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वनवास के गहरे रहस्यों से भरी इस नई गाथा में, श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण चित्रकूट छोड़कर घने दंडकारण्य में प्रवेश करते हैं। जहाँ उनका सामना न केवल प्रकृति के क्रूर रूप से होता है, बल्कि भयानक राक्षस विराध से भी होता है। परम तेजस्वी अगस्त्य मुनि के आश्रम में श्रीराम को प्राप्त होते हैं ऐसे दिव्य अस्त्र, जो आने वाले युद्धों की नींव रखेंगे। पंचवटी में अपने आश्रम की स्थापना के पश्चात्, एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में रावण की बहन शूर्पणखा का आगमन होता है, जो वनवास के मार्ग में एक नया और विनाशकारी मोड़ लेकर आता है। इस एपिसोड में देखें कैसे वनवास की चुनौतियाँ श्रीराम को उनके दिव्य उद्देश्य की ओर धकेलती हैं। #PadmaPurana #Ramayana #RamaVanvas #Dandakaranya #Shurpanakha #VishnuAvatar #HinduMythology #EpicStories #AgastyaMuni #Panchavati #DivineWeapons #RamLeela
Transcript
00:00भरत के हृदय परिवर्तन और पादुकाओं के साथ नंदी ग्राम लोटने के पश्चात, श्री राम, देवी सीता और लक्षमन ने
00:08चित्रकूट के रमनिय आश्रम को त्याग कर गेहन वन की ओर अग्रसर होने का द्रिड संकल्प लिया.
00:14श्री राम की कमलन्यन आखों में एक गेहन प्रतिज्या चमक रही थी, क्योंकि उन्होंने अपने बनवास के लक्षे को प्राप्त
00:22करने के लिए इस पवित्र स्थान को त्यागने का निर्णय लिया.
00:27देवी सीता और लक्षमन ने मौन रहकर उनकी आग्या का पालन किया, अपनी थोड़ी बहुत सामगरी को पत्तों की पोटलियों
00:35में समेटते हुए, नए मार्ग की ओर बढ़ने के लिए तैयार.
00:40उनके पैरों तले की धूल में अनिश्चित भविश्य की गूंच थी, और पेडों की सरसराहट में अज्यात यात्रा का आहवान
00:47जो उन्हें उनके कर्तव्यपत पर आगे बढ़ा रहा था.
00:52चित्रकूट की पवित्र भूमी पर निवास करने वाले अनेक तपस्वी और रिशिगन उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े, अपने प्रियराम,
01:00सीता और लक्षमन को विदाई देने हे तू.
01:04देवी सीता ने प्रत्येक रिशी पतनी को श्रधा पूर्वक नमन किया, उनकी आखों में विदाई का कोमल दुख और आने
01:12वाली कठिन यात्रा का अदमय साहस पष्ट दिख रहा था.
01:17लक्षमन ने भी उन सभी तपस्वियों के चर्णों में जुखकर आशिरवाद लिया, जिनके पवित्र साननिध्य में उन्होंने चित्रकूट में कुछ
01:25समय बिताया था, उनके मुख पर कृतग्यता का भाव था.
01:30महर्शियों ने उन्हें उनकी तपस्या में बाधा न डालने के लिए उनके त्याद की सराहना की और अपने दिव्य आशिरवाद
01:37से उनके आगामी मार्ग को प्रकाशित किया.
01:41चित्रकूट के परिचित मार्ग को छोड़ कर तीनों ने गेहन वन की ओर प्रस्थान किया, जहां हर कदम के साथ
01:48अयोध्या की स्मितिया पीछे छूपती जा रही थी.
01:53श्रीराम सबसे आगे चल रहे थे, उनका शांत द्रेड चहरा आने वाली चुनोतियों का सामना करने के लिए तयार था,
02:00और उनकी चाल में एक अविचल संकल्प था.
02:04देवी सीता, उनके पीछे, प्रत्येक कदम को अत्यंत सावधानी और गरिमा के साथ रखती हुई, वन्देवी के रूप में अपने
02:13नए जीवन को सहचता से स्विकार कर रही थी.
02:18लक्षमन धनुषबान लिये हुए, सतरकता से उनके पीछे चल रहे थे, हर पल अपने अग्रजों की रक्षा के लिए तयार,
02:26जिनकी निष्ठा अटूट थी.
02:28घने वन के गहरे अरणियों में, जहां सूर्य की किरने मुश्किल से पहुचती थी, उन्होंने एक अत्यंत शांत और एकांत
02:36स्थान धूढा, जो उनकी नई तपस्या स्थली बनी.
02:41लक्षमन ने अपने पराक्रम और कुशल्ता से उस स्थान को उनके रहने योग्य बनाया, चारों और की वनस्पतियों का उप्योग
02:49करके एक साधारन कुटिया का निर्मान किया.
02:53श्री राम ने उस नवनिर्मित कुटिया में प्रवेश किया, उनके मुख पर संतुष्टी और शांती का भाव था, क्योंकि उन्होंने
03:01अपने वनवास का सच्चा आश्रय ढूड लिया था.
03:05चारों और घनभोर शांती थी, केवल पत्तों की सरसराहट और दूर से आती वन्य जीवों की ध्वनिया ही इस अरण्य
03:13की गहराई का एहसास करा रही थी.
03:16नई सुभा की स्वर्णिम किरने कुटिया पर पड़ रही थी, एक नए अध्याय की शुरुवात का संकेट देते हुए, जहां
03:24उनका जीवन प्रकृती के साथ पूर्ण सामंजस्य में था.
03:28श्रीराम ध्यान में लीन थे, उनके चहरे पर एक अलौकिक तेज चमक रहा था, जैसे वे इस वन्वास के गूड
03:36रहसियों को आत्मसाथ कर रहे हुँ.
03:39देवी सीता नदी के तटपर पुष्प और फल एकत्र कर रही थी, उनकी साथगी और कर्तव्यनिष्ठा इस नए परिवेश में
03:47और भी उज्वल दिख रही थी.
