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  • 23 minutes ago
Witness the grand opening of Season 7 of our mythological series as we delve into the profound depths of the Skanda Purana. In this episode, we explore the divine birth and purpose of Lord Skanda (Kartikeya), the cosmic tensions in the heavens, and the absolute beginning of the sacred Khanda. Subscribe for more cinematic mythological journeys through ancient Hindu scriptures.
Transcript
00:00स्वर्ग के उंचे आकाश में एक गहरा और भारी सन्नाटा चाया हुआ है, मानो संपून ब्रहमांड किसी अग्रिश्य प्रलै की
00:08प्रतीच्षा कर रहा हो
00:10देवलोग के सिनहासन आज वीरान और चिंतित नजर आ रही हैं, जहां देवताओं की सांसों में भी तारकासुर के आतंक
00:18का भय समाया हुआ है
00:21तारकासुर के असह्य अत्याचारों से त्रस्थ होकर अंतरिक्ष के कोने-कोने से केवल देवताओं की सिस्किया और ब्रहमांडिय विलाप ही
00:29सुनाई दे रहे हैं
00:32यह वह गंभीर वेला है जहां साधारण अस्त्र और देवताओं के प्रयास उस महासुर के सामने पूरी तरहे पंगु साबित
00:40हो चुके हैं
00:42स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णु भी इस गहरी संकट की घड़ी में गंभीर मुद्रा में अपने दिव्य शंक और चक्र
00:50के साथ विचारमगन हैं
00:53भगवान विश्णु अपने शांत किन्तु अडिक स्वरूप में प्रैलोक्य के इस सबसे बड़े और लाइलाज संकट का समाधान धूंडने में
01:01लीन हैं
01:03उनके चारों और मंदराते दिव्य संदेशवाहक और रिशिगन इस महामौन के तूटने की प्रतीक्षा में अपनी आखें बंद किये हुए
01:12हैं
01:13यह सन्नाटा केवल शांती का प्रतीक नहीं बलकि उस भयानक तूफान से पहले की खामोशी है जो ब्रहमांड की नीम
01:22भिला देगा
01:24स्वर्ग के सिनहासन पर बैठे इंद्र देव का मुकुट भी इस अद्रिश्य भय के भार से काम प्रहा है और
01:30उनकी द्रिश्टी शूने में टिकी है
01:34देवराज इंद्र के नेत्रों में पराजय की वह पीडा साफ ज़लक रही है जिसे उन्होंने अपने इंद्रधनुशी इतिहास में कभी
01:42नहीं देखा था
01:44तारकासुर के वर्दानों की अटूट दीवार के आगे देवताओं के सभी अस्त्रशस्त्र केवल चमकीन खिलोने बन कर रह गए हैं
01:53आकाश गंदा के तारे भी अपनी चमक खोते जा रहे हैं मानो वे इस ब्रहमांडिय त्रास्दी के गवाह बनने से
02:01डर रहे हूं
02:03समुचे ब्रहमांड में एक ही प्रश्नगूज रहा है क्या इस अजे असुर का वध करने वाला कोई सेनाप्ती कभी प्रकट
02:10हो पाएगा
02:12देवर्शी नारद वीना के तारों पर अपनी उंगलिया थामे हुए इसी रहस्यमय और अद्रिश्य भविश्य की ओर देख रहे हैं
02:22वीना से निकलने वाला हर एक स्वर इस समय केवल करुना, वेधना और एक नए उद्धार करता की पुकार बन
02:29चुका है
02:31यह खामोशी इस बात की गवाही दे रही है कि साधारन शक्तियों का युग समाप्त हो चुका है और अब
02:38किसी दिव्य महाशक्ती के अवतरण का समय है
02:43ब्रहमांड के सभी रिशिमुनी और देवता अपनी आखे बंद करके केवल उस आदी शक्ती और महादेव के ध्यान में लीन
