पद्म पुराण के पाताल खण्ड के इस रोमांचक अध्याय में देखिए माता सीता के वनवास के बाद महर्षि वाल्मीकि के तपोवन में लव और कुश का अलौकिक जन्म! वहीं दूसरी ओर अयोध्या में शोक में डूबे श्रीराम के सम्मुख ऋषि च्यवन लेकर आते हैं लवणासुर के महाविनाश का खौफनाक समाचार। क्या शत्रुघ्न कर पाएंगे शिव के त्रिशूलधारी इस भयानक दैत्य का संहार? जानिए इस महागाथा में! #PadmaPurana #LuvKush #Shatrughna #Lavanasura #RamayanSecrets #HinduMythology
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00:00तमसा नदी के शांत तट पर माता सीता ने एक अंतिम बार अयोध्या की दिशा में प्रणाम किया और वन
00:07की गहरी शांती में प्रवेश किया।
00:10भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा में भी धर्ती पर घटित इस्त्याग की करुणा को अनुभव कर रहे थे और उनकी
00:17मंद मुस्कान में भविश्य का दिव्य संकेट छिपा था।
00:22महर्शी वालमीकी ने अपनी दिव्य द्रिश्टी से सीता के आगमन को देख लिया था और वे आश्रम की सीमा पर
00:29उनकी अगवानी के लिए उपस्थित हुए।
00:32आश्रम की कुटी में प्रवेश करते ही प्रकृती ने भी जैसे एक नई करवटली और खक्कुल के कलरव से वातावन
00:40गुजायमान हो उठा।
00:42तपोवन की तपस्विनी माताओं ने सीता को एक पुत्री के समान गले लगाया जिससे उनके हृदय का संताप क्षन भर
00:50के लिए शान्थ हो गया।
00:52गरुर के पंखों की फड़फडाहट से आकाश में कमपन हुआ, मानोस्वय गगन का अधिपती सीता के आगमन पर उनका अभिनंदन
01:01कर रहा हो।
01:03वालमीकी ने सीता के गर्भ में पल रहे, उन महातेजस्वी बालकों की आभा को अनुभव किया, जो साक्षात दिव्यशक्तियों का
01:11पुंच थे।
01:13आश्रम के चारों और दिव्यशक्तियों का एक सुरक्षा घेरा बनाने के लिए महर्शी ने वेदी का निर्मान किया और मंत्रों
01:20चार आरंब किये।
01:22यग्य की वेदी से उठने वाली सुगंधित धूमरे खाए वन की समस्त नकारात्मक उर्जाओं को दूर कर रही थी।
01:31महादेव शिव ने कैलाश की उँचाईयों से अपनी तीसरी आख खोली और उन बालकों की रक्षा का संकल्प लिया जो
01:38भविश्य के महानायक थे।
01:52जैसे कुटी के चारों और एक अभेद्य सुरक्षा कवच निर्मित कर दिया था।
01:58प्रकृती के कणकण ने सीता के इस तपस्वी जीवन को स्विकार कर लिया और वन ने उन्हें अपनी गोद में
02:05पनाह दी।
02:06देवराज इंद्र ने भी अपनी सभा में वालमिकी के इस अध्भुत तपोवन की प्रशंसा की जहा साक्षात लक्षमी का वास्था।
02:16सीता के कोमल हाथों ने आश्रम के पौधों को जल सीचा, जैसे वे स्वय अपनी ममता को उनमें प्रवाहित कर
02:23रही हो।
02:25आश्रम की पावन वेदी पर अगनी अब भी प्रजवलित थी, जो आने वाले समय के परिवर्तनों का मूख साक्षी बनी
02:33हुई थी।
02:34अद्रिश्य शक्तियों के पहरे में वालमिकी ने सीता को वेदों और रामायन के उन छंदों का उपदेश देना आरंभ किया
02:42जो काल जई थे।
02:44अयोध्या की सीमाओ पर अब एक अंजाना सन्नाटा पसर गया था, जहां प्रभु श्री राम अपनी प्रजा के बीच भी
02:51अकेले महसूस कर रहे थे।
02:54महर्शी वालमिकी ने अंतिम आहुती दी और आश्रम का सुरक्षा घेरा पूर्णतह सक्रिय हो उठा, जो किसी भी बाहरी संकट
03:03को रोकने में सक्षम था।
03:05तपोवन के इस शांट और दिव्यवातावर्ण में भविष्य के दो महान वीरों के आगमन की तैयारी पूर्ण हो चुकी थी।
03:14तपोवन के आकाश में नक्षत्रों का विन्यास अचानक बदल गया और एक अलौकिक दिव्य आभा आश्रम के कुटीर को धकने
03:22लगी।
03:23बैकुंठ लोक में भगवान विष्णू ने मंद मुस्कान के साथ शेशनाग की सया पर अपनी आखें खोली, जैसे वे इस
03:32पवित्र घडी की प्रतीक्षा कर रहे थे।
03:35महर्शी वालमीकी ने अपने ध्यान में दो तेजस्वी उर्जाओं को उतरते देखा और वे स्तुती मंत्रों का उच्चार करने लगे।
03:44आश्रम की पवित्र वेदी पर रखी कुश्की घास से दिव्यकिरने फूटने लगी, जो ब्रहमांडिय संतुलन के संकेत थे।
03:52माता सीता के मुखमंडल पर एक अध्वितिय तेज प्रकट हुआ और प्रसव पीडा के बीच भी उनके हृदय में नारायन
04:01का ध्यान प्रबल था।
