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विंध्याचल पर्वत के नीचे दबे एक प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर का द्वार खुल चुका है! भगवान कार्तिकेय अपनी दिव्य शक्तियों के साथ उस अंधेरे लोक में प्रवेश करते हैं, जहां तारकासुर की बची-खुची आसुरी शक्तियों ने एक नया मायाजाल बिछाया है। क्या यह कोई भूल भुलैया है या काल का चक्र? जानने के लिए देखिए स्कंद पुराण का यह रोमांचक अध्याय। #SkandaPurana #Kartikeya #HinduMythology #Vindhyachal #AncientSecrets #SpiritualAwakening #LordShiva #IndianMythology #Puranas
Transcript
00:00कार्तिके ने जैसे ही उस गुप्ट गुफा में कदम रखा, विंध्याचल की भूगर्भिक गहराईयों में दबी प्राचीन आसुरी उर्जाएं एक
00:08ठंडी सहरन बनकर उनके चारों और लिपट गई
00:12गुफा के भीतर कदम रखते ही सकंद के नेत्रों ने उन सुक्षम मायावी तरंगों को देखा जो अब भी तारकासुर
00:20के विनाशकारी मंत्रों की गूँच से स्पंदित हो रही थी
00:24उन्होंने अपनी शक्ती का आहवान किया जिससे उनके हाथ में स्थित शक्तिशस्त्र से निकली दिव्य आभा ने गुफा की घोर
00:32अंधकार्मई दीवारों को पहली बार प्रकाशित कर दिया
00:36गुफा की दीवारों पर उकेरी गई आकरितिया मानो जीवित हो उठीन जो एक प्राचीन कालकोठरी रौरव के भयावध द्रिश्यों को
00:45दर्शा रही थी
00:47अचानक हवा में एक भारी गड़गडाहट सुनाई दी और जमीन के भीतर से पिगले हुए कांस्य के स्रोत उभरने लगे
00:55जो अईपान नर्ग की क्रूरता को जीवन्त कर रहे थे
01:00कार्तिके ने अपनी दिव्य द्रिश्टी से उन भयंकर द्रिश्यों का अवलोकन करते हुए असुरों की उस माया को पहचान लिया
01:07जो धर्म के मार्ग को अवरुद्ध कर रही थी
01:11उनकी पच्चाप से निकलने वाली दिव्य उर्जा गुफा के फर्ष पर बिछी उस जहरीली राख को शुद्ध कर रही थी
01:18जो युगों से संचित पापों का परिणाम थी
01:22यह वह स्थान था जहां विनाश का महादवार स्थित था जिसे देख कर सकंड का मन सतर्कता और एक भीशन
01:30युद्ध की तयारी से भर गया
01:33वायो मंडल में अब एक नई गंध फैलने लगी थी जैसे कोई सड़ी हुई काष्ट और कीडों का सामरा जिक्रिमिभोजन
01:40नर्ग के रूप में यहां अस्तित्व में हो
01:44दिव्य सेनाप्ती ने अपने मस्तक को थोड़ा जुकाया मानो वे उन सभी असुरों की आत्माओं को नमन कर रहे हो
01:51जो इस मायावी कारागार में फंसकर रह गई थी
01:55उनके हाथ की हलचल ने हवा को चीरते हुए उन सुक्षम कीटों को भस्म कर दिया जो कार्तिके की आभा
02:02को दूशित करने का प्रयास कर रहे थे
02:06यह एक चेतावनी थी की विंध्याचल की यह गुफा केवल एक प्राचीन अवशेश नहीं बलकि अधर्म का एक जीवित और
02:14सक्रिय यंत्र है
02:16अंधेरी गलियारों से गुजरते हुए सकंद को उन सुरमुख वाले द्वारपालों की आहट सुनाई दी जो इस गुप्त कालकोठरी की
02:25रक्षा हेतु तैनात थे
02:28सकंद ने अपनी तलवार म्यान से निकाली जिसकी चमक ने सुक्रामुख नर्प के क्रूर रक्षकों को एक खशन के लिए
02:35अंधा कर दिया
02:37उनकी फुर्ती एक बिजली की गड़गडाहट के समान थी जिसने उन पाशान रक्षकों को खंडित कर दिया और आगे का
02:45मार्ग प्रशस्त किया
02:47अचानक वातावर्ण में एक शून्यत आछा गई जहां केवल सकंद की अपनी श्वास और हरिदय की धड़कन ही गूज रही
02:55थी
02:56दीवारों से टपकता हुआ जहरीला ग्रे स्लाइम अब स्थेर हो गया था मानो वह किसी महाशक्ती के आगमन की प्रतीक्षा
03:04कर रहा हो
03:06कार्तिकेय ने अपने नेत्र खोले उनकी पुतलियों में अब ब्रहमांडिय अगनी की ज्वालाएं नाच रही थी जो विनाश के महाद्वार
03:14को भेदने है तु तक पर थी
03:17उन्होंने अपनी शक्ती का पूर्ण विस्तार किया जिससे पूरी गुफा का आधार कामप उठा और प्राचीन द्वार के कपाट धीरे
03:25-धीरे खुलने लगे
