स्कंद पुराण के छठे अध्याय में देखिए महायुद्ध का सबसे भयंकर दृश्य। जब तारकासुर ने छोड़ा अपना अंतिम ब्रह्मास्त्र, तब कार्तिकेय ने कैसे दिया जवाब? ब्रह्मांड के कांपने का रहस्य और अधर्म के अंत की महागाथा। #SkandaPurana #Kartikeya #Tarakasura #HinduMythology #DeviPuran #SpiritualWarfare
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00:00तारकासुर द्वारा छोड़े गए ब्रहमास्त्र की भीशन ज्वाला ने समूचे ब्रहमांड को एक भयानक सुनहरी गूंच से भर दिया
00:08स्वर्ग के द्वारपालों ने देखा कि भगवान विशनु जिनका निल्मनी सा शरीर है और जो पीतामबर वस्त्रधारन किये हुए हैं
00:17अपने शेशनाग सिनहासन पर चिन्ता मगन है
00:22ब्रहमास्त्र की असहे गर्मी से क्रिमिभोजन के नर्क का हराभरा दलदल उबलने लगा और उसमें मौझूद कीडे दिशाहीन होकर छट
00:30पटाने लगे
00:32आकाश में व्याप्त दिव्य उर्जा का एक गहरा साया मानों पूरे स्रिष्टी के अस्तित्व को ही मिटाने पर उतारू था
00:40कार्तिकेय ने अपने दिव्य कवच को अभिमंत्रित किया जिससे उनके शरीर से साथ रंगों की सुरक्षात्मक किरने फूट पड़ी
00:49देवराज इंद्र के मुख पर उस प्रल्यंकारी द्रिश्य को देख भय और विस्मय के मिलेजुले भाव उभराए
00:57तभी तारकासुर के ब्रहमास्त्र के प्रहार से धर्ती की सतह पर बड़ी बड़ी दरारे पड़ गई और नीचे की अगनी
01:04उपर आने लगी
01:07स्रिश्टी का संतुलन हिल उठा, मानो प्रकृती स्वयं उस महाविनाश के आगे नत्मस्तक हो रही हो
01:15अयहपान के कड़ाहे जो पहले ठंडे थे, अब ब्रहमास्त्र की उर्जा से पिघले हुए तामबे के समान धधकने लगे
01:23भगवान शिव कैलाश के शिखर पर शांत मुद्रा में बैठे रहे, परन्तु उनकी तीसरी आख की पुतली में एक हलकी
01:31सी हल चल हुई
01:33कार्तिके ने अपनी पूरी शक्ती का आहवान करते हुए उस अस्त्र को अपनी धाल पर रोकने का साहस दिखाया
01:41ब्रहमांड के रक्षक और विनाशक की शक्तियों का मिलन एक ऐसी गर्जना पैदा कर रहा था जिससे अंतरिक्ष भी थर्रा
01:48उठा
01:50पुयोद के दुरगंधित कीचर भरे नद भी ब्रहमास्त्र के ताप से सूख कर राख के टीलों में परिवर्तित होने लगे
01:58नारद मुनी ने वीना के तारों पर अपनी उंगलिया रोक ली और उस महाट कराव को विस्मित होकर देखा
02:06ब्रहमास्त्र के टकराते ही धर्ती के भीतर दबी हुई प्राचीन उर्जाएं बाहर निकलने के लिए मचल उठी
02:14प्रकृती के सभी नियम मानों कुछ क्षणों के लिए थम गए थे क्योंकि शक्ती और विनाश का एक अध्भुत समन्वय
02:22घटित हो रहा था
02:24सुकर्मुख के वराह मुखी रक्षक भी इस दैविय प्रहार की तीवरता से अपने ही भारी पत्थरों के नीचे दबने लगे
02:32कार्तिके की ढाल और ब्रहमास्त्र के बीच का संगर्ष एक दिव्य प्रकाश के गुंबद में परिवर्तित हो गया
02:40उस गुंबद से निकली तरंगे तीन लोकों में इस तरह फैली जैसे शांथ सरोवर में फेंके गए किसी पत्थर से
02:47उठती लहरे
02:49पूरा ब्रहमांड एक क्षन के लिए मौन हो गया क्योंकि ब्रहमास्त्र की उर्जा का प्रभाव अब चरम सीमा पर था
02:58ब्रहमास्त्र के निश्फल होते ही तारकासुर की आखों में अविश्वास और उसके हृदय में प्रतिशोध की प्रचंड अगनी धधक उठी
03:07उसने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान करते हुए पाताल लोग की गहराईयों से अपने सबसे क्रूर असुर सेनाप्तियों को युद्ध
03:15भूमी में बुलाया
03:17पाताल की उन अंधेरी गुफाओं से करोडों की संख्या में विक्रित और विशालकाय दानव सेना बाहर निकली जिनकी दहार से
03:26ब्रहमांड का संतुलन डग्मगा गया