02:51है
02:52कैलाश की इन बरफीली और पवित्र वादियों में भी अब एक अनोखी और तेज उर्जा का संचार होने लगा है
03:01हवाओं की गती तेज हो रही है और परवतों की चट्टाने भी इस महा प्रिवर्तन के कमपन को महसूस करने
03:08लगी है
03:10यह उस अध्भुत आंधी का संकेत है जो तारकासुर के सामराज्य को जड़ से उखाड फैंकने के लिए बस प्रकट
03:18होने ही वाली है
03:20बर्फ से ढकी पवित्रवादियों को चीरते हुए महर्शी नारद वीना की गूंच के साथ सीधे त्रिमूर्ती के दिव्य दर्बार में
03:28प्रकट होते हैं
03:31भगवान विश्णु अपने अनंत शंक और गदा के साथ स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान होकर नारद जी के इस अचानक आगमन
03:39का स्वागत करते हैं
03:42नारद जी की उंगलियों ने जैसे ही वीना के तारों को छुआ, ब्रहमांड के कोने-कोने में तारकासुर के अत्याचारों
03:50की गूंच सुनाई देने लगी
03:52यह वहक्षन था जब कैलास की शान्त हवाओं में भी असुर राज के बढ़ते हुए आतंत की भयानक छाया मंदराने
04:00लगी
04:02देवर्शी नारद ने गंभीर स्वर में तीनों लोकों की दुर्धशा का वर्णन करते हुए बताया कि कैसे तारकासुर ने अमर्ता
04:09का वर्दान पाकर त्रैलोक्य को जीत लिया है
04:14विश्नु भगवान ने अपनी कमल जैसी आँखों को सिकोरते हुए तारकासुर के उस घमंड पर गहरी चिंता व्यक्त की जो
04:21उसने देवताओं को परास्त करके प्राप्त किया था
04:25नारत जी के शब्दों की तीवर्ता इतनी अधिक थी कि पास खड़ी बरफीली चट्टाने भी इस महाभयंकर संकट के सत्य
04:33से काम उठीन
04:35यह उस अद्रिश्य और घातक तूफान का प्रतीक था जो देवताओं के सिनहासन को जड़ से उखाड फैंकने के लिए
04:43आगे बढ़ रहा था
04:45ब्रहमा जी अपने चार मुखों से वेदों का पाठ रोक कर इस आसन्न संकट के समाधान पर गंभीर विचार करने
04:53लगे
04:54स्रिष्टी के रचिता के चारों मुखों पर चिन्ता की रेखाएं यह स्पष्ट कर रही थी कि तारकासुर का वर्दान ब्रहमांड
05:02के लिए अभिशाप बन चुका है
05:05ब्रहमा जी के हाथों में पकड़े पवित्र वेद पत्रे इस भयंकर भविश्य की चेताबनी देते हुए स्वतही कामपने लगे
05:14यह द्रिश इस बात का गवाह था कि विधी का विधान भी अब तारकासुर की क्रूरता के आगे असहाय महसूस
05:21कर रहा था
05:23नारत जी ने त्रिमूर्ती को याद दिलाया की केवल और केवल भगवान शिव की असीम उर्जा ही इस असूर का
05:30अंत कर सकती है
05:33भगवान विश्णु ने गंभीर मुद्रा में सिरहिलाते हुए नारत जी की बात का समर्थन किया और शिव की शक्ती को
05:40जगाने पर बल दिया
05:43नारत जी की वीना से उठी एक अंतिम और अत्यंत तीवरस्वर लेहर ने सीधे उस स्थान को कम्पित कर दिया
05:50जहां शिव ध्यानमगन थे
05:53यह वह निरनायक पल था जब ब्रह्मांड के सबसे बड़े संहारक की नींद को तोरने की योजना को अंतिम रूप
06:00दिया जा रहा था
06:02कैलास के उचे शिखरों पर जमी बर्फ अब धीरे धीरे पिघलने लगी थी क्योंकि महादेव की चेतना में हलकी सी
06:09हलचल होने लगी थी
06:12नारत जी और त्रिमूर्ती के बीच हुआ यह समवाद ब्रह्मांड के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोर साबित होने जा रहा
