मिथिला में देवी सीता से विवाह के पश्चात, अयोध्या लौटते श्रीराम के मार्ग में कौन खड़ा हो गया? जब शिव धनुष तोड़ने का प्रतिशोध लेने स्वयं भगवान परशुराम आ पहुंचे, तब तीनों लोकों में भय छा गया। क्या श्रीराम परशुराम के दिव्य वैष्णव धनुष की चुनौती स्वीकार करेंगे? इस एपिसोड में देखें कैसे श्रीराम ने अपने परम अवतार का परिचय दिया और एक महाकाव्य का मार्ग प्रशस्त किया। #PadmaPurana #Ramayana #LordRam #Parashuram #VishnuAvatar #HinduMythology #EpicStories #DivineChallenge
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00:00मिथिला नगरी से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हुए, श्री राम, लक्षमन, भरत और शत्रुगन अपनी नव विवाहित वधू, राजा
00:08दशरत और महर्शी विश्वामित्र के साथ एक भव्य और अत्यंत हर्षित जुलूस में आगे बढ़ रहे थे।
00:16देवलोक में भगवान विश्णु अपने दिव्य सिनहासन पर विराजमान होकर इस अलौकिक विवाह और राम के अयोध्या आगमन के अद्वितिय
00:25महत्व को गहन शांती और दूरदर्शिता के साथ निहार रहे थे।
00:30मुख्यरत में विराजमान श्रीराम और देवी सीता एक दूसरे को देख मुसकराते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके चहरे पर
00:38नवविवाहित प्रेम और आने वाले भविश्य की अनंत आशा स्पष्ट जलक रही थी।
00:44जुलूस के उपर देवगणों द्वारा आकाश से पुष्पवर्शा हो रही थी और दिव्यवाध्ययंत्रों की मधुर ध्वनी वातावन को और भी
00:53अधिक पवित्र और आनंदमय बना रही थी।
00:57वनमार के शांत और मनमोहक द्रिश्यों के बीच से गुजरता यह शाही काफिला एक सुखद यात्रा का अनुभव कर रहा
01:04था, जहां हर मोर पर प्रकृती अपनी सुन्दर्ता बिखेर रही थी।
01:09कैलाश परवत्पर समाधिस्थ भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से इस पवित्र यात्रा को देखा और अपनी ध्यानस्थ अवस्था में
01:18भी राम के आगमन के महत्व को समझा।
01:21महाराज दश्रत महर्शी विश्वामित्र के साथ अपनी प्रजा के बीच चलते हुए अपने चारों पुत्रों के सफल विवाह से अत्यंत
01:30संतुष्ट और गर्वित महसूस कर रहे थे।
01:33इस दिव्य जुलूस के चारों और एक अलौकिक आभा थी जो साधारन धूल को भी स्वर्णिन कणों में बदल रही
01:41थी, जिससे यह यात्रा एक उचसव से कहीं अधिक प्रतीत हो रही थी।
01:46जैसे ही काफिला आगे बढ़ा, वनमार्ग थोड़ा और घना होने लगा, जिससे वातावर्ण में एक हलकी अप्रत्याशित शान्ती और गंभीरता
01:56चागई, जो आने वाले किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत थी।
02:01स्रिष्टी के रचिता, ब्रह्मा जी अपने कमल आसन पर बैठे हुए, भविश्य के संकेतों को पढ़ रहे थे और परशुराम
02:09के आगमन की आसन्न चुनौती को समझ रहे थे।
02:14रथों में बैठे राजकुमार और उनकी वधुए, आसपास के बदलते द्रिश्यों और वातावर्ण की हलकी गंभीरता को महसूस कर रहे
02:22थे, उनके चहरों पर एक नई उत्सुकता थी।
