Skip to playerSkip to main content
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध्याय 45 में, सृष्टि के पुनर्निर्माण की जटिल प्रक्रिया और ब्रह्मा की नई चेतना के रहस्यों का खुलासा हो रहा है। नारद मुनि उस दिव्य क्षण के साक्षी बनते हैं जहाँ सृष्टि के वास्तुकार, ब्रह्मा, अपने नए अवतार में ब्रह्मांड की नींव रखते हैं। क्या इस बार ब्रह्मा अपनी पुरानी गलतियों से सीख पाएंगे? जानिए काल-चक्र के इस नए मोड़ की अद्भुत कहानी। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #CreationMythology #HinduPuranas #VedicSecrets #CosmicCycle #DivineKnowledge #SpiritualSeries
Transcript
00:00ब्रहमांड के अनंत अंधकार में शूनी की गर्भनाल से ब्रहमा का स्थूल शरीर एक प्रज्वलित तारे की भांती अचानक प्रकट
00:08हुआ।
00:09नारद मुनी ने अपनी वीना की जंकार थाम ली क्योंकि वे ब्रहमा के इस स्वरूप की तीवर और अप्रत्याशित आभा
00:17को देख स्तब्ध थे।
00:39संकेत था। ब्रहमांड की संरचना के केंद्र में स्थित ब्रहमा का यह स्वरूप पिछले सभी कलपों के अनुभवों का एक
00:48जीवित और तेजस्वी स्तंभ प्रतीत हो रहा था।
00:51नारद मुनी ने विस्मित होकर देखा कि ब्रहमा के प्रत्येक मुख से वेदों की रिचाएं प्रकाश के रूप में ब्रहमांड
00:59की दिशाओं में प्रवाहित हो रही थी।
01:01ब्रहमा की अंगलियों के सुक्ष्म कमपन से आकाशिय तत्वों ने अपना आकार लेना आरंभ किया, जैसे कलाकार कैनवास पर रंगों
01:11को जीवन्थ कर रहा हो।
01:13समय का चक्र एक स्वर्णिम आभा के साथ घूमने लगा, जिसने ब्रहमा की चेतना को ब्रहमांड के हर पर्मानु के
01:21साथ एक कर दिया।
01:23ब्रहमांड के इस विस्तार के बीच, ब्रहमा ने अनुभव किया कि यह कल्प उनकी पूर्व स्मृतियों के बोच से थोड़ा
01:31अधिक तीवर और जटिल है।
01:34नारद ने अनुभव किया कि ब्रहमा के इस अवतार में एक ऐसी गंभीरता है जो पहले के स्रिजन चक्रों में
01:41कहीं खोई हुई थी।
01:44ब्रहमा की हथेली से निकले एक सुक्ष्म बिंदु ने आकाश गंगाओं के विशाल जाल को जन्म दिया, जो प्रकाश की
01:51गती से फैलता चला गया।
01:54अस्तित्व के इस महान नाटक में ब्रहमा का स्वरूप अब एक शांत सागर की भांती विशाल और अगात दिख रहा
02:01था।
02:03ब्रहमांड के नए अधिपती के रूप में ब्रहमा ने उन शक्तियों का आहवान किया जो पदार्थ के मूल कणों को
02:10बांध कर रखने में सक्षम थी।
02:13नारद मुनी ने जुक कर ब्रहमा को नमन किया जैसे वे एक नए युग के उदे की गवाही दे रहे
02:19हों जो कालचकर की नेती से परे हैं।
02:23ब्रहमा की एक आग्या मात्र से ब्रहमांड के तत्व आपस में जुड़ने लगे और स्थूल जगत की नीम एक सुनहरी
02:31इंट की भांती सुद्रिड हो गई।
02:33यह वह क्षण था जहां ब्रहमा को यह बोध हुआ कि स्रिजन केवल निर्मान नहीं बलकि चेतना का एक निरंतर
02:41प्रबा है।
02:43ब्रहमांड के इस सुक्ष्म तंतर में ब्रहमा के शरीर के रोमरोम से दिव्य प्रकाश की किरने निकल कर आकाश की
02:50रिक्तता को भर रही थी।
02:53नारद मुनी ने अपनी दृष्टी से ब्रहमांड के इन नए आयामों को निहारा, जो इस बार अधिक जटिल और रहस्य
03:00में दिखाई दे रहे थे।
03:02ब्रहमा ने गहरी सास ली, जिससे ब्रहमांड में स्पंदन उत्पन हुआ, जिसने पदार्थ को जीवन और गती के प्रथम लक्षन
03:11प्रदान किये।
03:13इस प्रकार ब्रहमा ने स्रिष्टी की नई संग्रचना तयार कर ली थी, लेकिन वे अभी भी इस बात से अंजान
03:20थे कि यह प्रकाश कालचकर के किस नए ध्रम की ओर संकेत कर रहा है।