06:19था
06:21हवाओं का वेग और अधिक तीवर हो गया मानो पूरी प्रकृती भगवान शिव के नेत्र खुलने की प्रतीक्षा कर रही
06:28हो
06:29अब वह महान वेला आचुकी थी जब तारकासुर के सामराज्यका नाश करने के लिए उस दिव्य चिंगारी को प्रकट होना
06:37ही था
06:38हिम्वती शिखरों की शीतलता के बीच देवी पार्वती ने अपने सुकुमार चर्णों से उस पवित्र भूमी को स्पर्ष किया जहां
06:46तपस्या की अगनी प्रजवलित होनी थी
06:50अपनी राजसी सुक्सुविधाव का त्याग कर उन्होंने वन के एकांत में ध्यान की वह महामुगरा धारन की जिसे देखकर दिशाए
06:58भी स्तब्ध रह गई
07:00उनके संकल्प की उष्णता ने आसपास की बर्फ को पिघलाना शुरू कर दिया जिससे प्रकृती के कंकन में एक अध्भुत
07:08उर्जा का संचार होने लगा
07:11यह कठोर साधना केवल एक राजकुमारी का त्याग नहीं था, बलकि संपूर्ण ब्रहमांड के भाग्य को नए सिरे से लिखने
07:19का एक महाप्रयास था
07:21समय बीटता गया और देवी पार्वती ने भोजन और जल का पूर्ण त्याग करके केवल वायू के सहारे जीवित रहने
07:29का कठिन वरत ले लिया
07:32उनकी इस अचल निष्ठा को देखकर आकाश में देवताओं ने पुष्प वर्शा की और महर्शियों ने उनके तपकी महिमा का
07:40गुनगान शुरू कर दिया
07:42हर दिन उगते सूर्य के साथ उनका तप और अधिक तीवर होता गया जिससे उनकी देह से निकलने वाली प्रभाने
07:50बादलों को भी स्वर्णिन रंग में रंग दिया
07:53परवत्राज हिमालय अपनी पुत्री के इस असीम साहस को देख कर गर्व से भर गए किन्तु उनके पिता हरिदय में
08:01एक चिंता की लहर भी दोड रही थी
08:04इधर कैलास की गुफाओं में समाधिस्थ भगवान शिव के ध्यान में भी इस महान उर्जा के स्पंदन का प्रभाव स्पष्ट
08:12रूप से महसूस होने लगा था
08:15महादेव के भीतर समाधि की शान्ती और ब्रहमांडिये चेतना के बीच एक सुप्ष्म समवाद आरंभ हो चुका था जो स्रिष्टी
08:23के पुनरुथान का संकेट था
08:26पार्वती के तब की आच इतनी पवित्र और शक्तिशाली थी कि उसने समस्थ लोकों के रिशियों और मुनियों को भी
08:33अपनी और आकर्शित कर लिया
08:37ब्रहमांड के हर कोने में यह चर्चा फैल गई की आदिशक्ति का यह रूप समस्थ असुरों के अहंकार को चूर
08:43-चूर करने के लिए अवतरित हो रहा है
08:47मौसम की हर बाधा को पार करते हुए बिना अन्न और जल के देवी पार्वती एक अद्वितियस तंभ की भानती
08:55अपनी जगहे पर अडिक खड़ी रही
08:58उनकी इस अचल तपस्या को देख कर प्रकृती के समस्थ जीवजन्तू और वनस्पती भी मानों उनके सम्मान में मौन हो
09:05गए थे
09:07हर सांस के साथ वह ब्रह्मांड की मूल उर्जा को अपने भीतर समाहित कर रही थी जिससे उनका स्वरूप और
09:15अधिक देदी प्यमान होता जा रहा था
09:18यह वह क्षन था जब भौतिक जगत और आध्यात्मिक चेतना की सीमाएं आपस में घुल मिलकर एक हो रही थी
09:27तारकासुर के महलों में भी इस तपस्या की भयंकर उश्मा महसूस होने लगी जिससे उसके दुष्ठ हरिदय में भय की
09:34सहरन दोड गई
09:36सुरक्षत समझे जाने वाले उसके सामराज्य की नीम हिलने लगी और उसके दर्बारियों के चहरों पर आसन्न विनाश का भय
