर्तित कर रही थी.
21:57समस्त लोकों की सीमा रेखाओं को पार करते हुए नारद अब उस परमधाम की ओर अग्रसर हो रहे थे जहां
22:05से स्रिष्टी का नियंतरण होता है.
22:08अंतरिक्ष के देवता भी इस बात से अचम्भित थे की कैसे एक साधारण रिशी पुत्र अब ब्रहमांड की सबसे बड़ी
22:15भक्ती शक्ती बन चुका था.
22:18उनकी हर एक गती के साथ ब्रहमांड के भीतर एक नया आध्यात्मिक संतुलन स्थापित होता चला जा रहा था.
22:37अनंत अंतरिक्ष की गहरायों में नारत के मन में नारायन के दर्शन की तीवर व्याकुलता एक धधकते हुए सूर्य की
22:44भांती प्रकट हुई.
22:46व्यकुंठ के स्वर्ण कमलों के महलों के द्वार पर खड़े गरुड ने उस दिव्यस पंदन को महसूस किया जो नारत
22:53की भक्ती से आ रहा था.
22:56नारत ने अपनी महती वीना के तारों को छेड़ा और उस स्वर से निकली हर एक कमपन सीधे नारायन के
23:03हृदय तक पहुँचने लगी.
23:05पूरे ब्रहमांड में एक ऐसी शान्ती छा गई मानो समय स्वया रुप गया हो ताकि भक्त की पुकार प्रभु तक
23:12पहुँच सके.
23:31नारत ने अपने भीतर की सारी मुहमाया को त्याद कर प्रभु को ही अपना एक मात्र गंतव्य मान लिया था.
23:39वैकुंठ के वातावर्ण में नीले और सुनहरे उर्जा के कन जैसे नाचने लगे जो नारत के आने की सूचना दे
23:46रहे थे.
23:48आकाश के देवता भी अपनी दिव्य सभाओं को छोड़कर इस अध्भुत द्रिश्यावली को निहारने लगे.
23:55गरुर ने अपनी द्रिश्टी से नारत को पहचान लिया और उन्हें प्रवेश के लिए द्वार खोल दिये.
24:02नारत का हर एक कदम एक मंत्र की ध्वनी बनकर वैकुंठ के प्रांगण में गूंज रहा था.
24:09वहक्षन इतना पवित्र था कि स्वयन काल का चक्र भी अपनी गती बदल कर भक्ती की लए में समाहित हो
24:16गया.
24:17नारत की आखों में आसुओं की बूंदे नहीं, बलकि प्रभु के प्रती अटूट विश्वास का अम्रित छलका हुआ था.
24:25प्रभु विश्णु ने अपना हाथ उठा कर नारत का आहवान किया, जिससे पूरे ब्रहमांड में दिव्यता का संचार हो गया.
24:34नारत ने एक लंबी सांस ली और वैकुंट के पवित्र जल में अपने पैरों को स्पर्श कराया.
24:41उनके हृदय में नारायन नाम की ध्वनी पहली बार इतनी प्रबलता के साथ गूंजी की वैकुंट के द्वार भी कांप
24:48उठे.
24:50ब्रहमांड की सभी दिशाओं में एक नया संदेश फैलने लगा कि भक्ती का मार्ग अब खुल चुका था.
24:58गरुर जुक कर नारत को नमन करने लगे क्योंकि उन्होंने उस भक्त को देख लिया था जो स्वय नारायन के
25:04निकट जा रहा था.
25:07नारत के अस्तित्व के कणकण में अब केवल विश्णु का ही स्वरूप समाया हुआ था.
25:13अंत्वह द्वार खुला और नारत ने पहली बार अपने प्रभु के दर्शन के लिए अपना पहला कदम बढ़ाया.
25:21नारत ने जैसे ही वैकुंट की चौखट को पार किया, उनके चारों और का भौतिक आकाश एक अनन्त सुनहरे प्रकाश
25:29में विलीन हो गया.
25:31ग्वारपाल जै और विजय जो स्वय भगवान के अंश थे, उन्होंने नारत के हृदय में बसे नारायन के प्रेन को
25:38देखकर मस्तक जुका लिया.
25:41महर्शी नारत के कदमों के नीचे की भूमी अब मिट्टी नहीं, बलकि स्वटिक और रतनों की बनी थी जो उनके
25:48हर पच्चेहन के साथ जंकृत हो रही थी.
25:51हवा में बहने वाली सुगंध साधारन पुश्पों की नहीं, बलकि स्वय नारायन के चर्णों के स्पर्ष से निकले दिव्यचंदन और
26:00पारिजाद की थी.
26:02वैकुंट का वह विराट प्रांगन किसी काल के बंधन में नहीं था, जहां का हर क्षण केवल प्रभु के स्मरण
26:09में बीता हुआ एक अनंत उत्सव प्रतीत होता था.
26:13नारद ने अपनी वीना महती को स्पर्ष किया और उससे निकलने वाली ध्वनी ने वैकुंट के शून्यता को दिव्य संगीत
26:21से भर दिया.
26:23ध्वनी के स्पंदन से दीवारों पर जड़े हुए मनिक्य ऐसे चमकने लगे जैसे वे प्रभु के नाम के साथ अपने
26:30स्वर मिला रहे हुँ.
26:31इस पवित्र वातावर्ण में पहुँचते ही नारत को लगा जैसे उनके पिछले सभी जन्मों के कर्म संस्कार एक जलते हुए
26:40दीपक की जोती के समान शान्थ हो गए हैं.
26:44सामने दूर क्षितिच पर शेशनाग की शया पर विराजमान नारायन की वह छवी दिखाई दी जिसे देखने की प्यास युगों
26:52से नारत के भीतर दबी थी.
