- 31 minutes ago
स्कंद पुराण के पांचवें अध्याय में देखिए तारकासुर और कार्तिकेय के युद्ध का सबसे रोमांचक मोड़! जब तारकासुर ने अपने अंतिम ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तो क्या कार्तिकेय उसे रोक पाएंगे? जानिए इस महायुद्ध का वो रहस्य जो अब तक किसी ने नहीं बताया। Hindu Mythology, Skanda Purana, Lord Kartikeya, Tarakasura War, Ancient Indian Scriptures, Spiritual Awakening, Vedic History.
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00तार कासुर के सामराज्य रोरव के काले दहकते हुए नरक के बीच में असुरों की राजधानी में निराशा का काला
00:07साया गहराने लगा है।
00:08क्रोध में कापते हुए तारकासुर ने अपने विशाल स्वर्ण सिनहासन से उठकर अपने शेश योध्धाओं को अंतिम विनाशकारी युद्ध के
00:18लिए ललकारा
00:20असुर राज की दहार से रौरव की काली अगनी और भी भीशन हो उठी जैसे वह स्वयन ब्रह्मांड की नेती
00:28को भस्म कर देना चाहता हो
00:30अंधेरी गलियों में जली हुई लोहे की मीनारे तारकासुर के उस घातक संकर्प की गवाह बनी जो उसने देवताओं के
00:38विरुद्ध लिया था
00:40अपने सेनाप्तियों की ओर देखते हुए तारकासुर के चहरे पर विजय की नहीं बलकि अपने विनाश को टालने की एक
00:48हताश छटपटाहट दिखाई दी
00:51असुर योध्धाओं ने अपने हतियारों को उठाया, जिनकी चमक रौरव की काली अगनी को और भी भयानक रूप दे रही
00:59थी
01:00तारकासुर ने अपनी मायावी शक्ती से एक काला चक्र रचा, जो रनभूमी के देवताओं का सर्वनाश करने के लिए अभिशप्त
01:08था
01:10रौरव की राख और धुए से भरी हवाओं में तारकासुर के भयानक मंत्रों की गूँज ब्रहमांड की गहराईयों को हिला
01:17रही थी
01:18असुर सेना के मन में भय और उत्तेजना का एक विचित्र मिश्रण था, जो उनके अंतिम प्रहार को और भी
01:26खतरनाक बना रहा था
01:28तारकासुर का एक प्रमुख सेनापती, जिसकी देह वजर जैसी कठोर थी, अपने राजा के आगे नत्मस्तक होकर आग्या की प्रतीक्षा
01:37करने लगा
01:39राजा ने अपना त्रिशूल उठाया, जिसकी धार से रौरव की ज्वालाएं भी छटपटा कर दूर भागने लगी
01:47अराजकता का वातावर्ण और अधिक तीवर हो गया, जैसे रौरव का नरक अपनी पूरी सीमाओं को तोड़ कर बाहर आना
01:54चाहता हो
01:56तारकासुर ने गर्जना की और उसके साथ ही उसके सभी असुर सेनापती युद्धगोश करते हुए आगे बढ़ने के लिए तत्पर
02:04हो गए
02:06अंधकार के उस भीशन सामराज्य के उपर नेती का एक काला घेरा बन गया था जो देवताओं के लिए एक
02:13चेताबनी समान था
02:16असुरों की भीड में से निकलते हुए तारकासुर का गौरव और अहंकार उसकी आखों की लाल चमक में सपष्ट दिखाई
02:23दे रहा था
02:25रौरव की गहराई में दबे हुए प्राचीन लोहे के यंत्रों को तारकासुर ने अपनी मंत्र शक्ती से जागरित कर दिया
02:33युद्ध का बिगुल बस चुका था और रौरव के योध्धाओं की आखों में विनाश की एक गहरी प्यास पष्ट थी
02:41हर कदम के साथ असुर सेना अपने राजा के पीछे एक भयावः प्रतिध्वनी उत्पन कर रही थी
02:49तारकासुर ने अपनी माया का अंतिम प्रहार तै कर लिया था जो सृष्टी के हर कण को दहला देने के
02:56लिए परियाप्ट था
02:58अंधकार के उस देवता के हरिदय में जीत की जिद्ध और विनाश की ज्वाला का तांडव अपने चरम पर था
03:06तारकासुर अपने दुर्ग के सबसे गहरे और वर्जित कक्ष रौरव की ओर बढ़ा जहां सदियों से बंद तामसिक ग्रंथ हवा
03:14में तैर रहे थे
