ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध्याय 16 में जानिए देवर्षि नारद के वैकुंठ प्रवेश का अलौकिक रहस्य! जब वीणा महती की दिव्य ध्वनि पर खुले वैकुंठ के कपाट और महाविष्णु ने खोला गोलोक व राधा-तत्व का गुप्त ज्ञान। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #LordVishnu #Vaikuntha #HinduMythology
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00:00ब्रहमांड की सीमाओं को पार करते हुए, नारद मुनी की द्रिष्टी बैकुंठ के उस स्वर्निन द्वार पर टिकी, जो करोडो
00:07सूरियों के तेज से भी अधिक प्रकाशमान था।
00:11द्वार के दोनों और खड़े जय और विजय अपनी गदाओं के साथ अडिक थे, मानोवे स्वयन साक्षात, वैराग्य और भक्ती
00:19का संतुलन बनाए रखने वाले प्रहरी हुँ।
00:23नारद ने अपनी वीना महती के तारों को जंकृत किया, जिससे निकलने वाली दिव्यध्वनी ने द्वार के पास की द्वैत
00:30भावना को पूरी तरह मिटा दिया।
00:33बैकुंट की हवाओं में एक ऐसा अलौकिक संगीत तैर रहा था, जो अस्तित्व की हर परत को शुद्ध करने का
00:41सामर्थ्य रखता था।
00:43जय और विजय ने नारद की ओर देखा, उनकी आखों में एक मूख प्रश्न था कि क्या यह जीव अहंकार
00:50के बंधन को पीछे छोड़ आया है।
00:53नारद मुनी ने जुक कर नमन किया और अपने हृदय को प्रभु के चर्णों में समर्पित करते हुए अपनी आध्यात्मिक
01:01पात्रता को सिद्ध किया।
01:04वीना की गूंज जब गर्भग्रेह की ओर बढ़ी तो बैकुंठ के भीतर मौजूद नील कमल स्वयं ही पुष्प वर्शा करने
01:11लगे।
01:12वह वातावर्ण भक्ती के अतियधिशेश से भरा था, जहां काल का भी कोई अस्तित्व नहीं था।
01:20नारत के स्वर में अब केवल एक ही नाम था, नारायन, जिसके उच्चारन से संपूर, जय और विजय ने अपने
01:27गदाओं को नीचे जुका लिया। यह स्विकार करते हुए कि नारत के भीतर अब कोई द्वैत शेश नहीं है।
01:35जैसे ही द्वार खुले, भीतर से एक ऐसी दिव्य सुगंध निकली जिसने नारत की इंद्रियों को आत्म साथ कर लिया।
01:44वह गर्भगरह जहां स्वयम महा विश्नु वास करते हैं, अब एक दिव्य रहस्य की भांती नारत के सामने उद्घाटित होने
01:52वाला था।
01:54बैकुंट की सीधियों पर कदम रखते ही, नारत को ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह स्वयन को ही मिटाकर परमात्मा में
02:01विलीन हो रहे हैं।
02:04प्रभु के सेवक उस प्रकाश की ओर बढ़ते देख, मुस्कुराते हुए मार्ग प्रशस्त करने लगे।
02:10हर एक पक के साथ नारत की वीना की धुन अधिक गेहन और मधुर होती जा रही थी।
02:18बैकुंट का वह गरभगरे, जिसे देखने की अभिलाशा देवताओं के हृदय में भी दबी रहती थी, अब नारत के सम्मुख
02:26था।
02:27असीम ब्रहमांडिय उर्जा से सराबोर उस स्थान पर नारत ने अपने अस्तित्व को एक नगणिय बूंद के समान पाया।
02:35भगवान विश्णु के द्वारपालों ने एक स्वर में कहा, ये मुनिवर अब आप उस सत्य के समीप हैं जो केवल
02:43भक्ती से ही प्राप्थ होता है।
02:47नारत ने अपनी वीना एक ओर रखी और पूर्ण मौन धारण कर उस दिव्यगर्भगरे की ओर प्रस्थान किया।
02:55उस महार हस्य के उद्धाटन की अंतिम घडिया पहुची थी, जिसने नारत के रोमरों को दिव्यप्रेन से भर दिया।
03:03नारत के पक जैसे ही स्वर्ण में देहरी पर पड़े, अनंत आकाश से जरते हुए प्रकाश ने उन्हें एक नई
03:10चेतना से उत्प्रोत कर दिया।
03:25नारत ने अपनी आखें बंद कर ली, क्योंकि उस गर्भग्रे की उर्जा इतनी तीवर थी कि उसे देखने के लिए
03:32केवल देह नहीं, अपितु भक्ती का चक्षु चाहिए था।
03:36गर्भग्रे के चारों और तैरते हुए दिव्य कमलों से एक धीमी सुगंध उठ रही थी, जो काल की सीमाओं को
03:43मिटा कर आत्मा को शूने में विलीन कर रही थी।
03:48विश्नु के मुख से एक नाद निकला जो वेदों की मूल ध्वनी था, और नारत के हिदय में वह सत्य