03:29असुरों की वह असीम भीड किसी विशाल काली सुनामी की भांती आकाश की ओर बढ़ने लगी, मानो स्वयंकाल भी उनसे
03:37डर कर पीछे हट गया हो
03:40तारकासुर ने अपनी गदा उठा कर युद्ध का शंकनाद किया, जिससे निकली गूंज ने पूरे वायुमंडल को विशाक्त धुआ और
03:48भस में बदल दिया
03:50आकाश में उपस्थित देवगन तारकासुर की इस अंतिम और पागलपन भरी तैयारी को देख कर स्तंभित रह गए
03:58दानगों की सेना ने अपने तीखे शूल और जलते हुए भाले कार्तिके की ओर फेंकना प्रारंब कर दिया, जैसे आकाश
04:06से आग के गोले गिर रहे हुँ
04:09वातावर्ण में घुली हुई असुरों की चीखें और युद्ध भेरी की आवाज ने उस स्थान को मृत्यू और विनाश का
04:17एक जीवंत चित्र बना दिया
04:20तारकासुर का क्रोध अब चरम पर था, उसने अपने शरीर से मायावी अगनी उत्पन कर स्वयं को एक विशालकाई दानव
04:28रूप में परिवर्तित कर लिया
04:30भगवान विश्णू ने अपनी गदा से एक दिव्य सुरक्षा घेरा निर्मित किया ताकि असुरों के उस प्रहार को रोका जा
04:38सके
04:39आस्मान में टकराते ही अस्त्रों की चमक से पूरा रणक्षेत्र दूधिया रोश्नी में नहा गया और असुरों की सेना कुछ
04:47क्षण के लिए अंधी हो गई
04:50धूई के छंटते ही असुरों ने देखा कि कार्तिके की दिव्य शक्ती का तेज उनके माया भी अंधकार को चीर
04:57रहा था
04:59तारकासुर ने अपनी निराशा को अपनी शक्ती में बदलते हुए एक साथ कई दिशाओं से राक्षसों को आक्रमन करने का
05:06आदेश दिया
05:08गरुर के पंकों की फड़फडाहट से उत्पन हुई आंधी ने असुरों की उस पंक्ती को तितर बितर कर दिया
05:16जमीन के नीचे दबे हुए शूल और कांटे असुरों के ही पामबों में चुबने लगे जिससे उनकी गती मंद पड़
05:23गई
05:25तारकासुर के मन में यह विचार घर कर गया कि यदि आज वह सफल नहीं हुआ तो उसका संपून अस्तित्व
05:32राख हो जाएगा
05:34उसने अपने रक्त के अंतिम बूंद तक लड़ने का संकल्प लिया और पूरी शक्ती से अपनी तलवार को काल की
05:41दिशा में घुमाया
05:43देवराज इंद्र ने अपनी बजर का प्रहार सीधे असुर सेना के केंद्र पर किया जिससे धर्ती के टुक्रे टुक्रे होने
05:50लगे
05:52ब्रहमांड की नीम हिल गई क्योंकी ब्रहमास्त्र और असुरों के सामुहिक क्रोध का मिलन विनाश के एक नए युग को
05:59जन्न दे रहा था
06:02तारकासुर अब पूरी तरहे से पागल हो चुका था वह अपनी बची-खुची सेना के साथ उस अजे दिव्य प्रकाश
06:09की ओर कूदा
06:11देव लोग की स्वर्णमे सभा में सन्नाटा पसरा था और इंद्र के सिन्हासन के नीचे की आधारशिला दरकने लगी थी
06:19देव गुरु ब्रिहस्पती ने चिंतित मुद्रा में भगवान विश्णु की ओर देखते हुए कहा कि अंतरिक्ष के तानेबाने पर अब
06:27असहनिय दबाव बढ़ रहा है
06:30गरुर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पन वायु वेग ने उन नक्षत्रों को अपनी कक्षा से डग्मगाने पर मजबूर कर
06:38दिया
06:39ब्रहमांड के रक्षक का ध्यान इस भयानक प्रल्यकारी गूंच की ओर गया जो ब्रहमास्त्र के टक्राने से उत्पन हो रही
06:47थी
06:48इंद्र अपनी दिव्यद्रिष्टी से देख रहे थे कि कैसे समय का चक्र अपनी गती से विपरीट दिशा में घूमने का
06:55संकेत दे रहा है
06:58ब्रिहस्पती ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि यदी यह उर्जा शांत नहीं हुई तो तीन लोग एक अंथीन रिक्त
07:06स्थान में विलीन हो जाएंगे
07:09तारागनों की चमक फीकी पड़ रही थी और नक्षत्र अपने स्थान से तूटकर नीचे गिरने लगे थे
07:16विश्णू ने अपने नीले कमल जैसे नेत्रों को बंद किया जिससे पूरी सभा में एक दिवे शांती का संचार हुआ
