स्कंद पुराण के इस रहस्यमयी अध्याय में जानिए तारकासुर के अंत के बाद का चौंकाने वाला सच! क्या देवसेनापति कार्तिकेय पर लगा शिवभक्त की हत्या का महापाप? जानिए स्तंभेश्वर महादेव की स्थापना और महिसागर संगम का अद्वितीय रहस्य। Watch the post-war revelations of Skanda Purana Episode 7. #SkandaPurana #Kartikeya #Tarakasura #StambheshwarMahadeva #HinduMythology
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00:00ब्रहमास्त्र के प्रल्यंकारी टक्राने के बाद रन्भूमी पर एक सन्नाटा चा गया है जहां धुए के गुबार के बीच असुरों
00:07की सेना की राख हवा में तैर रही है
00:11भगवान विश्णु अपने दिव्यगरूर पर विराज मान होकर इस विध्वन्स को देख रहे हैं उनकी शांत आखों में ब्रहमांडिय न्याय
00:20का एक गहरा प्रतिविम्द दिखाई देता है
00:24कार्ति के विजय के गर्व से दूर अपने दिव्य हाथों में पकड़े हुए अस्त्रों की कान्ती को मंद करते हुए
00:30मृतक तारकासुर के विशाल का शरीर की ओर धीरे-धीरे बढ़ते हैं
00:37रनभूमी के केंद्र में तारकासुर का मृत शरीर एक विशाल शिलाखंड जैसा पड़ा है जिस पर दिव्य प्रकाश की अंतिन
00:45किर्णे किसी बुझते हुए दीपक की तरह चमक रही है
00:50देवराज इंद्र और अन्य देवतागन बादलों की ओट से इस द्रिश्य को देख रहे हैं
00:55उनके मन में विजय का हर्ष है पर वे इस महापाप के भार की गंभीरता को भांप चुके हैं
01:03भगवान विश्णु का गंभीर स्वर गूझता है जो कार्तिके को स्मरन दिलाता है कि एक असुर का वधभी धर्म के
01:11चक्र में नए पापों के द्वार खोल सकता है
01:15कार्तिके अपनी द्रिष्टी नीचे जुकाते हैं और उन्हें अपने हाथों पर लगे उस अधर्म के रक्त का अनुभव होता है
01:23जो विजय के क्षण में भी आत्मा को बोजिल कर देता है
01:28चारों और व्याप्त सन्नाटा इस बात का साक्षी है कि यह केवल एक युद्ध का अंत नहीं बलकि एक नए
01:35प्रायश्चित के महागरंथ की पहली पंक्ती लिखी जा रही है
01:41देवताओं के मध्य यह चर्चा छेड़ गई है कि क्या तारकासुर की मृत्यू के साथ ही असुरों का आतंक समाप्थ
01:48हुआ है या उसने कुछ और ही बीज बो दिये है
01:53भगवान विश्णुक कार्तिके के समीब आते हैं और उन्हें सांत्वना देते हुए बताते हैं कि दिव्य शक्ती का संतुलन बनाए
02:01रखने के लिए अब एक और कठिन मार्ब चुन्ना होगा
02:05कार्तिके का मन अशांत है और उनकी आखों में उस शिवलिंग की खोज की व्याकुलता स्पष्ट देखी जा सकती है
02:13जो उनके पापों का नाश कर सके
02:16अंधेरी रनभूमी में बिखरी हुई उर्जा अब धीरे धीरे एक स्थिर बिंदू की और आकर्षित हो रही है
02:23मानो ब्रहमांड स्वयन किसी नए अनुष्ठान की तयारी कर रहा हो
02:28इंद्रदेव इस द्रिश्य को देख रहे हैं उनका मन संशय से भरा हुआ है क्योंकि वे जानते हैं कि कार्तिके
02:35द्वारा किया जाने वाला यह कार्य कोई साधारन कर्म नहीं है
02:41भगवान विश्णु ने संकेत दिया है कि अब केवल महादेव का सानिध्य ही कार्तिके को इस मानसिक द्वंद्व से मुक्ती
02:49दिला सकता है
02:51कार्तिके एक गंभीर मुद्रा में अपने धनुष को जमीन पर रख देते हैं जो इस बात का प्रतीक है कि
02:59युद्ध के बाद अब धर्म के मार्क पर चलने का समय है
03:03पूरे रणक्षेत्र में एक दिव्य शंकनाध होता है जो हवा को चीरते हुए मृत असुरों की आत्माओं को शान्ती की
03:11ओर संकेत करता है
03:14कार्तिके ने अब अपनी द्रिष्टी को अंतरंग कर लिया है और वे अपने भीतर उस दिव्य उर्जा का संचय कर
03:21रहे हैं जो शिवलिंग के निर्माण के लिए आवश्चक है
03:26वायुमंडल का रंग अब गहराता जा रहा है मानुस्वयंग प्रकृती कार्तिके के इस गुप्ट शिवलिंग स्थापना के संकल्प का स्वागत
03:34कर रही हो
03:36देवताओं की भीड धीरे धीरे पीछे हट रही है कार्तिके अब अकेले हैं उस स्थान पर जहां कभी तारकासुर का
03:44अहंकार खड़ा था