04:02महादेव ने कैलाश शिखर से अपनी तीसरी आख खोली और उस दिव्य घटना को देखते हुए त्रिशूल को प्रणाम मुद्रा
04:11में स्थिर किया।
04:12आश्रम में दो ननहे शिशूओं की रुदन की पहली ध्वनी गुंजी जैसे साक्षात वेद मंत्रों का नाद गुंध उठा हो।
04:21वातावर्ण में एक दैविय सुगंध फैल गई और प्रकृती के सभी तत्व इन दो बालकों के आगमन पर हर्षित हो
04:28उठे।
04:30महर्शी वालमीकी ने सात्विक भाव से उन शिशूओं को अपनी गोद में लिया और उनके माथे पर चंदन का तिलक
04:37लगाया।
04:39स्वर्ग के देवता विमानों में सवार होकर पुष्प वर्षा करने लगे और गंधर्वों ने मंगल गान शुरू किया।
04:47महर्शी वालमीकी ने कुशा की घास के अगरभाग से प्रथम बालक को छुआ और उन्हें कुश नाम से संबोधित किया।
04:56दूसरे बालक के लिए उन्होंने लव के उपरी हिस्से का प्रयोग किया और उन्हें लव नाम का आशिरवात दिया।
05:03सीता की आखों से हर्ष के आशु छलक पड़े और उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को हृदय से लगा लिया।
05:12कैलाश के स्वामी ने अपनी त्रिशूल को भूमी पर रखा और एक विजी उद्गोश किया जो त्रिलोकी में गुंद उठा।
05:20अयोध्या के आकाश में एक क्षण के लिए बिजली कड़की जैसे किसी आने वाले संधर्ष की चेताबनी दे रही हो।
05:29इंद्रदेव ने भी अपने एरावत पर सवार होकर इस दिव्य प्राकटे को नमन किया और सुरक्षा का संकल्प लिया।
05:37महर्शी वालमीकी ने आश्रम की सीमा पर अद्रिश्य रक्षा चक्र को और भी अधिक शक्तिशाली बना दिया।
05:45आश्रम के पशुपक्षी भी इस चान्तिपूर्ण वातावर्ण में मानो किसी महान भविश्य के साक्षी बन गए थे।
05:53अयोध्या की सीमाओं पर पहरा दे रहे सैनिकों को एक अज्यात भय ने घेर लिया, मानो नेती का चक्र फिर
06:00से घूमने लगा हो।
06:02तपोवन के इस गर्भ में लव और कुश के साथ अब भविश्य के रामराज्य का नया अध्याय प्रारंभ हो चुका
06:09था।
06:10अयोध्या के राजमहल में अब उच्सव की जगह एक गहरी और भयावा शान्ती का सामराज्य है, जहां श्रीराम की उपस्थिती
06:19किसी जीवंत प्रतिमा के समान जड़ हो गई है।
06:23भगवान विश्णो बैकुंट के अपने दिव्य सिनहासन पर विराजमान है, उनकी नीली आभा मंद पड़ गई है और उनकी दृष्टी
06:32प्रिथवी पर हो रहे इस महामौन की ओर्टिकी है।
06:36श्रीराम ने अपनी विलासिता को पूरी तरह त्याग दिया है और अब वे शयनकक्ष में स्वर्ण पर्यंक के स्थान पर
06:44केवल कुष के एक साधारन आसन पर शयन करते हैं।
06:48महल की दिवारे भी मानो उस रिक्तता को महसूस कर रही हैं। जहां कभी सीता की पायल की जंकार गूंजती
06:56थी, वहां अब केवल गहन सननाटा पसरा है।
07:00लक्षमन, भरत और शत्रुगन महल के गलियारे में खड़े होकर अपने जेश्ट भ्राता की इस अवस्था को देख रहे हैं।
07:08किन्तु उनकी वानी में अब बोलने का साहस शेश नहीं है।
07:13देवर्शी नारद वीना का स्वर छेड़ते हुए उपर से सब देख रहे हैं, उनके मुख पर भी इस महान मर्यादा
07:20पुरुशोत्तम की कठिन परीक्षा को देख चिन्ता की रेखाएं हैं।
07:26राजकाज का संचालन अब श्री राम के लिए एक ऐसे तब की तरह है, जिसे वे पूरी निष्ठा और शुश्कता
07:33के साथ निर्वहन कर रहे हैं।
07:37महल का हर कोना उस अभाव की गवाही दे रहा है, जिसे राम ने स्वयं के भीतर और बाहर स्थापित
07:43कर लिया है, मानो समय थम गया हो।
07:47प्रजा में अभी भी उस घटना का दूख खव्याप्थ है, लेकिन अयोध्या की सीमाओ पर अब एक अंजाना संकट अपनी
07:55छाया फैलाने लगा है।
07:57भरत अपने कक्ष में श्रीराम की खडाओं के समक्ष नत्मस्तक हैं, वे जानते हैं कि अयोध्या का यह सिनहासन अब
08:05मात्र एक उत्तरदायत्व का बोज बन चुका है।
08:10शिव के लोग से भी महादेव इस तपस्या को देख रहे हैं और उनकी तीसरी आख के निकट एक सुक्ष्म
08:17कमपन हो रहा है जो भावी परिवर्तन का संकेत है।
08:22अंधेरा जैसे जैसे गहरा होता है, वैसे वैसे राजमहल की भव्यता एक दरावने सन्नाटे में बदलती जा रही है, जो
08:30किसी अनिष्ट की सूचना दे रहा है।
08:34लक्ष्मन के भीतर का आक्रोश अब शान्थ हो चुका है और उसकी जगह एक गहरी उदासींता ने ले ली है,
