उपबर्हण के श्रापित जीवन का अगला चरण शुरू होता है! ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस आठवें एपिसोड में, देखिए कैसे नारद का अंश मृत्युलोक के मायाजाल में फंसकर एक शूद्र के रूप में अपनी कठिन यात्रा शुरू करता है। क्या भक्ति की लौ इस घने अंधेरे में जीवित रह पाएगी? जानिए इस महा-रहस्यमयी यात्रा के बारे में। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #HinduMythology #SanatanDharma #SpiritualJourney #Karma #PuranaStories #HindiMythology #LordKrishna #Devotion
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00:00ब्रह्मा की सभा में उपबरहन का गंधर्व शरीर धीरे-धीरे अपनी चमक खोने लगा और उसकी आभा धुंधली पड़ने लगी।
00:08सभा में उपस्थित अने गंधर्वों की आखें अपने साथी के इस पतन को देखकर विस्मय और करुणा से भर गई।
00:17उपबरहन की भुजाओं से दिव्य तेज के कण इस प्रकार जहरने लगे मानो कोई जलप्रपात अपनी अंतिन बूंदे बिखेर रहा
00:25हो।
00:26पूरे ब्रहम लोग के वातावर्ण में एक भारी सन्नाटा पसर गया और गंधर्व संगीत की मधुर ध्वनी एकाएक थम गई।
00:35आकाश में तैरते हुए दिव्य लोग अब उपबरहन की गिर्ती हुई चेतना के साथ काले बादलों से ढखने लगे।
00:43ब्रहमा के पारशद गंभीर मुद्रा में उस स्थान पर खड़े थे, उनके चहरे पर न्याय की कठोर्ता स्पष्ट जलक रही
00:51थी।
00:52उपबरहन के वस्त्र, जो कभी स्वर्ण के समान चमकते थे, अब जीर्ण होकर उसके शरीर से अलग होने लगे थे।
01:01ब्रहम लोग की शोभा धीरे-धीरे विलीन हो रही थी, जैसे स्वपन के समाप्त होने पर चित्र धुंधले पड़ जाते
01:08हैं।
01:10दूर खडी अपसराएं उपबरहन के प्रती अपनी सहानु भूती व्यक्त करने के लिए अपने कमल के हाथों को जोड कर
01:17प्रार्थना करने लगी।
01:20स्वयम ब्रह्मा जी अपने आसन पर विराजमान, मौन रहकर इस श्राप की नेती को पूर्ण होते हुए देख रहे थे।
01:28उपबरहन के पैरों के नीचे की दिव्यस्वर्ण भूमी अब धूसर मिट्टी में बदलने लगी थी, जो उसके आने वाले पतन
01:36का संकेत था।
01:49लेकिन वे ब्रह्मा की आग्या के विरुद्ध एक शब्द भी बोलने में असमर्थ थे। ब्रह्मा के पार्षदों ने अपना मस्तक
01:57जुका लिया, जैसे वे इस कड़वे सत्य को स्विकार करने की चेश्टा कर रहे हुँ।
02:04उकबरहन के दिव्यकेश अब विखर कर उसके मुख पर आ गए थे, जो उसके व्याकुल मन का चितरन कर रहे
02:10थे।
02:12ब्रहम लोग की दिव्य सुगंध मन्द पड़ गई और वहां एक भारी सन्नाटा चा गया जो केवल विदाई का प्रतीक
02:19था।
02:20उकबरहन ने अंतिम बार अपने दिव्य रूप को देखा, जो अब मात्र एक स्मृती बनकर रहे गया था।
02:28आकाश के नक्षत्र भी मानो इस पतन को देखकर अपनी गती को धीमा कर चुके थे।
02:35श्राप का अंतिम प्रभाव उपबरहन की देह पर स्पष्ट रूप से उभराया और वह गंधर्व देह पूरी तरह समाप्थ हो
02:43गई।
02:44अत्ता उपबरहन की आत्मा मृत्य लोग की ओर प्रस्थान करने के लिए तयार थी, जहां शूद्र योनी उसका प्रतीक्षा कर
02:52रही थी।
02:53ब्रहमांड की विशालता में उपबरहन की आत्मा एक अद्रिश्य विद्य पुंच की भांती शून्यता के अंधकार को चीरते हुए मृत्यू
03:02लोग के जटिल चक्रों के मध्य आगे बढ़ रही है।
03:06बैकुंट के द्वार पर स्थित भगवान विश्नु अपनी अनंत योग निद्रा से जाग कर अपनी मंद मुस्कान के साथ उस
03:14भटकती हुई आत्मा के भविश्य के मार्ग को देख रहे हैं।
03:19नारत का वह सुक्ष्म अंश अब एक धुंधली गलियारे जैसी संरचना से गुजर रहा है, जहां कर्मों के सुक्ष्म धागे
03:27जीवन के अगले पड़ाव को बुनने के लिए तैयार हैं।
03:31नेती की लकीरें अब उस दरिद्र दासी के आवास की ओर जुकने लगी हैं, जहां एक ननहासा जीव भौतिक्ता के
03:39कारागार में आने की प्रतीक्षा कर रहा है।
03:43प्रित्वी का वातावर्ण नारत की उस दिव्यचेतना के स्पर्ष से मानो थर्थरा उठा, जिससे आसपास की वनस्पती और वायुमंडल में
