इस एपिसोड में नारद मुनि की ब्रह्मलोक वापसी के बाद एक नया रहस्य सामने आता है। जब सृष्टि की रचना में पहली बार असंतुलन पैदा होता है, तो ब्रह्मा जी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। क्या नारद का गोलोक ज्ञान इस संकट को टाल पाएगा? जानिए ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस अनकहे अध्याय में। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #LordBrahma #HinduMythology #SanatanDharma #AncientWisdom #Puranas
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00:00ब्रहम लोग के अनंत आकाश में, जहां स्वर्ण आभा बिखरी हुई है, देवर्शी नारत का प्रवेश एक दिव्य प्रकाश पुन्च
00:07के समान हुआ जिसने पूरे वातावर्ण को दिव्यता से भर दिया।
00:12चतुर्मुख ब्रहमा जी ने अपने नेत्र खोले और सामने खड़े नारत की बदलती आभा को देखकर उनका हृदय विस्मय और
00:20सम्मान के भाव से भर गया।
00:23नारत ने जुपकर ब्रहमा जी के चर्णों को स्पर्ष किया और उनके स्पर्ष से ब्रहम लोग की पूरी सभा में
00:30एक नई चेतना का स्पंदन गूम्ज गुठा।
00:34ब्रहमा जी की द्रिष्टी ने नारत के भीतर की उस पर ब्रहम जोती को पहचाना, जो गोलोग की कृपा के
00:40बिना संभव नहीं थी।
00:43ब्रहमा जी ने नारत को अपने निकट बिठाते हुए पूछा की किस दिव्य सागर से वे यह अपार शांती और
00:50ब्रहम ज्यान का भंडार लेकर आये हैं।
00:54नारत ने मुस्कुराते हुए अपनी वीना के तारों को छेडा और उस स्वर से गोलोग की उस लीला का वर्णन
01:00आरंभ किया जो स्रिष्टी के मूल में समाहित है।
01:05नारत की वानी से फूटती हुई कथाएं ब्रहम लोग की दिवारों पर चित्रों की तरह सजीव होने लगी जिससे एक
01:12अध्भुत मायावी वातावर्ण बन गया।
01:16ब्रहमा जी ने अनुभव किया कि उनकी अपनी स्रिष्टी रचना की प्रक्रिया में जो अधूरापन था, वह नारत के ज्यान
01:23से पूर्णता की ओर अग्रसर हो रहा है।
01:27नारत ने बताया की प्रक्रिती और पुरुष के मिलन का अर्थ केवल स्रिष्टी का विस्तार नहीं, बलकि स्वय में उस
01:34पर ब्रहम को खोजना है।
01:37इस गहन समवाद के बीच, ब्रहम लोग के द्वार पर एक दिव्य कमपन्न महसूस हुआ, जैसे कोई बड़ी ब्रहमांडिय घटना
01:45घटित होने वाली हो।
01:47ब्रहमा जी के नेत्रों में एक क्षण के लिए स्रिष्टी की चिन्ताओं का भार आ गया। उन्होंने इस अद्भुत घटना
01:54के कारण को भापने का प्रयास किया।
01:58नारद ने अपनी वीना को थाम लिया और उस दिव्य तरंग के स्रोत की ओर ध्यान केंद्रित किया जो स्रिष्टी
02:04के संतुलन को चुनोती दे रही थी।
02:08ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की कुछ बूंदें ब्रहम लोग के प्रांगण में छिड़की जिससे वहां का
02:15वातावर्ण स्थिर और शांत हो गया।
02:18स्थिर्ता लोटते ही एक दिव्य संदेश वाहक वहां उपस्थित हुआ, जिसकी चमक ब्रहम लोग की आभा को भी फीका कर
02:26रही थी।
02:27संदेश वाहक ने ब्रहमा जी के समक्ष नत्मस्तक होकर उस आने वाली चुनोती का वर्णन किया, जो स्रिष्टी के नए
02:35चक्र को बदलने वाली थी।
02:38नारद ने उस संदेश में छिपे संकेत को समझ लिया और अपनी वीना को दोबारा धारन करते हुए ब्रहमा जी
02:45की ओर देखा।
02:47ब्रहमा जी ने गहरी सांस ली और संकलप लिया कि वे अपनी सृष्टी के इस नए मोर को मर्यादा और
02:54धर्म के साथ स्विकार करेंगे।
02:57नारद ने ब्रहमा जी से अनुमती मांगी की वे स्वय जाकर इस ब्रहमांडिय घटना का अवलोकन करेंगे और उसका समाधान
03:06खोजेंगे
03:08ब्रहमा जी की सहमती मिलते ही नारद एक प्रकाश की रेखा बनकर ब्रहम लोक से ब्रहमांड के उस अंजान कोने
03:15की ओर प्रस्थान कर गए
03:18पीछे छूट गए ब्रहम लोक में केवल वो पवित्र गुंजन बाकी था जो आने वाले नए चक्र के शुभारंभ की
03:25पहली ध्वनी थी
03:27शुनी की गहरायों में प्रवाहित होते हुए नारद ने देखा कि समय की गती अचानक रुप गई है और वहां
03:34के नियत प्रकाश पुंज भी थर्थराने लगे हैं
03:38उसी क्षण वैकुंट के प्रवेश द्वार पर साक्षात श्रीहरी विश्नु का मुख मंडल गंभीर हो गया मानो वे ब्रहमांड की
