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In this intense episode of the Skanda Purana, we witness the divine manifestation of Lord Shiva's Avadhuta Avatar. As Tarakasura’s dark sorcery reaches its peak, the celestial forces face a terrifying void of hope. Discover the cosmic secret behind the Avadhuta form and how it shifts the balance of the war. #SkandaPurana #LordKartikeya #HinduMythology #AvadhutaAvatar #Tarakasura #SanatanDharma #IndianHistory #PuranicTales
Transcript
00:00तारकासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान करते हुए रणभूमी को एक घने और अभेध्य अंधकार से ढख दिया, जिससे
00:08देव सेना में हडकम्प मच गया।
00:11भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस माया को भामपते हुए भगवान शिव की ओर देखा, जिनके मुख पर एक
00:19शान्थ परंतु गंभीर गंभीरता व्याप्त थी।
00:23रणभूमी के केंद्र में असुर सेना के भयानक योध्धा इस गहरे धुएं और काली छाया का लाब उठाकर देवताओं पर
00:31छिपकर प्रहार कर रहे थे।
00:33युद्ध का आकाश अब पूरी तरह से काला पड़ चुका था, जहां केवल असुरों की अटहास और हथियारों के टकराने
00:41की गूंच सुनाई दे रही थी।
00:44देवराज इंद्र ने अपना वजर चमका कर अंधेरे को चीरने का असफल प्रयास किया, जिससे उनकी चिंता और बढ़ गई।
00:53भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख को हलका सा प्रजवलित किया, जिससे वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा का संचार हुआ।
01:02असुरों द्वारा छोड़ी गई काली माया के कीडे देव सेना के सैनिकों के कवच पर चिपक कर उन्हें शिथिल करने
01:09लगे।
01:10यह काला अंधकार कोई सामान्य रात्री नहीं, बलकि तारकासुर के तंत्रमंत्र से उपजी एक मानसिक और भौतिक बाधा थी।
01:19सकंध ने अपने तेजस्वी स्वरूप को प्रकट करते हुए अपनी सेना का साहस बढ़ाया और अंधेरे को चुनोती दी।
01:29नारद मुनी ने वीना के तार छेड़ कर मंत्रों का उच्चारण किया, जिससे देवताओं के आत्म विश्वास में पुना वृद्धी
01:36हुई।
01:38अंधेरे के भीतर छिपे असुर सेनापती ने अपनी माया का विस्तार करते हुए एक विशाल काली छाया बनाई।
01:46रनभूमी के चारों और लाल अगनी की लप्तें इस प्रकार नाच रही थी, जैसे वे स्वय तारकासुर के कुटिल अहंकार
01:54का प्रतिनिधित्व कर रही हुँ।
01:56देवताओं के रथों के पहिये इस चिपचिपी और काली माया में धंसने लगे, जिससे उनकी गती अवरुद्ध हो गई।
02:05गनेश जी ने अपनी सून से एक गंभीर ध्वनी उत्पन्न की, जो उस मायावी अंधेरे को विचलित करने लगी।
02:14असुरों के प्रहार अब अधिक तीवर हो गए थे क्योंकि वे जानते थे कि देव सेना अपनी दृष्टिक हो चुकी
02:21है।
02:23अंधेरे के उस अतलगर्त में केवल देवताओं के शस्त्रों की चमक ही एक मात्र दिशानिर देशक बची थी।
02:30तारकासुर अठास करता हुआ अंधकार के बीच एक विशाल आकरिती बनकर उभरा, उसका क्रोध ज्वालाओं के समान था।
02:40भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य शंक को धारण किया, जिससे उत्पन्न ध्वनी ने मायावी बादलों को कुछ खशनों के लिए
02:47हटा दिया।
02:49सकंद की शक्ती और विश्णू की ध्वनी के संगम ने उस घने अंधेरे में पहली बार प्रकाश की किरन बिखेरी।
02:58रणभूमी का वह अंधकार में अध्याय एक निरनायक मोर पर था, जहां देवताओं का संकल्प असुरों की माया से टक्रा
03:05रहा था।