03:52एक अजीव सी शान्ती छा गई।
03:55गरुर्देव, जो प्रभु की इच्छा के साक्षी हैं, आकाश मार्ग से नीचे उतरते हुए उस आत्मा को मृत्य लोग की
04:03सीमाव के भीतर सुरक्षित पहुँचने में मार्ग गर्षन प्रदान कर रहे हैं।
04:08उस दासी की कुटिया के भीतर, जहां अभावों का वास है, वहां हवा में एक दिव्य सुगंध का संचार होने
04:16लगा जो किसी अलोकिक उपस्थिती का संकेथ है।
04:21उपबरहन की आत्मा अब अपनी दिव्य स्मृती को पीछे छोड़ते हुए, धीरे धीरे उसकोख के भीतर प्रवेश करने की प्रक्रिया
04:29को पूर्ण कर रही है।
04:32मृत्यो लोक की कठोर धरा के कन भी अब उस महान रिशी के आगमन के स्वागत में मानो अपनी जड़ता
04:38को त्याग कर स्पंदित होने लगे हैं।
04:42भगवान शंकर ने हिमालय की एकांत शिकरों से अपनी तीसरी आख खोली और उस आत्मा की शूद्र योनी में हो
04:49रही यात्रा को अपनी दिव्यद्रिष्टी से स्विकार किया।
04:54समय का चक्र एक नई गती धारण कर चुका है, जहां ज्यान और अज्यान के मध्य एक सुक्ष्मरेखा का निर्मान
05:01हो रहा है।
05:23अपनी चमक को पुनः प्राप्त कर रहे हैं।
05:27देवराज इंद्र ने भी अपनी सभा में इस पतन और पुनरजन्म के रहस्य पर मौन धारण कर लिया, क्योंकि वे
05:34जानते थे कि यह भगवान की कोई गहन लीला है।
05:39वह निर्धन दासी अपनी नींद में भी एक सुखद स्वपन का अनुभव कर रही है, मानो कोई तेजपुंच उसके भीतर
05:46समा गया हो।
05:48अंधकार और प्रकाश की यह संधी वेला मृत्युलोग के लिए एक ऐसे इतिहास की नीम रख रही है, जिसका अंत
05:56ज्यान के महासागर में ही होगा।
05:59नारद का वह अंश अब अपनी दिव्य शक्तियों से पूरी तरह मुक्त हो चुका है, अब वह केवल एक रक्तमास
06:06के बंधन में बंधने की तयारी में है।
06:09प्रकृती के पंच्तत्व भी उस अध्भुत घटनाक्रम के साक्षी बनकर अपनी गती को शांत किये हुए हैं, मानो ब्रहमांड का
06:18नियम रुक गया हो।
06:20अंत्य वह क्षणा पहुचा है, जब देवर्शी नारत का वह अंश मृत्यो लोग की सीमा पार कर पूरी तरह एक
06:27मानवी गर्भ की मर्यादाओं में आबध हो गया।
06:31शूद्र योनी के उसकठोर संधर्ष का अध्याय प्रारंब हो चुका है, जहां देवर्शी को अब मनुष्य बनकर भक्ती का अर्थ
06:39पुनह खोजना होगा।
06:41घने अंधकार से लिप्टी हुई एक जरजर कुटिया में, जहां दरिद्रता की धूल जम चुकी है, एक बालक की पहली
06:49चीक पूरे संसार के नियती चक्र को जगजोर देती है।
06:54वैकुंट के स्वर्ण कमलों पर विराजमान भगवान विश्नु इस तुछ शूद्र योनी की पीडा को देखकर अपनी मंद मुस्कान के
07:02साथ उस ननहे जीव पर अपनी दिव्यद्रिष्टी बनाए रखते हैं।
07:07माता का जियनशियन शरीर और पिता की कठोर महंत की लकीरें उस बालक के भविश्य को एक ऐसी गाथा बनाने
07:15के लिए तैयार कर रही हैं, जिसका अंत भक्ती के महासागर में होगा।
07:21समय की गती उस बालक के लिए धीमी हो गई है, मानो प्रकृती स्वयं उस शूदर योनी की कठोरता और
07:28उसकी आंतरिक शुद्धता के बीच के द्वंद्व को देख रही हो।
07:32चारू और फैले उस अज्ञान के अंधेरे में भी बालक की आखों में एक ऐसी चमक है जो जन्मजात पूर्वस्मृतियों
07:41के अधूरे रह गए ज्ञान का आभास कराती है।
07:45विश्णु के दूट के रूप में भगवान गरूर उस अद्रिश्य आकाश से बालक के कश्टों का निरीच्षन कर रहे हैं
07:52ताकि वह मार्ग से भटक न जाए।
07:55शूद्र बालक अपनी छोटी-छोटी हतेलियों से प्रिथवी की कठोर मिट्टी को छूता है और एक अध्भुत शान्ती उस पूरे
08:04दरिद्र परिवेश में फैलने लगती है।
08:07अंधकार गहरा है और भूख की ज्वालाएं उस बालक की परीक्षा ले रही हैं पर उसकी आत्मा में ब्रहमांड के
08:15वेदों की ध्वनी का एक सुक्षम स्पंदन अभी भी जीवित है।
08:20संसार की दृष्टी में वह केवल एक शूद्र का बालक है। किन्तु काल के पटल पर उसका यह जीवन एक