03:16दानवराज की क्रूर आखों में एक आसुरी चमक थी जैसे उसने ब्रहमांड के विनाश का अंतिम मार्ग खोज लिया हो
03:25उसके भारी हाथों ने उस प्राचीन ताड़ पत्र को छुआ जिस पर ब्रहमास्त्र को जागरित करने की विभीशिका अनकित थी
03:33रौरव की उनकाली दीवारों के भीतर से एक भयावह कमपन उत्पन हुआ जो साक्षात काल की सीमाओं को चुनौती देने
03:42लगा था
03:43तारकासुर ने अपनी विक्राल गर्जना से रौरव के पत्थरों को कमपा दिया मानो उसने स्वयं मृत्यू को चुनौती दे दी
03:51हो
03:52उसके सामने खड़े होकर वह भयंकर अनुष्ठान शुरू हुआ जिसकी लप्टे काले धुए में लिप्टी हुई थी
04:00हवा में तैरते वे अभिशप्त मंत्र एक मंत्र मुग्ध कर देने वाली गूंच के साथ वातावर्ण को चीरने लगे
04:08आकाश के सुदूर कोनों से यह अनिष्ठ संकेत स्वयन ब्रह्मांड की आत्मा को जख जोरने के लिए काफी था
04:17तारकासुर का शरीर उस दिव्य उर्जा के भार से थर्थराने लगा जिसे सहने की क्षमता केवल देवताओं में होती है
04:25उसने अपने रक्त की बली दी जिससे वे काली लगटें और भी प्रजवलित हो उठी
04:32अंधकार का वह राजा अपनी साधना में इतना लीन था कि उसे अपने चारों और गिरती हुई चट्टानों का भी
04:40भान नहीं रहा
04:42स्रिष्टी के निर्मान का वह सबसे शक्तिशाली अस्त्र धीरे-धीरे धुए के रूप में साकार हो रहा था
04:49रौरव की राख में लिप्टे तार कासुर का मुख अब एक दानविय विजय की ओर बढ़ रहा था
04:56तभी उसके कानों में एक दिव्यगूंच सुनाई दी मानो देवताओं का भय अब अंतरिक्ष को पार कर उसके पास पहुँच
05:04गया हो
05:06उसने अपने हाथों में एक जलती हुई काश्ट उठाई जो ब्रहमांड के विनाश का प्रतीक बन चुकी थी
05:14अंधकार का तांडव अब चरम सीमा पर था और ब्रहमास्त्र की उर्जा का संचार चारों और फैल रहा था
05:22उसके क्रोध के आगे स्वयन नरक की आग भी ठंडी महसूस होने लगी थी
05:28देवता तो बस आने वाले विनाश की आहट सुन रहे थे जबकी तारकासुर ने अपनी अंतिम चाल चल दी थी
05:36अब केवल ब्रहमांड का संतुलन ही दाव पर था और समय की धारा थमती हुई प्रतीत हो रही थी
05:44अगले ही पल तारकासुर का वह वर्जित आहवान पूर्ण हुआ जिसने पूरे ब्रहमांड को एक भीशन हलचल में जोक दिया
05:53ब्रहमांड की डगमगाती धुरी को थामने के लिए कार्तिकेय ने हिमालय की उस दुर्गम तुशार्मय शिखरों पर अपनी चेतना का
06:01विस्तार आरंभ किया
06:04भगवान शिव अपनी योग निद्रा के गहंतम खंड में स्थित होकर अपने पुत्र की आध्यात्मिक परिपक्वता को मौन स्वीकृती दे
06:12रहे थे
06:14कार्तिकेय ने अपनी आखे मून्द कर उस दिव्य वेल अस्त्र का आहवान किया जो केवल सत्य और धर्म के प्रती
06:21समर्पित हृदय में ही जागरत होता है
06:25उनकी एक आगरता से निकली उर्जा की तरंगे कैलाश के बरफीले वातावर्ण में एक स्वर्ण में आभामंडल का निर्माण कर
06:33रही थी
06:34पूरे हिमालय का वातावर्ण अब एक सुक्षम स्पंदन से गोंजने लगा था जैसे प्रकृती स्वयन एक बड़े परिवर्तन की प्रतीक्षा
06:43कर रही हो
06:45नारद मुनी ने दूर से इस अलौकिक द्रिश्य को देखा और समझ गए की कार्तिके ने ब्रहमांड के अंतिम रक्षक
06:52के रूप में अपनी भूमिका स्विकार कर ली है
06:56कार्तिके के हृदय में स्थित वेल अस्त्र का तेज अब उनके रोम्रोम से प्रस्फुटित होकर वातावर्ण को दैविय कांती से
07:04भर रहा था
07:06इस गेहन साधना के मध्य कैलाश के शांत वातावर्ण में दिव्य शंकनाद की ध्वनी स्वतही उत्पन्न होने लगी
07:15ब्रहमांड की हर दिशा से देवता अपनी सुक्ष्म द्रिष्टी से इस महा संग्राम की पूर्व संध्या पर कार्तिके के आत्मिक