03:07तारकासुर की मायावी शक्तियों ने रणभूमी के उस प्रकाश को निगल लिया और चारों और एक भयावह सन्नाटा चा गया।
03:16भगवान विश्नु का मुख मंडल चिन्तित था, क्योंकि उनके सुदर्शन चक्र की चमक भी उस असुर के गहन अंधकार के
03:23आगे मंद पढ़ने लगी थी।
03:26इंद्रदेव के वजर से निकलती चिंगारिया उस मायावी अंधकार की दीवारों से टक्रा कर वापस उनही की ओर लपक रही
03:34थी।
03:35पूरे रणक्षेत्र में एक ऐसा नकारात्मक स्पंदन फैला मानो ब्रहमान के प्राण ही धीरे-धीरे समाप्थ हो रहे हो।
03:44देवराज इंद्र ने व्याकुल होकर अन्य देवगणों की ओर देखा, जिनकी आखों में हार का भैस पष्ट दिखाई दे रहा
03:52था।
03:53तभी देवगुरु ब्रहस्पती ने आगे आकर अपनी ज्यान की रश्मियों से उस अंधकार को चीरने का असफल प्रयास किया।
04:01असुरों की सेना ने उन स्तंभों के पीछे से निकल कर देवताओं पर काली शक्तियों का भीशन प्रहार करना आरंभ
04:09कर दिया।
04:11अंधकार का वह घेरा इतना घना था कि दिव्य अस्त्रों की शक्ती भी उसके भीतर जाकर निर्जीव सी पड़ गई।
04:19धर्ती काम्प उठी थी क्योंकि तारकासुर का माया जाल अब देवताओं के कवच को भी भेदने की चेश्टा कर रहा
04:26था।
04:28भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से स्थिती को भामपते हुए देवताओं को सन्यम बनाए रखने का आदेश दिया।
04:36असुर सेनापती का अटहास उस संपूर्ण ख्षेतर में गूझ उठा, जो देवताओं के मनोबल को खंडित करने का प्रयास था।
04:45प्रत्येक देवता अपनी शक्तिक होता हुआ महसूस कर रहा था, क्योंकि वह काला कुहासा उनकी प्रान उर्जा को सोख रहा
04:53था।
04:54अगनेदेव ने अपनी प्रखर ज्वालाओं को प्रजवलित करने का प्रयास किया, किन्तु वे भी उस मायावी शीतलता के आगे बेबस
05:02हो गए।
05:04रनभूमी के वातावर्ण में व्याप्त लोहे और राख की गंध देवताओं के लिए दम घोटने वाली साबित हो रही थी।
05:12देवताओं के संगठित व्यूह में दरारें पढ़ने लगी थी और वे अलग्थलग होकर असुरों के घेरे में फंस्ते जा रहे
05:19थे।
05:21ब्रहमाजी ने मानसरोवर की ओर देखते हुए देवताओं के लिए एक गुप्ट संदेश का आहवान किया।
05:29उस अंधकार के बीच भी सकंद की उपस्थिती एक ध्रुवतारे की भांती अडिग और प्रभावशाली बनी हुई थी।
05:37तारकासुर ने अपनी शक्तियों को और अधिक केंद्रित करते हुए पूरे रनक्षेत्र को एक महाशून्य में बदलने का प्रयास किया।
05:46देवताओं का धैर्य अब पूरी तरह तूट रहा था। वे अपनी नेती को उस गहरे गर्त में डूपता देख रहे
05:53थे।
05:54अंधेरे के इस पराकाश्ठा पर सकंध ने अपने हाथों से एक दिव्य चक्रव्यू रचने का संकल्प ले लिया।
06:02रनक्षेत्र के उपर आकाश में रौरव नरक की काली ज्वालाए धधकने लगी, जहां लोहे के खंभों पर भीशन अगनी का
06:10तांडव दिखाई दे रहा था।
06:12नारद मुनी ने रौरव की इस विभीशिका को देखा और अनुभव किया कि अब केवल महादेव की अमोख क्रिपाही इस
06:21चून्य को भर सकती है।
06:24मुनी ने अपनी वीना के तारों पर एक ऐसा स्वर छेडा जो रौरव की आग के बीचों बीच नीले प्रकाश
06:31की एक रेखा खीच गया।
06:33चारों और सन्नाटा चा गया। मानो संपूर्ण स्रिष्टी ने अपनी सांसे रोक ली हो ताकि अवधूत के आगमन की गूंच
06:41सुनी जा सके।
06:43तभी महादेव के ध्यान से निकले हुए एक सुक्षम अंशने रौरव की उन लोहे की दिवारों को भेदना आरंभ किया।
07:02का एक दैविय आभामंडल उस भीशन गड़े के उपर चा गया, जिसने दानवों की शक्तियों को कुचलना शुरू कर दिया।
07:11अंधेरे के वेस्तंभ जो तारकासुर की माया का आधार थे, अब स्वर्ण की अगनी में पिघल कर राख होने लगे।
