इस एपिसोड में देवर्षि नारद उस निषिद्ध मार्ग पर आगे बढ़ते हैं जहाँ से सीधे गोलोक की झलक मिलती है। रासलीला के परमानंद में लीन नारद को कृष्ण के एक ऐसे स्वरूप का अनुभव होता है जो आज तक वेदों के लिए भी रहस्य बना हुआ है। क्या नारद इस दिव्य ऊर्जा को सहन कर पाएंगे? देखिए ब्रह्मवैवर्त पुराण का यह अद्भुत रहस्यमयी अध्याय। #BrahmavaivartaPurana #Narada #KrishnaLeela #Goloka #HinduMythology #SanatanDharma #SpiritualJourney #GodRealization #VaikunthaSecrets
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00:00गोलोग की दहलीज पर खड़ा देवर्शी नारद उस अलौकिक दिव्य संगीत की प्रतिध्वनी में खो गए हैं, मानो ब्रह्मांड की
00:07चेतना उनकी वीना के तारों में सिमट आई हो
00:11नारद की आखों में वह दिव्यरस अब भी तैर रहा है, जैसे कोई सागर का अनन्ट विस्तार एक छोटी सी
00:18बूंद में समा गया हो
00:21उनकी वीना से निकलती सुक्ष्म तरंगे उस शांत वातावर्ण को कमपायमान कर रही हैं, जिससे समस्त लोक में शांती की
00:29एक नई लहर दोड़ गई है
00:32यह वहक्षन है, जहां समय का चक्र भी ठहर गया है, और नारत के हिदय में केवल राधाकृष्न का अद्वैक
00:40भाव शेश बचा है
00:43आकाश में बिखरी हुई नीली आभा नारत के चारों और एक सुरक्षा कवच की तरह फैल रही है, जो उन्हें
00:50सांसारिक मोह से दूर कर रही है
00:53नारत ने अपनी आखें बंद कर ली हैं, और उनके मुख पर एक अलौकिक मुस्कान है, जो उस अंतिम रहस्य
01:01को आत्मसात करने का प्रमाण है
01:05उनके भीतर एक दिव्य प्रकाश प्रजवलित हो रहा है, जो उनके रोमरों को राधाकृष्ण की रासलीला के भावों से अभिभूत
01:13कर रहा है
01:15यह दिव्यता इतनी प्रकर है कि स्वयंकाल भी नारत के मार्ग में कोई बाधा उत्पन करने का साहस नहीं कर
01:22पा रहा है
01:24नारत का मानस पटल उस रासलीला की अंतिन जाकी के लिए तयार हो रहा है, जो अब तक किसी भी
01:31जीव के लिए दुरगम रही है
01:35नारत की वीना अबमौन है, किन्तु उनकी आत्मा में गूंजता संगीत ब्रह्मान के हर पर्मानु को स्पंदित कर रहा है
01:44प्रत्येक सांस के साथ नारत उस दिव्य उर्जा को अंदर ले रहे हैं, जिससे उनका शरीर एक जोतिर्मय स्वरूप धारण
01:52कर रहा है
01:54यह दिव्य विस्तार नारत को साधारण विशी से उपर उठा कर एक ऐसे साक्षातकार के योग्य बना रहा है, जहां
02:02भेद मिट जाते हैं
02:05गोलोग की वह निशिद सीमा अब नारत के लिए एक द्वार के समान खुलती जा रही है, जो उनके धैर्य
02:12की परीक्षा ले रही है
02:15नारत के मुख से अब कोई शब्द नहीं, बलकि एक मौन प्रार्थना निकल रही है, जो सीधे गोलोग के स्वामी
02:22को समर्पित है
02:24उनके चारों और व्याप्त अलोकिक नीलिमा अब धीरे धीरे स्वर्णिम आभा में परिवर्तित हो रही है, जो रास के अंतिन
02:32दर्शन का संकेथ है
02:35यह वह अद्वितियक्षन है, जब भक्ती की पराकाश्था ज्यान के मार्ग को खोल देती है, और नारद शुने में भी
02:43पूर्णता को देख पा रही है
02:46नारद का प्रत्येक पग उस दिव्य उर्जा की ओर बढ़ रहा है, जैसे कोई भक्त गंगा के शीतल जल में
02:53अपनी प्यास बुझाने जाता है
02:56उनकी वीना पर अंकित दिव्य चिन्ह अब चमक रहे हैं, जो गोलोक की प्रवेश अनुमती के रूप में कार्य कर
03:03रहे हैं
03:15नारद ने अब उस अंतिन द्वार को छू लिया है, जिसके पार रासलीला का वह गुप्त रहस्य छिपा है, जिसे
03:22जानने हेतु देवर्शी युगों से प्रतीक्षा कर रहे थे
03:27महाती वीना के तंतूओं से फूट्ती वह अलौकिक ध्वनी ब्रहमांड के रिक्ट स्थान को भरते हुए नारद की चेतना को
03:34गोलोक की उच्चतर तरंगों के साथ एकाकार करने लगी
03:39देवर्शी ने अपनी आखे मून्द ली और स्वयं को उस दिव्यस पंदन के प्रती समर्पित कर दिया, जो उनके अंतर्तम
03:47के द्वारों को एक एक करके खोल रहा था