07:25आकाश के रंग बदलते हुए गहरे बैंगनी और धुंधले स्वर्ण में परिवर्तित होने लगे जो एक बड़े संकट का संकेत
07:33था
07:34इंद्र ने अपने बजर को कसकर पकड़ा उसकी चमक कम होने लगी थी जैसे उसे भी इस महाविनाश का भय
07:41हो
07:43सभा में उपस्थित अन्य देवता अपनी शक्तिक होते हुए प्रतीत हो रहे थे जैसे कोई अद्रिश उर्जा उन्हें सोख रही
07:51हो
07:52काल के प्रवाह को स्थिर करने के लिए देवताओं ने एक साथ मिलकर मंत्रो चार प्रारंभ कर दिया
08:00ब्रहमांड के द्वार पर खिंचाव इतना बढ़ गया था कि भौतिक पदार्थ धीरे धीरे कणों में बिखरने लगे थे
08:08ब्रिहस्पती की वानी में अब द्रिड़ता थी उन्होंने देवताओं को सचेप किया कि विनाश को रोकने का अंतिम अफसरा गया
08:16है
08:17इंद्र की द्रिष्टी सीधे उस बिंदु पर टिकी थी जहां ब्रहमांड का केंद्र तारकासुर के ब्रहमास्त्र के प्रहार से काम
08:25प्रहा था
08:27शाश्वत प्रकाश का पुंच पूरे देवलोक में फैल गया जैसे कोई उच्छ शक्ती हस्तक शेप करने वाली हो
08:35देवलोक के स्तंभ काम प्रहे थे और स्वर्ण के आभूशन गिरने लगे थे मानो प्रकृती भी अपना संतुलन खो चुकी
08:42हो
08:44विश्णु ने धीरे से कहा कि यह युद्ध अब केवल एक असुर का नहीं बलकि अस्तित्व की रक्षा का है
08:52देवताओं के हरिदय की धड़क ने उस ब्रहमांडिय गूंच के साथ लय में बंध गई थी
08:59अंतिम प्रहार की तैयारी में देवगन अब मौन थे केवल उस आने वाले महाविनाश की प्रतीक्षा में
09:07कार्तिकेय ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से युद्धक्षेत्र का अवलोकन किया
09:11जहां महार औरव के विशाल ज्वाला मुखिय गड़ों से निकलती कालिमा उनके सामरिक कौशल को चुनौती दे रही थी
09:20भगवान विश्णु ने अपनी नीलमनी जैसी आभा के साथ मंद मुस्कान बिखेरी जो यह संकेट दे रही थी कि अब
09:27अधर्म की जड़े कटने का समया गया है
09:31कार्तिके ने अपनी स्वर्णिम सेना को दिशा निर्देश दिये जिससे सैनिक एक अभेद्य चक्रव्यू की भांती तारकासुर के सेनापतियों को
09:40घेरने के लिए आगे बढ़े
09:43अंधकार मही शक्तियों के बीच एक भयावह गूंच उठी जैसे स्वयंकाल उस विनाशकारी प्रहार की प्रतीक्षा में अपनी सांसे रोक
09:52बैठा हो
09:54कार्तिके की योजना के अनुसार देव सेना ने तारकासुर के मायावी असुरों के साथ संपर्क काटने के लिए चारों और
10:01से घेराबंदी मजबूत कर दी
10:04गरुर के पंकों की फड़फडाहट ने आकाश में एक तीवर हलचल मचा दी जिससे असुरों के छद्म वेश और उनकी
10:12मायावी ओट छिन्न भिन हो गई
10:15कार्तिके का शक्ती अस्त्र एक तीवर प्रकाश रेखा की भांती असुर सेना के मुख्य स्तंभों को लक्ष बना कर आगे
10:23बढ़ा
10:25देवतागन अब उस कालरात्री के मध्य में एक जलते हुए प्रकाश पुंच की तरहे खड़े थे जो तारकासुर की असुरक्षित
10:32सीमाओं को भेद रहा था
10:35तारकासुर ने बौखला कर अपनी अंतिम माया का प्रयोग किया लेकिन कार्तिके की सटीक रणनीती ने उसे अपनी ही शक्तियों
10:43के घेरे में कैद कर लिया
10:46विश्नु की आग्या मिलते ही देव सेना ने एक साथ गर्जना की जिससे महार औरव की धर्ती काम उठी और
10:54असुरों के हतियार बिखर गए
10:57असुरों की सेना अब एक बिखरते हुए स्वपन की तरह सिमटने लगी थी, क्योंकि उनके शक्ती के मुख्यस रोतों को
11:04कार्तिकेय ने पहले ही अलग कर दिया था
11:08एक गुंजती हुई गर्जना के साथ, वातावर्ण में मौजूद सारी नकारात्मक उर्जा उस एक बिंदो पर सिमटने लगी जहातार का