07:19पूरे रनक्षेत्र में फैली हुरी नकारात्मक उर्जा अब एक दिशाहीन भवर में तब्दील हो चुकी थी।
07:27देवतागन विसमय से देख रहे थे कि कैसे महादेव की एक इच्छा मात्र से असुरों का पूरा आधार धराशाई हो
07:35रहा है।
07:36अवधूत की शक्ती अब एक दिव्य गर्जन के रूप में प्रकट हुई जिसने रौरव के गर्भ को चीर दिया।
07:44वह दिव्य ध्वनी ही स्वयन शिवमंत्र का सार थी जिसने अंधकार को सदा के लिए विलीन करने का आदेश दिया।
07:53तारकासुर की बची-खुची आसुरी सेना उस दिव्य प्रकाश से बचने के लिए पाताल की गहराईयों में छिपने लगी।
08:01नारद मुनी ने हाथ जोड कर महादेव का ध्यान किया और उस अवधूत अवतार की जयकार की।
08:08अब रणक्षेत्र का वह भयानक महाशून्य धीरे-धीरे दिव्य सुनहरे प्रकाश से भरने लगा था।
08:16प्रकाश की यह लहर सकंद के उस चक्रव्यू तक पहुँची जिसने उसे और भी अधिक शक्तिशाली और अभेध्य बना दिया।
08:24शिव का वह अवधूत रूप अब अद्रिश्य होते हुए भी पूरे ब्रहमांड में अपनी उपस्थिती का एहसास करा रहा था।
08:33तारकासुर की माया का अंत निश्चित था क्योंकि अब उसका सामना स्वय महाकाल के उस निराकार स्वरूप से होने वाला
08:41था।
08:43समस्थ स्रिष्टी में एक नई उर्जा का संचार हुआ, मानो काल का चक्र पुन्ह धर्म के मार्ग पर अग्रसर हो
08:49गया हो।
08:51अवधूत के इस रहस्य ने सकंद के साहस को वह नई गती दी, जो आने वाले निरनायक युद्ध के लिए
08:58अनिवार्य थी।
09:00रणभूमी के केंद्र में अचानक समय की गती थम गई और एक अद्भूत दिव्य आभा के साथ अवधूत का आगमन
09:08हुआ, जिसकी तेज से संपूर्ण वातावर्ण आलोकित हो उठा।
09:12भगवान विश्णु अपनी योगनिद्रा से जागरित होकर उस अवधूत के स्वरूप को निहारते हैं, मानोवे स्वयंकाल के उस निराकार अंश
09:21को पहचान रहे हूं।
09:24अवधूत की उपस्थिती मात्र से ही तारकासुर के विशालकाय दानव सैनिकों के शस्त्र अपने आप ही धूल में परिवर्थित होने
09:32लगे।
09:54कर दिया। देवराज इंद्र ने अपने सिनहासन से उठकर उस तपस्वी को नमन किया, क्योंकि वे जान चुके थे कि
10:02यह कोई सामान्य भिक्षुप नहीं, अपितुस्वयं महादेव का अंश है।
10:24अपने स्मर्थ रहे और उनके पास पहुचते ही विलीन हो गए।
10:28दानव सेनापती हताशा में अपने शस्त्रों को पटकने लगे, क्योंकि अवधूत की आखों की ज्वाला ने उनके अहंकार को उसी
10:37क्षन भस्न कर दिया था।
10:39देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को छेडा, जिससे निकलने वाले नाद ने अवधूत के आगमन की विजय घोशना
10:47कर दी।
10:49अवधूत ने अपनी एक उंदली उठाई और देखते ही देखते तारकासुर का मायावी अभिद्य किला दरारों में तब्दील हो गया।
10:58वातावर्ण में एक गहन निरवता चा गई, जहां केवल अवधूत की सांसों का स्वर सुनाई दे रहा था, जो स्रिष्टी
11:06के हरकन को प्रभावित कर रहा था।
11:09स्कंद ने अपने पिता स्वरूप उस अवधूत को देखकर अपना धनुष नीचे कर लिया, क्योंकि उन्हें ग्यात हो गया था
11:17कि अब शस्त्रों की आवश्शक्ता नहीं रही।
11:20स्वय अगनी देव ने अपनी ज्वालाओं को शांत कर लिया और अवधूत के चर्णों में सादर नत्मस्तक हो गए।
11:28युद्ध का शोर अब एक दैविय संगीत में बदल चुका था, जो अवधूत के संकल्प को पूरी स्रिष्टी तक पहुँचा
11:36रहा था।
11:38अवधूत ने एक मंद मुस्कान बिखेरी, जिससे तारकासुर का समस्त सैने बल अपने आप ही रनभूमी से लुप्थ होने लगा।
11:47महाकाल का यह निराकार स्वरूप अब अपनी पूर्ण तीवर्ता के साथ प्रत्यक्ष खड़ा था, जिसका कोई अंत या आरंभ नहीं