03:28दर्वाजा खुलते ही जो सत्यसकंद के सामने आया उसने स्वर्ग और प्रित्वी की समस्त मर्यादाओं को चुनौती देने का साहस
03:36किया
03:37गुफा के भीतर कदम रखते ही दीवारों पर बैंगनी प्रकाश की लहरें डौड गई
03:43मानो कोई प्राचीन जीवित जीवजाग उठा हो
03:47कार्तिकेय ने उनहिलती हुई आकृतियों को देखा जो नकाशी से निकल कर एक अलौकिक इतिहास रच रही थी
03:56नकाशी में चितरित उन विशालकाय बोरहेडेड वार्डनों के पत्थर के शरीर में एक ध्रेनित कमपन पैदा हो गया
04:04दीवारों से टपकता हुआ रहस्यमेई पदार्थ गुफा के फर्ष पर फैल गया जो काल के चकरों की बदी को अपने
04:11भीतर समाहित किये हुए था
04:24उन्हों का कमपन बढ़ता गया और उनसे एक धीमी फुस्फुसाती हुई आवाज निकलने लगी जो सीधे आत्मा को जखजोर रही
04:32थी
04:33तभी एक विशालकाय सुवर के मुख वाला द्वारपाल चटान से पूरी तरह बाहर निकलाया जिसके हाथ में वजर के समान
04:42भारी शिलाखंड थी
04:44सकंद ने अपने हाथ से वेग से अपनी दैविय शक्ती का आहवान किया जिससे गुफा की गहराई एक सुनहरी उर्जा
04:52से नहा उठी
04:54दीवारों पर बने चित्र अब सजीव होकर कार्तिके के चारों और घूम रहे थे जैसे वे स्वय युद्ध का निमंत्रन
05:02दे रहे हूँ
05:04सन्नाटा इस कदर गहरा था कि उन दीवारों की फुस्फुसाहट अब एक गर्जना बन चुकी थी जो ब्रह्मांडिय विनाश को
05:12दोहरा रही थी
05:14कार्तिके की द्रिष्टी उस विशेश नकाशी पर टिकी जो आदिकाल के उस महाद्वार का रहस्य उजागर कर रही थी
05:22वह द्वार साधारण न था, अपितु एक महाशून्य था जिसके भीतर समय की धाराएं आपस में उलजी हुई थी
05:31गुफा के भीतर मौजूद प्रत्येक शिलाखंड सकंद की उपस्थिती में काम प्रहा था, मानो उसे अपनी मर्यादा का भान हो
05:39गया हो
05:41दीवारों पर अंकित्वे प्राचीन लिप्यक्षर, आग की तरह देहक उठे और एक एक करके हवा में तैरने लगे
05:49सकंद ने जाना कि यह कालकोठरी कोई साधारन कारागार नहीं, अपितु ब्रहमांड के उन रहस्यों का समाधिस्थल है जिन्हें भुला
05:58दिया गया था
06:00तभी दीवार से निकल कर एक काला साया कार्तिके की ओर बढ़ा, जिसकी आखें विनाश की ज्वाला से धधक रही
06:08थी
06:09कार्तिके ने अपनी शक्ती के एक अंश को प्रवाहित किया, जिससे वह साया क्षन भर में भस्म होकर धूल बन
06:16गया
06:18परंतु विनाश के उस महाद्वार के कपाट अब और तेजी से खुलने लगे थे, जिससे भयंकर गर्जना गूझ गुठी
06:26कार्तिके ने अपने नेत्रों को पूरी तरह खोल दिया, जिससे उनकी दिव्य शक्ती ने गुफा के उस अंधकार को परास्त
06:34कर दिया
06:35अब विनाश का महाद्वार सामने था और सकंद अपनी पूरी उर्जा के साथ उसके रहस्य का सामना करने के लिए
06:43तैयार खड़े थे
06:45विन्ध्याचल की उस अतिप्राचीन गुफा में जैसे ही सकंद ने कदम बढ़ाया, धर्ती के भीतर दबा अयपान का विशाल कांस्य
06:53कड़ाहा खौलने लगा
06:56कार्तिके ने अपने दैविये तेज से उस वातावर्ण को भांप लिया और उनके मुख पर एक शांत किंतु द्रेड प्रतिग्या
07:03की लकीर उभराई
07:06अचानक उनकी ही परचाईयों से निकलते हुए प्रतिचाया असुर प्रकट हुए, जो बिलकुल सकंद की तरह ही दिव्य शस्त्रधारन किये
07:14हुए थे
07:16गुफा के भीतर गुजती उस विनाशकारी प्रतिध्वनी ने जैसे संपूर्ण ब्रहमांड के उन प्राचीन नियमों को चुनोती देना शुरू कर
07:24दिया
07:26कार्तिके ने अपने वेल को हवा में लहराया, जिससे उत्पन्दिव्य प्रकाश ने गुफा की दीवारों पर जमी प्राचीन राख को
07:34उड़ा दिया
07:36प्रतिछाया असुरों ने एक साथ वार किया, लेकिन कार्तिके का कौशल उनके स्वयं के अस्तित्व से भी कहीं अधिक तीवर
07:43और सत्य था
07:46रन्भूमी बनी वह गुफा अब पूर्णतय कामपने लगी थी, क्योंकि स्कंद का हर प्रहार उन परचाईयों के अस्तित्व को मिटा
07:53रहा था
