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इस एपिसोड में देवर्षि नारद वैकुंठ के गर्भगृह से आगे बढ़ते हुए गोलोक के उस रहस्यमयी द्वार तक पहुँचते हैं जहाँ का दृश्य आज तक किसी देवता ने नहीं देखा। भगवान विष्णु की कृपा से नारद को वो दिव्य रासलीला का दर्शन प्राप्त होता है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मूल है। क्या नारद इस महा-ज्ञान को पचा पाएंगे? जानिए ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस अद्भुत एपिसोड में। #Narada #Vaikuntha #Goloka #RadhaKrishna #BrahmavaivartaPurana #HinduMythology #Devotion #Spirituality #SanatanDharma #Puranas
Transcript
00:00नारद ने भक्ती भाव से मस्तक जुका कर भगवान विश्नु और देवी लक्ष्मी को नमन किया, जैसे कोई छोटा साकन
00:07विशाल ब्रहमांडिय प्रकाश के सामने स्वयं को समर्पित कर रहा हो.
00:13विश्नु का वह सौमे मुखमंडल मंद मुस्कान के साथ नारद के समर्पन को स्विकार कर रहा था, मानों उनकी करुणा
00:20संपून स्रिष्टी के हर अनों में व्याप्थ हो.
00:24नारद के हाथ में स्थित उनकी वीना से एक मधुर जंकार स्वतही उत्पन हो उठी, जो इस पावन क्षण की
00:32दिव्यता का बखान करने लगी.
00:35वैकुंठ का वह दिव्यवातावर्ण स्वर्ण आभासे जगमगा उठा, जहां हर एक पुष्प और लता नारायन के नाम का कीर्तन कर
00:43रहे थे.
00:45नारायन के संकेट पर नारद ने अपनी द्रिष्टी उठाई, जहां उन्हें ब्रह्मान के रहसियों की ओर जाने वाला एक गुप्ट
00:52स्वर्णिन मार्ग दिखाई दिया.
00:55नारद ने अब भगवान के सम्मुख से विदाली, उनका हृदय प्रेम और कृतग्यता के सागर में पूरी तरह डूब चुका
01:03था.
01:04उनके पैरों की गती मंत्रमुग्ध थी, वे वैकुंट के दिव्य उद्यानों से होते हुए उस प्रतिबंधित शेत्र की ओर बढ़
01:12रहे थे, जहां जाने का साहस कोई नहीं करता.
01:16आकाश में सितारे जैसे नृत्य कर रहे थे, वेकुंट की सीमा पर स्थित वे दिव्य द्वार धीरे-धीरे उनकी अलोकिक
01:24यात्रा का गवाह बन रहे थे.
01:27नारद ने जैसे ही उस अग्रिश्य दहलीज को पार किया, वेकुंट की शान्ती के पीछे उन्हें एक अध्भुत स्पंदन का
01:34आभास होने लगा.
01:36उस दिव्य स्थान पर स्वय नारायन की दिव्य शक्ती का एक और स्वरूप उपस्थित था, जिसे देखना हर किसी के
01:44भाग्य में नहीं होता.
01:46नारद की वीना की धुन अब और अधिक गंभीर हो गई थी, मानो वह स्वय उस निशिद्ध मार्ग की उर्जा
01:53के साथ तालमिल बिठा रही हो.
01:56चारों और स्वर्ण कमल की पंखुडिया धीरे से गिर रही थी, जैसे प्रकृती स्वय नारद का उस रहस्य में मार्ग
02:03पर स्वागत कर रही हो.
02:06नारद ने अनुभव किया कि इस दिव्य मार्ग पर चलते हुए उनका शरीर हलका हो रहा था, जैसे सांसारिक बंधनों
02:13से वे पूर्णता मुक्थ हो गए हो.
02:17सामने का मार्ग अब और अधिक प्रकाशमान हो गया था, जहां से रासलीला की दिव्य ध्वने की गूंज नारत के
02:24कानों तक पहुँचने लगी थी.
02:27उनकी वीना का स्वर अब एक गहरे ध्यान में परिवर्तित हो चुका था, जो उन्हें सांसारिक जगत से मीलों दूर
02:34ले जा रहा था.
02:36वैकुंट का वह निशिद्ध मार्ग अब अपनी पूरी महिमा के साथ खुल रहा था, जहां से दिव्य सुगंधित हवाय आ
02:43रही थी.
02:45नारद के चहरे पर अग्भुत शांती थी, क्योंकि उन्हें पता था कि आज वे उस सत्य का दर्शन करेंगे जो
02:52वेदों की भी पहुँच से बाहर है.
02:56ब्रहमांड की हर ध्वनी उस एक बिंदु पर आकर थम गई थी, जहां से रासलीला का अनादी प्रवा प्रवाहित हो
03:03रहा था.
