पद्म पुराण के इस भाग में, परशुराम का क्रोध प्रलय बनकर टूटता है! 🌩️ पिछले एपिसोड में शिव से दिव्य परशु प्राप्त करने के बाद, परशुराम को एक और भयंकर चुनौती का सामना करना पड़ता है। अहंकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिसकी हजार भुजाएँ थीं और जिसने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था, ने ऋषि जमदग्नि के आश्रम में प्रवेश किया और उनकी चमत्कारी कामधेनु गाय का अपहरण कर लिया। इस अपमान और अन्याय से परशुराम क्रोधित हो उठे। देखिए कैसे परशुराम ने अपने दिव्य अस्त्र से कार्तवीर्य अर्जुन का अंत किया और धर्म की स्थापना की, लेकिन इस जीत के बाद एक और भीषण प्रतिशोध का जन्म होता है जो परशुराम के जीवन की दिशा बदल देता है। क्या परशुराम अपने पिता के हत्यारों को माफ कर देंगे, या पृथ्वी पर क्षत्रियों का सर्वनाश करने की शपथ लेंगे? यह जानने के लिए इस महागाथा में हमारे साथ जुड़ें! #PadmaPurana #Parashurama #KartaviryaArjuna #Kamadhenu #HinduMythology #EpicBattle #SanatanDharma #PuranicStories #VishnuAvatar #BrahminKshatriyaWar
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00:00तपस्या पूर्ण कर भगवान शिव से दिव्य पर्शु प्राप्त करने के पश्चात, शांत और ग्रिड पर्शुरां अपने पिता रिशी जमदगनी
00:08के आश्रम की ओर अग्रसर हुए, जहां हरियाली और पवित्रता का सामराज्य था.
00:14दूर से ही अपने पुत्र को आते देख, रिशी जमदगनी और माता रेनुका के मुखमंडल पर वातसल्य और गर्व का
00:22तेज उमड आया, मानो सदियों का इंतजार पलभर में समाप्थ हो गया हो.
00:28नमरता से जुककर, परशुराम ने अपने माता पिता के चरण स्पर्ष किये और अपनी कठोर तपस्या भगवान शिव से मिले
00:36वर्दान और दिव्य परशु की प्राप्ती का विस्त्रित वर्णन किया.
00:41आश्रम का वातावर्ण पवित्र मंत्रों, यग्य की सुगंध और कामधेनु की शांत उपस्थिती से परिपूर्ण था, जो आने वाले भयंकर
00:49तूफान से पूरी तरह अनभिग्य एक स्वर्गिय शांती का अनुभव करा रहा था.
00:55उसी समय सहस्र भुजाओं और महादेव के वर्दान से मदोन मत्त अहमकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी विशाल सेना के साथ
01:04तीनों लोकों में आतंक और अराजकता का सामराज्य स्थापित करने में लगा था.
01:10अपने स्वर्ण सिनहासन पर आरूड राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी अदमय शक्ती और विज्यों का बखान करते हुए अपने मंत्रियों और
01:19सभास्दों पर गर्व से शासन कर रहा था, जिनकी आखों में भय और चापलूसी स्पष्ट थी.
01:27देवर्शी नारत जैसे प्रबुद्ध संत अपनी वीना के शांत स्वरों के बीच भी कार्तवीर्य अर्जुन के बढ़ते अत्याचारों और अधर्म
01:35पर चिंता व्यक्त करते हुए ब्रह्मान्डिय संतुलन के बिगरते स्वरूप पर गेहन विचार विमर्ष कर रहे थे.
01:43कार्तवीर्य अर्जुन के क्रूर शासन से भयभीत प्रित्वी एक विशालकाय जीव की तरह काप रही थी, जहां प्रजा के दुख
01:51और अन्याय की गूंज हर दिशा में फैल रही थी, मानो स्वय धर्ती माता कराह रही हो.
01:58अपने अजेयरत पर सवार, कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सहसर भुजाओं से वजर्पात करते हुए, रिशिमुनियों के आश्रमों को ध्वस्त कर रहा
02:07था और निर्दोश ग्रामवासियों को क्रूरता से अपने अधीन कर रहा था.
02:12पीडित प्रजा अपनी अंतिम आशा के साथ प्राहिमाम करती हुई, आकाश की ओर देखती थी, जहांसे उन्हें किसी दिव्य हस्तक्षेप
02:21की प्रतीक्षा थी, जो उन्हें इस दानवी राजा के चंगुल से मुक्त कर सके.
02:28शीरसागर में शेशनाग पर विराजमान, चतुर्भुज भगवान विश्नु, अपनी शांत मुस्कान और गंभीर नित्रों से प्रित्वी पर बढ़ते अधर्म को
02:37देख रहे थे, जहां स्रिष्टी का संतुलन एक बार फिर चर्मरा रहा था.
02:43ग्रहों और नक्षत्रों के बीच, ब्रहमांडिय उर्जा का संतुलन बिगड रहा था, जिससे आकाश में असाधारन खगोलिय घटनाय घटित हो
02:51रही थी, जो आने वाले महाविनाश की चेतावनी दे रही थी.
02:57अपनी असीमित शक्ती के नशे में चूर, कार्तवीर्य अर्जुन, वन में विचर्ण करते हुए पवित्र हिर्णों और रिशियों के पालतु
03:05पशुओं का शिकार कर रहा था, अपने सैनिकों को निर्दैता से उन्हें पकड़ने का आदेश दे रहा था.
03:12वहीं रिशी जमदगनी के आश्रम में दिव्य कामधेनु गाय अपनी अलौकिक शक्ती से समस्त भक्तों और रिशियों की इच्छाओं को
03:21पूर्ण कर रही थी, जिससे आश्रम में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती थी.
03:27स्वर्ण आभासे दीप्तिमान कामधेनु अपनी अलौकिक दुग्धधारा से आश्रम की हर आवश्शक्ता को पूरा करती थी, जिससे चारों और सुक्समरिद्धी
03:37और आध्यात्मिक शान्ती का वास था.
03:41कार्तवीर्य अर्जुन के एक गुप्त चरने, कामधेनु की अलौकिक शक्तियों और उसके दिव्यवर्दानों के बारे में जानकारी दी, जिससे अहमकारी
03:50राजा की आखों में ततकाल लोब और अधिकार की ज्वाला भड़क उठी.
03:55कामधेनु की महिमा सुनकर, कार्तवीर्य अर्जुन के हृदय में अथाह लोब उमड पड़ा और उसने तुरंट अपनी सेना को रिशी
04:03जमदगनी के आश्रम की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया, ताकि वह दिव्यगाय को हस्तगत कर सके.
