ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस 30वें एपिसोड में, हम अवधूत शिव के उस महा-रहस्य का खुलासा कर रहे हैं जो काल के चक्र को नियंत्रित करता है। प्रलय के बाद जब नई चेतना का संचार होता है, तो नारद मुनि एक ऐसे सत्य का सामना करते हैं जो सृष्टि की नींव को हिला देगा। देखिए कैसे भगवान शिव का अवधूत स्वरूप काल के प्रवाह को नई दिशा देता है और ब्रह्मांड के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है। 🕉️✨ #BrahmavaivartaPurana #NaradMuni #LordShiva #AvadhutaAvatar #HinduMythology #SpiritualJourney #Puranas #VedicWisdom #SanatanDharma #CosmicCycle
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00:00प्रले की राख और शून्यता के असीन विस्तार में देवर्शी नारद उस धूसर धरातल पर अवधूत शिव की मौन उपस्थिती
00:07को स्तब्ध होकर निहार रहे हैं।
00:11नारद मुनी ने अपनी वीना को थाम कर उस महाशून्य की गहराई को महसूस किया, जहां समय का पहिया एक
00:18क्षण के लिए ठहर गया है।
00:22अवधूत शिव के भस्मरंजित शरीर से उठने वाली सूक्ष्म उर्जा, इस मृत प्राय स्रिष्टी में एक नई प्रानवायू का संचार
00:30करने के लिए उच्सुक है।
00:33चारो और व्याप्त सन्नाटा ऐसे गूँज रहा है, जैसे ब्रहमांड अपने अगले महाकल्प के आरंभ का गुप्त मंत्र पढ़ रहा
00:41हो।
00:41नारद मुनी के हरिदय में इस रहस्य की जिग्यासा जाग उठी की विनाश के इस तांडव के बाद शिव किस
00:49नई चेतना का बीज बोने वाले हैं।
00:53भगवान विश्नु गरूर पर आरूड होकर इस शांती के केंदर की ओर बढ़ रहे हैं, ताकि वे काल के इस
01:00परिवर्तन को अपनी आँखों से देख सकें।
01:03गरूर के पंखों की फड़फडाहट ने उस जमे हुए समय में हलकी कमपन पैदा की, जिससे वातावर्ण में नई उर्जा
01:11का प्रवाह होने लगा।
01:14हवाओं में एक दिव्य संगीत घुल गया, जो प्रलै की राख के नीचे छिपे जीवन के अंकुरों को जगाने का
01:20संकेत दे रहा है।
01:23नारद मुनी ने नत्मस्तक होकर भगवान विश्नु का अभिवादन किया, जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान से शूनी की अराजकता को नियंतरित
01:32कर रखा है।
01:34विश्नु ने अपनी कमल जैसी आखों से अवधूत शिव की ओर देखा, जिनके शांत मुद्रा में ही स्रिष्टी का समस्त
01:42भविश्य सुरक्षित है।
01:45अवधूत के ललाट पर चमकती तीसरी आख अब मंद पड़ रही है, जैसे सूर्य के अस्त होने के बाद चंद्रमा
01:52का उदे हो रहा हो।
01:54समय का पहिया, जो इतने काल से स्थिर था, अब धीमी गती से घूमने लगा है, और साथ ही आकाश
02:01का रंग भी बदलने लगा है।
02:15नारद मुनी के मुख से अनायास ही स्थुती के शब्द फूट पड़े, क्योंकि उन्होंने शिव की उस करुणा को देख
02:22लिया था, जो सहार में भी छपी थी।
02:25अवधूत शिव ने धीरे से अपनी पलके खोली, और उनकी द्रिष्टी पड़ते ही राख के टीले से जीवन की पहली
02:32कोपले खिल उठीन।
02:35यह वहक्षन था जहां विनाश की अंतिम आह और स्रिजन की पहली सास का मिलन हो रहा था, और ब्रहमांड
02:42का भाग्य बदल गया।
02:44विश्णू ने अपना चक्रधी में से घुमाया, ताकि शिव की इस नई चेतना को पूरे ब्रहमांड में संतुलित किया जा
02:51सके।
02:53नारद मुनी ने उस द्रिश्य को अपनी स्मृती में अनकित कर लिया, क्योंकि यह स्रिष्टी की सबसे गोपनिय घटना का
03:00गवाह बनने का सौभाग्य था।
03:03ब्रहमांड की नसें फिर से सक्रिय हो उठीन और देवर्शी ने महसूस किया कि अवधूत का यह रहस्य वास्तव में