03:46किसी अद्रिश्य दरार को भांप रहे हो
03:50नारद ने उस अंजान कोने में पहुँच कर देखा कि स्रिष्टी की रचना करने वाले मूल तत्व बिखर कर एक
03:56जटिल मायावी चक्र का निर्मान कर रहे हैं
04:01चारों और एक दिव्यकंपन गूंच उठा जैसे कोई महाशक्ती इस ब्रहमांड के पुराने धाचे को तोड़ कर कुछ नया रचने
04:09का संकेत दे रही हो
04:11ब्रहमांड के इस कोने में काल का चक्र उल्टा घूमने लगा था जिससे नक्षत्रों की व्यवस्था और ग्रहों की कक्षाएं
04:19एक दूसरे में विलीन होने लगी
04:22तभी गरूर देव अपने विशाल पंखों को समेटे भगवान विश्नु के निकट आकर उस महागडबडी के केंद्र की ओर संकेत
04:30करते हुए विलीन हो गए
04:32नारद ने जब उस उर्जा के सुरोत को छुआ तो उनके भीतर का ज्यान पर ब्रहम के अनंत प्रकाश से
04:39और अधिक प्रदीप्थो उठा
04:41यह वह स्थान था जहां प्रकृती और पुरुष का मिलन एक नए अंजाने स्वरूप को जन्म देने की चेश्टा में
04:49रख था
04:50ब्रहम लोग के उचे शिखरों से गिर्ता हुआ प्रकाश भी अब उस चेत्र में प्रवेश करते ही एक श्वेत धुआ
04:57बन रहा था
04:59भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा का त्याग करते हुए शंकनाद किया जिससे उस ब्रहमांडिय हल्चल की गती कुछ क्षणों
05:07के लिए मंद पड़ गई
05:09नारद ने अनुभव किया कि यह गड़बडी कोई साधारन प्रोटी नहीं बलकि एक युग के अंत का अनिवार्य लक्षन है
05:17जिसे कोई भी टाल नहीं सकता
05:21आकाश के रंग बदलते हुए गाढ़े बैंगनी से सुनहरे होने लगे मानो स्वयंकाल का स्वरूप इस धटना को अपनी आँखों
05:29से देख रहा हो
05:31विष्णु के उस शंकनाद की प्रतिध्वनी से उन बिखरे हुए तत्वों में पुन एक लय आने लगी और वे संगठित
05:38होने के लिए प्रेरित हुए
05:41गरुड के नेत्रों में भी उस दिव्य परिवर्तन की ज्वाला दिखाई दे रही थी जो आने वाले नए चक्र के
05:47निर्माण के लिए आवश्चक थी
05:50नारद ने देखा कि उस केंद्र में एक बीज का अंकुरण हो रहा है जो अगले ब्रहमांड के उदे का
05:57आधार बनने वाला है
06:00यह विस्मयकारी द्रिश्य ब्रहम लोग के इतिहास में पहली बार घटित हो रहा था जहां निर्माण स्वय निर्माण के नियमों
06:08को चुनोती दे रहा था
06:10ब्रहमांड के उस अंजान कोने में परब्रम की मूख उपस्थिती और अधिक प्रगाड हो गई जिससे पूरा अस्तित्व एकाग्रहो उठा
06:20भगवान विश्णों ने मुस्कुराते हुए अपनी द्रिष्टी को ब्रहमांड के उस नए स्रिजन की ओर मोडा जो अब धीरे-धीरे
06:27स्थिर हो रहा था
06:30नारद का हृदय इस सत्य को जानकर पूर्ण हो गया कि निर्मांड का हर चरण केवल उस लीला का एक
06:36छोटा सा अंश है
06:39ब्रहमांड की वह महागडबडी अब एक सुन्दर संतुलन में परिवर्तित हो चुकी थी और नया चक्र अपने प्रथम चरण की
06:47ओर अग्रसर था
06:49ब्रहमांड के सुदूर कोनों में एक अद्रिश्य स्पंदन गूंज हुठा, मानो सुरिष्टी की आधार शिला पर कोई सुक्ष्म सुक्ष्म कंपन
06:57अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहा हो
07:01भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य द्रिश्टी से उन कंपनों को भांप लिया, जो ब्रहमांड की स्थिर्ता में एक अज्यात चुनोती
07:08की भांती उभर रहे थे
07:11अचानक सुक्ष्म जगत के केंद्र में एक नई तरंग ने जन्म लिया, जो प्रकृती की लएको विचलित करने के लिए
07:18परियाप्थ थी
07:20उस दिव्य उर्जा के विस्थापन से वायुमंडल में एक विचित्र धुआ साचा गया, जो भौतिक जगत के नियमों को चुनोती
07:28दे रहा था
07:30ब्रहमाजी ने भी अपने ध्यान में उस हल्चल को अनुभव किया और उनकी स्रिजन शक्ती में एक शनिक अवरोध उत्पन
07:37हो गया
07:39स्रिष्टी के भीतर का यह असंतुलन अब निचली परतों की ओर बढ़ने लगा था, जहां तत्वों का मेल अब विशम
07:46हो रहा था
07:48अद्रिष्य धागों से बंधी प्रकृती की डोरिया अचानक खिंचने लगी, जिससे पदार्थ और उर्जा के बीच एक द्वंद्व छिड़ गया
07:58स्रिष्टी की हर इकाई इस महागडबडी के प्रभाव में अपना स्थान बदलने को विवश हो गई