07:22उतकर्ष को नमन कर रहे थे
07:25मया पार्वती ने भी कैलाश के शिखर से अपने पुत्र की इस अखंड तपस्या को देख कर अपनी वात्सल्य में
07:33द्रिष्टी कार्तिके पर टिका दी थी
07:36वेल अस्त्र की उर्जा अब एक स्वर्ण में भाले का आकार लेकर कार्तिके के हाथों के समीप सघन होने लगी
07:43थी
07:44यह वहक्षन था जब भौतिक सक्ता और आध्यात्मिक संकल्प एक बिंदु पर आकर विलीन हो गए थे
07:52हिमाले की बर्फीई हवाएं अब कार्तिके के चारों और एक सुरक्षा कवच की तरहे चक्राकार गती में घूम रही थी
08:01अगनिपुत्र कार्तिके ने अब अपनी तीसरी आख को भीतर की और मोड कर स्रिष्टी के रहसियों को वेल अस्त्र में
08:08समाहित करना शुरू किया
08:21जो तारकासुर की असुर शक्तियों के विरुद्ध एक मात्र अजे अस्त्र सिद्ध होने वाली थी
08:28कार्तिके का ध्यान अब उस अंतिन सीमा पर पहुँच गया था जहां से लोटने का अर्थ केवल विजय ही था
08:36उनके मौन में भी एक ऐसी गर्जना थी जो पाताल की गहराई तक हलचल मचाने में समर्थ थी
08:43समस्त देवगन इस अलौकिक रुपांतरण को देख स्तब्ध थे क्योंकि उन्होंने आज तक ऐसी दिव्यता का अनुभव नहीं किया था
08:53अब समय था उस प्रहार का जिसके सामने ब्रहमांड का कोई भी छल्टिक नहीं सकता था
09:00आकाश के फलक पर अंधकार की चादर फैलने लगी और तारकासुर की मायावी शक्तियों ने बातावर्ण को एक भीशन क्रंदन
09:08में बदल दिया
09:10देवगन भैभीत होकर एक दूसरे को देख रहे थे, मानो उनका साहस उस गहरे काले धुएं के पीछे कहीं लुप्थ
09:18हो गया हो
09:20तभी सकंद ने अपनी स्वर्णमे भुजाओं को उपर उठाया और उनकी आखों की चमक से एक नई उर्जा का संचार
09:27हुआ
09:29समस्थ सेना के मध्य खड़ा यह बालक आज साक्षात महाकाल के तेज को अपने भीतर धारण किये हुए था
09:38तारकासुर ने अटहास करते हुए अपनी सेना को आज्यादी की वे ब्रहमांड के उस अंतिम छोर को भी राख में
09:45मिला दें
09:47देवराज इंद्र ने कापते हुए हाथों से वजर को पकड़ा जैसे वे इस महाविनाश के तांडब को रोकने में असमर्थ
09:54हुँ
09:55सकंद ने अपने सेनापती के स्वर में गरस्ते हुए कहा कि कायर्ता का समय समाप्थ हो चुका है और प्रतिशोत
10:03का सूर्य उदे हो रहा है
10:07वातावर्ण में उपस्थित हरकन अब युद्ध के उस अंतिम निर्नय की प्रतीक्षा में सहमा हुआ था
10:14जैसे ही असुरी अनुष्ठान की अगनी और भी तीवर हुई पाताल की गहराई से भयावह स्वर उठने लगे
10:22विश्नु ने गरुर पर विराज मान होकर उस माया के चक्र को अपनी माया से काटने की तयारी आरंभ की
10:30तारकासुर के मायावी असुरों ने अपनी विक्रित आकरितियों को बढ़ाते हुए स्वर्ग के द्वार की ओर कूच किया
10:38ब्रहमांड की शांती एक पतले धागे पर टिकी थी जिसे तारकासुर अपनी काली शक्तियों से तोड़ने पर उतारू था
10:47सकंद ने अपनी सेना के भीतर आत्म विश्वास का संचार किया, जिससे उनके अस्त्रों पर एक अलौकिक तेज चमक उठा
10:56देवताओं के हृदय में जो अंधकार का भय था, वह अब सकंद के संकल्प के प्रकाश में छंटने लगा था
11:04असुरों के शंकनाद से ऐसा लगामानो दिशाएं भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए विलाप कर रही हो
11:12सकंद ने अपनी दाहिनी हथेली से हवा में एक सुरक्षा कवच निर्मित किया, जो अभेद्य था
11:20तारकासुर ने अपनी गदा को पाताल की भूमी पर दे मारा, जिससे पूरी स्रिष्टी का आधार कांप उठा
11:27विश्नु ने सुदर्शन चक्र को अभिमंत्रित किया, जो अब एक जलते हुए सूर्य की भांती चमक रहा था