03:05नारद ने अपना अगला कदम उस प्रकाश की ओर बढ़ाया, और वेकुंट का वह निशिद्ध कोना उनके चर्णों के स्पर्श
03:12से धन्य हो गया.
03:14अंतिम द्वार के पार अब रासलीला का दिव्य दर्शन प्रतीक्षा कर रहा था, जहां समय भी ठहर गया था.
03:22महाती वीना के तारों से फूटी वह दिव्य अनुगुंज वेकुंट की स्वर्णमे गलियों में एक अद्रिश्य मार्क का निर्मान करने
03:30लगी.
03:31नारग ने अनुभव किया कि उनकी उंगलियां स्वयं किसी अलौकिक शक्ती से संचालित हो रही हैं, जो वीना की ध्वनी
03:39को एक दिव्य दिशा दे रही हैं.
03:43वीना की प्रतिध्वनी जैसे जैसे तीवर होती गई, वेकुंट के स्वर्णस्तंभ अपनी चेतना में जागरित होकर एक स्वर में गूंजने
03:51लगे.
03:52यह स्वर केवल संगीत नहीं था, बलकि वेकुंट के अंतसका वह निशिद्ध रहस्य था जो अब नारत के लिए प्रकट
04:00होने को व्याकुल था.
04:03वायुमंदल में तैरते हुए मंदार पुष्पों की सुगंध ने मार्ग को और अधिक अलोकिक बना दिया, जैसे प्रकृती स्वयन स्वागत
04:11कर रही हो.
04:13नारत का हृदय इस परम ध्वनी के साथ सामन्जस्य बिठाते हुए ब्रहमांडिय आनंद की चरम सीमा पर पहुँच गया था.
04:22अचानक वीना की ध्वनी एक सुख्ष्म आवरित्ती में बदल गई, जिससे वैकुंठ का एक अद्रिश्य द्वार नारत के सम्मुख चमक
04:30उठा.
04:31वह द्वार सामान्य नहीं था, यह रासलीला के उस दिव्यक्षेत्र का प्रवेशद्वार था जहां का अस्तित्व समय की सीमाओं से
04:39परे था.
04:41पूरी वैकुंठ नगरी एक दिव्यस पंदन में डूब गई, जैसे अनंत काल से प्रतीक्षित कोई शुब संकेत पूर्ण होने वाला
04:49हो.
04:50नारद ने अपनी वीना को था में उस स्वर्णिन प्रवेशद्वार की और एक निर्नायक कदम बढ़ाया, जो अब पूरी तरह
04:57से खुल चुका था.
05:00द्वार के पार का द्रिश्य किसी दिव्यस वपन के समान था, जहां प्रकाश स्वयन रित्य करता हुआ प्रतीत हो रहा
05:07था.
05:08ध्वनी की वह आवरित्ती अब नारद के रोमरोम में समा कर एक अलौकिक शून्यता का अनुभव करा रही थी.
05:16जैसे जैसे नारद आगे बढ़े, उनकी वीना की ध्वनी और भी अधिक मधुर और सुक्ष्म होती चली गई.
05:25वहां की हवाओं में भी भक्ती का राग घुल गया था, जो नारद की चेतना को उच्छतर लोकों की ओर
05:31खीच रहा था.
05:33वीना का प्रत्येक कमपन उस मार्ग को प्रकाशित कर रहा था, जिसे केवल एक प्रेमी भक्ती देख सकता था.
05:42नारद की आखें उस दिव्य वैभव को आत्म साथ कर लेने के लिए व्याकुल थी, जिसका दर्शन करने का सौभाग्य
05:49देवताओं को भी दुरलब होता है.
05:53रासलीला के उस तड़ तक पहुँचने के लिए वीना की ध्वनी एक दिशासूचक यंत्र की भाती कार्य कर रही थी.
06:01नारद ने अनुभव किया कि वैकुंट का यह मार्ग समय और काल के बंधनों से मुक्त एक अलग ही आयाम
06:08में ले जा रहा है.
06:10वीना की अंतिम मधुर अनुगूंच के साथ नारद ने उस निशिद्ध शेत्र के अंतिम सीमारेखा को पार कर लिया.
06:18सामने का द्रिश देख नारद की वीना शांत हो गई, क्योंकि अब उन्हें अपनी आँखों के सामने रासलीला का अनादी
06:26दर्शन प्राप्थ होने वाला था.
06:29नारद की द्रिश्टी के सामने अंतरिक्ष का वह विस्तार खुल गया, जहां स्वर्ण कमल के पुश्पों से बने महल मानो
06:36ब्रहमांड के कंकन को अपनी दिव्य आभा से प्रकाशित कर रहे थे.
06:42दिव्य साक्षातकारों के स्वामी, भगवान विश्णु का शांत और सौमय स्वरूप जो नील वर्ण के तेज से युक्त हैं, रासलीला
06:50के उस प्रांगण के मध्य में योग निद्रा की मुद्रा में विराजमान प्रतीत हुए.