07:55अंधकार और प्रकाश का यह द्वंद्व उस महाद्वार के समीप एक पवित्र अगनी की लप्टों के समान दहकने लगा
08:14कार्तिके की गती इतनी तीवर थी कि उनकी आकरिती एक दिव्य जोती की तरह गुफा में सर्वत्र दिखाई दे रही
08:22थी
08:23प्रतिछायाएं हारने लगी थी और उनके विलीन होते शरीर से उठने वाला काला धुआ विनाश के उस महाद्वार में समाने
08:31लगा
08:33गुफा के भीतर का वातावर्ण अब और अधिक भारी हो गया क्योंकि द्वार के दूसरी ओर से अज्यात शक्तियों का
08:40दबाव महसूस होने लगा था
08:43कार्तिकेय ने अपने नेत्रों को बंद किया और गेहन ध्यान में उतर कर उस द्वार के पीछे छिपी सुक्ष्म तरंगों
08:50को महसूस किया
08:52ध्यान की उस अवस्था में उन्हें विनाश के महाद्वार पर खुदी हुई उन लिपियों का ज्ञान प्राप्थ हुआ जो काल
09:00का चक्र बदल सकती थी
09:02तभी द्वार के भीतर से एक ऐसी गर्जना सुनाई दी जिसने पूरे विन्ध्याचल परवत को जड़ से हिला कर रख
09:10दिया
09:11सकंद ने अपनी गदाधारन की और उस द्वार की ओर बढ़े जैसे कोई योध्धा स्वयंकाल के विरुध युध के लिए
09:19निकल पड़ा हो
09:21विनाश का वह द्वार अब धीरे धीरे अपने कपाट खोल रहा था, जिससे बाहर की ओर असीम शूनी का आभास
09:29हो रहा था
09:31कार्तिके ये जानते थे कि यदि यह द्वार पूरी तरहा खुल गया, तो स्रिष्टी का संतुलन नश्ठ हो जाएगा
09:38उन्होंने अपनी पूरी शक्ती एकत्र की और अपने दिव्य अस्त्र को उस द्वार की ओर अचुक निशाना साध कर तान
09:46दिया
09:47जैसे ही उन्होंने प्रहार किया, गुफा प्रकाश से भर गई और विनाश का वह महादवार एक भयंकर विस्पोट के साथ
09:55बंध होने लगा
09:58विस्पोट के प्रचन जटकों के बीच कार्तिकेय ने देखा कि द्वार के चारों और लगे प्राचीन रिशियों के योगिक बंधन
10:05धूल की तरह बिखर रहे थे
10:08भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा से जाग कर सुदूर क्षितिज से इस अस्थिर्ता को महसूस किया और कार्तिकेय की
10:16सुरक्षा के लिए अपनी दिव्यद्रिष्टी केंद्रित की
10:20कार्तिकेय ने अपने वेलायुद को कसकर पकड़ा और उन तूटी हुई योगिक सीलों से रिस रही कालिख को वापस धकेलने
10:28का प्रयास किया
10:30हवा में तैरते हुए प्राचीन मंत्र अब धीरे-धीरे धूमिल होकर शून्यता में विलीन होने लगे जिससे वातावर्ण का भार
10:38असहनिय हो गया
10:40कार्तिके के चारों ओर की चट्टाने हिलने लगी जैसे वे इस महा विनाश के दबाव को और अधिक सहने में
10:47असमर्थ थी
10:49तभी देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा ताकि स्रिष्टी में उस गुप्ट विनाश की ध्वनी को फैलने
10:57से रोका जा सके
10:59कार्तिके के प्रहार से उत्पन्न उर्जा की लहरें उस प्राचीन गुफा की पर्तों को भेदती हुई गहराई में उतर गई
11:07गुफा के भीतर एक अद्रिश्य उर्जा चक्र घूमने लगा जो उन तूटे हुए योगिक बंधनों को फिर से जोडने की
11:15कोशिश कर रहा था
11:17कार्तिके ने अपनी एक आगरता भंग नहीं होने दी वे जानते थे कि एक छोटी सी चूप पूरे ब्रहमांड के
11:24लिए घातक हो सकती है
11:27भगवान शिव ने कैलाश से अपनी तीसरी आख खोल दी जिससे उस अंधेरी गुफा में एक दिव्य प्रकाश की किरणजा
11:35पहुँची
11:37दिव्य जोती के स्पर्श से वे प्राचीन योगिक शिलाएं फिर से चमकने लगी और उन पर अनकित अक्षर पुनह जीवित
11:45हो उठे
11:46हवा में व्याप्त वह भारीपन जो विनाश का संकेत दे रहा था धीरे धीरे लुप्त होने लगा और एक अजीब
11:54सी स्थिर्ता चा गई
11:56विंध्याचल की पहाडिया अब शांत थी जैसे उन्होंने सदियों बाद फिर से एक बार श्वास ली हो
12:04देवराज इंद्र ने आकाश मार्ग से इस शांती को देखा और अपनी प्रसन्ता व्यक्त करते हुए पुष्प वर्षा का संकेत
12:12दिया
12:13कार्तिकेय ने अपनी आखें खोली और वेलायुद को वापस अपने दिव्य स्वरूप में समेट लिया
