- 5 minutes ago
Witness the thrilling continuation of Skanda Purana Season 7, Episode 2! Dive deep into the divine strategy of Lord Kartikeya as he prepares the celestial army to counter the growing terror of Tarakasura. Explore the ancient texts, tactical formations of the Devas, and the mystical secrets of Skanda Purana Chapter 2. Don't forget to like, share, and subscribe for more epic mythological deep dives!
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
00:07bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
00:12Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
00:19bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
00:22Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
00:31bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
00:35Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
00:43bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
00:47Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
00:55bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
01:00Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
01:07bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
01:11Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
01:19bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
01:24Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
01:31bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
01:35Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
01:44bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
01:48Lord Indra and the Assembled Deities officially consecrate Kartike as the Supreme,
01:55bestowing upon Him divine weapons forged by the Trimurthy.
02:01अमर्वती की स्वर्ण नगरी में महा सेनाप्ती कार्ति के एके पवित्र आगमन से कंपित अंतरिक्ष में एक नया आत्म विश्वासी
02:09प्रकाश फैल गया.
02:11देवराज इंद्र ने अपने दिव्यस इनहासन से आगे बढ़कर कार्तिके के समक्ष नत्मस तक होकर उनका आभार व्यक्त किया.
02:20स्वर्ग के समस्थ देवगण भय को त्याग कर अपने सर्वोच सेनाप्ती की जैजैकार करने लगे जिससे सारा आकाश गूझ उठा.
02:30अमर्वती के विशाल प्रांगण में दिव्यस्वर्ण स्तंभों के बीच विजय की गाथाओं का गान गूझने लगा.
02:37कार्ति के के तेजस्वी स्वरूप को देख कर सभी रिशियों और मुनियों के हृदय में असुरों के विनाश का विश्वास
02:44जागरित हो गया.
02:46देवगुरु ग्रिहस्पती ने वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए महासेनाप्ती के ललाट पर विजय का तिलक लगाया.
02:54दिव्य अस्त्रों की उर्जा से संपूर्ण सभाकक्ष का वातावर्ण और अधिक तेजोमय तथा प्रदीप्थो उठा.
03:02स्वर्ग की अपसराओं और गंधर्वों ने पुष्प वर्षा कर इस महान एतिहासिक वेला का अभिनंदन किया.
03:10कार्तिकेय ने अपनी पैनी द्रिष्टी से तीनों लोकों की सीमाओं का निरीच्षन कर अपनी रणनीतिक हुंकार भरी.
03:17भगवान विश्णूनेक शीरसागर से अपनी दिव्यद्रिष्टी भेज कर कार्तिकेय की इस अध्भुत नेत्रित्वक्षमता की सराहना की.
03:27देव सेना के वीर सैनिकों ने अपने महासेनाप्ती के आदेश पर युद्ध अभ्यास की हुंकार भरकर आकाश को कमपा दिया.
03:36अमर्वती के विशाल द्वारों पर सुरक्षा चक्र को त्रिमूर्टी की उर्जासे और अधिक शक्तिशाली बना दिया गया.
03:45महर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर विजय का नया राग छेड़ कर तीनों लोकों में उच्साह का संचार
03:52कर दिया.
03:53इंद्रदेव के मस्तक की चिंता की रेखाएं अब पूर्णत है समाप्त हो चुकी थी और उनके चहरे पर गर्व का
04:00भाव था.
04:02कार्तिके के दिव्यमयूर वाहन ने अपनी पंखों को फैला कर संपून आकाश में स्वर्ण आभा बिखेर दी.
04:10स्वर्ग के महलों के उपर विजय पताकाएं गर्व के साथ लहराने लगी जो असुरों के अंत का संकेट दे रही
04:17थी.
04:19देवराज और अन्य देवताओं ने कार्तिके के मार्ग दर्शन में महा संग्राम की अंतिम रणनीती पर विचार विमर्ष किया.
04:28देवसेनाप्ती कार्तिके ने अपने दिव्यभाले को उठा कर समस्त देवगणों को युद्ध के लिए तैयार रहने का अंतिम उद्गोश किया.
04:38कार्तिके की इस हुमकार से सम्पूर्ण स्वर्ग लोक में एक अभूतपूर्व उर्जा तरंग दोड़ गई जिसने हर देवता को अजे
04:45बना दिया.