03:26ब्रहमा ने अपनी तरजनी से शूने में एक दिव्यरेखा खीची, जिससे ब्रहमांड के नक्षत्रों का पहला जामितिय धाचा अस्तित्व में
03:35आने लगा।
03:36विष्णु ने अपने नीले कमल के समान नयन खोले और मुस्कुराते हुए देखा कि कैसे ब्रहमा की इच्छा शक्ती से
03:44पदार्थ का सुक्षमतमकन आकार लेने लगा है।
03:48ब्रहमा के मन से निकली वासनाएं अब प्रकाश की तरंगों में बदल गई थी, जो ब्रहमांड की रिक्तता को एक
03:56दिव्यस पंदन से भर रही थी।
03:59ब्रहमांड के शूने में एक अनिश्चित्ता का कोहरा छा गया, जो कालचक्र के उस पहले भ्रहम का संकेत था जिसे
04:06ब्रहमा स्वयभी भांप नहीं सके।
04:09नारद मुनी ने अपनी वीना के तार छेड़े और उस धुन के कमपन से ब्रहमांड के नए नक्षत्रों ने अपनी
04:16गती और दिशा सुनिश्चित कर ली।
04:19स्रिष्टी के इस ब्लूपरिंट में एक गुप्ट गनितिय त्रोटी उत्पन हुई, जिसे ब्रहमा ने अंजाने में कालचक्र के साथ जोर
04:27दिया था।
04:28अद्रिश धागों से बने ये नक्षत्र धीरे धीरे एक वृत्ताकार गती में घूमने लगे, मानो कोई विशाल अद्रिश हाथ उन्हें
04:37किसी निश्चित धे की ओर मोर रहा हो।
04:41शुन्य का सन्नाटा अब इन नक्षत्रों की खनक और दिव्य गूँच से भर गया, जिससे स्रिष्टी के भौतिक तत्वों का
04:48गर्भाधान सुनिश्चित हुआ।
04:51ब्रह्मा ने पुनह अपनी आखें बंद की और उन बीजों को आमंत्रित किया, जो आने वाले युगों में जीवन और
04:58मृत्यू के चक्र को नियंत्रित करेंगे।
05:01विश्णू की द्रिष्टी में वह सत्य था जिसे ब्रहमा अभी नहीं देख पा रहे थे, वे स्रिष्टी के उस सुक्षम
05:08कालभ्रम को अपनी दिव्य मुस्कान से देख रहे थे।
05:12तत्वों के निर्मान के लिए ब्रहमा ने पांच दिव्य तत्वों का आहवान किया, जिससे ब्रहमान में जल, अगनी, वायु, प्रित्वी
05:20और आकाश का मेल होने लगा।
05:23अचानक आकाश का रंग बदलने लगा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि निर्माण के इस चक्र में कोई बाहरी शक्ती बाधा
05:31उत्पन कर रही है
05:34नारद मुनी ने सचेथ होते हुए अपनी द्रिष्टी उपर उठाई, जहां काल का पहिया अपनी गती से थोड़ा भटकता हुआ
05:41दिखाई दे रहा था
05:44ब्रह्मा की पहली भूल अब साकार हो रही थी, क्योंकि उन्होंने निर्माण में भावनाओं और वासनाओं का अनुपात अंजाने में
05:52अधिक रख दिया था
05:54प्रकाश और अंधकार के वेकन अब आपस में संघर्ष करने लगे थे, जिससे ब्रह्माण के नए नक्षत्रों में अस्थिर्ता का
06:02जन्म हुआ
06:04ब्रह्मांड के इस नए धाचे में जो स्पंदन पैदा हुआ, वह एक ऐसी ध्वनी थी जो पहले कभी भी स्रिजन
06:11के समय नहीं सुनी गई थी
06:14ब्रह्मा ने उस स्पंदन को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उनका प्रतेक प्रयास केवल उस भ्रम के जाल को
06:21और अधिक घना बना रहा था
06:24विश्णू ने अपने हाथों को स्थिर किया और एक ऐसी उर्जा प्रवाहित की, जिसने उस भ्रम को कुछ समय के
06:31लिए रोक दिया
06:33स्रिष्टी का ब्लूप्रिंट अब एक जटिल भूल भूलिया जैसा दिख रहा था, जिसे सुल्जाना ब्रहमा के लिए भी अब एक
06:40बड़ी चुनोती बन गया था
06:43कालचकर ने एक अजीब सी करवट ली, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस निर्माण के पीछे का रहस्य अब
06:51ब्रहमा की समझ से बाहर होने वाला है
06:55ब्रहमांड के शूने में अचानक पाँच दिव्य प्रकाश पुन्च प्रकट हुए, जो प्रित्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश के सुक्ष्म
07:03आधार बन गए
07:05नारद मुनी ने देखा कि भगवान विश्णु अपनी चतुर्भुज छवी में इन तत्वों के मध्य विराजमान है, उनके नीले शरीर