06:56वायुमंडल में गुंजायमान उस अलौकिक संगीत की ध्वनी नारत की चेतना को जैसे एक ऐसे सुक्ष्म लोक में खींच लिया
07:04जहां समय का प्रवाह पूरी तरह थम गया है.
07:08यह वह स्थान है जहां भक्ती के चर्मोत कर्ष पर भक्त स्वयं अपने आराध्य के साथ उस प्रेम लीला का
07:15अभिन्न अंग बन जाता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है.
07:21अनन्त रासलीला का वह अध्भुत द्रिश नारध की पलकों के सामने साकार होने लगा, जिसमें प्रत्येक गोपिका का हृदय केवल
07:29कृष्न के प्रेम की धुन पर स्पंदित हो रहा था.
07:33स्वय भगवान ने अपनी योगमाया के द्वारा उस निशिद्ध लोग के द्वारों को इतना सुलब बना दिया था कि एक
07:40भक्त के लिए वह केवल एक भाव की दूरी पर था.
07:44नारद ने देखा कि उस प्रेम के महासागर में न केवल देवता, बलकि प्रकृती का प्रत्येक कन भी आनंद के
07:52अश्रूओं से सराबोर होकर निर्थ्य कर रहा था.
07:56द्रिशिकी भव्यता इतनी अधिक थी कि देवर्शी की वीना भी अब केवल उस ब्रहमांडियस पंदन के साथ स्वयही स्वर उत्पन्न
08:04करने लगी थी.
08:06वह दिव्य लोक अब उनके चारों और व्याप्त था, जहां रास के केंद्र में साक्षात पर ब्रहम अपनी लिलाओं का
08:13विस्तार कर रहे थे.
08:16भगवान विश्णों के उस शांत और भव्य स्वरूप ने अपनी मंद मुस्कान के साथ नारत की ओर देखा, मानों उनकी
08:23भक्ती की निष्ठा का उत्तर दिया जा रहा हो.
08:27नारद ने उस निशिद्ध मार्ग के उस पार जाकर यह बोध किया कि प्रेम ही वह एक मात्र सेतु है
08:34जो जीव को ब्रहमा से जोडता है.
08:37वायु मंदल में पुश्पों की सुगंध और दिव्य संगीत का ऐसा सम्मिश्रण था जिसे देवलोग की साधारन इंद्रिया भी सहन
08:45करने में असमर्थ थी.
08:48सामने का विशाल प्रांगन ऐसे प्रकाश से जग्म का रहा था जो न तो सूर्य का था और नहीं चंद्रमा
08:55का अपितु वह स्वय क्रिश्न का आत्म प्रकाश था.
08:59ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में नारद ने हाज उस सर्वोच ज्यान को आत्म साथ किया जो वेदों और
09:06उपनिश्दों की सीमाओं से परे हैं.
09:10प्रक्तियक पच्चाप के साथ नारद का अहंकार जैसे उस दिव्यधूल में मिलकर पूर्णता विलीन हो रहा था.
09:17वह अद्भुत वातावर्ण जो कभी निशिद्ध माना जाता था, अब देवर्शी के लिए एक स्नेहिल और आत्मे आश्रय बन चुका
09:26था.
09:28रासलीला का दर्शन करते हुए नारद का हरिदय जैसे क्रिश्न की मुर्ली के सुरों में सदा के लिए खो गया
09:34था.
09:35भगवान की उपस्थिती ने उस संपूर्ण आयाम को एक अलौकिक प्रेम की उर्जा से भर दिया था, जहां द्वैत का
09:43कोई स्थान नहीं था.
09:45इस दुरलब दर्शन को प्राप्त करके नारद का अस्तित्व धन्य हो गया, क्योंकि उन्होंने वह देख लिया था जो ब्रहमांड
09:52के निर्माण के पूर्व से सत्य है.
09:56वैकुंट का वह निशिद्ध मार्ग, आज एक भक्त की निश्चल भक्ती के समक्ष नत्मस्तक होकर स्वय द्वार बन चुका था.
10:05जैसे ही नारद ने उस दिव्य दहलीज को पार किया, भौतिक जगत के सारे नियम पिघल कर एक आदिम चेतना
10:12में विलीन हो गए.
10:14नारद ने अनुभव किया कि काल की धारा अब सीधी न बहकर एक वृत्ताकार ब्रहमांडियन रीति में परिवर्तित हो गई
10:22थी.
10:23उनके चारों और आकाश गंगाओं का निर्मान और प्रलय एक ही क्षण में घटित हो रहे थे, जैसे कोई अनंक
10:31चित्रपट सजीव हो उठा हो.
10:33एक क्षण में उन्होंने देखा कि स्रिष्टी का आरंभ केवल एक नाज से हुआ था, जो अभी भी वैकुंठ की
10:40वायू में गूंज रहा है.
