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In Episode 8 of the Skanda Purana series, we witness the divine manifestation of Stambheshwar Mahadeva. As Kartikeya seeks redemption, the sea reveals a hidden sanctuary. Discover the mystery behind the disappearing Shivling and the cosmic purpose of this sacred site. Explore the profound intersection of devotion, guilt, and divine mercy in the heart of the Skanda Purana. #SkandaPurana #LordKartikeya #StambheshwarMahadeva #HinduMythology #SpiritualJourney #IndianHistory #DevotionalSeries
Transcript
00:00कार्तिकेय ने माहिसागर संगम के तट पर कदम रखा, जहां समुद्र की लहरें और नदी की धाराएं उनके हिदय के
00:07भारीपन को शांत करने के लिए एक दूसरे से टक्रा रही थी.
00:12भगवान विश्नुगरूर पर आरूड होकर आकाश से नीचे उतरे और कार्तिकेय के व्याकुल मन को देखकर चिन्ता और करुणा से
00:21भर गए.
00:23कार्तिकेय ने अपने हाथों में थामे उस पवित्र शिव लिंग को रेट पर स्थापित किया, जो ताड़कासुर के वध के
00:29बाद उनके पश्चाताप का प्रतीक बन गया था.
00:34समुद्र के किनारे की पावन रेट पर सूर्य की सुनहरी किरने पड़ रही थी, मानोस्वयं प्रकृती कार्तिकेय के कठिन तब
00:41के आरंभ का स्वागत कर रही हो.
00:45कार्तिकेय ने अपने अस्त्रों को धर्ती पर रखकर कमल की मुद्रा में बैठना स्विकार किया ताकि वे अपनी आत्मा को
00:52शिव की भक्ती में विलीन कर सकें
00:55शिव के ध्यान में मगन कार्तिके का तेज इतना प्रखर हो गया कि देवलोक में नारत मुनी ने अपनी वीना
01:03के तारों से उनकी प्रार्थना का सुर्छेड दिया
01:07कार्तिकेय ने अपनी आखें बंद कर ली और मन में केवल महादेव की उस छवी को धारण किया, जो उनके
01:14क्रोध और शोक का एक मात्र निवारण था
01:18तटकी वायू में एक दिव्य सन्नाट आचा गया और समुद्र की लहरें भी शान्त हो गई, मानो पूरी स्रिष्टी इस
01:25महातप के साक्षी बनने के लिए रुख गई हो
01:29महादेव के प्रती अपनी निष्ठा सिद्ध करने हेतु कार्तिकेय ने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह से सांसारिक माया से काट
01:37लिया
01:38वैकुंठ में विराजमान भगवान विश्णो मुस्कुराए क्योंकि वे जानते थे कि कार्तिकेय का यह तब केवल स्वयन के लिए नहीं,
01:47बलकि संपूर्ण ब्रहमांड के संतुलन के लिए है
01:51कार्तिकेय के शरीर से निकलने वाली उर्जा ने आसपास की रेट को भी स्वर्णिम बना दिया, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत
01:59हुआ कि वे स्वयन शिव के स्वरूप में ढल रहे है
02:04वातावर्ण में दिव्यगंध और सुगंधित फूलों की वर्शा होने लगी, जो स्वर्ग के देवताओं द्वारा उनके प्रती सम्मान व्यक्त करने
02:12का एक माध्यम था
02:14कार्तीके ने अपनी चेतना को अनन्त में ले जाने का प्रयास किया, जहां न कोई युद्ध था और नहीं कोई
02:21विजेता, केवल महादेव का अनन्त प्रकाश था
02:25इधर कैलास की हिमशिकरों पर बैठे भगवान शिव ने कार्तीके की व्याकुलता को अपने हृदय में महसूस किया, और उनकी
02:33ध्यानमगन मुद्रा में भी एक हलचल सी उत्पन्न हो गई
02:38शिव के मस्तक पर स्थित चंद्र की कलाभी जैसे कार्तीके के उस तब के सम्मान में अधिक शीतल प्रकाश बिखेरने
02:45लगी
02:47कैलास के पर्वत्राज पर बर्फ का एक कन भी आज हिल नहीं रहा था, जैसे समय स्वय उस दिव्यपिता और
02:54पुत्र के मिलन की प्रतीक्षा कर रहा हो
02:58कार्तीके के मन में उभरते हुए उस शिवलिंग के प्रती समर्पन भाव ने समुद्र के जल को भी शांत और
03:04स्थिर कर दिया था
03:07देवताओं के दूट के रूप में इंद्र ने भी स्वर्प के जरोखों से देखा कि कार्तीके की तपस्या केवल एक