11:16सुर खड़ा था
11:18कार्तिकेय ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची और उस प्रहार की गूंच पूरे ब्रहमांड के आकाश में सुनाई देने लगी
11:27विष्णु का सुदर्शन चक्र अब उस अस्त्र के चारों और एक सुरक्षा कवच की तरह घूमने लगा ताकि ब्रहमस्त्र की
11:35उर्जा को नियंत्रित किया जा सके
11:38रनभूमी के केंद्र में असुर सेना के बचे हुए टुकडे अपनी नेती के सामने असहाय खड़े होकर उस प्रलय को
11:45देख रहे थे
11:47अंतिम प्रहार से पूर्व की वह शान्ती किसी भीशन तूफान के आने का संकेट दे रही थी जिसने पूरे ब्रहमांड
11:54को स्तब्ध कर दिया
11:57कार्तिके का चहरा पूरी तरह शांत था, जैसे उन्होंने अपने भीतर उस ब्रहमस्त्र की भीशनता को आत्मसात कर लिया हो
12:06असुरों का वह मायावी जाला जिसे तारकासुर ने वर्षों तक बुना था, अब एक एक धागे करके तूट रहा था
12:15देवगणों ने अपनी सामुहिक शक्ती को एक त्रिशूल के रूप में सन्योजित कर कार्तिके के अस्त्र को बल प्रदान किया
12:23अब समय आ गया था कि ब्रहमस्त्र के उस प्रल्यंकारी प्रहार से अधर्म का वह अहंकार अंतिम बार धर्ती पर
12:30गिरे
12:32तारकासुर ने अपनी अंतिम चाल चलते हुए युद्ध भूमी के वायुमंडल में एक मायावी सघन कोहरे को जन्म दिया
12:39जिससे चारों और भ्रम की काली छाया फैल गई
12:43भगवान विश्णु ने अपनी कमल नियन ग्रिष्टी से उस मायाजाल को भांप लिया और गरुर पर आरूढ होकर शांत परंतु
12:51सतर्क मुद्रा में कार्तिके को सचेत किया
12:55सहसा कार्तिके के समक्ष माता पार्वती का एक आभासी रूप प्रकट हुआ
13:00जो करुन स्वर में उन्हें युद्ध रोकने का आग्रह कर रहा था
13:04यह मायावी जाल केवल एक दरपन था
13:08जिसके पीछे तारकासुर अपनी असुर सेना के साथ कार्तिके पर घातक वार करने की प्रतीक्षा कर रहा था
13:16कार्तिके ने अपनी ज्ञान द्रिष्टी का आहवान किया और उस मायावी द्रिष्य को भेदते हुए सत्य को स्पष्ट रूप से
13:23देख लिया
13:25भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख से एक सुक्ष्म प्रकाश किरन छोड़ी जिससे कार्तिके के विवेक को और अधिक तीक्षनता
13:33मिली
13:35कार्तिके ने अपने शक्ती अस्त्र को उठाया और उस भ्रमित कोहरे पर प्रहार किया जिससे वह मायावी जाल एक जटके
13:43में छिन्नभिन हो गया
13:45माया के नश्ट होते ही तारकासुर का वह भयानक और घिनोना रूप नगन होकर सब के सामने आ गया
13:52जो अब अपनी शक्तियों के खोने से काम प्रहा था
13:56चारों और व्याप्त असुरों का वह शड्यंत्र अब धूल में मिल चुका था और भूमी की दरारें उस अंतिन विनाश
14:03की गवाह बन रही थी
14:06देवगणों ने आकाश से पुष्प वर्षा की क्योंकि कार्तिकेय ने मनोवैज्यानिक युद्ध में भी विजय प्राप्त कर ली थी
14:15कार्तिकेय ने अपना धनुष साधा और तारकासुर की उस छुपी हुई कमजोरी पर निशाना लगाया जिसे वह अब तक छुपाए
14:23हुए था
14:25तारकासुर ने अपनी अंतिम श्वासे लेते हुए कुरूरता पूर्वक अट्थास किया लेकिन वह कार्तिकेय के द्रिड संकल्प के आगे पस्थ
14:33हो गया
14:34धूल और राख के गुबार में कार्तिकेय का तेज एक सूर्य के समान चमक रहा था जिसने अंधकार की अंतिम
14:42परत को भी जला दिया
14:45भगवान विश्णु ने अपनी शंक ध्वनी से ब्रहमांड को सूचित किया कि माया का अंत निकट आ चुका है
14:53कार्तिकेय ने धर्ती की कमकपी को महसूस किया जैसे स्वयन प्रित्वी भी उस दुराचारी के भार से मुक्त होने के
15:00लिए छटपटा रही हो
15:02असुर राज की आखें अब अपनी पराजय को स्वीकार कर रही थी क्योंकि उसे समझहा गया था कि धर्म के