12:20गुफा के कोनों में दबी वह नकारात्मक उर्जा अब पूरी तरह से समाप्थ हो चुकी थी, लेकिन एक गहरा सन्नाटा
12:28अभी भी शेश था
12:31कार्तिकेय के सामने अब वह महाद्वार तो बंद था, लेकिन उसके भीतर की फुस्फुसाहटें अभी भी रहस्य में बनी हुई
12:38थी
12:40देवी पार्वती ने मानसरोवर से एक दिव्य संदेश भेजा, जिसे कार्तिकेय ने अपनी अंतरात्मा में स्पष्ट अनुभव किया
12:49युद्ध का यह चरण समाप्थ हुआ, परंतु कार्तिकेय जानते थे कि यह तो केवल उस बड़ी योजना का एक छोटा
12:57सा हिस्सा था
12:58वे धीरे से पीछे मुड़े और विंध्याचल की उन अनसुलजी गुफाओं को छोड़कर आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान कर
13:06गए
13:08कार्तिकेय विंध्याचल की उन गहराईयों में प्रवेश करते हैं, जहां का वायुमंडल सदियों पुरानी वेदना के भार से भारी और
13:16स्थिर है
13:18अचानक पहाडों की चट्टाने हिलने लगी और एक गूंजती हुई दिव्यध्वनी कार्तिकेय के हृदय को जखजोर देती है
13:27विंध्याचल परवत स्वयं एक अग्रिश्य उर्जा के रूप में जागरित हुआ और उसने अपनी संचित पीडा का बोज कार्तिकेय के
13:35सामने रखा
13:37पहाड की रूह बताती है कि वह धरा को बचाने हेतू युगों से असुरों के विनाशकारी जादू के जहर को
13:44अपने भीतर समाहित किये हुए है
13:48कार्तिकेय स्थब्ध रह जाते हैं जब उन्हें यह घ्यात होता है कि विन्ध्य की विशाल चट्टा ने मात्र मिट्ती नहीं
13:55बलकि एक युगों पुराना कवच है
13:59दिव्य चेतना के रूप में विंध्याचल कार्ति के ऐसे आग्रह करता है कि वे उन छिपे हुए द्वारों को सुरक्षित
14:06करें जो संसार की शान्ती का अंतिन स्तंभ है
14:11अचानक गुफा के कोने से एक भयाबह कमपन उत्पन होता है जो तारा सुर के उन बचे हुए निशानों के
14:18पुनरजीवित होने का संकेत है
14:22पहाड की कराह अब एक भयानक दहाड में बदल गई है जो इस बात का प्रमाण है कि विंध्याचल की
14:29सहनशीलता अब चरम सीमा पर है
14:32कार्ति के ने अपने वेल को कसकर पकड़ा और उस गुप्त महादवार की ओर देखा जो परवत की सबसे गहरी
14:40तहमे स्थित था
14:42दिव्य तेज से दीप्त कार्ति केये ने उस विनाश के महादवार का सामना करते हुए अपनी अंतरात्मा में सत्य का
14:49साक्षात कार किया
14:52महाद्वार के चारों और काला जादू तरल पदार्थ के रूप में बह रहा था, जिसे देखकर कार्तिके की भुजाएं क्रोध
14:59से फड़क उठी
15:02वायु मंदल में भारीपन और भी बढ़ गया, जैसे प्रकृती स्वयां किसी बड़े अनर्थ को होने से रोकने के लिए
15:09ठहर गई हो
15:11कार्तिके ने दिव्यमंत्रों का उच्चारण किया, जिससे गुफा के अंदर जमी हुई नकारात्मक उर्जा की परते पिघलने लगी
15:20विंध्याचल के स्वर में एक विनमर्ता का भाव सुनाई दिया, जिसने कार्तिके के संकल्प को और अधिक द्रेड कर दिया
15:28अंधेरे की वे शक्तियां जो सदियों से दबी थी, अब अपना असली स्वरूप धारन कर रही थी, जिससे गुफा का
15:36फर्ष कांपने लगा
15:38यह विंध्याचल के अस्तित्व का वह कोना था, जहां काल की धारा उल्टी बहती प्रतीत हो रही थी
15:46कार्तिके ने अपने नेत्र खोले और उस विनाश के द्वार के केंद्र पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां से वह
15:53काला जादू उत्पन्न हो रहा था
15:56एक गुंजती हुई आवाज ने चेतावनी दी की द्वार खुलने के साथ ही संसार के नैतिक और आध्यात्मिक संतुलन पर
16:04गहरा संकट आएगा
16:06अपनी पूरी शक्ती का आहवान करते हुए कार्तिकेय ने विनाश के उस महाद्वार को जड़ से उखाडने का निश्चय किया
16:15विन्ध्याचल के उस गुप्त कालकोठरी का रहस्य अब खुलने वाला था जिसके अंत में केवल अंधकार या पूर्ण प्रकाश ही
16:23शेश बचना था