03:47कार्तिके के हाथों से दिव्य तेज निकल कर जमीन को छूता है और वहां एक गुप्ट शिवलिंग की आधार्शिला रखी
03:54जाती है जिससे पूरे ब्रहमांड में स्पंदन उत्पन हो जाता है
04:00कार्तिके द्वारा स्थापित यह शिवलिंग ब्रहमांड के केंदर में एक नई चेतना की भाती धधक रहा है जिससे तारकासुर का
04:08मृत शरीर अब धीरे-धीरे राख में परिवर्तित हो रहा है
04:13भगवान विश्णू का मुख मंडल इस अध्भुत द्रिश्य को देख कर विस्मय और शान्ती से भर गया है जबकी गरूर
04:21उनके पीछे अपनी विशाल स्वर्णमे पंखों को समेटे हुए साक्षात साक्षयों का बोध कर रही है
04:28कार्तिके अपने हाथों से शिवलिंग पर गंगा जल की एक सुक्ष्म धारा अर्पित करते हैं जिससे उस पाशान से निकलने
04:36वाली उर्जा का वेग सौमे हो जाता है
04:40पूरे क्षेत्र की वायुमंडल अब एक दिव्य संगीत की गूंच से भर गई है जो इस गुप्ट शिवलिंग की प्रतिष्ठा
04:47का प्रतीक बन गई है
04:50हिमालय की चोटियों के पीछे से सूर्य की पहली किरने इस पावन स्थल को छूती हैं जैसे स्वयम प्रकृती इस
04:58अनुष्ठान को अपनी स्वीकृती प्रदान कर रही हो
05:02भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी समाधी से उठते हैं उनके तीसरे नेत्र की चमक मंद पड़ गई है
05:09क्योंकि उन्हें अपने पुत्र के इस पावन कार्य का आभास हो चुका है
05:15कार्तिके ने अब उस शिवलिंग के चारों और अपनी दिव्य शक्ती से एक सुरक्षा कवच का निर्मान किया है जिससे
05:22कोई भी अधर्मी इसके तेज को सहन न कर सके
05:27आकाश से उतरती हुई एक दिव्य आभा शिवलिंग में समाहित हो रही है मानो स्वयन ब्रहमांड का सार उस पत्थर
05:34में सिमट कर रह गया हो
05:37पूरे ब्रहमांड में स्पंदन बढ़ रहा है मानो शिव के इस गुप्त अंश के प्रकट होने से प्रकृती के नियम
05:44एक बार फिर पुनरजीवित हो रहे हुँ
05:47नारद मुनी अपनी वीना को थामे हुए आकाश मार्ग से नीचे उतरते हैं उनके मुख पर इस अलौकिक ग्रिश को
05:55देखने का अध्भुत आनंद स्पष्ट जलक रहा है
05:59कार्ति के शिवलिंग के समक्ष जुककर प्रार्थना में लीन हो जाते हैं उनकी तलवार अब पूरी तरह से विसर्जित हो
06:07चुकी है और केवल शांती शेश है
06:11उस पावन धूमी पर उगने वाले दिव्यपुष्प शिवलिंग के चारों और स्वतह ही बिखर रहे हैं जैसे यह स्थान अब
06:18साक्षात वैकुंठ का द्वार बन गया हो
06:22दूर से आती हुई गंधर्वों की स्वर लहरिया इस स्थान को और भी अधिक अलौकिक बना रही है जिससे वातावर्ण
06:29में दिव्यता का वास हो गया है
06:33ब्रहमाजी अपनी कमल के आसन से इस शिवलिंग की ओर देख रहे हैं उनकी चारों भुजाओं में स्थित वेद इस
06:40घटना की पवित्रता का गुनगान कर रहे है
06:44कार्तिकेय ने अपने संकल्प से यह सिद्ध कर दिया है कि वध के बाद पश्चाताप नहीं बलकि स्रिजन का मार्धी
06:52सबसे महान है
06:55शिवलिंग से निकलने वाली यह उर्जा अब धीमी होकर स्थेर हो गई है
06:59मानोस्वय महादेव ने इसे अपनी स्वीकृती की मुहर लगा दी हो
07:05तारा का सुर का संपून अहंकार अब विलीन हो चुका है
07:09उसके स्थान पर केवल शिव की महिमा का प्रतीक यह पाशान अडिक खड़ा है
07:16देवराज इंद्र ने अपने दिव्य अस्त्रों को हटा लिया है और वेकार्तिके के इस कार्य के प्रती नत्मस्तक है
07:24यह गुप्ट शिवलिंग अब आने वाले युगों तक धर्म और न्याय का रक्षक बनकर इस स्थान पर विराजमान रहेगा
07:33इतिहास में पहली बार वध के साथ स्थापना का यह अनोखा मेल सकंद पुराण के इस अध्याय को अमर कर
07:40गया है
07:42युद्ध क्षेत्र की धूल अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुई थी कि देवर्शी नारत के मुख से निकली गंभीर
07:49वानी ने आकाश को स्तब्ध कर दिया
07:52भगवान विश्णों ने गरुड पर सवार होकर नारत मुनी की ओर देखते हुए प्रश्न किया कि विजय के इस उत्सव
07:59में यह वेदना क्यों दिखाई दे रही है