15:10सामने उसका अहंकार केवल राख है
15:14ब्रहमास्त्र के टक्राने की गूंश पूरे ब्रहमांड में फैल गई जिससे आकाश के नक्षत्र भी अपनी दिशा बदल रहे थे
15:23इस प्रलंकारी टक्कर से उपजी उर्जा ने तारकासुर की मायावी शक्तियों को सदा के लिए समाप्त कर दिया
15:31कार्तिके ने अपने अस्त्र को वापस खींच लिया अब युद्ध का अंतिम चरण समाप्त होने की ओर अग्रसर था
15:39धर्ती ने एक लंबी सास ली और अधर्म के पतन के साथ ही युद्ध भूमी पर एक नई शांती का
15:46उदे होने लगा
15:48युद्ध भूमी के उपर का आकाश अब धूल और राख से मुक्त होकर एक दिव्य सुनहरी आभा में बदल गया
15:55है
15:55जहां हिमालय के बरफीले शिखर शांती की गवाही दे रही है
16:01भगवान विश्नु अपनी शेश्या पर शांत मुद्रा में विराजमान है
16:05और उनके मुख पर धर्म की विजय का एक संतोश जनक मुस्कान स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है
16:13कार्तिकेय ने अपने हाथ में स्थित दिव्य वेल को म्यान में वापस रख लिया
16:18जिससे उसकी प्रखर ज्वालाएं अब शांत होकर एक दिव्य प्रकाश में विलीन हो गई
16:24हिमाले की बर्फियी हवाओं के बीच देवगणों ने पुष्प वर्शा कर कार्तिकेय के इस महान पराक्रम और धैर्य का गुनगान
16:32करना आरंभ कर दिया
16:35देवराज इंद्र ने अपने दिव्य एरावत पर सवार होकर कार्तिकेय की ओर देखते हुए अपने मस्तक को नमन के लिए
16:43जुका दिया
16:44भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी समाधी से उठकर अधर्म के विनाश के उपरांत ब्रहमांड में आए इस नूतन
16:52संतुलन को निहार रहे हैं
16:55धर्ती की सतह पर जो दरारे तारकासुर के ब्रहमास्त्र के कारण पड़ गई थी वे अब धीरे धीरे पुनह एक
17:03होने लगी हैं
17:05कैलाश के शिखरों के चारों और दिव्यशंखों की गूंच सुनाई दे रही है जो इस युद्ध के अंतिन समापन का
17:12शुब संदेश पूरे नक्षत्रों में फैला रहे हैं
17:17कार्तिके अब परवत की उचाईयों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं उनका प्रत्येक पक ब्रहमांड में एक नई सकारात्मक उर्जा
17:25का संचार कर रहा है
17:28नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे निकली हुई मधुर ध्वनी ने वातावर्ण को भक्ती और आनंद
17:36के रंग में रंग दिया
17:38कार्तिके के पीछे का अद्रिश्य दिव्यतेज अब एक धाल की भांती पूरे हिमालय को सुरक्षा और शांती के कवच में
17:46लपेट चुका है
17:48प्रकृती के कणकण में अब एक अद्भुत जीवन्तता का संचार हो रहा है जो अधर्म के अंत के बाद होने
17:55वाली उस पहली भोर का संकेथ है
17:59भगवान विश्णु ने गरोड की पीठ पर सवार होकर कार्तिकेय को आशिर्वात देने के लिए अपना दिव्याहात आकाश की ओर
18:07उठाया
18:09गौतम रिशी और अन्यमहान तपस्वियों ने अपनी आखे खोली उनके चेहरों पर अब भय का स्थान श्रद्धाने ले लिया है
18:18कार्तिकेय ने रुखकर अपनी माता पार्वती और पिता शिव की ओर देखा उनके नेत्रों में माता पिता के प्रती अथा
18:26प्रेम और भक्ती का सागर उमड आया
18:29इस दिव्य मिलन की प्रतीक्षा में कैलाश की वादिया मानो स्वयंग प्रार्थना में लीन हो गई हैं और शांत हो
18:36गई हैं
18:39ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदें ब्रहमांड में छिड़की जिससे संपून स्रिष्टी पुनह एक बार पवित्र
18:47हो गई
18:48सब्तरिष्यों के समूहों ने एक स्वर में वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना शुरू कर दिया जिससे कैलाश का कंकन गुंच
18:56गुठा