04:47भाय का वह अंधकार जो कभी अमर्वती पर छाया था, अब कार्तिके के प्रताप से सदा के लिए विलीन हो
04:54चुका था.
04:56पाताल लोग के गहन अंधकार में बने उस विशाल महास्भागार में असुर्राज ताड कासुर ने अपने महामंत्रियों की एक गुप्ट
05:04आपात कालीन सभा बुलाई.
05:07विशाल गर्जन करते हुए काले अश्वों पर सवार होकर क्रूर और शक्तिशाली असुर सेनाप्ती अपने भयानक हतियारों के साथ सभागार
05:16में प्रवेश करने लगे.
05:19असुर्राज ताड कासुर अपने विशाल स्वर्ण सिन्हासन पर बैठा था, जिसकी आखों में स्वर्गलोग की विजय का घमंड और कार्तिके
05:27के उदे से उपजा क्रोध साफ जलक रहा था.
05:31उस गहरी और भयावह गुफा के भीतर जल रही नीली लपतें इस बात की गवाही दे रही थी कि अब
05:38देव और असुरों के बीच महाविनाशक संग्राम अवश्य होगा.
05:43विशाल काय महाबली असुर सेनाप्ती विद्युप केतु ने आगे बढ़कर अपने भारी गदा को जमीन पर पटकते हुए अपनी क्रूरता
05:51का परिचय दिया.
05:53विद्युप केतु का भयानक चहरापसीने और गुस्से से लाल था, जिसके शरीर पर लोहे के नुकीले आभूशन और खोपडियों की
06:02माला शोभा पा रही थी.
06:04उसने अपनी लोहे की भारी मुठी हवा में उठाई और घोशना की की कोई भी बालक देवता उनके सामराज्य को
06:12चुनोती नहीं दे सकता.
06:15सभागार के उस विशाल स्तंभ पर टंगे हुए प्राचीन असुर शस्त्र इस बात के गवाह थे कि उन्होंने कभी त्रिलोकी
06:23को अपने चर्णों में जुकाया था.
06:24तब ताड़कासुर ने अपने हाथ का संकेत देकर सभा के सभी कोलाहल को शांत किया और अपनी भारी गूंजती हुई
06:34आवाज में बोलना शुरू किया.
06:37ताड़कासुर ने गर्व से भरे स्वर में कहा कि जिस बालक को देवता अपना रक्षक मान रहे हैं, वह उनके
06:44काल के समान है.
06:47उसके प्रत्येक शब्द में अहमकार का जहर था, जो सभा में बैठे हर एक असुर के भीतर युद्ध की ज्वाला
06:54को भड़का रहा था.
06:56सभागार की छट पर तंगे हुए विशाल काले नाग अपनी फन फैला कर ताड़कासुर के इस दुष्ट संकल्प का समर्थन
07:04कर रहे थे.
07:04असुर मंत्रियों में सबसे बुद्धिमान और चालाक मयूर नामक मायावी असुर ने आगया कर एक अत्यंत खतरनाक योजना प्रस्तुत की.
07:16मायावी मयूर ने अपने हाथ में एक चमकता हुआ काला यंत्र उठाया, जिसकी माया से वे देवलोग की हर गतिविधी
07:23पर नजर रख सकते थे.
07:26उस काले यंत्र के भीतर से स्वर्गलोग का वहद्रिश उभर आया, जहां कार्तिके अपनी सेना को युद्ध कौशल सिखा रहे
07:34थे.
07:35कार्तिके के उस अजे रूप को देखकर सभागार में बैठे सभी क्रूर असुरों के चहरों पर पहली बार गहरी चिन्ता
07:43की रेखाएं खिंच गई.
07:45किन्तु ताड कासुर ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए अपनी तलवार खींची और पूरी सेना को कार्तिके का वध
07:53करने का आदेश दे दिया.
07:55ताड कासुर की उस अंतिम हुमकार से पूरा पाताल लोक धर्रा उठा और काले बादलों ने उनके समर्थन में धर्ती
08:03को घेर लिया.