11:55था।
11:56स्रिष्टी के समस्त देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की, क्योंकि अन्याय का सबसे गहरा अंधकार अब समाप्त होने की
12:04कगार पर था।
12:07तारकासुर अपने अंतिनक्षणों के भय से कांप रहा था, क्योंकि अवधूत की द्रिष्टी अब सीधे उसकी आत्मा को विदीन कर
12:14रही थी।
12:16अवधूत के रहस्य से परदा उठ चुका था, और धर्म के इस युद्ध में अब एक ऐसे युग का आरंभ
12:23हुआ, जिसकी कल्पना किसी ने न की थी।
12:26अवधूत के मुख से निकला वह प्रथम ध्वनिनाद, महा भयानक रौरव नरक की काली ज्वालाओं के समान पूरी रणभूमी में
12:34गूम्ष उठा।
12:36भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस गर्जना का प्रभाव देखा और गरुर पर आरूड होकर सुक्ष्म जगत की गतिविधियों
12:44का सुक्ष्म निरीक्षन किया।
12:46उस प्रचंड नाद के टकराते ही तारकासुर की मायावी काली दिवारे काच की तरह बिखरने लगी और राक्षसी सेना का
12:55असली वीभत्स स्वरूप सब के सामने आ गया।
12:59वातावर्ण में एक तीक्षना और भयावह कमपन चा गया जो अधर्म के अंत के संदेश के रूप में नरक्की दीवारों
13:06को दहला रहा था।
13:08रौरव की उन अथा गहरायों में जहां आग कभी नहीं बुच्ती वहां अब अवधूत का तेज एक दिव्य सूर्य की
13:16भांती चमक रहा था।
13:19देवराज इंद्र ने चकित होकर देखा कि कैसे अवधूत के एक संकेट मात्र से राक्षसी शक्तियों के छग्म कवच धूल
13:27में मिल रहे थे।
13:29तारकासुर की सेना के योध्धा अपने ही मायावी जाल में फंसकर एक दूसरे पर प्रहार करने लगे क्योंकि उनका मानसिक
13:37संतुलन पूरी तरह नश्ट हो चुका था।
13:40उस भीशन अंधकार के बीच नरक के लोहे के खंभे अपनी जगह से उखड कर राख में बदलने लगे थे
13:47जो विनाश का अंतिन संकेत था।
13:51अवधूत के चर्णों के नीचे की धर्ती कांप रही थी, मानोस्वय रौरव लोक भी उस महान शक्ती के भार को
13:58सहन करने में असमर्थ हो।
14:01नारद मुनी ने अपनी वीना को थामते हुए इस अनूठे द्रिश को ब्रहमांड के इतिहास में अनकित होते देखा और
14:08नारायन का ध्यान किया।
14:11तारकासुर की उस विशालकाय सेना में एक अजीब सी चीख मच गई, क्योंकि उनकी माया का आवर्ण पूरी तरह नश्ट
14:19हो चुका था।
14:21वातावर्ण में घुली दुरगंध और राख का गुबार अब अवधूत के ओज से पवित्र होने के लिए छंटने लगा था।
14:40तारकासुर जो अब भी अपने अवधूत स्वरूप में स्थिर थे, उनकी तीसरी आख से निकलने वाली किरने रौरव की सीमाओं
14:47को भेद रही थी।
14:50तारकासुर ने अपनी गदा उठाने का प्रयास किया, किन्तु उसके हाथ काम प्रहे थे और उसके शस्त्रों की शक्ती का
14:57लोप हो रहा था।
14:59नरक की वह भीशन अगनी, जो अब तक पापियों को जलाती थी, अब धर्म के रक्षक के आदेश पर राक्षसों
15:07को ही अपनी लप्टों में लपेट रही थी।
15:10ब्रहमांड के समस्त लोकों में यह स्पष्ट हो गया था कि अब तार का सुर का कोई भी माया जाल
15:16उसे काल के ग्रास से नहीं बचा सकता।
15:20नारायन के सुदर्शन चक्र की आभा उस नरक के अंधेरे में एक दिव्य सेतू की भानती चमकने लगी, जो सत्य
15:27की विजय का द्वार था।
15:30अंधेरे के वे राक्षस, जो अब तक अजे बने हुए थे, अब अवधूत की तेजस्विता के सामने केवल राख के
15:37धेर बनकर रह गए थे।
15:40अवधूत के रहस्य का अर्थ अब यह युद्ध नहीं, बलकी अधर्म का संपूर्ण विनाश था, जो ब्रहमांड के अगले अध्याय
15:48की नीम रख रहा था।
15:51तारकासुर ने अपनी शक्तियों के दर्प में भरे हुए, उस शांत अवधूत की ओर एक क्रूर उफास भरी द्रिष्टी डाली,