03:50जैसे ही वीना के तारों ने एक विशेश लैपकड़ी, नारद के हिदय में गोलोक के निकुंजों का सुक्ष्म प्रकाश प्रतिध्वनित
03:58होने लगा
04:00यह वह सुक्ष्मक्षन था जहां समय की धारा थम गई और देवर्शी की आत्मा ब्रहमांड के उस अंतिम रहस्य को
04:07छूने के लिए व्याकुल हो उठी
04:11चारों और का वातावर्ण अब नीले और सुनहरे आभा मंडल से भर चुका है, मानो सम्पून स्रिष्टी इस मिलन के
04:18साक्षी बनने के लिए ठहर गई हो
04:21नारद ने अपनी कापती उंगलियों से वीना पर वह अंतिम तार छेड़ा, जिससे गोलोक का निशेध द्वार अब मंद गती
04:29से खुलने लगा
04:31द्वार के खुलते ही भीतर से निकलने वाली प्रकाश की किर्णों ने नारद के शरीर को पूरी तरह से दिव्य
04:38जोती से आच्छादित कर दिया
04:40यह प्रकाश कोई साधारन भौतिक उर्जा नहीं, बलकि प्रेम और समर्पन का वह मूल स्रोत है, जहां से रासलीला का
04:49स्रिजन हुआ है
04:51नारद अब उस दहलीज पर खड़े हैं, जहां तक पहुँचना किसी भी देवता के लिए केवल एक स्वपन मात्र रहा
04:58है
05:00वीना की गूंज अब स्थिर हो चुकी है, मानो महाती स्वय भी इस दिव्य उपस्थिती के समक्ष मौन धारन कर
05:07चुकी हो
05:09नारद ने अपने चर्णों को गोलोग की उस पावन भूमी पर रखा, जो हर पक के साथ अमरित और माधुर्य
05:16की वर्षा कर रही है
05:19सामने का द्रिश देखते ही नारद के नेत्र विस्मय से भर गए, क्योंकि वहां प्रकृती का प्रत्येक कन भगवान के
05:26मधुर नाम का गुनगान कर रहा है
05:30गोलोग का यह विस्तार अनन्थ है, जहां प्रत्येक दिशा में दिव्य रास की गुप्त तरंगे महसूस की जा सकती है
05:38नारद ने अनुभव किया कि उनकी अपनी पहचान अब उन सुरों में विलीन हो रही है, जो संपूर्ण गोलोग में
05:46गूज रहे है
05:48वीना पर अनकित चिन्ह अब एक दिव्य भाशा में परिवर्तित हो गए है, जो नारद को आगे का मार्क दिखा
05:55रहे है
05:57जैसे जैसे वह आगे बढ़ते हैं, उनके चारों और दिव्य सक्खियों के मृदू हास की प्रतिध्वनी सुनाई देने लगती है
06:06यह वह अंतिम सीमा है, जिसके पार जाते ही रासलीला का वह गुप्त रहस्य प्रकट होगा जिसके लिए देवर्शी ने
06:14तब किया था
06:16नारद एक गहरी सांस लेते हैं, उनका मन अब पूरी तरह से शांत और एकाग्र हो चुका है
06:24उन्होंने अपनी वीना को कसकर थाम लिया है, क्योंकि अब वह रहस्य के उस द्वार को खोलने जा रहे हैं,
06:31जो काल की सीमा से परे है
06:34गोलोग का निशिद्ध द्वार अब पूरी तरह खुल चुका है, और नारद उस प्रकाश में प्रवेश कर रहे हैं, जहां
06:41रासलीला का शाश्वत सत्य प्रतीक्षा कर रहा है
06:46नारद के चर्णों के नीचे शूने से एक स्वर्णिन सेतु का प्राकट्य होता है, जो अनन्त प्रकाश की लप्टों के
06:53बीच गोलोग की दिशा में आगे बढ़ता है
06:57रिशी नारद इस प्रेमांजली के मार्ग पर कदम रखते हैं, जहां हर पकपर वीना की ध्वनी स्वतह ही राधाकृष्ण के
07:05नाम का गुंजार कर रही है
07:08सेतु के दोनों और समय के प्रवाह को थामे हुए सुख्षम देवता अपनी उपस्थिती से इस पत को और अधिक
07:15तेजस्वी बना रही है
07:19वातावर्ण में प्रेम और भक्ती की सुगंध घुल गई है, जो नारद के मन में छुपे हुए संशय के अंतिन
07:25तंतु को भी मिटा रही है
07:28सेतु का विस्तार अब एक ऐसे लोग की ओर बढ़ रहा है, जहां न तो कोई दिशा है और नहीं
07:35काल का कोई बंधन शेश बचा है
07:39नारद ने अपनी वीना के तार को छेड़ा और उससे निकला नाद पूरे गोलोक के द्वार को कमपायमान कर रहा
07:46है
07:48वीना की गूंच से सेतु के बीचों बीच दिव्य कमल के पुष्प खिलने लगे हैं, जो नारद का स्वागत कर
07:55रही है
07:57प्रकाश की एक किरन नारद के मस्तक पर पड़ती है, जैसे स्वय रासलीला का अधिश्ठाता उन्हें अपना अनुग्रह प्रदान कर
08:05रहा हो
08:06नारद का शरीर अब एक दिव्य जोती में परिवर्तित हो रहा है, क्योंकि वे गोलोग के मुख्य द्वार के अत्यंत