03:13योध्धा की नहीं, एक भक्त की साधना है
03:18धैर्य और शांती का ऐसा संगम देखकर समुद्र की गहराई से उठने वाली लहरे भी अब कार्तीके के चर्णों को
03:25केवल स्पर्ष कर लौट जाती थी
03:29कार्तीके अब उस अवस्था में थे, जहां से उन्हें साक्षात, शिव के दर्शन की प्राप्ती का मार्ग दिखाई देने लगा
03:36था
03:38समुद्र की अथाह गहराई से अचानक एक दिव्य जोती का पुंज उभरने लगा जिसने सम्पूर्ण जल राशी को स्वर्ण में
03:45आभा से भर दिया
03:47इस अलोकिक दर्श को देखकर भगवान विश्नु जो गरुर पर विराज मान थे, अपनी चतुर्भुज छवी में शान्त और स्थिर
03:55भाव से उस पवित्र घटना के साक्षी बने
03:59कार्तिकेय ने देखा कि समुद्र की लहरों के बीच एक दिव्य शिवलिंग का प्राकट्य हो रहा है जो स्वय महादेव
04:07के अस्तित्व का प्रमाण था
04:09उस विशाल शिवलिंग के चारों और की जलधाराएं शान्त होकर एक अद्रिश्य उर्जा के घेरे में सिमट गई
04:28जिसे भविश्य में स्तंभेश्वर के नाम से जाना जाएगा देवर्शी नारद वीना बजाते हुए आकाश मार्ग से नीचे उत्रे और
04:37उस लिंग की स्तुती में मंत्रों चार करने लगे जिससे वातावर्ण में दिव्यता घुल गई
04:44जैसे ही लिंग समुद्र की सतह से उपर आया उसकी चमक से समस्थ देवलोग के नक्षत्र मंद पड़ गए
04:52कार्तिके ने उस लिंग के समक्ष अपना सिर जुकाया और उन्हें अनुभव हुआ कि उनके मन का भारीपन धीरे-धीरे
04:59कम हो रहा है
05:02समुद्र की लहरों ने एक बार फिर करवट ली और शिवलिंग के आसपास एक स्वर्णमई वेदी का निर्मान स्वतह ही
05:09हो गया
05:11भगवान विश्णू ने गरुड से उतर कर उस पवित्र स्थान की ओर कदम बढ़ाया जहा स्वयन शिव के अंश का
05:18अवतार हुआ था
05:20लिंके स्पंदन से निकलने वाली तरंगे मानो ब्रह्मांड के रहसियों को कार्तिके के हृदय में समाहित कर रही थी
05:28एक गूंजती हुई ध्वनी के साथ समुद्र की गहराईयों से शंक की मंगल ध्वनी सुनाई दी जिसने पूरे वातावर्ण को
05:36पावन बना दिया
05:38कार्तिके ने अपने नेत्र खोले तो उनके सामने स्वयन शिव की उपस्थिती का आभास हुआ जो उस लिंग के भीतर
05:46समाहित थे
05:48विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि यह लिंग ही कार्तिके के कर्मों के प्रायश्चित का एक मात्र मार्ग
05:55है
05:57कार्तिके ने उस दिव्य शिवलिंग को स्पर्ष किया और उस क्षण उनकी आत्मा का बोज जैसे एक दिव्य प्रकाश में
06:04परिवर्तित होकर विलीन हो गया
06:07समुद्र अब किसी शांत योगी की तरह स्थिर था जो उस महान शक्ती का स्वागत करने को लालायत था
06:15दिव्य ध्वनियों के बीच उस लिंग से एक अलोकिक उर्जा निकली जिसने समुद्र के तल को एक स्वर्णमे मंदिर में
06:22बदल दिया
06:24देवता गण स्वर्ग के जरोखों से इस अध्भुत चमतकार को देख कर स्थब्ध रह गए क्योंकि आज एक महा योध्धा
06:32का अहंकार पूरी तरह गल चुका था
06:35कार्तिके ने खड़े होकर उस शिवलिंग को प्रणाम किया और अब उनके व्यक्तित्व में एक नई करुणा और शान्ती का
06:43संचार हो चुका था
06:45स्तंभेश्वर महादेव का यह प्राकट्य केवल एक धटना नहीं बलकि धर्म और भक्ती के मिलन का एक शाश्वत अध्याय बन
06:53गया
06:55समुद्र का जलस्तर धीरे धीरे उपर उठने लगा मानो स्वयं वरुन देव स्तंभेश्वर महादेव के अभिशेक के लिए शीतल लहरेन
07:03लेकर आ रहे हूँ
07:06भगवान विश्णू ने गरूर पर आरूड होकर इस द्रिश्य को देखा और मंद मुस्कान के साथ कहा कि यह प्रकृती
07:13का महादेव के चर्णों में किया गया अनन्य समर्पन है
07:18लहरेन अब शिवलिंग के चर्णों को पूरी तरह ढख चुकी थी जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे स्वयन सागर
07:25ने महादेव को अपनी गोद में समाहित कर लिया हो