09:44स्पष्ट जलकने लगा
09:46किन्तु इन सभी विकारों से दूर हिमालय की श्वेट चादर के बीच केवल उस दिव्य तपकी जोती प्रखर से प्रखरतर
09:54होती चली गई
09:56और अब वह महान वेला निकट आ चुकी थी जब इस प्रचंड तपस्या के परिणामस्वरूप ब्रहमांड को उसका सबसे शक्तिशाली
10:04रक्षक मिलने वाला था
10:07देवराज इंद्र के नेत्रित्व में समस्थ देवता और रिशिमुनी अपनी पराजय की पीडा लेकर अमरावती के स्वर्ण सिनहासन कक्ष में
10:15चिंतित बैठे थे
10:18तारकासुर के अजे वर्दान की प्रचंड गूंज ने संपूर्ण स्वर्ग लोक में भय का एक ऐसा सामराज जिस स्थापित कर
10:25दिया था जिससे कोई अचूता न था
10:29प्राहित्राही के इन स्वरों के बीच देवराज इंद्र ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए ब्रहमांड के संतुलन को बनाए रखने
10:36की गुहार लगाए
10:38स्वर्ग की अपसराओं के निरित्य थम चुके थे और गंधरवों के वाग्यों में केवल करोन विलाप और शोक की स्वर
10:45लहरिया गूझ रही थी
10:48प्रत्येक देवता की आखों में केवल एक ही प्रश्न था कि क्या इस अपराजे राक्षस का अंत करने वाला कोई
10:55भी सामर्थ्य शेश नहीं बचा है
10:59महर्शी ब्रहस्पती ने आगे आकर देवताओं को सांत्वना दी और उन्हें केवल परम शक्ती की शरण में जाने का एक
11:06मात्र उपाय सुझाया
11:09अगनी देव और वायु देव भी अपनी समस्त उर्जा के क्षीन होने के बाद मौन होकर उस उच्चतर निर्नय की
11:16प्रतीक्षा करने लगे
11:19आकाश में मंदराते काले बादलों और उलका पातों ने यह संकेट दे दिया था कि संपून स्रिष्टी विनाश की कगार
11:26पर पहुँच चुकी है
11:29ब्रहमांड की इस असीन पीडा को महसूस करते हुए देवतागन एक स्वर में भगवान विश्णु के सम्मुक अपनी फरियाद लेकर
11:37उपस्थित हुए
11:39नारायन ने अपने शांत और गंभीर नेत्रों से देवताओं की ओर देखा और उन्हें इस संकट से मुक्ती का संकेट
11:47दिया
11:48विश्णु जी ने स्पष्ट किया कि तारका सुर का वद केवल भगवान शिव के तेज से उत्पन्न महायोध्धा ही कर
11:55सकता है
11:57यह सत्य सुनते ही देवताओं के मन में एक नई आशा की किरण जगी किन्तु साथ ही शिव की अटूट
12:04समाधी का विचार भी आया
12:07देवराज इंद्रने संकोच भरे स्वर में पूछा की महायोगी शिव की उस गाढ़ निद्रा को भंग करने का दुस्साहस कौन
12:14करे
12:16भगवान नारायन ने मुस्कुराते हुए समझाया कि नेति स्वय अपने चक्र को घुमा रही है और उचित समय पर सब
12:24प्रकट होगा
12:25किन्तु तब तक तारकासुर के अत्याचारों की सीमा लांख चुकी थी और पाताल से लेकर स्वर्ग तक हाहाकार मचा हुआ
12:33था
12:35असुर सेना ने अपने पराकरम के मद में चूर होकर देवलोग के पवित्र उद्ध्यानों और यग्यस्थलों को नश्ट करना शुरू
12:42कर दिया था
12:45रिशिमुनियों के हवन कुंडों में असुरों ने बाधा डालने आरंभ कर दी थी जिससे संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संकट में पड़
12:52गए थे
12:54संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल एक ही पुकार गूंज रही थी कि है महादेवा अब इस संकट से इस स्रिष्टी की