08:41जो उसे भीतर ही भीतर जला रही है।
08:45स्वर्ण की सीता प्रतिमा के समीक बैठ कर श्री राम अपने मन को ब्रहमांड की शून्यता में विलीन करने का
08:52प्रयत्न कर रहे हैं।
08:55आकाश में नक्षत्र भी मानो अपना स्थान छोड़ रहे हैं और नेती का चक्र एक ऐसे मोर पर आ गया
09:02है जहां से लोटना अब असंभव है।
09:06शत्रुग्न राजकोश की देख भाल करते हुए भी उस निर्जीव धन को देख रहे हैं जो अब राज्य के किसी
09:13कार्य में सुख नहीं ला पा रहा है।
09:16अयोध्या की सीमाओं पर पहरा दे रहे सैनिक अब उस अज्यात भाय को अनुभव कर रहे हैं जो उनके शस्त्रों
09:23को भी भारी बना रहा है।
09:26राम के चहरे पर अब कोई राज्सी तेज नहीं बलकि एक योगी की कठिन कांती है जो सांसारिक मोह को
09:34पूरी तरह त्याग चुकी है।
09:37बैकुंट से एक दिव्य संदेश की गूँच सुनाई दे रही है जो संकेट दे रही है कि अयोध्या का यह
09:44मौन जल्द ही एक महायुध के शंकनाद में बदलेगा।
09:49इस तपोमय मौन के अंत में अब वह बीज अंकुरित होने को है जो भविश्य के रामराज्य की नीव बनेगा
09:56और अन्याय का विनाश करेगा।
09:59अयोध्या की शांत सभा में अचानक भयंकर, आंधी उठी और महर्शी चवन अपने शिशों के साथ राजदर्बार में उपस्थित हुए,
10:08जिनके चहरे पर तपोवन की राख और भयंकर अनर्थ के चिन्ह अंकित थे।
10:14प्रभु श्री राम के सिन्हासन के सम्मुख खड़े होकर, महर्शी चवन ने अपनी कापती हुई वाणी में कहा कि यमुना
10:21तट के आश्रमों पर एक ऐसा दानव प्रलय बनकर तूटा है, जिसके सामने देवता भी असहाय हैं।
10:29महर्शी ने बताया कि मधु राक्षस का पुत्र लवनासुर अपने उस अभेद्यत रिशूल की शक्ती से रिशियों का मास भक्षन
10:36कर रहा है, जिसे स्वयम महादेव ने प्रसन्न होकर वर्दान स्वरूप प्रदान किया था।
10:43राजदर्बार की भव्यच्छत के उपर आकाश का रंग अचानक रक्त की भांती गहरा लाल हो गया। मानो अयोध्या की मर्यादा
10:51अब एक कठिन अगनिप्रीक्षा में प्रवेश करने जा रही है।
10:56दूर कैलाश परवत के शिखर पर ध्यानमगन भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख को हलका सा खोला, जिससे ब्रहमांड में
11:04एक ऐसी उर्जा का संचार हुआ जिसने लवनासुर की उस विनाशकारी शक्तियों को प्रतिध्वनित कर दिया।
11:11भगवान विश्णु ने अपनी क्शीर सागर की शया पर एक गहरा श्वास लिया और उनकी मुस्कान में उस आने वाले
11:19महायुद्ध का सपष्ट संकेट समाहित था जो अयोध्या की नीम को हिला देगा।
11:25लवनासुर अपने दुर्ग में खड़ा होकर अट्थास कर रहा था और उसका विशाल, विकृत और मांसल शरीर उस अभेद्यत रिशूल
11:33के प्रभाव से और भी भयावः प्रतीत हो रहा था।
11:37अयोध्या की सीमाओं पर दानविय छायाएं रेंगने लगी हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि लवनासुर का आतंक अब नगर
11:45की पवित्र दीवारों को भी अपनी चपेट में लेने को आतुर है।
11:51महर्शी चवन की आखों से टपकते हुए आसु अयोध्या के स्वन फर्ष पर गिरकर उस संकट की गंभीरता को रेखांकित
11:59कर रहे थे, जिसे टाला जाना अब असंभव प्रतीत होता था।
12:04देवराज इंद्र के दूतों ने अयोध्या के प्रांगण में प्रवेश किया। उनके हाथों में वे दिव्य संकेत थे जो लवनासुर
12:12के विनाश का एक मात्र गुप्ट मार्ग बताने आये थे।
12:16लवासुर के दुर्ग में उस त्रिशूल से निकलती हुई कातिलाना किर्ने आसपास के वातावर्ण को जुलसा रही थी, जहां कैदियों
12:24की चीखें वातावर्ण में एक भयानक संगीत पैदा कर रही थी।
12:29अंधकार का विस्तार बढ़ता जा रहा था, और ऐसा लग रहा था मानों अयोध्या के चारों और एक अद्रिश्य जाल
12:37बिछाया जा रहा है, जो धर्म के रक्षकों को उलजाने का प्रयास कर रहा है।
12:43महर्शी चवन ने अपने मस्तत पर लगे तिलक को रगड़ते हुए अंतरध्यान होकर प्रभु श्री राम को उस दानव की
12:50उत्पत्ती के उस गहरे सक्य से अवगत कराया जिसे सुनकर अयोध्या के योध्धा भी कांप उठे।
12:57अयोध्या के सैनिक अपनी तलवारों की म्यान को कस रहे थे और नगर के निवासियों में एक अंजाना भय व्याप्थ