02:27अचानक वातावर्ण में एक सुक्ष्म कमपन महसूस हुआ, जैसे कोई महान शक्ती समीप आ रही हो, जिसने जुलूस के उत्साह
02:35को क्षण भर के लिए रोक दिया।
02:38सहसा मार्ग के सामने एक गहरा, भयावा अंधकार छा गया, जैसे किसी अद्रिश्य शक्ती ने सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध
02:46कर दिया हो, जिससे पूरा जुलूस थम गया।
02:50शीर सागर में भगवान विश्नु, परशुराम के तीवर क्रोध और उनके आगमन की अप्रिहार्य शक्ती को अपने दिव्यद्रिष्टी से देख
02:58रहे थे, उनका चहरा शांत किन्तु गंभीर था।
03:03जुलूस में शामिल लोग अचानक फैले अंधकार और अद्रिश्य शक्ती के प्रभाव से भयभीत होकर एक दूसरे को देख रहे
03:11थे, उनके चहरे पर चिन्ता और अचरज का भाव था।
03:15दूर से एक प्रचंड वायू का जोंका आया, जिससे धूल के बवंडर उठे और घने पेड़ भी भय से काप
03:23उठे, जैसे किसी दिव्य प्रकोप का आगमन हो रहा हो।
03:27धूल और गर्जना के बीच, महा प्राक्रमी परशुराम अपने भयंकर फरसे को धारण किये हुए, क्रोध और तेज से परिपून
03:35मार्ग के ठीक बीच में प्रकट हुए, जिससे पूरा ब्रहमांड कांप उठा।
03:41देव लोक में सभी देवगण, परशुराम के अचानक और प्रचन आगमन से विस्मित और चिंतित होकर इस अप्रत्याशित तक्राव के
03:50साक्षी बन रहे थे।
03:52परशुराम ने अपनी भयंकर आखों से श्रीराम की ओर देखते हुए, अपने फरसे को उपर उठाया और एक चुनोती भरे
04:00स्वर में उनसे वैशनव धनुष को उठाने का आहवान किया।
04:05चारों और प्रित्वी काप उठी, आकाश में गर्जना हुई और परशुराम के दिव्यक रोध से उत्पन उर्जा ने पूरे वातावर्ण
04:13को एक भीशन युद्ध के आहवान में बदल दिया।
04:17परशुराम के प्रचंड टेर से संपून दिख्दिगंत थर्थरा उठे और आकाश में सूर्य का प्रकाश काले भयावः बादलों के पीछे
04:26विलुप्त होने लगा।
04:28राजा दश्रत ने भयभीत होकर हाथ जोडे और महर्शी वशिष्ट की ओर कातर द्रिश्टी से देखते हुए अपने कुल और
04:36नवविवाहित राजकुमारों की रक्षा की प्रार्थना की।
04:40क्रोधागनी में धधकते भगवान परशुराम ने अपने कंधे से नारायन के अभेद्य और दिव्य वैशनव धनुष को उतार कर भूमी
04:48पर स्थापित किया।
04:50उस वैशनव धनुष से निकलती नीली और स्वर्णिन दिव्य उर्जाने वातावर्ण में एक भयानक संहारक तरंगे उत्पन्न कर दी।
05:00बारात के घोडे और हाथी भय से चिंगाडने लगे तथा आकाश में पक्षियों के जुन्ड अनिष्ट की चेताबनियों के साथ
05:07दिशाहीन होकर उरने लगे।
05:10लक्षमन का मुख क्रोज से लाल हो उठा और वे अपने जेश्ट भ्राता की अभहेलना सह न सके, किन्तु श्री
05:18राम ने एक सौमय संकेट से उन्हें शांत रहने को कहा।
05:22परशुराम ने हुंकार भरते हुए कहा कि यदि दशर्थ नंदन वास्तव में क्षत्रिय वीर हैं, तो इस दिव्य वैशनव धनुष
05:30पर प्रत्यंचा चढ़ाकर अपनी सामर्थ्य सिद्ध करें।
05:34अंतरिक्ष में उपस्थित ब्रह्मा, शिव और इंद्रदेव चिंताकुल होकर इस असीन वैशनव और भारगव तेजों के भावी मिलन को देखने