08:05नारग मुनी ने अपनी वीना के तारों में उस कमपन को महसूस किया, जो सामाने सुरों से कहीं अधिक गेहन
08:12और भयावह था
08:14रिशी नारग ने गहरी चिंता के साथ उस रिक्तता को देखा, जहां स्रिष्टी का संतुलन अब लड़ खड़ाने लगा था
08:22कमपन इतना तीवर था कि परब्रम की चाया भी उस हलचल से अचूती न रह सकी
08:29ब्रहमांड के सभी देवता अपनी दिव्य सभाओं में स्तब्ध हो गए क्योंकि उन्होंने ऐसा स्रिजन विच्छेत पहले कभी नहीं देखा
08:38था
08:39धर्ती की निचली परतों से एक अजीब सी गूंज उठी जो स्रिष्टी के नए चक्र के आने का पूर्व संकेट
08:46दे रही थी
08:48भगवान विश्णु ने अपनी उंगलियों के स्पर्ष से उस कमपन को शांत करने का असफल प्रयास किया
08:55तत्वों के कण एक दूसरे से टक्रा कर नई उर्जा का निर्मान कर रहे थे जो स्रिजन के पुराने नियमों
09:02को मिटा रही थी
09:04यह सूक्ष्म हलचल अब एक विशाल लहर का रूप ले चुकी थी जो संपूर्ण ब्रहमांड के तानेबाने को जख जोर
09:12रही थी
09:14ब्रहमाजी ने अपना मस्तक जुकाया और उस अव्यवस्था के मूल कारण को समझने का प्रयास किया
09:21नारद मुनी ने अपनी वीना का वादन बंद कर दिया और उस शांती की प्रतीक्षा करने लगे जो उस महाकडबडी
09:28के बाद आने वाली थी
09:31स्रिष्टी के इस नए चक्र में पहली बार कोई ऐसी शक्ती सक्रिय हुई थी जो परब्रह्म की लीला से परेजान
09:38पड़ती थी
09:40अंधेरे और प्रकाश के इस सुक्ष्म खेल ने ब्रहमाज की दिशा को हमेशा के लिए बदलने का मार्ग प्रशस्थ कर
09:47दिया था
09:49ब्रहमांड के सुदूर कोनों में स्थित अयपान के तप्त लोक में कांसे के विशाल कड़ा है अचानक स्वतह ही उबलने
09:56लगे, मानों किसी अंदेखी उर्जा ने उन्हें उत्तेजित कर दिया हो
10:02भगवान विश्णू बैकुंट के अपने शयन कक्ष में विराज मान थे, उनकी अलौकिक नीली काया से निकलने वाला आभापुंज मंद
10:10पड़ने लगा था, जैसे वे स्वयें इस अप्रत्याशित विक्षोब का अनुभव कर रहे हो
10:17अयहपान के धधकते हुए लोहे के चिम्टों ने स्वयें को रिक्ट आकाश में मोरना शुरू किया, जैसे वे किसी अद्रिश
10:24शत्रू को पकड़ने का विफल प्रयास कर रहे हुँ
10:28यह खगोलिय उथल पुथल किसी कालचक्र के अंतका नहीं, बलकि एक ऐसे परिवर्तन का संकेत थी, जिसे देवताओं ने अपने
10:36अस्तित्व के आरंभ से कभी नहीं देखा था
10:40सुकर्मुख के कठोर ग्रेनाइट के शिलाखंड, जो युगों से स्थिर थे, अचानक कापने लगे और उनसे निकली धूल के गुबार
10:48ने संपून लोग को एक भस्म जैसी धुन्ध में लपेट लिया
10:53सुकर्मुख के द्वारपालों ने, जिनके मस्तक सुवर के समान थे और जिनका शरीर वजरसा कठोर था, अपनी गदाए उठाकर उस
11:02शूने को चुनौती दी जहां से यह कमपन उत्पन हो रहा था
11:07उन द्वारपालों की गदाओं से निकलने वाली भीशन गर्जना ने उस पाताल लोग की सीमाओं को हिला कर रख दिया,
11:15मानो कोई अद्रिश्य शक्ती उसे भीतर से फाड़ना चाहती हो
11:19यह घटना न केवल भौतिक थी, बलकि स्रिष्टी के उन नियमों पर प्रहार थी जिनके आधार पर ब्रहमा का यह
11:27ब्रहमांड तिका हुआ था
11:30क्रिमिभोजन के घोर अंधकार्मय गर्तों में, जहां कीचड और कीडों का सामराज्ज था, एक ऐसी नीली कांती उत्पन हुई जिसने
11:38वहां के दुरगंधयुक्त वातावर्ण को ही बदल दिया
11:42स्वया भगवान शिव ने कैलाश के एकांत में अपनी आखे खोली और उनके मस्तक के त्रीतिय नेत्र से एक सुक्ष्म
11:50प्रकाश की किरण स्रिष्टी की ओर प्रक्षे पित हुई
11:54उस त्रिनेत्र की ज्वाला ने क्रिमिभोजन के उन कीडों को क्षण भर के लिए स्तब्ध कर दिया जो अब तक
12:01की मर्यादा को भूल कर अराजक्ता की ओर बढ़ रहे थे
12:05कैलाश के शिकरों पर जमी बर्फ में भी पहली बार वह हल्चल दिखाई दी जो स्रिष्टी के किसी भारी मानसिक
12:13तनाव को दर्शाती थी
12:15पुयोद की विशाक्त नदियों में जहां गंधक और राख का अमबार था अचानक एक तीवर शान्ती चागई जो आने वाले
12:23किसी बड़े विनाश की पूर्व सूचना थी
12:27बैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय ने अपनी दिव्यगदाओं को धारण किया क्योंकि उन्हें परब्रह्म की आज्या के बिना ही