10:43समय की यह धुरी अब नारत के लिए पूरी तरह स्थेर हो चुकी थी, जहां वे एक साथ अतीत और
10:50भविश्य को देख पा रहे थे.
10:53भगवान नारायन के स्मित हास्य ने उस आयाम को और भी अधिक प्रकाशवान बना दिया, जिससे नारत की द्रिष्टिया और
11:01अधिक तीवर हो गई.
11:03नारत ने देखा कि संसार का हर जीव, चाहे वह देवता हो या दानव, उसी एक महाशक्ती की इच्छा से
11:11संचालित हो रहा है.
11:14कालचक्र की परिधी पर स्थित होते हुए भी नारत को स्वय के अस्थित्व का भान मिट गया और वे शूनी
11:20की पूर्णता में खो गए.
11:22दूर कहीं ब्रहमांड की विभिन अवस्थाए एक बिंदु पर आकर सिमट गई, जिसे देखकर नारत का हृदय परमानंद से भर
11:31उठा.
11:32श्री हरी की करुणा ने नारत को कालबंधनों से मुक्त कर उन्हें साक्षात ब्रहमांडिय ज्यान की अनुभूती प्रदान की.
11:41प्रत्येक पल में युगों का ज्यान समाहित था, जिसे नारत अब अपनी चेतना के विस्तार में अनुभव कर रहे थे.
11:49वैकुंठ का वह मार्ग जो पहले कठिन प्रतीत होता था, अब नारत की भक्ती के लिए एक सहज राजमार्ग बन
11:56चुका था.
11:58श्रिष्टी का हर पर्मानु अब एक मंत्र की भांती स्पंदित हो रहा था, जो केवल सत्य और प्रेन का आहवान
12:06कर रहा था.
12:08नारत के मुख से अब कोई शब्द नहीं, बलकि केवल उस दिव्य सत्य का मौन संगीत प्रवाहित हो रहा था.
12:16अतीत की स्मृतिया और भविष्य की संभावनाए सब कुछ उस दिव्य प्रकाश में एक साथ विलीन हो गई.
12:24अचानक नारत ने देखा कि वे स्वयं उस दिव्य लीला का एक छोटा सा अंश बनकर उसमें तैर रहे हैं.
12:32समय का वह भ्रम पूरी तरहे तूट चुका था और अब केवल शाश्वत वर्तमान शेश था.
12:39नारायन के चर्णों की धूल भी इस क्षण में ब्रहमांड के समस्त रहसियों का उत्तर लिये हुए थी.
12:46नारद समझ गए की जिसे वे निशिद्ध मार्ग समझ रहे थे, वह वास्तव में स्वय का अंतरात्मा से मिलन का
12:54पत्थ था.
12:55वह दिव्य दर्शन अब नारद के रोम रोम में समा गया था और वैकुंठ का वह स्थान उनकी चेतना का
13:02स्थाई केंद्र बन गया.
13:04नारद के चारों ओर की भूमी सहसा चैतन्य हो उठी और प्रत्येक व्रिक्ष प्रेम के स्पंदन से संगीत उत्पन करने
13:12लगा.
13:13स्वय भगवान नारायन ने मुस्कुराते हुए अपनी दिव्यद रिष्टी से नारद को वह गुप मार्ग दिखाया जो सीधे रासलीला के
13:21प्रांगण की ओर जाता था.
13:24नारद ने देखा कि उस मार्ग की मिट्टी भी स्वर्ण कणों की भांती चमक रही थी, जो अनंत काल से
13:31अंगिनत भक्तों की भक्ती का प्रतीक थी.
13:34उस अलौकिक मार्ग पर चलते हुए नारद को प्रतीत हुआ कि वे स्वयं के भीतर ही स्रिष्टी के रहसियों को
13:41अनुभूत कर रहे हैं.
13:44व्रिंदावन का वह दिव्य स्वरूप वैकुंट के भीतर ही प्रकट हो गया, जहां यमुना की लहरें भक्ती के राग में
13:51कलकल कर रही थी.
13:53भगवान श्री कृष्ण की वन्शी की ध्वनी ने नारद की चेतना के सभी द्वारों को एक साथ खोल दिया.
14:01प्रत्येक गोपी के मुख पर वह तेज था जो साक्षात ब्रह्मा के तब को भी तुछ सिद्ध कर रहा था.
14:09नारद ने अनुभव किया कि जिस रासलीला के लिए वे तरस्ते थे, वह कोई बाहे घटना नहीं, अपितु आत्मा का
14:16परम निरित्य है.
14:18वे दिव्यवरिक्ष अब अपनी शाखाओं से फूलों की वर्षा कर रहे थे, मानो स्वयन प्रकृती उस महामिलन को नमन कर
14:26रही हो.