18:58कार्तिके के शरीर से निकली वह दिव्य उर्जा अब एक सुनहरे गोले के रूप में पूरे आकाश में फैल कर
19:04अंधेरे का नामों निशान मिटा रही है
19:08अधर्म के पतन के बाद न्याय की विजय ने ब्रहमांड के इतिहास में एक नए युग का सुनहरा अध्याय लिखना
19:15प्रारंभ कर दिया है
19:18ब्रहमास्त्र के प्रहार से कापते हुए कैलाश की भूमी पर कार्तिके और तारकासुर के बीच का यह अंतिम महायुध अब
19:26एक प्रत्यक्ष अगनी परीच्षा में बदल गया है
19:30भगवान विश्नु अपने गरून पर विराजमान होकर इस विध्वनसक संधर्ष को देख रहे हैं जहां उनकी शांत ग्रिष्टी में भी
19:38धर्म की विजय का अटूट विश्वास पष्ट जलक रहा है
19:43कार्तिके ने अपने दिव्य शक्तिवेल से उस ब्रहमास्त्र की प्रचंड लप्टों को चीर दिया जिससे उत्पन्न उर्जा की तरंगों से
19:51पूरी घाटी में गड़गडा हट मच गई
19:54युद्ध क्षेत्र के उपर आकाश में काल का चक्र ठहर गया है मानो प्रकृती स्वय इन दोनों महाशक्तियों के मिलन
20:02का साक्षी बनने के लिए थम गई हो
20:06तारकासुर ने अपनी असुर सेना को पीछे हटते हुए देखा और स्वय अपनी विशालकाय भुजाओं में भयंकर विनाशकारी उर्जा को
20:14समाहित करने का प्रयास किया
20:17भगवान शिव अपनी समाधी से उठकर इस संधर्ष को एक सतर्क द्रिष्टी से निहार रहे हैं उनके माथे की तीसरी
20:25आख की चमक से कैलाश की बर्फ भी पिघलने लगी है
20:30दो महाशक्तियों के टकराते ही धर्टी की सतह पर गहरी दरारे पड़ गई जैसे की पाताल के द्वार स्वय इस
20:37विध्वन्स को निगलने के लिए खुल गए हूँ
20:41वायुमंडल में 33 स्वर्ण और काली उर्जा के बीच एक रहस्य में शान्ती छा गई है जो आने वाले निरनायक
20:48प्षन की पूर्व सूचना दे रही है
20:52तारकासुर के प्रहार से टक्रा कर कार्तिके के शस्त्र से निकली चिंगारिया चारों दिशाओं में फैल कर एक रक्षा कवच
20:59का निर्मान कर रही है
21:02देवराज इंद्र और अन्य देवतागन आकाश मार्ग से इस युगांतरकारी युद्ध की भयावता को देखकर स्तब्ध और अचम्भित है
21:13कार्तिके की प्रत्येक गती में ब्रहमान्डिय संतुलन का अनुशासन है जो तारकासुर की अनियंतरित असुर शक्ती को हर कदम पर
21:21विफल कर रहा है
21:23पर्वत की चोटी पर स्थित शिलाएं इस भीशन घर्षन से तूटकर आकाश में उचर रही हैं जिससे कैलाश का स्वरूप
21:31एक अकलपनिय द्रिश्य बन गया है
21:35तारकासुर ने अपनी आसुरी माया का अंतिम जाल बिछाया जिससे चारों और अंधकार के काले बादल छा गए और सब
21:43कुछ धुन्धला होने लगा
21:46भगवान विशनु ने अपनी शंक ध्वनी से उस मायावी अंधकार को भेदने का संकेत दिया जिससे आकाश में पुन प्रकाश
21:54की किरने फूट पड़ी
21:57कार्तिकेय ने अपने तेज को और अधिक प्रकार किया जिससे उनके शरीर से निकलने वाला ओस ब्रहमांड के हर कोने
22:04को आलोकित करने लगा
22:06पूरे कैलाश शेत्र में गूंजते मंत्रों का स्वर अब एक गड़गडाहट में बदल गया है जो असुरों के भय का
22:14कारण बन रहा है
22:16असुर राज का विशाल शरीर अब ठकने लगा है क्योंकि उसके द्वारा प्रयुक्त ब्रहमास्त्र की शक्ती अंत्ता उसका ही विनाश
22:24करने पर उतारू हो गई है
22:27भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए अपना त्रिशूल उठाया जिससे स्रिष्टी के कंकन में एक पवित्रस पंदन प्रवाहित हो उठा
22:37कार्तिके ने अंतिन प्रहार के लिए अपनी समस्त उर्जा को एकागर किया जिससे ब्रहमांड की सारी शक्तियां उनके उस वेल
22:45में सिमट आई
22:47धर्ती फटने लगी और आकाश से वजर्पात होने लगा जब कार्तिके और तारकासुर के बीच का यह द्वंद्व अपने चरम
