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स्कंद पुराण के 27वें एपिसोड में, भगवान कार्तिकेय पाताल लोक की गहराइयों में उतर चुके हैं। यहाँ का कालचक्र एक प्राचीन और डरावनी मशीन की तरह सक्रिय हो रहा है। क्या कार्तिकेय दूसरे दिव्य अस्त्र को पा पाएंगे, या पाताल के रक्षक उन्हें रोक देंगे? जानिए इस रहस्यमयी सफर की पूरी सच्चाई। #SkandaPurana #LordKartikeya #HinduMythology #PatalaLoka #AncientMysteries #SpiritualJourney #IndianPurana
Transcript
00:00कार्तिकेय ने जैसे ही पाताल के प्रथम द्वार रौरव में प्रवेश किया, वहां की काली अगनी और विशाल लोहे के
00:07स्तंभों ने उनके दिव्यकवच की चमक को मंद करना आरंभ कर दिया।
00:12शिवपुत्र कार्तिकेय ने अपने दिव्यकवच की उर्जा को बढ़ाते हुए महसूस किया कि रौरव की चुम्बकिये तरंगे कालचकर की रहस्यमई
00:21गती को धीमा कर रही हैं।
00:24उनकी दृष्टी के सामने रौरव के कालस्तंभों पर अनकित प्राचीन लिपी स्वतह ही चमकने लगी जो पाताल के भीतर छिपे
00:32महाभुकंप की चेतावनी दे रही थी।
00:35चारों और व्याप्त यह भयंकर अंधकार और निरंतर गूजती भीषन गर्जना कालचकर के उस भयाभर रहस्य को पुष्ट कर रही
00:44थी जिसे केवल कार्तिकेये ही देख पा रहे थे।
00:47आगे बढ़ने पर कार्तिकेये ने देखा कि महान रौरव की अगनी अब एक भवर का रूप ले चुकी है जो
00:55पाताल की आधार भूत संरचना को भीतर से खोखला कर रही थी।
01:00स्वया भगवान शिव कैलाश से इस द्रिश्य को देख रहे थे और उनके मस्तक का तीसरा नेतर पाताल की इस
01:07अस्थिर्ता को शांत करने के लिए स्पंदित हो उठा।
01:11कार्तिके के हाथ में स्थित गंधर्व लोक का वह दिव्य अवशेश अब एक तीवर प्रकाश के साथ कामपने लगा, जैसे
01:20वह रौरव की गहराई में किसी गुप्ट केंद्र को ढून रहा हो।
01:24हवा में व्याप्त वह भारी चुम्बकिये उर्जा कार्तिके के दिव्य शरीर पर दबाव डाल रही थी, लेकिन उनकी गती और
01:32अडिक संकल्प क्षन भर के लिए भी नहीं डिगे।
01:35वे अब सुकर्मुख के प्रवेश द्वार पर पहुँच चुके थे, जहां नरक के क्रूर वराहमुख वाले रक्षक भारी ग्रेनाइट के
01:44पत्थरों को कूटने के लिए तैयार खड़े थे।
01:48वराहमुख वाले उन राक्षसों ने कार्तिकेय को घेर लिया, उनकी आखों में पाताल के प्रती वफादारी की हिंसक ज्वाला जड़
01:56रही थी।
01:57कार्तिकेय ने अपने वेल को जमीन पर टिकाया और उत्पन हुई तरंगों ने उन विशाल ग्रेनाइट पत्थरों को क्षन भर
02:05में ही धूल में परिवर्तित कर दिया।
02:08अंधेरी गुफाओं के बीच पत्थरों के टक्राने की गूंज ने पाताल लोक के महाभुकंप की भयाभता को और अधिक बढ़ा
02:16दिया, जिससे धरातल कापने लगा।
02:19आगे बढ़ने के लिए कार्तिके को क्रिमिभोजन के उस दल्दली क्षेत्र से गुजरना था जहां नियोनहरी उर्जा के कीडे सतह
02:27पर तैर रहे थे।
02:29भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से पाताल की इस विशाक्त संरचना को देखा और गरुर को निर्देश दिया कि वे
02:37कार्तिके के मार्ग को शुद्ध रखें।
02:40कार्तिके के पग रखते ही दल्दली कीडे बिखरने लगे, जैसे वे किसी दिव्यशक्ती के तेज को सहन करने में पूर्णत्ह
02:48असमर्थ हों।
02:49यह दल्दल वास्तव में पाताल का एक समवेदनशील तंत्रिका केंद्र था, जो उपर की हल्चल का संकेत गहराई तक पहुचा
02:58रहा था।
02:59अचानक अयहपान के विशाल कांस्य के कड़ाहे, जिनमें गर्म धातु उबल रही थी, कार्तिके के सामने एक अवरोध बनकर उभे।
03:10देवसे नापती ने अपनी दाहिनी हथेली उठाई और उस तप्ध धातु की गर्मी को अपने सुरक्षाकवच के माध्यम से ही
03:18अवशोषित कर लिया।
03:20उनका कवच अब सूर्य की भांती चमक रहा था, क्योंकि वह पाताल की समस्त विशैली उर्जा को सोख कर उसे
03:28शुद्ध दिव्य प्रकाश में बदल रहा था।