14:28श्री कृष्न की मधूर मुस्कान नारद के भीतर व्याप्त संशय के अंतिम अंधकार को भी भस्म कर रही थी.
14:36नारद ने देखा कि उस लोक में काल का कोई अस्तित्व ही नहीं था, वहां केवल एक शाश्वत वर्तमान था.
14:44वह द्रिश नारद के हरिदय में एक ऐसे गहरे भाव के रूप में अंकित हो गया, जिसे कोई वानी व्यक्त
14:50करने में असमर्थ थी.
14:53आकाश में तैरते हुए वैकुंठ के महल जैसे स्वय भक्ती के स्तंभों पर टिके हुए थे.
15:00भगवान नारायन ने नारद की ओर देखा और एक मंद मुस्कान के साथ उनकी संपूर्ण यात्रा को स्विकार किया.
15:08उस दिव्य प्रांगण में नारद के पैरों के नीचे की भूमी स्वय के आनंद का विस्तार बन गई थी.
15:16ब्रहमांड के सभी संगीत उसक्षन नारद की वीना में स्वतह ही समाहित होने लगे थे.
15:22नारद को यह बोध हुआ कि भक्ती का यह मार्ग ही इस ब्रहमांड की सबसे कठिन परंतु सुन्दर साधना है.
15:31देवी लक्षमी ने अपनी कृपा द्रिष्टी बरसाते हुए उस स्थान को और अधिक दिव्य उर्जा से भर दिया.
15:38उस लोग का कणकण अब नारद की आत्मा का अभिन्न हिस्सा बन चुका था.
15:45नारद ने समझ लिया कि वैकुंट के उस निशिध मार्ग का रहस्य केवल प्रेम और समर्पन की पराकाश था थी.
15:53अचानक वैकुंट की अनन्त गहराईयों से एक ऐसी अलोकिक ध्वनी गुंजी जिसने ब्रहमांड के समस्थ शोर को शांत कर दिया.
16:02नारद मुनी ने अपनी आखे बंद कर ली क्योंकि वह बांसुरी का स्वर उनकी आत्मा के तारतार को जंकृत कर
16:09रहा था.
16:11यह स्वर साधारण नहीं था, बलकि यह स्वयन परमात्मा की रासलीला का अनादी निमंतरण था जो शूने को भी स्पंदित
16:19कर रहा था.
16:21वैकुंट के स्वर्ण प्रासाद का प्रत्येक शिखर उस अलौकिक संगीत की आवरित्ती में थिरकते हुए स्वर्ण वर्शा कर रहा था.
16:30नारद ने महसूस किया कि यह वह संगीत है जिसे सुनने के लिए योगियों को युगों तक तपस्या करनी पड़ती
16:37है.
16:39स्वया भगवान विश्णू के मुख पर एक मंद मुस्कान उभ्री जो उस मधुर धुन की प्रतिध्वनिसी प्रतीत हो रही थी.
16:48वह बांसुरी की तान जैसे जैसे तीवर हुई, वैकुंट के कंकं से दिव्य सुगंधित पवन बहने लगी.
16:55ध्वनी का वह स्पंदन अब नारद के वीना के तारों से भी प्रतिध्वनित होने लगा, मानो वीना भी उस लीला
17:02का हिस्सा बनना चाहती हो.
17:05नारद की चेतना उस ध्वनी के पीछे-पीछे अद्रिश्य गलियारों से आगे बढ़ने लगी, जहां समय का अस्तित्व समाप्थ हो
17:13गया था.
17:15वैकुंट की गूंज में छिपी वह रागिनी ब्रहमांड के सबसे गुप्त सत्य को उजागर करने का संकेट दे रही थी.
17:34संगीत केवल कानों के लिए नहीं, बलकि हृदय की अनुभूतियों को जगाने के लिए था.
17:41वैकुंट के उस शांट आकाश में अब संगीत की तरंगें एक स्वर्निन ओढ़नी की तरह बिछी हुई थी.
17:49भगवान की उस दिव्य मुस्कान में संगीत की लैस पश्ट रूप से जलक रही थी, जो नारत को मोह रही
17:55थी.
17:57बानसुरी का स्वर अब और भी कोमल हो गया, जैसे कोई प्रेमी अपने प्रिये को निजहरिदय के समीक बुला रहा
18:04हो.
18:05नारत का अहंकार पूरी तरह गल चुका था, वे केवल उस ध्वनी के अनुगामी बनकर रह गए थे.
18:13वैकुंट की उस दिव्य शांती में, वह बानसुरी की गूंज एक महा सागर जैसी अगाध गहराई पैदा कर रही थी.
18:22नारत के रोम्रोम से अब वही स्वर्प फूट रहे थे, जो वैकुंट की उस बानसुरी से निकल रहे थे.
18:29यह वह अद्वितियक्षन था जब भक्त और भगवान के बीच की दूरी संगीत की डोर से सिमट गई थी.