12:35इस हल्चल का आभास हो गया था
12:38उनकी दिव्यद रिष्टी ने देखा कि संसार के सभी लोक एक दूसरे से जुड़ने लगे थे जो प्रकृती की मूल
12:45व्यवस्था के विरुध एक अप्राकृतिक घटना थी
12:50संसार के विभिन लोकों में व्याप्त यह अस्थिर्ता अब एक ऐसी लए में बदल रही थी जो किसी पुरानी संहिता
12:57की ओर संकेत नहीं कर रही थी
13:00रौरव के नरक में जहां प्रताड़ना का नगन सत्य था वहां के अगनी कुंडों ने अपनी ज्वाला का रंग लाल
13:07से बदल कर धवल श्वेत कर लिया जो एक चेताबनी के समान था
13:13ब्रहमांड के इस महागरबडी ने अब देवताओं के अहंकार को भी चुनौती देना शुरू कर दिया था क्योंकि उनकी शक्ती
13:21का स्रोत स्वय ही संशय में था
13:24प्रकृती के पंच्तत्व अब अपनी सीमाओं को लांध कर एक दूसरे में विलीन हो रहे थे जैसे कि कोई अद्रिश्य
13:31शिल्पी पूरे संसार का मान्चित्र पुनह लिख रहा हो
13:35नारद मुनी ने अपनी आखें खोली और उस नई दिशा की ओर देखा जहां से यह सारा कोलाहल उत्पन्न हुआ
13:43था वे जानते थे कि अब संबाद का समय समाप्थ हो चुका था
13:48ब्रहम लोग की स्वर्ण आभा अब मलीन होने लगी थी जैसे स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा के मन में उठ रहे
13:55द्वंद्वने स्वयं प्रकाश की गती को अवरुद्ध कर दिया हो
14:00चतुर्मुखी ब्रहमा ने अपनी आखे मूद ली और उनके चिंतन में परब्रहम के निर्गुन स्वरूप और सगुन स्रिष्टी के बीच
14:08एक गहरा विरोधाभास उभरने लगा
14:12अचानक ब्रहम लोग के स्तंभों से एक सुक्ष्म कमपन उठा जो यह संकेट दे रहा था कि सत्य के आधार
14:19भूत सिधान्तों में एक दरार उत्पन हो रही है
14:23यह विसंगती केवल एक बाहय घटना नहीं थी बलकि ब्रहमांड के तानेबाने को बुनने वाले ब्रहमा के स्वयन के संकल्प
14:31की एक सुक्ष्म प्रतिक्रिया थी
14:35विशाल काया वाले ब्रहमा के चारों मुखों से एक साथ मंत्रों का धीमा गुंजन निकर रहा था, जो स्रिष्टी के
14:42चक्र को पुनह संतुलित करने की प्रार्थना कर रहे थे
14:46उनके समक्ष खड़ा सत्य का प्रकाश, नारत की वानी में गूंजता वह गोलोक का संदेश, अब ब्रहमा के मस्तिश्क में
14:54एक जटिल गणितिय समीकरन बन चुका था
14:58नारत की आखों में वह दिव्यता थी, जिसे देखकर ब्रहमा समझ गए कि परब्रम की लीला को साधारन बुद्धी से
15:05समझना अब असंभव हो चुका है
15:09स्रिष्टी के निर्मान की वेदी पर बिछे हुए पंच तत्व अब अपनी मूल प्रकृती को छोड़ कर एक नई अव्यक्त
15:16उर्जा में विलीन होने के लिए छटपटा रहे थे
15:20ब्रहमा ने अनुभव किया कि जिस गो लोक को उन्होंने परमानंद का केंद्र माना था वह इस मर्थ्य लोक में
15:27उतरते ही एक मायावी विसंगती पैदा कर रहा है
15:32उनकी कमलवत उंगलियों के सुक्ष्म संकेतों से ब्रहम लोक की उर्जा में हल चल हुई जो अंतरिक्ष के विस्तार को
15:39स्थिर करने का एक असफल प्रयास था
15:43नारद मौन थे पर उनका मौन ब्रहमा के संशय को और भी गहरा कर रहा था मानो वे रच्चिता की
15:49परीक्षा लेने के लिए अडिक खड़े हो
15:53स्रिष्टी के उस महा को लाहल में जो अब धीरे धीरे ब्रहम लोक की देहली तक पहुँच रहा था एक
15:59अजीब सी निरवता चाने लगी
16:03ब्रहमा की द्रिष्टी अब उस अद्रिष्य केंद्र की ओर थी जहां से प्रकृती के नियम तूटकर बिखर रहे थे और
16:10एक नई अंजानी नेती का जन्म हो रहा था
16:14ब्रहम लोक के स्वर्ण कल्षों में रखा अमरित भी इस अनिश्चिता के कारण अपनी चमक खोने लगा था जो रचिता
16:21के आंतरिक तनाव का प्रतिबिम्ब था
16:24नारद की उपस्थिती ही अब एक मात्र सूत्र थी जो परब्रहम की उस अगाध लीला को ब्रहमा के तरक प्रधान
16:32मस्तिश्क से जोड़ने की सामर्थ्य रखती थी
16:36ब्रहमांड का यह नया चक्र एक ऐसी चुनौती के साथ आया था जिसके उत्तर ब्रहमा के पूर्वनिर्धारित वेदों में भी
16:44कहीं अनकित नहीं थे
16:46ब्रहमां ने गहरी सास ली और उस विराठ सत्ता को संबोधित किया जिसका अंश होकर भी वे स्वयं को एक
16:54रच्चिता के सीमित धाचे में बंधा पा रहे थे