13:05हो गया था, मानो हवा में ही रक्त और युद्ध की गंध घुल गई हो।
13:10आकाश के तारों की स्थिती बदल रही थी और एक महासंयोग बन रहा था जहां लवनासुर की शक्ती का क्षय
13:17होने का काल अब निकट आ रहा था।
13:21भगवान शिव के कैलाश के बरफीले शिखर पर एक त्रिशूल का प्रतिध्वनित नाध हुआ, जिसने उस दानव के त्रिशूल की
13:28शक्ती को क्षन भर के लिए शिथिल कर दिया।
13:32अयोध्या के प्रासाद में अब सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा किसी तूफान के आने से पहले की उस शान्ती की
13:39तरह था, जहां हर प्रान युद्ध की प्रतीक्षा कर रहा था।
13:43दूर तपोवन की कुटिया में लवनासुर के दूतों ने अपनी काली चायाओं से पवित्र यग्य की अगनी को बुझा दिया,
13:52जो उस अधर्म के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट प्रतीक था।
13:56ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी ने कमल पर विराज मान होकर उस भविष्य की लिपी को पढ़ लिया, जिसमें लवनासुर के
14:04अंत और एक नए धर्म युद्ध की गाथा पहले ही लिखी जा चुकी थी।
14:09अयोध्या अब युद्ध के शंखनाद के लिए तयार थी, क्योंकि लवनासुर का वह अभेद्यत रिशूल भी अब काल की गती
14:17के सामने अपना तेज़ खोने लगा था।
14:20महर्शी चवन ने अयोध्या की राजसभा में गंभीर मुद्रा में खड़े होकर लवनासुर की अजे शक्ती का रहस्य सभी के
14:28समक्ष उजागर किया।
14:31भगवान श्री राम ने अपनी शांत किन्तु तेजस्वी द्रिश्टी से चवन रिशी को देखा, जो शिव के उस रहस्य में
14:38त्रिशूल की महिमा का वर्णन कर रहे थे।
14:42चवन मुनी ने स्पष्ट किया कि जब तक वह त्रिशूल लवनासुर के हाथ में है, तब तक कोई भी अस्त्र
14:48उसे स्पर्श करने में असमर्थ है।
14:52सभाकक्ष की दीवारों पर जलती हुई मशालों की लौ अचानक काम उठी, जैसे स्वय वायुदेव ने उस विनाशकारी त्रिशूल के
15:01अभिशाप को महसूस कर लिया हो।
15:04भरत ने आगे बढ़कर अपनी विनमर्ता के साथ इस कठिन युद्ध के संचालन का प्रस्ताव रखा, किन्तु उनकी आखों में
15:12एक योधा का आत्म विश्वास पश्ट था।
15:16तभी शत्रुग्न अपनी गदा थामे हुए तेजी से आगे आए, उनके मुख पर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के
15:22प्रती द्रिढ निश्चय चमक रहा था।
15:25शत्रुग्न ने श्री राम के सम्मुख नत्मस्तक होकर याचना की की उन्हें अपनी वीरता सिध्ध करने का यह अंतिम अफसर
15:33प्रदान किया जाएं।
15:36राज सभा में सन्नाटा चा गया, मानो संपून अयोध्या का भविष्य उसी क्षण की गंभीरता में ठहर गया हो।
15:44श्री राम ने मंद मुस्कान के साथ अपने अनुज शत्रुग्न के शौर्य को स्विकार किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी
15:52वीरों में एक नई उर्जा का संचार हुआ।
15:56भगवान विष्यु का दिव्य अन्ष शत्रुग्न के भीतर उस समय जागरित हुआ, जैसे महाकाल स्वय धर्म युद्ध की कमान संभालने
16:04का आदेश दे रहे हुँ।
16:06शत्रुग्न ने अपनी प्रतिग्याली की वह लवनासुर के शिकार पर जाने की प्रतीक्षा करेंगे और उस खाली समय का लाब
16:14उठाएंगे।
16:16अयोध्या की आभा उसक्षन और अधिक प्रदीक्थो उठी, मानो स्वय देवलोक इस प्रतिग्या के साक्षी बनने हे तु नीचे उतर
16:25आया हो।
16:26रिशी चवन ने शत्रुगन को आशिरवाद देते हुए कहा कि केवल बुद्धी और धैर्य ही उस अभेद्यत रिशूल के काल
16:34का कारण बनेंगे।
16:37शत्रुगन के मन में यमुना घाटी के उस भयावध ग्रिशी की कलपना चल रही थी, जिसे वे शीघ्र ही अधर्म
16:43से मुक्त करने वाले थे।
16:45उनकी गदा से निकलने वाली चिंदारिया मानो युद्ध की तैयारी का पहला संकेट दे रही थी, जो लवनासुर के अंत
16:54का आहवान था।
16:56अयोध्या के आकाश में बादलों का रंग बदल कर गहरा केस्रिया हो गया, जो किसी बड़े परिवर्तन की आहट दे
17:03रहा था।
17:04शत्रोगन ने राजदर्बार से बाहर निकलते हुए अपनी धनुष की प्रत्यंचा को चड़ाया, जिसकी गूंजने तपोवन तक के राक्षसों में
17:13हलचल मचा दी।
17:15राम के अनुजों की एकता का यह द्रिश्य वास्तव में ब्रहमांड के संतुलन को पुन स्थापित करने वाला महासन योग