11:35अब युद्ध का वहक्षन निकट था, जहां हार और जीत का निर्नय केवल प्रहार की तीवर्ता पर नहीं, अपितु आत्मा
11:43के बल पर होना था
11:45आस्मान में बादलों के बीच बिजली का कड़कना ऐसा था मानो स्वयन ब्रह्मांड युद्ध की उद्धोशना कर रहा हो
11:54तारकासुर ने रौरव नरक की उन कालमुख खाईयों के बीच खड़े होकर अपनी भुजाएं फैलाई, जहां से कालाधुआ और भयंकर
12:02अगनी की लप्तें उठने लगी
12:05विश्नु का सुदर्शन चक्र अंतरिक्ष की शान्ती को चीरते हुए उस नरक के द्वार पर एक दिव्य प्रहरी की भांती
12:13अडिक खड़ा था
12:15असुर राज के कंट से निकलेवे प्राचीन मंत्र ब्रहमांड के संतुलन को चुनौती देते हुए रौरव के स्तंभों को कपाने
12:22लगे
12:24हवा में तैरते हुए जलते हुए कंट मानो इस बात का संकेत दे रहे थे कि विनाश की एक नई
12:30और भयानक गाथा लिखी जाने वाली है
12:34ब्रहमांड की नीम्व में कमपन महसूस हुआ जिससे रौरव के काले पत्थरों के बीच से एक अलोकिक नीली जोती बाहर
12:42आने लगी
12:44ब्रहमास्त्र की जागरित उर्जा ने आसपास की वायू को भारी कर दिया मानो स्वयंकाल का चक्रस्थिर हो गया हो
12:53तारकासुर ने अपनी आखों को बंद किया और ब्रहमांड के विनाशकारी सूत्रों को अपने भीतर समाहित करने का दुस्सा हस
13:00किया
13:02रौरव की उनकाली चट्टानों पर ब्रहमास्त्र की शक्ती से जादूई चिनह उभरने लगे जो अंधकार को और भी गहरा कर
13:10रहे थे
13:11जैसे जैसे मंत्रों का वेग बढ़ा रौरव की आग का रंग बदल कर घातक बैंगनी हो गया जो ब्रहमास्त्र के
13:19आगमन की पहली आहट थी
13:21विश्णू ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया जिसके तेज ने उस बैंगनी धुंध को एक क्षण के लिए थाम
13:29लिया
13:30तारकासुर ने एक भयानक अट्थास किया जिसकी गूंच से रौरव के लोहे के स्तंभ और भी तेजी से हिलने लगे
13:38यह वहक्षन था जब स्रिष्टी के रचिता के अस्त्र का अहंकार असुर के दुर्भाबना पूर्ण संकल्प से टक्राने को तयार
13:46था
13:48अचानक रौरव की गहराई से एक वजर के समान ध्वनी उत्पन हुई जिसने वहां उपस्थित समस्थ भौतिक स्वरूपों को हिला
13:56कर रख दिया
13:58विष्णू की भुजाओं में दिव्य कमपन हुआ क्योंकि उन्हें ब्रहमास्त्र की उस असीमित विनाशकारी क्षमता का अनुभव हो रहा था
14:07तारकासुर ने अपनी एक भुजा हवा में उठाई जिससे ब्रहमास्त्र की उर्जा एक विशाल तीर के रूप में आकार लेने
14:14लगी
14:16पूरे ब्रहमांड में एक अजीब सी खामोशी छा गई जैसे काल स्वयें इस प्रहार के परिनामों को देखने के लिए
14:23रुप गया हो
14:25धरातल पर ब्रहमास्त्र की शक्ती ने ऐसी रेखाएं खीची, मानो प्रित्वी का सीना चीर कर नरक का द्वार और भी
14:33विस्त्रित हो गया हो
14:35विष्णू ने अपने संकल्प को और द्रेड किया, जानते हुए कि इस प्रहार को रोकना ही धर्म की अंतिम विजय
14:42का मार्ग है
14:45तारकासुर ने अपनी पूरी शक्ती का आहवान किया और उस ब्रहमास्त्र को एक गर्जना के साथ ब्रहमांड की ओर छोड़ने
14:52को उद्यत हुआ
14:55आकाश के उनकाले बादलों में एक दिव्य चमक उभ्री, जो यह बताने के लिए परियाप्त थी कि ब्रहमास्त्र की उर्जा
15:02अब नियंत्रन से बाहर हो चुकी थी
15:06ब्रहमांड के विशाल फलक पर सब्तर्शियों का समूह एक प्रकाश पुन्च की भांती प्रकट हुआ, जिनका मौन भी उस विनाशकारी
15:14अस्त्र की गती को कम करने के लिए परियाप्त था
15:18सब्तर्शियों के मुख से निकला हुआ ठहरों का स्वर उस अराजक्ता के बीच एक ऐसे दिव्य अनुशासन की तरह था,