03:31कार्तिके ने जान लिया था कि महाभुकंप कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बलकि कालचकर का एक नियोजत विध्वन्स है, जिसे रोकना
03:40ही अब उनका परमधर्म है।
03:44कार्तिके ने जैसे ही उस विशाल क्रिष्टलिय कक्ष में प्रवेश किया, नीलम की दीवारों से टकराती हुई गूंज ने उन्हें
03:51पाताल के उस रहस्य में तंत्र की ओर आकर्शित किया।
03:55दिव्य जोती का प्रतीक धारन किये हुए कार्तिके ने उस विशाल धातु के चक्र को देखा, जो धर्ती की स्थिर्ता
04:03को थामने वाले महाकाल चक्र का मुख्य आधार प्रतीत हो रहा था।
04:08जैसे ही उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया, एक गगन भेदी गर्जना के साथ वह भारी चक्र धीरे-धीरे घूमने लगा
04:17और पूरे पाताल में एक तीवर कमपन उत्पन हो गया।
04:21चक्र के घूमने के साथ ही दीवारों के पार छिपी हुई पाताल की गहरी दरारों से एक भयावा लाल प्रकाश
04:28निकलने लगा, जो विनाश के संकेट को स्पष्ट कर रहा था।
04:33कार्तिके ने अनुभव किया कि यह चक्र केवल एक यंत्र नहीं, बलकि ब्रह्मांड के संतुलन को नियंत्रित करने वाली एक
04:41आदिम कालधुरी है, जिसे कोई दुष्ट शक्ती बाधित कर रही है।
04:47तभी उस विशाल चक्र के पीछे से अंधकार की एक विक्राल आकरिती उभवी, जिसके हाथ में लोहदंड था और जो
04:55कालचक्र की गती को अवरुध कर रही थी।
04:59देवसे नाप्ती ने अपनी आखे मूंदी और दिव्यद्रिष्टी से उस अशुद्ध उर्जा को पढ़ना शुरू किया जो इस यंत्र की
05:06धुरी को जंद की तरहे खा रही थी।
05:09चारो ओर की चट्टाने कामपने लगी और छट से क्रिस्टल के टुकडे गिरने लगे जैसे स्वयन पाताल लोग इस अंचाहे
05:17संधर्ष के भार से कराह उठा हो।
05:21कार्तिके ने गरस्ते हुए कहा कि जिस काल चकर को विधी ने रचित किया है उसे किसी असुर की क्षुद्र
05:28महत्वा कांख्षा के लिए रोकना असंभव है।
05:32उस विशाल चकर के घुमने की गती अचानक बढ़ गई और उसने कार्तिके के सुरक्षाक्वच के साथ एक तीवर घर्षन
05:40उत्पन कर दिया।
05:42अंधकार से उपजीव अशुद्ध उर्जा अब एक काले धुएं के रूप में पूरे कक्ष में ठैल गई जिससे कार्तिके की
05:50द्रिष्टी भी धुंधली होने लगी।
05:52तभी कार्तिके ने अपने वेल, वेल को जमीन पर पठका और उस कमपन के माध्यम से ही काल चक्र की
05:59गती को स्थिर करने का प्रयास किया।
06:03जैसे ही उनका अस्त्र भूमी से टक्राया, पाताल की दीवारों पर अनकित प्राचीन वैदिक मंत्र चमक उठे और चक्र की
06:11गती धीमी होने लगी.
06:13विनाश का वह महाभुकम प्रुप गया, लेकिन अब उस यंत्र के बीचों बीच एक नई और भयंकर रहस्य में दरार
06:21उभराई.
06:23कार्तिकेय ने देखा कि वह दरार केवल यंत्र की क्षती नहीं, बलकि कालचकर का वह दूसरा भयावह रहस्य है, जिसे
06:31देवताओं से भी गुप्त रखा गया था.
06:34अचानक उस दरार से एक ठंडी और भयावह आवाज निकली, जो किसी मृत सभयता का विलाप प्रतीत हो रही थी.
06:43कार्तिके ने सावधानी पूर्वक आगे कदम बढ़ाया, यह जानते हुए कि इस रहस्य को खोलने का अर्थ होगा स्वयन व्रत्यू
06:51के साथ समबाद करना.
06:53उस दरार के भीतर से एक प्राचीन मनी प्रकट हुई, जो पाताल लोग की समस्थ कालगती का साक्ष्य थी और
07:01अब वह उनके समक्ष थी.
07:04मनी के निकलते ही वह विशाल चक्र रुख गया और पूरे पाताल में एक क्षन के लिए सननाटा चा गया.
07:12देवसे नापती समझ गये थे कि यह मनी मात्र एक वस्तु नहीं, बलकि भविश्य की उन अंगिनक धटनाओं का मान्चित्र
07:20है, जिन्हें रोकना अब उनका एक मात्र लक्ष है.
07:25पाताल लोक के गहरे अंधकार में उस प्राचीन मनी की आभासे एक दिव्य प्रकाश पुंज निकला, जिसने वहां की भूगर्भिय
07:33सनरचनाओं को प्रकाशित कर दिया.
07:36भगवान विश्णु अपनी योगनिद्रा में भी इस कमपन को अनुभव कर रहे थे और उनकी भुजाएं स्वतही उस उर्जा के
07:44प्रवाह को दिशा देने लगी.