08:03नारत ने अपनी वीना को थामे हुए यह स्पष्ट किया कि तार का सुर का वध तो हुआ है किन्तु
08:10उसका महादेव के प्रती अटूट समर्पन एक महापाप के रूप में कार्तिकेय के हृदय को आच्छा दित कर रहा है
08:18कार्तिकेय के चारों और एक सुक्ष्म छाया का निर्मान होने लगा जैसे किसी भक्त की हत्या का बोज उन्हें भीतर
08:26से ही दग्ध कर रहा हो
08:28समस्थ देवतागन यह समच चुके थे कि धर्म की रक्षा के लिए किया गया यह वध अंजाने में ही एक
08:35परम शिव भक्त के विनाश का कारण बना है
08:40भग्वान शिव जो कैलाश पर ध्यानस्थ थे ने अपनी तीसरी आख को हलका सा खोल कर इस आध्यात्मिक संतुलन को
08:47अनुभव किया
08:50कार्तिकेय ने अपने शस्त्रों को दूर फेंक दिया और उस भारीपन को मिटाने के लिए महादेव के ध्यान में लीन
08:57होने का संकल्क लिया
08:59आकाश से दिव्यास्त्रों का तेज धीरे-धीरे मन्द पढ़ने लगा मानो स्रिष्टि स्वय इस पाप की गंभीरता को स्विकार कर
09:07रही हो
09:09नारद ने आगे बढ़कर कहा कि तारकासुर के भीतर का वह भक्त तत्व अब कार्तिके के कर्मों के साथ जुड़कर
09:16उन्हें बेचैन कर रहा है
09:19भगवान विश्णु ने अपनी मुस्कान के साथ यह संकेत दिया कि केवल महादेव की ही भक्ती इस पाप की छाया
09:27को मिटाने में समर्थ है
09:30कार्तिके ने अपने मस्तक को नत्मस्तक किया और उस स्थान पर ही एक अखंड जोती प्रजवलित करने का निर्नय लिया
09:39वह स्थान जो अब तक युद्ध की भूमी था अचानक एक शांत आध्यात्मिक उर्जा के केंद्र में परिवर्तित होने लगा
09:48कार्तिके की तपस्या ने उस स्थान की मिक्टी को भी पवित्र कर दिया जहां उन्होंने तारकासुर का अंत किया था
09:56देवराज इंद्र ने भी हाथ जोड़कर उस स्थान की महिमा को स्विकार किया जो अब एक तीर्थ के समान बन
10:03चुका था
10:05शिवलिंग की स्थापना के साथ ही वह पाप की छाया धीरे धीरे उज़ल होने लगी मानो इश्वर ने कार्तिके को
10:12क्षमा कर दिया हो
10:15यह शिवलिंग उस भक्त के अंत और उस रक्षक के उदे का साक्षी बना जो अब कार्तिके की भक्ती से
10:22पुनह जीवित हो उठा था
10:24ब्रहमा जी भी अपनी कमंडलू लेकर वहां उपस्थित हुए और इस अद्वितिय कार्य की सराहना की
10:32इस स्थान की उर्जा ने अब पूरे ब्रहमांड में शान्ती का संदेश प्रसारित करना आरंभ कर दिया था
10:40कार्तिके अब केवल एक योध्धा नहीं बलकि एक मार्ग गर्षक के रूप में देवलोक में प्रतिश्थित हो गए
10:48सकंद पुरान का यह अध्याय आज भी उस गुप्ट शिवलिंग की महिमा को युगों तक जीवित रखेगा
10:55हिमाले की शांत और उत्तुम चोटियों पर कार्तिके ने अपने दिव्य शस्त्र वेल को एक पाशान शिला पर विश्राम के
11:03लिए रख दिया है
11:05भगवान शिव कैलाश के शिखर पर स्थित अपनी समाधी से कार्तिके के इस मौन संकल्प को निहार रहे हैं
11:14कार्तिके ने अपनी आखे बंद कर ली हैं और उनके चारों और ब्रहमांडिय उर्जा का एक सुरक्षा घेरा निर्मित होने
11:22लगा है
11:24कैलाश का वातावर्ण अब पूरी तरह से स्थब्ध है, मानो समय की गती भी इस महामौन के सम्मुख ठहर गई
11:31हो
11:32इस एकांत में कार्तिके को उन कर्मों का आभास हो रहा है जो धर्म की रक्षा हेतु अनिवार यते परंतु
11:40आत्मा पर भारी है
11:42देवी पार्वती अपने पुत्र के हरिदय में उठ रहे, इन ज्वलंत प्रशनों को अपनी दिव्यद रिष्टी से देख रही है
11:51कार्तिके ने एक स्वर्ण पात्र में पवित्र जल लेकर अपनी उंगलियों से उसे मगन होकर स्पर्ष किया
11:59पहाडों की चोटियों पर जमी बर्फ उस महापाप के प्रायश्चित की साक्षी बन रही है, जिसे कार्तिके अब मिटाने जा
12:06रहे है
12:09कार्तिके ने प्रिथवी की गोर मुख करके ध्यान केंद्रित किया, जहां का वातावर्ण अब शुद्धी की प्रतीक्षा में है
12:18भगवान विश्णु बैकुंड से कार्तिके के इस तब को देख मुस्कुरा रहे हैं, क्योंकि धर्म का वास्तविक स्वरूप धैर्य है