15:25जिसने स्वयन समय को भी कुछ क्षणों के लिए स्थिर कर दिया
15:30तारकासुर ने अपनी अहंकारी द्रिष्टी सब्तर्शियों पर डाली और उसके अध्रों पर वह कुटिल मुस्कान उभराई जो उसके विनाश के
15:39मार्ग को और भी प्रशस्त कर रही थी
15:42उसके चारों और जलते हुए लौह स्तंभों से निकलती चिंगारिया मानों उस अस्त्र के अभिशप्त होने की घोशना कर रही
15:50थी
15:51ब्रहमास्त्र की दिव्यक उर्जा तारकासुर की हथेलियों के बीच एक धधकते सूर्य की भांती सिमट्ती जा रही थी
15:59जिसे देखकर ब्रहमांड के देवताभी भय से कांप उठे
16:04सब्तर्शी मरीची ने आगे आकर चेतावनी दी की प्रकृती का यह विनाश न केवल देवों को बलकी स्वयन स्रिजनकर्ता की
16:12सत्ता को भी चुनौती देगा
16:15तारकासुर ने एक भयानक अटहास करते हुए अपनी पूरी शक्ती लगा दी जिससे उसकी भुजाओं की मास्पेशिया पत्थरों की भांती
16:23तन गई
16:25वातावर्ण में विद्यमान लौह की गंध और जलते हुए कोईलों की उश्मा इस सत्य को सिद्ध कर रही थी कि
16:32यहां से लोटकर जाना अब असंभव है
16:36देवतागण जो आकाश में स्थित होकर इस द्रिश को देख रहे थे ने अपने आयुधों को नीचे जुका लिया क्योंकि
16:44वे समझ गए थे कि अब केवल इश्वर की इच्छा ही शेश है
16:50सब्तर्शियों में से एक ने पुना गरस्ते हुए कहा कि यह ब्रहमास्त्र नहीं बलकि स्वयं के विनाश का मार्ग है
16:57जिसे तुम चुन रहे हो
17:00तारकासुर ने एक पाशान हरिदय दानव की भानती सब्तर्शियों की बात को ठुकराते हुए उस दिव्य उर्जा को और अधिक
17:08तीवरता से कम्पित किया
17:10अस्त्र के भीतर से निकली तरंगों ने आसपास के लौस तंभों को चूर्ण कर दिया जैसे वे धूल के कण
17:17हो
17:29और वे परब्रम के ध्यान में लीन हो गए यह जानते हुए कि अब धर्म की रक्षा का भार केवल
17:35उसी परम शक्ती पर है
17:38अंधकार और अगनी के मिलन से उत्पन्न वह भीशन गर्जना पूरे ब्रहमांड में गूंच उठी मानो स्रिष्टी स्वयम प्रलय के
17:46द्वार पर खड़ी हो
17:48वह दिव्य उर्जा अब अपना रंग बदल कर गहरे नीले और रक्त लाल रंग के मिश्रण में परिवर्तित होने लगी
17:55थी
17:56तारकासुर के चारों और की भूमे धंसने लगी जैसे उस अस्त्र का भार सहना अब रसातल के लिए भी संभव
18:04न रहा हो
18:06सब्तर्शियों की वानी का अंतिम स्वर्गूंच कर शान्त हुआ और अब चारों और एक भारी सन्नाटा व्याप्थ हो गया
18:14तारकासुर ने अपनी अंतिम गर्जना की और अस्त्र को छोड़ने के लिए अपने हाथ को ब्रहमांड की दिशा में आगे
18:21बढ़ाया
18:23ब्रहमास्त्र के प्रहार से पहले की वहक्षनिक शान्ती पूरे ब्रहमांड की धड़कन को थाम देने के लिए परियाप्थ थी
18:31ब्रहमास्त्र की उर्जातारकासुर की हथेलियों से निकल कर आकाश को चीरती हुई एक प्रल्यंकारी स्वर्ण रेखा के रूप में आगे
18:40बढ़ी
18:41भगवान विश्णु ने अपनी गदाधारन करते हुए देवराज इंद्र की ओर देखा उनके मुख पर उस विनाशी अस्त्र को रोकने
18:49का अडिक संकर्प था
18:52ब्रहमास्त्र की प्रचंड उश्मा ने क्रिमिभोजन के उस दल्दल को सुखा कर राख में बदल दिया जहां से अब केवल
18:59तप्ट स्वर्ण की भाप उठ रही थी
19:02पूरे ब्रहमांड में एक ऐसी गूँच सुनाई दी, मानो स्वयं प्रकृती अपने विनाश के भय से काम उठी हो
19:11तारकासुर ने उनमाद में अपनी भुजाएं फैलाई उसकी विशालकाए देह से निकलने वाली काली उर्जा ब्रहमास्त्र के साथ मिलकर एक
19:19महाप्रलय का स्रिजन कर रही थी
19:22गरुर देव ने अपने पंखों को फैला कर उस अगनेपुंच के मार्ग को अवरुध करने का प्रयास किया