07:47कार्तिकेय ने अपने त्रिशूल से उस मनी को स्पर्श किया, जिसके संपर्क में आते ही मनी से उर्जा की एक
07:54नीली रेखा पाताल की दिवारों के पार निकल गई.
07:58उस उर्जा ने पूरे पाताल में एक ऐसी प्रतिध्वनी पैदा की, मानो काल्चक्र के पहिये स्वयन अतीत के रहसियों को
08:06उगलने के लिए विवश हो रहे हूं.
08:09मनी की चमक से उत्पन्न हुआ यह मानचित्र दीवारों पर उभरते हुए उन गुप्त रास्तों को प्रदर्शित करने लगा, जो
08:17सीधे पाताल की गहराई में छिपे दूसरे टुकडे की ओर जाते थे.
08:22शिव के गणों की एक दिव्यद्रिष्टी उन रास्तों का पीछा कर रही थी, क्योंकि उन्हें पता था कि यदि ये
08:29मार्ग खुल गए तो काल के समस्त नियम अस्तव्यस्त हो जाएंगे.
08:34कार्तिकेय ने उस उर्जा के प्रवाह के साथ चलते हुए अपने दिव्यतेज से उन चट्टानों को पिघलाया जो उस मार्ग
08:41को अवरुध कर रही थी.
08:44अंधेरी गलियों में गूंजती वह प्रतिध्वनी अब एक भयानक गर्जना में बदल चुकी थी, जो पाताल के निवासियों को सचेत
08:52कर रही थी.
08:54अचानक मनी ने एक तीवर स्पंदन किया, जिसने कार्तिकेय के सम्मुख एक त्रिकोनिय द्वार का आभासी द्वार खोल दिया.
09:04देवसेनाप्ती के नेत्रों में वह संकल्प स्पष्ट था, क्योंकि वे जान चुके थे कि कालचकर का यह दूसरा रहस्य किसी
09:11विनाश का नहीं, बलकि निर्मान का आधार है.
09:16द्वार के दूसरी ओर से एक दिव्य संगीत की गूँच सुनाई दी, जो पाताल की भीशन अगनी को शांत करने
09:23की क्षमता रखती थी.
09:25उस संगीत की प्रतिध्वनी से संपून पाताल लोक्ट एक क्षन के लिए जम गया, जैसे काल का प्रवाही रुप गया
09:33हो.
09:34कार्तिके आगे बढ़े, उनके चर्णों के स्पर्ष मात्र से पाताल की तपती भूमी ठंडी होने लगी और वहां कमल के
09:42पुष्प खिल उठे.
09:44वह दिव्यमनी अब कार्तिके के हाथ में एक नक्षत्र की भांती चमक रही थी, जो उन्हें दूसरे खंड की और
09:51निरंतर निर्देशित कर रही थी.
09:54रास्ते में उन्हें कई प्राचीन शिलाय मिली जिन पर उस दूसरे टुकडे का इतिहास अनकित था, जिसे पढ़कर वे विचलित
10:02हो उठे.
10:04वह इतिहास केवल एक घटना नहीं, बलकि आने वाले युगों के महाविनाश की एक चेतावनी थी, जिसे केवल वे ही
10:12समझ सकते थे.
10:14कार्तिके ने पुनह अपने त्रिशूल से मनी को अभिमंत्रित किया, जिससे पाताल की दीवारों से अग्रिश्य द्वार और भी स्पष्ट
10:22हो गए.
10:24उस द्वार के भीतर से एक शीतल पवन का जोंका आया, जिसने पाताल की घुटन भरी गर्मी को पूरी तरह
10:31समाप्थ कर दिया.
10:33देवसेनाप्ती समझ गए कि वे अब उस पवित्र स्थान के निकट पहुंच चुके हैं, जहां दूसरा आर्टिफैक्ट कालदंड सुरक्षित रखा
10:41गया था.
10:43पाताल की गहरायों में छिपी यह चुनौती अब एक महा प्रिवर्तन का द्वार बनने जा रही थी, जिसे रोकने या
10:50अपनाने का चुनाव स्वयंकाल के स्वामी पर निर्भर था.
10:55पाताल के अंधकार को चीरते हुए कार्टिकेय ने देखा कि एक विशाल ओबसीडियन शिलापर प्राचीन सर्पयोध्धा का विराच शरीर पत्थर
11:04की तरहे जमा हुआ है.
11:07भगवान कार्टिकेय ने अपने मयूरवाहन से उतर कर उस स्थिर योध्धा की ओर देखा, जिसकी आखों में युगों की थकान
11:15और यंत्रवत व्यवस्था का बोज स्पष्ट था.
11:19अचानक उस सर्पयोध्धा ने अपनी जक्डी हुई भुजाओं को हिलाया, जिससे पाताल की शिलाओं में एक भयानक कमपन उत्पन हो
11:27गया.
11:28उस योध्धा की देह से निकलती धूल और राख ने पूरे वातावर्ण को एक भस्मद्रिश में बदल दिया, जैसे कोई
11:36प्राचीन कयामत अभी भी वहीं रुकी हो.
11:39वह सर्पयोध्धा अपनी गर्जना भरी वानी में बोला, है देवसे नाप्ती, जिस कालदंड को तुम खोज रहे हो, वह केवल
11:47एक अस्त्र नहीं, बलकि इस पाताल की धुरी है.