07:29आकाश से गिर्ती दिव्य आभा ने समुद्र के जल को एक रहस्यमय और चमकीले नीले रंग में बदल दिया जो
07:37इस पवित्र स्थान की दिव्यता को रेखांकित कर रहा था
07:41कार्तिके ने अपने नेत्र मून्द लिये और वे समुद्र के संगीत में महादेव के उमकार की ध्वनी को अनुभव करने
07:48लगे जो उनके भीतर की शेश गलानी को भी मिटा रही थी
07:54देवराज इंद्र ने अपने रत से इस घटना को निहारा और वे नत्मस तक होकर इस अलौकिक शक्ती के आगे
08:01अपनी विनमरता स्विकार करने लगे
08:04समुद्र के बीचों बीच उठते हुए जल ने एक भमवर का रूप ले लिया जिसके केंद्र में महादेव का शिवलिंग
08:11एक अटल सत्य की भांती अडिक खड़ा था
08:15अद्रिश शक्तियों का यह खेल प्रकृती के चक्र को दर्शाता था जहां अन्थी पुनह किसी नई रचना की शुरुवात का
08:23आधार बनता है
08:25तट पर खड़े सभी जीवजन्तु इस द्रिश को देख कर शान्थ हो गए, मानो समय का प्रवाह इस क्षण के
08:32लिए पूरी तरह थम गया हो
08:35देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर एक ऐसी धुन छेड़ी जिससे समुद्र का जल और भी अधिक लैबध
08:42होकर महादेव के चर्णों का स्पर्श करने लगा
08:46पानी का स्तर इतना बढ़ गया कि मंदिर का शिखर मात्र एक छोटी सी दीपशिखा की तरहे प्रतीत होने लगा,
08:54जो अनंत जल निधी में डूबा हुआ था
08:57यह विसर्जन नहीं, बलकि एक दिव्य मिलन था, जहां जल का तत्व शिव के अगनी तत्व में विलीन होने के
09:04लिए आतुर था
09:07कार्तिके ने अनुभव किया कि जिस अहंकार ने उन्हें युद्ध में धकेला था, वह अब इस अगाद सागर की गहरायों
09:14में कहीं खो गया है
09:17स्वय गंगा मया की धाराओं ने समुद्र के इस जल में आकर उसे पवित्र कर दिया, जिससे बातावर्ण में सुगंधित
09:25दिव्य उर्जा व्याप्थ हो गई
09:28स्तंभेश्वर महादेव का यह शिवलिंग अब ब्रहमांड के उस गुप्ट द्वार के समान था, जो केवल सच्चे भक्तों के हृदय
09:35में ही खुलता था
09:37ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदे छोड़ी, जो आकाश से गिरकर समुदर के मिलन बिंदु पर
09:44अमरित वर्षा की भांती गिरी
09:48समुदर ने अपनी सीमाओं को मान लिया और वह लहरेन वापस खीचने लगा, मानो शिवलिंग को प्रणाम कर अब वह
09:55शांत होने का संकेट दे रहा हो
09:58कार्तिके अब उस स्थान से विदा लेने के लिए तयार थे, उनका हृदय अब एक योगी की भाती अडिग और
10:05शांत था
10:07स्तंभेश्वर की इस लीला ने देवदानव और मनुश्यों को सिखा दिया कि भक्ती का मार्ग सदैव अहंकार के विसरजन से
10:15ही प्रारंभ होता है
10:17और इस प्रकार समुद्र की लहरों के बीच से प्रकट हुआ वह रहस्य कादवार जो समय के अंत तक महादेव
10:25के भक्तों के लिए एक वर्दान बना रहेगा
10:29समुद्र के उस पवित्र तट पर जहां महादेव का शिवलिंग लुप्थ हो रहा था वहां की शीतल वायू में एक
10:36अलोकिक निरवता व्याप्थ हो गई
10:39शूनि से आती हुई महादेव की गूंजती हुई वानी ने कार्तिके के हृदय के भार को एक दिव्य प्रकाश में
10:46परिवर्थित कर दिया
10:48कार्तिके ने देखा की कैसे लहरें उस लिंग को अपनी गोद में समेट रही हैं
10:53मानुस्वयन समुद्र भी महादेव की इस विसरजन लीला का गवाह बन रहा हो
10:59यह विसरजन केवल एक अंत नहीं था बलकि अनित्यता के उस महासत्य का प्रतीक था जिसे समझना हर देव और
11:07मानव के लिए अनिवार्य है
11:10शिव के इथर के माध्यम से प्रसारित संदेश ने कार्तीके के को सिखाया कि संसार के द्वंदवों के नीचे ही
11:18सत्यकी वास्तविक गहराई छिपी होती है
11:22देवराज इंद्र ने दूर से इस दिव्यद्रिश्य को देखा और जुक कर उस स्थान को नमन किया जहां अहंकार का
11:29त्याग हुआ था