03:11प्रेम और पुनर निर्मान का संदेश है।
03:15अंतर शिव ने अपने मौन को तोड़ कर एक धीमी ध्वनी निकाली, जिससे काल का चक्र पूर्णत है अपनी नई
03:22दिशा में मुड़ गया।
03:24भगवान शिव ने अपनी जटाओं के भीतर से काल के उन अद्रिश्य धागों को बाहर निकाला, जो स्रिष्टी के लएके
03:32साथ बिखर गए थे।
03:34देवर्शी नारत के नेत्र विस्मय से भर गए जब उन्होंने देखा कि शिव के हाथों में ब्रहमांड की समयरेखा एक
03:42रेश्मी डोरी की भांती चमक रही थी।
03:45शिव ने अपनी उंगलियों के सुक्ष्म कमपन से उन धागों को पुना व्यवस्थित करना आरंभ किया, जिससे शूने में एक
03:53नई लय उत्पन हुई।
03:55ब्रहमांड के शूने में एक दिव्यध्वनी गूंजी, मानो समय का चक्र फिर से अपनी धुरी पर स्थित होने के लिए
04:02तत्पर हो गया हो।
04:04शिव के जटाओं से निकली उर्जा ने चारों और फैली अराजकता को धीरे धीरे एक व्यवस्थित संरचना में ढालना शुरू
04:12कर दिया।
04:14नारद मुनी ने महसूस किया कि काल के ये धागे मात्र समय नहीं, बलकि समस्त जीवों के कर्मों और भाग्य
04:21का अटूट आधार हैं।
04:24शिव की भुजाओं की गती में एक ऐसी शान्ती थी, जो प्रलय के महा विनाश को भी मूख सांत्वना दे
04:31रही थी।
04:33अचानक एक धागे में आई रुकावट ने शिव के ध्यान को केंद्रित किया, जैसे कोई प्राचीन त्रूटी अभी भी काल
04:40के प्रवाह में शेश थी।
04:43विशाल हिमालय की चोटियों पर भी प्रकृती ने उस समय की नई गूंश को आत्मसाथ करना आरंभ कर दिया था।
04:51शिव ने अपनी तीसरी आख के सुक्ष्म तेज से उस त्रूटी को भस्म किया और समय के चक्र को पुनह
04:58गती प्रदान की।
05:00धागे अब बिना किसी अवरोध के आपस में जुड़ रहे थे, जिससे काल की एक नई और शुद्ध धारा प्रवाहित
05:07हो रही थी।
05:09उस पुनरजीवित समयरेखा ने समस्त लोकों में एक नई चेतना का संचार कर दिया, जिससे मृतप्राय आकाश फिर से सजीव
05:17हो उठा।
05:19नारद ने देखा कि शिव के प्रत्येक कार्य में सृष्टी को पुनरगठित करने का एक अथक प्रेम छिपा हुआ था।
05:27समय का चक्र अब अपनी नई दिशा में घूम रहा था, जो प्रलय के बाद की पहली आशा की किरण
05:34का प्रतीक था।
05:36शिव की जटाओं से निकलती आभा अब पूरे अंतरिक्ष में फैल चुकी थी, जो इस बात का संकेत थी कि
05:43प्रलय का युग समाप्थ हो गया है।
05:46देवर्शी नारद के मुख से स्वतह ही शिव की स्तुती के शब्द निकलने लगे, क्योंकि वे इस अग्भुत परिवर्तन के
05:53प्रथम साक्षी थे।
05:55समय की उन कडियों को जोडते हुए शिव ने एक गहरी सांस ली, जिससे पूरा ब्रहमांड उस नई उर्जा से
06:03थर्थरा उठा।
06:04अतीत की विस्मृत स्मृतिया अब काल के धागों के माध्यम से भविश्य के गर्भ में सुरक्षित हो रही थी।
06:12स्रिष्टी का पहिया अब पूरी तरह से अपनी नई और शुद्ध धूरी पर स्थापित हो चुका था।
06:20शिव ने अपना ध्यान संकुचित किया और काल के धागों को अपनी जटाओं में पुनह समाहित कर लिया एक नया
06:27अध्याय प्रारंभ करने के लिए।
06:29नारद मुनी ने कैलाश के हिमशिकरों के मौन में स्वयय के भीतर जाका, जहां शुने की गूंच अब एक नई
06:37चेतना के बीज बो रही थी।
06:40उनके समक्ष ब्रहमांड का वह सुक्ष्म सत्य प्रकट हुआ जिसे वे अब तक केवल शब्दों की माला समझते आये थे।
06:48उन्होंने अपनी वीना के तारों पर उंदलिया रखते हुए उस अतीत की ध्वनी को महसूस किया, जो अहंकार के कोलाहल
06:56में कहीं खो गई थी।
06:58आकाश के विस्तार में नारद ने देखा कि काल के धागे कैसे उनकी ही भूलों से उलजे हुए थे और