12:27कार्तिके ने अपनी हथेली में दिव्य उर्जा एकत्रित की जो अब शिवलिंग के रूप में प्रकट होने को आतुर है
12:35कैलाश के चारों और के वरिश और जीवजन्तु इस महानुष्ठान के प्रभाव से एक दिव्य शान्ती में डूब गए है
12:44कार्तिके की तपस्या का तेज इतना तीवर है कि संपून आकाश में सुनहरी आभा फैल गई है
13:01कार्तिके ने धर्ती की मिट्टी को अपने हाथों में उठाया और उसे एक पवित्र शिवलिंग का आकार देने लगे
13:09इस अनुष्ठान के दौरान उत्पन होने वाली दिव्य तरंगे कैलाश की चट्टानों में गूंज उठी है
13:17ब्रह्मांड की सभी शक्तियां कार्तिके के इस कठिन तब के आगे नत्मस्तक होकर उन्हें आशिरवाद दे रही है
13:26भगवान शिव ने अपनी आखें खोली और कार्तिके के इस समर्पन को स्विकार कर उन्हें मौन आशिरवाद दिया
13:35कार्तिकेय ने अंत्तह उस गुप्त शिवलिंग को धर्ती में स्थापित किया, जो धर्म के संतुलन का नया आधार बन गया
13:42है
13:44इस पवित्रक्षण में कार्तिकेय का चहरा एक अपार शांती और संतोष से भर उठा, जैसे उनका भार हलका हो गया
13:52हो
13:54कैलाश के गगन्चुंबी शिखरों पर जमी बर्फ की चादरों के बीच, ब्रहमांडिय ध्वनी के कमपन से पूरा वातावर्ण दिव्य उर्जा
14:02से उत्प्रोथ हो उठा
14:04भगवान शिव अपनी समाधी से धीरे से जागरित हुए, उनकी तीसरी आख से निकली हुई मंद आभा ने आकाश को
14:12एक स्वर्णिम कांती प्रदान की
14:15शिव के मुख से निकली हुई ओजस्वी वानी ने दिशाओं को भेदते हुए कार्तिके के हृदय तक अपने दिव्य संदेश
14:22को पहुँचाया
14:24आकाश में गूंजती उस गूंज के साथ ही चारों और एक अद्भुत दैविय धुआ साचा गया, जो कार्तिके के नए
14:32कर्तव्य का सूचक था
14:34कार्तिके ने नत्मस्तक होकर अपने पिता के आदेश को स्वीकार किया, उनकी द्रिश्टी अब उस पवित्र जल धारा पर टिकी
14:42थी जहां उन्हें शिवलिंग स्थापित करना था
14:46भगवान विश्णु अपनी वैकुंठ की सुनहरी लोटस आभा के साथ इस दिव्य घटना को देख मुस्कुराए और उन्होंने शिव के
14:54निर्णय को अपना समर्थन दिया
14:57कार्तिकेय ने अपने हाथों से मिक्टी और जल के संगम पर पवित्र शिवलिंग का निर्मान करना प्रारंब किया जो धर्म
15:04की नीम को सुद्रिढ कर रहा था
15:07स्वर्ण आभा से युक्त वह शिवलिंग धीरे-धीरे चमकने लगा, मानो उसमें स्वयंत्रिलो की नात का अंश समाहित हो रहा
15:15हो
15:17पहाडों की चोटियों से निकलती शीतल हवाने कार्तिकेय के चहरे पर एक ऐसी आभा बिखेरी जो पहले कभी न देखी
15:24गई थी
15:26देवर्शी नारद ने वीना के तारों को छेड़ा, जिससे कैलाश की गुफाओं में एक दिव्यराग गूंच उठा जो कार्तिकेय के
15:34प्रती समर्पित था
15:36कार्तिकेय शिवलिंग पर जल अर्पन कर रहे थे और उनके हर बूंद के स्पर्ष से वहां के वातावर्ण में एक
15:43नई उर्जा प्रवाहित हो रही थी
15:47वातावर्ण में विद्यमान वह पवित्र शांती यह बता रही थी कि ब्रहमांड का संतुलन अब पुन्क स्थापित हो चुका है
15:55हिमाले की उचायों पर कार्तिकेय के उस तब का प्रभाव ऐसा था कि स्वयन प्रकृती ने उनके सम्मान में अपना
16:03मस्तक जुका लिया
16:04शिव का वह दिव्यस्वर एक बार पुनह गुंजा जिसने कार्तिकेय के आत्मिक संतोष को पूनता प्रदान कर दी
16:13कार्तिकेय ने अपने शस्त्रों को दूर रख दिया और उस शिवलिंग की परिक्रमा करते हुए अपनी असीम भक्ती का प्रदर्शन
16:21किया
16:23ब्रहमांड के हर कोने में स्थापित ये लिंग अब अधर्म के विरुद्ध एक कवच की तरहे कार्य करने लगे थे
16:31कार्तिकेय की आखों में अब युद्ध की अगनी नहीं बलकि एक नए युग का मार्ग गर्शक होने का सौमय तेज
16:37चमक रहा था
16:39कैलाश के चारों और उरते हुए दिव्य पक्षियों ने मधूर स्वर में कार्तिके की स्तुती करना प्रारंभ कर दिया
16:48परमात्मा शिव और उनके पुत्र कार्तिके के बीच का वह मौन समवाद स्रिष्टी के कल्यान का नया आधार बन गया