16:26कार्तिकेय ने जैसे ही उस विशाल द्वार को छुआ वैसे ही समय का चक्र थम गया और विन्ध्याचल की गुफाएं
16:33एक अनंत शूने में विलीन होने लगी
16:37कार्तिकेय के नेत्रों के समक्ष समय के सुक्ष्म धागे बिखरने लगे जहां वे अपनी दिव्य द्रिष्टी से काल के उस
16:43अंतराल को देख रहे थे जिसे असुरों ने छुपा रखा था
16:48अचानक दिवारें फटने लगी और उनसे एक भयानक नीली और हरी चमक के साथ क्रिमिभोजन के कीडों का एक अंबार
16:57निकल आया जो काल को ही खा जाने को ततपर था
17:01यह वह स्थान था जहां विनाश के बीज बोए गए थे और कार्तिकेय ने अपने पच्चहनों के नीचे ब्रहमांड के
17:08नश्ट होते हुए तारों के प्रतिबिम को देखा
17:12कार्तिकेय ने अनुभव किया कि यह केवल एक गुफा नहीं बलकि तारका सुर्द्वारा निर्मित काल का एक ऐसा कारागार है
17:20जिसे मिटाना अब अनिवार्य हो गया था
17:24तभी अपनी योगमाया से उन्होंने उस स्थान की रक्शा कर रहे उन अदृष्य राक्षसी शक्तियों को पहचाना जो अब तक
17:32केवल परचायों में छिपी थी
17:35उनके चारों और हजारों काले परचाईयों ने आकार लेना शुरू कर दिया, जो तारकासुर के उन कुछ सित संकल्पों का
17:43प्रतिबिंब थी, जो अभी भी इस स्थान को घेरे हुए थे
17:48इन चायाओं का आवर्ण इतना घना था, कि जैसे पूरा का पूरा समय ही इन दुष्ट स्मृतियों के बोज तले
17:55दबकर अपना अस्तित्व खो रहा था
17:58कार्तिकेय ने अपनी पूरी शक्ती का संचय किया, और उनके द्वारा छोड़ा गया दिव्य प्रकाश इस अंधेरी कालकोथरी की गहराईयों
18:06तक फैलने लगा
18:08देवसे नाप्ती की गर्जना से गुफा की दीवारे कांप उठीन और विनाश का वह महादवार धीरे-धीरे अपनी अस्तिरता को
18:17त्याग कर स्तिर होने लगा
18:19द्वार के अंदर से अजीबो ग्रीब ध्वनिया आने लगी, जो अतीत के उन युद्धों की गूंश थी जहाँ धर्म का
18:26अंत करने का शड्यंत्र रचा गया था
18:30यह द्रिश किसी वीभत्स स्वपन जैसा था, जहां काल चक्र का उल्टा घूमना संपूर्ण स्रिष्टी के विनाश के संकेत दे
18:38रहा था
18:40कार्तिके ने देखा कि द्वार के उस पार केवल अंधकार ही नहीं, बलकि एक ऐसा जाल है, जिसे भेदने के
18:47लिए साधारन अस्त्र परियाक्त नहीं थे
18:50तभी देवताओं के सेनापती ने एक गहरा श्वास लिया, और उनके हृदय से निकली पवित्र उर्जा ने उन पर्छाईयों को
18:58पीछे धकेलना शुरू कर दिया
19:01जैसे ही प्रकाश छायाओं से टकराया, वे किसी धूल की तरह बिखरने लगी और गुफा के अंदर छिपे हुए उन
19:09यंत्रों का रहस्य उजागर होने लगा
19:12यह तारकाशुर के उन यंत्रों का समुह था, जो ब्रहमांड की धड़कन को नियंत्रित करने का एक कुछ सित प्रयास
19:19कर रहे थे
19:22विंध्याचल का वह पर्वत अब मानो स्वय इस विनाश के खेल को रोकने के लिए कार्तिके का साथ दे रहा
19:28था, उसकी दरारें एक नई उर्जा से भर गई थी
19:33कार्तिके ने अपने भाल पर चमकते दिव्यतेज के साथ उस पूरे कालतंत्र को नश्ट करने का अंतिम निरनय ले लिया
19:42उनकी दिव्य शक्तियों का एक प्रचंड जोंका उस महादवार के केंदर में समा गया, जिससे पूरी गुफा एक तीवर प्रकंपन
19:50के साथ कांप उठी
19:52प्रकाश और अंधकार का यह महायुध अब अपने निरनायक मोर पर था, जहां कार्तिके ने बिनाश के उस द्वार को
20:00ही हमेशा के लिए बंद करने का संकल्प ले लिया
20:04गुफा के भीतर जमी हुई वह प्राचीन उर्जा अब तडपने लगी थी, मानो तार कासुर का रक्त किसी श्रापित क्रिस्टल
20:12में कैध होकर जाग उठा हो
20:15भगवान विश्णू अपनी योग निद्रा से जागरित हुए, उनकी चतुर्भुज छवी ब्रहमांड के केंद्र में स्थिर्थी और वे इस अनिष्टकारी
20:23परिवर्तन को अपनी दिव्यद्रिष्टी से देख रहे थे
20:27कार्तिकेय ने अपने वेलायुधम को उचा उठाया, जिससे उत्पन हुई दिव्य ध्वनी ने उनकाले क्रिस्टलों के भीतर छिपे घ्रेनित कमपन
20:36को छिन्न भिन्न कर दिया