03:50वन्वास का मार्ग कठिन था, परंतु उनके अटूट विश्वास और प्रेम ने इस यात्रा को एक दिव्यत अपस्या में बदल
03:58दिया था, जो उन्हें उनके महान नेती की गोर ले जा रहा था.
04:03प्रातय काल की प्रथम किरने अभी वन के गहरे कोनों तक नहीं पहुँची थी कि श्रीराम, लक्षमन और देवी सीता
04:10ने एक बार फिर अपनी कठिन वन यात्रा का आरंब किया, घने व्रिक्षों की चाया में आगे बढ़ते हुए.
04:18सुदूर वैकुंठ लोक में भगवान विश्नु अपनी दिव्य मुस्कान के साथ शेशनाक पर विराजमान होकर प्रित्वी पर हो रही इस
04:27दिव्य तपस्या को अपलक निहार रहे थे. उनके हृदय में श्रीराम के प्रती अटूट प्रेम और विश्वास जलक रहा था.
04:35वन में एक अत्यंत कंटीला मारगा पड़ा, जहां घनी जाडिया और विशैले पौधे रास्ता रोके खड़े थे. तब लक्षमन ने
04:43अपनी कुलहाडी से कुशलता पूर्वक मारग प्रशस्त किया. श्रीराम और सीता को सुरक्षित आगे बढ़ाया.
04:51जैसे जैसे सूर्यक्षितिच की ओर जुक रहा था. घने वन की चायाये और भी गहरी होती जा रही थी. एक
04:58रहस्य में सन्नाटा पूरे परिवेश परचा गया, जिससे अद्रिश्य नेत्रों की उपस्थिती का आभास हो रहा था.
05:06अगले प्रभात में तीनों ने एक तीवर वेग वाली नदी को पार करने का निश्चय किया, जिसके पत्रीले तल और
05:14प्रबलधाराये उनकी द्रिड़ता की परीक्षा ले रही थी, पर वे एक दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़े.
05:21कमल के आसन पर विराजमान स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमाभी स्वर्गलोक से इस अध्वितिय तपस्या को देख रहे थे, उनकी
05:30चार मुखी आखों में संसार के चक्र का गूर ज्यान प्रतिबिम्बित हो रहा था.
05:35नदी पार करने के बाद देवी सीता ने तट पर कुछ दुरलब औश्धिय पौधों को पहचाना और स्ने से श्री
05:43राम को उनकी विशेश्टाय बताई जो प्रकृती के साथ उनके गहरे जुडाव को दर्शा रहा था.
05:50एक विशाल का एहिरन अपनी भव्यता से परिपूर्ण कुछ पल के लिए शांत भाव से उन्हें देखता रहा, मानो वन
05:57भी उनके दिव्य आगमन का साक्षी बन रहा हो, फिर वह धीरे से घने पेडों में उज़ल हो गया.
06:04उनकी यात्रा ने उन्हें अब एक अत्यंत खड़ी पहाडी धलान पर लाखडा किया, जहां घनी बेले और पत्रीले रास्ते उनकी
06:13शक्ती और सहनशील्टा की अंतिन परीक्षा ले रहे थे.
06:17कैलाश परवत के हिमशिकरों पर ध्यानमग्न भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख से एक सुक्ष्म तरंग महसूस की, जो श्री
06:26राम के संकल्प और प्रकृती की शक्ती के संतुलन का आभास दे रही थी.
06:32अचानक पेडों के बीच से एक बड़ा जुन्ड विदेशी पक्षियों का शोर करते हुए उर उठा, जिससे जंगल में एक
06:39शनिक खलबली मच गई, जो किसी अद्रिश्य खत्रे की चेताबनी दे रही थी.
06:45एक प्राचीन टेढामेढा विरिक्ष, जिसकी जड़े धर्ती में गहरे तक फैली हुई थी, और शाखाय आकाश चू रही थी, एक
06:53मुख प्रहरी की भाती खड़ा था, मानो वह वन के सभी रहस्यों का साक्षी हो.
06:59चलते चलते वे एक छोटे से वनस्थल में पहुँचे, जहां एक रहस्यमय उर्जा का अनुभव हुआ, मानो यहां प्रकृती और
07:08किसी प्राचीन शक्ती का संगम हो रहा हो.
07:12देवर्शी नारद अपने वीना के मधुरतारों को छेड़ते हुए, अपने दिव्य लोक में इस महाकाव्य यात्रा की गाथागा रहे थे,
07:20उनके हर स्वर में श्री राम के त्याग और धैर्य की महिमा गुंजायमान थी.
07:26उसी स्थल पर लक्षमन ने सतरकता से जमीन पर कुछ ताजे पच्चेहनों को देखा, जो एक विशालकाई जंगली जानवर के
07:34होने का संकेत दे रहे थे, और तुरंट अपना धनुष संभाल लिया.
07:39सूर्य अस्थ हो रहा था, उसकी अंतिम किरने वन के विशाल व्रिक्षों के बीच से चनकर आ रही थी, जिससे
07:46लंबी दरावनी चायाय बन रही थी, मानो पूरा जंगल प्रेटों की भूमी में बदल गया हो.
07:53रात बिताने के लिए उन्होंने एक छोटी प्राकृतिक गुफा खोजी, जो घनी जाडियों और लताओं से छिपी हुई थी, और
08:01वहां उन्होंने स्वयंकों बाहरी खत्रों से सुरक्षित महसूस किया.
08:06वैकुंट में देवी लक्षमी के साथ विराजमान भगवान विश्नु अपने शांत और आत्म विश्वासी भाव से प्रित्वी पर श्री राम
08:15के प्रत्येक कदम को देख रहे थे, उनकी आखों में एक दिव्य आश्वासन था.
08:21गुफा के अंदर श्री राम और लक्षमन ने एक छोटी सी अगनी प्रजवलित की, जिसकी मंद लौ में देवी सीता
08:28ने वन से एकत्र किये गए कंदमूल और फलों से एक साधा भोजन तयार किया, यह एक पवित्र अनुष्ठान जैसा
08:36लग रहा था.