08:05हजारों असुर सेनाप्ती अपने भयानक रथों और अस्त्रशस्त्रों के साथ स्वर्गलोक पर आक्रमन करने के लिए पाताल से बाहर निकल
08:14पड़े.
08:15इस प्रकार अंधकार की उस विशाल सेनाने देव सेनाप्ती कार्ति के के साथ होने वाले उस अंतिम महासंग्राम की ओर
08:23अपनी पहली चाल चल दी.
08:26ब्रहमांड के सर्वोच वास्तुकार विश्वकर्मा ने दिव्य शस्त्रशाला के भीतर अनंत उर्जा से धधक्ती हुई विशाल स्वर्ण वेदिकाओं का निर्मान
08:35आरंभ किया.
08:37रिशी अगस्त्य अपनी महान आध्यात्मिक द्रिश्टी से उन दैविय अस्त्रों की शक्ती का सुक्ष्म परीच्षन करने के लिए आगे आए.
08:46दिव्य भठ्थियों से उठती हुई स्वर्ण और अगनी की भयंकर लप्टों के बीच सहस्त्रों अस्त्रों को अंतिम रूप दिया जा
08:54रहा था.
08:55यह वह पावन स्थान था जहां सृष्टी के रक्षन हेतु अजय शस्त्रों का निर्मान किया जा रहा था.
09:03विशाल काय तामबे की कढ़ाईयों और अगनी कुंदों के चारों और दिव्य मंत्रों की गूंच से पूरा प्रांगन कांप रहा
09:10था.
09:11विश्व कर्मा ने अपने विशाल हाथों से वजर के समान कठोर एक महान धाल पर पवित्र चिनह उत्कीन किये.
09:20रिशी अगस्त्य ने अपनी कमंडल के पवित्र जल से उन निर्मित अस्त्रों को अभिमंत्रित कर उनकी उर्जा को स्थिर किया.
09:29अस्त्रशाला के द्वार पर प्रज्वलित दिव्य अगनी ने समस्त वातावर्ण को स्वर्णिन प्रकाश से भर दिया.
09:36ब्रहमांड के कोने-कोने से लाई गई दुरलब धातूओं को पिघला कर वजरायुध जैसी अभेद्य शक्तियां गढ़ी जा रही थी
09:45विश्वकर्मा के सहायक दिव्यशिल्पकार पसीना बहाते हुए अपनी पूरी उजा से महास्त्रों को आकार दे रहे थे
09:54प्रत्येक धाल और कवच पर ब्रहमांडिय नक्षत्रों के चित्र उकेरे गए थे जो युद्ध में सुरक्षा प्रदान करते
10:02स्वर्ण और अगनी के इस अध्भुत संगम से उत्पन तेज ने देवलोग की दिशाओं को रोशन कर दिया
10:09रिशी अगस्त्य ने उन अस्त्रों के सामने बैठकर निरंतर महामरित्यूंजय मंत्रों का उच्चार किया
10:17विश्वकर्मा ने गर्व से भरे स्वर में कहा कि ये अस्त्र असुरों के अहंकार को चूर-चूर कर देंगे
10:24भट्टी के भीतर सुलक्ती हुई अग्नी ने एक महा विशाल त्रिशूल को अंतिम और दिव्य चमक प्रदान की
10:32दिव्य अस्त्रों के इस विशाल भंडार के चमकते ही संपून शस्त्रशाला में एक अध्भुत चेतना जाग उठी
10:40असुरों के आक्रमन से पहले देवसेना के लिए इन अस्त्रों का तैयार होना ब्रहमांड के लिए एक महान वर्दान था
10:49रिशी अगस्त्य ने उठकर उन अस्त्रों को प्रणाम किया और युद्ध के लिए अपनी स्विकृती प्रदान की
10:57विशाल हथोडों की गूंज और मंत्रों के पाठ के साथ शस्त्र निर्मान का यह दिव्य अध्याय पूर्ण हुआ
11:05अब देवसेनाप्ती कार्तिके के नेत्रित्व में इन महास्त्रों को रणक्षेत्र में ले जाने की बेला आचुकी थी
11:13महर्शी नारद वीना बजाते हुए आकाश मार्ग से उस दिव्य शिविर में प्रकट हुए जहां सेनाप्ती कार्तिके अपनी सेना के
11:21साथ उपस्थित थे