07:05फिर शिव की क्रिपा से सुलज गए।
07:08कैलाश के शिखरों पर जमी बर्फ ने जैसे नारद के अंतर्मन की शुद्धी का प्रमान दिया, जहां हरकन अब सत्य
07:16की खोज में था।
07:17नारद ने शिव के उस अवधूत स्वरूप का स्मरण किया, जिसने प्रलय की अगनी में भी करुणा का एक कोना
07:25सुरक्षित रखा था।
07:26वीना की एक ताम छिड़ी, जो संसार के बंधनों को तोड़ कर सीधे ब्रहमा के महासागर तक पहुँचने का प्रयास
07:35कर रही थी।
07:36धुंध के रूप में फैली उनकी अग्यानता अब छंटने लगी थी, जैसे परवत शिकरों से सुभा की पहली किरने कोहरे
07:44को हटाती हैं।
07:47नारद ने प्रार्थनाकी की वे आने वाली स्रिष्टी के लिए केवल एक मूख साक्षी नहीं, बलकि ज्यान का एक सच्चा
07:54बाहत बन सकें।
07:57शिव के मौन में नहित वेदों की रिचाएं अब नारद के कानों में एक दिव्य संगीत की भांती सुनाई दे
08:03रही थी।
08:05उन्होंने अनुभव किया कि उनकी वीना का प्रत्येक तार अब स्रिष्टी के स्पंदन के साथ एक लय में बंध चुका
08:12है।
08:14काल का चक्र अब उनके लिए भय का प्रतीक नहीं, बलकि परिवर्तन की एक सुन्दर यात्रा का मार्ग बन गया
08:21था।
08:22नारद के आत्ममंथन ने उन्हें यह सिखाया कि हर प्रलय के पीछे एक नई आशा का अंकुर छिपा होता है।
08:31वे अब उस दिव्य प्रकाश की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो स्रिष्टी के नवनिर्मान का संकेट देने वाला था।
08:39उनके हृदय में अब न कोई संशय था और नहीं पुरानी स्मृतियों का बोज, क्योंकि उन्होंने स्वयं को शिव के
08:47चर्णों में समर्पित कर दिया था।
08:50कैलाश के शांत वातावर्ण में एक नई उर्जा का संचार होने लगा, जैसे कोई सोई हुई प्रकृती जागने की तयारी
08:57कर रही हो।
08:59नारद ने अपनी आखें खोली और सामने उस अनंत आकाश को देखा, जो अब और भी गहरा और अर्थपूर्ण लग
09:07रहा था।
09:09उनकी वीना से निकली अन्तिम स्वरलहरी ने पूरे ब्रहमांड में शांती का आहवान किया।
09:15अब समय आ गया था कि नारद उस नई चेतना को लेकर स्रिष्टी के उन कोनों में जाए, जहां जीवन
09:22की प्रतीक्षा थी।
09:24ब्रहम वैवर्थ के इस महार ध्याय में नारद का आत्म मंथन पूर्ण हुआ और स्रिष्टी का नया पहिया गतिमान होने
09:32के लिए तयार था।
09:34शूनी की शांत गहरायों में अचानक अवधूत शिव के भीतर से एक दिव्य स्पंदन उठा, जिसने ब्रहमांड के स्थिर कणों
09:42को मतना शुरू कर दिया।
09:45नारद मुनी ने देखा कि अवधूत के मुख से निकली वह हुंकार एक दिव्य ध्वनी तरंग बनकर पूरी स्रिष्टी के
09:52रिक्त स्थानों को भरने लगी है।
09:55शिव की उस हुंकार की तीवरता से माउंट कैलाश की बर्फ से धकी चोटियां जैसे सजीव हो उठीन और उनमें
10:02से एक अजीब सी कमपन उत्पन हुई।
10:06यह हुंकार कोई सामान्य ध्वनी नहीं, बलकी प्रलय के बाद की पहली चेतना थी जिसने मृत पदार्थों को स्पंदित करना
10:14शुरू कर दिया था।
10:16शिव का वह स्वरूप जो अब तक अवधूत था, अब भ्रहमान्ड का नाद बनने की प्रक्रिया में पूरी तरह से
10:23लीन हो चुका था।
10:25नारद ने अपनी वीना को थामे हुए देखा कि कैसे प्रक्रिती के हर जड़ तत्व में शिव की हुंकार से
10:31प्राण का संचार हो रहा है।
10:34उंकार की प्रतिध्वनी ने आकाश के उन कोनों को भी स्पर्ष किया, जहां अब तक केवल सन्नाटा और अंधकार का
10:42सामराज्य था।
10:44हर अनों में एक नई उर्जा का जन्म हुआ, जो स्रिष्टी के पुराने धाचे को तोड़ कर नए सौंदर्य की
10:51नीम रख रही थी।
10:53शिव ने अपनी आखे धीरे से खोली और उनकी द्रिष्टी पड़ते ही ब्रहमांड के कन एक निश्चित दिशा में गती