17:23था।
17:24शत्रुघन का रत तयार था, जिसके घोडे भी धर्मयुद्ध की गंध पाकर हिनहिना रहे थे, जैसे वे भी विजय की
17:32प्रतीक्षा में हो।
17:34एक नए सूर्योदय के साथ, शत्रुघन का प्रस्थान अयोध्या की सीमाओं से परे उस धर्मयुद्ध का आरंभ बन गया, जिसका
17:42अंत युगों तक याद रखा जाएगा।
17:45अयोध्या की सीमापार करते ही शत्रुघन का रत मधुपुरी के भयावह और दुर्गम पथों की ओर तेजी से अग्रसर हो
17:53उठा, जहां का वातावर्ण तामसी उर्जाओं से परिपूर्ण था।
17:58वैकुंठ लोग के परमशान्त वातावर्ण में भगवान विश्नु अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरूर को संकेत देते हैं कि धर्म
18:06की रक्षा का एक नया अध्याय प्रारंभ हो चुका है।
18:11रत की गती को रोक कर शत्रुगन ने उस दिव्य अस्त्र का आहवान किया, जो स्वयम प्रभु श्री राम के
18:18संकल्प से उर्जावान होकर सूर्य की भाती चमक रहा था।
18:22मधुपुरी के चारों और का वातावन अशुद्ध और दुर्गंध पूर्ण है, जहां राक्षसी शक्तियों की उपस्थिती से वायुमंडल भी भारी
18:31हो गया है।
18:33प्रभु श्री राम का उपदेश गूँचता है कि शत्रु को तब ही प्रहार करना उचित है जब वह अपनी पूर्ण
18:41शक्ती के स्रोत से दूर और निहत्था हो।
18:45दिव्य अस्त्रवराहास्त्र की आभा ने शत्रुघन के हृदय में उस द्रिड़ता को भर दिया जो केवल एक चक्रवर्ती समराट के
18:52भाई में ही हो सकती है।
18:55शत्रुघन ने देखा कि लवनासुर का शिविरवन से वापस लोट रहा है जबकि उसका घातक त्रिशूल अभी भी दुर्ब के
19:03भीतर एक गुप्ट स्थान पर रखा हुआ है।
19:07दिव्य चेतना से उत्परोथ होकर शत्रुघन ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची जिससे उत्पन्न नाद ने संपूर्ण मधुपुरी को थर्थरा
19:16दिया।
19:18मधुपुरी के विशाल द्वार के भीतर लवनासुर के रक्षक भयानक शोर से व्याकुल होकर अपनी अपनी कुंद बुद्धियों के साथ
19:26यहां वहां भागने लगे।
19:29अयोध्या की विजय पताका को अपने हृदय में बसाए, शत्रुगन ने अपनी रणनीती को अंतिम रूप देते हुए वन के
19:36शांत मार्क का चयन किया।
19:39भगवान शिव अपने हिमाली निवास में इस धर्मयुद्ध के साक्षी बने, उनके त्रिनेत्र में उस आसन्न संधर्ष की ज्वाला स्पष्ट
19:47दिखाई दे रही थी।
19:50लवरासुर वन से बाहर निकलने ही वाला था कि उसे एक अप्शकुन का आभास हुआ, किन्तु उसने अपनी दानवी शक्ती
19:58के मद में उसे अंदेखा कर दिया।
20:01शत्रुघन ने अपनी श्वासों को सन्यमित किया और प्रभु श्री राम के स्मरण मात्र से स्वयन को दिव्यरक्षाकवच में ढक
20:09लिया।
20:10वराहास्त्र अब पूर्णत है सक्रिय हो चुका था, जिसके प्रहार से मधुपुरी की अभेद्य दीवारे भी कामपने लगी थी।
20:18महर्शी नारद का विनावादन शांत होकर उस युद्ध क्षेत्र की ओर मुड़ गया, जहां धर्म और अधर्म का महासंग्राम होने
20:27वाला था।
20:29शत्रुघन के घोडों की हिनहिनाहट ने सन्नाटे को चीर दिया और युद्ध की शंकध्वनी की प्रतीक्षा समाप्थ हो गई।
20:37लवनासुर के मार्ग को काटते हुए, शत्रुघन ने अपनी स्थिती ऐसी बनाली की राक्षस के लिए अपने दुर्ग तक पहुँचना
20:45असंभव हो गया।
20:47आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा नहीं, बलकी विजय के लिए आशिरवाद के रूप में उर्जा के सुक्ष्म कणों की
20:55फुहार की।
20:56शत्रुघन ने लवनासुर के सम्मुख जाकर सिहनाद किया, जिससे राक्षस की समस्थ अटहासों का अंत हो गया।
21:05अब समय आ गया था उस न्याय का, जिसके लिए श्रीराम ने अपने प्रिय अनुझ को इस भीषन मधुपुरी के
21:12संग्राम में भेजा था।
21:14मधुपुरी के भीषन संग्राम का अंत होते ही, शत्रुघन ने अपनी विजय पता का फहराते हुए तपोवन की ओर प्रस्थान
21:22किया।
21:24विजी अनुझ शत्रुघन की मानसिक शांती के लिए देवराज इंद्र ने स्वर्ग से सुक्ष्म उर्जा की वर्षा की, जो रनभूमी
21:32की धूल को शांत कर रही थी।
21:34सेना के साथ ठके हुए शत्रुघन ने संध्या ढलते ही वन की घनी छाया के निकट एक आश्रम के प्रवेश
21:42द्वार को देखा।