22:56पर पहुँच गया
22:58रणभूमी के केंद्र में आकाश से उतरती ब्रहमांडिय उर्जाने रावरव के उस भयानत काले गर्थ को पूरी तरह से प्रकाशित
23:06कर दिया
23:07भगवान विश्णु ने अपनी गरूर पर विराज मान होकर अपने चतुर्भुज रूप में इस महा संग्राम के अंतिम क्षणों को
23:15शांत और गंभीर द्रिश्टी से निहारा
23:19कार्ति के का वेल जैसे ही आगे बढ़ा हवा में मौजूद अगनी और धातु के कणों ने एक चीखती हुई
23:26ध्वनी पैदा की जो पूरे ब्रहमांड में गूंच गुठी
23:30तारकासुर के चारों और बनी अभेद्य मायावी कवच जो अब तक काल के प्रहारों को जेलती आई थी वेल की
23:37आभा से थर्थराने लगी
23:40सुकर्मुख के दैत्य पहरेदार जो तारकासुर की रक्षा के लिए खड़े थे उस दिव्य प्रहार के तेज से पीछे हटने
23:48को मजबूर हो गए
23:50भगवान शिव ने अपनी जटाओं को समेटा और एक मूख आदेश के साथ ब्रहमांडिय संतुलन को कार्थिके के वेल के
23:58पीछे द्रिड कर दिया
24:00वेल की नोक ने तारकासुर के कवच के केंद्र में उस बिंदु को स्पर्ष किया जहां से उसकी अमर्ता का
24:07अहंकार उपजा था
24:10जैसे ही काज के तूटने की आवाज आई उस अभेद्य कवच पर गहरी दरारे पड़ गई और उसके भीतर का
24:17अंधकार बाहर छलकने लगा
24:20पूरे ब्रहमांड की शक्तिया एक क्षण के लिए ठहर गई, मानोस्वयन समय भी तारकासुर के कवच के तूटने की गवाही
24:28दे रहा हो
24:30देवराज इंद्र ने अपने दिव्य सिनहासन से इस द्रिश्य को देखा, जहां उनके चहरे पर पहली बार एक राहत भरी
24:37मुस्कान उभी
24:39वेल का तीवर कमपन अब तारकासुर की असुर शक्तियों को उसके शरीर से अलग कर रहा था, जिससे उसकी धूर्तता
24:47पूर्न रूप से नग्न हो गई
24:50अंधकार के उस गर्त में अब कोई माया नहीं बची थी, केवल एक असुर था जिसके पास अब अपनी नश्वर्ता
24:57के सिवाय कुछ नहीं बचा था
25:00आकाश में खड़े देवताओं ने कार्ति के एके इस विजय के प्रथम चरण पर पुष्प वर्षा करने के लिए अपने
25:07हाथों को उपर उठाया
25:10महादेव के मस्तक पर तीसरी आख ने एक क्षण के लिए जपकी ली, जैसे वे तारकासुर के अंत के लिए
25:17मार्ग प्रशस्त कर रहे हूँ
25:19वेल की उर्जा ने अब तारकासुर के उन्गुक्त बिंदूओं को खोज लिया था, जो कभी ब्रहमाजी के वर्दान द्वारा सुरक्षित
25:27थे
25:29कवच के गिरने की आवाज किसी वजर्पात के समान थी, जिसने उस पूरे क्षेत्र की चट्टानों को भी कमपकपा कर
25:36रख दिया
25:38तारकासुर अब अपने प्राणों के लिए लड़ रहा था, उसकी आखे क्रोध से नहीं, बल्कि अपनी पराजय की वास्तविक्ता से
25:46जड़ रही थी
25:48कार्तिके की तेजस्वी आकरिती उस अंधकार में एक सूर्य के समान चमक रही थी, जो असुरों के विनाश का प्रतीक
25:56बन चुकी थी
25:58धूल और राख के गुबार में से तारकासुर का अस्तित्व अब बस एक पतन की ओर अग्रसर अंत की भानती
26:05शेश रह गया था
26:07अंतिम प्रहार के लिए वेल अब पूरी तरह से आवेशित हो चुका था और कार्तिके ने अपने लक्षे को बिना
26:14किसी मोह के साध लिया था
26:17कार्तिके द्वारा छोड़े गए वेल की उर्जाने ब्रहमांड की दिशाओं को कमपा दिया
26:23देवराज इंद्र और अन्य देवता स्वर्ग के छोर से इस महाप्रलय को स्तब्ध होकर देख रहे थे
26:31तारकासुर ने अपनी अंतिम सांसों में उस दिव्य प्रकाश को अपनी और आते हुए अनुभव किया
26:38यह वह क्षण था जब अहंकार का विशाल परवत न्याय के वजर के आगे ढहने लगा था
26:45वेल का तीखा सिरा तारकासुर के अजे कवच को चीरता हुआ सीधा उसके हृदय में उतर गया