15:58मानो उसे काल का बोध ही नहो।
16:01स्वय नारायन अपने चतुर्भुज स्वरूक में उस भीशन युद्ध के मध्य प्रकट हुए, जहां उनके हाथ में स्थित सुदर्शन चक्र
16:10की आभातारकासुर के अंधकार को चीर रही थी।
16:14नारायन के मुख से निकली हुई एक दिव्यहुंकार ने उस पूरे रौरव छेत्र के धधकते हुए स्तंभों को जैसे स्थिर
16:21कर दिया, जिससे राक्षसों की सेना में खलबली मच गई।
16:25उस अगनी के महासागर के बीच अवधूत ने अपने खपर को उठाया, जिसमें ब्रहमांड के विनाश का मौन संगीत समाहित
16:34था।
16:35तारकासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का जाल बुना, किन्तु अवधूत की शून्यता के सामने उसका हर प्रहार एक व्यर्थ प्रयास
16:44सिध्ध हो रहा था।
16:46भवान शंकर ने अपने अर्धनारीश्वर स्वरूप के उस एक अंश से जो अवधूत बना था, तारकासुर को चेताबनी दी की
16:55अधर्म का अंत अब सुनिश्चित है।
16:58अगनी की लप्टे तारकासुर के कवच को जुलसाने लगी, क्योंकि अवधूत का तेज अब उस दैत्य की सहनशक्ती से परे
17:06हो चुका था।
17:08ब्रहमांड के समस्ट नक्षत्र उस अनहोनी के गवाह बन रहे थे, जहां एक नश्वर दैत्य एक दिव्य अवधूत को चुनौती
17:16देने का दुस्साहस कर रहा था।
17:19अवधूत के चारों और जमा हुआ वह भयाव कालंधकार धीरे-धीरे लुप्त होने लगा और उसके भीतर से शुद्ध चैतन्य
17:27की किरने फूटने लगी।
17:29देवर्शी नारद उस दृष्य को देखकर विस्मय में भर गए क्योंकि उन्होंने स्रिष्टी के रच्चिता और संहारक का अध्भुत मिलन
17:38देख लिया था।
17:40तारकासुर ने अपनी गदा घुमा कर एक प्रहार किया, किन्तु वह गदा हवा में ही राख बनकर बिखर गई, जैसे
17:47सत्य से टकरा कर असत्य तूट जाता है।
17:51हवा में एक रहस्य में कमपन गूंजने लगा, जो यह घोशित कर रहा था कि तारकासुर के पतन की घड़ी
17:58अब समीप आ गई है।
18:01अवधूत ने मंद मुस्कान के साथ तारकासुर की ओर देखा, मानो वह उस दैत्य के अंत के साथ साथ उसके
18:08भीतर छिपे अज्ञान का भी नाश कर रहे हूं।
18:12स्वया भगवान शिव की तेजस्विता अवधूत के माध्यम से प्रकट हुई, जिससे रौरव की काली भूमी भी स्वर्ण में प्रतीत
18:20होने लगी।
18:22तारकासुर ने भय से कापते हुए अपनी माया से स्वया को धकने का प्रयास किया, किन्तु अवधूत की द्रिष्टी से
18:29कोई भी परदा उज़ल नहीं था।
18:31पूरे ब्रहमांड में एक गंभीर सन्नाट आचा गया, मानोकाल स्वया अपने अगले कदम का इंतजार कर रहा हो।
18:41अवधूत ने अपना खपर नीचे रखा और उस दैत्य को उसके अंत की पूर्व संध्या पर एक अंतिम अफसर दिया
18:48कि वह अपने अहंकार को त्याग दे।
18:52लेकिन तारकासुर के भीतर का अंधकार इतना गहरा था कि उसने उस दिव्य करुणा को भी अपने पतन का संकेत
18:59मानकर और अधिक क्रोधित हो गया।
19:03जैसे ही उसने आक्रमन किया, अवधूत ने अपना त्रिशूल उठाया और उस एक क्षण में रौरव की संपूर्ण माया नश्ठ
19:11हो गई।
19:12अब यह स्पष्ट हो चुका था कि तारकासुर के विनाश की पराकाश था अब मात्र कुछ क्षणों की दूरी पर
19:19है।
19:21तारकासुर के सामराज्य के केंद्र में रौरव की भयानक अगनी अब स्वयन के विनाश की ज्वाला बन गई है और
19:29चारों ओर की दिवारे ढहने लगी है।
19:32भगवान विश्णु अपनी योगमाया से इस पतन को देख रहे हैं, जहां उनके नेत्रों में स्रिष्टी के संतुलन का अटल
19:40संकल्प स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
19:43दैत्य सेनाप्ती अपनी ही काली शक्तियों के वश में होकर एक दूसरे पर प्रहार करने लगे हैं क्योंकि अवधूत का