08:38अगनी की शांत रोशनी उनके चहरों को उजवल कर रही थी, और बाहर अंधेरे चौकस वन की विशालता उनके द्रिड
08:46संकल्प के चारों और एक मुख गवाह की तरहे खड़ी थी, जो उनकी अटूट भावना का प्रतीक था.
08:53अगले प्रभात में सूर्य की पहली किर्ने वन के पत्तों को भेदती हुई प्रिथवी पर स्वर्णिन मार्ग बना रही थी,
09:01जब श्रीराम, सीता और लक्षमन ने अपनी आगे की यात्रा प्रारंभ की, उनका संकल्प हिमालय सा अटल था.
09:09वैकुंट में भगवान विश्नु और देवी लक्षमी, दिव्य कमल सिनहासन पर विराजमान, प्रित्वी पर घटित हो रहे इस पवित्र नाटक
09:18को अपनी शांत, सरवग्य द्रिष्टी से देख रहे थे, उनके मुख पर मंद मुस्कान थी.
09:24देवी सीता सावधानी से एक संकरी वन पकडंडी से गुजर रही थी, उनके कदम को मल और द्रेड थे, जैसे
09:32वे स्वयें इस दिव्य यात्रा की पवित्रता को अनुभव कर रही हो.
09:37घने पत्तों से छनकर आती सूर्य की किरने, जैसे भविष्य की आशा की किरने, उनके मार्ग को उजडवल कर रही
09:45थी, और वन की आत्मा उनके द्रेड निश्चय की मूख साक्षी बन रही थी.
09:51जैसे जैसे वे आगे बढ़ते गए, वन की गहराईयों में उन्हें दूर से धुए का हलका निशान और एक असपष्ट
09:58पकडंडी दिखाई देने लगी, जो किसी मानव बस्तिया पवित्र आश्रम की उपस्थिती का संकेत दे रही थी.
10:06वैकुंट में भगवान विश्णू ने अपने दिव्य संग्यान से महर्शी अत्री और देवी अनुसुया के आश्रम के महत्व को देवी
10:14लक्ष्मी को समझाया, उनके मिलने का समय अब निकट था.
10:19लक्ष्मन ने अपनी भुजाओं के बल से कुछ घनी जाडियों को साबधानी से हटाया, जिससे आगे का रास्ता और भी
10:27स्पष्ठ हो गया, आश्रम की और उनकी राह अब सुगम हो रही थी.
10:32एक शांत हिरन अपनी बड़ी चौकननी आखों से उन्हें कुछ क्षणों के लिए निहारता रहा, फिर धीरे से एक स्वच
10:40जलधारा में उतर गया, जो उन्हें पवित्र आश्रम की ओर अग्रसर होने का संकेत दे रहा था.
10:47जैसे ही वे वन से बाहर निकले, एक अत्यंत शांत और निर्मल आश्रम द्रिष्टि गोचर हुआ, जहां हवन कुंड से
10:55उठता धुआ और पवित्र मंत्रों की गूंज एक दिव्य आभा बिखेर रही थी.
11:01वैकुंट से भगवान विश्णों की आखें महर्शी अत्री के तपस्या पूर्ण आश्रम पर टिकी थी, मानों वे इस पवित्र मिलन
11:09की भूमि का लिख रहे हों.
11:11आश्रम के भीतर महर्शी अत्री अपनी कुटिया के बाहर शांत मुद्रा में ध्यान कर रहे थे, उनके चारों और एक
11:19दिव्य आभा प्रदीप्थ हो रही थी, उनकी गेहन तपस्या की शक्ती का प्रतीग.
11:25आश्रम की पवित्र भूमी पर तुलसी के पौधे और सुगंधित पुश्पों से सजी वेदिया, जीवन और आध्यात मिक्ता के दिव्य
11:33संतुलन का प्रतीग थी, जो आने वाले अतिथियों का स्वागत कर रही थी.
11:39महर्शी अत्री और देवी अनुसुया, अपने आश्रम के द्वार पर अत्यंत प्रेम और आधर के साथ श्री राम, सीता और
11:47लक्षमन का स्वागत करने के लिए खड़े थे, उनके मुख पर दिव्य प्रसन्ता थी.
11:53वैकुंट में भगवान विश्नु और देवी लक्षमी के चहरों पर एक गहरी संतुष्टी और आनन्द की चमक थी, जैसे वे
12:01इस पवित्र मिलन के हर क्षण को स्वयंजी रहे हों.
12:06देवी सीता ने जुककर परम आदर के साथ देवी अनुसुया के चर्णों का स्पर्ष किया, उनके मन में पावन तपस्विनी
12:14के प्रती अगाध श्रधा उमड़ पड़ी.
12:17महर्शी दमपत्ती ने अपने अतिथियों को शुद्ध जल और वन के ताजे फल भेंट किये, जो उनकी सादगी और अतिथी
12:25सतकार की परमपरा का प्रतीक था.
12:28देवी अनुसुया सीता को पातिवरत धर्म के गूड सिधानतों का उपदेश दे रही थी, उनके शब्दों में ज्यान और मा
12:36का गहरा वादसल्य घुला हुआ था, जो सीता के हृदय में उतर गया.
12:42वैकुंठ में भगवान विश्नु और देवी लक्ष्मी के चहरों पर संतोष की गहरी आभा थी, जैसे उन्होंने स्वय इस पवित्र
12:50शिक्षा के महत्व को अनुभव किया हो, जो युगों तक गूंजेगी.
12:55अपने उपदेश के उपरांत, देवी अनुसुया ने सीता को दिव्य वस्त्र और अनुपम आभूशन भेंट किये, जो उनकी तपस्या की
13:03शक्ती से उतप्रोत थे, उनकी पवित्रता का प्रती.