05:43लगे।
05:44चारो और अंधकार गाढ़ा होता गया और परवत शिखर भयंकर भूकंप के कारण आपस में टकरा कर चटकने लगे।
05:53मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम ने परशुराम के तीवर वचनों को अत्यंत नमरता और अलोकिक मुस्कान के साथ स्वीकार किया।
06:02श्रीराम अपने दाहिने हाथ से उस गुरुतर वैशनव धनुष को स्पर्श करने के लिए शांत कदमों से आगे बढ़े।
06:11जैसे ही श्रीराम के चर्णों ने उस स्थान की रज को छुआ, संपून ब्रहमांड में शांती का एक अलोकिक प्रकाश
06:18फैल गया।
06:20प्रल्यकारी तूफान एक क्षण के लिए थम गया और संपून प्रकृती श्रीराम के उस अवतार रूप को पहचान कर नत्मस्तक
06:28हो गई।
06:29पर्शुराम ने आश्चर्यचकित नेत्रों से देखा कि श्रीराम के शांत सौंदर्य के पीछे नारायन का अनंत ब्रहमांडिय स्वरूप दिखाई देने
06:38लगा था।
06:39श्रीराम ने अनायासी ही एक हाथ से उस विशाल वैशनव धनुष को उपर उठाया, जिससे आकाश मंडल में एक भीशन
06:48गूंज उत्पन हुई।
06:50धनुष के उठते ही उससे निकली सहसरों सूर्यों के समान दीप्ती ने परशुराम के उग्रतेज को निश्प्रभ करना प्रारंभ कर
06:58दिया।
07:00दिशाओं का अंधकार छंटने लगा और गगन से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी, जिससे समस्त बारात में छाय अनिश्ट
07:08का भय मिट गया।
07:10श्रीराम ने परशुराम की ओर देखते हुए मधुर स्वर में कहा कि वैशनव धनुष पर संधान किया गया बान व्यर्थ
07:17नहीं जाता, इसलिए वे बताएं कि इसका लक्ष्य क्या हो।
07:22परशुराम का क्रोध छिन्न भिन्न हो गया और उन्होंने कापते हाथों से स्विकार किया कि वे समझ चुके हैं कि
07:29श्रीराम स्वय भगवान नारायन के पूर्ण अवतार हैं।
07:34परशुराम ने अपना सारा तपस्वी तेज श्री राम के चर्णों में समर्पित किया और आकाश में अनिष्ट के सभी संकेट
07:42एक नए धर्मयुक के आगमन में परिवर्तित हो गए
07:47परशुराम जिनके मुखमंडल पर अब तक क्रोध की ज्वाला धधक रही थी, शान्ती और विस्मय से भर गए, मानो युगों
07:54का बोज उनके कंधों से उतर गया हो
07:58अपने दिव्य फरसे और वैशनव धनुष को जो अब तेज हीन दिख रहे थे, नीचे रखते हुए उन्होंने श्री राम
08:05से अंतिन प्रणाम किया
08:08ततपश्चात परशुराम ने अपनी दिव्य शक्ती को समेखते हुए, अपनी तपस्या की गहनता में पुना लीन होने के लिए एकांत
08:16परवतिय मार्ग की और प्रस्थान किया
08:20परशुराम के प्रस्थान के साथ ही वायुमंदल में छाई घंगोर उर्जा शान्त हो गई और एक दिव्य शान्ती ने पूरे
08:27वातावर्ण को आच्छादित कर लिया
08:31रिशिमुनियों और उपस्थित सभी राजाओं ने इस अद्भुत द्रिश्य को देख श्री राम के अप्रतिम पराक्रम और इश्वरत्व को हृदय
08:39से स्विकार किया
08:41महाराज दश्रत की आखें आनंद और गर्व से भर आई क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र में साक्षात नारायन के दर्शन किये