13:01रक्षा कीजिए
13:04देवताओं की इस आर्ख पुकार ने हिमालय की उस शांत वादियों में कमपन पैदा कर दिया जहां तपस्या की अगनी
13:11प्रजवलित थी
13:12और अब वह परंक्षणा पहुँचा था जब इस योग निग्रा को तोड़ कर शिव का दिव्य प्रक्टी करण होने ही
13:19बाला था
13:32सभी देवता इस अलौकिक तेज को देख कर अपनी आखें बंद करने को विवश हो गए
13:38उस प्रचंड प्रक्तिकरण की लहर ने अंतरिक्ष के हर कोने को जख जोर दिया और दिशाएं काम उठी
13:46यह वह क्षण था जब प्रक्रिती और परम पुरुष की संयुक्त उर्जा एक नया आकार लेने लगी थी
13:54आकाश में तैरते हुए बादलों ने इस दिव्य प्रकाश के स्पर्ष से ही एक स्वन आवन ओड लिया
14:02महर्शी और मुनी अपनी गुफाओं से बाहर निकल आये और इस महातेज के दर्शन कर कृतार्थ हो गए
14:09उस असीम प्रकाश पुन्च के मध्य से एक ऐसी उर्जा निकली जिसने अंतरिक्ष के अंधकार को पूर्णत है चीर दिया
14:18यह उर्जा इतनी तीवर थी कि मानो संपून ब्रहमांड एक नए जन्म की पीडा से गुजर रहा हो
14:25समस्त लोकों में सन्नाट आचा गया और केवल इसी महाप्रकाश की गुँच सुनाई देने लगी
14:33ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से जल लेकर इस पवित्र तेज को प्रणाम किया और स्रिष्टी के कल्यान की प्रार्थना
14:40की
14:41इस तेज के प्रभाव से धर्ती की हर एक शिला और व्रिक्ष में एक नई चेतना का संचार हो उठा
14:49यह पल इतिहास का वह बिंदू बन गया जहां से असुरों के विनाश की उल्टी गिन्ती शुरू हो चुकी थी
14:57नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों पर हाथ फेरा और नारायन का स्मरण करते हुए इस दिव्य प्रक्टी करण
15:04का गुनगान किया
15:06अंतरिक्ष में तैरते हुए ग्रहों और नक्षत्रों की गती इस महाउर्जा के सामने जैसे थमसी गई
15:14महादेव और माता पार्वती की यह समेकित शक्ती अब एक केंदरित बिंदू पर आकर संधनित होने लगी
15:21इस रहस्य में प्रकाश के आवर्ण के भीतर कुछ ऐसा आकार ले रहा था जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की
15:28थी
15:30देव लोग के द्वारों पर पहरा दे रहे गंधर्व और किन्नर भी अपने शस्त्रता में इस अग्भुत ग्रिश को देखते
15:37रह गए
15:38पूरी वसुधा पर एक शांत किन्तु शक्तिशाली कमपन महसूस हो रहा था, मानो धर्ती स्वयन किसी का स्वागत कर रही
15:46हो
15:47उस महान उर्जा के भीतर से गूंज उठी वह पहली हुंकार जिसने पाताल लोग तक खलबली मचा दी
15:55यह उस महासेनानी के आगमन की पूर्वाभास थी, जो समस्त देवताओं का उध्धार करने आ रहा था
16:03उस प्रचंड अगनितेजने दिशाओं को चीरते हुए सीधे सर्वन नामक पवित्र और गुप्त सरोवर की ओर प्रस्थान किया
16:12सरोवर के शांत जल में उतरते ही उस दिव्य उर्जा ने एक अध्भुत और अलौकिक रूप धारन करना आरंभ कर
16:19दिया
16:21जल के भीतर लहराती हुई पवित्र सरकंडों की जाडिया उस प्रदीप्ट अगनी की अनूठी पाल की बन गई
16:29संपूर्ण ब्रहमांड में यह महामूर्तिकला मानो साक्षात प्रकृती के गर्भ से एक नए युग के स्रिजन का गान कर रही