08:14समीप आ चुके हैं
08:16गोलोग का वह निशिद्ध द्वार अब धीरे धीरे अपनी अनंत गहराईयों को खोल रहा है, जिससे राधाकृष्ण के प्रेम की
08:24सुगंध निकल रही है
08:27द्वार के भीतर से सुनाई देती संगीत की मधुर लहरेंग नारत की चेतना को पूरी तरह से रासलीला के सागर
08:34में डुबो रही है
08:37यह वह स्थान है जहां भक्ती का अंत होता है और केवल साक्षात प्रेम का अस्तित्व शेष रह जाता है
08:45नारत के भीतर का रिशित्व अब पूर्नत्व विलीन हो चुका है और वे एक प्रेमी भक्त की भांती द्वार की
08:52ओर बढ़ रहे हैं
08:55द्वार के दोनों ओर खड़े द्वार पाल भी आज अपनी काया छोड़ कर जोती स्वरूप में परिनत हो गए हैं
09:03नारत का एक हाथ अपनी वीना पर और दूसरा हृदय पर है जैसे वे अपने अंतर की धड़कन को ब्रहमांड
09:10की धड़कन से जोड़ रहे हो
09:13पूरे गोलोक में एक दिव्य तरंग दौरती है जो नारत के आगमन की सूचना समस्त गोपगोपियों को दे रही है
09:22अब उनके और अंतिम रहस्य के बीच केवल एक धुन्धली सी रेखा बची है जिसे पार करते ही सत्य का
09:29स्वरूप प्रकट होगा
09:32वीना की तान अचानक चरम पर पहुँचकर शान्थ हो जाती है मानो मौन ही अब परम सत्य का उद्धोश कर
09:39रहा हो
09:40नारद ने जैसे ही द्वार का स्पर्श किया उनके अस्तित्व का कंकन राधाकृष्ण के महामंत्र में परिवर्तित हो गया
09:49अंतिम रहस्य के खुलने के साथ ही गोलोग का प्रकाश नारद के भीतर समा गया और वे रासलीला के शाश्वत
09:56सत्य का अंश बन गये
09:59गोलोग के प्रवेश द्वार पर खड़े दो दिव्य द्वारपाल जिनका वर्ण नीलाब और शरीर ब्रहमांडिय जोती से निर्मित है नारद
10:07के मार्ग में एक विशाल दिवार बनकर खड़े हो गए
10:12द्वारपालों के नेत्रों में समय और स्थान का गहन सन्नाटा था उन्होंने अपनी गूंजती हुरी बाणी में नारद से उनके
10:19अहंकार और भक्ती की परीक्षा देने का आदेश दिया
10:24नारद ने अपनी वीना को वक्ष से सटा कर एक ऐसी धुन छेड़ी जो नश्वर जगत के समस्त बंधनों को
10:31काट कर सीधे इश्वर के हरिदय तक पहुँचने में सक्षम थी
10:35वीना की तरंगे जैसे ही द्वारपालों के ओजस्वी शरीर से टक्राई एक स्वर्णिम प्रकाश चक्र उत्पन्न हुआ जो नारद की
10:43पातरता का प्रमान देने लगा
10:46प्रथम द्वारपाल ने अपना वजर जैसा हाथ उठाया और नारद के सम्मुख दिव्य अगनी का एक सुक्षम घेरा बना दिया
10:54ताकि उनकी आत्मा की शुद्धता परखी जा सके
10:58नारद ने निर्भय होकर उस अगनी के घेरे में प्रवेश किया क्योंकि उनके भीतर राधाकृष्ण का नाम एक अटूट कवच
11:06की भानती विद्यमान था
11:09जैसे ही अगनी नारद के शरीर को स्पर्श करती वह भस्म के स्थान पर पूलों की पंखुडियों और दिव्य सुगंध
11:16में परिवर्तित होकर वायू में विलीन होने लगी
11:20अद्रिश्य शक्तियों द्वारा रचित वह मायावी परीक्षा अब नारद की अविचल श्रधा के समक्ष निश्पल सिध्ध हो रही थी
11:29दूसरे द्वारपाल ने अपनी गंभीर आवाज में कहा कि गोलोक में प्रवेश करने से पहले स्वयन के अस्तित्व का विसर्जन
11:37ही अंतिम अर्ग्य है
11:40नारद ने अपनी वीना को नीचे रखा और हाथ जोड़ कर यह स्विकार किया कि उनका अपना कोई अहंकार शेश
11:48नहीं है वे केवल एक माध्यम मात्र है
11:52उनके इस समर्पन से गोलोक का मुख्यद्वार स्वतही एक तीवर दिव्यध्वनी के साथ धीरे-धीरे खुलने लगा
12:01दर्वाजों के खुलते ही वहां से बहने वाली दिव्यसमीर ने नारद को एक अलोकिक शितलता और शांती से भर दिया
12:09द्वारपालों ने अब अपने दिव्यस्वरूप को शांत करते हुए नारद को साधर भीतर जाने का संकेत दिया
12:17नारद ने जैसे ही भीतर कदम रखा उन्हें लगा मानोवे स्वयन समय की धारा से परे किसी ऐसे लोक में
12:24आ गए हैं जहां केवल प्रेम ही स्पंदित है
12:28उनकी वीना के तार बिना किसी सहारे के ही स्वमेव जंकरित होने लगे जो रासलीला के आगामी मधुर संगीत का
12:36पूर्वाभास दे रहे थे