03:54प्रस्पुटित हुआ जो देवलोक में भी अग्यात था।
03:58गरुर अपने विशाल स्वर्ण में पंखों को समेटे द्वार के पास स्थिर खड़ा था, उसकी द्रिष्टी नारत की भक्ती के
04:05उस उतकर्ष पर टी की थी।
04:08नारत का शरीर कांप उठा जब उन्होंने अनुभव किया कि विश्णु के गर्भग्रह का कंकन उन्ही के अस्तित्व के साथ
04:16स्पंदित हो रहा है।
04:18वह महार हस्य जो वेदों में भी पहेली बना रहा, आज नारत के अंतर्मन में एक शांत नदी की भांती
04:25प्रवाहित होने लगा।
04:28भगवान विश्णु ने अपना दाहिना हाथ उठाया और नारत को समीप आने का संकेत दिया, जिससे उनके चारों ओर की
04:36प्रकाश किरने और भी सधन हो गई।
04:39नारत ने जुक कर साष्टान प्रणाम किया और उस गर्भगरह की पवित्र धूल को अपने मस्तक पर धारन किया, जो
04:47संसार की सबसे बड़ी निधी थी।
04:50उस गर्भगरह की दीवारों पर अंकित चित्र स्वतह जीवित हो उठे और भक्ती के इतिहास को सुनाने लगे। एक गूंड
04:59सुनाई दी नारत जो आज तक देवताओं से भी छिपा था, वह तुम्हारा प्रेम है, जिसे तुमने निस्वार्थ हो कर
05:06पाया है।
05:08नारत ने अनुभव किया कि वे अब केवल एक रिशी नहीं, बलकि स्वयं के भीतर समाय हुए ब्रहमांड के एक
05:16साक्षी बन गए हैं।
05:19भगवान विश्णु ने अपनी मोहिनी मुस्कान के साथ गर्भग्रह की अद्रिश्य उर्जा को नारत के भीतर समाहित करना आरंभ किया।
05:28इस गर्भग्रह की उर्जा ने नारत के भीतर की अंतिम बाधाओं को भस्म कर दिया, और वे पूर्णता शुद्ध हो
05:35गए।
05:36स्रिश्टी का चक्रत हम गया सा प्रतीत हुआ, जैसे की स्वयन समय भी इस रहस्य के उठगाटन को देखने के
05:43लिए रुक गया हो।
05:45नारत की वीना, महती, गर्भग्रह में स्वयन बजने लगी और उसकी धुन में साक्षात ब्रहमा का आहवान किया।
05:54पूरे वैकुंठ लोक में एक अपूर्व आनंद का संचार हुआ, जैसे की कोई नवस्रिष्टी का द्वार खुल गया हो।
06:03विश्नु ने कहा, नारत तुमने वह देख लिया जो देवताओं की द्रिष्टी से भी परे था, अब तुम जगत को
06:09भक्ती का मार्ग दिखाओगे।
06:12नारत ने जुक कर आशिरवाद लिया और उस गर्भगरे के दिव्य प्रकाश को अपने हृदय में समेट कर बाहर की
06:19ओर प्रस्थान किया।
06:21नारत ने वैकुंठ के उस दिव्य गर्भगरे से कदम बाहर रखे, मानो वे अनंत प्रकाश की तरंगों से होकर भौतिक
06:29जगत की ओर लोट रहे हूँ।
06:32गरुर के विशाल और सुवर्ण पंखों की फड़फडाहट ने वैकुंठ के शांत वातावर्ण में एक मधुरनात पैदा किया, जो मानो
06:40स्वयन विश्णू की आग्या का उद्गोश था।
06:43रिशी नारद ने अपनी वीना महती के तारों को छेड़ा, जिससे निकली ध्वनिया पूरे वैकुंठ के स्वर्ण कमल भवनों में
06:51गुंजायमान हो उठी।
06:53स्वय भगवान अनंत शेशनाद, जिनके फणों की मनिया वैकुंठ को आलोकित कर रही थी, ने नारद के प्रस्थान को एक
07:02मूख स्वीकृती प्रदान की।
07:04नारद अब वैकुंठ की उन सीमांत वीथियों पर थे, जहां से ब्रह्मांड का विस्तार किसी विशाल नीली चादर जैसा प्रतीत
07:12हो रहा था।
07:14तभी नारद को अनुभव हुआ कि उनकी वीना का नाद अब किसी साधारन संगीत का नहीं, बलकि साक्षात विश्नू की
07:22भक्ती का मंत्र बन चुका है।
07:25वीना की तान इतनी शक्तिशाली थी कि आसपास के कल्पवरिक्ष अपनी स्वन आभा को और भी तीवर गती से बिखेरने
07:33लगे।
07:35नारद ने पीछे मुर कर उस गर्भगरे की ओर देखा, जहां से अभी अभी वे ज्ञान की अनंत निधी लेकर
07:42बाहर निकले थे।
07:44वैकुंट के आकाश में चमकते हुए नक्षत्र मानो नारद के मार्ग को आलोकित करने के लिए स्वयंग पंक्ति बद्ध हो
07:51गए थे।
07:53नारद ने उस प्रकाश को अपने हृदय में अनुभव किया और संकल्प लिया कि वे इस भक्ति का प्रसार समस्त
08:00लोकों में करेंगे।