08:27महान देवर्शी की तपस्या का नया अध्याय लिख रहा है।
08:32भगवान विश्णु का सुक्षम अंश उस बालक के हृदय में निवास कर उसे सांसारिक दुखों के थपेडों से सुरक्षित रख
08:40रहा है।
08:42बालक को भूख की पीडा हो रही है लेकिन वह रोता नहीं मानो वह अपनी अंतरात्मा में किसी मंत्र का
08:49जाब कर रहा हो।
08:51इस शूद्र योनी की कठोर मर्यादाए नारत के अहंकार को चून करने वाली हैं जो उनके पतन का मूलकारण बनी
08:59थी।
09:00गाउं की सरहदों पर लगे पुराने पत्थरों की दीवारें इस बात की साक्षी हैं कि यहां रहने वाला बालक कोई
09:07साधारन मानव नहीं बलकी एक दिव्य आत्मा है।
09:12भगवान शिव अपनी समाधी में स्थिर हैं और उनकी तीसरी आख से निकला एक सुक्षम प्रकाश पुंज उस बालक की
09:20रक्षा कर रहा है।
09:22बालक की उंगलिया उस मिट्टी की दीवार पर अंजाने में ही हरी के नाम की आकृतिया उकेरने लगती हैं।
09:31अंधेरी रातों में जब सारी स्रिष्टी सोती है तब उस बालक की आत्मा और परमात्मा के बीच एक मौन समवाद
09:39की नीम रखी जाती है।
09:42दरिद्रता की काली छायाओं के बीच बालक के मस्तक पर एक दिव्य आभा मंदरा रही है जो केवल धर्मग्यों को
09:49ही दिखाई देती है।
09:52परमात्मा ने जिस खेल को रचा है वह एक शूदर के घर की दिवारों के भीतर से आरंभ होकर ब्रहमांड
09:59की सीमाओं तक पहुँचेगा।
10:02बालक अब अपने आसपास के दुखों को सहते हुए उन दुखों के पीछे छिपे सत्य को ढूंडने का पहला सार्थक
10:09प्रयास कर रहा है।
10:12देवर्शी का यह शूदर जन्म उनके लिए एक कारागार नहीं बलकि वह तपोभूमी है जहां से वे पुनह भक्ती के
10:20शिखर तक पहुचने की यात्रा आरंभ करेंगे।
10:24माया की सघन परतों ने नारत की चेतना को पूरी तरह से ढख लिया है और वे अब अपने शूदर
10:30जन्म के निर्धन आवास की चारदीवारी में बंध होकर रह गए हैं।
10:36विष्णु लोक के वैभव से दूर भगवान विष्णु मंद मुस्कान के साथ उस दृष्य को देख रहे हैं जहां उनके
10:43परम भक्त अब कर्मों की श्रिंखला में बंधे हैं।
10:48बालक नारद अपनी मा के आंचल के पास दुबग कर उस भूख और अभाव को महसूस कर रहे हैं जो
10:55एक शूदर के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।
10:59अंधकार का सामराज्य अपने विस्तार के साथ उस कुटीर को घेरे हुए है जैसे स्वय माया बालक के ज्ञान के
11:07दीप को बुझाने का प्रयास कर रही हो।
11:10विस्तरत ग्रामेन परिवेश में जहां भाग्य की रेखाएं कठिन परिश्रम और सामाजिक सीमाओं से लिखी जाती हैं नारत का छोटा
11:19सा जीवन एक ननहे बीज की भांती संधर्श कर रहा है।
11:24परमात्मा की आग्या से देवगण भी इस लीला के मूख दर्शक बने हैं जानते हुए कि यह कष्ठ ही उन्हे
11:31भविश्य का महान भक्त बनाएगा।
11:34नारत की मा अपने ननहे बालक को शांत करने के लिए एक फटे हुए वस्त्र को बुन रही हैं।
11:40उनके चहरे पर गरीबी के निशान लेकिन वातसले की चमक स्पष्ठ है।
11:46समय का पहिया अपनी गती से आगे बढ़ रहा है, जबकि बालक की स्मृतियों का भंडार गहरी नींद में सो
11:53गया है।
11:55उस शूद्र कुटीर की तूटी हुई दीवारें जैसे इस बात की गवाह हैं कि यहां एक ऐसा जीवन पल रहा
12:02है जो समस्त ब्रहमांड को भक्ती का मार्ग दिखाएगा।
12:07ब्रहमा जी की दृष्टी में नारत का यह शूद्र रूप एक तपस्या है, जो उन्हें अहंकार के उस तर से
12:14नीचे ले आई है, जहां से भक्ती का उदे संभव है।
12:19बालक अब खेलते-खेलते अपने हाथों से मिक्टी में एक दिव्य आकरिती बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका आभास
12:27उसे स्वय भी नहीं है।
12:30अद्रिश शक्तिया इस शूद्र बस्ती के चारों और एक सुरक्षा घेरा बनाए हुए हैं, ताकि काल की गती में यह
12:37ननहा जीव सुरक्षित रहे।
12:40दूर कहीं वायू में नारद के पूर्व जन्म के गंधर्व संगीत की एक हलकी सी गूंच तैर रही है, जिसे
12:47बालक अंजाने में महसूस कर अपनी आखे मूद लेता है।