12:39यहां की भूमी किसी भौतिक धरातल के समान नहीं बलकि सम्वित और आनंद की तरंगों से बनी हुई प्रतीत होती
12:46थी
12:48नारद ने देखा कि हर कण यहां राधा और कृष्ण के मिलन की गाथा स्वया लिख रहा था
12:55उनकी आत्मा में समाया हुआ अंतिम संशय भी इस अलौकिक प्रकाश के संपर्प में आते ही विलीन हो गया
13:03अब नारद के लिए गोलोक केवल एक धाम नहीं बलकि उनके भीतर छिपे उस अंतिम रहस्य का दर्पन बन गया
13:10था जिसे जानने के लिए वे युगों से प्रतीक्षा कर रहे थे
13:15रासलीला का अंतिम रहस्य उनके मन के कोनों में धीरे-धीरे साकार होने लगा जैसे उदे होते सूर्य की प्रथम
13:23किरने किसी कमल को खिलाती है
13:26गोलोग के द्वार पर पहुँचते ही नारद ने देखा कि वहां के प्रहरी सामान्य द्वारपाल नहीं बलकि स्वयंप्रेम और वैराग्य
13:35के जीवित विग्रह थे जो उनके हृदय के अहंकार को चुनोती दे रहे थे
13:41द्वारपालों ने नारद के हाथों से वीना को संकेच से हटाने को कहा जैसे वे उनके लोकभ्रमन के उस अहंकारी
13:48भार को गिराने का निर्देश दे रहे हूं
13:52नारद ने अपनी वीना को चर्णों में रख दिया, मानों उन्होंने अपने उस पूरे अस्तित्व को त्याग दिया हो जो
13:59अब तक ब्रह्मांड की खबरों का समभाहक मात्र बना रहा था
14:03तभी एक दिव्यध्वनी गुंजायमान हुई जिसने उनके अंतर्मन के अंतिन वैचारिक अवरोधों को भी राख की तरह उड़ा दिया
14:12नारद ने अब अपनी आखे बंद कर ली और गोलोग का प्रवेश द्वार उनके चारों और एक अलौकिक नीले प्रकाश
14:20के गोले में परिवर्तित हो गया
14:23द्वार के प्रहरी अब नारद की ओर नहीं देख रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि अब इस देह में
14:30नारद का नारदत्व शेश नहीं रहा
14:33रिशी ने महसूस किया कि उनके रोमरों से वह नाम प्रस्पुटित हो रहा था जिसे वे अभी तक केवल वानी
14:40से जबते थे
14:41यह उनके तपका वहक्षन था जहां वे स्वयं की परिभाशा खोकर गोपी भाव की प्रारंभिक दहलीज पर खड़े हो गए
14:49थे
14:50चारो दिशाओं से उठती दिव्य सुगंध ने उन्हें चेतना के एक ऐसे स्तर पर पहुँचा दिया जहां समय का चक्र
14:58रुप गया था
15:11अब कोई प्रशन शेश नहीं था केवल एक अनन्त शूने था जिसे प्रेम के महासागर ने भर दिया था
15:19गोलोग के द्वार के उस पार से आती बासुरी की ध्वनी अब उनकी हृदय की धड़कन बन चुकी थी
15:26प्रहरियों ने अपना स्थान छोड़ दिया और नारत के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए अद्रिश्य हो गए
15:32मानोवे स्वयन नारत की एकागरता का हिस्सा बन गए हो
15:37नारत ने जैसे ही पहला कदम रखा उन्हें अनुभव हुआ कि वे किसी धाम में नहीं
15:43बलकि अपने ही भीतर के उस परम सत्य में प्रवेश कर रहे हैं
15:49उनके चारों ओर का वातावर्ण अब स्वर्ण से अधिक श्वेत प्रकाश में नहाया हुआ था
15:54जो गोलोक की शुद्धता का प्रतीक था
15:58आमकार की बची-खुची परतें जैसे किसी जरने के नीचे धुल गई हो और नारद अब एक नवीन चेतना के
16:05साथ आगे बढ़ रहे थे
16:08रासलीला का अंतिम रहस्य अब उनके लिए किसी ग्रंथ का श्लोक नहीं बलकि उनका अपना अनुभव बन गया था
16:17नारद ने पीछे मुर कर नहीं देखा क्योंकि जो उन्होंने पाया था वह पीछे छूट चुकी दुनिया के वैभव से
16:24करोडों गुना महान था
16:26एक अंतिम सात्विक कमपन के साथ गोलोक के आंतरिक कपाट नारद के समक्ष पूरी तरह से खुल गये और सारा
16:34ब्रह्मान उस एक पल के लिए मौन हो गया
16:38नारद के जीवन की यह अंतिम यात्रा अब कृष्ण भक्ती के उस शिखर पर पहुँच चुकी थी जहा भक्त और
16:45भगवान के बीच कोई परदाशेश नहीं रहा
16:49गोलोग की दहलीज पर कदम रखते ही नारद ने देखा कि वहां की भूमी कोई साधारन धरातल नहीं बलकि साक्षात
16:57आनंद और प्रकाश का एक अंथीन सागर है
17:01नारद ने विस्मय से अपनी आखे मीची क्योंकि उनके सामने अनंत काल तक नृत्य करती गोपी काए किसी भौतिक शरीर