20:38अन्धकार का वह महादवार अब एक भयानक जीवन्त रूप लेने लगा था, जहां से क्रूर और परजीवी चायाएं एक भयावध्वनी
20:47के साथ बाहर निकल रही थी
20:50विन्ध्याचल की चट्टा ने इस दिव्य और आसुरी टकराव को सह न सकी और उनके गर्ब से एक विशाल दरार
20:58फूट पड़ी जो पाताल के गहन अंधकार की ओर ले जाती थी
21:03शिव के मस्तक पर विद्यमान अर्धचंद्र की आभा ने उस अंधेरी गुफा में एक दिव्य प्रकाश पुन्च को जन्म दिया
21:10जिससे राक्षसी शक्तियों का प्रभाव कुछ क्षण के लिए थमा
21:15कार्तिके की शक्ती का प्रभाव उन क्रिस्टली कृत अवशेशों को पिघलाने लगा था और वहां से तारकासुर के पुराने अभिशाप
21:23की गूंज बाहर आने लगी
21:26समय मानो थम गया हो जब उन क्रिस्टलों के भीतर से भयानक चीखे सुनाई दी जो उस प्राचीन असुर के
21:33विनाश के अंतिम क्षणों को दर्शाती थी
21:37पूरी गुफा अब एक ऐसे तंत्र में बदल चुकी थी जहां भौतिक जगत के नियम समाप्त होकर केवल कर्म और
21:44दंड का विधान शेश था
21:46गरुर के पंखों की फड़फडाहट ने गुफा के भारी सन्नाटे को तोर दिया जिससे एक दिव्य वायू का संचार हुआ
21:54और विशाक्त छायाएं छिन्नभिन होने लगी
21:58कार्तिके ने भाल पर स्थित तीसरी नेत्र के समान एकागरता से उस उर्जा को लक्षित किया जो अभी भी पर्वत
22:05की नीम को खोखला कर रही थी
22:08असुरों की वह बची खुची पर जीवी उर्जा एक काले धुएं का रूप लेकर भगवान की दिव्य कृपा के सामने
22:15थर्थराने लगी
22:18विंध्याचल की गुफाएं अब गूंज रही थी, मानुस्वयं पृत्वी माता उस विशैले भार से मुक्त होने के लिए कराह रही
22:25हो
22:27भगवान शिव की गूंजती हुई गर्जना ने उन पर जीवियों के अस्तित्व को ही मिटाने का आदेश दिया, जो सदियों
22:34से इस परवत में छिपकर बैठे थे
22:38कार्तिकेय ने अपने अस्त्र से उनकाले क्रिस्टलों पर एक अंतिम प्रहार किया, जिससे एक दिव्य विस्पोट के साथ पूरा छेत्र
22:46प्रकाशमान हो गया
22:48विस्पोट का वह द्रिश ऐसा था जैसे कोई तारा कालकोठरी के भीतर ही फट गया हो, जिससे हर अंधेरा कोना
22:56चमक उठा
22:57असुरों के उस रक्ट से उपजे क्रिस्टल अब राख बन चुके थे और परवत की नीव में व्याप्त वह विशैला
23:04प्रभाव पूर्णता शांत हो गया था
23:08भगवान विश्णों की स्तुती करते हुए कार्तिके ने उस कालकोठरी की सीमाओं को अपने दिव्य प्रताप से सील कर दिया
23:17विंध्याचल के वे काले साये हमेशा के लिए विलीन हो गए और गुफा के भीतर अब केवल एक शांत दिव्य
23:24गूंज ही शेश थी
23:26कार्तिके ने मुर कर उस द्वार को देखा जिसे उन्होंने न केवल बंद किया था बलकि स्वयन के तेज से
23:33सुरक्षित भी कर दिया था
23:36कार्तिकेय ने जैसे ही उस दिव्यद्वार को सील किया
23:39उनके अंतर्मन की गहराईयों से एक प्रतिध्वनी उठी जो उनके ही स्वरूप की एक धुंधली परचाई के रूप में प्रकट
23:47हुई
23:48उस मायावी प्रतिधिम्ब ने कार्तिकेय की आखों में देखते हुए चुनौती दी की क्या सेनाप्ती का कर्तव्य वास्तव में धर्म
23:56की रक्षा है या केवल सहार का एक और ना
24:00कार्तिकेय ने अपने मन को विचलित करने वाली इस माया को समझने के लिए वहीं शिलापर पदमासन में बैठकर अपनी
24:08इंद्रियों को भीतर की ओर मोड लिया
24:11चारों और अंधेरा और सन्नाटा था लेकिन कार्तिकेय का तेज उस गुफा के हर कोने को एक स्वर्ण आभा से
24:19जग्मगा रहा था
24:20उस अंतरमुखी यात्रा के दौरान कार्तिकेय ने देखा कि कैसे उनके भीतर के अहंकार और द्वैत ने असुरों को और
24:28अधिक बल प्रदान किया था
24:31पर्चाई ने उफास करते हुए कहा कि यदि सेनापती स्वयन शान्त नहीं है तो वह पूरे ब्रहमांड की शान्ती का
24:39रक्षक कैसे हो सकता है
24:42कार्तिकेय ने अपने ध्यान की अगनी से उस पर्चाई को भस्म करने के बजाए उसे अपने ही हृदय की करूना