16:36थी
16:38आकाश मार्ग से कृप्तिकाय यानि कृतिका नक्षत्र की छहों दिव्य देविया उस पावन सरोवर की ओर खींची चली आई
16:45वे देविया उस महातेज के समीप पहुँचकर विस्मित और स्तब्ध हो गई जिसकी उश्मा से संपूर्ण वातावर्ण महेक उठा था
16:55अपनी ममतामई गोद में उन्होंने उस अद्वितिय और प्रचंड अगनिपिंड को अत्यंत सावधानी से संभाला
17:04उस दिव्यस पर्ष से वह प्रचंड उर्जा शान्थ होकर एक अती सुन्दर शिशु के आकार में परिवर्तित होने लगी
17:12सरोवर के जल में जैसे ही वह चमतकार घटित हुआ
17:16छै अलग-अलग प्रकाश पुंजों से छै मुखों वाले एक बालक की आकृती उभराई
17:33पूर्ण ब्रहमांड को आलोकित कर रही थी यह वहक्षन था जब देवताओं के सेनापती का इस लोक में भौतिक अवतरन
17:42पूर्ण हुआ
17:44सरोवर की लहरेन भी मानो उस बालक के अभिनंदन में मधूर संगीत उत्पन कर रही थी
17:51कृतिकाएं अपने माता होने का सौभाग्य पाकर कृतार्थ भाव से उस बालक की स्तुती करने लगी
17:58उस बालक की प्रथम किलकारी से पाताल लोक के असुरों के महलों में कमपन उत्पन हो गया
18:05यह हुंकार तारक्सुर के सामराज्य के पतन की उल्टी गिन्ती का आरंभ बन चुकी थी
18:12देवलोक में अपसराओं ने निरित्य किया और गंधर्वों ने इस महान आगमन पर विजय के गीत गाए
18:19समस्त रिशिमुनियों ने अपनी कुटीरों से बाहर निकल कर इस अलौकिक प्रकाश को प्रणाम किया
18:26सर्वन सरोवर का वह पावन तट अब ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य का जीवन्त केंद्र बन चुका था
18:34इस प्रकार कार्तिके के रूप में उस महाशक्ती का प्रक्टी करण हुआ जो धर्म की पुनर्स्थापना करने वाला था
18:42छै अलग-अलग शिशुओं के वे दिव्य शरीर एक महादिव्य प्रकाश पुंज में समाहित होकर एकाकार होने लगे
18:50इस अद्भुत विलीन करण से एक ऐसा दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ जिसके छै मुख और बारा अद्भुत भुजाय थी
18:59शन्मुख कार्तिके के उस अद्वितिय प्रक्टी करण ने संपून ब्रहमांड को अपनी तेजों में आभासे चकाचौंध कर दिया
19:07उनके प्रतेक मुख से वेदों की रिचाओं साज्यान और ब्रहमांडिय उर्जा का निरंतर प्रवाह हो रहा था
19:15देवराज इंद्र और सभी देवी देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्शा कर इस महायोध्धा का अभिनंदन किया
19:23ब्रहमा जी और भगवान विश्णु ने उस महातेजस्वी बालक के चर्णों में नत्मस्तक होकर उसकी स्तुती की
19:31माता पार्वती ने वादसल्य से भर कर अपने इस अद्भुत पुत्र को अपनी विशाल गोद में उठा लिया
19:39महादेव शिव ने मुस्कुराते हुए अपने त्रिशूल से उस वीर बालक को ब्रहमांडिय विजय का आशिर्वाद दिया
19:47सर्वन सरोवर का शांत जल उस महाशक्ती के स्पर्ष से आनंदित होकर तरंगित हो उठा
19:55रिशमुनियों के हृदय में जो अंधकार का भय था वह कार्तिके के तेज से कपूर की तरह उड़ गया
20:03कार्तिके के शरीर से निकली स्वन आभा ने पाताल लोग तक की अंधकार में गहराईयों को रोशन कर दिया
20:11वहक्षन समस्त ब्रह्मांड के पुनरजन्म और धर्म की विजय की घोशना कर रहा था