11:00करने लगे।
11:02नारद मुनी उसक्षन को देख दंग थे, जहां शिव के एक संकेट मात्र से प्रलै का अवशेश पुनर जीवन के
11:09उच्सव में बदर रहा था।
11:12ब्रहमांड के सभी दिशासूचक यंत्र जो अब तक मृत्त थे, शिव की हुंकार के साथ पुनह अपनी गती और दिशा
11:20प्राप्त कर चुके थे।
11:22शिव का अवधूत स्वरूप अब स्रिष्टी के संचालक की भांती उन तरंगों को निर्देशित कर रहा था जो भविश्य की
11:29रूपरेखा तयार कर रही थी।
11:32नारद ने अपनी वीना के तारों को छेडा, जिससे उस हुंकार की ध्वनी एक मधुर राग में परिवर्तित होकर पूरे
11:40ब्रहमाड में ठैल गई।
11:42यह स्वरलहरी और शिव की हुंकार मिलकर एक ऐसी शक्ती बन गई, जिसने काल के ठहरे हुए पहिये को फिर
11:49से घुमा दिया।
11:51काल अब केवल एक अवधारना नहीं थी, बलकि शिव के अनुशासन में बंधी हुई एक जीवन्त धारा बन चुकी थी।
12:00हर दिशा में जहां तक नारद की दृष्टी जा सकती थी, उन्हें एक नई स्रिष्टी के बीज अंकुरित होते दिखाई
12:07दे रहे थे।
12:09शिव का यह अवधूत स्वरूप अब शांत था, क्योंकि उन्होंने प्रलै के पश्चात की सबसे महत्वपूर्ण चुनोती को पूर्ण कर
12:17लिया था।
12:19नारद ने जुक कर शिव को प्रणाम किया, वे जानते थे कि अब स्रिष्टी की बागदोर फिर से देवताओं के
12:26हाथों में सौंपने का समया गया है।
12:29ब्रहमांड के कण अब स्वतंत्र थे, वे शिव की प्रेणा से अपने अपने नए रूपों को धारन करने के लिए
12:36तयार थे।
12:37शिव का यह महाध्याय समाप्थ हुआ और नारद एक नई चेतना का संदेशवाहक बनकर अनन्त की और प्रस्थान करने के
12:46लिए तत्पर हो गए।
12:48अनन्त शूने के गर्ब से सबसे पहले प्रित्वी का कन प्रकट हुआ, जो अपनी गुरुत्वाकर्शन शक्ती से बिखरे हुए परमानुओं
12:57को एक केंद्र में समेटने लगा।
13:00भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से जाग कर उस नवस्रिजित धरातल को देखते हैं, जहां उनके नाभिक्मल से ब्रहमा की
13:07उत्पत्ती का मार्ग प्रशस्थ हो रहा है।
13:11ब्रहमान्ड के सुनेपन में जल की प्रथम बून का संचार हुआ, जो अमरित की भानती बहकर प्रित्वी के कठोर धरातल
13:19को सीचने लगी।
13:21आकाश के विस्तार में चमकते हुए तारों की एक नई श्रिंखला ने जन्म लिया, जो समय के चक्र को नियंत्रित
13:28करने वाली पहली सीधी बन गई।
13:31अगनी के तत्व ने ब्रहमांड को उश्मा और प्रकाश प्रदान किया, जिससे शून्यता की ठंडी चादर पूरी तरह जल कर
13:39राख हो गई।
13:41नारद मुनी, जो इस महांद्रिश के साक्षी हैं, आकाशवानी सुनकर अपने वीना के तारों को एक नई लए में जंकृत
13:49करने लगे।
13:51वायू का वेग अब ब्रहमांड में स्पंदित होने लगा, जिसने जल और प्रित्वी के तत्वों को एक सुविवस्थित धाचे में
13:58ढालना शुरू कर दिया।
14:00यह पाँच तत्वों का अध्भुत मिलन एक ऐसे महासंगम की तरह था, जहां सत्य की प्रथम किरन पूरे ब्रहमांड को
14:08आलोकित कर रही थी।
14:11प्रित्वी के ठोस रूप ने अब परवत और घाटियों का आकार लेना शुरू किया, जैसे कोई मूर्तिकार मिट्टी को प्राणवान
14:18बना रहा हो।
14:20विष्णु का एक अंश उस जल के भीतर समा गया, जिसे बाद में समस्त जीवजन्तूओं के लिए आधार स्वरूप माना
14:28गया।
14:30अग्नी ने सूर्य का रूप धारण कर आकाश के मध्य अपना स्थान बनाया, ताकि अंधकार फिर कभी स्रिष्टी पर हावी
14:37न हो सके।
14:50उनका यह पांच वाचरण एक नए सत्य का उद्गोश कर रहा था, जहां विनाश केवल स्रिजन का ही एक सोपान
14:57था।