08:03उनके आगे बढ़ने पर वैकुंट की सीधिया स्वतही मार्ग प्रशस्त कर रही थी, जैसे वे उनका स्वागत कर रही हो।
08:11मुग्ध आत्माएं जो वैकुंट में वास करती हैं, नारद के मुख पर दिखाई दे रही उस दिवे चमक को देखकर
08:19नत्मस्तक हो गई।
08:21नारद का प्रतेक पग वैकुंट की महिमा का गुंगान कर रहा था और उनकी वाणी में ब्रहम वैवर्थ पुरान का
08:28सत्य समाहित था।
08:30अचानक नारद की वीना से एक ऐसी ध्वनी निकली जिसने पूरे ब्रहमांड के चक्र को एक नई लय प्रदान कर
08:37दी।
08:39वैकुंट की सीमा पर पहुँचकर नारद ने ठहर कर पुनह उस अनंत शूने की ओर देखा जिसे वे पार करने
08:46जा रहे थे।
08:48भगवान विश्नु का वह सुक्ष्म आशिरवाद उनके चारों और एक सुरक्षा कवच की भाती चमक रहा था।
08:55नारद ने अपनी आखें खोली और अब उनका लक्ष केवल भक्ती का वह पावन मार्ग था जो अधर्म के अंधकार
09:03को नश्ट कर सकता था।
09:05उनके पैरों की गती बढ़ गई और उन्होंने वैकुंट के द्वार से बाहर निकल कर ब्रहमांड की अनन्त यात्रा आरंभ
09:13कर दी।
09:14वीना का प्रत्येक तार अब एक ऐसे मंत्र की तरह बज रहा था, जिसे सुनकर पाशान भी पिघलने पर विवश
09:22हो जाए।
09:23वैकुंट का वह महार हस्य अब नारत के रूप में संसार के कल्यान के लिए निकल पड़ा था, जो भक्ती
09:30की नई भोर का सूचक था।
09:33ब्रहमांड की परतों को पार करते हुए नारत कारत जैसे ही दिव्य प्रकाश के पुंज में प्रवेश कर गया, वैकुंट
09:41की अनुपम छटा ने उनके नेत्रों को चौनधिया दिया।
09:45गरुड के पंकों की फड़फडाहट और दिव्य सुगंध से सराबोर उस गलियारे में पहुँचते ही नारत को स्वय महाविश्नु के
09:53अस्तित्व का आभास होने लगा।
09:55नारत ने देखा कि वैकुंट का वह गर्भगरे जहां साक्षात नारायन विराज मान थे, करोडो सूरियों के तेज से भी
10:04अधिक प्रकाश मान था।
10:06वह पहुचते ही नारत की महती वीना के तार स्वतह ही बस उठे, मानो ब्रहमान का हरकन उस सर्वोच सत्य
10:14का स्वागत कर रहा हो।
10:16नारत की दृष्टी जैसे ही प्रभू के चर्णों पर पड़ी, उन्होंने देखा कि महालक्ष्मी स्वय को मलता से उनके पादपद्मों
10:25की सेवा कर रही हैं।
10:28महालक्ष्मी का वह सौमे रूप देख नारत का हरिदय भक्ती के सागर में डूब गया और वे मंत्रमुग्ध होकर वहीं
10:35स्तब्ध रह गए।
10:37नारायन के वक्षस्थल पर विराजमान कौस्तुभ मनी की चमक ने नारत की चेटना को जैसे ब्रहमांड के हर रहस्य से
10:44पूर्ण कर दिया।
10:46वैकुंट की उस दिव्यशांती में नारत ने अनुभव किया कि समस्त द्वैत भाव मिठ चुके हैं और केवल एक भक्ती
10:54का अस्तित्व शेश है।
10:57दिव्यानंद के अतिरेक से नारत की आखों से बहने वाली अश्रुधाराय वैकुंट के रतनों पर गिरकर मानों मोतियों सी चमक
11:05उठी।
11:06नारायन की चार भुजाओं में स्थित शंक, चक्र, गदा और पद्म एक ऐसी दिव्यध्वनी उत्पन कर रहे थे जिसे केवल
11:14समाधी में ही सुना जा सकता है।
11:18नारत ने साक्षात देखा कि किस प्रकार महा विश्नु की क्रिपा से ब्रहमांड की प्रत्येक रचना अपनी धुरी पर निरंतर
11:25गतिशील है।
11:28भक्ती का वह महार हस्य जो नारत के अंतर्मन में समाया था, अब साक्षात नारायन के दर्शन से चरितार्थ हो
11:35रहा था।
11:48स्वयं को भूमी पर दंडवत नमन किया और अपने संपूर्ण अहंकार को प्रभो के चर्णों में समर्पित कर दिया।
11:56वैकुंठ के उस गर्भगरिह में नारत को अब समय का कोई बोध नहीं रहा, क्योंकि वे शाश्वत काल की गोध
12:03में प्रवेश कर चुके थे।
12:05अचानक महा विश्णु के उठोन पर एक मंद मुस्कान बिखरी, जिसने वैकुंठ के वातावर्ण को और भी अधिक सुगंधित और
12:13तेजस्वी बना दिया।
12:16नारत ने महसूस किया कि यह दर्शन कोई साधारन घटना नहीं, बलकि युगो-युगो से प्रतीक्षित एक महाभोर का सुत्रपात