04:11सैकडों हाथियों, घोरों और सैनिकों की गर्जना से धर्ती काप उठी, जब कार्तवीर्य अर्जुन की विशाल सेना, धूल का गुबार
04:20उडाती हुई, शांत रिशी जमदगनी के आश्रम की ओर निर्दैता से बढ़ रही थी.
04:26रिशी जमदगनी अपनी स्वाभाविक उदार्ता और अतिति सतकार की भावना से उतप्रोत कार्तवीर्य अर्जुन और उसकी पूरी सेना का स्वागत
04:35करने के लिए तयार हुए, उनके दुर्भावना पूर्ण इरादों से अन्जान.
04:41कामधेनु आश्रम के पवित्र प्रांगन में घास चरती हुई, अपने दिव्य सौंदर्य और शान्ती में लीन थी, आने वाले भीशन
04:49टकराव और उस पर मंदरा रहे लोभी संकट से पूर्णता अन्भिग्य.
04:54जैसे ही राजाकार्तवीर्य अर्जुन की सेना रिशी जमदगनी के आश्रम के निकट पहुँची, हवा में धूल और शंकनात का मिश्रण
05:02एक अशुब संकेप बनकर फैल गया, जो शान्ती और सन्यम के स्थान को भंग करने को तयार था.
05:10रिशी जमदगनी अपनी कुटिया के बाहर खड़े, अपनी गहरी, शान्त आखों से आती हुई सेना को देखते हैं, उनके चहरे
05:19पर अगाध धैर्य और सहज आतिथ्य का भाव स्पष्ट है, अन्भिग्य की उनके सामने कितना बड़ा संकट खड़ा है.
05:27कार्तवेर्य अर्जुन अपने विशालकाय रत से उतर कर, अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखे हुए, आश्रम के पवित्र और
05:35शान्त वातावर्ण को तिरसकारपून द्रिष्टी से मापते हुए, अपने अहंकार से भरे इरादों को छुपा नहीं पा रहा था.
05:44शान्त आश्रम का हराभरा वातावर्ण, दिव्य पक्षियों के चहचहाने और मंध हवा के साथ, दूर से आती सैने गर्जना और
05:52हतियारों की चमक के कारण एक अजीब विरोधा भास में डूब गया था, जो आने वाले तूफान का संकेट दे
05:59रहा था.
06:01अपनी स्वाभाविक उदारता से प्रेरित होकर, रिशी जमदगनी ने राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसकी पूरी सेना का स्वागत करने के
06:09लिए आगे कदम बढ़ाए. उनके मुख पर एक शान्त मुसकान थी, जो किसी भी द्वेश से परे थी.
06:17राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने रिशी जमदगनी के नमर स्वागत का जवाब अपनी घमंडी मुसकान और तिरसकार भरी आखों से दिया,
06:25मानों वे इस पवित्र स्थान पर रिशी की सादगी का उपहास कर रहे हूं.
06:31रिशी की धर्म पतनी, रेनुका, आश्रम के एक शांत कोने से राजा और उसकी सेना को सतर्क द्रिश्टी से देख
06:39रही थी, उनके मन में आने वाली अन्होनी के प्रती एक असपष्ट चिन्ता व्याप्त थी.
06:45जैसे ही हवा में हलचल बढ़ी, आश्रम के प्राचीन व्रिक्षों की पत्तिया कापी, मानो विस्वया आने वाले लोग और अनादर
06:53की प्रतिध्वनी कर रही हो, जो इस शांत स्थान की पवित्रता को चुनौती देने वाला था.
07:00अपनी असीम करुणा और अतिथि सत्कार की भावना से, रिशी जमदगनी ने राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसकी विशाल सेना को
07:08भोजन के लिए आमंत्रित किया, यह विश्वास दिलाते हुए कि उनके आश्रम में किसी भी अतिथी को भूखा नहीं रहना
07:16पड़े�
07:17राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने रिशी के इस आश्चर्यजनक निमंत्रन को सुनकर व्यंग्यात्मक हसी हंसी यह सोचकर की एक साधारन रिशी
07:27भला इतनी बड़ी सेना का सत्कार कैसे कर सकता है
07:31रिशी जमदगनी ने राजा के संदेह को भामपते हुए अपनी दिव्य कामधेनु गाय की ओर्सने से इशारा किया जो आश्रम
07:40के पवित्र प्रांगण में खड़ी थी मानो वही इस असीम आतिथ्य का रहस्य हो
07:46कामधेनु अपने दिव्य सौंदर्य और शांती में लीन अपनी बड़ी काली आखों से रिशी की ओर देखती है
07:53मानो वह बिना बोले ही उनकी आग्या और उनके भक्तों की सेवा के लिए अपनी स्वीकृती दे रही हो
08:01कुछ ही क्षणों में एक दिव्य चमतकार घटित हुआ
08:04आश्रम के प्रांगण में विशाल भोजन शालाय प्रकट हुई
08:08जिनमें अंगिनत स्वर्ण पात्रों में स्वादिष्ट व्यंजन, फल और पे पदार्थ सजे हुए थे
08:13जो सेना की पूरी भूख मिटाने को तयार थे
08:18सैनिकों के चहरे पर अविश्वास और आश्चर्य के भाव स्पष्ट थे
08:22जब उन्होंने अपनी आखों के सामने स्वादिष्ट भोजन के धेर लगे देखे
08:27जिसकी कलपना भी उन्होंने कभी नहीं की थी
08:30वह भी एक साधारन आश्रम में
08:34राजा कार्त वीर्य अर्जुन अपने सिनहासन पर बैठे हुए
08:38पहले तो अपनी आखों पर विश्वास नहीं कर पाए
08:41फिर उनकी आखों में रिशी की शक्ती के प्रती आश्चर्य और कामधेनु को पाने के लोग की चमक स्पष्ट रूप
08:48से दिखाई देने लगी
08:50असीन भोजन और स्वादिष्ट व्यंजनों का प्रवाह अविराम था
08:54जो स्वर्ण पात्रों से छलक रहा था
08:57जिससे आश्रम का वातावर्ण एक स्वर्गिय उत्सव के समान प्रतीत हो रहा था
09:02और सब कुछ दिव्य कामधेनों की क्रिपा से संभव हुआ था
09:07जब राजा की पूरी सेना ने त्रिप्ती से भोजन कर लिया
09:11तो उनके चहरे पर संतोष और अध्भुत अनुभव की चमक थी
09:15मानों उन्होंने स्वर्ग का स्वाद चक लिया हो जो एक रिशी के साधारन आश्रम में मिला था