16:57उनके हृदय में उठा यह सूक्ष्म संदेह वास्तव में उस पूर्णत्व की ओर पहला कदम था जिसे प्राप्त करने हे
17:05तुस्वयं रच्चिता को भी अपनी सीमाओं से परे जाना था
17:10नारद ने अपनी वीना का एक कोमलतार छेड़ा जिसकी गूंज ने ब्रहम लोग के उस भारीपन को क्षण भर के
17:17लिए शांत कर दिया
17:19स्रिष्टी का यह नया चक्र ब्रहमा के संदेह के साथ अब एक ऐसी यात्रा पर निकल चुका था जिसका अंत्स्वयं
17:27पर ब्रहम की इच्छा के अधीन था
17:30ब्रहम लोग के स्वर्ण मंडप में वीना की गूंच शांत होने के बाद भी एक भारी मौन चाया हुआ था
17:36जहां स्वय रचिता ब्रहमा गहरी सोच में डूबे थे
17:41द्रिशी नारद ने अपनी श्वेत जटाओं को सवारते हुए ब्रहमा जी के समीप आसन ग्रहन किया और उनके मुख पर
17:49एक गंभीर वविचारमगन भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था
17:53अपनी दिव्य द्रिश्टी से मृत्यू लोग की ओर संकेत करते हुए नारद ने पितामह को बताया कि भौतिक जगत में
18:00जीवों की चेतना किस प्रकार माया के पाश में उलच्टी जा रही है
18:06यह द्रिश देखकर ब्रहम लोग की स्वर्णिम हवा में भी एक अजीब सी सिहरन दोड़ गई, मानो प्रकृती स्वया आने
18:13वाले संकटों का पूर्वाभास करा रही हो
18:17ब्रहमा जी ने अपनी चारों दिशाओं की द्रिश्टियों को समेटते हुए नारत से पूछा कि इस अनादी स्रिश्टी के चक्र
18:24में कौन सा नया जटिल मोड आ गया है
18:28नारत ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया कि हे पितामह आपके द्वारा रची गई इस माया के कारण अब परब्रहम
18:36तक पहुँचने का मार्ग अत्यंत पेचीदा हो चुका है
18:40मृत्यो लोग के जीव अब केवल कर्मकांडों और बाहरी दिखावे में उलचकर रह गए हैं और मुक्ती का वास्तविक ज्यान
18:48उनकी पहुँच से कोसों दूर चला गया है
18:52यह चेतावने केवल शब्दों का प्रपंच नहीं थी बलकि यह स्रिष्टी के उस आंतरिक संतुलन का कमपन था जो हर
19:00युग में धर्म की परीक्षा लेता है
19:03ब्रहमा जी ने अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेरा और स्विकार किया कि कर्म और भाग्य का यह चक्र ही
19:10स्रिष्टी के अस्तित्व का सबसे बड़ा नियम है
19:15नारद ने समझाया कि जीव जब तक अहंकार और देहाध्यास से मुक्त नहीं होते तब तक वे गोलोक और वैकुंट
19:22के उस परम प्रकाश को कभी महसूस नहीं कर पाएंगे
19:27रिशी के इन वचनों ने ब्रहम लोग की उस शांत आभा को अचानक ही एक गहरे वैराग्य और आंतरिक मन्थन
19:34के सागर में बदल दिया
19:36यह वक्षन था जब रचिता और उनके मानस पुत्र दोनों को यह आभास हो गया कि आगे आने वाले काल
19:44में जीवों का उद्धार अत्यंत कठिन होने वाला है
19:48ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल निकाल कर चारों और छिड़का जिससे अंतरिक्ष में तैरती हुई अंगिनत लुक
19:56स्रिष्टी की उर्जा संतुलित हो सके
20:00नारद ने अपनी वीना के तारों पर फिर से उंगलिया फेरीं किन्तु इस बार स्वर में आनंद के स्थान पर
20:07एक अंजानी सी करुना और पुकार थी
20:10वह गूंज ब्रह्मांड की दीवारों से तकरा कर वापस लोटी मानो संपूर्ण ब्रह्मांड अपनी इस नई उल्जन और जटिलता पर
20:18मौन सहमती दे रहा हो
20:21स्रिष्टी के इस नए चक्र में अब धर्म और अधर्म, ज्यान और अज्यान के बीच का वह सुक्ष्म अंतर और
20:28अधिक स्पष्ट होने लगा था
20:31ब्रह्मा जी ने अपने नेत्र बंद करके पर ब्रह्म का स्मरण किया ताकि इस विकट परिस्थिती में उन्हें जीवों के
20:38कल्यान का कोई नया मार प्राप्थ हो सके
20:42नारद ने अपने स्थान से उठकर ब्रहमाजी को प्रणाम किया, क्योंकि उनकी चेतावनी का यह संदेश अब ब्रहम लोग से
20:50निकल कर संपूर्ण ब्रहमाण्ड में फैल चुका था
20:53वह चेतावनी आने वाले युगों के लिए एक दिशात बन गई, जिसके बिना मोक्ष के द्वार तक पहुँचने का स्वपन
21:01अधूरा ही रह जाता
21:03इस प्रकार नारद की भविश्य द्रिश्टी ने स्रिश्टी के इतिहास में एक नए और चुनौती पूर्ण अध्याय का द्वार खोल
21:11दिया, जो अब नेती के अधीन था