12:24था।
12:26महालक्ष्मी की द्रिष्टी नारत पर पड़ी और उनकी करुणा से नारत के भीतर भक्ती का एक नया स्रोत फूट पड़ा।
12:34वीना की गूंज अब संपूर्ण वैकुंठ में एक ऐसा मंत्र बन गई थी, जिसे सुनकर देवगण भी अपनी सभा में
12:42मौन हो गए।
12:43उस सर्वोट चिक्षन में नारत के रूप में भक्ती स्वय नारायन के चर्णों में समर्पित होकर संसार के कल्यान का
12:51संकल्प ले रही थी।
12:53नारत ने अपनी महाती वीना के तारों को छेड़ा और वैकुंठ का संपूर्ण आकाश एक दिव्य संगीत की मूच्छना से
13:01भर गया।
13:03भगवान विश्णों के मुख पर मंद मुस्कान आई, मानोवे नारत के हृदय में छिपे भक्ती के सागर को अपनी अंतरग्रिष्टी
13:11से देख रहे हो।
13:12नारत ने अपने नेतर बंद किये और ब्रहमांड के प्रथमकारण नारायन की स्तुती में वेदों के गूड श्लोकों का उच्चारन
13:21प्रारंभ किया।
13:23नारत की स्तुती की तरंगे वैकुंठ के सुनहरे स्तंभों से टकरा कर एक दिव्य गूंज उत्पन कर रही थी, जिससे
13:30बातावर्ण पवित्रता से उत्परोथ हो गया।
13:34पूरे वैकुंठ में चारों और वेदों का घोश गूंजने लगा और प्रत्येक दिशा में नारायन का तेज अनन्त प्रकाश के
13:41रूप में फैल गया।
13:44तभी माता लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर एक स्वर्ण पात्र से पारिजात के पुश्पों की वर्षा नारत पर करनी शुरू की।
13:52पंखुडियों के स्पर्ष मात्र से नारत के स्वर में एक ऐसी दिव्यता आ गई, जिसे सुनकर स्वयन समय की गती
13:59भी थमसी गई।
14:01आकाश में दिव्य प्रकाश के गोले बन गए, जो इस ब्रहमांडिय संगीत के साक्षी बन रहे थे।
14:09नारत गा रहे थे कि किस प्रकार नारायन समस्त प्राणियों के हृदय में रहकर उनके कर्मों और भावों को साक्षी
14:16बन कर देखते हैं।
14:18भगवान विश्णू ने अपना चतुर्भुज रूप और भी अधिक तेजस्वी कर लिया, जिससे संपूर्ण वैकुंठ में दिव्य चेतना का संचार
14:27हुआ।
14:28नारद का विनावादन अब भक्ती की चरम सीमा पर पहुँच गया था, जहां शब्द पीछे छूट गए थे और केवल
14:36भावों की गूँच्शेश थी।
14:38एक स्वर्णन प्रकाश पुंज ने देवर्शी को घेर लिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनकी स्तुती साक्षात परमात्मा
14:46को समर्पित हो गई है।
14:49वैकुंट की अलौकिक वाटिकाओं में लगे कल्पवरिक्ष भी नारत के गीतों के साथ जुमने लगे और उनका पराग हवाओं में
14:57महक उठा।
14:58लक्ष्मी जी की करुणा ग्रिष्टी से नारत का रोमरोम पुलकित हो गया और उन्होंने नारायन को ही अपना एक मात्र
15:06आश्रे मान लिया।
15:09नारत की उंगलियों ने वीना पर एक ऐसी लए पकड़ी जिसे सुनकर वैकुंट के पारशद भी अपनी सेवा छोड़कर उस
15:16दिव्य संगीत में लीन हो गए।
15:18एक शक्तिशाली स्पंदन वैकुंट के गर्भ ग्रह से उठा जिसने नारत के संगीत को और अधिक उजस्वित कर दिया।
15:28संपूर्ण ब्रहमांड में नारत की यह स्टुती एक गूंच की भांती फैलने लगी जो संसार के भटकते जीवों को शांती
15:35का मार्ग दिखा रही थी।
15:38भगवान विश्णू ने प्रसन्न होकर अपना दक्षिन हस्त उपर उठाया, जिससे नारत को साक्षात नारायन के आशिरवात का अनुभव हुआ।
15:48नारत ने जुककर नारायन के चर्णों में अपने आपको समर्पित किया और वीना की आखिरी जंकार के साथ वैकुंठ मौन
15:56हो गया।
15:57उस निस्तब्धता में भी एक महान संदेश छिपा था, जो संसार के कल्यान के लिए एक नए युक्के उदे का
16:05संकेत दे रहा था।
16:07वैकुंठ की दिव्यस्वर्ण में सभा में नारायन ने अपनी कोमल मुस्कान के साथ अपना दाहिना हाथ उपर उठाया और समूचे
16:16वातावर्ण में शान्ती का संचार हो गया।
16:19साक्षात भगवान विश्णू, जिनका शरीर नी मेगों के समान दीप्तिमान है और जिनके मस्तक पर वैजनती माला वस्वर्ण मुकुट सुशोभित