14:59नारद ने अपनी वीना के माध्यम से उस ध्वनी को ब्रहमांड में प्रसारित किया, जो आने वाली नई चेतना का
15:06आहवान थी।
15:07जल की प्रतेक लेहर अब जीवन के स्पंदन के साथ तालमेल बिठा कर संगीत उत्पन कर रही थी।
15:16स्रिष्टी का यह नवीन स्वरूप इतना दिव्य था कि स्वय देवराज इंद्र भी स्वर्ग के द्वारों से इसे नहारने के
15:23लिए व्याकुल हो गए।
15:25पंच्तत्व अब केवल भौतिक पदार्थ नहीं, बलकि शिव के उस दिव्य संकल्प के जीवन्त प्रमान बन चुके थे।
15:33ब्रहमांड के कोने-कोने में चेतना का संचार हो रहा था, जिससे जड़ वस्तुएं भी शिव की भक्ती में लीम
15:40प्रतीत होने लगी।
15:42नारद का प्रस्थान अब निश्चित था क्योंकि स्रिष्टी की धुरी पुनह अपने केंदर पर स्थिर हो चुकी थी।
15:50इस महा स्रिष्टी के साथ ही अवधूत शिव का वह रहस्य पूर्ण हुआ, जिसने काल की दिशा को एक नई
15:57दिशा प्रदान कर दी थी।
15:59ब्रहमांड के सुने आकाश में एक सुक्षम स्पंदन उठा, जैसे किसी सोई हुई माया का पहला पच्चाप गुंज रहा हो।
16:08अवधूत शिव ने अपनी जटाओं को खोलते हुए नारत की ओर देखा, जहां उनकी शांत आखों में माया के आगमन
16:16की पूर्व सूचना स्पष्ट थी।
16:18शिव के हाथ से एक सुनहरी ज्योती निकली जिसने रिक्त स्थान को छुआ और वहां धीरे-धीरे एक मायावी जाल
16:27बुनने लगी।
16:28स्रिष्टी की उस निर्मल शांती के ऊपर माया का एक इंद्रधनुशी आवर्ण धीरे-धीरे पसरने लगा, जो सत्य को धकने
16:36का प्रयास कर रहा था।
16:39नारद ने अनुभव किया कि जिस चुने में वह खड़े थे, वहां अब इच्छाओं और वासनाओं की एक सुक्ष्म गूंच
16:46सुनाई देने लगी है।
16:49शिव ने गंभीर स्वर में कहा कि यही वह माया है, जो जीव को उसके असली स्वरूप से दूर एक
16:56कृत्रिन संसार की ओर खींच ले जाती है।
17:00अद्रिश्य धागों की तरह माया ने ब्रहमांड के कणों को आपस में जोड कर एक जटिल मोह का तानाबाना बुन्ना
17:07आरंभ कर दिया।
17:09आकाश का रंग जो पहले स्वच नील था, अब माया के प्रवेश से हलके बैंगनी और गुलाबी आभा में बदलने
17:16लगा।
17:17इस नए ब्रहमांड के कणों में अब द्वैत का बीजारोपन हो चुका था, जहां सुख और दुख की परिभाशाएं स्वयं
17:25को जन्न देने लगी थी।
17:27नारद ने शिव की ओर देखते हुए प्रश्न किया कि क्या यह माया ही उस परम सक्त्य को विस्मृत करने
17:34का कारण बनेगी।
17:36शिव ने अपनी त्रिशूल की नोक से उस मायावी आवर्ण को स्पर्श किया, जिससे पूरे आकाश में एक मधुर जंकार
17:44गुम्ड उठी।
17:57विस्तार के साथ साथ माया का प्रभाव भी गहरा होता गया, जिससे जीव में अहका भाव जागरित होने लगा। शिव
18:06का अवधूत स्वरूप अब स्थिर था, वे जानते थे कि स्रिष्टी के इस पुनरजन में माया का साथ अनिवार्य है।
18:15माया ने अपनी मोहिनी शक्तियों से आसपास की चट्टानों को भी सजीव और मोहक रूप देने का प्रयास किया।
18:23वह माया अब एक अद्रिष्य द्वार बन चुकी थी, जिससे होकर प्रत्येक चेटना इस नए ब्रहमांड के खेल में प्रवेश
18:31करेगी।
18:32नारत को आभास हुआ कि शिव द्वारा रचित यह स्रिष्टी अब एक रंगमंच बन चुकी है, जहां माया का परदा
18:39कभी भी गिर सकता है।
18:42शिव ने संकेत किया कि काल का चक्र अब पूरी गती से घूमने के लिए तयार है, क्योंकि माया ने
18:49अपनी नीव रख दी है।
18:52माया के उस सुक्षम प्रवेश से स्रिष्टी में हलचल मच गई और जड़ पदार्थ भी अब स्पंदित होकर जीव बनने
18:59की ओर अग्रसर हुए।
19:01माया के इस महाजाल के बीच शिव एक साक्षी बनकर खड़े थे, यह जानते हुए कि अंत्त केवल वेही इस