17:09से नहीं बलकि राधा राने की चित्शक्ती के प्रकाश पुन्जों से निर्मित प्रतीत हो रही थी
17:16प्रत्यक गोपी का रूप शनक्षन बदल रहा था, मानों वे किसी एक ही दिव्यता के अनंत प्रतिबिम्भों जो काल की
17:24सीमाओं को लांध कर सदा जूम रही हो
17:27नारद ने अनुभव किया कि जो गोपी काये उन्हें मनुष्य दिखाई दे रही थी, वे वास्तव में कृष्ण के रास्सुख
17:35को विस्तार देने वाली दिव्यत अरंगे थी
17:39ब्रहमांड की हर दिशा से इन गोपी कायों का एक अद्भुत सामन जस्य गूंज रहा था, जो वेदों के किसी
17:46मंत्र की भाती नारद के हृदय में उतर गया
17:49नारद ने विनमर्ता से अपना मस्तक जुकाया, क्योंकि वे समझ गए थे कि वे स्वय भी उस रासलीला के एक
17:57अद्रिश्य दर्शक के रूप में आमंत्रित किये गए हैं
18:02जैसे जैसे नारद आगे बढ़े, उन्होंने देखा कि गोपी काओ का नरित्य समय के प्रवाह के साथ नहीं, बल्कि कृष्ण
18:09की इच्छा के स्पंदन के साथ ताल मिला रहा था
18:13यह वह स्थान था जहां पूरी तरह विलीन हो जाता था और केवल राधा के अंशी शेश रहते थे
18:22गोलोग के आकाश में नक्षतरों के स्थान पर दिव्य पुष्पों की वर्षा हो रही थी, जो हर पल अपना रंग
18:28बदल कर कृष्ण के प्रती प्रेम का संदेश दे रहे थे
18:33नारद के कानों में वह दिव्य मधुर ध्वनी गूंज रही थी, जिसे सुनकर प्रकृती स्वयन समाधी में लीन हो जाती
18:40है
18:42उन्होंने पाया कि रासलीला का यह अंतिम रहस्य कोई गुप्ट विधी नहीं, बलकि संपूर्ण समर्पन की एक पराकाश था है
18:51अद्रिश्य गोपीकाओ का वह वरिंद नारद के चारों और चक्कर काटने लगा, जिससे उनकी चेतना के सभी पुराने द्वार खुल
18:59गए
19:00पूरे गोलोक में कहीं भी मृत्यू, वृध्धावस्था या शोक का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं था, क्योंकि यहां सब कुछ कृष्ण
19:09की अनंत नित्य लीला का हिस्सा था
19:12नारद की वीना ने अपने आप एक ऐसे राग को छेड़ा, जिसे अब तक केवल गोपी का एही गुनगुनाने में
19:19सक्षम थी
19:21उनका शरीर अब उस दिव्य शक्ती के प्रभाव से एक तेजस्वी ओज से भर गया था, जैसे वे इस लोक
19:28के ही वासी हो
19:30वह द्रिश अद्भुत था, नारद ने देखा कि राधा और कृष्ण के मिलन का बिंदु वास्तव में प्रत्येक गोपी के
19:37हृदय के भीतर ही स्थित है
19:41गोलोक की वह संपूर्ण आभा नारद के रोम रोम में समा गई, जिससे वेकाल और देश के बंधनों से मुक्त
19:48हो गए
19:49ब्रहमांड के सभी वेदों का ज्यान इसक्षन उस अलोकिक अनुभव के सामने अत्यंत गौन और सीमित प्रतीत होने लगा
19:58नारद ने अब जान लिया था कि गोपी के वल्स्त्रिया नहीं, बलकि जीव की वे आत्माएं हैं, जो अनन्त जन्मों
20:06की प्रतीक्षा के बाद कृष्ण में विलीन होती है
20:10गोलोक के उस अन्तिन द्वार के भीतर, नारद ने उस सत्य को पा लिया था जिसे पाने के लिए स्रिष्टी
20:17का हर जीव युगों से भटक रहा है
20:20नारद जैसे ही उस गोलोक के अन्तिन द्वार में प्रवेश करते हैं, चारों और व्याप्त अनन्त अंतरिक्ष और नीले प्रकाश
20:28का विस्तार उनकी द्रिष्टी से ओजल हो गया
20:32महर्शी नारद ने अनुभव किया कि ध्वनी का स्पंदन धीरे-धीरे एक अगाद शांती में परिवर्तित हो रहा है, मानो
20:40समस्त ब्रहमांड अपनी सांसे थामे हुए है
20:44शूनी की इस अनन्त गहराई में नारद के कानों में एक सुक्ष्म गुंजन गुंजने लगी जो कानों के माध्यम से
20:52नहीं बलकि उनकी आत्मा के भीतर से उत्पन हो रही थी
20:57यह अनाहत नाध ही साक्षात श्री क्रिश्न की धड़कन है जो पूरे ब्रहमांड की उर्जा को एक लैबध अनुशासन में
21:05बांधे हुए है
21:07नारद का तन्मन उस दिव्यस्वर के साथ एक रूप हो गया और उन्हें लगा कि वे अपनी भौतिक काया से
21:14उपर उठकर क्रिश्न के अस्तित्व में विलीन हो रहे हैं