07:13की आभा ब्रहमांड को प्रकाशित कर रही है
07:17प्रित्वी के कणों में पुरानी स्रिष्टी की स्मृतियों का भार था, जिसे नारद ने उन चमकते धूलिकनों के भीतर कापते
07:25हुए महसूस किया
07:27अस्तित्व की चादर पर यह सुक्ष्म संसकार किसी पुरानी लिपी की तरह अनकित थे, जिन्हें ब्रहमा के हाथ थर्थरा रहे
07:35थे
07:36जल के तंतूओं में पिछली स्रिष्टी के सागरों की गर्जना और लवन्ता का स्वाद अभी भी विद्यमान था, जो नारत
07:44को अचम्भित कर रहा था
07:46विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि स्मृती का यह अंशी नई स्रिष्टी को उसके मूल से जोड़े रखने
07:53का एक मात्र सेतु है
07:56ब्रहमा के हाथों से निकली अगनी की लप्टे तत्वों के बीच प्रवाहित होने लगी, जिससे पुरानी स्मृतियों का शुद्धिकरन प्रारंभ
08:05हुआ
08:06अगनी की उस्तीवर चमक में आकाश के तत्व में एक सूक्ष्म कमपन हुआ, मानो कोई प्राचीन स्वर फिर से जाग
08:14उठा हो
08:15वायू का संचार ब्रहमांड के कोनों में हुआ, जिसने उन पुरानी स्मृतियों के संसकारों को बिखेर कर नए निर्मान का
08:23मार्ग प्रशस्त किया
08:25नारद ने अनुभव किया कि ब्रहमांड के हर पर्मानों में पिछली स्रिष्टी का एक अद्रिश्य इतिहास सास ले रहा है
08:34प्रिथवी के तत्व को ठोस आधार देने के लिए ब्रहमांड ने अपनी मानसिक शक्ती का उप्योग किया, जिससे ब्रहमांड का
08:42धाचा स्थिर होने लगा
08:44आकाश और प्रिथवी के बीच एक रहस्यमय संतुलन स्थापित हुआ, जिसने समय की गती को एक नई दिशा प्रदान की
08:53जल ने अगनी के साथ मिलकर वाश्प की स्रिष्टी की, जिससे ब्रहमांड में बादलों और वातावर्ण का निर्मान होने लगा
09:02विश्णु की उपस्थिती ने इन तत्वों को सन्यमित रखा, ताकि स्मृतियों का प्रभाव अराजक्ता में न बदल जाए
09:10ब्रहमा ने अपनी आखे बंद करके उन सुक्षम संसकारों को एक नई चेतना में बदलने का कठिन प्रयास आरंभ किया
09:20ब्रहमांड के इस सुक्षमस्तर पर कालचक्र ने एक अध्भुत प्रकाश फैलाया, जो अतीत और वर्तमान का संधिस्थल बन गया
09:29नारद मुनी ने देखा कि पांचों तत्वों का मेल एक जीवंत उर्जा के रूप में ब्रहमांड की धमनियों में बहने
09:36लगा है
09:38भगवान विश्णु ने अपनी गदा को उठा कर उस उर्जा को स्थिर्ता प्रदान की, जिससे निर्मान का आधार पुखता हो
09:45गया
09:47ब्रहमा की भूल का प्रभाव अब कम होने लगा था क्योंकि तत्व अब अपनी नई पहचान को ग्रहें करने लगे
09:53थे
09:55स्रिष्टी के निर्मान का यह जटिल चरण अब एक शांत और व्यवस्थित लए में परिनत हो चुका था, जिसे देखकर
10:02देवगण भी विस्मित थे
10:05ब्रहमा का रचा हुआ यह नूतन ब्रहमांड अब स्वयं को सहेजने लगा था, जहां कणकण में इश्वरिय उर्जा का एक
10:12सुक्षम स्पंदन प्रवाहित हो रहा था
10:16भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से पुनह सजग होकर उस व्यवस्थित लए का अवलोकन करने लगे, जो उनके प्रभाव से
10:24अब शांत हो चुकी थी
10:26अचानक ब्रह्मा ने निर्मान की गती को और अधिक त्वरित करने का प्रयास किया, जिससे ब्रह्मान के शांत आकाश में
10:34समय की धाराएं आपस में टकराने लगी
10:38समय का चक्र जो पहले एक लए में चल रहा था, अब अपनी धूरी से विचलित होकर अराजकता की ओर
10:44बढ़ने लगा
10:46नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों पर उस कमपन को महसूस किया, जो समय की उस बिगड़ती हुई लए
10:53का संगीत था
10:55देवगण इस अप्रत्याशित हलचल को देख कर विस्मित थे, क्योंकि स्रिष्टी के नियमों में यह पहली बड़ी दरार उभर रही