11:52कार्तिकेय ने गंभीर्ता से उत्तर दिया, कि धर्म की रक्षा के लिए वे कालचक्र की हर जरजर कड़ी को पुनरजीवित
12:00करने के संकर्प के साथ यहां आए हैं.
12:04योध्धा ने चेतावनी दी की यह विनाशकारी स्थिती ही प्रिथवी के संतुलन को थामे हुए हैं, और इसे बदलना महाविनाश
12:12को आमंतरन देना होगा.
12:15काल के इस रहस्य को सुनकर कार्तिके के तेज से एक दिव्य प्रकाश फूटा, जिसने पाताल के गहन अंधेरे को
12:22क्षण भर के लिए स्वर्ण में बना दिया.
12:26वो सर्पयोध्धा अब फुफकारते हुए आगे बढ़ा, जैसे कोई जलती हुई मशाल काल के अंधकार में भटक रही हो.
12:35कार्तिके ने अपने हाथ में स्थित कलाकृती के स्पंदन को महसूस किया, जो उस योध्धा के शरीर में प्रवाहित उर्जा
12:42के साथ तालमिल बिठाने लगी.
12:45उस योध्धा की त्वचा से रिस्ता विश पाताल की भूमी पर गिरते ही अगनी की लप्टों में बदल गया, जिससे
12:52वहां का तापमान सहसा बढ़ गया.
12:55चारों और खड़ी पाताल की शिलाएं उस योध्धा के आक्रोश के साथ कामपने लगी, जैसे वे योगोबाद किसी हलचल का
13:03अनुभव कर रही हो.
13:06सर्पयोध्धा ने पुकार लगाई, तुम जिसे सुधार कह रहे हो, वह वास्तव में इस स्रिष्टी का अंत करने वाला महाभुकंप
13:14है.
13:15देवसे नाप्ती मुस्कुराएं और उन्होंने अपनी दिव्यद्रिष्टी से देखा कि विनाश के भीतर ही स्रिजन के बीज छिपे होते हैं.
13:25उनका मयूरवाहन एक पंक फड़फडाते ही पूरे कक्ष में स्वर्णिम आभा बिखेर गया, जिसने उस योध्धा के क्रोध को कुछ
13:33समय के लिए शांत कर दिया.
13:35यह वह क्षन था जहां पाताल की स्थिर्ता और काल्चक्र की गती एक दूसरे के आमने सामने आकर ठहर गए.
13:44सर्पयोध्धा ने अपना शीष जुकाया, जैसे वह किसी परम शक्ती के आने की आहट को पहचान गया हो.
13:52तभी पाताल के उस कक्ष के मध्य से कालदंड की गूंच सुनाई दी, जो किसी मृतप्राय हृदय के पुनरजीवित होने
13:59के समान थी.
14:02कार्तिकेय ने अपने कदम उस दंड की ओर बढ़ाए, और उनके हर पक के साथ धर्ती की परतों में एक
14:08दिव्यस पंदन होने लगा.
14:21कालदंड के स्पर्ष से निकली उर्जा की लहरों ने पाताल के उस कक्ष में स्थित अयाहपाना के तप्तकां से पात्रों
14:28को तीवर गती से घुमाना आरंभ कर दिया.
14:32अचानक अंधकार से उभे एक विशालकाय सनरक्षक ने, जिसके हाथ में रक्तवर्ण का त्रिशूल था, कार्तिके को चेताबनी देते हुए
14:40गर्जना की.
14:43कार्तिके ने अपने शक्ती अस्त्र को बिना चलाये ही, केवल अपनी दिव्यद्रिश्टी से सनरक्षक के प्रहारों को एक अद्रिश्य घेरे
14:51में समेट लिया.
14:52वह भयानक गर्जना पाताल की दीवारों से टक्रा कर एक संगीत में बदल गई, मानो कालचकर स्वया अपने अस्तित्व की
15:01रक्षा का गीत गा रहा हो.
15:04संरक्षक ने तप्त लौह के चिंटों से प्रहार किया, किंतु कार्थिके के कुशल कौशल ने बिना किसी हिंसा के उन
15:11प्रहारों की दिशा को मोर दिया.