21:13ब्रहम लोग के स्वर्णमय शिखर अचानक एक रहस्यमय कमपन से थर्थरा उठे, जैसे की ब्रहमांड के आधार स्तंभों में कोई
21:22सुक्ष्म विचलन उत्पन हो गया हो
21:26देवराज इंद्र अपनी स्वर्ण सिनहासन से विचलित होकर उठ खड़े हुए, उनकी द्रिष्टी उन नक्षत्रों पर टिकी थी, जो अपनी
21:34निर्धारित कक्षा से भिन्न व्यवहार कर रहे थे
21:38सभा के मध्य में रखी हुई कालगणना की दिव्य चक्रिका में अनायास ही दरारें उभरने लगी, जो भविश्य के अनिश्चित
21:45कालचक्र की ओर संकेत कर रही थी
21:49समस्थ सभा कक्ष में सन्नाटा पसर गया और चारों दिशाओं से एक दिव्य ओजस्वी प्रकाश पुंज ने देवताओं के हृद्यों
21:57को संशय और भै से भर दिया
22:00ब्रहमा जी के चारों मुखों से एक साथ गंभीर स्वर गूंजा, जिसमें स्रिष्टी के विधाता का चिन्ताकुल आहवान समाहित था
22:10यमराज ने अपने दंड को भूमी पर टिकाते हुए कहा कि मृत्यु लोक और देव लोक के मध्य की मर्यादाएं
22:17अब धुंधली पड़ती जा रही हैं
22:20यमराज के स्वर में छिपी चिन्ता को भाम पकर, वरुन देव ने समुद्र के मन्थन के समय हुए संतुलन का
22:27उदाहरन देते हुए अपनी आशंका व्यक्त की
22:31सभा के वातावर्ण में एक आएक वैकुंट की पवित्र उश्मा का अनुभव हुआ, जो आने वाले किसी बड़े परिवर्तन का
22:39संकेट दे रही थी
22:41अगस्त्य मुनी ने अपने कमंडलू को देखते हुए कहा कि जल और अगनी के तत्व अब अपनी प्रकृती छोड़ रहे
22:48हैं, जो एक बड़ी गड़बडी का लक्षण है
22:53देवताओं के मध्य यह बहस तीवर हो गई कि क्या यह कोई दैविय शड्यंत्र है या स्वयन प्रकृती का अपना
23:00अंचाहा मोड
23:02तभी सभा के द्वार पर वायू की गती से आये हुए संदेशों ने उन सभी को चकित कर दिया जो
23:08अब तक इस संकट से अन्भिग्य थे
23:11समगर सभा में एक अजीब सा नीलिमा युक्त अंधकार छा गया जिसने स्वर्ण आभा को भी फीका कर दिया
23:19नारद मुनी ने आगे बढ़ कर कहा कि यह गड़बडी कोई साधारन परिवर्तन नहीं बलकि स्रिष्टी के प्रथम महा संकेतों
23:28में से एक है
23:30इंद्र ने कृध्ध होकर वजर को अपनी हथेली में धारन किया जैसे वे किसी अद्रिष्य शत्रु को चुनौती दे रहे
23:37हूँ
23:39अचानक ब्रहम लोग की छत से दिव्य पुष्पों की वर्षा के स्थान पर राख जैसी धूल गिरने लगी जिसने सब
23:46को विस्मय में डाल दिया
23:48यह विसंगती इस बात का प्रमाण थी कि निर्माण की प्रक्रिया में कुछ ऐसा प्रवेश कर गया है जो पूर्णता
23:55अप्रिचित था
23:58ब्रहमाजी ने अपने नेत्र बंद कर ध्यान में प्रवेश किया ताकि वे मूल स्रोत तक पहुँच सके जहां यह त्रुटी
24:05उत्पन हुई थी
24:07उनकी समाधी में उन्हें स्रिष्टी के उनकोनों के दर्शन हुए जहां समय का बहाव एक ठहरे हुए सन्नाटे में बदल
24:15चुका था
24:16सभा में उपस्थित अन्य सभी देवतास तब्ध खड़े थे क्योंकि पहली बार उन्होंने अपने रच्चिता को इतनी गहन उल्जन में
24:25देखा था
24:26यह महागड़बडी अब केवल ब्रहम लोग की समस्या नहीं रही बलकि संपून ब्रहमांड के अस्तित्व के लिए एक कठिन परीक्षा
24:35बन गई
24:36ब्रहम लोग की स्वर्ण आभा अचानक धुंधली पड़ गई और चारों दिशाओं में प्रकृती के तत्व अपने मर्यादित स्वरूप से
24:44विचलित होकर क्रंदन करने लगे
24:47भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से जागरित हुए और उनके नेत्रों की चंचलता ब्रहमांड के असंतुलन को देख अत्यंत गंभीर
24:55हो गई
24:57प्रित्वी के भीतर से अगनी और जल का एक अनियंत्रित संगम फूट पड़ा जिससे समस्त भूमंडल थर-थर कामपने लगा
25:06प्रकृती का यह विद्रोह आकाश में एक ऐसे भयावः चक्रवात के रूप में उभरा जिसने सितारों को अपनी कक्षा से
25:13विस्थापित करना शुरू कर दिया
25:17ब्रहमा जी के मुख से निकले चारों वेद अब मंत्रों के रूप में नहीं, बलकि भौतिक उर्जा की चिंगारियों के
25:23रूप में वायुमंडल में बिखर रहे थे
25:27नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों से उस कमपन को थामने का प्रयास किया, किन्तु प्रकृती के स्वराज उनके
25:34संगीत से कहीं अधिक उग्र थे