26:55शेशनाग के फनों से निकलने वाली मनियों की आभाने नारत की आखों को चकाचौंध तो किया, लेकिन उनका मनप्रभु के
27:03दर्शन के लिए स्थिर हो गया.
27:06नारायन के मुख की वह सौमय मुस्कान देखकर नारत का अस्तित्व विस्मय और आनंद के ऐसे समुद्र में डूग गया
27:13जहां स्वयंका बोध भी मिट गया.
27:17वैकुंट के वातावर्ण में गूंजने लगा वह मंत्र, जिसे आज पहली बार नारत ने अपने कंट से इतने वेग के
27:24साथ उच्चारित किया था.
27:27नारायन की दृष्टी में नारत ने पाया कि सम्पून ब्रह्मांड की रचना और उसके समस्त कर्म केवल एक खेल की
27:34तरह उनके चर्णों में खेल रहे हैं.
27:38जैसे ही नारत का नारायन मंत्र वेकुंट के द्वारों को स्पर्श किया, चारों और स्थित कमल के फूल एक साथ
27:45खिल उठे.
27:47प्रभु के निकट पहुँचते ही नारत की वीना की धुन में एक अलौकिक परिवर्तन हुआ, जो अब सीधा नारायन के
27:54हिरदय की धड़कन से जुड़ गई थी.
27:58वहां उपस्थित गरोर ने भी अपने पंक सिकोड लिये, क्योंकि आज भक्ती की एक ऐसी पराकाश्ठा हो रही थी, जो
28:05वेकुंट में भी अद्विती थी.
28:08नारद ने अनुभव किया कि वेकुंट का नियम, कर्म का नियम नहीं, बल्कि केवल और केवल करुणा का नियम है.
28:17समय मानो थम गया और नारद का मस्तक स्वय नारायन के चर्णों में समर्पित होने के लिए धीरे-धीरे जुपने
28:24लगा.
28:25आज नारद केवल एक मुनी नहीं रहे, बल्कि वे साक्षात भक्ती का एक जीवन्त स्वरूप बनकर प्रभो की सेवा में
28:33समर्पित हो गए.
28:35उस गुंजती हुई नारायन ध्वनी के साथ, वेकुंट का द्वार सदा के लिए नारद की भक्ती का साक्षी बन गया.
28:44महाती वीना के तारों पर नारद की उंगलियां थिरकते ही वेकुंट के अनंत आकाश में एक दिव्य संगीत गुंज उठा.
28:52साक्षात भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर विराजित होकर इस अभूत पूर्व संगीत और अनन्य भक्ती का आनंद लेने लगे.
29:02नारद के कंट से निकली पहली नारायन की ध्वनी ने संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना को जखजोर कर रख दिया.
29:10उस पवित्र नाम के उच्चारण से वैकुंठ के विशाल और भारी स्वर्ण द्वार पहली बार स्वता कामपने लगे.
29:18महाती वीना का प्रत्येक स्वर भगवान विश्नु के चर्णों में समर्पित एक जीवन्त पुष्प के समान प्रतीत हो रहा था.
29:26भग्ती की उस प्रखर जोती ने वैकुंठ के कोने कोने को एक अलोकिक स्वर्ण प्रकाश से आलोकित कर दिया.
29:34नारद के हृदय का सारा संताप उस एक ही पवित्र मंतर के समरण मात्र से बिलीन हो गया.
29:41वैकुंठ की गगंचुम्बी स्वर्ण मीनारे भी इस भक्तिरस की धारा में सरोबार होकर जूम उठी
29:49स्वय भगवान नारायन ने अपनी योग निद्रा त्याग कर अपने इस परम भक्त की गोर अपनी कृपा द्रिश्टी डाली
29:57माता लक्ष्मी ने भी प्रसन्न होकर अपने परमेश्वर की इस लीला पर आनन्दित मुद्रा में पुश्प वर्षा की
30:05नारद ने अपनी आखें खोली और सामने साक्षात अपने आराध्य को देख कर उनका रोम रोम पुलकित हो उठा
30:14वहक्षन त्रैलोक्य के इतिहास में भक्ती और भगवान के मिलन का सबसे स्वर्ण स्वर्णिम अध्याय बन गया
30:22नारद का मस्तक एक बार फिर उस महाप्रभु के चर्णों में जुख गया और उनके आसूं से चरण अभिशेक होने
30:29लगा
30:30भगवान विश्णु ने आगे बढ़कर अपने प्रिय भक्त को अपने वक्ष से लगा लिया जिससे समस्त ब्रहमांड में शितलता फैल
30:38गई
30:39उस दिव्य आलिंगन ने नारद को भौतिक बंधनों से मुक्त कर अमर प्रेम और भक्ती की पराकाष्ठा पर पहुचा दिया
30:48वैकुंठ के द्वार जो अब तक बंद थे वे अब प्रेम और भक्ती के प्रताप से सरवदा के लिए खुल
30:54चुके थे
30:56नारद की वह पहली नारायन ध्वनी अब वैकुंठ की सीमाओं को लांग कर संपूर्ण ब्रहमाड में गूजने लगी थी
31:05देवर्शी नारद का यह महा मिशन अब सफल हो चुका था क्योंकि भक्ती का पहला मार्ग प्रशस्थ हो गया था
31:13नारायन के मुख से निकला आशिरवाद नारद के जीवन का सबसे बड़ा संबल बन गया
31:19इस प्रकार वैकुंठ के द्वार पर गूंजी नारायन की उस पहली ध्वनी ने स्रिष्टी के कल्यान का नया इतिहास रच
31:27दिया

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