16:29है, उन्होंने अपनी करुणा भरी द्रिष्टी नारत पर डाली।
16:34नारायन के मुख से निकले अमरित समान शब्दों ने ब्रह्मांड के सन्नाटे को संगीत की एक नई गूम्व से भर
16:41दिया।
16:42महा विष्णु ने दिव्य आभा बिखेरते हुए नारत को अपने चर्णों से उठाकर हृदय से लगा लिया, जिससे एक अद्वितिय
16:50दिव्य प्रकाश उत्पन हुआ।
16:53भगवान विष्णु ने अपनी वीना महती की ओर संकेत किया, जो उस समय स्वय दैविय कंपनों से जंकृत हो रही
17:00थी।
17:02नारायन ने घोशना की की अब से यह वीना तीनों लोकों में भक्ती का प्रकाश फैलाने वाली एक मात्र दिव्य
17:09जोती होगी।
17:11महर्शी नारद ने साश्टान प्रणाम किया, उनके शरीर से भक्ती का एक श्वेत प्रकाश निकल कर वीना के तारों में
17:18समाने लगा।
17:20नारायन ने अपनी अंगुलियों का स्पर्श वीना के तारों पर किया, जिससे वैकुंट के कणकण में एक दिव्य आवरित्ती, फ्रिक्वेंसी,
17:29प्रवाहित हो गई।
17:31यह वह अनंत शक्ती थी, जो निर्जीव पाशानों को भी प्रेम की भावनाओं से द्रवित करने में सक्षम थी।
17:39वैकुंट के द्वारपालों ने भी उस संगीत के प्रभाव को महसूस किया, जिससे उनके हृदय में भी भक्ती का ज्वार
17:46उमड पड़ा।
17:48नारद ने अनुभव किया कि उनकी महती अब केवल एक वाध्य यंत्र नहीं, बल्कि साक्षात विश्नु के संकल्प का प्रतीक
17:56बन चुकी है।
17:59संसार के कल्यान हे तु, प्रभु ने उस वीना में ऐसी शक्ती भर दी की उसका श्रवन मात्र ही जीवों
18:05को संसार सागर से मुक्त कर देगा।
18:09नारायन की दृष्टी में वह करुना थी, जो ब्रहमांड के हर दुहक का निवारन करने के लिए परियाप्त थी।
18:16नारद के कानों में नारायन का वह मधुर आदेश गूंज रहा था कि वे इस संगीत को हर उस जीव
18:23तक पहुँचाएं जो अंधकार में भटक रहा है।
18:28वीना की जंकार में अब नारायन की सौमयता और शिव का वैराग्य दोनों का अध्भुत समावेश हो चुका था।
18:46नारद की उस घटना को निहार रहे थे क्योंकि ऐसा अध्भुत द्रिश उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
18:54नारद ने अपनी आखें बंद की और नारायन के उस आशिरवात को अपने भीतर आत्म साथ कर लिया।
19:02जब उन्होंने आखें खोली तो उनके भीतर का अज्यान पूरी तरह से भस्म हो चुका था और वे भक्ती का
19:09महासागर बन चुके थे।
19:12नारायन ने अंत में अपना हाथ नीचे किया और वेकुंट एक बार पुनह भक्ती के उस दिव्य संगीत में डूग
19:19गया जो अनंत काल तक गूंजता रहेगा।
19:23वेकुंट की अनंत आभा के बीच नारायन ने अपने चतुर्भुज स्वरूप में एक मंद मुस्कान बिखेरी और नारत की जिग्यासा
19:31को भांप लिया।
19:33नारायन की दृष्टी सुदूर ब्रहमांडिय शून्यता की ओर गई जहां वे एक ऐसे परम सत्य का अनावरण करने जा रहे
19:41थे जो देवगणों की कलपना से भी परे था।
19:44नारायन ने धीरे से अपनी तरजनी उठाई जिससे उनके सामने का आकाश एक स्वर्णिन द्वार की भांती खुलने लगा।
19:54उस द्वार के पीछे एक ऐसी आभा थी जिसे देखकर स्वय वेकुंट की कांती भी मंद पड़ गई और चारों
20:02और एक दिव्य सन्नाट आचा गया।
20:05नारायन ने गंभीर स्वर में नारत से कहा कि यह वेकुंट तो केवल ब्रहमांड की व्यवस्था के लिए निर्मित एक
20:12विस्तार मात्र है।
20:15नारायन ने बताया कि इस संपूर्ण स्रिष्टी के मूल में गोलोक नामक एक परमधाम स्थित है, जहां स्वयन श्री कृष्ण
20:22नित्य विराजमान है।
20:25नारत का हृदैर उस परम नाम को सुनते ही भक्ती के स्पंदन से भर गया, जैसे कोई प्यासा सदियों बाद
20:32अमरित के निकट आ गया हो।
20:35वह गोलोक धाम स्वप्रकाशित है, जहां न तो सूर्य की आवश्शकता है और नहीं किसी अन्य लौकिक उर्जा की, क्योंकि
20:43वहां स्वयम प्रकाश का स्रोत बसता है।
20:47नारायन ने समझाया कि गोलोक की दिव्यता के सामने वैकुंट के सभी एश्वर्य एक तुछ प्रतिबिंद की भांती प्रतीत होते