11:03थी
11:04ब्रहमा की आखों में वह निर्माण का अहंकार एक धुंध की भांती चाया हुआ था, जिससे वेकाल की गती की
11:12गंभीरता को देख पाने में असमर्थ थे
11:16ब्रहमांड के एक छोर पर तत्वों के मिलन से उत्पन्न वह उर्जा अब अनियंत्रित होकर बिखरने लगी थी
11:33ब्रहमा की गूंच शान्थ हो गई और नारद मुनी ने उस द्रिश्य की ओर संकेत किया जहां तारे अपनी कक्षाओं
11:40से भटक रहे थे
11:42ब्रहमा ने अपनी द्रिश्टी नीचे की ओर घुमाई जहां स्रिश्टी के प्रारंभिक अंकुर अब काल की गती के कारण मुर्जाने
11:49लगे थे
11:51समय का वह भ्रम इतना तीवर था कि वह प्रत्येक्षण को युगों में परिवर्तित कर रहा था
11:58भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थामे हुए उस बिगड़ते संतुलन को पुनह रोकने का प्रयास किया पर ब्रहमा का
12:06आवेग अधिक प्रबल था
12:08तत्वों के कण अब एक नई और तीवर उर्जा से चमक रहे थे जो ब्रहमांड को विनाश के कगार पर
12:15ले जा रही थी
12:17ब्रहमा के हृदय में पहली बार अपनी तुटी का बोध हुआ और उनका वह गर्वित चेहरा अब गलानी से भर
12:24गया
12:26वातावर्ण में एक गहन सननाटा चा गया, मानो समस्त ब्रहमांड ने स्वयं को ठहरने का निर्देश दे दिया हो
12:34नारद मुनी ने अब प्रश्ण किया, पितामह क्या निर्मांड की गती में समय का सम्मान करना शेश रह गया था
12:42ब्रह्मा मौन रहे उनके चार मुखों पर अब केवल उस विशाल उत्तरदायत्व की गंभीरता स्पष्ट दिखाई दे रही थी
12:51स्रिष्टी के उस चक्र को पुनह सन्योजत करने के लिए भगवान विश्णु ने अब स्वया हस्तक्षेप करने का निर्नय लिया
12:59ब्रह्मांड के इस नए अधिपती के उदे के साथ ही ब्रह्मा की वह प्रथम भूल अब एक अन्मोल सीख के
13:06रूप में इतिहास में दर्ज हो गई
13:09ब्रह्मा ने अपनी स्रिजनात्मक उर्जा को शूने के अनंत विस्तार में बिखेर कर समय के उन सूत्रों को बुन्ना आरंभ
13:17किया जो अब एक चक्र की भांती घूम सकेंगे
13:21भगवान विश्णू ने अपनी नीले वर्ण वाली दिव्यकाया को स्थिर करते हुए ब्रह्मा की इस कठिन तपस्या पर अपनी सहमती
13:29की मुस्कान बिखेरी
13:31ब्रह्मा के हाथों से निकली स्वर्णिम आभा की किरने ब्रह्मांड के कोनों में जाकर समय के पहियों की रूकरेखा तयार
13:39कर रही थी
13:40समय का चक्र अब केवल गती नहीं बलकि एक पवित्र बंधन बन चुका था जो ब्रह्मांड को उसकी मर्यादा में
13:48बांधे रखने के लिए नियत था
13:51इस नए प्रतिमान के उदे के साथ ही स्रिष्टी की समस्ट इकाईयों में एक स्पंदन जाग उठा जो काल चक्र
13:58की धड़कन को स्पष्ट अनुभव कर रहा था
14:01गरुर के पंखों की फड़फडाहट में भी अब समय की लैबध गूंच सुनाई दे रही थी मानो वे इस नए
14:08युग की सूचना ले जा रहे हो
14:11ब्रह्मा ने अपनी दाई हथेली से उस चक्र को गती दी जिससे ब्रह्मान के प्रथम युग सत्ययुग का अंकुरन सुनिश्चित
14:19हुआ
14:21यह चक्र अब ब्रह्मा के संकल्प का प्रतिविम्ब था जो स्वय में अनन्थ होकर भी निरंतर एक अंत और आरंभ
14:28की ओर बढ़ रहा था
14:30विशाल सुनहरे स्तंभों के बीच खड़ा होकर ब्रह्माने उन शक्तियों का आहवान किया जो समय के इस प्रवाह को संभाल
14:38कर रखेंगी
14:40भगवान विश्णु ने अपनी त्रिने त्रतुल्य अंतर ग्रिष्टी से ब्रह्मा की ओर देखा और कहा कि यही चक्र अब धर्म
14:48की रक्षा का एक मात्र आधार होगा
14:51ब्रह्मा के मुख से निकले वेद मंत्र इस चक्र की गती में एक स्थिर धुन जोड रहे थे जो काल
14:57के प्रभाव को और भी शक्तिशाली बना रहे थे