20:17माता कृतिकाएं जिन्होंने उस बालक को स्तनपान कराया था अश्रूओं से सिक्ट नैनों से उसे निहार रही थी
20:26अगनी देव और वायु देव ने अपनी समस्त उर्जा उस महा सेनाप्ती के चर्णों में समर्पित कर दी
20:33कार्तिके ने अपनी चहों भुजाओं में दिव्य अस्त्रशस्त्रों को धारन कर रनबांकुरे का रूप ले लिया
20:40उनके उस भयंकर और प्रतापी रूप को देखकर स्वर्ग और पाताल दोनों में हल्चल मच गई
20:48देव सेना की हुंकार से दिशाएं गूँझ उठीन और हर तरफ विजय के शंकनात सुनाई देने लगे
20:55नारद मुनी ने अपनी वीना पर विजय के ऐसे मंगलगी छेड़े जो तीनों लोकों में गूँझ गुठे
21:02वह छै मुखों वाला महानायक अब धर्म की रक्षा और तारकासुर के सहार के लिए पूर्णत है तयार था
21:10इस प्रकार सकंद पुरान के इस परम अध्याय में कार्तिके के रूप में ब्रह्मांड की सबसे बड़ी महाशक्ती का अवतरण
21:18हुआ
21:19दिव्य प्रकाश से आलोकित उस पावन सरोवर के तट पर अब समस्त ब्रह्मांड की निगाहे टिकी थी
21:27शीघर ही उस अलोकिक स्थल पर आदिदेव, भगवान, शिव और माता पार्वती का भव्य आग्मन हुआ
21:35माता पार्वती ने अपने दिव्यनेत्रों से उस छै मुखों वाले तेजोमय बालक को निहारा और उनका हृदय वातसले से भर
21:43गया
21:44महादेव के चर्णों में नत्मस्तक होकर उस छै मुखों वाले महानायक ने अपने पिता की ओर श्रद्धा से देखा
21:52सरोवर के शांत जल में आकाश के तारे जिल मिला रहे थे और संपून वातावर्ण एक नए युग के आरंभ
22:00का गान कर रहा था
22:02भगवान शिव ने आगे बढ़कर अपने करकमलों से उस प्रतापी बालक को अपनी गोद में उठा लिया
22:09पिता की गोद में विराजित होते ही उस बालक का तेज सूर्य के समान दमक उठा
22:16समस्त देवगन इस अलौकिक मिलन के साक्षी बने और आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी
22:23हिमाले की बरफीली घाटियों में शंखनाद गूँझ उठा जिससे दिशाएं प्रफुलित हो उठी
22:30माता पार्वती ने अत्यंत प्रेम से उस महाबली कुमार को अपने आचल में समेट लिया
22:37देवों के देव महादेव ने गंभीर और मधुरवानी में उस बालक का नामकरण करने का निर्णय लिया
22:45ब्रहमांड के कल्यान के लिए उन्होंने इस महान सेनाप्ती को सकंध नाम से संबोधित किया
22:52सकंध नाम के उच्चारण मात्र से ही तीनों लोकों में विजय का उद्गोश गूंज गुठा
22:59देवराज इंद्र और सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर अपने नए सेनाप्ती को प्रणाम किया
23:06कार्तिके के रूप में देव सेना को वह महानायक मिल गया था जो अधर्म का नाश करने वाला था
23:13दिव्य तेज से परिपूर्ण वह पवित्र सरोवर अब इतिहास के सबसे बड़े अध्याय का साक्षी बन चुका था
23:21समस्त दिशाओं में धर्म की पुनरस्थापना का शंकनाध हो चुका था और असुरों के सामराज्य में खलबली मच गई थी
23:30भगवान शिव ने अपने पुत्र के मस्तक पर हात फेरकर उसे तारकासुर के सहार का परम आशिरवाद दिया
23:38माता पार्वती और महादेव के आशिरवाद से सुसजित होकर सकंद ने युद्ध के लिए हुंकार भरी
23:44इस प्रकार सकंद पुराण के इस अध्भुत अध्याय में देव सेनाप्ती कार्तिके का प्राकट्य संपन्न हुआ