19:51तेज उनके अहंकार को भस्म कर रहा है।
19:55चारों और व्याप्त यह अंधकार अब एक भयानत प्रतीक बन चुका है, जहां लोहे के स्तंभ तारकासुर की असुर सेना
20:03के रक्ट से रंजित होकर काम प्रहे हैं।
20:07तारकासुर की माया का चक्रवियो अब तूट चुका है, जिससे उसकी बची-खुची सेना में भगदर मच गई है।
20:15स्वय भगवान शिव जो अवधूत के स्वरूप में हैं, की शांत दृष्टी से तारकासुर के भीतर का डर पराकाश्था पर
20:23पहुँच चुका है।
20:25असुर राजा के मुख से एक करुण चीख निकली, जैसे उसकी पूरी सदियों पुरानी शक्ती एक जटके में शूनिय में
20:33विलीन हो रही हो।
20:35धूल और राख के गुबार में छिपी यह रनभूमी अब एक शम्शान की भाती शांत हो रही है, जहां केवल
20:42विनाश की गूंशेश है।
20:45अवधूत के चर्णों के समीप आते ही रौरव के भीशन स्तंभ स्वयं को धर्ती के अंदर समाहित कर रहे हैं।
20:54गरुर देव आकाश से इस द्रिश्य को देखते हुए अपनी पंखों की गडगडाहट से दैत्के सेना के मनोबल को पूरी
21:01तरह तोड़ देते हैं।
21:04असुरों के हाथों से उनके अस्त्रशस्त्र छूट कर गिर रहे हैं, मानों उन्हें किसी अद्रिश्य दैविय शक्ती ने निर्बल बना
21:11दिया हो।
21:13भयावर सन्नाटा चा गया है, जो इस बात का प्रमान है कि अधर्म के सामराज्य का अंट अब निकट आ
21:20चुका है।
21:22तारकासुर ने अंतिम बार अपनी दुष्ट शक्ती का आहवान किया, परंतु उसकी मंत्र विद्या उसके ही विरुद्ध काम करने लगी
21:30है।
21:32भगवान शिव की मुस्कान में अब वह काल का महाप्रलय छिपा है, जो संपून असुरी सत्ता को निगलने के लिए
21:39तयार है।
21:41असुर सेना के कमाडरों के सिर से उनके स्वर्ण मुकुट गिरकर राख में तबदील हो रहे हैं, जो उनके पतन
21:48का अंतिम चरण है।
21:51अंधकार का सामराज्य अब अपनी ही आद में जुलसकर काल की गर्त में समाने के लिए विवश है।
21:59तारकासुर का अहंकार जो परवत के समान उचा था, अब एक छोटी सी धूल की कन की भानती अवधूत के
22:06सामने लगू हो गया है।
22:09आकाश से गिरते हुए जलते हुए उलकापेंडो ने इस युद्धक्षेत्र को एक नरक का प्रतिरूप बना दिया है।
22:18अवधूत के त्रिशूल की चमक से रौरव की भयानक दीवारें धीरे धीरे ढहकर धूल में परिवर्तित हो रही है।
22:26अब तार का सुर पूरी तरह अकेला है जिसके चारों और का अंधकार अब उसी के विनाश का अंतिम गवाह
22:33बन रहा है।
22:35कार्तिकेय ने अपनी द्रिश्टी उस अवधूत पर स्थिर की जिसके हर श्वास में ब्रह्मांड की स्थिर्ता और विनाश का अध्भुत
22:43संतुलन समाहित था।
22:46भगवान विश्टी ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरुड की पीठ पर आरूड होकर इस अलौकिक द्रिश्य का अवलोकन करते
22:54हुए कहा कि आज युद्ध नहीं बलकि चेतना का रुपांतरन हो रहा है।
23:00अवधूत के त्रिशूल से निकलती हुरी दिव्यकिर ने तारकासुर के चारों और बने भ्रम के जाल को चीरते हुए सत्य
23:07का प्रकाश फैला रही है।
23:31गेहन ध्यान की मुद्रा में स्थित कार्ति के एके मस्तिश्क में उन सभी वेद मंत्रों का संचार हुआ जो संसार
23:38के संचालन का मूल आधार है।
23:42अवधूत के चर्णों के पास बिखरी हुई असुर सेना के अस्त्रशस्त्र अब धूल में बदल कर शांती की गवाही दे
23:49रहे हैं।
23:51इस विनाशकारी स्थान पर सत्य और असत्य का मिलन एक ऐसे धरातल का निर्मान कर रहा है जहां युद्ध अब
23:59केवल एक कर्म मात्र है।
24:02भगवान कार्तिके ने अपने हृदय में उस विशालता का अनुभव किया जो समस्थ असुरों की शक्ती को भी एक बिंदु