09:22संतोष के क्षणों में भी कार्तवीर्य अर्जुन की लोभी आखें बार-बार आश्रम में चर रही कामधेनु पर ठहर रही
09:30थी
09:30उसके मन में अब उसे चुराने का भयानक विचार घर कर रहा था
09:35रिशी जमदगनी अपने अतिथियों की प्रसंता से अभिभूत संतोष पूर्वक मुस्कुराते हैं
09:42राजा के मन में पल रहे घोर अनिष्टकारी इरादों से अभी भी पूरी तरह अन्भिज्य है
09:49कामधेनु जो अभी तक शान्ती से घास चर रही थी
09:52अपनी दिव्य इंद्रियों से आसन्न खत्रे को भामपते हुए एक हलकी सी आह भरती है
09:58उसकी आखों में एक दुख भरी चाया और भावी प्रलय की धुन्धली आशंका तैर जाती है
10:06कामधेनु की उदासी गहरी होती गई
10:08जैसे उसने नेती के क्रूर खेल को अपनी अंतरात्मा में अनुभव कर लिया हो
10:14और उसकी आखों में आसन्न संकट की स्पष्ट छवी तैर गई
10:19वैकुंठ में भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर विराजे
10:23प्रित्वी पर मंदराते इस अन्याय को शांत भाव से देख रहे थे
10:27उनके हृदय में धर्म की रक्षा का संकल्प द्रिढ हो रहा था
10:33कार्तवीर्य अर्जुन का धैर्य अब जवाब दे चुका था
10:36और उसके मन में कामधेनु को बलपूर्वक छीनने का दुष्ट संकल्प पूरी तरह हावी हो गया
10:42उसकी आखों में लोब की अगनी धधक रही थी
10:46आश्रम पर एक अंजानी उदासी चा गई जैसे प्रकृती भी आने वाले अप्शकुन को महसूस कर रही हो
10:53उसकी चिर्शान्ती भंग होने वाली थी और हवा में एक अजीब सा तनाव घुल गया
11:00राजा ने अपने सैनिकों को एक सुक्ष्म संकेत दिया
11:04और वे धीरे धीरे रिशी जमदगनी और कामधेनु की ओर बढ़ने लगे
11:08उनके चहरों पर क्रूर इरादों की कठोर्ता स्पष्ट जलक रही थी
11:14कैलाश पर भगवान शिव गहन ध्यान में लीन अपने तीसरे नेत्र में प्रित्वी पर पनप रहे
11:20इस अन्याय की लहरों को महसूस करते हैं उनके मुख पर एक हलकी सी चिंता की रेखा उभराती है
11:28रिशी जमदगनी अब स्थिती की गंभीरता को भामपते हुए अपनी तपस्या से उठ खड़े हुए
11:34उनके चहरे पर द्रिडता और धर्म की रक्षा का संकल्प स्पष्ट था जैसे कोई अटल परवत
11:41हवा में तनाव भर गया पक्षियों का चहचाना बंध हो गया और पूरे आश्रम में एक अशुब खामोशी पसर गई
11:49जैसे कोई बड़ा तूफान आने वाला हो अपनी विनाशकारी शक्ती को संजोए
11:55कार्तवीर्य अर्जुन अपने बल के घमंड में चूर रिशी के सामने खड़ा हुआ और कामधेनु को तुरंत सौम्पने की मांग
12:03की उसकी आवाज में निरंकुष अहंकार गूंज रहा था
12:08गरुर्क वैकुंट से प्रिथवी की ओर उरते हुए इस बढ़ते हुए अधर्म को अपनी पैनी द्रिश्टी से देख रहे थे
12:15उनकी आखों में न्याय की प्रतीक्षा जहलक रही थी
12:19रिशी जम्दगनी ने शांत परंतु द्रिड स्वर में उत्तर दिया कि कामधेनु किसी की निजी समपत्ती नहीं है वह समस्त
12:27प्राणियों के कल्यान के लिए है और उसे किसी को भी हरन करने की अनुमती नहीं दी जाएगी
12:34रिशी के शब्ध हवा में गुझे मानो धर्म स्वयं चुनौती दे रहा हो और उनके पीछे खड़ी कामधेनु ने एक
12:42गहरी सांस ली उसकी आखें नम थी और उसने भाग्य को स्वीकार कर लिया
12:47राजा कार्तवीर्य अर्जुन रिशी के प्रतिरोध से क्रोधित होकर अपने सैनिकों को कामधेनु को बलपूर्वक पकड़ने का आदेश देता है
12:57उसकी आखों में अहंकार और सत्ता की भूख जल रही थी
13:02देवर्शी नारद तीनों लोकों में विचर्ण करते हुए इस अधर्म को देखकर चिन्तित हो उठे और अपने वीना के तार
13:10पर एक दुख भरी धुन छेड़ते हुए आगे बढ़ गए
13:14क्रूर सैनिक राजा की आग्या का पालन करते हुए रिशी को धकेल कर कामधेनों की ओर लपके उनकी बरबरता आश्रम
13:22की पवित्रता को भंग कर रही थी
13:25रिशी जम्दगनी अपमानित और असहाय होकर धर्ती पर गिर पड़े उनके मन में गहरा क्रोध और प्रतिशोध की ज्वाला प्रजवलित
13:34हो रही थी जो शांत राख के नीचे सुलग रही थी
13:39कामधेनु अपनी दिव्य शक्तियों को प्रकट न करते हुए भी अत्यंत पीडा में चीखी क्योंकि सैनिकों ने उसे जंजीरों से
13:46बांधना शुरू कर दिया उसकी आखें दर्द से भर गई
13:51माता रेनु का दूर से यह क्रूर द्रिश देखकर चीतकार कर उठीन उनका हृदय अपने पती के अपमान और कामधेनु
13:59की पीडा से विदीर्न हो रहा था जैसे किसी ने उनके प्राण छीन ये हो
14:06कार्तवीर्य अर्जुन कामधेनु को सैने को द्वारा बलपूर्वक ले जाते हुए देखकर एक विजी और क्रूर मुस्कान के साथ रिशी
14:14जम्दगनी का उपहास करता है अपने अहंकार की चरम सीमा पर पहुँच गया था
14:20कामधेनु को माहिश्मती की ओर ले जाया जा रहा था और उसके पीछे सुने आश्रम में केवल अपमान, पीड़ा और
14:28एक भयंकर प्रतिशोध की चुपचाप सुलक्ती आगशेश रह गई थी
14:33संध्या के धुंधलके में जब युवा परशुराम आश्रम की ओर लोट रहे थे, तो चारों ओर च्छाई अस्वाभाविक स्तब्धता ने
14:41उनके मन में एक अज्यात आशंका भर दी
14:45आश्रम के मुख्यद्वार पर बिखरे हुए पूजा पात्रों और भारी रथों के उथले निशानों को देखकर परशुराम का शांत स्वभाव