08:50श्री राम ने वैशनव धनुष को अत्यंत सहचता से उठा कर गुरु वशिष्ट और विश्वामित्र को सादर लोटाया
08:58इस दिव्य घटना के उपरांत अयोध्या का भव्य जुलूस अब एक नवीन उत्साह और भक्ती के साथ अपने मार्ग पर
09:06आगे बढ़ा
09:08नगर भर में मंगल गीप गाए गए और फूलों की वर्शा हुई जो श्री राम के पराक्रम और परशुराम के
09:15समर्पन का उच्सव मना रहे थे
09:18स्वर्ग लोग से देवतागन भी पुश्प वर्शा कर रहे थे श्री राम के इस महिमामय कृत्य की सराहना करते हुए
09:27श्री राम सभी की स्थुती और प्रशंसा के मध्य भी अत्यंत विनम्र और शांत बने रहे जैसे यह सब उनके
09:35लिए एक सामान्य घटना हो
09:37यह घटना मात्र एक संधर्ष का अंत नहीं बलकि धर्म की पुनरस्थापना और एक नए युग के आरंभ का प्रतीक
09:45बन गई
09:47जुलूस अंतह भव्य अयोध्या राजप्रसाद के मुख्य द्वार पर पहुँचा जहां राजपरिवार के सदस्य प्रतीक्षा कर रहे थे
09:56कौशलिया, सुमित्रा और कैकेई ने अपने पुत्र को सकुषल और विजी देख अपनी आखों से बहते आसुओं को पोच्छा
10:05श्रीराम ने अपनी माताओं के चरण स्पर्ष कर उनका आशिरवाद लिया उनके मुख पर वही शांत मुस्कान थी
10:14राजप्रासाद के भीतर अब एक गहरी शांती और भक्ती का वातावर्ण था जो प्रभु श्रीराम की उपस्थिती से और भी
10:22दिव्य हो गया
10:24चारो भाई श्रीराम, भरत, लक्षमन और शत्रुगन एक साथ खड़े थे उनकी एकता और प्रेम ने राजकुल को और भी
10:32सुद्रिड किया
10:34महर्शी वशिष्ठ और विश्वामित्र अपने शिश्यों की इस महिमा को देख अत्यंत संतुष्ट और गर्वित थे
10:41अब अयोध्या में उत्सव और उल्लास के बीच आगामी महत्वपूर्ण राजसी कारियों की तैयारी आरंभ हुई जो धर्म की स्थापना
10:51को आगे बढ़ाएंगे
10:53इस प्रकार परशुराम श्रीराम समवाद ने न केवल एक युग का अंत किया बलकि चिरस्थाई धर्म और मर्यादा के नए
11:01अध्याय की नीम रखी
11:04अयोध्या के भव्य प्रांगण में तेजस्वी परशुराम का आगमन किसी प्रल्यंकारी तूफान से कम नहीं था
11:10जिसने क्षण भर में उच्सव के वातावर्ण को गंभीर चुनोती के गर्जना में बदल दिया
11:17उनकी भुजाओं का बल और नेत्रों का तेज जिसने 21 बार प्रित्वी को क्षत्रियों से वहीन किया था
11:24श्रीराम के सम्मुख एक अटल चुनोती बनकर खड़ा था
11:28परशुराम ने गर्जनाकी की शिव का पिनात भंकर श्रीराम ने अपने कुल का महापमान किया है
11:35और यह कार्य किसी भी क्षत्रिय को शोभा नहीं देता
11:39इस अप्रत्याशित तक्राव से अयोध्या का पूरा वातावर्ण स्तभ रह गया
11:44जहां हर कोई आगामी घटनाकरम की भीशनता को भांप रहा था
11:50असाधारन क्रोध में परशुराम ने भगवान शिव के पिनाक धनुष की महीमा
11:54और अपने गुरु महादेव के प्रती अपनी अदमय भक्ती का विस्तरत वर्णन किया
12:01मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम के समक्ष परशुराम ने अपने गुरु महादेव के प्रती अटूट निश्ठा और पिनाक धनुष के तूटने
12:09से उत्पन्न अपने अपमान का वर्णन किया