19:29किन्तु अस्त्र का वेग इतना तीवर था कि उनका शरीर भी डगमगा गया
19:35ब्रहमास्त्र की लप्तें इतनी प्रकर थी कि उसने चारों दिशाओं में मौजूद तामरपात्रों को पिघला कर पिघला हुआ स्वर्ण बना
19:43दिया
19:45सन्नाटा इतना गहरा था कि किसी के हृदय की धड़कन भी ढोल की भांती स्पष्ट सुनाई दे रही थी
19:52अस्त्र की गती के साथ ब्रहमांड के नक्षत्र अपनी कक्षा से विचलित होकर इधर उधर भटकने लगे
20:00विश्नु का सुदर्शन चक्र अपनी तीवर्ता से उस अगने पुंच को काटने का असफल किन्तु साहसी प्रयास कर रहा था
20:09तारकासुर का अट्थास अब उस अगनी के शोर में विलीन हो रहा था, जैसे उसकी विजय ही उसका विनाश हो
20:16शुनी की शांती में ब्रहमास्त्र की गर्जना किसी घायल सिह की दहाड के समान गुजगुठी
20:24देवताओं के दल में एक अंजाना भय व्याप्थ हो गया था, क्योंकि उन्होंने आज तक किसी अस्त्र को इतनी विनाशकारी
20:31शक्ती के साथ नहीं देखा था
20:34भगवान शिव के प्रिशूल की नोक पर एक मंद नीली अगनी प्रजवलित हुई, जो उस्स्वन अगनी को चुनोती दे रही
20:42थी
20:44ब्रहमास्त्र के प्रहार से उत्पन घर्शन ने वातावर्ण में मौजूद धूल को सोने के कणों में परिवर्तित कर दिया
20:52ब्रहमांड के रक्षक और विनाशक के बीच का यह संधर्श किसी महागाथा के अंतिम प्रिष्ट की भान्ती प्रतीत हो रहा
20:59था
21:01तारकासुर ने अपनी अंतिम शक्तियों को भी उस अस्त्र में जोक दिया, ताकि वह इस प्रलै का एक मात्र साक्षी
21:08बन सके
21:10नक्षत्रों ने अपना मार्ग त्याग दिया और अब वे सीधे उस अगनिपुंच की ओर खिंचे चले आ रहे थे
21:17शिव का अवतार अवधूत रूप में अब अपनी पूर्ण गंभीरता के साथ उस प्रलै को रोकने हेतु सन्नध खड़ा था
21:26जैसे ही अस्त्र की अगनी चरम सीमा पर पहुँची समय का चक्रक्षन भर के लिए ठहर गया
21:34कार्तिकेय ने अपने नेत्र मूंदे और हृदय की अनंत गहराई से उस दिव्य ओज को जागरित किया जो स्वयं महादेव
21:41की ज्वाला से जन्मा था
21:44भगवान विश्णू ने गरुर पर आरूड होकर उस अद्भुत तेजोमय शक्ती को देखा जो बालक कार्तिकेय के भीतर से ब्रहमांड
21:52की भांती विस्तार ले रही थी
21:55कार्तिकेय के शरीर से फूटती हुई स्वर्ण किरने उस महाप्रलय की अगनी को स्पर्श करने लगी जिससे वह विनाशकारी ताप
22:03धीरे-धीरे शान्त होने लगा
22:06रनभूमी के उपर एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्मान हुआ जो किसी धाल की भांती न केवल अस्त्र की तीवरता
22:14को सोख रहा था
22:15अपितु उसे दिव्य प्रकाश में परिवर्तित कर रहा था
22:19इस प्रकाश के स्पर्ष से तारकासुर की मायावी अगनी इस प्रकार लुप्ध हो रही थी जैसे सूर्य के उदे होते
22:27ही अंधकार का अस्तित्व मिट जाता है
22:31देवता गन जो अब तक अपने प्राणों की रक्षा हेतु विवश्थे इस दिव्य आलोग को देख पुनह साहस से भर
22:38उठे
22:40कार्तिके के हाथों से निकलते हुए श्वेतस्वन वल्यों ने उस शस्त्र की गती को अवरुद्ध कर उसे एक स्थिर बिंदु
22:47पर ला खड़ा किया
22:50ब्रहमांड के समस्थ नक्षत्र इस प्रकाश के प्रभाव से थम गए और ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्रिष्टी का चक्र उस
22:57बालक की आज्या की प्रतीक्षा कर रहा हो
23:01महादेव के उस अवधूत रूप ने भी एक क्षण के लिए अपनी मुस्कान को और गहरा किया
23:07मानो वह अपने पुत्र के इस अद्वितिय पराक्रम पर गर्व कर रहे हुँ