18:37रासलीला का वह निशिद्ध दर्शन अब नारत की दृष्टी के सामने जीवन्थ होने की प्रतीक्षा कर रहा था.
18:45ब्रहमांड की सीमाएं पिघलने लगी और नारत के चारों और स्वर्ण कमल के पंखुरियों से एक दिव्य और अलौकिक प्रकाश
18:53फैल गया.
18:54नारत ने देखा की भगवान विश्णु का चतुर्भुज रूप मंद मुस्कान के साथ एक अनंत प्रेम के महासागर में विलीन
19:02हो रहा है.
19:04वैकुंट के उस गुप्ट कुंज में साक्षात राधाकृष्ण का रास आरंभ हुआ, जहां की हवाओं में केवल भक्ती की गुम्ज
19:12थी.
19:13परम सत्ता का वह सौंदर्य किसी एक लोक का नहीं, बलकि सम्पूर्ण स्रिष्टी के अस्तित्व का सार प्रतीत हो रहा
19:21था.
19:22नारद की द्रिष्टी ने देखा कि समस्थ गोपिया, जो साक्षात शृतियों का प्रतीक थी, एक ही लए में नाच रही
19:29थी.
19:31भगवान नारायन का वह मुख मंडल, जो रासलीला के आनंद से प्रफुलित था, भक्त के लिए मोक्ष से भी बढ़ा
19:38सत्य था.
19:40हर गोपी के साथ एक अलग क्रिष्ण नरित्य कर रहे थे, और हर क्रिष्ण के हृदय में केवल वही एक
19:47मात्र दिव्य प्रेन धड़क रहा था.
19:50यह वह रहस्य था, जिसे देवता भी अपनी तपस्या से नहीं देख पाए थे, और आज नारत के लिए द्वार
19:57खुल गए थे.
19:59आकाश के नक्षत्र भी मानो ठहर गए थे, इस अनुपम रासलीला के संगीत की एक एक ताल सुनने के लिए.
20:07नारत ने कापते हुए हाथों से वीना को थाम लिया, क्योंकि उनके हृदय में अब वही दिव्य स्पंदन हो रहा
20:14था, जो रासलीला का आधार था.
20:17हर कदम पर एक नया लोक रच रहा था, और हर सास में स्रिष्टी का विस्तार सिमट रहा था.
20:24वह निशिद्ध मार्ग जो अब तक रहस्य में था, अब प्रकाश की अनन्त धाराओं में बदल चुका था.
20:32नारत की चेतना अब उस दिव्य संगीत के साथ एक हो गई थी, जिसे केवल आत्म ज्यानी ही अनुभव कर
20:39सकते हैं.
20:42भगवान के उस मधुर मुस्कान के पीछे छिपे अनन्त ब्रहमांडों का दर्शन पाकर नारत के नयन अश्रुपूर्ण हो गए.
20:50प्रत्येक गोपी का आत्म स्मर्पन ही वह डोर थी, जिससे वे दोनों राधा और कृष्ण सदा के लिए एक दूसरे
20:58से बंधे थे.
21:00समय का चक्र रुप गया और वैकुंट की उस कांती में केवल वह शाश्वत प्रेम ही शेश रह गया.
21:07नारत के भीतर का भक्त अब शान्त था क्योंकि उसने वह देख लिया था जिसके लिए वह युगों से भटक
21:14रहे थे.
21:15वह दिव्य रासलीला अब एक द्रिश नहीं, बलकि नारत के अस्तित्व का अविभाज भाग बन चुकी थी.
21:23वैकुंट का वह कोना, जहां निशिद्ध मार्ग समाप्थ हुआ, वहां से भक्ती का एक नया द्वार खुल गया.
21:31आज नारत में न केवल रासलीला देखी थी, बलकि स्वयं को उस लीला में खोकर ब्रहमा का साक्षात कार कर
21:39लिया था.
21:40नारत का हृदय वैकुंट की उस अनंत उर्जा को सहन करने के लिए अपने भीतर के स्पंदन को स्थिर करने
21:47का प्रयास कर रहा था.
21:49तभी साक्षात विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ नारत की ओर देखा, जैसे वे उनके अंतर्मन की व्याकुलता को भलीभानती
21:58जान रहे हूँ.
22:00नारत ने अपनी आखे बंद कर ली और वैकुंट की दिव्य तरंगों को अपने प्राणों में समाहित करना आरंभ किया.
22:08ब्रहमांड की हर ध्वनी अब नारत के कानों में ओम के गुंजार के समान प्रतिध्वनित होने लगी थी.
22:16जैसे ही उन्होंने अपने चित्त को एकागर किया, वैकुंट का दिव्य प्रकाश उनके शरीर के कणकन को पवित्र करने लगा.