19:09माया के स्वामी हैं।
19:12ब्रहमांड के अनंत विस्तार में शूने की उस तब्धता को चीरते हुए एक स्वर्णिन प्रकाश पुंच प्रकट हुआ, जो समय
19:20के देवता कालदेव के आगमन का सूचक था।
19:24कालदेव जो स्वय महादेव के अंश से उत्पन हुए हैं, धीरे-धीरे भौतिक स्वरूप धारन करने लगे और उनकी उपस्थिती
19:33से चारों दिशाओं में स्पंदन होने लगा।
19:36कालदेव ने अपनी अद्रिश घडियों की सुया थाम ली, जिससे स्रिष्टी की गतीक्षन भर के लिए ठिठक गई और हरकन
19:44शिव की ओर देखने लगा।
19:47वातावर्ण में एक दिव्य शांती व्याप्थ हो गई, जैसे समय ने स्वयन शिव के चर्णों में बैठकर प्रार्थना की हो।
19:55कालदेव ने जुपकर अवधूत शिव को प्रणाम किया, जिनका त्रिशूल अब शांत था और जिनकी आखें स्रिष्टी के पुनरजन्म के
20:03स्वपन में डूबी थी।
20:06महादेव ने अपनी तीसरी आख को हलका सासिकोड़ा, जिससे कालदेव के मस्तक पर एक नया आभा मंडल चमकने लगा।
20:15शिव के संकेत पर कालदेव ने ब्रहमांड के चक्र को पुनह गती दी, जिससे शूनि में छिपे हुए माया के
20:22बीज अंकुरित होने लगे।
20:24समय का वह चक्र अब केवल एक गती नहीं, बलकि एक नए युग का महानुबंध बन गया था जिससे स्वयन
20:32शिव ने प्रमानित किया था।
20:34स्रिष्टी की नसंस में एक नया स्पंदन डौड गया, जो जड़ पदार्थों को चेतना के उच्चतर सोपान की ओर धकेल
20:42रहा था।
20:44शिव के साननिध्य में नारद मुनी ने वीना के तारों को छेडा, जिससे ब्रहमान्ड में काल के पुनरागमन का मधुर
20:51राग गुनजायमान हो उठा।
20:53नारद के संगीत की प्रत्येक धुन कालदेव के उस चक्र के साथ तालमिल बिठा रही थी, जैसे समय और स्वर
21:01का मिलन हो रहा हो।
21:03प्रलय की राख पर अब जीवन के पहले फूल खिलने लगे थे, जिनका सुगंधित रस काल का अमरित बन रहा
21:10था।
21:12कालदेव ने शिव की ओर देखा, जैसे वे पूछ रहे हो कि क्या अब माया को उसके पूर्ण वैभव में
21:19प्रकट होने का आदेश दिया जाए।
21:22शिव ने मौन रहकर स्वीकृती दी और उस मौन से एक उर्जा तरंग निकली जिसने काल की गती को और
21:29भी तीवर कर दिया।
21:31स्रिष्टी का हर पर्मानु अब एक नई कहानी बुनने के लिए आतुर था और काल का चक्र अब पूरी तरह
21:38से अपनी धुरी पर घूम चुका था।
21:41काल देव की उपस्थिती ने उस चूने को भर दिया था, जिसे शिव ने अभी अभी शुद्ध करके पुनरजन्म के
21:48योग्य बनाया था।
21:50माया की शक्ती धीरे-धीरे सूश्म रूप में वापस आने लगी थी, लेकिन इस बार वह शिव के नियंत्रण में
21:58एक अनुशासित शक्ती थी।
22:01शिव ने अब अपने आखें पूरी तरह खोली और उनकी द्रिष्टी में उस भविश्य की जलक थी जो अब अनंत
22:08काल तक चलने वाला था।
22:10काल देव ने महादेव को एक अंतिन नमन किया और समय की धारा को ब्रहमांड के हर कोने में प्रवाहित
22:17कर दिया।
22:19एक नया युग ब्रहम वैवर्त का नया अध्याय अब शुरू हो चुका था, जहां शिव और काल की युती से
22:25स्रिष्टी का भविश्य सुरक्षित था।
22:29ब्रहमांड की सीमा रेखा पर खड़े नारद को दूरस्त क्षितिच पर गोलोक का एक दिव्य आभास पुनह स्वर्निल प्रकाश की
22:36तरह दिखाई देने लगा।
22:39नारद ने अपनी आखे बंद की और उस दिव्य लोग की असीम शांती को अपने भीतर अनुभव करने का प्रयास
22:46किया।
22:47उनके वीना के तार स्वतह ही बजने लगे, जैसे वे स्रिष्टी के पुनर निर्मान का गीट गा रहे हूं।
22:55स्वर्णमे नगरियों का सौंदर्य अब अंधकार के बाद एक नई आशा का प्रतीक बनकर उभरा था।