13:08दिव्य वस्त्रों और आभूशनों से सुसजित देवी सीता, उनकी कांती और भी बढ़ गई थी, आश्रम का वातावर्ण भी उनकी
13:16पावन आभा से आलोकित हो उठा, जैसे स्वयन स्वर्ग धरा पर उतर आया हो
13:23रिशी अत्री और माता अन्सुया से आशिर्वाद लेने के उपरांत, श्रीराम, लक्षमन और देवी सीता घने एवन रहस्य में दंडकारण
13:32यवन की सीमा में प्रवेश करते हैं
13:35उस दुर्गम वन के भीतर कदम रखते ही चारों और व्याकुल सन्नाटा चा गया, जबकि श्रीराम अत्यंत सतर्क होकर अपने
13:43धनुशबान पर हाथ रखे आगे बढ़ रहे थे
13:48प्राचीन व्रिक्षों के नीचे बिखरे हुए रिशियों के कंकाल और सुखे रक्त के निशान इस बात का संकेट दे रहे
13:55थे कि यह वन खुंखार राक्षसों का निवास थल बन चुका है
14:00एकाएक संपूर्ण वन थर्थरा उठा और वायू में एक भयंकर दुष्ट उर्जा की गंध फैल गई जिससे व्रिक्षों से पक्षी
14:08भयभीत होकर उड़ने लगे
14:10मेध करजन जैसी हुकार भरते हुए परवताकार राक्षस विराध प्रकट हुआ जिसकी विशाल काया देखकर घने जंगल के छायादार मार्ग
14:20भी कांप उठे
14:22विराध का भयानक चहरा विशाल दात और लोहे के शूलों से जड़ा भाला उसकी नरिशनस्ता की कहानी कह रहे थे
14:30जिसकी जलती हुई आखें देवी सीता पर टिक गई
14:34पलक जपकते ही उस दैत्य ने अपनी भीमकाय भुजाएं बढ़ा कर देवी सीता को जपट लिया और अपने विक्राल हास्य
14:42से पूरे जंगल को दहला दिया
14:45सीता जी के संताप को देखकर भगवान श्रीराम का सौमे मुखमंडल क्रोध की प्रचंड जवाला से प्रजवलित हो उठा और
14:53उनकी आखें सूर्य के समान लाल हो गई
14:57बिना एक भीक्षन गवाय श्रीराम और लक्षमन ने एक साथ अपने प्रत्यंचा को खीचा और बानों की तीवर बौचार राक्षस
15:06पर प्रारंभ कर दी
15:08श्रीराम के स्वर्णजडित बानों ने राक्षस विराध के वक्षस्थल और भुजाओं को भेद दिया जिससे वह पीडा से चीतकार कर
15:17उठा
15:18तीवर पीडा के कारण राक्षस के हाथ धीले पड़ गए और उसी क्षन लक्षमन ने फुर्ती से आगे बढ़कर देवी
15:26सीता को सुरक्षित अपने पीछे कर लिया
15:29देवी सीता को सुरक्षित देख कर भी विराध का रोश शांत नहीं हुआ और वह अपनी काली मायावी शक्तियों को
15:36जागरत करते हुए श्री राम की ओर जप्ता
15:40अपनी वर्दान प्राप्त अजेता के घमंड में विराध अपने विशाल लोहे के त्रिशूल को लहराता हुआ श्री राम और लक्षमन
15:48को कुचलने के लिए आगे बढ़ा
15:51श्री राम ने एक ही दिव्यबान से विराध के भाले को खंडखंड कर दिया जिससे उसकी धातु के टुक्रे दसो
15:58दिशाओं में बिखर गए
16:00जब शस्त्र भी निश्वल प्रतीत होने लगे तब दोनों भाईयों ने अपनी अपार शारिरिक शक्ती का प्रयोग करते हुए राक्षस
16:08की विशालकाय भुजाओं को मरोड कर तोड़ दिया
16:12असहाई और धराशाई होकर विराध को एहसास हुआ कि उसके सामने स्वयं जगतपती विश्नु के अवतार खड़े हैं जिससे उसके
16:21मन का पाप नश्ट होने लगा
16:24अपने पूर्वजन्म के गंधर्व रूप और तुम्बुरु नाम के शाप का स्मरण करते हुए विराध ने श्रीराम से स्वयं को
16:31भूमी में गाड़ कर मुक्त करने की प्रार्थना की
16:35श्रीराम की आग्या से लक्षमन ने अपने बानो और बाहुबल से एक गहरा गढढ़ा खोदा जिसमें उस विशालकाय राक्षस को
16:43स्थापित किया गया
16:45जैसे ही श्रीराम ने गड़े को मिट्टी से ढखा विराध के शरीर से एक दिव्य गंधर्व की स्वर्णिम आत्मा मुक्त
16:53होकर वैकुंठ लोग की ओर उर्चली
16:56राक्षस के अंत के साथ ही दंडकारणिय वन में फैली असुरक्षा समाप्थ हो गई और श्रीराम सीता एवन लक्षमन पवित्र
17:04रिशियों के सनरक्षन हेतु वन के और गहरे भागों की ओर निकल पड़े
17:10विराध के वध के उपरांट श्रीराम, देवी सीता और लक्षमन दंडकारणे के घने और प्राचीन वन मार्ग पर आगे बढ़ने
17:18लगे
17:19वन में आगे बढ़ते ही, वर्षों से भैभीत तपस्वी रिशी अपने शांत आश्रमों से निकल कर मर्यादा पुरुशोत्तम के दर्शन
17:28हेतु एकत्र होने लगे
17:30पूज रिशियों ने श्रीराम के चर्णों में नत्मस्तक होकर उनका भावपून स्वागत किया और दुष्ट राक्षस के अंत पर प्रसन्नता
17:38व्यक्त की
17:40किन्तु उस पावन उत्सव के बीच भी रिशियों के कान्तिहीन मुख मंडल पर राक्षसों के अत्याचारों का गहरा भैस पष्ट
17:48जलक रहा था
17:50रिशियों के प्रमुक श्रीराम को वन के एक अत्यंत वीरान और भैभीत करने वाले स्थान की ओर ले गए जहां
17:58एक रिदयविदारक द्रिश दिखाई दिया
18:01व्रिद्ध महर्शी ने अश्रुपूरित नेत्रों से श्रीराम को बताया कि ये विशाल धेरों में पड़ी अस्थिया उन पवित्र साधों की