25:37वायुदेव ने अपनी दिशाएं खोदी और उनके वेग से परवत श्रेनिया अपनी जड़े छोड़कर आकाश में तैरने लगी
25:46यह महाविद्रोह उन प्राचीन शक्तियों के जागरित होने का संकेत था, जिन्हें परब्रहम ने स्रिष्टी के प्रथम दिन ही पाताल
25:54के अंधकार में बंद कर दिया था
25:57स्रिष्टी के निर्माता के चारों मुख अब एक साथ मौन थे, मानों वे इस प्रल्यंकारी परिवर्तन के पीछे छिपे रहसियों
26:05को डिकोड कर रहे हूँ
26:08विश्णु जी ने अपना सुदर्शन चक्र प्रकट किया, जिसका प्रकाश प्रकृती की इस अराजक्ता को शांत करने के लिए एक
26:15दिवे धाल बन गया
26:18अगनी के भीतर से निकलते हुए वे तप्तकन ब्रहमांड की आधारशिला को पिघलाने लगे थे, जिसे देख देवगन त्राहतराही कर
26:26उठे
26:28ब्रहमांड के हर अनु में अब केवल एक ही ध्वनी गूंज रही थी, प्रकृती के प्रतिशोध की अनसुनी पुकार
26:35ब्रहम लोग की सीमाव पर लगे नील्मनी के द्वार स्वयन तूटकर बिखर गए, जैसे किसी बाहरी दबावने उन्हें भीतर से
26:43ही तोड़ दिया हो
26:45नारद मुनी की आँखों में वह करुणा और भैस पश्ट दिखाई दे रहा था, जो केवल एक सत्यद्रष्टा ही प्रलय
26:53के समय अनुभव कर सकता है
26:56धर्ती के भीतर छिपी हुई प्राचीन अगनी अब लावा बनकर नहीं, बलकि स्वर्ण भस्म के रूप में बाहर निकल कर
27:03पूरे वातावर्ण को धक रही थी
27:07आकाश के रंग बदलते बदलते गहरे काले और रक्तवर्ण के हो गए जो प्रकृती की इस भयावः विद्रोही स्थिती का
27:14प्रतीक थे
27:16ब्रहमांड के संतुलन का आधार, शेशनाग के सहसरफ फन भी आज इस कमपन से विचलित होकर असहज थे
27:24भगवान विश्णू ने अपनी गर्जना से उस सन्नाटे को तोड़ा और समस्त दिशाओं को सचेत रहने का आदेश दिया
27:33प्रत्येक देवता अब अपने अस्त्रशस्त्र लेकर स्रिष्टी को बचाने के लिए रक्षा पंक्तियों में खड़ा होने लगा था
27:41इस विद्रोही प्रक्रिती के सामने अब केवल पर ब्रहम का वह अनिश्चित स्वरूप ही था जो आने वाले महा प्रिवर्तन
27:49का एक मात्र उत्तर था
27:51ब्रहम लोग की स्वर्ण में आभा अचानक एक अकल्पनिय निरवता में बदल गई जहां ब्रहमा जी के चारों मुखों पर
27:59एक गंभीर मौन छा गया
28:02चतुर्मुख ब्रहमा जी ने अपने नेत्र बंद कर लिये मानो वे इस स्विष्टी के पन्नों को एक नई लिपी में
28:08फिर से लिखने का संकेत खोज रहे हो
28:12उनके हृदय के भीतर एक सुक्ष्म स्पंदन हुआ जैसे किसी अनंत स्रोत से कोई गुप आग्या उनके अंतर्मन में प्रवाहित
28:20हो रही हो
28:22ब्रहमांड के इस सुक्ष्म कणकण में एक अद्रिश्य उर्जा का जाल बुना जाने लगा जो आने वाले महा प्रिवर्तन का
28:29मौन निमंतरन था
28:31तभी क्षून्य से एक नीरव ध्वनी निकली जो परब्रहम का वह संकेत थी जिसने स्रिष्टी के नए चक्र को प्रारंभ
28:39करने का मार्ग प्रशस्त किया
28:42ब्रहमा जी की समाधी में लीन मुद्रा और अधिक स्थेर हो गई क्योंकि वे अब परब्रहम की उस इच्छा को
28:49आत्म साथ कर रहे थे जो आत्माओं की परीच्छा का आधार बनी
28:54उनके प्रतेक मुख से एक गुप्त मंत्र प्रवाहित होने लगा जिससे ब्रहम लोग के स्तंभ भी कामपने लगे और एक
29:02नई तरंग का संचार हुआ
29:05यह संकेत इतना गहरा था कि इसने नेती की सीमाओं को तोड़ कर भविश्य की अनिश्चित रेखाओं को एक साचे
29:12में ढालना शुरू कर दिया
29:15समस्त देवता जो अब तक रक्षा पंक्तियों में सतर्क थे अचानक उस दिव्य मौन को महसूस कर ठिठक गए
29:24इंद्रदेव ने अपने सिनहासन से उठकर उस अद्रिश्य उर्जा को प्रणाम किया क्योंकि वे जानते थे कि अब न्याय और
29:32परीच्षा का समय निकट है
29:35परब्रहम की यह मूख वानी स्रिष्टी के उन गुप्त कोनों तक पहुँच गई जहां अब तक केवल अंधेरा ही अपना
29:42सामराज्य बनाए हुए था
29:44अंधेरे के उनकारागारों में भी हलचल हुई जैसे कोई सोया हुआ दैत्य अपनी नीन से जागने के लिए विवश हो
29:52गया हो
29:54ब्रहमा जी ने अपने नेत्रों को एक विशेश प्रकाश के साथ खोला जिससे संपूर्ण ब्रहम लोक एक पल के लिए
30:01दिव्यश्वेत जोती से प्रकाशित हो उठा