26:52ब्रह्मा और विश्णु ने इस एतिहासिक पराजय को देख कर अद्रिश्य रूप से अपनी सहमती प्रकट की
27:00तारकासुर के शरीर से निकलती उर्जा ने आसमान में एक अद्भुत और भयावः घेरा बना लिया
27:07वह अहंकार जो सदियों से तीनों लोकों पर भारी था अब एक जटके में बिखरने लगा था
27:15कार्तिके ने अत्यंत शांत मुद्रा में अपने अस्त्र को वापस अपने हाथों में खींच लिया
27:22माता पारवती ने अपने पुत्र के इस पराक्रम को देख कर गर्व से अपनी आखे बंद कर ली
27:29असुर राज का विशाल शरीर धीरे-धीरे रेत के कनों की भांती नीचे गिरने लगा
27:35धर्ती की फटी हुई दरारें अब धीरे धीरे शान्त होने लगी और गहरी शान्ती छा गई
27:43समस्त आकाश मंडल में फूलों की वर्षा होने लगी और गंधर्वों ने विजय गीत गाए
27:49नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों पर विजय का पावन स्वर छेड़ दिया
27:55तारकासुर की अंतिम चेतना ने ब्रहमांडिय सत्य को स्विकार कर लिया और वह विलीन हो गया
28:02यह अंत केवल एक असुर का नहीं बलकी भय और अत्याचार के उस युग का था
28:09कार्तिके की जैजैकार से तीनों लोग गुँझ उठे और हर ओर प्रकाश फैल गया
28:16भगवान शिव ने अपनी समाधी से मुस्कुराते हुए इस नए युग के सूर्य का स्वागत किया
28:23युद्ध भूमी पर अब केवल विजय की सुगंध और धर्म का प्रकाश शेश था
28:29इस प्रकार तारकासुर का अंत हुआ और सकंद के पराक्रम ने इतिहास रच दिया
28:35रणभूमी के शान्थ होते ही आकाश में छाया हुआ भीशन अंधकार धीरे-धीरे छंटने लगा
28:43देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन इस महाविजय पर हर्शित होकर धीरे-धीरे नीचे उतर आए
28:50सकंद के चर्णों में नत्मस्तक होकर देवों ने उनके अद्वितिय पराक्रम की वंदना की
28:57समस्थ प्रैलोक्य में शान्ती का शीतल समीर बहने लगा और अधर्म का नामों निशान मिट गया
29:04भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य शंकध्वनी से इस महान विजय की घोषणा पूरे ब्रहमांड में की
29:12रिशिमुनियों ने वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ सकंद के यशस्वी ललाट का अभिशेक किया
29:19मापार्वती ने सनेह से भरे हृदय से अपने विजी पुत्र को गले से लगा लिया
29:25दिव्य आलोक से सजी यह बेला संपूर्ण स्रिष्टी के पुनरुथान का प्रतीक बन गई
29:31हालांकि असुरों के विनाश के उपरांत भी भविश्य के गर्भ में छिपे रहसियों का भय बना रहा
29:38देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर एक गंभीर और विचार्निय धुन छेडी
29:45कैलास परवत पर बैठे भगवान शिव की आखें अभी भी ब्रहमांडिय संतुलन को टटोल रही थी
29:53धर्म की स्थापना के बाद भी पाताल लोक की गहराईयों में कुछ अनिष्ठ हलचल महसूस हुई
29:59काल चक्र अपनी गती से आगे बढ़ रहा था और पुरान का अगला अध्याय द्वार पर था
30:07नक्षत्रों की चाल में एक नया परिवर्तन आया जो आने वाले युग के संधर्ष की और इशारा था
30:14सकंद ने अपने अस्त्र को शांत करते हुए धर्म के मार्ग पर निरंतर चलने का संकल्क लिया
30:21यह विजय केवल एक अध्याय थी संपूर्ण कथा का विस्त्रित विस्तार अभी शेश था
30:29संपूर्ण ब्रहमांड में सकंद के यश की गूंच चारों दिशाओं में अमर हो गई
30:35देवता अपने अपने लोकों की और प्रस्थान करने लगे, मन में एक अगाध संतोश लिये हुए
30:42महांता के इस शिखर पर पहुँच कर भी सकंद की दृष्टी में विनमर्ता और करुणा का भाव था
30:49इस प्रकार सकंद पुरान के इस अध्भुत अध्याय का विराम हुआ और भविश्य की राहें खुल गई