15:01समय के इस नए प्रतिमान में अब परिवर्तन एक शाश्वत सत्य बन गया जिसे न ब्रह्मा स्वया और नहीं कोई
15:09देवता बदल सकते थे
15:12स्रिष्टी के कणकण में अब काल का प्रभाव व्याप्थ हो गया था जिससे हर पदार्थ अपने विकास और विनाश की
15:19एक निश्चित यात्रा पर चल पड़ा था
15:22नारद मुनी ने दूर से इस अध्भुत परिवर्तन को देखा और वीना पर एक नई राग छेड़ दी जो काल
15:29की इस अनंतलय को समर्पित थी
15:33ब्रह्मा ने उन दिव्य शक्तियों को स्थापित किया जो युगों के परिवर्तन के समय काल के पहिये को धीमाया तेज
15:40करने में सक्षम थी
15:42यह काल चक्र अब ब्रह्मा की प्रथम भूल का प्रायश्चित और उनके भविश्य के ज्ञान का अनूठा समनवय था
15:51ब्रह्मांड के इस नए अधिपती ने अपनी चार भुजाओं से चक्र के केंद्र को स्पर्ष किया जिससे समस्त लोकों में
15:58एक नई उर्जा का संचार हुआ
16:01विश्णु और ब्रह्मा के बीच का यह समवाद अब केवल शब्दों तक सीमित नहीं था बल्कि वह ब्रह्मांड की नीन
16:08को मजबूत कर रहा था
16:11अब समय के नियम पत्थर की लकीर बन चुके थे जो किसी भी विचलित आत्मा को पुना मर्यादा के पत्थ
16:18पर लाने के लिए परियाप्त थे
16:21ब्रह्मांड के नए अधिपती का यह उदे वास्तव में उस अन्थीन यात्रा की शुरुवात थी जिसे हम आज काल के
16:28पहिये के रूप में जानते हैं
16:32ब्रह्मांड की सीमाओ पर एक अद्रिश कोहरा चाने लगा है जहां माया अपने सुक्ष्म तंतूओं को भौतिक कणों में पिरोने
16:39का प्रयास कर रही है
16:42नारद मुनी ने देखा कि भगवान विश्नु का शान्त स्वरूप भी इस मायावी हल्चल को तटस्थ भाव से देखते हुए
16:49ब्रह्मांड की स्थिर्ता सुनिश्चित कर रहा है
16:54स्रिष्टी के कणों के बीच एक सुक्ष्म द्वैत पैदा हो गया है जिससे हर निर्मान अब किसी न किसी दुविधा
17:01के साथ जुड़ गया है
17:03माया की यह पहली लहर ब्रह्मांड की उस शान्ती को भंग करने के लिए उच्सुख है जिसे ब्रह्माने अपने तपसे
17:11संबारा था
17:13नारद मुनी ने अनुभव किया कि कैसे भौतिक वस्तूओं की चमक ही जीव की बुद्धी को भ्रमित करने का सबसे
17:20बड़ा जाल बन गई है
17:23नारद ने कापते हाथों से देखा कि कैसे भगवान विश्नु अपने चक्र से माया के उस सुक्षम जाल को काटने
17:30का संकेत दे रहे हैं
17:33माया का सुक्षम प्रवेश निर्मान के हर पर्मानों में एक ऐसी प्यास जगा रहा है जो कभी पूरी नहीं हो
17:40सकती
17:42यह विडम बना ही है कि जो भी ब्रहमा रचित कर रहे हैं माया उसी को अपनी चाया से ढखने
17:48का साहस कर रही है
17:51सृष्टी का हर नया कोना अब माया की मायावी फुसफुसाहटों से गूजने लगा है जो जीव को उसके असली स्वरूप
17:59से दूर ले जा रही है
18:02भगवान विश्णु का दिव्य तेज ही एक मात्रव वह प्रकाश है जो माया के इस अंधेरे को एक निश्चित सीमा
18:09में बांध कर रख रहा है
18:12नारद मुनी ने महसूस किया कि कालचक्र अब माया के प्रभाव से थोड़ा डगमगाने लगा है
18:20स्रिष्टी के इस प्रारंभिक चरण में ही माया ने अपनी जीत का पर्चम लहराने के लिए अपनी पहली विसात बिछा
18:27दी है
18:29ब्रहमांड के हर कण में एक बेचैनी सी दौड़ गई है जैसे कि निर्मान स्वय ही अपने अस्तित्व पर सवाल
18:36कर रहा हो
18:38विष्णु ने अपनी दृष्टी को उस दिशा में मोडा जहां माया अपनी जड़े फैला रही थी
18:44हर एक पर्मानु अपनी जगह छोड़ने को आतुर है ताकि माया उसे अपनी मनमानी दिशा में ढाल सके
18:53यह माया का वह प्रभाव है जिसे देखने के लिए नारद मुनी की दिव्यद रिष्टी भी कई बार विचलित हो
18:59जाती है