16:55था
16:56इस प्रकार उस गुप्ट शिवलिंग की स्थापना के साथ स्कंद पुराण का यह अध्याय ब्रहमांड के एक नय और शांतिपूर्ण
17:05युग का सूत्र पात कर गया
17:07ब्रहमांड के रक्षक भगवान विश्नू और स्रिष्टी के रचिता प्रहमा के साथ कार्तिके ने माहिसागर संगम की ओर अपनी यात्रा
17:15का शुभारंब किया
17:18भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थाम कर मार्ग के अवरोधों को दूर किया, जिससे दिव्य प्रकाश के पुन्ष चारों
17:25दिशाओं में फैल गए
17:28कार्तिके ने अपनी शक्ती का संचय करते हुए उस पवित्र तट की मिट्टी को स्पर्श किया जहां जल और भूमी
17:34का मिलन हो रहा था
17:37सब्तरिशियों के मंत्रों चार से माहिसागर के तट पर एक अलौकिक आभामंडल निर्मित हो गया जो आकाश को भी प्रकाशित
17:45करने लगा
17:46जैसे ही कारतिके संगम के केंदर में पहुँचे विशाल लहरिंग अचानक शान्थ हो गई मानो स्वयं महासागर देव ने उन्हें
17:55प्रणाम किया हो
17:57भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपनी दिव्य आभा से उस स्थान को पवित्र किया जिससे वहां की रेट स्वर्ण के
18:04समान चमकने लगी
18:07कार्तिकेय ने अपने हाथों में जल लेकर संकल्प किया कि यह स्थान आने वाली पीढियों के लिए मोक्ष का द्वार
18:14बनेगा
18:16वायुमंडल में स्थित दिव्य गंधर्वों ने पुष्पों की वर्षा कर इस पावन अनुष्ठान का अभिनन्दन किया
18:23महान रिशियों ने वेदों की रिचाओं का गान प्रारंभ किया जिससे संपून ख्षेतर में सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगा
18:33भगवान ब्रह्मा ने कार्तिके की ओर देखते हुए आशिरवाद दिया उनकी मुखाकृती पर स्रिष्टी के कल्यान की संतुष्टी स्पष्ट दिखाई
18:42दे रही थी
18:44कार्तिके ने संगम की पवित्रधारा में डुपकी लगा कर अपने दिव्य तेज को जल के माध्यम से संपून प्रिथ्वी में
18:51प्रवाहित किया
18:53सागर की गर्जना अब एक मधुर संगीत में बदल गई थी जो ब्रह्मान की शांती का संदेश सुना रही थी
19:02कार्तिके ने उस स्थान की मिक्टी से एक दिव्य आकृती का निर्मान किया जिसे देखकर देवताभी चकित रह गए
19:10भगवान विश्णु ने उस आकृती पर अपनी कृपाद रिष्टी डाली जिससे वह मिट्टी का स्वरूप एक अमर दिव्य जोती में
19:18परिवर्तित हो गया
19:21कार्तिके ने पूर्ण श्रधा के साथ उस शिवलिंग को संगम के तट पर स्थापित कर दिया जो अब एक गुप्ट
19:27शक्ती केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ
19:31संपूर्ण वातावर्ण में एक अनकही शांती चा गई, मानो प्रकृती स्वय भगवान शिव की आराधना में लीन हो गई हो
19:40ब्रहमाजी ने आगे बढ़कर शिवलिंग का प्रथम अभिशेक किया, जिससे अमरिक मई जल की धाराय बहने लगी
19:48कार्तिके अब निश्चिन्थ थे, क्योंकि उन्होंने ब्रहमाण को उस महापाप के भार से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया
19:56था
19:57संगम के उस पावन तट पर अब केवल शांती और परमात्मा का वास था, जो समय की सीमाओं से परेप्रतीत
20:05होता था
20:05इस प्रकार सकंद पुराण के इस अध्याय में कार्तिके ने अपने कर्तवियों को पूरा कर ब्रहमाण को नई चेतना प्रदान
20:14की
20:16ब्रहमाजी ने पवित्र मंत्रों का उच्चारण करते हुए संगम के तट पर दिव्यरेच से एक वेदी का निर्माण किया, जिससे
20:23वातावर्ण में सकाराक्मक उर्जा का संचार होने लगा
20:28भगवान विश्णू ने गरूर पर आरूढ होकर अपनी उपस्थिती से आकाश को सुवर्ण आभासे भर दिया, जहां उनका शांत और
20:36सौमे मुखमंडल शांती का प्रतीक था
20:40कार्तिके ने अपने हाथों की सुख्ष्म तरंगों से उस पवित्ररेत को एक शिवलिंग का आकार दिया, जो ब्रहमांड की आदिशक्ती
20:48का साक्षात स्वरूप प्रतीत होता था
20:51चारों और व्याप्त दिव्य नीलिमा और चमकते स्वर्ण प्रभाव ने उस स्थान को एक अलौकिक धाम में परिवर्तित कर दिया,
20:59जहां समय मानो ठहर सा गया था