11:23कार्तिके ने आदर कूर्वक आगे बढ़कर देवर्शी का स्वागत किया और उनके मुखमंडल पर किसी गंभीर संदेश की आशंका को
11:32भांप लिया
11:34नारद मुनी ने अपनी वीना को एक ओर रख कर अपनी दिव्य द्रिष्टी से तड़कासुर के वंश्जों द्वारा रची जा
11:41रही माया का वर्णन किया
11:43उस चेतावनी की गूंच से संपूर्ण शिविर में सननाटा चा गया क्योंकि मायावी अस्त्रों का यह संकट साधारन युद्ध से
11:51कहीं अधिक भयानक था
11:54विस्त्रत आकाश के पट पर नारद मुनी ने उंगलिया उठा कर उस मायावी जाल की रूपरेखा समझाई जो अद्रिष्य रहकर
12:02देवताओं को भ्रमित कर सकता था
12:05कार्तिके ने गंभीर्ता से सुनते हुए अपने स्वन जडित त्रिशूल को भूमी पर टिकाया जिससे उनकी द्रिड प्रतिज्या और तेज
12:13प्रकट हुआ
12:15नारद मुनी के हाथों से निकली एक दिव्य प्रकाश किरण ने तड़कासुर के वंशजों के अस्त्रों के उस भयानक ध्रम
12:22को हवा में चित्रित कर दिया
12:25वह मायावी आकृतियां हवा में तैरते हुए ऐसा शड्यंत्र रच रही थी जिसे भेट पाना केवल सर्वोच दिव्य चेतना के
12:33लिए ही संभव था
12:35चारों और फैले उस स्वर्ण मंदित प्रांगण में देवर्शी के इन वचनों ने एक नई उर्जा और सतर्कता का संचार
12:43कर दिया
12:45सेनाप्ती कार्तिके ने अपने वीर सेनाप्तियों की ओर देख कर उन्हें इस अद्रिश शत्रु की माया से साब्धान रहने का
12:52कड़ा निर्देश दिया
12:55नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों पर उंगली फेर कर एक ऐसा रक्षात्मक मंत्र गूंजाया जिसने पूरे शिविर को
13:02सुरक्षा कवच से घेर लिया
13:05सुरक्षा कवच के स्वर्ण कन हवा में चमक उठे और हर योध्धा का आत्मबल उस संकट की घड़ी में और
13:12अधिक प्रखर हो गया
13:14उस दिव्य शिविर के मध्य भाग में खड़े होकर कार्तिकेय ने आसमान की ओर देखा जहां भविश्य के युद्ध के
13:21बादल मंदरा रहे थे
13:24देवर्शी नारद ने कार्तिकेय के कंधे पर हाथ रख कर उन्हें आशिरवाद दिया कि सत्य की इस अगनी में हर
13:32माया अपने आप भस्म हो जाएगी
13:35नारद जी के कमंडल से छलक्ती पवित्र जल की बूंदों ने भूमी को स्पर्ष कर तड़कासुर के कुप्रयासों को विफल
13:42करने का संकल्प लिया
13:44वह पवित्र जल स्पर्ष करते ही भूमी से स्वर्ण रेखाएं फूट पड़ी जो तड़कासुर के माया लोग की हर चाल
13:52को मात देने के लिए तैयार थी
13:55सेनाप्ती कार्तिके ने अपने धनुष को उठाया और तड़कासुर की उस कपट सेना के विरुद्ध महा आक्रमन का शंकनाद कर
14:03दिया
14:05कार्तिके के ओजस्वी मुख मंडल पर विजय का अटूट विश्वास जलका जो समस्थ देव लोग की जीत की प्रथम गारंटी
14:12बन गया
14:14दिव्य अस्त्रों की चमक और नारद मुनिके मंत्रोच चार के साथ रणक्षेत्र की ओर प्रस्थान करने का अंतिम चरण आरंभ
14:22हुआ
14:23इस प्रकार नारद की चेतावनी ने देवसेना को न केवल सचेत किया बलकि महायुध के लिए उनकी अजे शक्ती को
14:31भी जागरित कर दिया
14:33देवसेनाप्ती कार्तिके ने अपनी स्वर्ण आभा से प्रदीप्थ होकर दिव्य चावनी के मुख्य द्वार पर कदम रखा