11:31समुद्र के भीतर से उठती हुई दिव्य तरंगे मानों मंत्रों चार कर रही थी जिससे चारों दिशाएं एक अध्भुत दिव्य
11:39उर्जा से भर उठी
11:42महादेव की लीला का यह रहस्य कार्ति के एके मन के सभी द्वंद्वों को विसर्जित कर रहा था और वे
11:48पूर्णत है शांत हो गए
11:51आकाश में देवताओं के विमान ठहरे हुए थे क्योंकि वे भी इस क्षण को कालजई अनुभव मान कर देख रहे
11:58थे
11:59भगवान विश्णु ने गरुर पर विराज मान होकर इस विसर्जन का अवलोकन किया और उन्होंने एक मन्द मुस्कान के साथ
12:07इसे ब्रहमांड का नियम बताया
12:10गरुर के पंखों की फड़फडाहट से उठी हवा ने उस तटकी पवित्रता को और अधिक प्रगाड कर दिया जहां महादेव
12:18का वास था
12:20यह द्रिश किसी साधारन घटना का नहीं बलकि स्रिष्टी के उन गूढ नियमों का था जो समय की गती के
12:27साथ बदलते रहते हैं
12:40ब्रहमाजी ने मानसरोवर से इस पवित्रक्षन का ध्यान किया और वेदों की रिचाओं का मूख गान करने लगे
12:48तटकी रेद पर अनकित महादेव के चर्णों के चिनह लहरों के स्पर्ष से और भी अधिक दिव्य आभा बिखेरने लगे
12:56थे
12:57ब्रहमांड की शक्तिया एक साथ उस बिंदु पर केंडरित हो गई जहां से काल और महाकाल का मिलन संभव हुआ
13:06स्तंभेश्वर महादेव का यह शिवलिंग समुद्र की गहराईयों में छिपकर भी अपनी शक्ती से संसार को संतुलित कर रहा था
13:15कार्तिके के नेत्रों में अब युद्ध की लालसा नहीं बलकि उस अनन्त शांती का वास्था जो केवल आत्मबोध से प्राप्थ
13:23होती है
13:25देवता गण अब समझ चुके थे कि सच्चा भक्त वह नहीं जो शिवलिंग को पूजे बलकि वह है जो महादेव
13:32के सत्य को अपने हृदय में धारण करे
13:36और इस प्रकार समय के अंत तक के लिए वह द्वार खुला रहा जो स्तंभेश्वर महादेव के दर्शन हेतु भक्तों
13:43के लिए एक शाश्वत मार्ग बना
13:46कार्तिके ने देखा कि समुद्र की लहरें स्तंभेश्वर के चर्णों को पकारने के लिए स्वया आगे बढ़ रही हैं जैसे
13:54कोई सेवक अपने स्वामी के आगमन पर आतुर हो
13:58भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए सागर की इस नैसरगिक भक्ती को देखा और कार्तिके से कहा कि प्रकृती का हरकन
14:06महादेव की आग्या में बंधा है
14:10सागर की अनंत गहराईयों से उठती हुई जल की धाराए शिवलिंग को धीरे-धीरे अपनी गोद में समा लेने के
14:17लिए ततपर थी
14:19यह विस्मयकारी द्रिश एक महान सत्य का उद्गोश कर रहा था कि महादेव के लिए न कोई जल की सीमा
14:26है और नहीं समाय का बंधन
14:30कार्ति के अब उस रहस्य को समझ गए थे कि समुद्र का चड़ना और उतरना वास्तव में महादेव का नित्य
14:37अभिशेखी है
14:39भगवान शिव की उपस्थिती का आभास चारों और की शांत वायू में गूंज रहा था जो भक्त के हृदय को
14:46आत्म बोज से भर रही थी
14:49लहरों का शोर अब किसी मंत्रों चार की तरह सुनाई पड़ रहा था जो स्तमभेश्वर महादेव के वैभव का गुनगान
14:57कर रहा था
14:59इस पवित्र तट पर जो भी आता है वह स्वय को महासागर की असीम शांती में खो जाने का सौभाग्य
15:06पाता है
15:08समुद्र का जल धीरे-धीरे शिवलिंग से पीछे हटने लगा, मालो वह अपना अभिशेक पूरा करके महादेव को पुनह एकांत
15:16में छोड़ रहा हो
15:18विश्नुजी ने कार्तिके के कंधे पर हाथ रखा, जैसे वे उन्हें यह संदेश दे रहे हों कि कर्तव्य के पालन
15:25के साथ समर्पन ही मोक्ष का मार्ग है
15:29तटकी बालू पर पड़ी जल की बूदे मोतियों की तरहें चमक रही थी, जो महादेव के दिव्य आशिर्वात का प्रतीक
15:37प्रतीत होती थी
15:39प्रकृती का यह चक्र अनादिकाल से चल रहा है और आने वाली पीढ़िया भी इसी चमतकार की साक्षी बनेंगी
15:48कार्थिके ने नत्मस्तक होकर उस स्थान को प्रणाम किया, जहां महादेव ने स्वयं को समुद्र के बीच गुप्त रखा था