21:03शिवलिंग की स्थापना के साथ ही वातावर्ण में शंकनाध हुआ, जिससे सुदूर ब्रहमांडों तक एक नई चेतना का उदे हुआ
21:12भगवान शिव कैलाश के शिखर से इस अनुष्ठान को देख रहे थे, जहां उनकी जटाओं से चंद्र की शीतल किरने
21:19निकल कर संगम पर गिर रही थी
21:23कार्तिकेय ने मंत्रो चार के साथ जल अर्पित किया, जिससे शिवलिंग से एक अलोकिक तेज पुन्ष चारों दिशाओं में फैलने
21:30लगा
21:32ब्रहमांड की शुद्धी हे तु, कार्तिकेय ने हाथ जोड कर महादेव से उस महायुध में प्राण त्यागने वाली आत्माओं की
21:40मुक्ती की प्रार्थना की
21:42तट पर उपस्थित समस्थ देवी देवता एक स्वर में जयगोश करने लगे, जिससे धरा और आकाश का मिलन एक नए
21:50सत्य के रूप में हुआ
21:53भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपनी दिव्यशंक ध्वनी से उस स्थान की आभा को और अधिक पवित्र और तेजोमय बना
22:00दिया
22:02संगम की लहरेंग अब शिवलिंग को स्पर्श कर रही थी, जैसे वे स्वया भगवान शिव के चर्णों का अभिशेक करने
22:09के लिए आतुर थी
22:11यह वह गुक्ट शिवलिंग था जिसे कार्तिकेय ने प्रित्वी की रक्षा के लिए स्थापित किया था, जो आने वाली पीढियों
22:19के लिए एक महान उर्जा स्रोत बन गया
22:23ब्रहमाजी ने अपना मस्तक जुका कर इस अनुष्ठान की पूर्णता को स्विकार किया और स्रिष्टी के कल्यान का मार प्रशस्त
22:31माना
22:32आकाश से फूलों की वर्शा होने लगी और गंधर्वों ने मिलकर स्तुती गान प्रारंभ कर दिया, जिससे वातावर्ण भक्तिमय हो
22:40उठा
22:42कार्तिकेय ने उस शिवलिंग के समक्ष आत्मस्मर्पन किया, जो उनके मन के समस्त भार और युद्ध के गलानी को मिटाने
22:50वाला था
22:51वह गुप्त शिवलिंग अब केवल एक पत्थर नहीं, बलकि समस्त ब्रहमांड के दुखों को हरने वाला दिव्यद्वार बन चुका था
23:00हिमाले के कंदराओं से होकर गुजरने वाली हवा ने उस स्थान पर एक दिव्यशितलता का एहसास कराया, जो सीधे महादेव
23:08के आशिरवात का प्रमाण था
23:11भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख खोल कर उस शिवलिंग को देखा, जिससे एक सुक्षम प्रकाश पुंज उसलिंग में समाहित
23:19हो गया
23:21कार्तिके के इस कृत्य से ब्रहमांड के सुक्षम तत्वों में संतुलन लोट आया, और प्रकृती एक बार फिर मुस्कुरा उठी
23:30इस प्रकार गुप शिवलिंग के प्राकटे के साथ ही कार्तिके इने अपने महाकर्तव्य को पूर्ण किया और ब्रहमांड को एक
23:38नई आशा प्रदान की
23:41समुद्र की लहरें अचानक शांत हो गई, जैसे प्रकृती स्वयें किसी दिव्य घटना के घटित होने की प्रतीक्षा कर रही
23:48हो
23:49भगवान विश्णु ने अपनी कमलनियन ग्रिष्टी से उस तट को निहारा और गरुर से कहा कि यह स्थान अब सदैव
23:56के लिए पावन हो गया है
23:59अचानक अरब सागर का जल स्तर अपनी सीमाओं को लांधने लगा और वे दिव्य तरंगे सीधे शिवलिंग की ओर बढ़ने
24:07लगी
24:08समुद्र के जल का यह स्वत्ह प्रवाह एक दिव्य अभिशेक के समान था जो उस गुप्ट शिवलिंग के चर्णों को
24:15नहला रहा था
24:18कार्तिके ने अपने मयूर वाहन पर विराजमान होकर इस अग्भुत द्रिश को देखा जहां जल और अगनी का मिलन हो
24:25रहा था
24:27जैसे ही जल शिवलिंग को स्पर्श कर पीछे हटा तट पर एक अलौकिक शान्ती छा गई और वातावर्ण सुगंधित फूलों
24:35से महक उठा
24:37भगवान शिव ने अपनी मंद मुस्कान के साथ इस स्थान को स्थमभेश्वर महादेव के नाम से संबोधित किया जो भक्तों
24:45के समस्थ पापों का सहार करेगा
24:48कार्तिके की तेजस्वी मुखाकृती से निकलती कान्ती ने उस शिवलिंग को और भी अधिक ओजस्वी बना दिया था
24:56देवगण आकाश से इस पवित्र अनुष्ठान को देख रहे थे और पुष्प वर्शाकर अपनी श्रधा अर्पित कर रहे थे
25:05स्तंभेश्वर महादेव का यह शिवलिंग न केवल जल की सीमा को दर्शाता था, बलकी कार्तिके के अनुषासन का प्रतीक भी
25:13बन गया