14:41अगनी देव ने अपनी प्रजवलित ज्वालाओं के साथ प्रकट होकर अपने सैनिकों की युद्ध तत्परता का परिचय दिया
14:50कार्तिके की पैनी द्रिष्टी ने अगनी देव की व्यूह रचना का निरीच्षन करते हुए उनकी शक्ती को पर्खा
14:58यह वहक्षन था जब अनुशासन और शौर्य का अध्भुत संगम देवलोग के भविश्य को लिख रहा था
15:06इसके पश्चात सेनाप्ती ने देवराज इंद्र के वजरधारियों के विशाल शिविर की ओर प्रस्थान किया
15:13देवराज इंद्र ने अपने सहस्र नेत्रों के तेज के साथ कार्तिके का अभिनंदन कर अपनी वाहिनी की शक्ती का बखान
15:21किया
15:22इंद्र के सैनेकों ने अपने चमकते हुए वजरों को हवा में लहरा कर अपनी अजेक शमता का प्रदर्शन किया
15:31बिजली की गड़गडाहट के बीच देवसेनाप्ती ने हर एक योध्धा की भुजाओं के बल को व्यक्तिगत रूप से परखा
15:39निरीक्षन का अगला चरण मरुतों की उस रहस्यमई और वेगवान टुकडी के पास पहुचा जो तूफानों की स्वामी थी
15:47मरुत गणों के मुख्य नेता ने हवाओं को थाम कर कार्तिकेय के सम्मुख अपनी अटूट निष्ठा का संकल्त लिया
15:56कार्तिकेय ने अपने दिव्य हाथों से मरुतों के अस्त्रशस्त्रों को चूकर उनमें महाप्रलय जैसी उजा का संचार कर दिया
16:04तूफानी हवाओं का वह घेरा इस बात का साक्षी बन गया कि अब कोई भी शत्रू इस सेना को भेद
16:11नहीं सकता
16:13एक एक करके सभी देव डिवीजनों का सफल निरीक्षन करने के बाद सेनाप्ती का ओज और अधिक प्रकर हो उठा
16:22समस्त देवताओं के चहरों पर भय के बादल छट चुके थे और उनकी आखों में केवल विजय का सूर्य चमक
16:29रहा था
16:31कार्तिकेय ने अपनी गंभीर और गूंजती हुई वानी से संपूर्न रणभूमी में एक नया प्रान फूप दिया
16:38उनकी हर एक हुंकार से दिशाएं काम्प उठीन और ब्रह्मांड की नीम्वतक में कमपन उत्पन हो गया
16:45अब देव सेना का प्रत्येक योध्धा अपनी व्यक्तिगत सीमाओं को लांध कर एक सामुहिक महाशक्ती बन चुका था
16:54नारद मुनी ने वीना के तारों पर विजय का अंतिम महामंत्र बजाकर इस स्वर्णिन क्षण को अमर कर दिया
17:02युद्ध का शंखनाद बजने से पूर्व ही कार्तिकेय ने अपने अजे रत को अधर्म के विनाश की ओर मोर दिया
17:10इस प्रकार महासेनाप्ती के नेत्रित्व में देवलोग की यह आंधी अब असुरों के सामराज्य को रौंधने के लिए पूरी तरह
17:18तयार थी
17:20स्वर्ग के विशाल प्रांगन से उठी रनभेरी की गूंज ने अंतरिक्ष के कनकन को उर्जा से भर दिया
17:27भगवान विश्णों ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस महासंगराम के आरंभ को आशिरवाद दिया
17:34कार्तिके के रत के पहियों तले धर्ती काम्प उठी और अंतरिक्ष में विजय का नया इतिहास लिखा जाने लगा
17:43स्वर्गिय बादलों के बीच चमकती हुई बिजली इस बात की साक्षी बन रही थी कि अब अधर्म का अंत निश्चित
17:50है
17:52देवसेना के वीर सैनिकों ने अपने चमकते हुए भालों और धालों से आकाश को रोशन कर दिया
17:59रिशी नारद ने अपनी स्वर्ण वीना के तारों पर एक ऐसा वीर रस छेड़ा जिसे सुनकर कायरों के हृदय में