22:25लक्ष्मी देवी ने अपनी कृपा ग्रिष्टी नारत पर डाली, जिससे उनके मन के सारे सांसारिक संशय एक पल में तिरोहित
22:33हो गए.
22:34नारत ने देखा कि उनके भीतर का अहमकार अब उस दिव्य जोती में भस्म होकर शुद्ध चैतन्य में बदल रहा
22:41है.
22:43जह परीक्षा केवल भक्ती की नहीं, बलकि स्वयं के अस्तित्व के पूर्ण समर्पन की थी.
22:50नारत ने अनुभव किया कि उनकी आत्मा अब वैकुंट के उस निशिद्ध मार्ग की सीमाओं से मुक्थ हो चुकी है.
22:59विश्नु ने मंद स्वर में कहा कि जो स्वयं को पूरी तरह मिटा देता है, वही वैकुंट का वास्तविक अधिकारी
23:06है.
23:08नारत ने अपने वीना के तारों को छेरा, जिससे निकली संगीत की लहरेंग वैकुंट के कणों से मेल खाने लगी.
23:16अद्रिश शक्तियों का एक चक्रसा बन गया, जिसने नारत को पूर्ण सुरक्षा और शांती का अनुभव कराया.
23:24संसार की माया के सारे बंधन इस दिव्य अनुभव के सामने तिनके की भांती बिखर गए.
23:31नारत की एक आगरता अब उस बिंदु पर थी जहा काल और समय का अस्तित्व समाप्थ हो जाता है.
23:39उनका शरीर अब उस दिव्य उर्जा को धारन करने में पूर्ण तह सक्षम हो चुका था, जिसे सहना सामान्य देवों
23:46के लिए भी कठिन था.
23:49अंतिम अवरोध के रूप में उनके मन में छिपे थोड़े से अहंकार ने भी अंतह घुटने टेक दिये.
23:56वैकुंट का वह निशिद्ध मार्ग अब नारद के लिए एक मार्ग नहीं, बलकि मोक्ष का साक्षात द्वार बन गया था.
24:05विश्नु और लक्षमी के मुख पर नारद के प्रती एक अगाध संतोश और प्रेम की जलक दिखाई दी.
24:12नारद ने नमन करते हुए स्विकार किया कि यह केवल प्रभू की इच्छा थी, उनकी अपनी कोई शक्ती नहीं.
24:21भक्ती का यह नया आयाम पाकर नारद का अस्तित्व वैकुंट की उस अमर उर्जा में विलीन होने लगा.
24:28वैकुंट के स्वर्ण प्रांगण में अचानक एक दिव्यस पंदन उत्पन हुआ, जिससे संपूर्ण वातावर्ण नीले और सुनहरे प्रकाश की तरंगों
24:37में सराबोर हो गया.
24:40नारायन के मुख से निकली वह ओजस्वी ध्वनी नारद की आत्मा के भीतर एक अलौकिक सत्य के रूप में प्रतिध्वनित
24:47होने लगी.
24:49प्रभु ने बताया कि रासलीला केवल एक क्रीडा नहीं, बलकि राधा और कृष्ण का एकत्व ही जगत की मूल चेतना
24:56है.
24:58नारद ने अनुभव किया कि यह ज्यान उनके संपूर्ण अस्तित्व को एक ऐसे बिंदु पर ले आया है, जहां द्वैत
25:05का कोई स्थान नहीं बचा है.
25:08चारो और व्याप्त दिव्य नीलिमा और स्वर्ण की चमक ने एक ऐसा मंडप निर्मित किया, जहां समय की गती थमसी
25:16गई.
25:17विष्णू ने अपनी मुस्कुराती हुई द्रिष्टी से नारत को यह समझाया कि राधा स्वयन उनकी शक्ती और कृष्ण उनका स्वयन
25:25का हृदय है.
25:28ब्रहमांड की हर इकाई इस दिव्य प्रेम के स्पंदन से स्पंदित हो रही है, जिसे नारत अब अपनी अंतरात्मा से
25:35स्पष्ट सुन सकते थे.
25:38हवा में बहते चंदन की सुगंध और वीना की अद्रिष्य गूंज ने नारत के हृदय में भक्ती का एक महासागर
25:45उम्रा दिया.
25:47वैकुंठ का वह विशाल परिसर अब एक ऐसे दरपण के समान था, जिसमें नारत को अपनी स्वयन की आत्मा का
25:54प्रतिविंब राधाकृष्ण के प्रेम में दिखाई दिया.
25:58प्रभु के मुख से जरते हुए शब्दों ने अज्यानता के उन सभी पर्दों को हटा दिया, जो नारत के मानस
26:05पटल पर अभी तक शेश थे.
26:08नारत का मस्तक नत्मस्तक हो गया, क्योंकि इस बोध ने उन्हें यह समझा दिया कि भक्ती का सर्वोच शिखर प्रेम
26:16का समर्पण ही है.