24:10के समान तुछ बना देती है।
24:13देवर्शी नारद ने वीना के तार छेरते हुए उस अलौकिक संगीत की रचना की जो कार्तिके के भीतर की शांत
24:21चित्त स्थिती को और प्रगाड कर रहा है।
24:25रणभूमी की धूल अब मंत्रो चार की उर्जा से शुद्ध होकर एक स्वर्णिम प्रकाश के आवर्ण में बदल रही है।
24:33आमकार के परित्याग का वहक्षन उपस्थित हुआ है, जहां तार कासुर का अस्तित्व अब केवल एक स्मृती के रूप में
24:41शेश रह जाएगा।
24:43कार्तिके का मुख मंडल अब एक ऐसे तेज से चमक उठा है, जिसे देखकर देवगण भी नत्मस्तक होने पर विवश
24:51हो गए हैं।
24:53अवधूत ने अपनी मौन उपस्थिती से कार्तिके को वहर दिशा दिखाई है, जहां नेत्रित्व केवल शस्त्र से नहीं, अपितु आत्मसन्यम
25:02से संभव है।
25:04हवाओं में तैरती हुई गंध अब रक्त की नहीं, बलकि शुद्ध हवन कुंड की पावन सुगंध की भांती प्रतीत हो
25:11रही है।
25:13इस भीशन रौरव में भी अब कार्तिके को केवल अपने धर्म का मार्गी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
25:22तारकासुर की बची-खुची शक्तियां अब एक-एक करके आत्मस्मरपन करती हुई अंधकार में विलीन हो रही है।
25:31भगवान शिव ने हिमालय की चोटियों से इस अंत का संकेत पाकर अपनी तीसरी आख को शांत कर लिया है।
25:39कार्तिके के हरिदय में अब केवल करुणा और न्याय का भाव है, जिसने युद्ध के उग्रस्वरूप को पूर्णत है त्याग
25:46दिया है।
25:48ब्रहमांड के इस महा संग्राम का अंतिम्चरण अब एक नए युग के उदे की प्रतीक्षा कर रहा है।
25:56हिमाले की बरफीली चोटियों के चारों और दिव्य प्रकाश का एक ऐसा घेरा बना है, जो सम्पून ब्रहमांड को एक
26:04नई उर्जा से भर रहा है।
26:07भगवान विश्णु ने अपने गरूर पर विराज मान होकर देखा कि किस प्रकार अवधूत के प्रताप से देवताओं का आत्म
26:15विश्वास फिर से जागरित हो रहा है।
26:19देवताओं की मुर्जाई हुई सेना में एक अलौकिक तेज का संचार हुआ, जिससे उनके शस्त्रों की चमक पुनह सूर्य के
26:26समान प्रकर हो उठी।
26:29आकाश में गूंजता हुआ शंकनाद यह घोशना कर रहा है कि अब विनाश की संध्या समाप्त हो चुकी है और
26:37धर्म की विजय का शंक फूका गया है।
26:40किन शिकरों के बीच से एक दैविय शीतलता प्रवाहित हो रही है, जो तारकासुर की असुर शक्तियों के प्रभाव को
26:48धीरे-धीरे निश्प्रभावी कर रही है।
26:52देवराज इंद्र ने अपनी वजर को धारण किया, जिसका तेज अब साधारण नहीं, अपितु अवधूत के आशिरवाद से अभिमंत्रित है।
27:02रणक्षेत्र में बिखरे हुए पत्थर और धुल अब स्वर्निम आभा में बदलने लगे हैं, जैसे स्वयं प्रकृती युद्ध के घावों
27:10को भर रही हो।
27:12यह वहक्षन है जब न्याय और करुणा के मिलन से ब्रहमांड की धुरी पुनह संतुलित हो रही है।
27:19पहाडों की गुफाओं से निकले दिव्यरिशिमुनियों का समोह अपने मंत्रों से वायुमंडल को पवित्र और शांत बना रहा है।
27:29ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की वर्षा की, जिससे देवताओं के शरीर का कष्ट पल भर में
27:35दूर हो गया।
27:37सफेद बादलों की ओट में देवताओं के रत अब युद्ध के लिए नहीं, बलकि सत्य की स्थापना के लिए आगे
27:45बढ़ रहे हैं।
27:47आकाश की ओर उठती हुई यह दिव्य जोती संकेत है कि अवधूत का संकल्प सफल हो चुका है।
27:55विंध्याचल की पहाडिया भी आज इस परिवर्तन को देखकर गूँच उठी हैं और एक नया संगीत उत्पन कर रही हैं।
28:04नारद मुनी वीना बजाते हुए इस स्वर्णिन युग के आगमन का गान कर रहे हैं, जिसे सुनकर स्रिष्टी पुलकित है।