19:01नारद ने देखा कि माया का प्रभाव केवल बाहरी नहीं बलकि स्रिष्टी की चेतना पर भी पढ़ने लगा है
19:10भगवान विश्णु के एक इशारे मात्र से ब्रहमांड का संतुलन पुनह अपने पत पर लोटने का प्रयास कर रहा है
19:18माया की यह शक्ती अब और अधिक तीवर होकर स्रिष्टी के भौतिक धाचे को चुनोती दे रही है
19:27ब्रहमांड के अधिपती और माया के बीच यह अग्रिश्य युद्ध अब कालचकर की अगली गती निर्धारित करेगा
19:35ब्रहमा के मानस से निकली वह पहली किरण अंजाने में ही ब्रहमांड की सीमाओं को दो विपरीत ध्रुवों में विभाजित
19:42कर रही है
19:44भगवान विश्नु का दिव्यमुख मंडल इस विभाजन को देख कर गंभीर हो गया है जैसे वे इस सुक्ष्म तुरुटी के
19:52गंभीर परिनामों का पहले ही अनुभव कर रहे हूँ
19:56ब्रहमा ने जैसे ही रचना की धुरी को छुआ प्रकाश के कणों से एक विशाल अंधकार की छाया अनायास ही
20:03जन्म लेने लगी
20:05स्रिष्टी के भीतर यह प्रथमदरार कालचकर के उस पहिये को घुमा रही है जहां सत्य और मिथ्या का द्वैत अब
20:13स्थाई होने जा रहा है
20:16अंधकार की यह माया ब्रहम लोग के स्वर्ण द्वारों को भेद कर अब उन क्षेतरों की ओर बढ़ रही है
20:23जहां आत्माओं का विचर्ण होता है
20:27नारद मुने अपने वीना के तारों से उस कमपन को महसूस कर रहे हैं जो इस द्वैत के जन्म की
20:33पहली आहट है
20:36वीना की गूँज अब प्रकाश और अंधकार के इस संधर्ष को संगीत में बदल कर ब्रहमांड के कंकन में गुंजायमान
20:43कर रही है
20:45स्वर्ण महल के गलियारों में अब वह कमपन एक भयावह गूँज में बदल चुका है जो भौतिक स्रिष्टी की नीव
20:52को हिला रहा है
21:04वीना का सुक्ष्म अंश जो अब तक स्थिर था इस मायावी द्वैत को रोकने के लिए अपनी दिव्य आभा को
21:10प्रकर कर रहा है
21:13प्रकाश और अंधकार के बीच खिंची यह रेखा अब एक अद्रिष्य दिवार बन गई है जो ब्रहमांड को दो टुक्डों
21:21में विभाजित कर रही है
21:24ब्रहमा का मस्तक इस भूल के भार से जुप गया है क्योंकि उन्हें ग्यात हो गया है कि वे अंजाने
21:30में ही विनाश के जनक बन गए है
21:34काल का पहिया अब रुक सा गया है जैसे ही स्रिष्टी के इस नए अधिपती ने द्वैत की डोर को
21:40अपने हाथों में थामा है
21:43माया की वह शक्ती जो अब तक विश्णू के अधीन थी अब ब्रहमा की उस त्रुटी का लाब उठा कर
21:50स्वतंत्र हो रही है
21:53माया के प्रभाव से अब भौतिक पदार्थों में भी आकर्शन और विकर्शन का द्वंद्व शुरू हो चुका है
22:01ब्रहमांड के इस नए अधिपती का उदे विनाश और स्रिजन के उस महा संग्राम का संकेत है जिसे कोई भी
22:09देवता टालने में समर्थ नहीं है
22:12नारद मुनी इस द्वैत की लहरों को पार कर विश्नु की ओर बढ़ रहे हैं ताकि स्रिष्टी की इस विकर्थी
22:19का समाधान खोजा जा सके
22:22स्रिष्टी का संतुलन अब एक पतली डोर पर लटका है जहां हर निर्ने एक नए युग को जन्म दे सकता
22:29है
22:31ब्रहमा द्वारा बोया गया द्वैत का बीज अब अंकुरित होकर ब्रहमांड के पूरे ढाचे को बदलने की तयारी में है
22:40कालचक्र अब अपनी अगली गती पकड़ रहा है और इस भ्रहम का जाल और अधिक घना होता जा रहा है
22:48ब्रहमांड के शूने में तैरते हुए नारग मुनी ने देखा कि ब्रहमा का आत्म बोव अब अहंकार की धुन्द से
22:55ढकने लगा है
22:57ब्रहमा की मुखाकरती पर एक सुक्ष्म खिंचाव उभरा है मानोवे स्वयं को स्रिष्टी का एक मात्र रच्चिता मानकर सत्य को
23:05चुनौती दे रहे हुँ
23:08नारग ने अपनी वीना को थाम लिया उनकी उंगलिया तारों पर नहीं बलकि आने वाले संकट की गंभीरता को महसूस
23:16कर रही है