23:12तभी उस धाल से एक तीवर दिव्य गर्जना हुई जिसने तारकासुर की आसुरी सेनाओं के मनों में भय का बीज
23:20बो दिया
23:21प्रकाश की वह लहरें अगनी के कणों को एक एक करके भस्म करने लगी जिससे संपूर्ण वातावर्ण एक दिव्य तेज
23:29से भर उठा
23:31यह द्रिश्य देखकर ऐसा आभास होता था मानों साक्षात स्रिष्टी का प्रकाश उस अधर्म के काले घेरे को चीर कर
23:39आगे बढ़ रहा हो
23:41तार का सुर्ष तब्ध था क्योंकि उसकी वह विद्या जिसे वह अजय समझता था आज एक बालक के संकल्प के
23:49सम्मुख व्यर्थ सिद्ध हो रही थी
23:52देवर्षी नारद ने वीना का तार छेडा और उस धुन से कार्तिके के सुरक्षा घेरे की शक्ती और अधिक प्रबल
23:59हो गई
24:00उस धाल के भीतर का स्थान अब इतना पवित्र और शान्त हो गया था कि वहां का वातावर्ण स्वयन तपस्वियों
24:08के आश्रम जैसा प्रतीत होने लगा था
24:11यह वह अद्भुत क्षन था जब युद्ध भूमी के बीचों बीच सात्विक उर्जा का एक नया केंद्र स्थापित हो गया
24:18था जिसे भेदना अब असंभव था
24:22कार्तिके अब स्थिर थे उनका ध्यान केवल उस अगनिपुँच को पूर्णता नश्ट करने और ब्रह्मान को सुरक्षित रखने पर केंद्रित
24:30था
24:31शिव के उस अवधूत अवतार ने अपने त्रिशूल को भूमी पर अनकित किया और उस त्रिशूल से निकली कमपन से
24:39कार्तिके का प्रकाश और भी अधिक प्रखर हो उठा
24:43पूरा आकाश अब उस दिव्य प्रकाश की आभासे जग्मगा उठा था, जिसे देखकर अंधकार के स्वामी भी अपने अस्तित्व को
24:52बचाने हेतु विचलित होने लगे
24:55अंता वह विनाशकारी अगनी कार्तिके की ढाल के भीतर विलीन हो गई और वहां केवल एक शांत दिव्य प्रकाश ही
25:02शेश रह गया
25:04ब्रहमास्त्र के प्रहार से उत्पन्नवह भीशन स्वन प्रभा संपून ब्रहमांड की दिशाओं को चीर्ती हुई एक अकल्पनिय उर्जा तरंग के
25:13रूप में विस्तारित हुई
25:15भगवान विश्नु ने गरूर पर आरूड होकर इस महाविस्पोर्ट के केंद्र को अपनी योगद्रिष्टी से देखा जहां समय का चक्र
25:23भी कुछ क्षणों के लिए ठहर गया था
25:27कार्तिके की उस अभेद्य धाल के भीतर से निकली तरंगों ने ब्रहमास्त्र के प्रचंड ताप को अपने भीतर समाहित करना
25:34आरंभ कर दिया
25:36वह क्षण ऐसा था मानो प्रलय की अगनी और स्रिष्टी के निर्मान का प्रकाश एक ही बिंदु पर आकर एक
25:44दूसरे में विलीन हो रहे हो
25:46अंधकार के स्वामी तारकासूर की दृष्टी उस अध्भूत दृष्पर टिकी थी और उसके हृदय में पहली बार विजय के प्रती
25:54संशय का बीज अंकुरत हुआ
25:57ब्रह्मा की वह अमोग शक्ती अब कार्तिके के अनुशासन के सामने अपना अस्तित्व खोती हुई प्रतीत हो रही थी
26:06आकाश के कोने कोने में व्याप्त वह दिव्यकंपन देवों और दानवों दोनों के कानों में एक अनसुनी गूंच बनकर तैरने
26:13लगी
26:15प्रकृती के नियम भी इस महासंधर्ष के प्रभाव से विचलित होकर अपने केंद्र से बाहर आ गए थे
26:22युद्ध भूमी के पत्थरों ने उस दिव्य उर्जा के स्पर्ष से पिघल कर स्वर्निम द्रवों का रूप धारन करना प्रारंभ
26:29कर दिया
26:31भगवान विश्णों के मुख पर मंद मुस्कान आई क्योंकी वे समझ गए थे कि कार्तिके ने अपने शस्त्र को पूर्णत
26:38वश में कर लिया है
26:41तभी ब्रहमास्त्र का अंतिम प्रहार एक विशाल अगनिपिंड बनकर कार्तिके की ओर बढ़ा जो किसी उल्कापिंड के समान प्रल्यकारी था
26:51उस अगनिपिंड के टकराते ही संपूर्ण रौरव लोक एक क्षन के लिए सफेद प्रकाश में डोग गया
26:57मानो सूर्य का उदे पाताल में हो गया हो
27:01कार्तिके ने अपने दोनों हाथों से उस असीमित उर्जा को नियंतरित करते हुए अपने त्रिशूल से उसे एक नया आयाम