25:15समुद्र की लहरों का बार-बार वापस लोटना मानो भगवान की निरंतर पूजा में रत रहने का एक शाश्वत प्रमान
25:22था
25:23कार्तिके ने अपने अस्त्रवेल को नीचे जुका कर उस स्थान को अनंत काल के लिए सनरक्षित और पवित्र घोशित किया
25:32इस पावन तीर्थ के प्राकट्य के साथ ही ब्रहमान्ड में व्याप्त ब्रहमहत्या का सारा बोज भी शान्थ हो गया
25:40देवर्शी नारद ने अपनी वीना की तान छेडी जिससे स्तंभेश्वर महादेव की महिमा का गुनगान चारों दिशाओं में फैल गया
25:49प्रकृती के कणकण ने इस महापाप के निवारण का उत्सव मनाया और लवन सागर का जल और भी स्वच्छ हो
25:56गया
25:58कार्तिके के हरिदय में अब एक अटूट शान्ती थी क्योंकि उन्होंने अपने पिता के चर्णों के समीप इस गुप्त धरोहर
26:05की स्थापना की थी
26:08स्तंभेश्वर महादेव का यह स्थान आने वाली पीडियों के लिए आध्यात्मिक उन्नती का एक अखंड केंद्र बन गया
26:16समय का चक्र अब एक नई गती से आगे बढ़ने लगा जहां हर लहर के साथ महादेव का अभिशेक अनंतकाल
26:24तक चलता रहेगा
26:26कार्तिके ने अन्त में उस गुप्ट शिवलिंग को नमन किया और ब्रह्मांड के प्रती अपने कर्तवे का परित्याग करते हुए
26:34कैलाश की ओर प्रस्थान किया
26:37स्तंभेश्वर महादेव की इस अध्भुत कथा ने यह सिद्ध कर दिया कि जहां भक्ती और निष्ठा का संगम होता है
26:44वहां पाप का अस्तित्व शेश नहीं रहता
26:48कैलाश के शिखरों पर जमी बर्फ की चादरें अब सूर्य की प्रथम किर्णों के साथ स्वर्ण में आभा में परिवर्तित
26:55होकर ब्रह्मांडिय शांती का आहवान कर रही है
27:00स्वया भगवान विश्णु ने अपनी चतुर्भुज छवी में प्रकट होकर देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं के साथ कार्तिके के प्रतीश
27:08रधा अर्पित की
27:11कार्तिके ने अपने शस्त्रों को दिव्य अगनी में विसर्जित करते हुए अपना ध्यान पुन उस आदिशक्ती की ओर केंद्रित किया
27:18जिससे संपूर्ण चराचर जगत का स्रिजन हुआ है
27:23आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है और देवर्शी नारत के वीना के तार इस विजय और शान्ती के
27:30महासंगीत को गा रहे हैं
27:33देवराज इंद्र ने एक स्वर्ण कलश को कार्तिके के चर्णों में समर्पित किया जो उनके पद की गरिमा और ब्रहमांड
27:41के नए रक्षक के रूप में स्विक्रिती का प्रतीक है
27:45भगवान शिव ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिष्टी से निकली उर्जा ने संपून आकाश में एक दिव्य नीले रंग
27:53का आभामंडल निर्मित कर दिया
27:56महादेव के मस्तक से निकली वह उर्जा धीरे धीरे उन सभी स्थानों पर प्रवाहित होने लगी जहाँ युद्ध की विभीशिका
28:04के घाव अभी भी शेश थे
28:07ब्रहमांड की कुंडलियों में छिपी हुई वह प्राचीन शक्ती पुनः जागरित हो उठी और संपून स्रिष्टी का संतुलन एक नई
28:15स्थिर्ता को प्राप्त करने लगा
28:18देवता गण अब अपनी खोई हुई कांती को पुनः प्राप्त कर रहे थे जैसे पज़ड के बाद प्रकृती पर पुनः
28:25वसंत का आगमन हो गया हो
28:28भगवान विष्णू ने मुस्कुराते हुए कार्तिके के मस्तक पर अपना आशिर्वाद रखा जिससे एक दिव्यत तेज कार्तिके के संपूर्ण व्यक्तित्व
28:37में समाहित हो गया
28:39कार्तिके ने उठकर अपनी दिव्य शक्ती का अनुभव किया और आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने ब्रहमांड को अपनी सुरक्षा
28:47का संकल्प दिया
28:50कैलाश के चारों ओर की हवाओं में अब केवल ओंकार का गुंजन सुनाई दे रहा है जो समस्त दुखों के
28:56विनाश का साक्ष्य है
28:59देवी पारवती ने अपने पुत्र की इस महानता को देखकर ममता और गौरव के अश्रु बहाए जो पृत्वी पर अमरित
29:07के रूप में गिरे
29:09ब्रहमाजी ने अपना मुख उत्तर की ओर किया और वेदों की रिचाओं का गान करते हुए इस नए युग का
29:16स्वागत किया
29:18कार्तिके के हर कदम के साथ उस दिव्य शिवलिंग की उर्जा चारों और फैलती जा रही थी जो उन्होंने गुप