15:14कार्थिके की शांत मुद्रा को देख कर संरक्षक की क्रोधित आखों में एक विस्मय का भाव उभ्रा जो उसके दैत्यत्व
15:21को कम करने लगा था
15:24रणनीती के अगले चरण में कार्थिके ने अपने पद संचालन से कक्ष के आधार को स्थिर किया ताकि पाताल की
15:32नीम फिर से न डग्मगाए
15:34काल्चक्र की गूंज अब एक मंध स्पंदन बनकर वातावर्ण में समा गई थी जैसे ब्रहमांड स्वयं किसी बड़े निर्नय की
15:42प्रतीक्षा कर रहा हो
15:45अयापाना की तप्त ज्वालाए अब एक गोलाकार रूप लेने लगी थी जो कार्थिके के दिव्य घेरे के साथ तालमिल बिठा
15:53रही थी
15:54संरक्षक ने अपनी घातक चिम्टों को नीचे गिरा दिया और कार्थिके के समक्ष नत्मस्तक होकर उस गुप मार्ग का संकेत
16:02दिया
16:04कार्थिके ने अपनी स्वन आभा से उस मार्ग के अंधेरे को चीर दिया जहां युगों से कोई सूर्य की किरण
16:11नहीं पहुँची थी
16:13वह गुप मार्ग पाताल की परतों के नीचे एक ऐसे शूने की ओर जाता था जिसे कालचकर ने स्वयन निर्मित
16:21किया था
16:23सरक्षक की आखों से अब ईश्या का भाव लुप्थ हो चुका था और वह कार्थिके के मार्ग गर्षन में एक
16:29सहयोगी की भाती खड़ा हो गया
16:33वातावर्ण में एक दिव्य संगीत की प्रतिध्वनी हुई जो कालचकर की गती के साथ साथ धीमी और तीवर हो रही
16:40थी
16:42कार्थिके ने धैर्यपूर्वक उस संगीत को समझा और पाया की यह पाताल के भीतर छिपे एक प्राचीन रहस्य की कुण्जी
16:50है
16:52अयाहपाना की तप्त अगनी अब कार्थिके के इर्दगिर्द एक सुरक्षा कवच की भाती घूम रही थी जो उन्हें पाताल के
16:59दबाव से बचा रही थी
17:02जैसे ही उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया काल्चक्र का वह भयावर रहस्य एक दरपन की तरहे चमक उठा जिसमें इतिहास
17:11की परचाया दिखने लगी
17:13वह रहस्य कोई शस्त्र नहीं बलकि काल की वह धारा थी जो भूत और भविश्य के बीच संतुलन बनाये रखती
17:21है
17:23कार्तिके ने उस धारा को अपने नियंत्रण में लेने के लिए हथेली का सहारा लिया जिससे पूरा पाताल लोग एक
17:30क्षण के लिए ठहर गया
17:32उस थेरे हुएक्षण में कार्तिके ने वह देख लिया जिसके लिए वे पाताल की इतनी गहराईयों में उत्रे थे
17:41कार्तिके की हथेली के दबाव से पाताल की चट्टानों में एक विक्राल दरार पड़ गई जिससे आदिन गैसों का भयावा
17:49प्रवाह बाहर निकलने लगा
17:52भगवान कार्तिके ने अनुभव किया कि यह गुफा कोई साधारन स्थान नहीं बलकि एक विशाल जलराशी को थामे रखने वाली
18:00दैविय मुहर है
18:03दरार के भीतर से एक रहस्यमई गर्जना सुनाई दी जैसे की कोई भूखा सागर सदियों की कैद से आजाद होने
18:11के लिए छटपटा रहा हो
18:12उस भयावह सन्नाटे के बीच कार्तिकेय ने अपने विलायुद को कसकर पकड़ा जो अब कालचकर के बिगड़ते संतुलन के साथ
18:22प्रतिध्वनित हो रहा था
18:24पाताल की नीवं काम्प उठी और चारों और पत्थर के बड़े बड़े शिलाखंड गिरने लगे जैसे कोई विशालकाई जीव करवट
18:32बदल रहा हो
18:34स्वया भगवान विश्णु ने वैकुंठ में इस हल्चल को भाम्प लिया और उनकी द्रिष्टी सीधे पाताल की उस गहराई में
18:42जाटी की
18:44कार्तिकेय ने अपनी दैविय शक्ती का संचार उस दरार में किया ताकि महासागर के उस प्रलेकारी वेक को कुछ क्षणों
18:52के लिए रोका जा सके
18:54अंधेरी गुफा में काल की गूंच सुनाई देने लगी जैसे समय खुद अपनी धुरी से फिसल कर किसी अंजाने भविश्य
19:02की ओर बढ़ रहा हो
19:04शिलाओं के भीतर से अजीबो ग्रीब आकृतिया उभरने लगी जो सदियों से इस प्रलेकी रखवाली कर रही थी
19:13कार्तिकेय ने देखा कि वे कोई साधारन राक्षस नहीं बल्कि पाताल की गहराईयों में जमी हुई कालसंबाहक मूर्तिया थी
19:22तभी एक शिलाखंड तूटकर कार्तिकेय के समीप आगिरा जिससे उठी धूल ने उनके चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्माण
19:31कर दिया
19:32पाताल की वह नीवं अब चटक चुकी थी और वहां से बहता हुआ काला जल धीरे-धीरे धरातल की और
19:39बढ़ने लगा था
19:41भगवान कार्तिकेय जानते थे कि यदि यह जल प्रलय के रूप में निकला तो तीनों लोकों का अस्तित्व खत्रे में