12:52भगवान विश्णु का दिव्य संकेप मिलता है, और माता की ममता अपने बालक की उस बेचैनी को समझ कर उसे
13:00अपने हृदय से लगा लेती है।
13:03मिट्टी और धूल से सना हुआ वह बालक अब नींद की आगोश में है, जबकि उसकी आत्मा अपनी असली पहचान
13:11को पुनह प्राप्थ करने के लिए प्रतीक्षा कर रही है।
13:16ब्रहमांड की शांती के पीछे छिपा यह संधर्ष किसी को ग्यात नहीं, यह केवल वही जानता है जिसने स्रिष्टी की
13:23रचना की है।
13:26अगले ही दिन नारद का सामान्य जीवन अपनी चुनोतियों के साथ पुनह प्रारंभ होता है, जहां उन्हें अब जीवित रहने
13:34के लिए संधर्ष करना है।
13:37गरुर देव की उडान का एक अंश उस आकाश को छू लेता है, जैसे भगवान का संधेश हो की वे
13:44नारद से दूर नहीं है।
13:47शूद्र योनी का कठोर अनुशासन अब बालक की दिंचर्या का हिस्सा बन रहा है, जो धीरे-धीरे उसे कठोर परिस्थितियों
13:55में भी अडिग रहना सिखा रहा है।
13:58भक्ती का वह बीज जो इस कठिन भूमी में बोया गया है, अब धीरे-धीरे अपनी जड़ें गहराई तक पहुचा
14:05रहा है, जहां से एक महापुरुष का उदे होगा।
14:09प्राचीन भारत की धूल भरी गलियों में, शूद्र बालक के रूप में नारत का दैनंदिन संधर्ष उसक्रूर वास्तविक्ता को दर्शाता
14:18है, जहां सम्मान केवल जन्म और कर्म के बंधनों से तय होता है।
14:23वैकुंट के स्वर्ण कमलों पर विराजमान भगवान विश्नु अपनी सूक्षम द्रिश्टी से अपने भक्त की इस व्यथा को देखते हुए
14:31मंद मुस्कान के साथ करुणा और लीला का संतुलन साध रहे हैं।
14:37नारद का ननहा हाथ जब भारी पत्थरों को उठाने के लिए कापता है तो वे अपनी पूर्व स्मृतियों के बोच
14:45तले दबकर इश्वर के नाम का ही एक मात्र सहारा ढूंडते हैं।
14:50सूर्य की प्रखर किरने जैसे इस नश्वर लोग की कुरूरता को दर्शाती हैं, जो एक दिव्य आत्मा के लिए भी
14:58कठोर परीच्षा का केंद्र बनी हुई है।
15:02समाज के उच्च वर्ग के लोग अपनी श्रेश्थता का दंभ भर कर बालक के समीप आने पर भी घ्रेना और
15:08तिरसकार की द्रिश्टी डालते हैं।
15:12गरुर देव उपर आकाश में एक मौन रक्षक की भाती मंदराते हैं, मानों वे जानते हों कि यह अपमान ही
15:19नारत की आगामी भक्ती की नीम्व बनने वाला है।
15:24बालक नारत का एक मात्र सात्विक आहार अब उस समाज का बचा हुआ टुकड़ा है, जो उसके आत्म सम्मान को
15:31नहीं बलकी उसकी सहनशीलता को और अधिक प्रबल बना रहा है।
15:37अस्थ होता सूर्य इस बात का प्रतीक है कि प्रत्येक रात्री के बाद एक दिव्य प्रकाश का उदे निश्चित है,
15:44चाहे वह शूद्र योनी का अंधकार ही क्यों न हो।
15:48कुटीर के भीतर नारद अपनी आखें बंद करके उस परमेश्वर का स्मरण करते हैं, जिन्हें वे गंधर्व सभा की चकाचोंध
15:56में कभी ठीक से पहचान न पाए थे।
16:00भगवान शिव कैलाश के एकांत में समाधिस्थ होकर इस शूद्र बालक के हृदय में उठने वाली भक्ती की अगनी को
16:08साक्षात अनुभव कर रहे हैं।
16:11बाहर की दुनिया में उसके सहकर्मी उसके श्रम को मामूली समझ कर उसकी खामोशी का मजाक उडाते हैं, पर नारत
16:19के मुख पर एक दिवेशान्ती है।
16:22शूद्र योनी का अनुशासन नारत को सिखा रहा है कि सत्य की प्राप्ती विलासिता में नहीं, बलकी स्वयन के अंकार
16:30के विसरजन में नहित है।
16:33रात के सन्नाटे में नारत का मन उस अलौकिक संगीत की खोज करता है, जो उनके अंतस में कहीं गुंचता
16:41हुआ प्रतीत होता है।
16:43गरुर के पंकों की फड़फडाहट से आकाश में कमपन होता है। मानुस्वर्ग का द्वार बालक के द्रिड संकल्प को प्रणाम
16:51कर रहा हो।
16:53अगले दिन भोर में बालक नारत को भारी बोजह उठाने का निर्देश मिलता है, जो उसके शरीर को ठकाने के
17:00लिए परियाप्त है, पर उसकी आत्मा को नहीं।
17:05शारिरिक ठकान के चरमक्षण में भी नारत के मुख से नारायन का नाम अनायास ही उच्चारित होता है, जिससे आसपास