14:53अचानक गंभीर और चिंतित हो उठा
14:57वे शीघरता से आश्रम के प्रांगण में प्रविष्ठ हुए जहां तूट-फूट और तबाही का द्रिश देखकर उनका हरदय अत्यधिक
15:05उद्वेलित हो गया
15:07पवित्र यज्यवेदी की बुझी हुई भस्म और बिखरी हुई समिधाय किसी भयानक अधर्म और अनर्थ की मुख गवाही दे रही
15:15थी
15:16आश्रम के मुख्य कुटीर के समीग पहुचते ही परशुराम ने देखा कि उनकी माता रेनुका भूमी पर बैठी निरंतर अश्रु
15:24बहा रही थी
15:26रोती हुई माता रेनुका ने अपने पुत्र परशुराम को गले से लगा लिया और विलाप करते हुए समराट कार्तवीर्य अर्जुन
15:34के क्रूर अत्याचार की गाथा सुनाई
15:38अश्रुपूरत नेत्रों से माता ने सूने गोशाला की ओर संकेत किया जहां से कामधेनों को बलपूर्वक लोहे की श्रिंखलाओं में
15:46बांध कर ले जाया गया था
15:49गोशाला की गीली मिट्टी पर पड़े तूटे हुए पाश और कामधेनों के खुरों के निशान उस अमानविय प्रताडना की कहानी
15:56बया कर रहे थे
15:58वही समीक बैठे अत्यंत दुर्बल और व्यथित रिशी जमदगनी ने अपने तेजस्वी पुत्र की ओर मौन और वेदना भरी द्रिश्टी
16:07से देखा
16:08पिता के शरीर पर लगे आधातों और उनके अपमान की कथा सुनते ही परशुराम के शांत नेत्रों में भयानक क्रोधागनी
16:16प्रजवलित हो उठी
16:18परशुराम ने अपनी मुठिया भींच ली और उनके विशाल शरीर से प्रल्यंकारी दिव्य तेज का स्वर्णिम वलय प्रस्पुतित होने लगा
16:28परशुराम के विक्राल क्रोध से संपून वातावर्ण कांप उठा और सायनकालीन रक्तवर्ण आकाश में प्रचंड तडित की कड़क गूंज उठी
16:38बिना एक क्षण कवाए परशुराम आश्रम के उस पवित्र व्रिक्ष की ओर बढ़े जहां उनका अमोग अस्त्र परशु एक शिला
16:46पर स्थापित था
16:48भगवान शिव द्वारा प्रदान किये गए उस अमोग और संहारक फरसे को परशुराम ने नमन किया और उसे अपने बलिष्ट
16:56हाथों में धारण कर लिया
16:58फरसे की मूंट को भूमी पर पटकते हुए परशुराम ने भीशन गर्जना की और प्रित्वी से कार्थवीर्य अर्जुन जैसे अन्याईक
17:06शत्रियों का सर्वनाश करने की प्रतिग्या ली
17:10उस महाभीशन प्रतिग्या के साथ ही फरसे की पैनी धार से नीले और स्वर्णिम रंग की विनाशकारी ज्वालाएं प्रस्फुटित होने
17:18लगी
17:20रिशी जमदगनी और माता रेनुका ने अपने तेजस्वी पुत्र के सिर पर हाथ रख कर उसे धर्मरक्षा के इस महासंगराम
17:28के लिए मौन आशिरवाद दिया
17:31परशुराम ने अपने मातापिता के चर्णों में मस्तक जुका कर वचन दिया कि वे कामधेनू को मुक्त कराकर ही आश्रम
17:38में पुनह प्रवेश करेंगे
17:41फरसे को अपने विशाल कंधे पर टिका कर परशुराम त्वरित गती से माहिश्मती नगरी की दिशा में घंगोर वनों को
17:48लांगते हुए निकल पड़े
17:51लालक्षितिज की प्रिष्ठ भूमी में परशुराम का संहारक स्वरूप चमक रहा था, जो माहिश्मती के राजा के लिए काल का
17:59प्रत्यक्ष संदेश वाहक बन चुका था
18:02परशुराम तीवर गती से दुर्गम परवतमालाओं और घंगोर वनों को लांगते हुए माहिश्मती नगरी की सीमा की ओर बढ़ते चले
18:10जा रहे थे
18:12स्वर्गलोक से देवता और सिद्ध गंधर्व परशुराम के इस प्रचंड रूप और प्रतिशोध की यात्रा को बड़े विस्मय और भय
18:20के साथ देख रहे थे
18:23परशुराम के प्रतियेक भारी चरण प्रहार से भूमी कमपित हो उठती थी और हिंसक वन्य जीव भी भैभीत होकर उनके
18:30मार्ग से पीछे हट जाते थे
18:33भगवान शिव द्वारा प्रदत दिव्य परशु उनके कंधे पर स्थित होकर संहारक अगनी और विद्युत तरंगों से देहक रहा था
18:42संध्या ढलते ही परशुराम विशाल नर्मदा नदी के तट पर पहुँचे जिसके पार माहिश्मती की विशाल स्वन नगरी स्थित थी
18:52नदी तक पर खड़े होकर परशुराम ने माहिश्मती की उची प्राचीरों को देखा, जहां अधर्म का सामराज्य अपनी चरम सीमा
19:00पर था
19:01उन्होंने नर्मदा के पवित्र जल की अंजली भरकर संकल्प लिया कि वे प्रित्वी को अत्याचारी राजाओं के अत्याचार से मुक्त
19:10करेंगे
19:11उसी क्षण माहिश्मती नगरी में अमंगल के सूचक द्रिश्य दिखने लगे, राजमहल के उपर काले कौउं का समों मंदराने लगा
19:21माहिश्मती के विशाल मुख्यद्वार और अभेद्य सुरक्षा दुर्गों पर सहसरों क्षत्रिय सैनिक तैनात थे
19:28दुर्ग के उपर खड़े प्रहरियों ने दूर से आते उस एका की तेजस्वी योध्धा को देखा और राजमहल में खत्रे
19:36का शंखनात कर दिया
19:38परशुराम ने अपनी महान प्रत्यंचा खीच कर एक ऐसा गरजन किया जिससे माहिश्मती की विशाल प्राचीरे कांप उठी
19:47उस सिन्हनाद की गूंच से नदी की तरंगें उचल पड़ी और राजमहल की छतों पर फहराते ध्वच तूट कर गिरने
19:55लगे
19:56माहिश्मती के विशाल पत्थर के पुल पर सहसरों शस्त्रधारीक शत्रिय सैनिक परशुराम को रोकने के लिए ढाल बना कर खड़े
20:04हो गए
20:06सैनिकों के मुख्य सेनाप्ती ने परशुराम के शांत पर भयानक स्वरूप को देखा और उसका हृदय अग्यात भय से कांप
20:13उठा
20:15परशुराम ने एक भीक्षन व्यर्थ गवाय बिना पुल पर पहला कदम रखा और उनका परशु स्वर्णिन जोती के साथ घूम