27:09प्रदान किया
27:11देवराज इंद्र और अन्य देवतागन अपने रथों से उस द्रिश को देख रहे थे, उनकी आखें इस अलोकिक द्रिश को
27:19देखने में अक्षम हो रही थी
27:22वह प्रल्यकारी अगनी जो दानव की रक्षा के लिए आई थी, अब उसी के सामराज्य को भस्म करने वाली ज्वाला
27:29में बदल चुकी थी
27:31प्रकाश के उस विस्तार के भीतर केवल शिव के अवधूत रूप की स्थिर छवी ही सबसे अधिक प्रभावशाली दिख रही
27:39थी
27:51तारकाशुर का वह दंभ जो ब्रहमास्त्र के बल पर था, अब राख के उन धेरों में खोने लगा था जिन्हें
27:58वह अपनी शक्ती समझता था
28:01कार्तिकेय ने एक गहरी श्वास ली और उनके चारों और का कवच अब शांत नीले रंग के आभा में परिवर्तित
28:08हो गया
28:10ब्रहमांड के इस महायुद्ध का एक अध्याय समाप्थ हुआ, परन्तु अंतिम प्रहार का अर्थ अभी भी भविष्य के गर्भ में
28:17छिपा था
28:19रंभूमी की राख के बीच तारकासुर का विशालकाय शरीर अब काम प्रहा था, जैसे कोई प्राचीन व्रिक्ष जड़ों से उखडने
28:27की प्रतीक्षा में हो
28:30कार्थिकेय ने अपने दैविये तेज को समेटते हुए उस योध्धा की ओर देखा, जिसकी आखों में अब विजय का नहीं,
28:38विनाश का आखिरी उन्माद शेश था
28:41तारकासुर ने अपनी गदा को जमीन पर पटकते हुए दहाड लगाई, जिससे उस घोर नरक की भूमी में दरारें पढ़ने
28:49लगी
28:50उस भयावह गडगड़ाहट के बीच, आकाश से गिरते हुए राख के कन एक खूनी लाल आभामंडल में परिवर्तित होने लगे
28:59ब्रहमांड के रक्षक भगवान विश्णू ने सुदर्शन चक्र को सक्रिय किया, जिसका तेज उस घने अंधकार को चीरने लगा
29:08भगवान विश्णू की शान्त मुद्रा में एक चेतावनी थी, जो पूरे ब्रहमांड को उस अंतिम प्रहार की गंभीरता का आभास
29:16करा रही थी
29:18गरुर ने अपने विशाल पंखों को फड़फडाया, जिससे उस नरक लोग की जहरीली गैसे क्षणभर के लिए बिखर गई
29:27अंधकार की उस घाटी में केवल ब्रहमास्त्र की प्रतिध्वनी ही एक मात्र सत्य के रूप में शेश रह गई थी
29:35तारकासुर का कवच तूटने लगा था, जिससे उसका वह राक्षसी स्वरूप और अधिक उग्र और धेनित दिखाई देने लगा
29:44कार्तिके ने अपनी द्रिष्टी को एकागर किया, जैसे वे समय की गती को थाम कर अंतिम प्रहार का लक्षे चुन
29:51रहे हो
29:53उसक्षन प्रित्वी से लेकर पाताल तक ब्रहमांड के सभी तत्व जैसे एक अज्यात भैसे स्थिर हो गए
30:01ब्रहमांड की शांती के लिए उस अधर्मी के अंत का समय अब निकट आ चुका था, जिसका साक्ष काल स्वय
30:08था
30:09असुर राज के मुख से निकली अगनी उस राख की चादर को जुलसा रही थी, जिसे उसने अपनी विजय समझा
30:17था
30:18विश्नु ने अपने हाथों में तेज को केंद्रित करते हुए कार्थिके को उस अंतिम प्रहार के लिए संकेत दिया
30:26कार्तिके के शस्त्र से निकली नीली विद्यूप की किरने उस पाताल के घने अंधकार को चीर कर आगे बढ़ने लगी
30:35पूरे ब्रहमांड में एक ऐसी गूंच सुनाई दी जैसे स्वयन स्रिष्टी अपने आधार को और सुद्रेड कर रही हो
30:43तार कासुर अपनी अंतिन सांसे गिनते हुए भी उस दिव्य तेज की ओर लल्चाई नजरों से देख रहा था
30:51कार्तिके का चहरा पूरी तरह शांत था क्योंकि वे जानते थे कि यही वह धर्म का मार्ग है जो अधर्म
30:59का विनाश करेगा
31:01अंतह उस ब्रहमास्त्र की उर्जा ने तार कासुर के चारों और एक ऐसा घेरा बना लिया जिससे बचना असंभव था
31:10ब्रहमांड के उस महायुध का अंतिन अंक अब खुल चुका था जहां सत्य और असत्य का निर्णय निश्चित था