23:03ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ने अनुभव किया कि यह संपून स्रिष्टी वास्तव में भगवान की एक अध्भुत क्रीडा मात्र
23:10है।
23:12दूर कहीं से बहती मंदाकिनी की ध्वनी ने नारत की चेतना को पुनह जागरित कर दिया।
23:19द्रिशी की गहराई में उन्हें वैकुंट के उनस्वर्ण द्वारों के खुलने की आहट महसूस हुई जो लंबे समय से बंद
23:26थे।
23:27प्रकाश की वह किरण जिसने शूने को भेदा था, अब गोलोक के आंगन को स्पर्ष करने लगी थी।
23:35नारत ने देखा कि समय की नदिया अब पुनह उसी दिव्यस रोत की और प्रवाहित होने लगी है।
23:42भगवान विश्नु के चरन चिन्हों का आभास नारत के हिदय में भक्ती का एक नया ज्वार ले आया।
23:49उनकी वीना की हर गूंज अब गोलोक की महिमा का गुनगान कर रही थी।
23:55आकाश के कणकण में एक संगीत था जो स्रिष्टी के रचिता के प्रती कृतग्यता व्यक्त कर रहा था।
24:03नारद मुनी ने महसूस किया कि प्रलय का वह महांधकार अब पूरी तरह विलीन हो चुका है।
24:11वैकुंठ के वैभव ने अपनी पुरानी चमक को पुनह धारन कर लिया था।
24:17हवाओं में पारिजात की सुगंध व्याप्त थी, जो इस नए ब्रहम वैवर्त के स्वागत में मगन थी।
24:24यह वहक्षन था जब काल का चक्र पूरी तरह से अपनी सही दिशा में लौट आया था।
24:31नारद ने हाथ जोड कर उस अनंत सत्य को प्रणाम किया, जिसे अब संपूर्ण स्रिष्टी अनुभव करने वाली थी।
24:39स्रिष्टी का हर पर्मानु अब शिव और विश्णु की सम्मिलिक चेतना से स्पंदित हो रहा था।
24:46एक शांत गूंच चारों और सुनाई दी, जैसे ब्रहमांड स्वया अपनी नई धड़कन के साथ जीवित हो उठा हो।
24:54नारद की यह यात्रा अब सत्य के उस अंतिम शिखर पर पहुँच चुकी थी जहां से केवल प्रेम और प्रकाश
25:01ही दिखाई देता था।
25:03शिव के अवधूत स्वरूप की प्रचंड अगनी धीरे-धीरे मंद पढ़ने लगी और कैलाश की चोटियों पर एक अलौकिक नीली
25:11माचा गई।
25:13नारद मुनी ने देखा कि भगवान विश्नु जो अब तक स्थिर थे, मुस्कुराते हुए शिव की और एक सौमे द्रिष्टी
25:21से देख रहे थे।
25:23शिव के शरीर से लिप्टे सर्पों का फुफकारना शांत हुआ और वे अपनी स्वाभाविक शांती मुद्रा में वापस आ गए।
25:31पूरा वातावर्ण अब उस आदिध्वनी से उतप्रोथ हो गया, जिसे केवल हृदय की गहराई से ही सुना जा सकता था।
25:40भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख को धीरे से बंद किया, जैसे वे ब्रहमांड के अगले चक्र का बीज अपने
25:47भीतर समेट रहे हो।
25:49विश्नु ने अपना शंक धीरे से उठाया, जिसकी मंद और मीठी ध्वनी से स्रिष्टी का कंकन पुलकित हो उठा।
25:58नारद मुनी ने शिव के चर्णों में अपना मस्तक जुकाया और उस नई चेतना को अनुभव किया जो स्रिष्टी के
26:05पुनरजन्म का आधार थी।
26:08कैलाश के उपर एक अध्भुत स्वर्णिम आभा उभराई, जो इस बात का संकेत थी कि समय का चक्रपुनह अपनी सही
26:15दिशा में लौट आया है।
26:18शिव ने अपने त्रिशूल को प्रिथवी पर रखा, जिसकी गूँच से कैलाश के पत्थरों में एक नई प्राणशक्ती का संचार
26:26हुआ।
26:28विश्नु और शिव के बीच मौन का वह समवाध हुआ जिसे शब्दों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता था।
26:34शिव ने अपनी द्रिश्टी नारत की ओर घुमाई, उनकी आँखों में प्रेम और करुना का एक अथा सागर था।
26:44वायो मंडल में अब फूलों की एक दिव्य सुगंध फैल गई थी, जो यह स्पष्ट कर रही थी कि प्रलै
26:50का संकट पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
26:54शिव ने अपने कमंडल से पवित्र जल की एक बूंध छोड़ी, जो कैलाश के शिखर पर गिरते ही ओसकी बूंधों