26:19दिव्यध्वनी ने यह संकेट दिया कि राधा का स्वरूप ही भक्ती की साक्षात अनुकृती है, जिसे प्राप्त करना ही प्रत्येक
26:26आत्मा का लक्ष है.
26:29वैकुंट के उचे स्वर्नस्तंभो से निकलती प्रकाश की किरने नारत के शरीर को दिव्य उर्जा से भर रही थी.
26:37विश्णु ने धीर स्वर में कहा कि रासलीला में प्रवेश करना भौतिक नेत्रों का नहीं, अपितु आत्मिक नेत्रों का विशय
26:45है.
26:47नारत की वीना के तार बिना किसी स्पर्ष के स्वतह ही जंकृत होने लगे, जो उस दिव्य प्रेम का गीतगा
26:53रहे थे.
26:55यह वहक्षन था जब नारत का व्यक्तित्व वैकुंट की इस शाश्वत उर्जा में पूरी तरह विलीन होकर एक हो गया.
27:03आकाश से गिरते हुए फूलों के पराग ने वैकुंट के उस पूरे क्षेत्र को एक अध्भुत सुगंध से भर दिया.
27:12नारायन की मुस्कान में संपून ब्रहमांड का सारा रहस्य समाहित था, जिसे देखकर नारत को परमशांती की अनुभूती हुई.
27:21अब नारत के भीतर कोई जिग्यासा शेश नहीं थी, क्योंकि उन्होंने वह सत्य पालिया था जो वेदों के भी पार
27:28था.
27:30वैकुंट का वह निशिद्ध मार्ग अब नारत के लिए केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि उनके सत्य बोध का अंतिम
27:37चरण बन चुका था.
27:40नारत ने जुपकर नारायन के चरणत्मलो को स्पर्ष किया और उनके हृदय में एक अडिक संकल्प का उदे हुआ.
28:07वैकुंट की दिव्यवायू ने नारत के संकल्प को स्विकार करते हुए एक शंकनाद किया, जिससे आकाश गंगाएं कम्पित हो उठी.
28:16नारत ने ब्रहमांड के समस्थ जीवों को प्रेम की पराकाश्ठा का मार्ग दिखाने का अपना जीवन समर्पित कर दिया.
28:25नारायन की द्रिष्टी में नारत को अपना भविश्य स्पष्ट दिखाई दिया, जहां भक्ती ही एक मात्र धर्म था.
28:33नारत ने अपनी वीना के तारों को प्रेम के उन सुरों में जकड लिया, जो केवल गोलोक में ही सुनाई
28:39देते थे.
28:41वैकुंठ का स्वर्ण शिखर इस एतिहासिक प्रतिग्या का साक्षी बना, जहां एक रिशी ने नश्वर संसार को अमर प्रेम का
28:49संदेश देने की शपत ली.
28:52नारद के भीतर का द्वैक मिट चुका था और अब उनके हर शब्द में नारायन का ही स्पंदन शेश था.
28:59गरुर देव ने अपने पंखों को फैला कर नारद के संकल्प को वायुमार्ग के माध्यम से त्रिलोकी में प्रसारित करने
29:07का संकेत दिया.
29:09नारद की आखों से भक्ती के अश्रुगिरे जो ब्रहमांड की शुश्कता को मिटाने के लिए दिव्य अमरत बन गए.
29:17आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, मानो स्वयं प्रकृती ने नारद के इस महान उद्देश को नमन किया हो.
29:25नारद ने अब एक नए अवतार के रूप में वैकुंट से प्रस्थान करने की अनुमती मांगी.
29:33नारायन की मौन सहमती ने नारद को भक्ती के प्रचारक के रूप में ब्रहमांड की यात्रा पर निकल जाने का
29:39निर्देश दिया.
29:41नारद के कद्मों के नीचे का मार्ग स्वयं प्रकाशित होने लगा, जो उनकी साधना की पवित्रता का प्रमार था.
29:49वैकुंट का वह द्वार जो अब तक निशिद्ध था, नारद के लिए भक्ती के अनंत द्वारों का केंद्र बन गया.
29:57नारद ने अपनी वीना को उच्चस्वर में बजाया, जिससे संपूर्ण वैकुंट में एक पावन ध्वनी गूझ गुठी.
30:06संकल्थ की वह अगनी अब नारद के भीतर एक मशाल बन चुकी थी, जो अज्यान के अंधकार को भस्म करने
30:13वाली थी.
30:15नारद ने अंत में एक बार पीछे मुड़ कर देखा, जहां नारायन की कृपा का प्रकाश अभी भी उन्हें आशिरवाद
30:22दे रहा था.
30:24एक नए युग का सूत्र पात करते हुए, नारद वैकुंठ की सीमाओं से बाहर निकल कर भक्ती के अनंत संसार
30:31की ओर बढ़ गए.

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