21:19दिव्य चेतना की इस उच्च अवस्था में उन्हें वह गूर सत्य स्पष्ट दिखाई दिया जिसे शास्त्रों में केवल शब्दों के
21:27माध्यम से पिरोया गया था
21:29उनका वीना का स्वर अब शान्थ हो चुका था क्योंकि गोलोक की उस मूख गूंच के सामने संसार के सभी
21:36संगीत फीके और अर्थहीन प्रतीत हो रहे थे
21:40हर कण में उन्हें कृष्ण की लीला का प्रतिबिम्द दिख रहा था जो अब तक उन्हें केवल कहानियों के रूप
21:47में ग्यात था
21:49इस मौन की गहराई में उन्हें वह अंतिन सत्य प्राप्थ हुआ की प्रेम ही वह एक मात्र मार्ग है जिससे
21:56जीव अपने मूल स्त्रोत तक पहुँच सकता है
22:00नारद के मुख पर एक अलौकिक मुस्कान थी क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि गोलोक का द्वार किसी भौतिक पत
22:08पर नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धी पर स्थित है
22:13जैसे ही नारद ने अपनी आखें खोली उन्होंने स्वयं को उस दिव्य प्रकाश के केंद्र में पाया जहां समय का
22:20अस्तित्व ही समाप्थ हो गया था
22:23ब्रहमांड के सभी वेदों का ज्यान इस क्षण उस अलोकिक अनुभव के सामने अत्यंत गौन और सीमित प्रतीत होने लगा
22:32मौन के उस महासागर में नारद अब न तो कोई मुनी थे और नहीं कोई यात्री वे केवल एक भक्ती
22:39का स्पंदन बनकर रह गये थे
22:42स्रिष्टी के निर्मान की हर ध्वनी उसी अनाहत नाद की प्रतिध्वनी थी जिसे अब नारद अपनी अंतरात्मा से अनुभव कर
22:50पा रहे थे
22:52उन्हें ग्यात हुआ कि राधा और कृष्ण के मिलन का अर्थ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बलकि प्रेम और प्रेमी
22:59के बीच के अंतर का मिट जाना है
23:03गोलोक की वह शान्ती अब नारद के रोमरोम में बस गई थी, और वे जानते थे कि अब उन्हें वापस
23:10जाने की कोई आवश्चक्ता नहीं है
23:14रासलीला का अंतिम रहस्य उनके सामने उदघाटित हो चुका था, जो शब्दों से परे एक अनुभूती थी
23:22नारद ने अनुभव किया कि वे स्वयं ही उस लीला का हिस्सा बन गए हैं, जिसे देखने के लिए वे
23:28युगों से तरस रहे थे
23:31वह दिव्यमौन अब किसी उपदेश की तरह गूंज रहा था, जो नारद की चेतना को पूरी तरह से रुपांतरित कर
23:38चुका था
23:40गोलोग के निशिद्ध द्वार के उस पार नारद ने वह पालिया था जो पाने के लिए स्रिष्टी के हरकन का
23:46अस्तित्व अनंतकाल से प्रतीक्षा कर रहा है
23:51गोलोग के उस परमधाम में सहसरों सूरियों की दीप्ती एक साथ विलीन हो रही थी, जिससे समस्त दिशाएं एक दिव्यस्वर्ण
23:59आभा से भर गई
24:01नारद मुनी ने देखा कि उनके सम्मुख खड़ा वो प्रकाशपुँझ धीरे-धीरे साकार होने लगा, जहां एक ही चेतना दो
24:09दिव्यरूपों में विभाजत हो रही थी
24:13एक ओर कृष्ण की सामवली मोहक छवी थी, तो दूसरी ओर राधा का गौर वर्ण, जो प्रेम के अनन्य संगम
24:20का साक्षात प्रतीक लग रहे थे
24:23ब्रह्मांड का सारा रहस्य उस एक क्षण में सिमट आया था, जहां द्वैत और अद्वैत की सीमाएं प्रेम के महासागर
24:31में पूरी तरह मिट गई थी
24:34गोलोग की वह पावन भूमि स्वय में धड़कने महसूस कर रही थी, क्योंकि स्रिष्टी के रच्चिता और उनकी शक्ती अब
24:41अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित थे
24:45नारद के हाथों से वीना स्वत बस उठी, जिसके स्वरों ने उस दिव्य युगल की स्थुती में एक अनंतराग छेड़
24:52दिया था
24:54राधाकृष्ण के उस एकाकार रूप से निकलती हुई दिव्य किर्णे नारद के मस्तक को स्पर्श कर रही थी, जिससे उनके
25:01भीतर का सारा अज्यान भस्म हो गया
25:05यह वह क्षण था जहां समय की गती थम गई और गोलोग की परिधी में केवल प्रेन की शाश्वत गूंज
25:12ही शेश रह गई थी
25:14चारो और व्याप्ट दिव्य सुगंध और मंद मंद पवन का जोंका यह कह रहा था कि सत्य केवल प्रेन के
25:21अनुभूत स्वरूप में ही नहित है
25:24नारत को अब यह स्पष्ट अनुभव हो रहा था कि जिसे वे कृष्ण मान रहे थे वह स्वया राधा का