18:09हैं जिनहें राक्षसों ने मार डाला था
18:12इस भयावह और करोन द्रिश को देख कर देवी सीता अत्यंत ग्रवित हो गई और उनके नेत्रों से अश्रुबह निकले
18:22निश्पाप रिशियों के इस निर्मम नर्सनहार ने वीर लक्षमन के मन में प्रचन प्रतिशोध की ज्वाला भड़का दी
18:29वन में रहने वाले समस्त तपस्वी श्री राम के चारों और घुटनों के बल बैठ गए और रोते हुए अपने
18:36प्राणों की रक्षा के लिए गुहार लगाने लगे
18:40रिशियों की इस दैनिय स्थिती और क्रंदन को सुनकर मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम का धर्म प्रायन हृदय द्रवित और अत्यंत
18:48क्रोधित हो उठा
18:50श्री राम ने तुरंट अपने कंधे से दिव्यास्त्रों से सुसजित विशाल और अजय धनुष को दंड को उठाकर अपने हाथ
18:58में संभाला
18:59श्री राम ने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर समस्त रिशियों के समक्ष इस प्रित्वी को राक्षसों से विहीन करने की भीश्म
19:07प्रतिग्याली
19:09श्री राम की इस महा प्रतिग्या के बोलते ही पूरे दंड कारणिय वन में एक दिव्यस वर्निंग प्रकाश फैल गया
19:16और वातावर्ण पावन हो गया
19:19आकाश में गुप रूप से उपस्थित समस्त देवों ने श्री राम के इस महान संकल्प को सुनकर उन पर पारिजात
19:26के पुश्पों की वर्शा की
19:29श्री राम के इस निर्भय अभयदान को पाकर सभी रिशियों के चहरे पर परम शान्ती और आनंद की मुस्कान तैर
19:36गई
19:38रिशियों ने श्री राम, सीता और लक्षमन का पाध्य और अर्ध्य से विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें अनेक अमोग आशिरवाद
19:46दिये
19:48तत्पश्चात शांत वन मार्ग पर आगे बढ़ते हुए देवी सीता ने श्री राम से बिना प्रत्यक्ष बैर के भी अस्त्र
19:55उठाने के विशय में सौमय प्रश्न किया
19:58श्री राम ने मुस्कुराते हुए प्रिय सीता को समझाया कि शर्नागत रिशियों की रक्षा करना और धर्म की पुनरस्थापना करना
20:06ही क्षत्रिय का परम धर्म है
20:09इस धर्मचर्चा के पश्चात वे तीनों दिव्य यात्री महात पस्वी सुतीक्ष्न रिशी के पावन आश्रम की दिशा में आगे बढ़
20:17चले
20:19श्रीराम के आगमन मात्र से ही दंड कारणे का भयानक वातावन एक शांत सुरमय और पावन तपोवन में परिवर्तित हो
20:27गया
20:28महर्शी सुतीक्ष्न के पावन आश्रम में पहुँच कर श्रीराम, माता सीता और लक्षमन ने उस तपोनिष्ट संत के दर्शन किये
20:37महर्शी सुतीक्ष्ण ने असीन हर्ष से भर कर अपने आराध्य श्रीराम को कंदमूल, फल और शीतल जल अर्पित कर उनका
20:45आतिथ्य सतकार किया
20:48भक्तिभाव में लीन होकर सुतीक्ष्ण मुनी ने श्रीराम से प्रार्थना की की वे दंडकारने के महांतम ज्यानी महर्शी अगस्त्य के
20:56दर्शन हेतु आगे बढ़े
20:59महर्शी सुतीक्ष्ण से आग्या और शुभ आशिर्वाद प्राप्त करके वे तीनों दिव्य पथिक अगस्त्य मुनी के आश्रम की ओर अग्रसर
21:08हुए
21:09घने वनों, कलकल बहती नदियों और पुश्पित लताओं को पार करते हुए वे महर्शी अगस्त्य के पावन मंडल में प्रविष्ठ
21:17हुए
21:17उस आश्रम का शांत और अलौकिक वातावर्ण वेदमंत्रों की सुम्धूर ध्वनियों से निरंतर गुंजायमान हो रहा था
21:26विंध्य परवत का मान मरदन करने वाले महान तपस्वी अगस्त्य मुनी को जब श्री राम के आगमन की सूचना मिली
21:34तो उनका हृदय आनन्द से भर उठा
21:37महर्शी अगस्त्य स्वयन डौड कर अपने आश्रम के द्वार पर आये और उन्होंने प्रभु श्री राम को अपार प्रेम से
21:44निहारा
21:46श्री राम लक्षमन और सीता ने मुनिश्रिष्ट अगस्त्य के चर्णों में श्रधा पूर्वक प्रणाम किया
21:53महर्शी अगस्त्य ने श्री राम को उठा कर अत्यन्त स्नेह से अपने हृदय से लगा लिया और उनका अभिनन्दन किया
22:02आश्रम के भीतर श्री राम का यथायोग्य पूजन करके मुनी ने उन्हें दिव्य फल और अमरित्तुल्य रसका भोग अर्पित किया
22:11तत्पश्चात अगस्त्य मुनी ने दंड कारणिय में राक्षसों के बढ़ते अत्याचारों और धर्म की रक्षा के लिए श्री राम के
22:19अवतारों देश्य की चर्चा की
22:21रिशी अगस्त्य ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित भगवान विश्नु का अतिशक्तिशाली दिव्य धनुष श्री राम को भेंट करने हेतु प्रस्तुत किया
22:31इस धनुष के साथ ही उन्होंने कभी न समाप्थ होने वाले बानों से भरे दो अक्षय तरकश भी श्री राम
22:38को प्रदान किये
22:40मुनी ने एक अत्यंत तीक्षन और देदी प्यमान खडगभी सौंपी जो दुष्टों का सहार करने में पूर्णत है समर्थ थी