24:49में विलीन करने का संकल्प लिया
24:52गुफा के भीतर की शान्ती एक विशाल ब्रहमांडिय गूंज में बदल गई जैसे स्वयन प्रकृती उनके इस आत्म साक्षातकार को
25:01स्वीकार कर रही हो
25:03अचानक उनकी चेतना के भीतर भगवान विश्नु का दिव्यरूप प्रकट हुआ, जो उन्हें यह स्मरण करा रहा था कि युद्ध
25:11का वास्तविक शेत्र बाहर नहीं, बलकी भीतर है
25:16भगवान विश्नु ने धीर स्वर में कहा कि जो स्वयन को जीत लेता है, वही त्रिलोकी का वास्तविक विजेता कहलाता
25:23है
25:25कार्तिकेय ने अपने मस्तत को जुका कर विश्नु के इस ज्ञान को आत्म साथ किया, जिससे उनके तेज में एक
25:32अध्भुत को मलता समा गई
25:35चारों ओर की काल कोठरी की कठोर दीवारें, अब और अधिक दिव्य और पवित्र प्रतीत होने लगी थी
25:43उनके भीतर के द्वंदव ने पूरी तरह से दम तोर दिया, और वहां अब केवल एक अटल से नापती का
25:49संकल्प बचा था
25:51विश्णु का वह सुक्ष्म रूप धीरे धीरे प्रकाश के पुंज में विलीन हो गया, कार्तिके को पूल्ण एकागरता के साथ
25:59छोड़ते हुए
26:01अब कार्तिके ने अपनी आखें खोली, जिसमें एक अजे शान्ती और भविश्य के प्रती स्पष्ट द्रिष्टी थी
26:20उठाया, जो अब पहले से कहीं अधिक तीवर प्रकाश उत्सर्जित कर रहा था
26:26उनकी प्रत्येक गतिविधी में अब न केवल बल था, बलकी ब्रहमांडिय संतुलन की पूर्ण समझ का अनुभव भी था
26:35कालकोठरी का वहद्वार अब सुरक्षित था और कार्तिकेय ने अपनी यात्रा को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया
26:44विंध्याचल के उस गुप्त रहस्य को जीत लेने के बाद सेनाप्ती अब एक नई दैविय परीच्षा के लिए तयार थे
26:52कार्तिकेय ने अपने पच्चेहनों के नीचे दबी उस आदिम अगनी को पहचाना जो विंध्याचल की गहराईयों में सुप्त अवस्था में
27:00सोई हुई थी
27:02भगवान विश्णु अपनी क्षीर सागर की योग निद्रा से उठकर कार्तिके की उस एकागरता को देखकर मंद मुस्कान के साथ
27:10आशिरवाद स्वरूप अपनी दिव्यद्रिष्टी बनाये रखते हैं
27:16सेनाप्ती ने अपनी दाहिनी हथेली से उस क्रैक को स्पर्ष किया जहां से तमस की काली उर्जा का रिसाव हो
27:23रहा था और मंत्रो चार से उसे स्थिर करने का प्रयास किया
27:28अगनी की एक तीच्ष नरेखा गुफा की चट्टानों पर दोड़ गई, मानो परवत की रगों में पिघला हुआ स्वर्ण प्रवाहित
27:35हो रहा हो
27:37विंध्याचल का वह काल कोठरी चेत्र अब अपनी धुरी पर हिलने लगा, जैसे कोई सोता हुआ विशालकाई जीव जागने के
27:45लिए अंगडाई ले रहा हो
27:48देवर्शी नारद अपनी वीना को थामे हुए उस दिव्य उर्जा के स्पंदन को सुनकर सतर्क हो गए और कार्तिकेय की
27:55शक्ती को नमन किया
27:58कार्तिकेय ने अपने दिव्य शस्त्र शक्ती को भूमी में गार दिया, जिससे पर्वत की जड़े पुन्ट एक दूसरे में मजबूती
28:05से जुड़ गई
28:07अगनी की लप्तें गुफा की दीवारों को आलिंगन करने लगी, जिससे तमस का अंधकार पूरी तरह भस्म होकर राख में
28:15बदल गया
28:16उस भूगर भीय केंद्र में अब एक विशाल सुवर्ण चक्र का निर्मान हुआ, जो पर्वत के भीतर से उर्जा के
28:23असंतुलन को रोकने का पहरा देने लगा
28:27भगवान शिव कैलाश से अपनी तीसरी आख खोल कर उस दिव्य अनुष्ठान को देख रहे थे और कार्तिके की निपुन्ता
28:35को देख कर गर्वित थे
28:37पिघले हुए स्वर्ण की धाराएं अब पर्वत की दरारों के भीतर जमने लगी, जिससे चट्टानों की संरचना पहले से कहीं
28:45अधिक कठोर हो गई
28:48वातावर्ण में गूंजता हुआ ओंकार का नाद उस गुफा की हर दीवार से टक्रा कर एक नई चेतना का निर्मान
28:54कर रहा था
28:57विंध्याचल के नीचे दबी उस काल कोठरी का भार अब हलका हो गया था, क्योंकि अगनी के तत्वों ने नकारात्मक्ता
29:04को पूरी तरह त्याग दिया था