25:31ही हृदय और स्पंदन है
25:34राधा के प्रत्येक्श्वास से स्रिष्टी के नए नक्षत्रों का जन्म हो रहा था जो गोलुक की उस महाशक्ती की विशालता
25:42को प्रकट कर रहे थे
25:44द्रिष्टी की भव्यता इतनी अधिक थी कि आकाश में उपस्थित देवता भी अपने विमानों से नीचे जुक कर उस महामिलन
25:52को निहार रहे थे
25:54पूरी स्रिष्टी का भार जैसे अब इन दो दिव्य आकरितियों के चर्णों में आकर समर्पित हो गया था जहां शान्ती
26:01ही एक मात्र सत्य था
26:04नारद ने अब समझ लिया था कि गोलोक का द्वार केवल भक्ती और समर्पन के माध्यम से ही पार किया
26:11जा सकता है
26:13वह द्वार जो अभी तक निशिद्ध था अब प्रेम की पवित्रता से पूरी तरह प्रकाशित होकर एक नए युक के
26:20उदे का मार्ग खोल चुका था
26:23हवाओं में घुली प्रेम की सुगंध ने नारत की इंद्रियों को इस प्रकार वश्मे कर लिया था कि वे स्वयन
26:30को ही भूल चुके थे
26:33राधाकृष्ण के नयन एक साथ नारत की ओर जुके जैसे वे उनकी यात्रा के इस अंतिम पड़ाव पर उन्हें आशिर्वाद
26:40दे रहे हो
26:42उस द्रिष्टिपात मात्र से नारत के भीतर का समस्त ग्वैत भाव समाप्थ हो गया और उन्होंने अखंड अध्वैत का स्वाद
26:50चक लिया
26:52गोलोक अब केवल एक स्थान नहीं अपितु नारत की चेतना का ही विस्तार बन चुका था जो अनंत का अनुभव
26:59कर रहा था
27:01अन्तिम रहस्य उद्घाटित हो चुका था, क्रिष्ण ही राधा है और राधा ही क्रिष्ण और इस प्रेम में ही संपूर्ण
27:09स्रिष्टी का आधार सुरक्षित है
27:12गोलोक के उस परमशून्य में जहां से समय का प्रवाह भी थम जाता है एक अनादी स्वर गूम्ज उठा जो
27:19स्वय नारायन का दिव्यस पंदन था
27:22नारद ने अपना मस्तप जुकाया अनुभव करते हुए कि यह ध्वनी उनके रोमरोम में समाकर महारास के उस गूड अर्थ
27:30को अनकित कर रही है जिसे केवल अनुभूत किया जा सकता है
27:36अद्रिश्यवानी ने नारद को आदेश दिया कि वे इस स्रिष्टी के मूल आधार अर्थात महारास के उस अखंड नृत्ती की
27:44रक्षा करने वाले पहले दिव्य प्रहरी बने
27:47उस अद्भूत क्षण में गोलोक का वातावर्ण प्रेम और स्रिष्टी के निर्माण के स्पंदनों से भर गया जैसे स्वयन ब्रहमांड
27:55एक लए में थिरक रहा हो
27:58नारद का हृदय उस दिव्य जिम्मेदारी के भार से भर गया जिसे धारन करना किसी साधारन देवता के वश की
28:05बात नहीं थी
28:07नारायन की वह वानी पुनह गूंजी जिसने नारद को बताया कि यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं बलकि संपूर्ण ब्रहमांड की
28:16धड़कन है
28:18नारद ने अपनी वीना के तारों को छेडा जिससे निकली स्वरलहरी ने महारास के उस गुप्ट स्वरूप को द्रिशमान करने
28:26की चेश्टा की
28:28गोलोक की वह पावन वेदी अब एक जीवन्त दरपन बन चुकी थी जहां राधा और कृष्ण के उस अग्वैत प्रेम
28:35का प्रतिविम्भर कन में समाया हुआ था
28:39पूरे ब्रहमांड का संतुलन उसी प्रेमनृत्य पर टिका था और नारद अब उस रहस्य के एक मात्र वाहक थे जो
28:46समय की सीमाओं से परे था
28:50आकाश से उतरती हुई उस दिव्य ज्योती ने नारद के शरीर को एक अभेद्य सुरक्षा कवच से घेर लिया ताकि
28:57वे इस ज्यान को सुरक्षित रख सकें
29:00नारद ने अनुभव किया कि सृष्टी का प्रतेक परमानृ राधाकृष्ण की उसी लैका अनुसर्ण कर रहा है जो अब उनके
29:08कानों में स्पष्ट थी
29:11गोलोग के द्वार पर स्थित वह दिव्य उर्जा ने एक सुक्ष्म आकरिती का रूप ले लिया जो नारद को आगे
29:18के पत के लिए मार्ग दर्शन कर रही थी
29:21नारद ने जाना की यदिवे यह नृत्य नहीं देखेंगे तो स्रिष्टी अपनी धुरी खो देगी और इसी लिए उनका साक्षी
29:29होना अनिवार्य था
29:31नारायन की क्रिपा से नारद की चेतना उस महारास के परम अनुभव में डूब गई जहां द्वैत की कोई सत्ता
29:38शेश न बची
29:41प्रत्येक द्रिश्य जो अब नारद देख रहे थे वह स्वयं कालचक्र की उत्पत्ती का प्रमार था जो राधा के मौन