18:06भी साहस जाग उठा
18:09कार्ति के के अजे अस्त्रों की चमक से असुरों के गुपतचरों के प्रान भय से सुखने लगे
18:15युद्ध के इस भव्य मार्ग पर बहने वाली ठंडी और पवित्र हवाने देव सेना के उत्साह को और प्रखर कर
18:23दिया
18:24ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल छिड़क कर इस महासैन यात्रा को अमिट सुरक्षा प्रदान की
18:32देवराज इंद्र ने अपने एरावत हाथी की गती को बढ़ा कर सेनाप्ती कार्तिकेय के ठीक आगे मार्ग प्रशस्त किया
18:41कार्तिकेय ने अपने छै मुखों से एक साथ ऐसा मंत्रोच चार किया जिससे दसों दिशाएं गूज उठी
18:49अंतरिक्ष में तैरते हुए नक्षत्रों ने भी अपनी चाल धीमी कर दी मानोवे इस एतिहासिक मार्च को देखना चाहते हूँ
18:58गंधर्वों और अपसराओं ने पुष्प वर्शा करके कार्तिकेय के इस अजे अभियान का अभिनंदन किया
19:06सूर्यदेव ने अपनी स्वर्ण किर्णों को समेट कर सीधे महा सेनाप्ती के रत पर केंद्रित कर दिया
19:13कार्तिकेय के हाथों में सुसजित महाशक्ती बान ने अंधकार के सामराज्य को चुनोती दी
19:20महाकाल के त्रिशूल की प्रतिध्वनी इस पूरी सेना के साथ गूजती हुई रणभूमी की ओर बढ़ रही थी
19:28देव लोग के ध्वच पर अंकित गरुड का चित्र ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अभी जीवन्त होकर उड़ जाएगा
19:36समस्त मात्रिरिग्णों और देव शक्तियों ने एक स्वर में कार्तिके की जैजैकार की
19:43कार्तिके के रत के आगे बढ़ते ही असुरों की भूमी के द्वार स्वतह कामपने लगे
19:49इस प्रकार महासेनाप्ती के नेत्रित्व में देवलोग की यह अडिक सेना धर्म की अंतिम और निरनायक विजय के द्वार पर
19:57आप पहुँची
19:59असुरों की विशाल सेना के बीच से कुछ मायावी दूत देव छावनी में सेंध लगाने के लिए आगे बढ़े
20:06इन चालाक दूतों ने अपनी आकरिती बदलने की महामायावी विद्या का उप्योग करना आरंभ किया
20:14उन्होंने अपनी काया बदल कर देव दूतों का रूप धर लिया ताकि वे पहरेदारों को भ्रमित कर सकें
20:21अद्रिश साय बनकर वे गुप मार्ग से तंबों के भीतर प्रवेश करने का दुस्साहस करने लगे
20:28परंतु महासे नाप्ती कार्ती के की तीक्षन और अमोग द्रिष्टी से कोई भी माया बच नहीं सकती थी
20:36ग्वार पर तैनात दिव्य प्रहरियों ने तुरंत उन बहुरुपिया असुरों की चाल को भांक लिया
20:43बिना एक पल गवाय प्रहरियों ने उनके मार्ग को घेर कर उन्हें ललकारना शुरू कर दिया
20:50असुरों की यह गुप्त साजिश विफल होती देख छावनी में युद्ध का सायरन बज उठा
20:56पकड़े जाने के भय से उन जासुसों ने अपनी असली भयानक असुरी सूर्ते दिखाना शुरू कर दिया
21:04विशालकाय शरीर और नुकीले दातों वाले वे दूत अब खुले आम तलवारे लहराने लगे
21:11उन्होंने अपनी जादूई शक्तियों से प्रहरियों पर अंधाधुंध वार करना चाहा
21:17किन्तु देव सेना के पराक्रमी सैनिकों ने उनके हर वार को अपनी धालों पर रोक लिया
21:24इस अल्पकालिक संघर्ष ने पूरे शिविर में सतर्कता की अगनी को और अधिक प्रजवलित कर दिया