23:54सब्तर्शियों के चर्णों में प्रणाम करते हुए कार्तिके ने अपने दिव्य मस्तक को जुका कर पवित्र अनुष्ठान का आरंभ किया
24:02महर्शी वशिष्ठ ने आगे बढ़कर वेदमंत्रों का उच्चारण किया जिससे चारों दिशाओं में दिव्य उर्जा प्रवाहित होने लगी
24:11प्रत्येक रिशी ने अपने कमंडल से पवित्र जल लेकर नूतन सेनाप्ती के ऊपर छिड़का जिससे उनका तेज हजार गुना बढ़
24:19गया
24:21ब्रहमांड के समस्त नक्षत्र और तारे इस एतिहासिक अभिशेक के साक्षी बनकर आकाश से पुश पवर्शा करने लगे
24:30महर्शी विष्वामित्र ने अपनी योग शक्ती से प्रकट होकर दिव्य अस्त्रों का आवान किया जो सीधे ब्रहमांडी उर्जा से बने
24:38थे
24:39महर्शी अत्री और अंगिरा ने मिलकर एक अद्भुत अगनी कुंड प्रजवलित किया जिससे अस्त्रों की शक्ती जागरित हुई
24:48कार्थिकेय ने अपने दोनों हाथों को फैला कर महर्शी कश्यप द्वारा प्रदान किये गए अन्मोल ब्रहमास्त्र को सहर्ष स्वीकार किया
24:57परवतों की कंदराओं से गुंजती हुई रिशियों की मंत्रध्वनी ने संपून ब्रहमांड में विजय का शंकनाद कर दिया
25:05महर्शी भारदवाज ने आगे आकर सकंद को युध की व्यूह रचना और कूटनीती के सभी गूढ रहसियों का ज्यान कराया
25:14रिशी गौतम ने अपने कमंडल के जल से सकंद के अस्त्रशस्त्रों को अभिमंत्रित कर उन्हें अजे बना दिया
25:22कार्तिके के शरीर पर पड़े जल की प्रत्येक बूंद ने एक नए दिव्य आभूशन का रूप धारण कर लिया
25:30सब्तर्शियों के सामुहिक तेज से आकाश में एक महावरित बन गया जिसमें संपून ब्रहमांड की शक्ती समाहित थी
25:39महर्शी जमदगनी ने अपने शक्तिशाली धनुष को उठा कर सकंद को युद्ध कला की सर्वोच दीक्षा दी
25:47सकंद ने उस दिव्य धनुष की प्रत्यंचा खीचा जिससे उत्पन्न टंकार से संपून हिमाले थर्रा उठा
25:55धनुष की प्रत्यंचा से निकली उर्जा तरंगों ने बादलों को चीरते हुए चारों और प्रकाश फैला दिया
26:03आकाश में उपस्थित सभी देवताओं ने इस अध्भुत द्रिश्य को देखकर जैकारे लगाए और पुष्पवर्शा की
26:11सब्तर्शियों ने एक स्वर में कार्तिके को देवताओं के रक्षक और तारकासुर के संहारक के रूप में घोशत किया
26:19कार्तिके ने अपने हाथों में त्रिशूल धारण किया और ब्रहमांड के कल्यान की प्रतिग्याली
26:26उनके उस दिव्य संकल्प से संपूर्ण हिमालय परवत पर अध्भुत स्वर्णिम प्रकाश छा गया
26:32इस प्रकार सब्तर्शियों के आशिर्वाद से पूर्ण होकर देवसे नापती युद्ध के लिए पूरी तरह तयार हो गए
26:41As skandh raises his divine spear way
26:45The sound reverberates through all lokas
26:50Signaling the imminent end of adharma and setting the stage further
26:55As skandh raises his divine spear way
26:58The sound reverberates through all lokas
27:03Signaling the imminent end of adharma and setting the stage further
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27:36As Skand raises His Divine Spear, वे
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