22:49इन अमोग और अलौकिक अस्त्रशस्त्रों को धारण कर श्री राम एक महातेजस्वी धर्मरक्षक के रूप में सुशोभित होने लगे
22:58श्री राम ने इन दिव्य उपहारों को अत्यंत आदर पूर्वक ग्रहें किया और महर्शी के प्रती अपनी कृतग्यता व्यक्त की
23:07देवी सीता और लक्षमन ने भी श्री राम के इस अलौकिक रूप को देखकर मन ही मन इश्वर का धन्यवाद
23:14किया
23:15महर्शी अगस्त्य ने श्री राम को आगे के प्रवास के लिए गोदावरी तट पर स्थित पंच्वटी नामक सुरमय स्थान पर
23:23जाने का परामर्श दिया
23:25अगस्त्य मुनी से पावन आशीश लेकर श्री राम, सीता और लक्षमन पंच्वटी की दिशा में अपनी मंगल यात्रा पर निकल
23:33पड़े
23:34महर्शी अगस्त्य का आशिर्वाद लेकर भगवान श्री राम, माता सीता और भ्राता लक्षमन दंड कारणे के अतिगेहन और सुन्दर वनों
23:43में आगे बढ़ते चले गए
23:46यात्रा के दौरान श्री राम ने देवी सीता को वन के विहंगम प्राकृतिक सौन्दर्य और पशुपक्षियों के आनंदमय जीवन के
23:54बारे में बड़े प्रेम से बताया
23:57भ्राता लक्षमन एक सजग प्रहरी की भानती धनुष पर बान चड़ाए मार्ग में आने वाली हर छोटी बड़ी गतिविधी पर
24:04पैनी द्रिष्टी बनाए हुए थे
24:07यद्यपी वातावर्ण में प्राकृतिक सौन्दर्य विखरा था
24:11किन्तु रिशियों द्वारा दी गई चेताबनी के अनुसार वन के कोने कोने में राक्षसों की अवांचित छाया का आभास हो
24:18रहा था
24:20जैसे जैसे वे आगे बढ़े शितिच पर पवित्र गोदावरी नदी का विशाल और शांत जल प्रवाह सूर्य की किर्णों में
24:28स्वर्ण की भांती चमकता दिखाई दिया
24:31गोदावरी के पावन तट को देखकर श्री राम के मुख पर एक दिव्य संतोष छा गया और उन्होंने अगस्त्य मुनी
24:38के शब्दों को स्मरण किया
24:41देवी सीता ने गोदावरी के शुद्ध जल का आचमन किया और उस सुरमय वातावर्ण के प्रती अपनी गहरी कृतग्यता व्यक्त
24:49की
24:50नदी के पास ही पाँच विशाल और प्राचीन वटवरिक्षों का एक समोग खड़ा था जिनकी शाखाए आपस में मिलकर एक
24:59प्राकृतिक छत्र का निर्मान कर रही थी
25:02के भ्राता लक्ष्मन यही वह पंच्वटी स्थल है जिसके बारे में महर्शी अगस्त्य ने संकेत दिया था श्री राम ने
25:10चारों और देखते हुए कहा
25:13लक्ष्मन ने अग्रज राम के आदेश को शिरोधार्य करते हुए तुरंत ही वहा एक सुन्दर और सुरक्षित परणकुटी के निर्मान
25:21की योजना बनाई
25:23लक्ष्मन ने बड़ी कुशल्ता से मजबूत लकडियों, बास और विशाल पत्तियों को एकत्र करके एक दिव्य और सुद्रिड कुटिया का
25:31निर्मान आरंभ किया
25:33कुछ ही समय में गोदावरी के तट पर एक अत्यंत मनमोहक और पवित्र परणकुटी बनकर तयार हो गई, जो शान्ती
25:41का प्रतीक प्रतीत हो रही थी
25:44श्री राम और सीता ने कुटिया के भीतर प्रवेशकर उसे अपना आवास स्विकार किया और वहां की पवित्र भूमी को
25:52नमन किया
25:53श्री राम ने लक्ष्मन के परिश्रम और कलात मक्ता की मुक्त कंट से प्रशंसा करते हुए उन्हें गले से लगा
26:00लिया
26:02रातरी के आगमन पर लक्ष्मन ने कुटिया के बाहर प्रहरी का पद संभाला और अपनी धनुर विद्या के साथ पूरी
26:09निष्ठा से चौक्सी करने लगे
26:12गोदावरी की लहरों में चंद्रमा का प्रतिविंब तैर रहा था और पच्वटी का पूरा वातावर्ण एक अलौकिक निरवता में डूब
26:20गया
26:22प्रातैकाल होते ही श्री राम और सीता ने गोदावरी में स्नान कर रिशियों की भांती सूर्यदेव को अर्ग्य दिया
26:30यद्यपी पंच्वटी में शांती चाचुकी थी परंतु दूर जनस्थान के वनों में राक्षसों का नायक खर अपने गुप्तचरों के माध्यम
26:38से स्थिती पर नजर बनाये हुए था
26:42राक्षसी गुपतचरोने खर और दूशन को पंच्वटी में दो तेजस्वी राजकुमारों और एक सुन्दर नारी के आगमन का समाचार दिया
26:51नेती का चक्र घूमने लगा था, जहां पंच्वटी की पवित्रता और जनस्थान के राक्षसों की दुश्टता के बीच एक महान
26:59युद्ध का आधार बन रहा था
27:02गोदावरी नदी के तटपर स्थित पंच्वटी के शांत और पावन वन में शीतल मंद समीर और चहक्ते पक्षियों का सुन्दर
27:10वातावर्ण फैला हुआ था
27:13भगवान श्री राम ने अपने छोटे भाई लक्षमन से उस पवित्र भूमी पर एक सुन्दर और द्रिड आश्रम बनाने का
27:20विचार प्रकट किया
27:23भ्रात्र भक्ती से उतप्रोथ लक्षमन ने पूरी निष्ठा के साथ कंदमूल, विशाल, पत्तों और काष्ट की लकडियों से कुटिया निर्मान
27:31का कार्य आरंभ किया
27:33पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बीच लक्षमन ने कुटिया के चारों और एक सुरक्षात्मक और पावन आभामंडल स्थापित किया