28:14देवताओं के हृदय में अब विजय की आकांक्षा नहीं, बलकि एक सुरक्षित भविश्य की सुखद अनुभूती है।
28:22शांती और न्याय के इस संगम को देखकर प्रकृती ने भी अपने रंगों को अधिक जीवन्त बना लिया है।
28:30ब्रहमांड के सभी जीव एक अनोखी स्थिर्ता का अनुभव कर रही हैं, जो सकंड की विजय का प्रथम पच्चेहन है।
28:39हिमाले की यह पवित्र भूमी आज उस अवधूत के गौरव को स्वय में संजोकर अमर हो गई है।
28:46समय का चक्र अब घूम चुका है और एक नई सुभ़ की प्रथम किरण हिमाले की वादियों में प्रविष्ठ हो
28:53रही है।
28:55अब हर दिशा में सत्य और धर्म का वास है, क्योंकि सकंड की करुणा ने अंधकार को पूर्णतय परास्त कर
29:02दिया है।
29:04हिमाले की गगंचुंबी चोटियों के बीच सन्नाटे की एक गहरी चादर बिच गई है, जो आने वाले महासंग्राम के भयावह
29:13मौन का संकेत दे रही है।
29:15भगवान विश्नु अपने दिव्यगरूर पर विराज मान होकर आकाश से इस शांती का निरीख्षन कर रहे हैं। उनके मुख पर
29:24एक गंभीर सौमयभाव है।
29:27हवा में अब धूल के कन नहीं, बलकी तारकासुर के तंत्रमंत्रों की तीखी गंध तैर रही है, जो भूमी को
29:35अभिशप्त बना रही है।
29:38हिमाले की शीतल पवन भी आज उस अद्रिश्य उर्जा के भार को सह नहीं पा रही है, जो वातावर्ण में
29:45स्थिर हो गई है।
29:58देवराज इंद्र ने भी अपना वजरकस लिया है, उनकी आखों में उस अंतिम प्रहार की प्रतीक्षा है, जो तारकासुर के
30:06अहंकार को चकनाचूर कर देगा।
30:09युद्ध क्षेत्र के मध्य में अचानक धर्ती फटने लगी है, और पाताल की अशुद्ध उजा सतह पर आने के लिए
30:16लालायत है।
30:19प्रकृती की हर शक्ती इस क्षण को थामे हुए है, मानोकाल स्वय भी एक निरनायक मोर पर आकर ठहर गया
30:26हो।
30:27सकंद की दिवे सेना अपने आयुधों को धारण कर एक ही स्वर में धर्म की विजय का उद्गोश करने हेतु
30:34ततपर है।
30:37देवर्शी नारद के मुख से निकला नारायन नारायन का नाद वातावर्ण की भयावता को चीर कर एक दिवे स्पंदन उत्पन
30:44कर रहा है।
30:47तारकासुर की शक्तियों का केंद्र अब उन पाताल की गुफाओं में है जहां वह अंतिम मायाजाल बुन्ने की चेश्टा कर
30:54रहा है।
30:56परम्पिता ब्रहमाजी ने अपनी द्रिष्टी से ब्रहमांड के संतुलन को भाम्त लिया है और वे विधाता की लेखनी को नियंत्रित
31:04कर रहे हैं।
31:06हिमालय की तलहटी में स्थित वे प्राचीन प्रस्तर खंड भी अब कांप रहे हैं जैसे वे स्वयन युद्ध की भी
31:13शंता को महसूस कर रहे हूं।
31:16शक्ती का संतुलन बिगड़ने लगा है और यह अनिश्चित्ता का समय ही वास्तव में उस प्रलै की भूमिका है जो
31:23अप्रिहार्य है।
31:26सकंद के मस्तक की वह तेजपुंज अब अधिक प्रकर हो गई है, मानो सूर्य स्वयन उनके क्रोध की अगनी में
31:33समाहित होने को आतुर हो।
31:36अंधकार के स्वामी अब अपनी सेना को उन पाताल के कुओं की ओर धकेल रहे हैं, जहां केवल विनाश का
31:43ही वास है।
31:45समय का चक्र अब रुक चुका है, क्योंकि धर्म और अधर्म की इस महा प्रीक्षा की अंतिम घडी निकट आपहुँची
31:52है।
31:54वातावर्ण में एक अध्भुत शांती है, लेकिन यह शांती उस तूफान की तरह है, जो सब कुछ ध्वस्त करने का
32:01संकल्प ले चुका है।
32:04परवत की शिलाओं पर पड़ी ओस की बून्दे भी अब ठिठक गई हैं, मानों वे भी इस महा युद्ध के
32:11साक्षी बनने को तयार हैं।
32:14अब प्रहार का समय है, क्योंकि धर्म की रक्षा के लिए सकंद का अवतरण अब अंतिम चरण की ओर अग्रसर
32:21है।

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