27:01में बदल गई।
27:03वह ओसकी बूंध जैसे ही गिरी, कैलाश के पत्थरों से नीले रंग की दिव्य उर्जा के पौधे फूटने लगे।
27:11नारद समझ गए कि यह शिव का वह संकेत है, जिसके माध्यम से वे स्रिष्टी की नई रचना का शुभारंभ
27:18कर रहे थे।
27:20कैलाश के चारों और की प्रकृती शांत होकर इस महानक्षन का अभिनंदन कर रही थी।
27:27शिव का शरीर धीरे धीरे प्रकाश की किर्णों में विलीन होने लगा, जैसे वे अब इस भौतिक जगत से परे
27:34जा रहे हूं।
27:36विश्णू ने अपने चतुर्भुज रूप में शिव को नमन किया, जैसे एक मित्र दूसरे को विदाई दे रहा हो।
27:44प्रकाश का एक विशाल पुँच कैलाश के शिखर को छूटा हुआ अनंत आकाश में विलीन हो गया।
27:51शिव अंतरध्यान हो चुके थे, लेकिन उनके द्वारा स्थापित शांती अब स्रिष्टी के हर कण में सदा के लिए बस
27:58गई थी।
28:00नारद मुनी ने कैलाश की पवित्र निरवता में अकेले खड़े होकर उस महाशूने को अनुभव किया जहां अब केवल एक
28:08नई स्रिष्टी की स्पंदन बाकी थी।
28:11उनके हाथों में मौजूद वीना से निकली मधुर ध्वनी उस दिवे शांती का गुनगान कर रही थी जिसे शिव ने
28:18अपने तांडव के पश्चात स्थापित किया था।
28:22नारद ने अपनी आखें बंद की और अपनी योगद्रिष्टी से आने वाले युग के जटिल चकरों और छिपी हुई बाधाओं
28:29को स्पष्ट रूप से देख लिया।
28:32ब्रहम लोग का मार्ग अब उनके लिए खुल चुका था, जहां स्रिजन के स्वामी ब्रहमाजी स्वयें इस नई चेतना के
28:39प्रसार की प्रतीक्षा कर रहे थे।
28:42वे कैलाश के बरफीले शिकरों से विदा लेते हुए वायू की गती से अंतरिक्ष के उस पार प्रस्थान करने के
28:49लिए तत्पर हो गए।
28:51मार्ग में उन्हें उन्सुक्ष्म आयामों का आभास हुआ जिन्हें शिव के अवधूत स्वरूप ने अपनी शक्ती से एक नई दिशा
28:59प्रदान की थी।
29:01वीना की जंकार अंतरिक्ष के सन्नाटे को चीरते हुए ब्रहम लोग के स्वर्ण द्वारों तक पहुँचने की तयारी करने लगी।
29:10दूरी पर स्थित ब्रहम लोग के विशाल कमल सद्रिश भवन अब स्पष्ट रूप से उनकी दिव्यद रिष्टी के सामने उभरने
29:17लगे थे।
29:19नारद के मन में यह बोध गहरा होता गया कि काल का चक्र अब एक ऐसे मोर पर है जहां
29:25न्याय और धर्म की परिच्षा होना शेश है।
29:30ब्रहम लोग के प्रवेश द्वार पर पहुँचकर उन्होंने अपनी वीना के स्वरों को धीमा किया और नमन की मुद्रा धारन
29:37की।
29:49ब्रहम लोग के भीतर प्रवेश करते ही उन्हें चारों और वेदों की रिचाओं का गान सुनाई देने लगा जो बातावर्ण
29:56को पवित्र कर रहा था।
29:59नारद ने अनुभव किया कि स्रिष्टी का आधार अब पूरी तरह से शिव की क्रिपा से पुनह संतुलित हो चुका
30:05है।
30:06स्रिष्टी के पुनरजन्म का यह अध्याय नारद के लिए केवल एक शुरुवात थी क्योंकि उन्हें आगामी चुनोतियों का सामना करना
30:15था।
30:17उन्होंने अपनी वीना को एक बार फिर जंकृत किया जिससे पूरे ब्रहम लोक में नई उर्जा का संचार होने लगा।
30:36और उस महार हस्य के बारे में बताने की अनुमती मांगी जिसे उन्होंने कैलाश पर अनुभव किया था।
30:44ब्रहमाजी के मुख पर एक सौमे मुस्कान आई, मानो वे पहले से ही उस रहस्य की गहराई को जानते हों
30:51जिसे नारद साज़ा करने वाले थे।
30:54नारद का शब्द शब्द अब उस सत्य की ओर मुड़ने लगा था जो आने वाले युगों के लिए एक अटल
31:01आधार बनने वाला था।
31:03काल का चक्र अब अपनी नई दिशा में घूम चुका था और नारद की यात्रा का अगला चरन सृष्टी के
31:10रक्षक के द्वार की ओर था।