17:13की वायू में एक नई स्पूर्ती का संचार होता है।
17:17समाज के संकीयन विचार वाले लोग उस दिव्यकंपन को महसूस नहीं कर पाते, वे मात्र अपनी इर्श्या की अगनी में
17:25जलते रह जाते हैं।
17:28ब्रहमांड के रचिता ब्रहमा की यह लीला अब अपने अगले चरण की ओर बढ़ रही है, जहां एक शूदर का
17:35साधारन जीवन एक असाधारन इतिहास लिखेगा।
17:40नारद का संधर्ष अब केवल उत्तर जीविता नहीं, बलकि परमात्मा से पुना जुरने की एक कठिन तपस्या बन चुका है।
17:49इस शूदर योनी के अंधकार में ही अब वह भक्ती का बीज अंकुरित हो रहा है, जो आगे चलकर तीनों
17:56लोकों को प्रकाशित करने वाला है।
18:00मित्योलोक की विद्रूपताओं के बीच शूदर योनी में जन्मा नारत कठोर श्रम और अभावों के साथ अपना जीवन व्यतीत करने
18:08लगा है।
18:10शीर सागर के दिव्यतत पर विराजमान भगवान विश्नु अपनी योगमाया से इस तुछ जीव के भीतर छिपे परम तत्व को
18:18देख मुस्कुरा रहे हैं।
18:20दिन भर की थकान के उपरांत वह शूदर बालक अपनी कुटिया के कोने में बैठकर अंजाने में ही हरी नाम
18:28का गुनगुनाना शुरू कर देता है।
18:31अंधकार से भरी उस कुटिया के उपर ब्रहमांडिय उर्जा एक स्वर्ण आभा बनकर मंडराने लगती है।
18:38मानो परमात्मा ने उसे अपना आशिर्वात दिया हो।
18:42उसके चारों और फैला हुआ समाज उसे तुछ मानता है, किन्तु उसके हृदय में पल रही शांती अब एक दिव्य
18:50संगीत की भांती प्रतिध्वनित होने लगी है।
18:53भगवान शिव अपनी समाधी में स्थित होकर इस परिवर्टन को अनुभव करते हैं और मंद मुस्कान के साथ अपने त्रिशूल
19:02को धीमे से स्पर्ष करते हैं।
19:05कठिन परिस्थितियों के बावजूद वह बालक नदी तट पर बैठ अपनी वेधना को परमात्मा के चर्णों में समर्पित कर देता
19:13है।
19:15शून्य में खोया हुआ वहमन अब धीरे-धीरे अपनी पूर्व स्मृती के धुंधले प्रकाश को खोजने का प्रयास कर रहा
19:22है।
19:24उसके चारों ओर के वातावर्ण में जैसे एक अध्भुत सुगंध फैल गई है जो उसके शूद्र जीवन की कठोर्ता को
19:32कोमलता में बदर रही है।
19:34गरुर जी आकाश में पंक फैलाए उस बालक की रक्षा में ततपर हैं जो पर्मात्मा की इच्छा का एक सुक्ष्म
19:42माध्यम बन चुका है।
19:44जंगल की ओर जाते हुए उसे प्रकृती के कणकण में वही गंधर्व सभा की स्मृतिया एक मीठे स्वपन की तरह
19:52सुनाई देती हैं।
19:55जीवन की इस भूल भुलिया में वह अकेला नहीं है, अद्रिश शक्तिया उसके हर कदम पर एक सुरक्षा कवच बना
20:03रही हैं।
20:05वह शूद्र बालक अंजाने में ही किसी प्राचीन मंदिर के अवशेशों के सामने आकर नत्मस्तक हो जाता है, जहां एक
20:13अंजानी शक्ति उसे बुला रही है।
20:17भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा को त्याग कर उस मंदिर की और एक द्रिश्टि पात करते हैं, जिससे पत्थर की
20:24मूर्तिया भी मानो जागरित हो उठती हैं।
20:28मंदिर के भीतर वह बालक पत्थर के शिवलिंग के समक्ष बैठ जाता है और उसकी आखों से भक्ति के अश्रु
20:35झरने लगते हैं।
20:37उसके आसूँ की प्रत्येक बूंद मानो उस स्थान को पवित्र कर रही है, जहां वर्षों से कोई भक्त नहीं आया
20:45था।
20:46अब उसका मन केवल भौतिकता में नहीं, बलकि उस अनन्त सत्य की खोज में तल्लीन हो गया है, जिसे उसने
20:53गंधर्व लोक में त्याग दिया था।
20:57आकाश से उतरती हुई शीतल हवाएं उसके कश्टों को धीरे-धीरे मिटा रही हैं, जैसे कोई देवी मा अपने पुत्र
21:04को गोद में ले रही हो।
21:07साधारन शूद्र वेश में छिपे उस महापुरुष का स्वरूप अब धीरे-धीरे अपनी खोई हुई दिवेकान्ती को पुनह प्राप्त करने
21:15लगा है।
21:17यह संधर्श ही उसकी विजय की नीम है, जहां अब एक शूद्र का शरीर एक परम भक्त के हृदय को
21:23धारन करने के लिए तैयार हो चुका है।
21:27निर्जन वन की गोद में बिखरी हुई धुन्धली शाम के बीच, एक बालक अपनी सुधबुत खोए हुए अंजाने पत पर