21:31स्वय महासेनाप्ती कार्तिके के गणों ने उन सभी घुसपैठियों को घेर कर बंदी बना लिया
21:38पकड़े गए असुरों के चहरों पर असफलता और भय की रेखाएं सपष्ट दिखाई दे रही थी
21:45यह घटना इस बात का प्रमान थी कि देवलोग की सुरक्षा को भेद पाना असंभव है
21:53गुप्तचरों के पकड़े जाने का यह संदेश तुरंत सर्वोच सेनाप्ती तक पहुँचाया गया
22:00कार्तिके ने इस ध्रिष्टता पर गंभीर मुद्राधारन करते हुए आगामी रणनीती पर विचार किया
22:07उनकी इस अटूट सतरक्ता ने शत्रूओं के हर गुप्त शड्यंत्र को धूल में मिला दिया
22:12इस प्रकार छलकपट की हर कोशिश को नाकाम कर देव सेना ने अपनी अडिक शक्ती का परिचय दिया
22:21रणभूमी के उपर अचानक अंतरिक्ष में भयंकर प्राकृतिक हलचल शुरू हो गई और दोनों विशाल सेनाओं के बीच काले बादलों
22:29का पहरा बैठ गया
22:32देवराज इंद्र ने अपने श्वेत एरावत हाथी पर सवार होकर बादलों की इस अस्वाभाविक गती को अपनी वजर्मंदित ग्रिष्टी से
22:40पर्खा
22:42आकाश में उमरते घुमरते गहरे लाल और काले मेगों ने सूरिय और चंद्रमा के प्रकाश को पूरी तरह से ग्रस
22:49लिया
22:50प्रकृति के इस भयंकर प्रकोप को देख कर दोनों पक्षों के योध्धाओं के हृदय में अज्यात भय की सहरन दोड़
22:57गई
22:59कार्तिके ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस ब्रहमांडिय विक्षोब को भाम्पते हुए अपनी सेना को पूरी तरह से सतर्क रहने का
23:07संकेत दिया
23:09सेनाप्ती कार्तिके के इस आदेश के साथ ही देव सेना के अग्रिम मोर्चे ने अपनी स्थिती को और अधिक सुद्रिड
23:16कर लिया
23:18विपरीत दिशा में असुरों के शिविर में भी इस भयानक आंधी और बादलों के गर्जन के बीच महायुद्ध का शंकनाद
23:26गूझ उठा
23:27यह वहक्षन था जब संपून ब्रहमांड की सांसे थमसी गई और दोनों महाशक्तियां एक दूसरे के आमने सामने आडटी
23:37धर्ती और आकाश के बीच छाए इस घोर अंधकार में केवल अस्त्रशस्त्रों की धातू की चमक ही एक मात्र प्रकाश
23:45का स्रोत बची थी
23:47महर्शी नारद ने अपने कर में वीना थामे हुए इस महाविनाश के आसन्न संकट को ट्रेलोक्य के कल्यान हेतु स्मरण
23:55किया
23:57असुर सेना के मुख्य सेनाप्ती ने अपनी भारी गदा को घुमाते हुए अपनी सेना को आगे बढ़ने का क्रूर आदेश
24:04दिया
24:06आसमान से गिरती हुई बिजली की तेज चमक ने इस भयानक द्रिश्य को और अधिक वीभत्स और भव्य बना दिया
24:14कार्तिके ने अपने च्छै मुखों से एक साथ मंत्रोच्चार करते हुए अपनी दिव्य शक्तियों का विस्तार करना प्रारंभ किया
24:23उनके इस महान तेज से उत्पन हुई उर्जा तरंगों ने संपून रनभूमी के वातावर्ण को कमपायमान कर दिया
24:32असुरों के खेमे में इस अद्भूत दिव्य तेज को देखकर शनभर के लिए खलबली मच गई और उनके कदम ठिठक
24:39गए
24:40परंतु उनके महाबली सेनाप्ती ने अपनी वीर्ता का जूठा प्रदर्शन करते हुए पुन्ह अपनी सेना को आगे धकेला
24:49प्रकृती के ये भयंकर काले बादल अब युद्ध के मैदान पर एक विशाल छत्री की भानती मंदराने लगे थे