27:43कुछ ही समय में पंच्वटी के मध्य में एक दिव्य, मजबूत और भव्य पर्णकुटी बनकर तयार हो गई जो मन
27:50को शांती देने वाली थी
27:52उस सुन्दर और सुरक्षित कुटिया को देख कर माता सीता का हरिदय असीम आनंद और कृतग्यता से भर उठा
28:01श्री राम ने लक्षमन की वास्तुशिल्प कला और अगाध प्रेम की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए उन्हें गले से लगा
28:08लिया
28:10गोदावरी के शांत जल पर ढलते सूर्य की स्वर्णिम किरने पंच्वटी के आश्रम को एक आलोकिक कांती प्रदान कर रही
28:17थी
28:19श्री राम की उपस्थिती के प्रभाव से उस वन के हिंसक जीव भी अपनी स्वाभाविक शत्रुता भोलकर शांत और मित्रवत
28:27हो गए थे
28:28कुटिया के आंगन में स्थापित शिवलिंग की पूजा करते हुए देवी सीता ने संपूर्ण संसार के कल्यान की मंगल कामना
28:36की
28:38संध्याकाल में श्री राम कुटिया के बाहर बैठकर लक्षमन और सीता को अध्यात्म और धर्म के गूढ रहसियों का ज्यान
28:45देने लगे
28:47पंच्वटी की इस असीम शांती के विपरीत दूर जनस्थान की सीमाओ पर राक्षसी कुछक्रों के काले बादल उमड रहे थे
29:06तचरों से पंच्वटी में दो तेजस्वी धनूर्धारियों की उपस्थिती सुनकर राक्षस्पती खर के मन में तीवर क्रोध भर आया
29:15खर का सेनाप्ती दूशन अपनी विशाल लोहे की गदा को चमकाते हुए अयोध्या के राजकुमारों को ललकारने की योजना बनाने
29:23लगा
29:24नेती के विधान के अनुसार श्रीराम की सात्विक उर्जा और राक्षसों की तामसिक शक्ती के बीच महासंग्राम का समय निकट
29:33आ रहा था
29:34अगली प्रभात पंच्वटी में शीतल ओस की बूंदों और कमलों की भीनी सुगंध के साथ एक नई आशा लेकर आई
29:43श्रीराम अपने दिव्यधनुष को धारण कर आश्रम की सुरक्षा हेतु सावधान द्रिष्टी से चारों ओर का निरीच्षन करने लगे
29:52माता सीता ने आश्रम के तुलसी विरिक्ष को जल अर्पित कर अपने वनवासी जीवन में आत्मिक संतोष का अनुभव किया
30:00पंच्वटी का यह आश्रम अब आने वाले भयंकर राक्षस संगराम से पूर्व श्रीराम के लिए परमशान्ती और दैविय शक्ती का
30:09केंद्र बन चुका था
30:12पंच्वटी के शांत आश्रम में जहां श्रीराम, सीता और लक्षमन अपने वनवास का निर्वेहन कर रहे थे
30:19अचानक एक अप्षक उनसा वातावर्ण चा गया जैसे कोई अनिष्ट शक्ती समीप आ रही हो
30:26श्रीराम जिनकी प्रत्येक इंद्रिय प्रकृती के साथ एकाकार थी, उन्होंने वायू में फैले उस आसन्न खत्रे को ततकाल भांप लिया,
30:35उनके दिव्यन नयन गेहन विचार में डूग गए
30:38घने वन के साए से निकल कर रावन की बहन विक्राल राक्षसी शूर्पनखा अपने वास्टविक भयंकर रूप में श्रीराम के
30:47आश्रम की ओर भूरते हुए, काली शक्तियों का आभास दे रही थी
30:53श्रीराम के अनुपम सौंदर्य से मोहित होकर शूर्पनखा ने अपने घ्रेनित रूप का त्याग कर एक अपसरा समान मोहक स्त्री
31:01का रूप धारन करने का निश्चय किया, जो उसके कपट और लालसा का प्रतीक था
31:07पलक जपकते ही, भयानक राक्षसी एक अत्यन्त रूप वती स्त्री में परिवर्तित हो गई, जिसकी सुंदर्ता किसी मायावी स्वपन से
31:16कम न थी, छल के लिए सजीड जी
31:19अपनी नवप्राप्त सौंदर्य की मादक्ता में चूर शूरपनखा सीधे श्री राम के समक्ष प्रस्तुत हुई, उनके हृदय में प्रेम और
31:27वासना दोनों का ज्वार उमड रहा था
31:30श्री राम ने अपने दिव्यज्ञान से उसकी माया को तुरंत पहचानते हुए भी एक वनवासी के शालीन स्वभाव से उसका
31:39स्वागत किया और उसके आगमन का कारण पूछा
31:43शूर्पन्खा ने अपनी मीठी वानी में श्री राम के प्रती अपने अगाध प्रेम का वर्नन किया और उनसे सहचरी के
31:51रूप में स्विकार करने का आगरह किया अपनी वासना को प्रेम का जामा पहनाते हुए
31:57श्रीराम ने अपनी मधुर मुसकान के साथ बड़ी चतुराई से उसे अपने विवाहित होने की बात कही और उसे अपने
32:05छोटे भाई लक्षमन के पास जाने का सुझाव दिया
32:10श्रीराम की बात सुनकर शूरपणखा आशा से भरकर लक्षमन के पास पहुँची जो उस समय आश्रम के व्रिच्षों को सींच
32:18रहे थे
32:20लक्षमन ने श्रीराम की ओर संकेत करते हुए अपनी वागपटुता और हास्य का प्रयोग करते हुए शूरपणखा को यह कहकर
32:28अस्विकार कर दिया कि वे तो श्रीराम के दास हैं
32:33लक्षमन के तीखे व्यंग्य से और अपने बार-बार के अनादर से शूरपणखा का धीरच जवाब देने लगा और उसके
32:41मुख पर क्रोध की काली चाया मंदराने लगी
32:45इस अपमान से तिल मिलाकर शूरपणखा पुनह श्रीराम के पास लौट आई इस बार उसके स्वर में कटुता और आखों
32:53में अधिकार का भाव था