20:23उठा
20:24यह द्रिश ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो गिद्धों के समूह की और एक एकाकी प्रजवलित सिंग निर्भीक होकर बढ़
20:32रहा हो
20:33माहिश्मती के गगन में घंगोर काले बादल घिराये और भयंकर गर्जना के साथ मुसलाधार वर्षा आरम हो गई
20:42राजमहल के भीतर कार्तवीर्य अर्जुन के मंतरी और सामंत एकाकी ब्राहमन के आगमन का समाचार सुनकर स्थब्ध रह गए
20:52परशुराम ने अपने एक ही प्रचंड प्रहार से माहिश्मती के विशाल लौह द्वार के भारी अर्गला को छिन भिन कर
20:59दिया
21:00तूटे हुए द्वारों और धधकते अंगारों के बीच से परशुराम ने माहिशमती में प्रवेश किया, जहां अब प्रतिशोध का महातांडव
21:09होने वाला था
21:11माहिश्मती के भव्य प्रांगण में प्रवेश करते ही परशुराम के दिव्य तेज से संपून वातावन क्षन भर के लिए थमसा
21:18गया
21:19जैसे प्रकृती भी उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रही हो
21:24वैकुंठ में शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु ने इस आसन्न संधर्ष को अपनी शांत गंभीर द्रिश्टी से देखा
21:32जानते हुए कि यह धर्म की स्थापना हेतु एक आवश्यक चरण था
21:37राजमहल के स्वर्णमंडित सिनहासन पर आसीन कार्तवीर्य अर्जुन अपनी असंख्य भुजाओं के बल पर अभीमानी परशुराम के आगमन की सूचना
21:47सुनकर क्रोज से उबल रहा था
21:50जैसे ही परशुराम ने महल के मुख्य प्रांगन की ओर कदम बढ़ाए वहां उपस्थित सहसरों सैनिक सहम गए और पूरे
21:58महल पर एक भयावः शान्ती चा गई
22:02परशुराम अपने कंधे पर फरसालिये अडिक कदमों से राजमहल के हृदय की ओर बढ़ रहे थे उनकी आखों में प्रतिशोध
22:10की अगने धधक रही थी
22:13कैलाश पर समाधिस्थ भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से इस धर्ती पर हो रहे अन्याय और आसन्न न्याय को
22:20शांत भाव से देखा उनकी मुखाकरती पर एक दिव्य गंभीर ता थी
22:26राजमहल के प्रवेश द्वार पर खड़े, कार्तवीर्य अरजुन के सबसे पराक्रमी सेनापतियों ने परशुराम को रोकने का निश्वर प्रयास किया,
22:35पर वे उनके क्रोधित रूब के सामने टिक न सके
22:39जैसे ही परशुराम ने अवरोधकों को पार किया, महल के अंदर की हवा भारी हो गई और हर कोने में
22:46एक अद्रिश्य दहशक फैल गई
22:49आखिरकार परशुराम विशाल दर्बार हॉल में प्रवेश कर गए, जहां कार्तवीर्य अर्जुन अपने सिनहासन पर बैठा, घमन से परशुराम की
22:58ओर देख रहा था
23:01वैकुंठ में बैठे भगवान विश्नु के होठोन पर एक सुक्ष्म मुस्कान आई, जैसे वे जानते हों की अब धर्म और
23:08अधर्म का अंतिन निर्णय निकट था
23:12परशुराम ने अपनी अटल वानी में कामधेनु को लोटाने और अपने पिता से क्षमा मांगने की मांग की, उनके स्वर
23:19में परवत्सी द्रिडता थी
23:22परशुराम की चुनोती सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन के चहरे पर घमंड और क्रोध की मिश्रित अभिव्यक्ती उभी, जैसे उसने कभी किसी
23:31ब्राहमन को इतनी ध्रिष्टता करते न देखा हो
23:35आमकारी कार्तवीर्य अर्जुन ने परशुराम की मान को ठुकराते हुए अपने एक हजार भुजाओं के बल का प्रदर्शन करने का
23:42निश्चय किया, जिससे दर्बार में सन्नाटा चा गया
23:47कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी आखें खोली और एक गहरी सांस ली, जैसे वे जानते हों की अब
23:54विध्वन्स का चक्र आरम हो चुका था
23:58तक्षण कार्तवीर्य अर्जुन ने अपने राजसी कवच को चीरते हुए अपनी एक हजार भुजाओं को प्रकट किया, प्रत्येक भुजा में
24:06एक धातक अस्त्र चमक रहा था
24:09हजार भुजाओं के इस अकस्मात प्रदर्शन से दर्बार हॉल एक क्षण में भयावा रणभूमी में बदल गया, जहां कार्तवीर्य अर्जुन
24:18की शक्ती का प्रकोप स्पष्ट था
24:21कार्तवीर्य अर्जुन ने अपनी सहस्र भुजाओं से एक साथ असंख्य अस्त्र चलाए, किन्तु परशुराम ने अपने फरसे से उन सभी
24:29प्रहारों को द्रिड़ता से विफल कर दिया
24:33देवर्शी नारद ने वीना पर मंद स्वर छेड़ते हुए, इस अभूत पूर्व द्वंदव को आकाश से देखा और अपने मुख
24:40से जय परशुराम का उद्गोश किया
24:44परशुराम ने अपने दिव्य फरसे को एक प्रचंड वेग से घुमाया और कार्टवीर्य अर्जुन की कई भुजाओं को एक ही
24:51जटके में काट डाला, जिससे रक्त की धाराय बह निकली
24:56इस रक्तरंजित महायुद्ध का आरंभ हो चुका था, जहां धर्म की स्थापना के लिए परशुराम का क्रोध प्रल्यंकारी रूप धारण
25:04कर चुका था
25:06अपनी कटी हुई भुजाओं को देखकर अत्यंत क्रोधित होकर कार्टवीर्य अर्जुन ने अपनी बची हुई भुजाओं में विशाल अस्त्रशस्त्र थाम
25:15लिए
25:16आकाश में विद्यमान देवर्शी नारद और अन्य देवता इस भीशन युद्ध को देखकर चकित रह गए और धर्म की रक्षा
25:24की प्रार्थना करने लगे
25:27कार्टवीर्य अर्जुन ने अपने शेश हाथों से प्रचंड अगनी से धधक्ती गदाए और विशैले भाले परशुराम की और पूरे वेग
25:35से फेंके
25:37युद्ध भूमी में टकराते अस्त्रों के इस भीशन प्रहार से संपून प्रिथवी कांप उठी और चारों और अगनी की ज्वालाए