20:55हैं।
20:57नारद ने कापती हुई वानी में पूछा कि क्या वह परमधाम देवताओं की पहुँच में भी है या यह कोई
21:04अलौकिक रहस्य है जिसे केवल कृष्ण ही जानते हैं।
21:09नारायन ने उत्तर दिया कि गोलोक का द्वार केवल प्रेम और निस्वार्थ भक्ती के मार्ग से ही खुलता है जो
21:16किसी भी कर्मकान से परे हैं।
21:20जैसे ही गोलोक का वर्णन हुआ, वैकुंट के कमल स्वय अधिक खिल उठे और वातावर्ण में एक अनसुनी सुगंध घुल
21:28गई।
21:29नारायन ने आगे बताया कि वैकुंट का अस्तित्व भी उसी परम आनंद के अंश से निर्मित है ताकि ब्रहमांड की
21:37धारा निरंतर चलती रहे।
21:40नारद ने अपनी आखे मूंद ली और उस परम धाम की कलपना मात्र से ही वे समाधी की स्थिती में
21:46पहुँच गए।
21:48गोलोग की वह अलोकिक किरने वैकुंट के गर्भगरह में पहली बार प्रवेश कर रही थी जिससे चारों और स्वर्ण की
21:56चमक और बढ़ गई।
21:58नारायन ने एक गहरी श्वास ली और उनके रोमरों से भक्ती का एक ऐसा प्रवाह निकला जो सीधे गोलोक की
22:06ओर जाने लगा।
22:08यह रहस्य अब तक देवलोक से भी छिपा था क्योंकि अधिकारी के बिना सत्य का उठगाटन विनाशकारी हो सकता था।
22:17नारद ने अनुभव किया कि उनकी महती वीना के तार भी अब उस परम संगीत को सुनने के लिए आतुर
22:23थे जो गोलोक से आ रहा था।
22:27नारायन की क्रिपा से वैकुंट की सीमाएं अब धुंधली पड़ने लगी थी और नारद के समक्षपरम सत्य का द्वार पूर्णता
22:35खुल चुका था।
22:37वह महार हस्य जो युगों से छिपा था, आज नारत के माध्यम से स्रिष्टी के कल्यान के लिए प्रकट होने
22:43की प्रतीक्षा कर रहा था।
22:46वैकुंट का गर्भ पूरी तरह से प्रकाशित हो उठा जब भगवान विश्णु ने अपनी मुस्कान के साथ उस अनंत सत्य
22:53की ओर इशारा किया जो स्रिष्टी के मूल में व्याप्त है।
22:58नारायन के मुख से पहली बार राधा नाम का स्पंदन निकलते ही ब्रहमांड के कनकन में एक दिव्य संगीत गूँज
23:06उठा।
23:07विश्णु ने समझाया की राधा और कृष्ण दो नहीं बलकी एक ही चेतना के दो अभिन अंग हैं, जैसे प्रकाश
23:15और उसका स्रोत कभी अलग नहीं होते।
23:18नारद की दृष्टी के समक्ष वैकुंठ की स्वर्ण आभा और गहरी होती गई, मानों वे किसी अलोकिक द्वार के बिलकुल
23:26भीतर प्रवेश कर रहे हूं।
23:29नारायन ने आगे कहा कि राधा वही प्रकृती हैं, जिनके बिना स्वयन श्री कृष्ण की लीला अधूरी है और ब्रहमांड
23:37का स्रिजन असंभव है।
23:40नारद मुनी ने नत्मस्तक होकर सुना की किस प्रकार राधा के प्रेम की शक्ती से ही समस्त देवता और लोक
23:47अपनी मर्यादा का पालन करते हैं।
23:51भगवान विश्णु के चारों हाथों में चमकता हुआ सुदर्शन चक्र और कौमोद की गदा भी उस राधातत्व के सामने शांत
23:59और समर्पित प्रतीत होने लगी।
24:02स्रिष्टी के उस परम केंद्र पर जहां आज तक किसी देवता की द्रिष्टी नहीं पड़ी थी, वहां राधा की दिव्यमुस्कान
24:09का आभास होने लगा।
24:12नारायन के वानी से यह रहस्य उद्धाटित हुआ कि राधा के बिना न तो कृष्ण की पूर्णता है और नहीं
24:19इस अनंत स्रिष्टी का कोई अस्तित्व।
24:22नारद ने अनुभव किया कि जिस महती वीना को वेधारन करते हैं, उसका संगीत वास्तव में राधा और कृष्ण के
24:30उस नित्यरास का ही प्रतिध्वनी है।
24:33उस गर्भग्रह में समय की गती जैसे रुख गई थी और केवल प्रेम का स्पंदन ही एक मात्र सत्य बनकर
24:41उभरा था।
24:43नारायन ने एक और रहस्य जोडा की जो जीव राधा तत्व को समझ लेता है, वह माया के चक्र से
24:49सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
24:53ब्रहमांड के रचिता के मुक्से राधा को आध्या शक्ती के रूप में सुनकर नारत के रोमरों में एक अलोकिक पुलक
25:00भर आया।