21:34धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।
21:38दूर एक कुटिया के पास से आती हुई मृदं की मधुर ध्वनी और संतों का कीर्तन गूझने लगता है, जो
21:45बालक के कानों में एक दिव्यमंत्र की तरह प्रवेश करता है।
21:50संतों के मंडली के भीतर से उठती हुई हरिनाम की गूंज उस बालक के हृदय में एक सोई हुई चेतना
21:57की चिंगारी को फिर से प्रजवलित कर देती है।
22:01समय मानो सहसा थमसा गया है और वातावर्ण में एक अलौकिक सुगंध घुल गई है जो उस शूदर वेशधारी बालक
22:09की आखों में आसु भर देती है।
22:13बालक अब अपने पैरों को उस पवित्र ध्वनी की ओर खींचता हुआ ले जा रहा है, जैसे कोई भटका हुआ
22:20जलकन सागर के मिलन की प्रतीक्षा कर रहा हो।
22:24संतों की सभा में बैठे उन महापुरुशों का तेज बालक की खोई हुई स्मृती के पन्नों को एक एक करके
22:31पलटने लगा है।
22:33जैसे ही बालक उस मंडली के समीप पहुचता है, उसके शरीर में एक विद्युप तरंगसी दौड जाती है, जो उसके
22:41शूद्र जीवन के कश्टों को क्शन भर के लिए मिटा देती है।
22:46प्रकृती भी इस दुलब मिलन की साक्षी बन, अपने व्रिक्षों की शाखाओं को जुका कर मानों उस बालक को अभिनंदन
22:53प्रदान कर रही है।
22:56बालक स्तब्ध खड़ा है, क्योंकि वह उन संतों के मुख से निकले हर शब्द को अपने पूर्व जन्म की गूंच
23:03के समान सुन रहा है।
23:06मुख्य संत अपनी आखें खोलते हैं और उनकी करुणामई द्रिष्टी सीधे बालक की अंतरात्मा को भेद कर उसके मर्म को
23:14चूजाती है।
23:16संतों की सेवा में तत पर वह बालक अंजाने में ही उस मर्यादा और भक्ती के मार्ग पर फिर से
23:22अग्रसर हो रहा है, जिसे वह बहुत पहले छोड़ चुका था।
23:28यह वहक्षण है जहां मृत्यु लोग का अंधकार अब एक परम प्रकाश में परिवर्तित होने की आहट दे रहा है।
23:36संतों की कीर्टन की लए अब और भी तीवर हो गई है, जैसे किसी खोए हुए पथिक का घर आने
23:43पर स्वागत किया जा रहा हो।
23:45इश्वरिय कृपा की पहली किरण बालत के मस्तत पर पड़ रही है, जो उसकी शूद्र देह की सीमा को तोड
23:52रही है।
23:54वह हाथ जोड कर बैठ जाता है, और उसके कंट से स्वतही वेस्तुतिया निकलने लगती है, जो उसके हृदय के
24:02गुप्त कोश में सुरक्षित थी।
24:05आकाश से उतरती हुई शीतल उर्जा संतों की कुटिया को एक दिव्य लोक में बदल रही है, जहां द्वैत का
24:12कोई स्थान शेश नहीं है।
24:15संतगण अब एक स्वर में गा रहे हैं, और उनके संगीत की शक्ती से बालक के मस्तिश्क का भ्रम धीरे
24:22धीरे उजल हो रहा है।
24:24यह बालक अब केवल एक शूद्र नहीं, अपितु भक्ती के उस उच्छ शिखर पर चड़ने की तयारी कर चुका है,
24:32जिसे देवर्शी भी अपना आदर्श मानते हैं।
24:37कीर्टन की पूर्णता के साथ ही वन में एक गेहन सन्नाटा चा जाता है, जो आने वाले किसी बड़े परिवर्टन
24:44का संकेत दे रहा है।
24:47सत्संग की वह पहली किरण ने बालक के अंधकार्मय जीवन को अर्थ दे दिया है, और अब उसकी यात्रा का
24:54नया अध्याय आरंभ होता है।
24:57प्राचीन वटवरिक्ष की शीतल चाया में बालक अपने भीतर छिपे शूद्र संसकारों के बंधनों को तोड़ कर संतों की भक्ती
25:05की और प्रथम चरण बढ़ाता है।
25:08वैकुंट के स्वर्ण सिनहासन पर विराजे भगवान विश्नु अपने भक्त की इस अटूट निष्ठा को देख मंद मुस्कान के साथ
25:16गरूर को संकेत देते हैं।
25:20बालक अब बिना किसी संकोच के संतों के चरणों में बैठ कर उनके मुख से निकलने वाले हरिनाम के अमरित
25:26का पान करने लगा है।
25:29संसार की मर्यादाएं एक धुन्ध की तरहे पीछे चूट रही हैं और भक्ती का प्रकाश बालक के मुख पर एक
25:36दिव्य आभा को जन्द दे रहा है।
25:40समाज के उच्चवर्ग के लोग उस बालक को संतों के साथ देखकर अपनी कुटिल द्रिष्टी से उसका उपहास करने के
25:47लिए एकत्रत हो रहे हैं।
25:51गरूर भगवान विश्णों की आध्या पाकर सुख्ष्म रूप में उस स्थान की रक्षा करने के लिए बायुमंडल में अद्रिष्य होकर