25:45भड़क उठी
25:46इस भयानक आक्रमन के बाद भी परशुराम तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने फरसे को शिवतेज से प्रदीप्त करते
25:54हुए आगे बढ़े
25:56कैलाश परवतपर विराजमान भगवान शिवने मंद मुस्कान के साथ अपने प्रियभक्त परशुराम को विजय का अमोग आशिरवाद प्रदान किया
26:07परशुराम ने अत्यंत तीवर वेग से आकाश में उचल कर एक ही क्षण में राजा अरजुन के सभी शस्त्रों को
26:14टुक्रों में काट दिया
26:16कटे हुए अस्त्रशस्त्र और तूटे हुए स्वर्ण मुकुट युद्ध के मैदान में बिखर गए जिससे अहंकार के विनाश का द्रिश
26:24स्पष्ट होने लगा
26:26अपने शस्त्रों को निश्फल होते देख कार्तवीर्य अरजुन ने अपनी बची हुई शक्ती से मायावी अंधकार फैला कर अनेक रूप
26:34धर लिये
26:36वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान विश्णु ने इस धर्म युद्ध को देखा और जाना की अब अधर्म के अंत का
26:43समय निकट आ गया है
26:46परशुराम ने अपने फरसे पर मंत्रशक्ती का आवान करके उस सम्पूर्ण मायावी जाल को एक ही क्षण में भस्न कर
26:54दिया
26:55सत्य के उस दिव्य प्रकाश ने युद्ध भूमी को पुनह उजागर कर दिया और कार्टवीर्य अर्जुन का सारा अहंकार धूल
27:03में मिल गया
27:04फिर परशुराम ने प्रचंड वेग से वार करते हुए कार्टवीर्य अर्जुन की एक एक करके बची हुई समस्त भुजाओं को
27:12काट डाला
27:14आकाश में खड़े देवताओं ने परशुराम के इस अध्भुत पराक्रम की सराहना की और युद्ध भूमी पर पुष्पों की वर्षा
27:21होने लगी
27:23भुजाहीन होकर अत्यंत असहाय हुआ राजा अर्जुन फिर भी अहमकार्वश गर्जना करते हुए परशुराम को ललकारने लगा
27:32संपूर्ण स्रिष्टी में एक पल के लिए सन्नाटा चा गया जब परशुराम का परशु अंतिम प्रहार के लिए प्रल्यंकारी चमक
27:40से दीप्थो उठा
27:42और फिर एक ही जटके में परशुराम ने कार्थवीर्य अर्जुन का शीष धड़ से अलग करके उस अत्याचारी राजा का
27:49अंत कर दिया
27:51राजा के अंत के साथ ही देवलोक में शंकनाद गूंच उठा और तीनों लोकों में धर्म की पुनहस्थापना का उद्गोश
27:59हुआ
28:01परशुराम युद्धक्षेत्र के समीप बंधक बनी कामधेनू और उसके बच्छडे के पास पहुँचे और उनके बंधनों को प्रेमपूर्वक खोल दिया
28:10मुक्त हुई कामधेनू के साथ परशुराम दिव्य प्रकाश में खड़े होकर धर्म सत्य और न्याय की अजे शक्ती के प्रतीक
28:18बन गए
28:20परशुराम धर्म के ध्वजवाहक बनकर शांत वन पथों से होते हुए कामधेनू और उसके बच्छडे के साथ अपने पवित्र आश्रम
28:28की ओर अग्रसर हुए उनका हृदय विजय और कर्तव्य प्रायंता के संतोश से परिपूर्ण था
28:35वही सुदूर वैकुंठ लोक में भगवान विश्णू ने अपने शेशनाग शया पर विराजे हुए ब्रहमांड के इस न्यायपूर्ण मोर को
28:44मंद मुस्कान के साथ निहारा उनके मुखमंडल पर दिव्य शांती की आभा थी
28:50परशुराम ने कामधेनू और उसके बच्छडे को कोमलता से आगे बढ़ने का संकेत दिया जंगल के शांती पूर्ण हरिदय से
28:58गुजरते हुए जहां हर पत्ता उनकी विजय की गाथा गुनबुना रहा था
29:03मुक्त हुई कामधेनू अब बिना किसी भय के हरी भी घास चर रही थी यह द्रिश धर्म और सत्य की
29:10पुनरस्थापित शांती का एक जीवन्त प्रतीक था जिसे परशुराम ने अपनी भुजाओं के बल से अर्जित किया था
29:19दूरक्षितिच पर रिशी जमदगनी के आश्रम की शांत कुटियाए सुनहरी धूप में चमक रही थी परशुराम के लोटने की प्रतीक्षा
29:27में मानोस्वयन प्रकृती भी टकट की लगाय बैठी थी
29:32आश्रम में रिशी जमदगनी ध्यान में लीन थे, किन्तु उनके अंतर्मन में एक गहरी शांती और गौरव का अनुभव हो
29:39रहा था, जैसे उन्हें पुत्र की विजय का पूर्वज्यान हो गया हो
29:44जैसे ही परशुराम कामधेनू के साथ आश्रम के द्वार पर पहुँचे, रिशी जमदगनी ने अपनी आखें खोली और उनका हृदय
29:53पुत्र के शौर्य और निष्ठा को देख कर वातसल्य और गर्व से भर उठा
29:59आश्रम का वातावर्ण उच्सवपूर्ण हो उठा, जैसे देवताओं ने भी परशुराम की विजय पर पुश्प वर्शा की हो और कामधेनू
30:07की वापसी से एक नई उर्जा का संचार हुआ
30:11रिशी जमदगनी ने अपने पराक्रमी पुत्र परशुराम को स्नेह पूर्वक गले लगाया, उनकी आखों में अश्रु नहीं, बलकि अपने कुल
30:20के गौरव और धर्म की रक्षा के प्रती असीम संतोष था
30:24माता रेनुका, जिनकी आखों में पहले चिन्ता की परचाई थी, अब पुत्र और कामधेनू को सुरक्षित देखकर वादसल्यपूर्ण आसूओं और
30:34असीम राहत से चमक रही थी
30:37कामधेनू को आश्रम के भीतर एक पवित्र और स्वच गोशाला में श्रद्धा पूर्वक ले जाया गया, जहां उसकी दिव्य आभा
30:45से पूरा स्थान जग्मगा उठा
30:48समस्ट आश्रम वासी, रिशी जमदगनी के नेत्रित्व में परशुराम को उनके असाधारन पराक्रम के लिए आशिरवाद दे रहे थे और
30:57आश्रम में एक अनुपम शान्ती और सध्धाव व्याप्ट था
31:02दिन धलते ही आश्रम में उत्सव और आनंद की लहर दोड़ गई, अगनी प्रजवलित हुई, वैदिक मंत्रों का उच्चारण हुआ