19:48पढ़ जाएगा
19:50गरुर देव ने दूर से इस आपदा का आभास पाकर अपनी पंखों की गड़-गड़ा हट से पाताल के वातावर्ण
19:57को जख जोर दिया
20:00गरुर की उपस्थिती मात्र से वह काला जल कुछ क्षण के लिए थम गया
20:04मानों वह दिव्य प्रकाश के तेश को सह न पा रहा हो
20:09कार्तिके ने स्थिती की गंभीरता को देखते हुए अपनी दिव्य उर्जा को उस जल को जमने के निर्देश दिये
20:17पूरे पाताल लोक में एक कमकमपी दोड़ गई और वह दरार धीरे-धीरे कार्तिके के संकल्प से भरनी शुरू हो
20:24गई
20:26सन्नाटा इतना गहरा था कि कार्तिके को कालचकर के रुकने की धड़कने भी स्पष्ट सुनाई देने लगी
20:33वे अब जान चुके थे कि यह मशीन केवल एक संतुलन यंत्र नहीं, बलकि स्रिजन और प्रलय के बीच का
20:41एक द्वार है
20:43दरार बंध होते ही कार्तिके को आभास हुआ कि उनकी यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव अभी शुरू होना बाकी है
20:52पाताल की गहरायों में व्याप्त रौरव नरक की अगनी कार्तिके के चारों और एक ज्वाला मुख्ये घेरा बना रही थी
21:01देवसे नाप्ती कार्तिके ने अपने दिव्यत रिशूल शक्ती का आहवान किया, जिसका प्रकाश पूरे अंधकार को चीरने लगा
21:10उन्होंने अपनी हथेलियों को पाताल की कमपकमपाती धर्ती पर रखा, ताकि कमपन की लहरों को सीधे अपने भीतर समाहित कर
21:18सकें
21:20महान रौरव के स्टम्ड इस उर्जा के दबाव से कामपने लगे, जैसे कोई प्राचीन दानव अपनी बेडिया तोड रहा हो
21:29कार्तिकेय ने अपनी आखें बंद कर ली और ध्यान की वह अवस्था धारन की जिससे समय की धाराभी स्थिर हो
21:36जाती है
21:38भगवान विश्नु ने वैकुंट से अपनी योगमाया के माध्यम से कार्तिकेय को उस उर्जा को संतुलित करने का संकेत दिया
21:47जैसे ही उन्होंने मंत्रोच चारण शुरू किया त्रिशूल से निकली तरंगे कमपन की तीवरता को कम करने लगी
21:55अगनी की लप्टें जो अब तक विनाशकारी थी अब शान्त होकर कार्तिकेय के चर्णों में समर्पित हो रही थी
22:04पाताल की पर्तों में फंसी प्राचीन उर्जा एक विशाल नाग की तरह सिमटने लगी जो अब कार्तिके के नियंत्रण में
22:12थी
22:13देवों के सेनापती की मुखाकरती पर कोई तनाव नहीं बलकी एक दिव्य शान्ती का वास्था
22:21उनकी उंगलियों से निकले प्रकाश ने प्रित्वी की दरारों को जैसे स्वर्ण से भर दिया हो
22:27यह संतुलन केवल धर्ती का नहीं बलकी पाताल की गहरी उर्जाओं का भी पुनरगठन था
22:35रौरव की भयानक गर्जना अब एक मधुर संगीत में बदलने लगी थी, जैसे ब्रहमांड का कोई प्राचीन मंत्र गूज रहा
22:43हो
22:44भगवान शिव ने कैलाश से इस घटना का अनुभव करते हुए मुस्कुरा कर अपनी तीसरी आख की चमक को नियंत्रित
22:51किया
22:53कार्टिकेय ने अपने त्रिशूल को धर्ती में गाड़ कर उस धिर उर्जा को पाताल के आधारभूत स्तंभ से जोर दिया
23:01इस प्रक्रिया ने उस विनाषकारी यंत्र की गती को पूर्णता शिथिल कर दिया था
23:07अब केवल कार्तिके के हरिदय की धड़कन ही उस शांत गुफा में एक मात्र धोनी बची थी
23:14काल चक्र का वह भयावह रहस्य जिसे देख पाना भी कठिन था अब कार्तिके के सामने स्पष्ट था
23:23उन्होंने समझ लिया कि प्रलय का यह चक्र बाहरी नहीं बलकि भीतर की शक्तियों का असंतुलन है
23:31अंधकार के सामराज्ज में अब कार्तिके के तेज ने एक नए सवेरे की नीम रख दी थी
23:38पाताल की उन गहन कंदराओं के भीतर जहां कालचकर का गियर एक विशाल प्रल्यंकारी मशीन की भांती घूम रहा था
23:45कार्तिके ने अपने पच्चहनों से उस यांत्रिक उर्जा को थाम लिया
23:51महान रक्षक ने कापते हुए स्वर में बताया कि दूसरा रहस्य मशीन के केंदर में जड़ित है
23:57जिसे निकाल पाना अगनी में हाथ डालने जैसा कठिन था
24:02कार्तिके ने अपने त्रिशूल से मशीन की बाहरी परतों को सावधानी पूर्वक छूना आरंभ किया
24:08मानो किसी जीवित शरीर की शल्य चिकित्सा कर रहे हूँ
24:13चारू और व्याप्त सन्नाटा कालचकर की गूंच से भर गया
24:17जहां प्रत्येक धातूई टकराहट एक नए भुकंप की चेतावनी दे रही थी
24:23मशीन की गती धीमी पड़ते ही कार्तिकेय को वह सुक्ष्म सिजल प्रतीक दिखाई दिया