21:44अंधकार गहराते ही आश्रम के विशाल वट व्रिक्ष के नीचे मशाले जल उठीन मानो कोई अद्रिश्य शक्ती स्वागत के लिए
21:52तक पर हो।
21:54महर्शी वालमीकी ने कुटिया से बाहर निकल कर शत्रुघन का सत्कार किया। उनके मुख मंडल पर ब्रहमा तेज की अलोकिक
22:02आभा विद्यमान थी।
22:04महर्शी ने शत्रुघन को अतिथी सत्कार के योग्य आसन प्रदान करते हुए कहा कि तपोवन की शांती में ही वास्तविक
22:12राजधर्म का बोध होता है।
22:15शत्रुघन ने विनीत भाव से महर्शी के चर्णों में मस्तक जुकाया और अपनी यात्रा के ठकान को गुरुजनों के सानिध्य
22:23में भूल गए।
22:25हवा के जोके के साथ आश्रम के भीतर से एक अत्यंत मधुर और कोमल लोरी की ध्वनी तैरती हुई आई,
22:32जिसने वातावर्ण को मंत्रमुग्ध कर दिया।
22:35महर्शी वालमी की का चहरा एक रहस्य में मुस्कान से खिल उठा, जैसे वे उस दिव्य ध्वनी के स्रोत और
22:43उसके महत्व से भलीभानती परिचित हों।
22:46शत्रुग्न उस ध्वनी की मिठास से मंत्रमुग्ध हो गए, उन्हें लगा जैसे यह स्वर उन्हें बहुत निकट और अत्यंत प्रिय
22:54किसी आत्मा का स्मरण करा रहा है।
22:58तपोवन के पशुपक्षी भी उस लोरी की लएपर शान्त हो गए, मानो प्रकृती स्वयं उस दिव्य वात्सले का आनंद ले
23:05रही हो।
23:06आकाश में नक्षत्र भी मानो थम गए थे, और स्वयं देवलोक से ब्रहमाजी इस दुलब द्रिश को अपने दिव्य चक्षूओं
23:15से निहार रहे थे।
23:16शत्रुगन ने धीरे से पूछा कि इस घने वन के मध्य यह दिव्य स्वर किसका है, जिसे सुनकर हृदय में
23:24एक अजीब सी पुलक जागरित हो रही है।
23:28महर्शी वाल्मीकी ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया कि यह स्वर उस प्रकृती के हैं, जिसने जगत के उध्धार के
23:35लिए स्वयं को मौन में समर्पित कर दिया है।
23:39लोरी का स्वर अब और भी समीप आ गया था, मानो वात्सले के अश्रु बनकर हवा में टैर रहा हो।
23:47शत्रुगन की आखों में जिग्यासा और सम्मान का भाव था, वे इस अध्भुत शान्ती के पीछे के रहस्य को जानने
23:55के लिए तत्पर थे।
23:57अचानक एक शिशु की किलकारी ने रात्री के सन्नाटे को आनन्द से भर दिया, जिससे शत्रुगन का हृदय एक क्षण
24:04के लिए स्पंदित होना भूल गया।
24:07महर्शी ने आखे बंद कर ली और धीमी आवाज में नारायन का स्मरण किया, जैसे वे इस बालक के भविश्य
24:15के निर्मान का भार देख रहे हूं।
24:18शत्रुगन समझ न सके की क्यों, लेकिन उन किलकारियों को सुनकर उनकी आखों से अंजाने ही दो अश्रु की बूंदे
24:26टपक पड़ी।
24:28उस रात वालमी की आश्रम में एक ऐसा अंकहा संगम घटित हुआ, जो नेती की लेखनी में अयोध्या के भविश्य
24:35का स्वन अक्षरों में इतिहास लिख रहा था।
24:39प्राची दिशा में उभरती अरुनिमा की पहली किरण ने आश्रम के शांत परिवेश को सुनहरे प्रकाश से सराबोर कर दिया।
24:48शत्रुघन ने अपनी कुटिया से बाहर निकल कर आकाश की ओर देखा, जैसे वे उस अनाम शांती के स्रोत को
24:55ढूंड रहे हों जिसने उनकी आत्मा को स्पंदित कर दिया था।
25:00बालकों के कंट से निकली राम कथा की वह मधुर गूंज अभी भी हवाओं में टैर रही थी, जिससे व्रिक्षों
25:07के पक्ते भी लैबद जूम रहे थे।
25:10दीवारों के भीतर से आती वह दैवियवानी मानो ब्रहमांड के रहसियों को उजागर कर रही थी, जिसे सुनकर शत्रुगन की
25:18चेतना जैसे किसी गहरे ध्यान में डूग गई।
25:22महर्शी वालमीकी ने कुटिया के द्वार पर खड़े होकर उस तेजस्वी राजकुमार को देखा और अपनी अंतरग्रिष्टी से उनके हृदय
25:30के द्वंद को भांप लिया।
25:33वालमीकी ने धीमे स्वर में कहा, हे रगुकुल के वीर समय की धारा किसी की प्रतीक्षा नहीं करती और सत्य
25:41को प्रकट होने के लिए नेती का उचित क्षन चुनना पड़ता है।
25:46शत्रुघन के मन में जिग्यासा और संकोच का युद्ध चल रहा था, लेकिन मर्यादित आचर्ण के कारण उन्होंने अपना मुख
25:54मौन ही रखा।
25:55आश्रम की पवित्र वेदी पर जलती हुई अगनी की लप्टें भी मानो उस अनकहे सत्य को साक्षी मान कर शांत
26:03भाव से प्रजवलित हो रही थी।
26:05सूर्य के उपर चड़ते ही शत्रुगन ने अपने घोडे की लगाम थामी और अयोध्या की ओर प्रस्थान करने के लिए