31:10और सब ने मिलकर धर्म की विजय का गुनगान किया
31:14किन्तु इस उत्सव से अन्भिग्य महिश्मती नगरी में कार्तवीर्य अर्जुन की मृत्यू का समाचार शोक और क्रोध की काली छाया
31:22बनकर फैल गया, जिसने उसके पुत्रों के हृद्यों को प्रतिशोध की आग से भर दिया
31:29पिता की मृत्यू से मरमाहत होकर पुत्रों के मुख पर शोक की गहरी रेखाये खिंच गई, पर कुछ ही क्षणों
31:36में वह शोक दुर्दमे क्रोध और प्रतिशोध की ज्वाला में परिवर्तित हो गया
31:42मृत्यूदंड के साक्षी बने पुत्रों ने अपने पिता कार्तवीर्य अर्जुन की जली हुई चिता की राख पर हाथ रख कर
31:48परशुराम से प्रतिशोध लेने की भयावः शपत ली, जिसका प्रभाव तीनों लोकों में गूंध उठा
31:56उनकी प्रतिग्या की अगनी से प्रेरित होकर कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने एक गुप्त परिशद का आयोजन किया, जहां उन्होंने
32:04परशुराम और उनके आश्रम पर आक्रमन की भयावः योजनाय बनाना शुरू किया
32:10एक पुत्रने क्रोध से भरी आखों से एक प्राचीन मान्चित्र पर अपनी उंगली रखी, आश्रम के मार्ग और कमजोरियों को
32:19इंगित करते हुए, उसकी क्रूर मुस्कान उसके इरादों को दर्शा रही थी
32:24जिस समय आश्रम में शांती और विजय का उत्सव मनाया जा रहा था, उसी क्षण एक काली अद्रिश छाया धीरे
32:32धीरे उस पवित्र भूमी की ओर बढ़ रही थी, प्रासदी का अग्रदूत बनकर
32:38आनंद और उत्सव के बीच भी आश्रम के शांत वातावर्ण में एक सुक्ष्म बदलाव महसूस किया जा सकता था, एक
32:46अशांत उर्जा का अस्पष्ट आभास जो आने वाले भयानक तूफान का संकेट दे रहा था
32:53शांत आश्रम की हरियाली में एक अप्रत्याशित तनाव तैर रहा था, मानो प्रकृती भी आने वाले भयानक तूफान का पूर्वाभास
33:02कर रही हो, जहां सूरज की अंतिम किर्ने भी उदासी का रंगले रही थी
33:08सुदूर वैकुंट में भगवान विश्णू ने अपने कमल नेत्रों से प्रित्वी की ओर देखा, उनके शांत मुख पर एक सुक्ष्म
33:16चिन्ता की चाया मंदरा रही थी, जैसे वे आने वाले अंधकार को भांप रहे हो
33:22घने व्रिक्षों के पीछे से, कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों के नेत्रित्व में सशस्त्र सैनिकों का एक दल, उनकी क्रूर आखें
33:30आश्रम की ओर टिकी हुई, चुप्पी साधे हुए बढ़ रहा था, हर कदम विनाश का संकेत दे रहा था
33:38एक विशाल बर्गद के पेड़ पर बैठी एक उल्लूने लंबी और डरावनी आवाज में चीख मारी, जिसकी गूंज घाटी में
33:46फैल गई, आने वाली विपदा की भयाभता को और गहरा कर रही थी
33:52अचानक आश्रम की बाहरी दीवारे दरक गई और शांती भंग करते हुए, आक्रमन कारी गर्जना करते हुए पवित्र भूमी में
34:00प्रवेश कर गए, उनकी चीखें उच्सव की सभी आवाजों को निगल गई
34:06कैलाश परवतपर, भगवान शिव, गहन ध्यान में लीन, अपनी तीसरी आख पर एक सुक्ष्म तनाव महसूस करते हुए, धर्ती पर
34:14बढ़ते अधर्म और त्रासदी को अपने अंतरग्यान से भांप रहे थे
34:20प्रमुख आक्रमनकारी, कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रक, गर्व से अपने हथियार लहराते हुए, सीधे आश्रम के केंद्रिय आंगन में घुस आए,
34:29उनकी आखें कामधेनु गाय और जमदगने रिशी की ओर केंद्रित थी
34:35आनंद और विजय के प्रतीक के रूप में सजे हुए रंगीन, फूल और मालाय, सैनिकों के बूटों तले निर्ममता से
34:42कुचल दी गई, जो आश्रम की शान्ती के अंत का एक भयावः प्रतीक बन गया
34:49आश्रम में अराजकता फैल गई, जहां रिशिमुनी और उनके परिवार चीखते हुए इधर उधर भाग रहे थे, कुछ अपनी जान
34:57बचाने के लिए तो कुछ अपने प्रियजनों को बचाने के लिए
35:02वैकुंट के आकाश में उरते हुए, गरुड ने प्रित्वी की ओर अपने तीखे नेत्रों से देखा, उनकी सुनहरी आखे मानव
35:10जाती पर आई इस अकस्मात आपदा को देखकर चिन्ता से भर गई थी
35:16जमदगने रिशी अपने शांत और तेजस्वी चहरे पर ग्रिड संकल्प लिए, आक्रमन कारियों के सामने निडर्ता से खड़े थे, उनके
35:24हाथों में केवल एक साधारन लकडी का डंडा था, जो उनकी अदमें आध्यात्मिक शक्ती का प्रतीक था
35:32आश्रम के यग्यकुंड से उठती पवित्र अगनी अचानक बुझ गई, और चारों और राख और खून की बुदे फैल गई,
35:40जो धर्म के अपमान और अपवित्रता का एक भयानक संकेत था
35:45निर्बल जमदगने रिशी, कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों द्वारा चारों और से घिर गए, उनके चहरे पर अब भी एक अलौकिक
35:53शांती थी, यद्यपी उनके चारों और मृत्यु का घेरा कस रहा था
35:58एक कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र ने, जिसकी आखे घ्रिना और विजय के उन्माद से चमक रही थी, अपने खंजर को
36:07उचा उठाया और निर्मम्ता से वयोवरिध रिशी पर हमला करने का आदेश दिया
36:13एक क्रूर तलवार ने जमदगने रिशी के हरिदय को चीर दिया, और उनके शरीर से जीवन की जोती बुझ गई,
36:20जिससे आश्रम में एक गहरा स्तब्ध कर देने वाला सन्नाट आचा गया