29:07ब्रहमा जी अपनी कमल की पंखुडियों पर विराज मान होकर इस कार्य को स्रिष्टी के पुरुद्धार की दिशा में एक
29:14बड़ा कदम मान रहे थे
29:17कार्तिकेय ने अपना हाथ हवा में उठाया और एक क्षण में वहां के वातावर्ण में मौजूद तप्त अगनी शांत होकर
29:24मंद प्रकाश में विलीन हो गई
29:27गुफा के भीतर अब एक शांती का अनुभव होने लगा जो किसी तपस्वी की समाधी के समान गहरी और स्थिर
29:35थी
29:36विंध्याचल की नीम अप्पुन्ध स्थिर थी और प्रित्वी के भीतर का वह महादवार सुरक्षित रूप से सील हो चुका था
29:45देवी पार्वती ने अपने पुत्र की इस विजय पर हिमालय की उचाईयों से पुष्प वर्षा की जिसकी सुगंध ने पूरे
29:53विंध्याचल को भर दिया
29:55सेनाप्ती ने एक बार उस स्थान को निहारा और संतुष्ठ होकर अपनी आगे की यात्रा के लिए मुर गए
30:03विंध्याचल की पहाडियों ने एक नई आभा को धारन कर लिया था जैसे सेनाप्ती के स्पर्ष ने परवत को पुना
30:10जीवन्त कर दिया हो
30:13कार्तिके ने विंध्याचल की उस पवित्र भूमी के नीचे एक सुक्षम स्पंदन महसूस किया जो किसी गहरी और प्राचीन रहस्य
30:21में उर्जा की गूम्ष थी
30:24भगवान विश्णु अपनी योगनिद्रा से जागरित होकर गरुर पर विराज मान हुए और इस रहस्य की ओर अपनी दिव्यद्रिष्टी से
30:32देखने लगे
30:34सेनाप्ती ने अपनी हथेली से उस शिला को स्पर्ष किया जहां से वह सुक्षम स्पंदन उत्पन हो रहा था और
30:41वह पत्थर जादुई रूप से पारदर्शी हो गया
30:45शिला के भीतर एक भूल भूलया जैसे मार्ग का आभास हुआ जो प्रित्वी की परतों को चीरते हुए किसी अज्यात
30:53दिशा की ओर जा रहा था
30:56विंध्याचल का वह पर्वत अब केवल एक स्थान नहीं रहा बलकि वह एक विशाल जादुई यंत्र का केंद्र प्रतीत होने
31:03लगा
31:05देवर्शी नारद वीना बजाते हुए वहाँ प्रकट हुए और कार्ती के को चेतावनी दी की ये मार्ग ब्रहमांड के विभिन
31:12आयामों को आपस में जोडते हैं
31:16सेनाप्ती ने देखा कि वह सुरंग एक जटिल जाल की तरहे बिछी थी जो प्रित्वी की धुरी को स्थिर रखने
31:23वाले सुरक्षा तंत्र को कमजोर कर रही थी
31:27यह वह स्थान था जहां विनाश का महादवार छुपा था जिसे असुरों की कुद्रिष्टी ने सदियों से दबा कर रखा
31:35था
31:36पहाडों की श्रिंखला मानों सिस्किया भर रही थी क्योंकि वह पुरानी उर्जा बाहर आने के लिए चटपटा रही थी
31:45भगवान शिव कैलाश से अपनी तीसरी आख खोल कर इस हलचल को महसूस कर रहे थे और कार्तिके की सुरक्षा
31:52के लिए चिन्तित थे
31:55कार्तिके ने अपने वेल को जमीन में धनसा दिया जिससे एक दिव्य तेज उत्पन हुआ और वह जाल स्वतही चमकने
32:02लगा
32:04प्रित्वी के उनगुप द्वारों पर लगे सुरक्षा चक्रों का स्वरूप किसी विशाल चक्रव्यों के समान था
32:11सेनाप्ती जानते थे कि यह केवल शुरुवात है क्योंकि ऐसे कई केंद्र पूरे भूमंडल पर फैले हुए हैं
32:20देवी पार्वती ने आकाश से अपनी दिव्यक्रिपा बरसाई जिससे कार्ति के के संकल्प को नई शक्ती मिली
32:29सुरं के भीतर से आने वाली वह गूंज अब कम होने लगी थी मानो कार्ति के के तेज ने उसे
32:35नियंत्रित कर लिया हो
32:37यह द्रिशे किसी दैविय संधर्ष के अंत का प्रतीक नहीं, बलकि एक लंबी और कठिन यात्रा का आरंभ था
32:46विंध्याचल की पहाडिया अब पूरी तरह से शान्थ हो गई थी, लेकिन हवा में अभी भी उस प्राचीन रहस्य की
32:53महक बाकी थी
32:56सेनाप्ती ने एक बार और उस शिला को देखा और अपनी आदे की यात्रा के लिए निकल पड़े
33:03प्रिथवी के उन गुप्त केंद्रों को सहेजने का भार अब पूरी तरह से उनके कंधों पर आचुका था
33:10अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हुए कार्तिके ने जान लिया था कि अब कोई भी असुर इस ब्रहमांडिय संतुलन को
33:18नहीं बिगाड़ पाएगा

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