15:56भगवान शिव की दिव्य माया का विस्तार इतना सूक्ष्म है कि उसे केवल भक्त के शुद्ध हरिदय से ही अनुभूत
16:03किया जा सकता है
16:06लहरों के साथ बहती हुई सुगंधित वायू में जैसे महादेव का चंदनलिप मिश्रित था, जो आत्मा को त्रिप्ट कर रहा
16:14था
16:15यह स्थान किसी तीर्ट से कम नहीं, जहां जल ही महादेव का जलभिशेक करता है और पवन उनकी स्तुती गाती
16:23है
16:25विश्णु जी ने कार्तिके को समझाया कि कैसे स्तंभेश्वर महादेव स्रिष्टी के रक्षक और अंत के साक्षी दोनों है
16:34समुद्र के बीच प्रकट हुआ वहद्वार केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बलकि सत्य और मिथ्या के बीच का एक पवित्र
16:41सेतु है
16:44कार्तिके के हरिदय में अब युद्ध का कोई कोलाहल नहीं, बलकि स्तंभेश्वर की अगाध शान्ती का अमरित रस बह रहा
16:51था
16:52इस प्रकार वह पावन तट एक ऐसा अक्षय स्रोत बन गया जहां समय रुक जाता है और केवल महादेव का
17:00अस्तित्व शेश रहता है
17:03कार्तिके ने देखा कि युद्ध के बाद भी गावों के खेतों में तारकासुर की असुर सेना के बचेखुचे विशाक्त पच्चिनहों
17:11से अभी भी घ्रेनित काली उर्जा का संचार हो रहा था
17:15भगवान विश्णू ने अपनी शांत द्रिष्टी से उन गावों की ओर संकेत करते हुए कार्तिके को उन अधोमुखी उर्जाओं को
17:23शुद्ध करने का आदेश दिया
17:26कार्तिके ने अपने दिव्य शस्त्र शक्ती को आहवान किया जिससे स्वर्णमे दिव्य जोती उन जहरीली लताओं और काले धब्बों पर
17:34गिरने लगी
17:36उस दैवी उर्जा के स्पर्ष से वह प्रदूशित भूमी अचानक से कामपने लगी और अंधकार के अवशेश राख बनकर हवा
17:44में विलीन हो गए
17:46सुकर्मुख नरक के समान गहरी दरारों से निकलते वे काले धुए अब शान्त हो चुके थे
17:52मानो प्रिथवी ने अपना जहर उगल दिया हो
17:56शिव जी ने कैलाश के शिखर से इस शुद्धी प्रक्रिया को देखते हुए अपना त्रिशूल घुमाया
18:02जिससे वायुमंडल में एक शीतल और पवित्र स्पंदन खैल गया
18:08कार्तिके ने अपनी शक्ती के तेज से उस भूमी को पुनह उर्वर बनाने के लिए मंत्रो चार का प्रयोग किया
18:14जो चारों दिशाओं में गूंज उठा
18:18देखते ही देखते वह बंजर और जहरीली भूमी पुनह हरियाली और फूलों की सुगंध से भर गई जैसे मृत्यू ने
18:25जीवन को गले लगा लिया हो
18:28क्रमी भोजन की उस काली छाया से प्रभावित क्षेत्रों में अब पवित्र गंगाजल जैसी निर्मलधाराय स्वयं प्रकट होकर प्रवाहित होने
18:37लगी
18:38देवता गण उपर से इस परिवर्तन को निहार रहे थे और कार्तिके की इस अध्भुत क्रिपा की सराहना करने लगे
18:47तभी कार्तिके ने अनुभव किया कि कुछ जिद्धी नकारात्मक शक्तियां अभी भी गाउं के प्राचीन व्रिक्षों में समाई हुई है
18:56उन्होंने अपनी शक्ति से एक ऐसा चक्रव्यूह रचा जो उन व्रिक्षों को घेर कर उनके भीटर के अंधकार को बाहर
19:04खीचने लगा
19:06अया पान के गर्म लोहे के समान जलते हुए उन नकारात्मक अंशों ने अंतिन बार संधर्ष किया लेकिन कार्तिके की
19:14दिव्य तेज के आगे वे टिक न सके
19:17अंता वह पूरा शेत्र शुद्ध होकर एक शांत ध्यानस्थली में परिवर्तित हो गया जहां केवल इश्वर की भक्ती का वास
19:25था
19:26पुयोड के उस दुरगंधित कीचड से मुक्त होकर गाव की हवा में अब चंदन और पुष्पों की दिव्य सुगंध घुल
19:33गई थी
19:46उपका स्मरण करते हुए उस पवित्र भूमी को आशिरवाद दिया ताकि वहां फिर कभी कोई असुर अपनी चाया न डाल
19:53सके
19:55पृत्वी माता ने भी कार्ति के के इस उपकार को स्विकार करते हुए अपनी शीतल लप्टों के साथ उनका अभिननदन
20:02किया
20:04स्तंभेश्वर की वह पावन भूमी अब संपूर्ण रूप से शुद्ध होकर ब्रह्मांड के एक पवित्र तीर्थ केंद्र में बदल चुकी