24:57देव सेना के प्रत्येक योध्धा ने अपने अस्त्रों को थामे हुए महासंधराम के इस प्रथम आगात के लिए खुद को
25:05तयार कर लिया
25:07कार्ती के की अडिग मुद्रा और उनकी अजे सेना की उपस्थिती ने इस संकट काल में भी देवताओं में अभूतपूर्व
25:14विश्वास भर दिया
25:16अब दोनों महाबलियों के बीच वह एतिहासिक तक्राव अवश्य भावी हो चुका था जिसका इंतजार संपूर्ण ब्रहमांड कर रहा था
25:26रात्री के गहरे आगोश में देव सेना का विशाल शिविर युद्ध की अंतिन घडियों की खामोशी में डूबा हुआ था
25:35शिवपुत्रकार्ति के अपनी चावनी के बाहर एक विशाल प्रस्तर शिलापर शांत चित्त से पदमासन में लीन थे
25:43उनके मस्तक पर विराजमान दिव्यतेज अंधकार को चीर कर समस्त ब्रहमांड में एक नई उर्जा का संचार कर रहा था
25:52शीतलता लिये हुए मंदार परवत की ठंडी हवाएं इस शांत वातावर्ण में एक गहरी और गंभीर प्रतिध्वनी उत्पन कर रही
26:00थी
26:02देव सेनाप्ती के चारों और ब्रहमांडिय संतुलन को स्थेर रखने के लिए अद्रिश्य दिव्य उर्जा का एक सुरक्षा कवच बना
26:10हुआ था
26:11शिव और माता पार्वती के अन्शावतार कार्तिके का यह रूप देखकर देवगन दूर से ही श्रद्धा भाव से नत्मस्तक हो
26:19रहे थे
26:22महासंद्राम के इस अनुष्ठान में कार्तिके की प्रत्येक सांस के साथ ब्रहमांड के नक्षत्र अपनी गती नियंत्रित कर रहे थे
26:30प्रकृती भी इस महानक्षन की गंभीरता को समझते हुए अपने सभी कोलाहल को शांत कर चुकी थी
26:38विपरीत दिशा में असुरों के शिविर में भी इस भयानक शांती का भारी दबाव सपष्ट रूप से महसूस किया जा
26:45रहा था
26:47असुर सेनाप्तियों के मन में उस अजे देव सेनाप्ती की शक्ती का भय धीरे-धीरे एक विक्राल रूप लेता जा
26:54रहा था
26:56समय मानो इस महान युद्ध की प्रतीक्षा में अपनी गती रोक चुका था और प्रतेक्षण भारी लग रहा था
27:04आकाश गंगा के तारे भी अपनी चमक को समेट कर इस रात के अंतिम पहर के साक्षी बन रहे थे
27:12कार्तिकेय ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिष्टी सीधे उस अंधकार की ओर गई जहां असुरों का सामराज्य बसा था
27:21उनकी उस एक निरनायक द्रिष्टी ने समस्त देव सेना के भीतर अदमे साहस और उचसाह की लहर दोडा दी
27:30अस्त्रशस्त्रों की हलकी सी खनक ने इस शांत रात की छाती को चीर कर आने वाले महायुध का संदेश दे
27:36दिया
27:38पूर्णिमा के अंतिम क्षणों में चंद्रमा की श्वेत किर्णों ने रनक्षेत्र पर एक अजीब सा रहस्य में आवर उढ़ा दिया
27:47ब्रहमांड के सभी रिशिमुनी इस पवित्र वेला में अपनी कुटीरों से निकल कर कार्तिके की विजय के लिए प्रार्थना कर
27:54रहे थे
27:56कार्तिके ने अपने दिविय शस्त्र वेल को जमीन से उठाया जिससे संपूर्ण दिशाएं स्वर्णिंप्रकाश से जग्म का उठी
28:04वह क्षण आचुका था जब धर्म और अधर्म के बीच इस ब्रहमांड का सबसे बड़ा निर्ने लिखा जाना था
28:12और फिर युद्ध के प्रथम शंक की वह गगनभेदी ध्वनी गूज उठी जिसने आकाश और पाताल दोनों को हिला कर
28:20रख दिया