36:26मृत्यू के क्षण में भी जमदगने रिशी के मुख पर एक अलौकिक शांती और क्षमा का भाव था, उनकी आखों
36:34से एक अंतिम अश्रुधारा प्रवाहित हुई जो उनके बलिदान का मौन गवाह बनी
36:40आश्रम अब खंडहर बन चुका था, चारों ओर से धुआ उठ रहा था और आक्रमनकारी संतोष की विक्रित मुस्कान के
36:48साथ कामधेनों को खोजने के लिए हर कोने को खंगाल रहे थे
36:53कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी आखे खोली, उनके चहरे पर गहरा दुख और क्रोध जलक रहा था, क्योंकि
37:01उन्हें प्रित्वी पर हुई इस जगन्य हत्या और अन्याय का बोध हुआ था
37:06विजोन माज से भरे कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र अपने हाथों में लूटे गए सामान और पवित्र कामधेनु गाय को लेकर
37:14ध्वस्ट आश्रम से बाहर निकल रहे थे, उनके पीछे बस विनाश और एक विध्वा की चीखें छोडते हुए
37:22आश्रम की पवित्र भूमी पर रक्त का एक गहरा धब्बा धीरे-धीरे फैल रहा था, जो केवल जमदगनी के बलिदान
37:30का नहीं, बलकी आने वाले भीशन प्रतिशोध का भी एक अशुब संकेत था
37:36विध्वा रेनुका की करोन चीखें उस उजाड जलते हुए आश्रम में गूंज रही थी, जो अब सिर्फ राख और तूटे
37:44हुए सपनों का धेर था
37:46कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र को हलके से चमकते हुए, प्रित्वी पर घटित इस जगन्य अन्याय
37:54और हत्या को गेहन दुख और क्रोध के एक बढ़ते हुए तूफान के साथ देखा
38:01विज्वनमाद से भरे कार्तवीर्य अर्जुन के अहंकारी पुत्र भगवीत कामधेनु गाय को खीचते हुए, जलते हुए आश्रम के अवशेशों से
38:10बाहर निकल रहे थे, उनके चहरों पर क्रूर हंसी फैली हुई थी
38:15धलते सूरज की किरने उस अपवित्र आश्रम पर लंबी भयावा परचाया डाल रही थी, जो धर्ती को एक गहरे लाल
38:23रंग से रंग रही थी, आने वाले भीशन विनाश का अशुब संकेट दे रही थी
38:29दूर से आती अपनी मा की हृदय विदारक चीखों से प्रेरित होकर, एक अकेला शक्तिशाली आकरिती, परशुराम, अपनी लंबी जटाओं
38:38और सुद्रिड काया के साथ, आश्रम की ओर तेजी से बढ़ रहा था
38:44वैकुंठ में शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु अपने दिव्यमुख पर शांत किन्तु द्रिट भाव लिये, परशुराम के आने वाले क्रोध
38:52को पहले से ही देख रहे थे, उसकी ब्रहमांडिय आवश्शक्ता को समझते हुए
38:58भयानक द्रिश्य से परशुराम की आखें चोड़ी हो गई, जब उन्होंने अपने पिता, रिशी जमदगनी का निर्मम शरीर अपने कभी
39:07शांतिपूर्ण घर के खंधरों के बीच पड़ा पाया
39:11एक प्रचंड तेज हवा अचानक आश्रम से होकर गुजरी, राख और पत्तियों को बिखेरती हुई, जो परशुराम की आत्मा में
39:19उठ रहे तूफान का प्रतिबिंब थी
39:22जैसे ही परशुराम अपने पिता के पास धेर हो गए, उनका दुख एक ज्वाला मुखी क्रोध में बदल गया, जिससे
39:30ऐसा लगा कि पूरा आश्रम ही अपनी सासे थामे हुए है
39:35देवी पार्वती, जिनकी आखों में करुणा और चिंता भरी थी, भगवान शिव के हाथ पर एक सांत्वना पूर्ण हाथ रखती
39:43हैं, जब वे परशुराम की पीडा के गवाह बनते हैं
39:49परशुराम अपने पिता के सिर को धीरे से गोद में उठाते हैं, उनके आसू पवित्ररक्ट के साथ मिल जाते हैं,
39:56और उनके तूटे हुए दिल में एक मौन प्रतिग्या आकार ले लेती है
40:02आश्रम के उपर का आकाश एक गहरे नीले और नारंगी रंग में बदल गया, जो पृत्वी पर उत्रे हिंसक उथल
40:09-पुथल और गहन क्षती को दर्शाता था
40:13पृत्वी को कमपक्पा देने वाली एक तीवर गर्जना के साथ परशुराम खड़े हो गए, उनका शक्तिशाली शरीर भय से नहीं,
40:21बलकि एक अदमय अपवित्र क्रोध से काम प्रहा था
40:26भगवान ब्रहमा, अपने कमल पर विराजमान, अपने चार मुखों पर गंभीर चिंतन व्यक्त करते हुए, ब्रहमांडिय घटनाओं में इस निर्नायक
40:34मोर को स्विकार करते हैं, शुद्धी के एक नियत युग की शुरुआत
40:40परशुराम ने अपने दिव्य परशु, फरसे की ओर हाथ बढ़ाया, जो उनके हाथ में एक भयावह, अग्निमय चमक के साथ
40:48स्पंदित होता प्रतीत होता था, अपने भयानक उद्धेश के लिए तयार
40:53अंधेरे आसमान के नीचे उसकी तेज धार चमकती हुई, परशुराम ने अपनी चमकती हुई कुलहाडी को उचा उठाया, जिससे हवा
41:02में एक लगभग द्रिश उर्जा का संचार हुआ
41:06दुख और पूर्ण संकल्प से भरी उनकी आवास, उस वीरान भूमी पर गूंज उठी, दुष्ट क्षत्रियों से प्रित्वी को शुद्ध
41:14करने की उनकी भयानक शपत का उद्धोश कर रही थी
41:18अद्रिश रूप से एक प्रित सेलेस्टियल बीइंग्स, भय और विस्मय के मिश्रण के साथ देखते हैं, क्योंकि परशुराम के शब्द
41:26कॉस्मोस में गूंचते हैं, एक नए युक का संकेत देते हैं
41:32परशुराम उनका चहरा प्रज्वलित क्रोध का मुखोटा बना हुआ था, उन्होंने प्रित्वी को क्षत्रेविहीन बनाने की अपनी गंभीर प्रतिज्या की
41:40घोशना की एक बार नहीं, बलकी 21 बार
41:45उनके नीचे की धर्ती भी काम्प उठी, क्योंकि परशुराम की भयानक प्रतिज्या ने दिव्य प्रतिशोध और विनाशकारी शुद्धिकरण के एक
41:54अध्वितिय युग की नीम रख दी