20:11थी
20:13युद्ध का कोलाहल समाप्थ हो गया और अब चारों और केवल महादेव के महामंत्र का दिव्यगूंशेश रह गई थी
20:22कार्तिके ने स्तंभेश्वर के दिव्य तेज को अपने अस्त्रों में समाहित करते हुए अंधकार के अंतिम अवशेशों को मिटाने का
20:29द्रिड संकल्क लिया
20:32भगवान विश्णू ने गरुड पर आरूड होकर कार्तिके को आशिरवाद दिया और ब्रहमांदिय संतुलन बनाए रखने का मार्ग दर्शन किया
20:41कार्तिके के दिव्य अस्त्र की अगनी ने रौरव नरक की उनकालिक भरी दरारों को खोजना शुरू किया जहां मायावी शक्तिया
20:49छिपी थी
20:51आकाश में व्याप्त दिव्य उर्जा उन छिपे हुए असुरों के ठिकानों को उजागर करने के लिए एक स्वर्णिन जाल की
20:58भांती बिच गई
21:00अंधकार के उस गड महारौरव की गहराई में छुपे असुरों ने कार्तिके के तेज से बचने के लिए अपनी अंतिम
21:08माया रची
21:10भगवान शिव कैलाश से अपनी तीसरी आख खोल कर उस युद्ध क्षेत्र का सूक्ष्म निरीक्षन कर रहे थे ताकि कोई
21:17भी माया शेश न रह जाए
21:20कार्तिके ने अपने पच्चाप से उन असुरों की गुप मांद को कामपने पर विवश कर दिया जो धर्ती की पर्तों
21:27में दबे हुए थे
21:29वायुमंडल में तैरते हुए पवित्र चिन्हों ने उस नकारात्मक उर्जा को सोखना शुरू किया जिससे असुर अपनी शक्ती प्राप्त करते
21:37थे
21:39सुकर्मुख की उनकठोर पत्थरों वाली शिलाओं के पीछे छुपने की चेश्टा कर रहे असुरों पर कार्तिके का दिव्यक्रोध बरसना शुरू
21:47हुआ
21:49विष्णुजी ने अपनी शंक ध्वनी से उस चेत्र को पवित्र किया जिससे असुरों की माया कमजोर होकर बिखरने लगी
21:57कार्तिके ने एक तीवर प्रहार से रौरव की उन स्पाइक्ट स्तंभों को तोर दिया जो असुरों के लिए सुरक्षा कवच
22:05का कार्य करते थे
22:07चारों और बिखरी हुई वह राख अब एक दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हो रही थी जो पुराने पापों के अंत
22:14का प्रतीक थी
22:16पयोद की उस विशाक्त गंध वाली नदी को कार्तिके ने अपने तेज से शुद्ध जल की धारा में बदलने का
22:23प्रयास किया
22:25देवताओं के सेनापती कार्तिके का मुखमंडल उस भीशन युद्ध के अंत में भी पूर्णत है शांत और अडिक दिखाई दे
22:32रहा था
22:34असुरों की अंतिम टोलियों ने मिलकर कार्तिके पर प्रहार करने की धृष्ट ताकी परंतु वे उनके तेज के सामने टिक
22:42न सके
22:43ब्रहमांड के रक्षक के रूप में कार्तिके ने उन असुरों की माया को उनके ही दुर्ग के मलबे के नीचे
22:50दबा दिया
22:52आयापन के उस नरक में दहकते हुए कांस्य के पात्र अब ठंडे पड़ गए थे क्योंकि असुरों की अगनी शान्थ
22:59हो चुकी थी
23:01भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए कार्थिके को संकेत दिया कि अब यह लोग पूरी तरह से शुद्ध और सुरक्षित हो
23:08चुका है
23:11कार्थिके ने अपने दिव्यास्त्र को पुन्धारण किया और उस स्थान के केंद्र में महादेव के नाम का स्मरण किया
23:19संपूर्ण ब्रह्मांड में एक नई शान्ती का संचार हुआ जैसे कि युगों पुराना अंधकार स्तंभेश्वर के उस चमतकार से मिट
23:27गया हो
23:29ब्रह्मांड के आकाश में स्वर्ण में आभा बिखेरते हुए ब्रह्मा और विश्णु का अवतरण हुआ जिससे संपूर्ण समुद्र तट एक
23:37दिव्य प्रकाश से जग्म का उठा
23:40विश्णु ने सौमय द्रिष्टी से कार्थिके को देखा और मंद मुस्कान के साथ उस पवित्र लिंकी महिमा का गुनगान किया
23:49कार्थिके ने नतमस्तक होकर त्रिलोकी के रक्षकों को प्रणाम किया और उनसे इस स्थान के उध्धार के लिए प्रार्थना की
23:58समुद्र की लहरेन शान्थ होकर ब्रहमा और विश्नु के चर्णों को स्पर्ष करने लगी, जैसे वे स्वय इस दिव्य भेंट
24:06के प्रती अपना सम्मान व्यक्त कर रही हो