24:29जो एक धधकते हुए अंगारे की भानती भीतर छिपा था
24:33रक्षक ने चेतावनी दी की यदि एक भी गियर गलत दिशा में घूमा
24:38तो पाताल का यह संपूर्ण धाचा ढह जाएगा और साथ ही ब्रह्मान का संतुलन भी
24:45कार्तिकेय ने अपने मानसिक संकल्प का उप्योग करते हुए
24:49मशीन के भारी धक्कन को धीरे-धीरे अपनी उर्जा से उपर उठाया
24:54अचानक मशीन के भीतर से काल की गूँच सुनाई दी
24:58मानो कोई अद्रिश्य शक्ती उसे रोकने के लिए जाग उठी हो
25:03सत्य के उस प्रतीक को पाने के लिए कार्तिकेय को उन घूमते हुए
25:08वजर्दंतों के बीच से अपना हाथ डालना था
25:11जहां काल की धाराएं रुख जाती थी
25:14रक्षक ने अपना दिव्या हाथ उठाकर कार्तिकेय को सुरक्षा कवच प्रदान किया
25:20ताकि वह काल्चकर के प्रभाव से सुरक्षित रह सके
25:24कार्तिकेय के अंगुलियों ने जैसे ही उस द्वितिय सिजिल को छुआ
25:28संपूर्ण पाताल लोक एक क्षण के लिए स्थिर हो गया
25:33वह प्रतीक नहीं था बलकि साक्षात समय का एक अंश था
25:37जिसे काल्चकर ने सदियों से अपनी कैद में रखा था
25:42कार्तिकेय के तेज से मशीन की जक्रन धीली पड़ने लगी
25:46और वह धधकती अगनी जो अब तक विनाश का कारण थी अब शान्थ हो गई
25:52रक्षक ने नत्मस्तक होकर उस देवपुत्र के साहस को नमन किया
25:57जिसने असंभव को भी संभव कर दिखाया था
26:01अंधकार का सामराज्य अब एक नई उर्जा के साथ स्पंदित हो रहा था
26:06जहां दूसरा सिजल प्राप्थ होते ही ब्रहमांड का अगला सूत्र स्पष्ट हो गया
26:12मशीन के अंदर का वह काला कोटर अब खाली था
26:15जैसे किसी गहरी बीमारी से शरीर को मुक्ती मिल गई हो
26:20कार्तिकेय ने उस सिजल को अपने वक्षस्थल पर धारन किया
26:24जिससे उनका तेज और अधिक बढ़ गया
26:28कालचकर की वह भयावह गूंज जिसने पाताल लोग को हिला दिया था
26:33अब पूर्णता थम गई थी
26:36रक्षक ने संकेप दिया कि अगले पड़ाव के लिए मार्ग अब उनके द्वारा ही खोला जाएगा
26:42क्योंकि कार्तिकेय ने अपना दायत्व पूरा कर लिया है
26:47कार्तिकेय ने एक गहरी सांस ली और उस काल के रहस्य को अपने भीतर समेटते हुए
26:53आगे के अज्यात सफर के लिए प्रस्थान किया
26:57कार्तिकेय अब पाताल लोग के उस गहरे रहस्य में कक्ष में खड़े थे
27:01जहां कालचकर के प्राचीन गियर्स धीनी गती से आपस में घर्शन कर रहे थे
27:07उनके समक्ष भगवान विश्नु प्रकट हुए
27:10जिनकी शांत और गंभीर मुद्रा ने उस भारी वातावर्ण में एक दिव्य संतुलन स्थापित कर दिया था
27:18कालचकर की प्रत्येक धड़कन के साथ प्रित्वी के धरातल पर आने वाले भुकम्पों की तीवर्ता का आभास स्वयंकार्तिके के हृदय
27:26को विदीन कर रहा था
27:29चारों और फैले उस रौदर पाताल के अंधकार में कालचकर की चमक एक जलते हुए सूर्य की भांती उस स्थान
27:36को प्रकाशित कर रही थी
27:39कार्तिके ने प्रश्न किया कि क्या इस समय गती को थाम देना वास्तव में स्रिष्टी के प्राकृतिक विकास के लिए
27:46उचित है या यह केवल एक ध्रम है
27:51भगवान विश्नु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ कहा कि प्रकृती का हर घाव स्वयं को भरने का साहस रखता
27:58है यदि उसे समय दिया जाए
28:01कार्तिके की द्रिष्टी उस विशाल तंत्रपर्टी की थी जिसका एक छोटा सा बदलाव भी उपर बसी मानव सभ्यता के इतिहास
28:10को बदल सकता था
28:12अंधकार के उस विशाल विस्तार में कार्तिके की देह की कांती काल के उस कठोर सत्य को चुनौती देने हेतु
28:19ततपर दिखाई दे रही थी
28:22प्रित्वी की हलचल को रोकने का अर्थ था स्वयंकाल के प्राकृतिक चक्र को विवश करना जो की एक अत्यंत भयानक
28:30जोखिम था
28:32भगवान विश्नु के संकेत पर गरुड की उपस्थिती का एक दिव्य आभास पूरे पाताल लोक में फैल गया जैसे बायु
28:40का वेग स्थिर हो गया हो
28:42कार्थिकेय ने अपने भीतर के उस युद्ध को अनुभव किया जहां एक तरफ करुणा का भाव था और दूसरी तरफ
28:50ब्रहमांडिय नियमों की कठोरता
28:51उस पाताल लोक के स्तंभों में समाहित प्राचीन उर्जा अब कार्थिकेय के निर्णै की प्रतीक्षा में जैसे थमसी गई थी