26:13सन्नध हो गए।
26:16प्रस्थान करने से पूर्व उन्होंने एक बार फिर उस कुटिया की ओर मुड कर देखा जहां उनके स्वयन के रक्त
26:23का अंश अंजाने में निवास कर रहा था।
26:26कुटिया के भीतर लव और कुष ने अपनी आखेट की तयारी पूरी कर ली थी, अन्भिग्य की उनके पिता का
26:33प्रिय अनुज उनसे केवल कुछ गस की दूरी पर है।
26:37नेती का चक्र घूम रहा था और एक अद्रिश डोर उन दोनों भाईयों को उनके पित्रिकुल के इतिहास से जोड
26:45रही थी।
26:47शत्रुग्न के जाते ही आश्रम की शांती में एक अजीब सा ठहराव आ गया, मानो प्रकृती भी उस विदाई के
26:54क्षण को सम्मान दे रही हो।
26:57महर्शी वालमीकी ने अपनी आखे बंद कर ली, जैसे वे ब्रहमांड के उस महान आलेख को पढ़ रहे हों जो
27:04आने वाले समय में रघुकुल की नीन भिलाने वाला था।
27:08आश्रम के प्रांगण में खिले हुए पुश्पों की सुगंध अब और भी प्रगाड हो गई थी, जो उस दैविय बालक
27:15की उपस्थिती का संकेत थी।
27:18एक रहस्यमय पवन का जोंका चला जिसने कुटिया के परदे को एक पल के लिए हिलाया, जैसे अतीत और भविश्य
27:26का मिलन हो रहा हो।
27:28अयोध्या के आकाश पर मंदराता वह अज्यात संकट अब और भी स्पष्ट होने लगा था, जिसे केवल वे रिशी ही
27:35देख पा रहे थे।
27:37शत्रुग्न अबवन के घने मार्गों से बाहर निकल कर राजमार्ग की ओर बढ़ रहे थे, उनके हृदय में एक अनोखा
27:45हलकापन था।
27:46उधर वालमीकी के आश्रम में लवकुष की किलकारियों ने एक बार फिर मौन को भंकिया, जिससे चारों दिशाये गूंज उठीं।
27:55यह वहक्षन था जहां अयोध्या के भविश्य की डोर अब केवल उन दो बालकों के हाथों में थी, जो अभी
28:03भी अपनी शक्ती से अप्रिचित थे।
28:07यमुना के तटपर स्थित मधुवन का सघन वन शेत्र आज एक भारी और असहज शांती से घिरा हुआ था, जहां
28:14की भूमी पर राक्षसी अत्याचारों की गहरी चाप अंकित थी।
28:19आकाश के सुदूर कोनों से देवताओं के प्रतिनिधी देवर्शी नारद इस महायुद्ध की पूर्व सूचना पाकर अपने वीना के तारों
28:27को थामे हुए सुक्ष्म रूप में भविश्य की घटनाओं का अवलोकन कर रहे थे।
28:34शत्रुगन ने मधुपुरी के मुख्यद्वार की घेराबंदी कर ली थी, जहां उन्होंने अपने गुप्त विग्रहों और कुशल योध्धाओं के साथ
28:42लवनासुर को फसाने का जाल बुन दिया था।
28:46वातावर्ण में एक रहस्यमय और भारीपन था, जैसे की काल स्वय किसी बड़े रक्तपात की प्रतीक्षा में अपनी सांसे थामे
28:54खड़ा हो।
28:55दूर से एक भयावह गर्जना सुनाई दी, जो मधुवन के व्रिक्षों को हिलाने के लिए परियाक्त थी, क्योंकि लवनासुर अपने
29:04शिकार के साथ वापस लोट रहा था।
29:07इंद्र के वाहन पर सवार होकर देख रहे, भगवान विश्नु ने इस युद्ध के परिणाम को पहले ही देख लिया
29:14था, क्योंकि यह अधर्म के अंत की अनिवार्य शुरुवात थी।
29:19लवनासुर के हाथों में निर्दोष वन्य जीवों का भार था और उसकी आँखों में रक्त पिपासा की अगनी धधक रही
29:27थी, वह अपनी शक्ती के अहंकार में चूर था।
29:31आकाश के नीचे युद्ध की नीव पड़ चुकी थी और नेती का चक्र अब तेजी से घूमने लगा था।
29:38अचानत लवनासुर ने देखा कि उसके महल का द्वार बंध है और शत्रुग्न की सेना उसे घेरे हुए हैं, जिससे
29:46उसकी क्रूर मुस्कान एक क्षन के लिए जम गई।
29:50इधर भगवान शिव कैलास की उचाईयों से इस अधर्मी राक्षस के अंत की घड़ी को देखकर त्रिशूल थामे हुए स्थिर
29:58और शांत खड़े थे।
30:00अपनी अजेत रिशूल से वंचित देखकर राक्षस का क्रोध एक ज्वाला मुखी की भानती फट पड़ा और उसने अपनी विशाल
30:09भुजाओं से धर्ती को कामपने पर विवश कर दिया।
30:13यह वहक्षन था जब शत्रुघन की धैर्यपूवन रणनीती और राक्षस के अनियंत्रित क्रोध का मिलन होने वाला था।
30:21लवणासुर ने अपनी पूरी शक्ती का उपयोग करते हुए पास के एक विशाल प्राचीन वट व्रिक्ष को अपनी जड़ों सहित
30:29उखाड लिया।
30:31देवराज इंद्र भी उपर से देख रहे थे कि कैसे एक मानव एक महाबली राक्षस को अपनी बुद्धी के जाल
30:38में फंसाकर न्याय की बली चड़ा रहा है।