24:09ब्रहमा जी ने अपने मुख से वेदों के मंत्रों का उच्चारण किया, जिससे स्तम्भेश्वर की भूमी पर एक अद्रिश्य रक्षा
24:17चक्र का निर्मान हो गया
24:19विश्णु के हाथों से प्रकट हुई एक दिव्य नीली जोती ने शिवलिंग को घेर लिया, जिससे उसकी आभा और अधिक
24:27तेजस्वी हो गई
24:29कार्तिके की आखों में अब गलानी के स्थान पर इश्वर की कृपा का आनंद स्पष्ट दिखाई दे रहा था
24:37प्रकृती के कणकण में एक संगीत गुंजायमान हुआ, जो इस स्थान के पवित्र होने का संकेत दे रहा था
24:45ब्रहमाजी ने आकाश्वानी जैसी गंभीर ध्वनी में घोशना की की यह स्थान अब स्तंभेश्वर महादेव का निवास कहलाएगा
24:54विष्णु ने पुष्टी की की इस थल पर जो भी भक्त समुद्र के जवार के साथ महादेव की पूजा करेगा,
25:01उसके समस्त पाप धुल जाएंगे
25:04समुद्र के भीतर से उठती हुई तरंगे शिवलिंग के चारों और एक अभिशेक का जलधार प्रवाहित करने लगी
25:23स्वरूप विस्तृत कर रहा था
25:26कार्तिके ने दोनों देवताओं के चर्णों को स्पर्श किया और अपनी आत्मिक शांती को पूर्ण पाया
25:33भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह तीर्थ सदियों तक मानवता को मोक्ष का मार्ग दिखाएगा
25:41हवाओं ने महादेव के नाम का कीर्तन प्रारंब किया जिससे समूचा तट भक्ती के सागर में डूब गया
25:49ब्रहमाजी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की कुछ बूंदे समुद्र में अर्पित की जिससे जल का रंग नीले से
25:56स्वर्णिम हो गया
25:59संपूर्ण ब्रहमाण्ड के नक्षत्र इस अध्भुत क्षन को निहारने के लिए एक सीध में आ गए
26:06स्तंभेश्वर के उस पावन धाम में अब समय जैसे थम गया था केवल भक्ती और शान्ती का वास था
26:14कार्तिकेय ने महादेव के नाम का स्मरण करते हुए उस पवित्र तीर्थ को नमन किया जो अब युगों-युगों के
26:20लिए अमर हो चुका था
26:23महासागर की लहरेन धीरे-धीरे पीछे हट रही थी, मानुस्वयन समुद्र देव कार्तिकेय के इस पावन संकल्प को नमन कर
26:31रहे हुँ
26:33भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से जागे और उन्होंने कार्तिकेय की ओर देख कर एक सौमे मुस्कान बिखेरी
26:42कार्तिकेय ने अपने हाथों को जोड़ कर उस शिव लिंग को स्पर्ष किया, जिसके कनकन से शांती का अनंत स्रोत
26:48प्रवाहित हो रहा था
26:51स्तंभेश्वर की उस भूमी पर आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी, जिससे संपूर्ण वातावर्ण सुगंधित हो गया
27:00समुद्र का शांत जल अब एक दरपन की भानती स्थेर हो चुका था, जिसमें स्रिष्टी की समस्त उर्जा प्रतिविंद के
27:07रूप में चमक रही थी
27:10भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थामे हुए कार्तिकेय को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह स्थान अब दुखों के
27:17नाश का सबसे बड़ा केंद्र बनेगा
27:21कार्तिकेय की आखों में अब पश्चाताप की अगनी शान्थ हो चुकी थी और उनकी जगह एक दिव्य तेजने ले ली
27:28थी
27:30हवाओं में शंखनाद की गूँच सुनाई दी, मानो दसों दिशाएं इस शुब संकल्प के लिए एक जुठ हो गई हो
27:38धर्ती की गहराई से निकली उर्जा ने उस स्थान को एक अद्रिश्य सुरक्षा कवच से ढख दिया, जिसे कोई भी
27:45नकारात्मक शक्ती भेद न सके
27:48विश्णुजी ने कार्ती के के सिर पर अपना आशिरवाद रखा, जिससे उनके भीतर का हर द्वंद्व समाप्थ हो गया
27:57कार्ती के ने संकल्प लिया कि जो भी भक्त यहां पूर्ण भक्ती के साथ आएगा, उसके मन की लहरे भी
28:03समुद्र की तरह शान्थ हो जाएंगी
28:17प्रकार व्यवस्थित किया कि वह एक प्रवेश द्वार की भांती प्रतीत होने लगा
28:23भगवान विश्णुने घोशना की कि स्तंभेश्वर केवल एक तीर्थ नहीं, बलकि मोक्ष का वह मार्ग है, जो हर हृदय को
28:31शुद्ध करता है