29:02यदि कार्थिकेय हस्तक शेप करते हैं तो वे भविश्य को बचा तो लेंगे परंतु मानवता अपनी उस शक्ती को खोदेगी
29:10जिसे केवल संकट के समय ही पाया जा सकता है
29:14भगवान विश्णू ने समरण कराया कि काल चक्र का निर्मान ही इस प्रकार हुआ है कि वह प्रत्येक विनाश को
29:21एक नए निर्मान की नीम्व बना सके
29:25कार्तिके का हाथ धीरे-धीरे उस मुख्य नियंत्रक चक्र की ओर बढ़ा जो प्रित्वी के भुकम्पिय वेग को नियंत्रित करने
29:33वाली चाबी था
29:34एक च्षण के लिए पूरा पाताल लोग काम्प उठा जैसे स्वयंकाल भगवान इस निर्नाय की गंभीरता को भांप गए हो
29:44कार्तिके ने अपनी इंद्रियों को शूने में विलीन किया ताकि वे प्रकृती की उस मौन पुकार को सुन सके जो
29:51शब्दों से परे थी
29:53उस गेहन ध्यान में उन्हें काल के उन्चिपे हुए रहसियों का बोध हुआ जो किसी भी शास्त्र में वर्नित नहीं
30:00थे
30:02स्रिष्टी का भविष्य अब एक पतली दोर पर टिका था, जिसे कार्तिके को या तो थामना था या फिर उसे
30:09अपने स्वाभाविक अंत तक जाने देना था
30:12अंतिमक्षण में उन्होंने अपनी भुजाएं पीछे खीच ली और कालचक्र को उसके नियत मार्ग पर छोड़ दिया, क्योंकि प्रकृती का
30:21न्याय ही सर्वोच था
30:23पाताल की गहरायों में कार्तिके के समीप वाली विशाल शिला अचानक चर्मराने लगी जैसे ब्रहमांड का संतुलन दग्मगा रहा हो
30:33भगवान शिव अपनी कैलाश की ध्यान मुद्रा से बाहर आये, उनकी तीसरी आख से निकलने वाली अग्नी ने ब्रहमांड के
30:41उस गुप द्वार की ओर इशारा किया
30:44पत्थर की दरारों से नीले प्रकाश का एक प्रचंड जल प्रपात फूट पड़ा, जो पाताल की खामोश गहराईयों को एक
30:52क्षण में हलचल से भर गया
30:55कालचक्र की भयावह गूंच के बीच कार्तिकेय के चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्मान हुआ, जिसने उन्हें उस रहस्यमई
31:03बाढ के दबाव से बचाया
31:06कार्तिकेय ने देखा कि वह नीला जल सामान्य नहीं, बलकि समय की बिखरी हुई स्मृतियों का एक घातक प्रवाह था
31:14भगवान विश्णू ने क्षीर सागर के अनंत शयन से उठते हुए अपनी द्रिष्टी पाताल की उस उथल पुथल पर केंद्रित
31:22की
31:23प्रचंड लहरें कार्तिकेय की ओर ऐसे बढ़ रही थी, जैसे वे पाताल की प्राचीन सीमाओं को मिटाने पर आमादा हो
31:32दिव्यतेज के साथ कार्तिकेय ने अपनी भुजाएं उठाई, जिससे कालचकर का दूसरा रहस्य उस जल के भीतर सुरक्षित हो गया
31:42पाताल की दीवारें पूरी तरह तूटकर जल्मगन होने लगी और वहां के प्राचीन स्तंभ अपनी नीम से उखडने लगे
31:51देवराज इंद्र ने आकाश से इस विनाश लीला को देखा और महसूस किया कि यह प्रलय किसी साधारन दैत्य का
31:58कार्य नहीं है
32:01वह नीला जल अब गुफा की छट से भी रिसने लगा था जिससे पाताल लोक एक विशाल जल समाधी में
32:08बदलने की ओर अग्रसर था
32:11अंधकार और नीले प्रकाश का वह अद्भुत संगम ऐसा लग रहा था मानो काल स्वय अपनी दिशा बदल रहा हो
32:19कार्तिकेय ने अपनी शक्ती का संचय किया जिससे उनके चारों और एक स्वर्णवले बन गया जो उस जल के वेग
32:27को थामने में सक्षम था
32:29नारद मुनी जो इस पूरी घटना को देख रहे थे के वीना के तार भी इस अलोकिक कमपन से जंकृत
32:36होकर तूट गए
32:38गुफा के भीतर के प्राचीन बोरहेडेड रक्षक अपने ठिकानों से निकल कर उस जल के प्रवाह को रोकने के लिए
32:45दौड पड़े
32:47जल की तीवरता इतनी अधिक थी कि पाताल की नीव के पथर भी पिघल कर अपना स्वरूप खोने लगे थे
32:55कार्तिके ने अपने नेत्र मूंद लिये और वे उस जल प्रवाह के केंद्र में स्थित कालचक्र की सुक्ष्म उर्जा के
33:02साथ एक हो गए
33:05कैलाश के हिमशिकरों पर भी अब उस जल का प्रभाव महसूस किया जा रहा था जहा ठंडी हवाएं अचानक गर्म
33:12हो उठी
33:14पाताल का यह महाभुकम्प अब केवल एक स्थान तक सीमित नहीं था बलकि वह पूरे ब्रहमांड के ढाचे को हिला
33:21रहा था
33:23जैसे ही लहरें उनके समीग पहुची कार्तिके ने अपनी उर्जा के अंतिन प्रहार से उस जल को जमने पर विवश
33:31कर दिया
33:31झाल

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