25:01विश्नु ने अपने करक्मलों से वैकुंठ के उस रहस्यमे परदे को थोड़ा और हटाया, जिससे एक दिव्य सुगंध पूरे लोक
25:10में ठैल गई।
25:11नारत ने देखा कि उस जोती के भीतर अनंत ब्रह्मांडों की रचना हो रही है और वे सभी राधा के
25:18प्रेन से पोशित हो रहे हैं।
25:21दिव्य प्रकाश और दिव्य अंधकार के उस मिलन बिंदु पर महा विश्नु ने राधा के उस शाश्वत रूप का दर्शन
25:29कराया जिसे वेदों ने भी केवल नेतिनेती कहकर संबोधित किया।
25:34नारायन ने शांत वाणी में कहा कि राधा ही वह सेतु हैं जिस पर चलकर आत्मा गोलोक के उस नित्यधाम
25:41तक पहुँचती है।
25:44नारद मुनिक जो अभी तक केवल ज्यान की खोज में थे, अब भक्ती के उस सर्वोच सागर में पूर्णता डूब
25:51चुके थे।
25:53वैकुंट का वह गर्भग्रिह अब ध्यान और प्रेन का संगम स्थल बन चुका था जहां से स्रिष्टी का भविष्य निर्देशित
26:00होना था।
26:02नारायन के उस रहस्योधाटन ने नारत के माध्यम से अब उस संदेश को जन दे दिया था जो लुगों-लुगों
26:09तक मानव जाती का मार्गदर्शन करेगा।
26:12वैकुंट के स्वर्णमे प्रांगण में खडी अनंत काल की धारा। नारायन के एक संकेट पर ब्रहमांड के आगामी चकरों के
26:20सुक्षम स्पंदन को मूर्थ करने लगी।
26:23महा विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ अपनी त्रिलों की व्यापिनी द्रिश्टी से उस भविश्य को देखा, जहां धर्म के
26:31संरक्षन हेतु देविय अंशों का धरा पर उतरना अनिवार्य था।
26:36नारायन ने अपनी अंगुलियों से आकाश मेरे खाएं खीच कर नारत को वह अग्रिश्य रूपरेखा दिखाई, जो युगों के परिवर्तन
26:44का आधार स्तंभ बनने वाली थी।
26:47उस गर्भग्रेह की दीवारों पर महाकाल का वह विराट स्वरूप उभराया, जो काल चक्र के रुकने और पुनह गतिमान होने
26:55के रहस्य को प्रतिध्वनित कर रहा था।
26:59नारायन की वानी गंभीर हो उठी और उन्होंने देवर्शी नारत के भविश्य के उत्तरदायत्वों को एक पवित्र संकल्प के रूप
27:07में घोशित किया।
27:09देवर्शी नारत ने अपनी वीना महती के तारों को जंकृत किया, जिससे उस ब्रह्मांडिय योजना की ध्वनी तीनों लोकों में
27:17गूझ उठी।
27:19महा विश्णु ने कहा कि है नारत, तुम ही वह सूत्रधार हो जो शापों और वर्दानों के माध्यम से धर्म
27:25की स्थापना के लिए लीलाओं का सूत्रपात करोगे।
27:29नारत ने जुक कर नमन किया और उस महान उत्तरदायत्व को स्विकार किया, जिसके लिए उन्हें संसार के हर सुखदुख
27:37से निरलिप्त रहकर यात्रा करनी थी।
27:41वैकुंट के आकाश में नक्षत्रों ने अपनी गती बदल दी, जैसे कि वे किसी महा प्रिवर्तन के आगमन की सूचना
27:48दे रहे हूं।
27:50गरुर देव अपनी विशाल पंखों को फड़फडाते हुए उस सभा में उपस्थित हुए, जैसे वे नारायन की इस दिव्य योजना
27:58के साक्षी बनने के लिए तत्पर हूं।
28:01नारायन के मुख से निकली एक-एक शब्द की गूंच सीधे काल के प्रवाह में जाकर समा रही थी, जो
28:08भविश्य के अवतारों की नीम रख रही थी।
28:11इस गर्भग्रह में व्याप्त मौन अब एक ऐसे महा तूफान के शान्त होने जैसा था, जिसके पीछे संपूर्ण स्रिष्टी के
28:19उत्थान का संकल्क छिपा था।
28:22नारद ने अनुभव किया कि उनकी महती वीना के स्वर अब केवल संगीत नहीं, बलकि स्रिष्टी के उन रहसियों का
28:30आहवान कर रहे हैं, जो अभी तक अज्यात थे।
28:34वैकुंट की स्वर्ण दीरगाओं में नारायन की छाया, अब एक ऐसे पुरुष की तरहे प्रतीत हो रही थी, जो आने
28:41वाले युगों के संधर्ष को पहले से ही देख चुका था।
28:46नारत को यह ज्यात हो गया कि उनकी प्रत्येक यात्रा अब ब्रहमांड के उस संतुलन को पुनह स्थापित करने का
28:53साधन बनेगी, जिसके लिए वे निर्मित किये गए हैं।
28:58एक अग्रिश अग्निवले ने गर्भग्रह को घेर लिया, जो इस बात का प्रतीक था कि नारायन की आग्या अब एक