30:04इस प्रकाश ने आत्माओं के उन सोय हुए संसकारों को जग जोर दिया जो अब इस महा प्रीक्षण में अगनी
30:12की तरह शुद्ध होने वाले थे
30:15नया चक्र अब शब्दों में नहीं बलकी परिस्थितियों की उस श्रिंखला में रचित होने वाला था जो अनिवार्य थी
30:23पर ब्रहम का वह मौन संकेत अब साकार होकर ब्रहमांड की हर नस में डौड़ने लगा था
30:30ब्रहमा जी ने अपना मस्तक थोड़ा जुकाया जैसे वे स्वयन भी उस महायोजना के समक्ष नत्मस्तक हो रहे हो
30:38यही वहक्षन था जहां से स्रिष्टी ने अपनी पुरानी जड़ों को त्याग कर भविश्य के नए अंकुरों को जन्म देने
30:46का संकल्त लिया
30:48पूरे ब्रहम लोक में एक मधोर और गूंजती हुई ध्वनी का आभास हुआ जो शांत भी थी और प्रल्यंकारी भी
30:56स्रिष्टी अब उस मोर पर खड़ी थी जहां से वापसी का कोई मार्ग नहीं था और आत्माओं का महा प्रीक्षन
31:03अब प्रारंभ होने को था
31:06ब्रहमा जी के नेत्रों के सम्मुख वह आदिशून्य प्रकट हुआ जिसने स्रिष्टी के आधार भूत नियमों को पुनह परिभाशत करने
31:14का संकेत दिया
31:16ब्रहमा जी ने गंभीर मुद्रा में अपनी दिव्यद्रिष्टी को उस रिक्ट स्थान पर केंद्रित किया जहां से नए ब्रहमांड का
31:23बीज अंकुरित होना था
31:26उनकी उंगलियों के सुक्ष्म कंपन से अंतरिक्ष की पर्तों में एक दिव्यद्रियामिती का निर्मान होने लगा जो प्रकृती के गुप्त
31:34सूत्रों को स्पष्ट कर रही थी
31:37ब्रहम लोग के स्वर्नस्तंभो के मध्य एक अलोकिक नीलिमा फैल गई, मानो स्वयंकाल का चक्र अपना दिशाप्रिवर्तन कर रहा हो
31:46इस नए महा संकल्प के केंद्र में ब्रहमा जी ने माया के आवर्ण को भेदने हेतु एक ऐसी शक्ती का
31:53आवाहन किया जो सत्य और असत्य के भेद को मिटा सके
31:58विष्णु भगवान ने योग निद्रा से जाग कर ब्रहमा के इस साहस को अपनी स्वीकृती दी और उनकी मुस्कान में
32:05पूरे ब्रहमांड का संतुलन जलका
32:09विष्णु के सुदर्शन चक्र की आभा ने ब्रहम लोग की उस नीलिमा को स्थिर कर दिया जिससे स्रिष्टी की डगमगाती
32:16हुई नीन फिर से सुद्रिड होने लगी
32:19ब्रहमांड के इस परिवर्तन में आकाश और पाताल के मध्य एक अद्रिष्य सेतु का निर्मान हो रहा था जो आत्माओं
32:27को उनके कर्मों के नए आयाम से जोड़ने वाला था
32:31नारद मुनी जो इस प्रक्रिया के साक्षी थे ने अपनी वीना को थाम लिया और एक ऐसे स्वर को छेड़ा
32:38जो स्रिष्टी के कणकण में गुंजायमान हो गया
32:42नारद का मुखमंडल आत्मज्यान की आभासे आलोकित था और उनकी वीना के तारों से निकलने वाली ध्वनी में समस्त वेदों
32:50का सार समाहित था
32:53वीना की तान ने उन रिक्ट स्थानों को भर दिया जहां माया अपना जाल बुंती थी जिससे सत्य का मार्ग
33:00अब सुस्पष्ट दिखाई देने लगा
33:03पूरे ब्रहम लोक में एक दिव्य अनुष्थान जैसा वातावर्ण बन गया जहां प्रत्येक पर्मानू स्रिष्टी के नए संकल्प में अपनी
33:11आहुती दे रहा था
33:14ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदे ब्रहमान के खाली स्थानों पर छिड़की जिससे निर्मान की नई
33:21प्रक्रिया में प्राण फूख गए
33:24जल की प्रत्येक बूंद गिरते ही एक नया नक्षत्र बन गई जो स्रिष्टी के नए तंत्र को दिशा देने हे
33:31तु आकाश में स्थापित होने लगी
33:34स्रिष्टी के निर्मान की इस महागरबडी ने अन्तह एक पूर्ण और संतुलित चक्र का स्वरूप ले लिया था जहां हर
33:41आत्मा का अपना निश्चित मार्ग था
33:45ब्रह्म लोग की आभा अब अधिक तीवर और शान्त हो गई थी मानो स्रिष्टी ने अपनी पूर्णता को पुनह प्राप्त
33:52कर लिया हो
33:54ब्रह्मा ने अपनी आखें खोली और स्रिष्टी के नए मान्चित्र को देखा जिसमें अब माया का कोई स्थान शेश नहीं
34:02बचा था
34:03नारद ने जुक कर ब्रह्मा को प्रणाम किया और इस नए युक के आगमन की घोशना करते हुए उनकी वीना
34:10शान्त हो गई
34:12स्रिष्टी अब उस मोर पर खड़ी थी जहां से वापसी का कोई मार्ग नहीं था और आत्माओं का महा प्रीक्षन
34:19अब पूर्णत है प्रारम हो चुका था
34:23ब्रह्मान का नया चक्र चल पड़ा था और इसके साथ ही वेदों की गूंज एक बार पुन सत्य के उदे
34:29की कथा सुनाने लगी