23:18ब्रहमांड की तरंगे अब ब्रहमा के गलत निर्नयों के भार से कामपने लगी है जैसे कोई विशाल चक्र अपनी धुरी
23:26से भटक गया हो
23:39ब्रहमा की आखों में जो भ्रम का जाल बुना जा रहा है वह पूरी स्रिष्टी को एक ऐसे मोर परला
23:46खड़ा करेगा जहां वापसी संभव नहीं होगी
23:50नारद मुनी ने अपने आखें बंद कर ली हैं मानोवे ब्रहमा के अहंकार और सत्य के बीच की दिवार को
23:57बंते देख रहे हूँ
23:59स्रिष्टी के कण अब अलग-अलग दिशाओं में बिखरने लगे हैं और इस रिंखलता के औस के बीच केवल ब्रहमा
24:07ही मगन है
24:09ब्रहमा का एक हाथ आकाश की ओर उठा है मानोवे स्वयं को ही ब्रहमांड के नए केंद्र के रूप में
24:16स्थापित कर रहे हूँ
24:19नारद जानते हैं कि यदि वे आज बोले तो काल्चक्र का प्रवाह रुक जाएगा जो की अभी के लिए स्रिष्टी
24:26के अंत के बराबर है
24:39काल्चक्र की धड़कन धीमी हो गई है मानो वह भी इस ब्रहमा के अहंकार को स्विकार करने से पहले एक
24:46बार हिचकिचा रही हो
24:49नारद की मौन साक्ष्य अब एक अटूट संकल्प बन गई है वे समझ चुके हैं कि सत्य को केवल अनुभव
24:56किया जा सकता है शब्दों से नहीं
25:00ब्रहमा के चारों मुख अब अलग-अलग दिशाओं में अपनी श्रेष्ठता का बखान कर रहे हैं जो एक गूंज बनकर
25:07ब्रहमांड को भर रहा है
25:10नारद ने अपनी वीना का एक तार धीरे से छेड़ा जिससे निकली गूंज ब्रहमा के अहंकार के सम्मोहन को तोड़ने
25:17का प्रयास कर रही है
25:20परंतु ब्रहमा का ध्यान अब किसी भी संगीत से परे हो चुका है वे स्वयं के बनाए भ्रम में इतने
25:27विलीन हैं कि बाहरी दुनिया समाप्थ हो गई है
25:31ब्रहमांड के इस नए यूग की नीम पर अहंकार का पत्थर रखा जा चुका है जो भविश्य के सभी दुखों
25:38का आधार बनेगा
25:40ब्रहमा की भूल का परिनाम केवल एक शन की बात नहीं बलकि आने वाले कलपों की विडम बना बन गया
25:47है
25:49नारद अब चुपचाप उस स्थान से पीछे हट रहे हैं उनकी मौन मौजूदगी एक कड़वे सत्यका भार लिये हुए है
25:58कालचक्र का भ्रम अब पूर्ण हो चुका है और ब्रहमा इस भ्रम के रचिता के रूप में स्वयन के ही
26:04जाल में फंस चुके है
26:07ब्रहमा के चार मुखों से निकलती हुई गूंज अब शुने के कणकण में समाहित होकर उस कालचक्र की कठोर्ता को
26:15उजागर कर रही है
26:17भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से विचलित होकर ब्रहमांड की उस सुक्ष्म हल्चल को अपनी दिव्य द्रिश्टी से निहार रहे
26:25है
26:27कालदेव की सुक्ष्म गूंज अब एक गेहन ध्वनी बनकर ब्रहमा के चारों और एक अभेद्य सुरक्षा घेरे की तरह घूम
26:34रही है
26:36सृष्टी का यह भ्रम अब अपनी पराकाश्था पर है जहां समय का पहिया रुकने के बजाए तीवर गती से घूमने
26:44लगा है
26:46ब्रहमा अपने द्वारा रचित नियमों के जाल में स्वय को उल्जा हुआ महसूस कर रहे हैं किन्तु उनका अहंकार अभी
26:53भी शान्त नहीं हुआ है
26:56गरुर देव अपनी विशाल पंखों को समेटे हुए उस दिव्य संकेत को भापकर भगवान विश्नु की ओर चिंतित मुद्रा में
27:04देखते हैं
27:06ब्रह्मा की एक आगरता भंग होने से ब्रह्मांड के कुछ नक्षत्र अपनी निर्धारित कक्षा से क्षन भर के लिए बिचलित
27:13हो गए
27:15शून्य से आती गूंज अब ब्रह्मा के कान में एक चेतावनी नहीं बलकि एक चुनौती की तरह सुनाई दे रही
27:22है
27:24विश्नु का शांत स्वरूप उस हल्चल को थामने के लिए एक दिव्य मुस्कान के साथ उठ खड़ा हुआ है
27:32ब्रह्मा अब अपनी स्रिजनात्मक शक्तियों को पुनह सन्योजित करने का अस्फल प्रयास कर रहे हैं