25:58विचर्ण करते हैं।
26:01बालक अपने तुछ काम छोड़ कर भक्ती के कीर्टन में मगन हो जाता है, जिससे उसके हृदय का शूद्रहंकार पूनतह
26:09समाप्थ हो रहा है।
26:12प्रकृती भी मानो उस बालक की भक्ती में सम्मिलित हो गई है, व्रिक्ष अपनी शाखाएं जुका कर उस पर छाया
26:19कर रहे हैं।
26:21गाओं के अहंकारी लोगों ने उसे संतों की सेवा करने से रोकने का निश्चय किया है, उनके मन में इरश्या
26:28की ज्वाला देहक रही है।
26:31भगवान विश्णु अपनी योगमाया से उस बालक के चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्मान कर देते हैं, ताकि कोई
26:39उसे विचलित न कर सके।
26:41बालक को अब समाज के नियमों का कोई भय नहीं है, क्योंकि उसे साक्षात परमाक्मा की छत्रचाया का अनुभव होने
26:49लगा है।
26:51सन्नाटा इतना गहन है कि बालक के हरिदय की धड़कने भी हरिनाम की गूंच के साथ एक लए में धड़क
26:58रही हैं।
27:00आमकारी ग्रामेन बालक के पास पहुँचने का साहस्तो करते हैं, परंतु एक अद्रिश बल उन्हें बार-बार पीछे धकेल देता
27:08है।
27:10वैकुंठ में स्थित गरूर अपनी तीक्षन द्रिश्टी से नीचे घट रही प्रत्येक घटना पर नजर रखे हुए हैं, ताकि उनके
27:18स्वामी का भक्त सुरक्षित रहे।
27:21बालक ने अपनी शूद्र योनी के समस्त संसकारों का त्याग करके अब केवल संतों की सेवा को ही अपना एक
27:28मात्र कर्तव्य मान लिया है।
27:31समय मानो थमसा गया है और वातावर्ण में एक अलौकिक सुगंध प्रवाहित हो रही है जो संतों की उपस्थिती का
27:39प्रमाण है
27:42ग्रामीनों का अहंकार अब दर में परिवर्तित हो रहा है क्योंकि वे बालक के व्यक्तित में एक अपूर्व दैविय शान्ती
27:49देख रही है
28:02बालक अब पूर्ण रूप से भक्ती के रंग में रंग चुका है और उसका पुराना व्यक्तित्व शूदर की मर्यादाओं से
28:09मुक्त हो चुका है
28:11यह संघर्ष का अंत नहीं अपितु उस यात्रा का आरंभ है जहां मृत्यु लोग का शूदर देवर्शी नारत के मार्ग
28:19पर अग्रसर होने के लिए तयार है
28:22धोल और मिक्टी से सने उस वन के शांत वातावर्ण में बालक ने अपने चारों और व्याप्त निर्जनता में एकांत
28:30का पहला स्पर्श अनुभव किया
28:33भगवान विश्णु अपनी अनंत शया पर मुस्कुराते हुए उस बालक के भीतर जागरित हो रही भक्ती की अगनी को निहार
28:41रहे हैं
28:43बालक ने अपनी आखों को मूद लिया और संसार की नश्वर्ता का विचार उसके मन में एक लेहर की भाती
28:50उठने लगा
28:52उसकी आत्मा में वैराग्य की एक सुक्ष्म चिंगारी प्रजवलित हुई जो सांसारिक मोह के काले बादलों को चीरने के लिए
29:00परियाप्त थी
29:02वन की विशाल व्रिश रिंख लाएं गवाह बनी जब बालक ने अपनी शूदर अवस्था के कर्तवियों को धर्म की सेवा
29:09में समर्पित करने का संकल्प लिया
29:12आकाश से उतरती हुई नीली आभा में देवर्शी नारद के पूर्वस्मरण की एक जलक ने बालक को स्तब्ध कर दिया
29:21वह मिट्टी के धेरों पर बैठे हुए उन बंधनों को महसूस कर रहा था जो उसे केवल शरीर तक सीमित
29:28रखने का प्रयास करते थे
29:30समय जैसे ठहर गया और प्रकृती की प्रत्येक ध्वनी बालक के भीतर भक्ती के संगीट में परिवर्तित हो गई
29:39शूद्र योनी की कठोर मर्यादाएं अब उसे एक स्वर्ण पिंजरे के समान प्रतीत होने लगी जिसे तोड़कर वह परमात्मा की
29:47ओर दोड़ना चाहता था
29:50भगवान विष्णू के पार्षदों ने दिव्य प्रकाश का एक स्थम्भ उसके चारों और स्थापित किया ताकि बालक का ध्यान विचलित
29:58न हो
29:59बालक ने उठकर अपने नंगे पैरों से उस वन की धूल को छुआ और अनुभव किया कि वह स्वयं प्रित्वी
30:06के साथ एकाकार हो चुका है
30:10वैराग्य का ज्वार उसके हरिदय में उमड पड़ा और उसने संसार की उन सभी वस्तूओं को त्यागने का निर्ने लिया
30:17जो उसे विलासिता से जोडती थी