12:12यह सुन लक्षमन का रक्त खॉल उठा, उन्होंने आवेश में आकर परशुराम की बातों का प्रतिवाद किया, किन्तु श्री राम
12:20ने उन्हें सन्यम बरतने का संकेत दिया
12:24परशुराम ने तब एक भयानत प्रतिग्या की कीवे किसी भी ऐसे क्षत्रिय को नहीं छोडेंगे जो शिव के धनुष का
12:31अपमान करेगा, जिससे वातावर्ण और भी भारी हो गया
12:36फिर परशुराम ने अपने हाथों में भगवान विश्नु का दिव्य वैशनव धनुष प्रकट किया, जो स्वर्णिम आभा से जग्मगा रहा
12:44था, और श्री राम को चुनौती दी
12:48परशुराम ने श्री राम से कहा कि यदी वे सच्चेक शत्रिय हैं, तो इस वैशनव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर
12:55दिखाए, जो स्वय भगवान विश्नु का है
12:59समस्त राजसी सभाश्वास रोके हुए देख रही थी, जैसे स्वयन समय भी इस दिव्य चुनौती के आगे थम गया हो
13:07यह वह धनुष था जिसे स्वय भगवान विश्नु ने धारन किया था, और इसकी महिमा शिव के पिनाक से किसी
13:15भी मायने में कम नहीं थी
13:17श्री राम ने शांत भाव से उस दिव्य वैश्नव धनुष को अपने हाथ में लिया, जिसकी महिमा तीनों लोकों में
13:24विख्यात थी
13:26जैसे ही श्री राम ने धनुष को उठाया, परशुराम के क्रोधित मुख पर भी एक क्षण के लिए विस्मय और
13:33संदेह की परचाई उभराई
13:36मर्यादा पुरुशोत्तम ने क्षण भर में उस अजे धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी, जैसे वह कोई साधारन लकडी का टुकड़ा
13:44हो
13:45प्रत्यंचा चढ़ाने की गूंच से पूरा ब्रहमांड कांप उठा और परशुराम को अपनी प्रतिग्या का भयंकर परिणाम स्पष्ट दिखाई देने
13:54लगा
13:55श्रीराम ने प्रत्यंचा चढ़ाने के बाद पूछा की अब वे इस वैशनवबान को किस लक्षे पर चलाएं जिससे परशुराम का
14:03अहंकार क्षण भर में चूर-चूर हो गया
14:07ततपश्चात परशुराम ने अपने जीवन भर की तपस्या का फल और अपने वैशनवी तेज को श्रीराम में समाहित होते देखा
14:15और उन्हें अपने आराध्य भगवान विश्नु के अंश के रूप में पहचाना
14:21श्रीराम ने अपनी शक्ती के प्रयोग से परशुराम के गर्व को शांत कर उनके तपका फल ब्रहमांड में लोटा दिया
14:28जिससे धर्म की पुनहस्थापना हुई
14:31इस प्रकार परशुराम के क्रोध की ज्वाला शांत हुई और वे श्रीराम के समक्ष नत्मस्तक होकर तपस्या के लिए महेंद्र
14:40परवत की ओर प्रस्थान कर गए एक नए युग का सूत्रपात करते हुए
14:45परशुराम के प्रस्थान के पश्चात वहां उपस्थित समस्ट जनसमुदाय एक गहन शान्ती और विस्मय में डूबा रहा, मानो अभी भी
14:54उस अलोकिक शक्ती के प्रभाव से मुक्त न हुए हो
14:58राजा दशरत की आखों में अपने पुत्र के प्रती अगाध प्रेम साथ ही उस दिव्य शक्ती का भय स्पष्ट जलक
15:05रहा था, जिसने उनके हृदय को एक ही क्षण में खुशी और चिन्ता से भर दिया था
15:12श्री राम अपने धनुष को शांत भाव से नीचे रख, दिव्य तेज से प्रकाशत होते हुए एक नए युग के
15:19सूत्रपात के प्रतीक स्वरूप अविचल खड़े थे