32:55जब शूरपणखा ने श्रीराम के साथ सीता को देखा तो उसके मन में इरश्या की अगनी भड़क उठी उसे सीता
33:03अपनी राह का कांटा लगने लगी
33:06इर्श्या से अंधी होकर शूर्पन्खा ने अपने मायावी रूप का परित्याग करते हुए सीता पर जपटने का प्रयास किया, उसकी
33:15असली राक्षसी प्रकृती उजागर हो गई
33:19ततकाल श्री राम ने अपनी दिवेगती से आगे आकर सीता और उस क्रोधित राक्षसी के बीच स्वयं को ढाल बना
33:26लिया, उनके मुख पर अब गंभीरता थी
33:29यह देखकर लक्षमन ने क्रोधित होकर अपनी तलवार निकाली और श्री राम की आग्या पर शूरपनखा को दंड देने के
33:38लिए आगे बढ़े
33:40लक्षमन ने शीघरता से आगे बढ़कर शूर्पन्खा को उसके घ्रेनित प्रयास के लिए दंडित किया
33:46उसकी नाक और कान काट डाले जिससे वह अपनी वास्तविक भयावता में छट पटाने लगी
33:54अपने कटे हुए अंगो से रक्तसराव करती हुई शूर्पन्खा दर्द और अपमान से चीक उठी उसकी माया छिन्नभिन हो चुकी
34:02थी
34:03अपने अपमानित और विरूपित रूप में शूर्पन्खा पूरे वन को अपने भयानक चीटकारों से गुनजायमान करती हुई
34:11वहां से भाग निकली भविश्य के विनाश का बीजारोपन करते हुए
34:17शूर्पन्खा के भागने के बाद पच्वटी का वह पावन वनपुना शांत हो गया जहां व्रिक्षों से धली स्वर्णमे किरने भूमी
34:25पर छनकर बिखरने लगी
34:28श्रीराम ने अपने शांत और करुनापूर्ण नेत्रों से भयभीत देवी सीता की ओर देखा और अत्यंत मधुर वचनों में उन्हें
34:36आश्वस्त करते हुए अपने पास बिठाया
34:39वीर लक्षमन ने अपने तेजस्वी खडग को एक पवित्र कपडे से पोँचकर म्यान में वापस रखा और अपने जेश्ट भ्राता
34:47श्रीराम के चर्णों में विनीत भाव से प्रणाम किया
34:52उधर्क घंगोर दंकारणिय में भागती हुई शूरपणखा के पच्चाप से सूखी पत्तिया और वन की भूमी काप उठी जो आसन्न
35:00महाविनाश का संकेट दे रही थी
35:04शूरपणखा के विक्राल चीटकारों से जनस्थान की राक्षसी बस्ती के दूर दूर फैले काले पत्थर के दुर्ग और प्राचीर देहल
35:12उठे
35:13अपने सम्मुख लहूलुहान और विरूपित शूरपणखा को देखकर राक्षस सेनापती खर का मुख अत्यधिक क्रोध से लाल हो गया और
35:22उसके नेत्र अगनी की भाती जलने लगे
35:25शूरपणखा ने उच्चस्वर में विलाप करते हुए खर और दूशन के समक्ष अपने नाककान कटने का क्रूर समाचार सुनाया और
35:34प्रतिशोध के लिए पुकारा
35:36खर के भयानक हुकार भरते ही उसकी गदा भूमी से तकराई जिससे जनस्थान के राजदर्बार की शिलाए चटक गई और
35:44चारों और भय की लहर फैल गई
35:48जनस्थान के दुर्गम छेत्र में चारों और काले बादल घिराए और भयंकर गिध्ध हाकाश में मंदराने लगे, जो राक्षसों के
35:56अंत का अशुब पूर्वाभास था
36:00दूशन ने अपने भाई खर की ओर देखते हुए भीशन गर्जना की और प्रतिज्याली की वह उन दोनों तपस्वियों का
36:07रक्त बहा कर अपनी बहन का अपमान मिटाएगा
36:10खर ने अविलंग 14 शक्तिशाली और खूंखार राक्षस योद्धाओं को आदेश देकर श्री राम और लक्षमन का वध करने हेतु
36:19पंचवटी की ओर रवाना किया
36:22उन 14 राक्षसों के हाथों में चमकते त्रिशूल और फरसे लेकर प्रस्थान करते ही वन के व्रिक्षों के पत्ते भय
36:30से कापने लगे और सन्नाटा चा गया
36:33पंचवटी की परणकुटी के आसपास संध्या की सुनहरी धूप धल रही थी जहां श्री राम ने दूर से आती आसुरी
36:41आहट को अपने सुक्षम बोध से पहचान लिया
36:45श्री राम ने मुस्कुराते हुए लक्षमन को देवी सीता की सुरक्षा का दायत्व सौपा और स्वय अपने अक्षय तूनीर से
36:53दिव्यधनुष धारन कर लिया
36:55श्री राम ने अपने दिव्य धनुष की प्रत्यंचा को खीच कर जैसी ही टंकार की संपूर्ण दंड कारणिय में उसकी
37:03घोर ध्वनी गूंध उठी
37:05धनुष की उस अलौकिक तंकार से वायू में स्वर्णमे किरने प्रस्पुटित हुई जिन्होंने रात्री के आगमन से पूर्वी वन के
37:14अंधकार को चीर दिया
37:16व्रिक्षों की आर से निकल कर वे चौधा क्रूर राक्षस हुंकार भरते हुए श्री राम की परनकुटी के सामने आधम
37:23के
37:24श्री राम ने अपने तेजस्वी मुकुट और शान्त मुखमंडल के साथ उन राक्षसों की ओर देखा उनके नेत्रों में धर्म
37:32की विजय का अटूट विश्वास था
37:35एक ही क्षण में श्री राम ने अपने धनुष से 14 बानों का संधान किया जो अगने की ज्वालाओं की
37:42तरहें चमकते हुए सीधे राक्षसों की ओर लपके
37:46श्री राम के अचूक बानों ने पलक जपकती उन 14 राक्षसों के प्राण हर लिये जिसने लंकापती रावन के पतन
37:54के अंतिम अध्याय का श्रीगनेश कर दिया

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