29:05अप्रिवर्तनिय दैविय विधान बन चुकी है।
29:10ब्रहमांड के समस्थ देवताओं ने भी अपने अपने लोक में उस दिव्य संकल्प की गूंच को महसूस किया और वे
29:17विस्मय में नारायन की ओर निहारने लगे।
29:20नारायन ने एक बार फिर नारद को आशिरवाद दिया, जिससे देवर्शी का रोमरोम भक्ती और कर्तवय के उस अध्भुत संगम
29:28से खिल उठा।
29:30अब समय आ गया था कि नारद वैकुंठ की इस पावन देहली को छोड़ कर उस मित्युलोग की यात्रा आरंभ
29:37करें, जहां से धर्म का नूतन अध्याय प्रारंभ होना था।
29:42महा विष्णु का वह गर्भगरेह, जहां से स्रिष्टी का भविष्य निर्देशित हुआ था, एक बार फिर अनंत काल की शांत
29:50आभा में विलीन हो गया।
29:51नारद ने महाती वीना को अपने वक्ष से थाम कर वैकुंठ के स्वर्ण द्वारों को अंतिम प्रणाम किया और अनंत
30:00ब्रहमांडी अंधकार की ओर प्रस्थान किया।
30:02उनके हृदय में नारायन के उस गर्भगरे की उर्जा स्पंदित हो रही थी, जिसने उनके अस्तित्व को एक नए ब्रहमांडी
30:11उत्तरदायत्व से अभिशिक्त कर दिया था।
30:15वीना की तंतियों से फूटते दिव्यस्वरों ने शून्यता को तरंगित कर दिया, मानो स्वयन स्रिष्टी का संगीत नारत के साथ
30:23चल पड़ा हो।
30:24वैकुंट के स्वर्नप्टल के ठीक पीछे ब्रहमांड का वो विशाल विस्तार फैला था जहां सितारों का जन्म और ग्रहों की
30:33गती निरंतर जारी थी।
30:35नारत की द्रिष्टी अब उन नक्षत्रों के मिलन बिंदू पर टिकी थी, जहां से मृत्यू लोक के संधर्षों की प्रतिध्वनी
30:42सुनाई पड़ने लगी थी।
30:45देवर्षी ने अपनी वीना के सुरों को उस विशेश कमपन में ढाला, जिससे अद्रिष्य लोकों के द्वार स्वयन उनके लिए
30:53खुलते जा रहे थे।
30:55अंधकार और प्रकाश के उस मध्यक्षेत्र में नारद को एक दिव्यस पंदन महसूस हुआ, जो किसी अनसुलजे रहस्य की आहट
31:03दे रहा था।
31:05यह वह स्थान था जहां कर्मों का लेखा जोखा लिखने वाली कालशक्ती अपना मौन तांडव करती थी।
31:12नारद ने सचेत होकर अपने चारों और एक सुरक्षा धेरा बनाया, क्योंकि अब वे सामान्य आकाश मार्क से परे ब्रहमांड
31:21के सुक्ष्म स्तरों में प्रवेश कर रहे थे।
31:24महा विश्नु के आशिर्वाद की ओजस्वी आभा उनके चारों और एक धाल की तरहे चमक रही थी, जो किसी भी
31:32नकाराक्मक शक्ती को उनके समीप नहीं आने देती थी।
31:37तभी एक दिव्यध्वनी के साथ उनके सामने आकाश के केंदर में एक द्वार खुला, जिसके पीछे से अंगिनत संभावनाओं का
31:45प्रकाश फूट रहा था।
31:48वह द्वार था संकल्प लोग का, जहां देवताओं के द्वारा लिये गए हर संकल्प का बीज अंकुरित होता था।
31:56नारद ने अपनी वीना को थप्थ पाया, जिससे एक मधुर स्वर निकला और उस द्वार के भीतर की हलचल एकाएक
32:04शांत हो गई।
32:05शांत होते ही द्वार के उस पार नारद को उन मनुश्यों की जलत मिली, जो अभी अपने कर्मों के चक्र
32:12में उलजे हुए थे।
32:15देवर्शी ने अनुभव किया कि उनकी यात्रा केवल वैकुंट से मृत्यो लोग तक नहीं, बलकि हृदय से आत्मा तक की
32:22है।
32:24उन्होंने अपनी वीना के सुरों को और भी अधिक सुक्ष्म किया, ताकि उनकी ध्वनी सीधे उन मनुश्यों के अंतर्मन को
32:32छू सके।
32:34ब्रहमांडिय मार्ग अब एक तंतु की भांती स्पष्ठ हो गया था और नारद उस पर एक पथिक की भाती आगे
32:41बढ़ने लगे।
32:42प्रत्येक कदम के साथ उनकी वीना के सुरों में एक नया राग जुड रहा था, जो भक्ती की शक्ती को
32:49और अधिक प्रबल बना रहा था।
32:52दूर क्षितिच पर मृत्यू लोग के वे प्रथम संकेट दिखाई देने लगे, जहां धर्म की स्थापना हेतु देवर्शी का प्रथम
33:00पादप्रहार होना शेश था।
33:02नारद ने एक लंबी गहरी सांस ली, वीना को अपने सकंध पर रखा और उस दिव्य रहस्य को अपने भीतर
33:10समेट कर मृत्यू लोग के लिए प्रस्थान कर दिया।