29:48और कृष्ण के नृत्य से उपजा था
29:52गोलोग का यह अंतिम रहस्य अब नारद के भीतर का एक अभिन्न अंग बन चुका था एक ऐसी जोती जो
29:59कभी बुछ नहीं सकती थी
30:01नारद ने अनुभव किया कि कैसे ब्रहमांड के सभी ग्रह और नक्षत्र इस प्रेम की ताल पर अपनी कक्षा में
30:09गतिमान है
30:11उस दिव्य अनुकमपा के साथ नारद ने अब स्रिष्टी के कल्यान हेतु इस गुप्ट विद्या के रक्षक के रूप में
30:18शपत ली
30:20गोलोग के गलियारे पुनह प्रकाश से भर उठे जैसे स्वयन समय ने नारद के उस संकल्प को स्वीकार कर लिया
30:27हो
30:29नारद अब केवल एक रिशी नहीं अपितु उस महार हस्य के जीवित स्तंभ थे जो स्रिष्टी के अंत तक राधाक्रिष्ण
30:36के प्रेन की रक्षा के लिए संकल्पित थे
30:40गोलोग की दिव्य आभा के नीचे नारद के पग अब भारी होने लगे थे जैसे स्वयन प्रिथवी का गुरुत्वाकर्षन उन्हें
30:48अपनी ओर खीच रहा हो
30:50आकाश के विस्तार में तैरते हुए नारद के सम्मुख साक्षात भगवान विश्णु प्रकट हुए जिनके मुख पर एक सौमय और
30:59रहस्य में मुस्कान थी
31:01नारायन ने अपने कर कमलों से नारद के मस्तक को स्पर्ष किया जिससे उस गोलोक के ज्यान का बीज नारद
31:08की चेतना में और गहराई से समा गया
31:12अंधकार और प्रकाश के मिलन बिंदु पर एक अद्भुत दिव्यतारा मंडल साक्ष्य बन रहा था जो नारद की इस अंतिम
31:20यात्रा का गवाह था
31:22नारद का शरीर धीरे धीरे उस लोक से नीचे की ओर उतरने लगा जैसे कोई दिव्य प्रकाश पुन्ष सागर के
31:29तलकी ओर प्रस्थान कर रहा हो
31:33रास्ते में उन्हें महर्शी कश्यप और अन्यरिशी गण मिले जो नारद के चहरे पर अनकित उस अलोकिक दिव्य तेज को
31:40देखकर स्तमभित रह गए
31:43नारद ने मौन रहकर केवल अपनी वीना के उन स्वरों को बजाया जो अब गोलोक के रासलीला का मधूर प्रतिध्वनी
31:50सुना रहे थे
31:52उस वीना की मधूर ध्वनी से नीचे की समस्थ दिव्य लोक की वायुमंडल में प्रेम और भक्ती का संचार होने
31:59लगा जैसे फूल स्वयन खिलने लगे हो
32:03नीचे की ओर गिरते हुए नारद ने उस लोक की जटिलता को देखा जहां माया का जाल अब भी अज्ञानी
32:10जीवों को भटकाने के लिए तयार था
32:14रिशी नारद ने संकल्प लिया कि वे अपनी वीना की प्रत्येक तान से इस माया के जाल को छिन्न भिन्न
32:21कर देंगे और सत्य का मार्ग दिखाएंगे
32:24जैसे ही उन्होंने माया के सीमांत को पार किया एक तीख्ष्न दिव्य गर्जना हुई और नारद का तेज और भी
32:32तीवरहो उठा
32:34ब्रहमांड के रक्षकों ने इस दिव्य रिशी के प्रती नत्मस्तक होकर उन्हें मार्ग प्रदान किया, जैसे सूर्य के उदे होने
32:42पर तारे अपना मार्ग छोड़ देते हैं
32:45प्रित्वी की सीमा समीप थी और नारद के हिदय में गोलोक का प्रेम अब एक अथा सागर की तरह हिलोरे
32:52ले रहा था
32:54देवी सरस्वती ने भी सूक्ष्म रूप में नारद के वीना के स्वरों को आशिरवाद दिया ताकि उनका हर शब्द वेदों
33:02का सार बन सके
33:04नारद ने अब धर्ती के धरातल पर अपने चरण रखे जहां की धूल भी गोलोक के चरणों के स्पर्ष से
33:11पवित्र होने के लिए लालायत थी
33:14यह संसार जो कभी उन्हें साधारन लगा था अब उन्हें कणकण में कृष्ण की लीलाओं का प्रतिविंद दिखाई दे रहा
33:22था
33:23नारद ने अपनी आखे बंद की और गोलोक के उस अंतिम रहस्य को स्मरण किया जो अब उनकी वाणी में
33:31अमरित बनकर बहने वाला था
33:34स्रिष्टी का इतिहास अब बदलने वाला था क्योंकि पहली बार कोई रिशी गोलोक के द्वार खोल कर उसका सार जन्वरी
33:41से जन्वरी तक ले आया था
33:44रिशी नारद ने चलते हुए पीछे मुड़ कर देखा जहां गोलोक का प्रकाश अब एक सुक्ष्म बिंदी के समान उनकी
33:52स्मृती का केंदर बन गया था
33:54अब वे एक साधारन रिशी नहीं अपितु भक्ती के उस सर्वोच सत्य के संरक्षक थे जो स्रिष्टी के अंत तक
34:02जीवित रहने वाला था