29:25रूप से स्थापित किया था
29:27यह स्थान अब समस्थ तपस्वियों के लिए एक महातीर्थ बन चुका था जहां मोक्ष और शांती का मार्ग प्रशस्थ होता
29:35है
29:37स्रिष्टी के कणकण में अब शिव के उस अंश का वास था जिसने तारकासुर के सहार के बाद भी धर्म
29:44की रक्षा का मार्ग अपनाया
29:46इंद्र ने गर्व से अपना वजर नीचे जुका दिया और कार्तिके को प्रणाम करते हुए उन्हें देवसेना का शाश्वत नेत्रित्व
29:54स्विकार करने का निवेदन किया
29:58कार्तिकेय ने मुस्कान के साथ स्वीकार किया और उनके एक संकेत मात्र से आकाश के नक्षत्र भी अपनी दिशा में
30:05व्यवस्थित हो गए
30:07इस प्रकार महापाप का अंथुआ और स्रिष्टी एक बार पुना अनंत काल के लिए महादेव की भक्ती और कार्तिके के
30:16तेज से प्रकाशित हो उठी
30:18क्रौच पर्वत की अतल गहरायों में जहां प्रकाश की एक किरण भी नहीं पहुँचती वहां भूमी के भीतर से एक
30:26रहस्यमई और दरावनी हलचल शुरू हुई
30:29इस निरवता के बीच भगवान विश्णु अपने क्शीर सागर के तट पर बैठे गरुड की पीठ पर सवार होकर उस
30:37अज्यात संकट की गंभीरता को भांप रहे थे
30:41असुरों के बचे-खुचे मायावी टोले धीरे-धीरे एकत्र हो रहे थे जिनकी काली शक्तियों से क्रॉंच परवत की नीमवे
30:49काम उठी
30:51परवत के हृदय में एक विशाल काला शूने निर्मित हो रहा था जो धीरे-धीरे आने वाले विनाश की आहट
30:58दे रहा था
30:59क्रॉंच परवत की चट्टाने जैसे किसी अमानविय बल के भार से कराह रही थी और वहां की उर्जा का स्तर
31:07असामान्य रूप से बढ़ने लगा
31:10भगवान शिव अपनी समाधी में लीन थे लेकिन कैलाश की तुशार भरी चोटियों पर भी उन्हें क्रॉंच परवत के उस
31:17विशैले स्पंदन का अनुभव हुआ
31:20असुरों का अधिपती एक विक्रित काया वाला मायावी गुप रूप से एक ऐसे अभेद्य कवच की रचना कर रहा था
31:28जिसे भेदना देवताओं के लिए असंभव था
31:32परवत के भीतर की यह मायावी संरचना क्रॉंच के पत्थरों को चीरते हुए एक नारकिये द्वार का रूप ले रही
31:39थी
31:40धरा की सतह पर भी इसका प्रभाव दिखने लगा जहां पेड़ पौधे अचानक सूखने लगे और हवा में एक घुटन
31:48भरी गंध घुल गई
31:50देवता इस अकस्मात उत्पन्न हुई बाधा से विचलित थे क्योंकि यह शक्ती न तो तारकासुर की थी और नहीं किसी
31:58ग्यात राक्षस की
32:00असुरों की वह टोली एक प्राचीन और निशेध मंत्र का उच्चारण कर रही थी जिससे पूरा क्रॉंच परवत हिल उठा
32:08यह गुप माया एक ऐसा सुरक्षा कवच था जो संसार की समस्थ दैविय शक्तियों को अवरुध करने की क्षमता रखता
32:17था
32:18दूर अंतरिक्ष में बैठे देवर्शी नारद ने अपनी वीना को थाम लिया क्योंकि सुरों की लए में एक भयंकर गिरावट
32:26महसूस हो रही थी
32:28क्रोंच पर्वत के भीतर से निकलने वाली काली उर्जा ने आकाश के रंगों को धूमिल कर दिया था जैसे सूर्य
32:36का तेज भी वहां पहुँचने से कत्रा रहा हो
32:40मायावी असुरों ने अपनी कुछ सित कला से पर्वत की चट्टानों को जीवित हथियारों में परिवर्तित करना प्रारंभ कर दिया
32:47था
32:48यह काला जादू इतना गहन था कि स्वयन क्रॉंच पर्वत की आत्मा जो सदियों से मौन थी पीड़ा से चीख
32:56उठी
32:58असुरों के उस गुप्ट अनुष्ठान का प्रभाव अब स्रिष्टी के पाँचों तत्वों पर पढ़ने लगा था जिससे प्रकृती का संतुलन
33:05खिर बिगड़ने लगा
33:08भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उस अतल लोग की गतिविधियों को देखा और समझ गये की कार्थिके को पुनह
33:15युद्ध के लिए तत्पर होना होगा
33:18क्रौच परवत की उन अंधेरी गुफाओं में अब एक नई और अधिक क्रूर शक्ती का जन्म हो रहा था जो
33:25सीधे देव सेना के नायक को चुनौती देने वाली थी
33:30इधर कार्थिके के शिविर में भी एक हलचल महसूस की गई जैसे किसी अगरिश सेना ने उनके चारों और घेरा
33:37डाल दिया हो