30:20वह अब केवल एक शूद्र बालक नहीं अपितु भक्ती के मार्ग का एक अनन्य पथिक बनने की ओर अग्रसर था
30:29ब्रह्मा की रचना के इस विशाल चक्र में उसने अपनी शूद्र पहचान को परमात्मा के चर्णों में समर्पित कर दिया
30:36था
30:38जहां लोग अपनी मर्यादाओं से डरते थे वहाँ वह बालक अपनी सीमाओं को लांगने का साहस जुटा रहा था
30:46वैराग्य का अर्थ उसके लिए अब किसी आश्रम का त्याग नहीं बलकि संसार में रहकर भी संसार से मुक्ठ हो
30:53जाना था
30:55उस वन छेत्र की शान्ती में अब कोई अंधकार नहीं बचा था क्योंकि बालक के हृदय का प्रकाश ही सब
31:02कुछ रोशन कर रहा था
31:05देवता भी अब उस बालक के तप और संधर्ष को विस्मय की द्रिष्टी से देख रहे थे क्योंकि शूदर योनी
31:12में यह वैराग्य असाधारन था
31:15नारत का वह अंश अब अपनी पुरानी स्मृतियों के बोज को त्याग कर भविश्य की दिव्यता को स्विकार करने के
31:22लिए तैयार हो गया था
31:24मृत्यो लोग का यह शूदर अब उन उचाईयों को चूने वाला था जहां पहुँचकर काल भी अपनी गती धीमी कर
31:31लेता है
31:33बालक ने अपनी जोपरी के बाहर बैठ कर मृत्यो लोग की कठोर धरा को स्पर्श किया और भक्ती के बीज
31:40को अपने हृदय में रोपित करने का निर्णै लिया
31:44बैकुंट के स्वर्ण महलों से भगवान श्री विश्णू ने अपने पार्षद के इस संकल्प को देखा और मुस्कुराते हुए अपनी
31:52स्विकृती प्रदान की
31:54बालक ने अपने ननहे हाथों से मिक्टी के शिवलिंग का निर्मान किया ताकि वह अपने आराध्य के प्रती समर्पन को
32:02स्थायत्व प्रदान कर सके
32:05उसके चारों और की हवा में एक अद्रिश्य उर्जा का प्रवाह होने लगा जो धीरे धीरे उसकी साधना को दिव्यता
32:12की सुगंध से भर रही थी
32:15देवर्शी नारध का वह अंश अब अपनी पुरानी पहचान की बेडियों को तोड़ कर क्रिश्न नाम के महामंत्र में पूरी
32:22तरह विलीन होने का प्रयास कर रहा था
32:25उसकी आत्मा के भीतर छिपे हुए पूर्व जन्म के संसकार अब एक एक करके जागरित हो रहे थे जो उसे
32:33एक असाधारन पथ पर ले जाने वाले थे
32:36तभी वातावर्ण में एक दिव्य संगीत की गूंच सुनाई दी मानो स्वया आकाश बालक के तपका अभिनंदन कर रहा हो
32:46नारद का वह बाल रूप अब साधारन संसार की तुच्छताओं से उपर उठकर परम सत्य की खोज में एक योगी
32:53की भांती अडिक खड़ा था
33:05की चमक और अधिक तीवर हो गई क्योंकि उन्हें ग्यात था कि यह बालक काल के चक्र को बदलने की
33:12सामर्थ्य रखता है
33:15कैलाश के शिखरों पर जमी हुई बर्फ भी अब बालक के तप के ताप से पिघल कर गंगा की पावन
33:21धारा के समान प्रवाहित होने लगी थी
33:24यह बालक अब शूद्र के वेश में रहकर भी देवतुल्य आचर्ण के प्रती अपनी अटूट निष्ठा का परिचय दे रहा
33:31था
33:33भक्ती का वह बीज जो उसने बोया था अब अंकुरित होकर एक विशाल वट्वरिक्ष की तरह उसके पूरे अस्तित्व को
33:40दिव्य आनन से ढखने लगा था
33:43भग्वान विश्णू ने गरूर को संकेत दिया ताकि वे इस बालक की रक्षा के लिए अपनी द्रिष्टी सदैव उस पर
33:51बनाये रखें
33:53गरूर के पंखों की फड़फडाहट ने मृत्यू लोग की अशुद्ध वायु को शुद्ध कर दिया और वहां एक नए युग
33:59का उदे हुआ
34:01बालक अब हर पल केवल कृष्ण के नाम का स्मरण करता और संसार की हर वस्तु में उसे भगवान का
34:08ही रूप देखता था
34:11नारद का यह कठोर संधर्ष अब एक महाकाव्य की भूमी का तयार कर चुका था जिसे इतिहास के प्रिष्ठों में
34:18स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना था
34:21देवता भी अब विस्मय से भरे हुए थे कि कैसे एक सामान्य बालक के हरिदय में ब्रह्मांड की समस्थ भक्ती
34:28समाहित हो सकती है
34:31अंत्य बालक ने अपनी आखों को खोला और उसमें एक ऐसी दिव्य द्रिष्टी थी जो मृत्य लोग के अंधेरे को
34:38चीरने में समर्थ थी
34:41उसका संकल्प पूर्ण हुआ और उसने एक नई दिव्य यात्रा की गोर अपने पहले कदम को विश्वास के साथ बढ़ाया
34:48झाल