27:39काल चक्र का प्रभाव इतना तीवर है कि वह स्वय निर्माता के वस्त्रों को भी समय की धूल से मलिन
27:46कर रहा है
27:49आकाश में उभरते वे रंग जो आज तक किसी ने नहीं देखे थे इस नए ब्रहमान के पतन के संकेत
27:56हैं
27:58ब्रहमा के चार मुखों से एक साथ निकलती दिव्यस्तुती भी अब काल की गूंज में दपती जा रही है
28:06विश्नु के हाथ का चक्र अब स्वय ही अपनी धुरी पर तेजी से घूम रहा है जैसे काल का न्याय
28:12निकट आ गया हो
28:14काल देव की आवाज अब ब्रहमा के भीतर से आ रही है उन्हें उनके स्वयन के अहमकार की याद दिलाते
28:21हुए
28:23नारायन की उपस्थिती ने उस स्थान की उर्जा को पुनह स्थिर करने का एक शीन प्रयास किया है
28:31स्रिष्टी का हर एक जीव अब उस अद्रिष्य कालचकर के दबाव को अनुभव कर पा रहा है
28:38ब्रहमा की भूल का बोज अब स्वयन ब्रहमा की चेतना को ही जगजोर कर रख देने वाला है
28:45समय का वह पहिया अब पूरी तरह से अपनी गती पकड़ चुका है, जिसे रोकना अब किसी के वश में
28:52नहीं है
28:54अंधकार और प्रकाश के इस मिलन बिंदु पर ब्रहमा का नया रूप धारन करने का समया गया है
29:02ब्रहमांड के विस्तार के इस क्षण में एक ऐसा अज्यात क्षितिच प्रकट हुआ जो स्रिष्टिकर्ता के भी बोध से परे
29:09था
29:11नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों में अचानक एक ऐसी कमकमपी महसूस की जो आसन्न संकट की चेतावनी दे
29:18रही थी
29:20ब्रहमांड की पहली सुभह की सुनहरी धूप पर अचानक एक अजन्बी और घनी काली छाया मंदराने लगी
29:28यह वह शक्ती थी जो किसी नियम या विधान के अधीन नहीं बलकि अराजकता के गर्ब से जन्म ले रही
29:35थी
29:37ब्रहमांजी की बनाई गई व्यवस्था में इस अंजानी शक्ती ने अपनी पहली दरार डालनी शुरू कर दी थी
29:44नारत की द्रिष्टी ने उस अद्रिश्य खत्रे को भांप लिया जो आने वाले युगों के इतिहास को बदलने की क्षमता
29:52रखता था
29:54अंधकार के उस विशाल पुन्च से कुछ अनकहे और भयानक रहस्यों की गूंच संपून अंतरिक्ष में गूंच गूठी
30:02यह द्रिश्य इस बात का प्रतीक था कि हर रचना के साथ एक अज्यात प्रतिच्छाया अवश्य जन्म लेती है
30:11स्रिश्टी के इस आगामी संकट की आहट ने देवताओं के महलों में भी बेचैनी की लहर गौडा दी थी
30:18नारद मुनी ने अपने कमंडल से जल लेकर इस अनिष्ट को टालने का मौन संकल्प दोहराया
30:25वह भयानक छाया धीरे-धीरे एक ठोस और आक्रामक रूप धारन करती जा रही थी जिसे कोई रोक नहीं सकता
30:33था
30:34कालचकर के पहिये की गती में एक अप्रत्याशित जटका लगा जिससे पूरी ब्रहमांडी विवस्था हिल उठी
30:42यह संकट केवल भौतिक स्वरूप का नहीं बलकि संपूर्ण अस्तित्व के अस्तित्व पर एक गहरा प्रश्ण चेहन था
30:50नारद ने आकाश की ओर देखते हुए महसूस किया कि ब्रहमा का नियंत्रन अब इस नई शक्ती पर नहीं रहा
30:59अंतरिक्ष के कोने कोने से असंतुलन की उर्जाएं प्रवाहित होकर उस नए केंद्र की ओर खिंची चलिया रही थी
31:07यह ब्रहमांड के इतिहास का वहम मोर्था जहां से अंधकार और प्रकाश का अंतिम संधर्ष अनिवार्य हो गया था
31:16स्रिष्टी की हर एक इकाई इस नए खत्रे के भार तले कांप रही थी मानो प्रलै का पूर्वाभ्यास हो रहा
31:23हो
31:24नारद मुनी ने अपनी आखें बंद करके परम शक्ती का आहवान किया ताकि इस संकट का कोई मार्ग मिल सके
31:32उस उभर्ती हुई शक्ती के भीतर से एक ऐसी गूँच सुनाई दी जिसने ब्रहमांड की नीन को जख जोर दिया
31:40इस प्रकार स्रिष्टी की पहली सुभा के साथ ही एक ऐसे आसन संकट का उदे हुआ जिसका सामना करने के
31:48लिए पूरा ब्रहमांड तयार नहीं था

Recommended