28:33कार्तिके के पच्चिनहरेट पर अनकित हो गए, जो युगों तक भक्तों के लिए प्रेणा के केंद्र बने रहेंगे
28:41आस्मान का रंग गहरा सुनहरा हो गया, मानो स्वयं प्रकृती इस शान्ति पूर्ण क्षण का अभिनंदन कर रही हो
28:50स्तंभेश्वर महादेव का वह शिव लिंग अब एक प्रकाश स्तंभ की भांती समुद्र के मध्य अपनी आभा बिखेर रहा था
28:58देवता गण अपने स्वर्गिय विमानों से नीचे देख कर इस द्रिश के अग्भुत व्यभव पर आश्चर्यच्कित थे
29:07कार्तिके ने अंतिम बार उस पवित्र स्थान को नमन किया और उनकी आत्मा अब पूरी तरह मुक्त थी
29:15स्तंभेश्वर की वह पावन भूमी अब इतिहास के पन्नों में अमर्ता का प्रतीक बनकर अनकित हो गई
29:22स्तंभेश्वर की शांत लहरों के बीच सहसा आकाश से एक स्वर्णिन प्रकाश की किरण नीचे उत्री और संपूर्ण वातावर्ण दिव्यध्वनियों
29:31से गुंज उठा
29:33भगवान विश्णु का चतुर्भुज रूप गरुड पर विराजमान होकर प्रकट हुआ उनकी मंद मुस्कान में ब्रहमांड के समस्त रहसियों का
29:41सार समाहित था
29:44कार्तिकेय ने अपने मयूर वाहन को थामते हुए उन दिव्य नेत्रों में देखा जो स्रिष्टी के पालनहार के अनंत धैर्य
29:51को दर्शा रहे थे
29:54समुद्र के उस छोर पर जहां जल और आकाश का मिलन होता है एक अद्रिष्य शंक ध्वनी ने भविश्य के
30:01नए मार्क का उद्गोश कर दिया
30:04भगवान विश्णु ने अपनी गदा से उत्तर दिशा की ओर संकेत किया जहां हिमालय की बरफीली चोटिया धर्म के पुनुरुथान
30:12की प्रतीक्षा कर रही थी
30:15देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को जंकृत किया जिससे निकलने वाले स्वर कार्तिके के हृदय में एक नया
30:22संकल्प जागरित कर रहे थे
30:25कार्तिके के हाथ में स्थित वेल अचानक तीवर ज्वाला की भांती चमकने लगी, जो उनके अगले कर्तव्य का आभास करा
30:33रही थी
30:35आकाश में देवताओं का समोह एक दिव्य माला की भांती चमक रहा था, जो इस महानायक के अगले प्रस्थान की
30:42साक्षी बन रहा था
30:45संपूर्ण हिमालय का क्षेत्र मानो एक महायग्य की वेदी की भांती पवित्र और धधकते हुए तेज से उत्प्रोथो उठा था
30:54भगवान शिव अपने कैलाश के आसन पर बैठे अपनी योग निद्रा से जागरित हुए और उन्होंने कार्तिके के प्रस्थान का
31:02मंगल में आशिरवाद दिया
31:05कार्तिके ने अपने मयूर की पीठ पर सवार होकर उत्तर की ओर उडान भरी उनके पीछे बादलों में एक स्वर्णिम
31:13मार्ग बन गया था
31:15यह यात्रा केवल एक दिशा की ओर नहीं बलकि धर्म के गौरव को पुनह स्थापित करने का एक चिरंतन अभियान
31:22था
31:24देवताओं के विमानों ने भी उनके अनुगम्न में हिमालय की उंचाईयों की ओर गती पकड़ ली जिससे आकाश में रंगों
31:31की छटा बिखर गई
31:34भगवान विश्नु गरूर पर सवार होकर कार्तिके के पथप्रदर्शक के रूप में उनके साथ साथ चल रहे थे
31:42मयूर के पंकों की फड़फडाहट से ब्रहमांड में एक ऐसी दिव्य उर्जा उत्पन हुई जिसने हिमालय की बर्फ को भी
31:49चमकने के लिए मजबूर कर दिया
31:52आकाश का वह द्रिश्य दिव्य वैभव का प्रतीक था जहां एक योध्धा अपने नए उत्तरदायत्व की ओर बढ़ रहा था
32:01हिमालय के दुरगम रास्तों पर देवताओं का काफिला एक नदी की भांती बह रहा था जिसमें धर्म की ही धारा
32:09प्रवाहित थी
32:11ब्रहमाजी के मुख से निकले वेद मंत्रों की ध्वनी उन पहाडियों की गूंज बनकर संपूर्ण वातावर्ण को पवित्र कर रही
32:18थी
32:20कार्तिके की दृष्टी अब केवल लक्षे पर थी और उनका साहस हिमालय की चोटियों से भी कहीं अधिक उचा और
32:27अडिक था
32:28इस प्रकार एक महानायक का नया अध्याय आरंभ हुआ जो आने वाले युगों के लिए धर्म का मार्ग प्रशस्त करने
32:36वाला था

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