30:42राक्षस ने वह विशाल व्रिक्ष शत्रुगन की ओर हवा में उच्छाल दिया, जिससे हवा की गती भी मानो कुछ पल
30:49के लिए थम गई।
30:51समुचा मधुवन इस प्रहार की गूंच से थर्रा उठा और पक्षी अपने नीडों को छोड़कर आकाश में इधर उधर भागने
30:59लगे।
31:00शत्रुगन अपनी चपलता दिखाते हुए एक ओर हटे और पूरी ततपरता के साथ अपनी धनुष की प्रत्यंचा को कान तक
31:09खींचा।
31:10लगासुर के चहरे पर अब केवल विनाश का उन्माद था, वह अब किसी भी स्थिती में शत्रुगन के जीवन का
31:17अंत करने के लिए पागल हो चुका था।
31:21लड़ाई के इस केंद्र में, जहां केवल रक्त और धूल ही शेश थी, एक ऐसी शक्ती का जन्म होने जा
31:28रहा था जो त्रेता युग की अंतिम महान गाथा लिखती।
31:32मधूवन का महायुध अपने चरम पर पहुँच चुका था और प्रकृती स्वय इस बात की गवाह बनी की कैसे धर्म
31:39अधर्म के अहंकार को चूर-चूर करता है।
31:43मधूवन की पावन भूमी पर शत्रुघन ने एक आग्रचित्थ होकर उस अमोग वैशनव अस्त्र का ध्यान किया, जो साक्षाक भगवान
31:52विश्नु के संकल्प से निर्मित था।
31:55वैकुंठ में विराजमान श्रीहरी ने इस धर्म युद्ध को देख मंद मुसकान बिखेरी मानोवे शत्रुघन के भीतर स्वय अपनी ही
32:03शक्ती का संचार कर रहे हूं।
32:07लवासुर ने एक भीशन गर्जना के साथ अपने विशालकाय शूल को शत्रुघन की ओर फेंका, किन्तु वह अस्त्रवायू में ही
32:15ठहर कर राख में बदल गया।
32:18प्रकृती का कणकन शांत हो गया और मधुवन में एक रहस्य में स्वर्ण आभा फैल गई, जो अधर्म के अंत
32:25और धर्म की विजय की पूर्व सूचना थी।
32:29शत्रुघन ने जैसे ही वैशनव अस्त्र को धनुष पर संधान किया, ब्रह्मांड का हर तत्व उस दिव्य उर्जा के तेज
32:36से आलोकित हो उठा।
32:39देवराज, इंद्र और अन्य देवता आकाश से इस एतिहासिक खण को देख रहे थे, जहां रगुवन्ष का एक वीर पुरुष
32:47एक दुष्ट दानव का काल बनने को तत्पर था।
32:51शत्रुघन का बान बिजली की गती से छूटा और लवनासुर की छाती को चीरते हुए उसके भीतर के समस्थ अहंकार
32:58और राक्षसी वृत्तियों को भस्म कर गया।
33:01एक गुंजती हुई चीख के साथ वह परवत जैसा शरीर धराशाई हो गया और मधुवन की मिट्टी पर दैत्यराज का
33:10अंत अनकित हो गया।
33:12शत्रुघन ने अपना धनुष नीचे किया और धर्ती को प्रणाम किया जहां अब धर्म की पुनहस्थापना हो चुकी थी।
33:21गरुर के पंकों की फड़फडाहट ने आकाश में आनंद की लेहर दोडाई, मानो स्वयन स्वर्ग भी इस महान विजय का
33:29उत्सव मना रहा हो।
33:31रिशियों के तपस्वी आश्रमों से शंख ध्वनी गूंज उठी और मुक्त हुए मुनियों ने शत्रुघन पर पुश्पों की वर्षा कर
33:38दी।
33:39शत्रुघन के हाथों से मधुवन के हृदय में एक भव्य नगर मथुरा की आधारशिला रखी गई, जो आने वाले समय
33:47में संस्कृती और भक्ती का केंद्र बनने वाला था।
33:51उसी समयत दूर तपोवन के घने शांत वनों में महर्शी वालमीकी की कुटिया के द्वार पर दो बालक अपनी तोतली
33:59बोली में धर्म का पाठ पढ़ रहे थे।
34:03शिवजी ने कैलाश परवत से इस द्रिश को निहारा, जहां एक और वीर्ता का शंकनाद था, तो दूसरी और नए
34:10युग के बीज का अंकुरन।
34:13लवकुष के हाथों में वे छोटे काश्थधनुष देख ऐसा प्रतीत होता था मानो त्रेता युग की आने वाली पीधिया धनुर्विद्या
34:21के संसकार को सहेज रही हो।
34:24मधुवन के कनकन से अब राक्षसी अंधकार पूरी तरह विलीन हो चुका था और वहां की भूमी फिर से रिशियों
34:32के मंत्रो चार से गुझूठी।
34:35शत्रोगन का व्यक्तित्व अब एक योध्धा से उपर उठकर एक कुशल शासक और सनरक्षक के रूप में विक्सित हो रहा
34:42था।
34:44ब्रहमा जी ने स्रिजन के इस चक्र को देख ब्रहमांडिय संतुलन के मुस्कुराते हुए संकेत दिये क्योंकि जो समाप्थ हुआ
34:51वह पाप था और जो आरंभ हुआ वह भविश्य।
34:55इधर वन की शांती में लवकुष के उन खिलोनों जैसे धनुशों ने पहली बार हवा को चीरते हुए एक अध्वितिय
35:03ध्वनी उत्पन्न की।
35:05अयोध्या के संकट का अंथ हुआ किंतु नेती के गर्भ में छिपे अगले अध्याय की आहट अब तपोवन की मंध
35:12हवाओं में सुनाई देने लगी थी।