15:23जहां परशुराम खड़े थे, वहां की वायू में अभी भी एक सुक्ष्म स्वर्निम आभा तैर रही थी, जो इस बात
15:31का प्रमार थी कि स्वय देवों ने इस घटना का साक्षी बनकर धर्म की पुनस्थापना देखी है
15:38इस अध्भुत घटना के पश्चात, अयोध्या लोटने का शाही का फिला धीमी गती से आगे बढ़ा, परंतु अब हर किसी
15:46के मन में श्री राम के प्रती एक गहन श्रद्धा और विस्मय का भाव था
15:52वैकुंठ लोक में, शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ देवी लक्षमी को आश्वस्त किया की धर्म
16:00की स्थापना के लिए उनका अवतार उचित दिशा में अग्रसर है
16:05भय और राहत के मिले जुले भावों से अभिभूत राजा दशरत ने आगे बढ़कर अपने प्रिय पुत्र श्री राम को
16:12गले लगाया, उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी
16:17आकाश से हलकी हलकी पुष्प वर्षा हो रही थी, मानोस्वय देवगण इस अभूत पूर्वक्षन की प्रशंसा करते हुए श्री राम
16:26के दिव्यस्वरूप को स्वीकार कर रहे हुँ
16:29अब मार्ग के प्रत्येक व्रिक्ष, प्रत्येक लता को श्री राम के दिव्यस पर्ष से पावंता प्राप्थ हो गई थी और
16:36वे अयोध्या की ओर एक पवित्र तीर थे आत्रा पर निकल पड़े थे
16:42कैलाश परवत पर ध्यानमगन भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख को क्षण भर के लिए खोला, उनके होठोन पर एक
16:49रहस्यमय मुस्कान तैर रही थी, जो ब्रहमांडिय योजनाओं की पूर्णता का संकेत थी
16:56रिशिमुनी और शाही दल के सदस्य एक दूसरे से विस्मय भरी द्रिश्टी से देख रहे थे, उनकी फुस्कुसाहटों में श्री
17:04राम के वास्तविक स्वरूप की महीमा गुंज रही थी
17:08वन के प्राणी भी अपने बिलों और जाडियों से निकल कर एक अलौकिक शांती के साथ इस दिव्य काफिले को
17:15देख रहे थे, जैसे वे भी इस क्षण की पवित्रता को महसूस कर रहे हूँ
17:21मार्ग अब धीरे धीरे चोड़ा होता गया और क्षितिच पर अयोध्या नगरी के भव्यद्वार और उंची अट्टालिकाय दिखाई देने लगी,
17:29जो आज पहले से कहीं अधिक दैविय आभा से चमक रही थी
17:34कमल पर आसीन ब्रहमाजी अपनी चारों दिशाओं में देखते हुए स्रिजन और नेती के इस जटिल खेल पर गहन विचार
17:42कर रहे थे, श्री राम की लीलाओं को ब्रहमांडिय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण मानते हुए
17:49सीता, श्री राम के समीब चलती हुई, उनकी आखों में अपने दिव्यपती के प्रती अगात प्रेम, समर्पन और भविश्य की
17:57घटनाओं की गहरी समच स्पष्ट दिखाई दे रही थी
18:02अस्थ होता हुआ सूर्यक शितिच को नारंगी और बैंगनी रंगों से रंग रहा था, मानो वह भी इस दिन की
18:09असाधारन घटना का सम्मान कर रहा हो और आने वाले परिवर्तन का संकेट दे रहा हो
18:16अंतर शाही दल अयोध्या के भव्य द्वारों पर पहुँच गया, जहां नागरिक अपने राजा और राजकुमारों के स्वागत के लिए
18:24उच्सुक्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे, उनके हृदय में मिश्रित भावनाय थी
18:30नारद मुनी वैकुंट के दिव्य मंडप में अपनी वीना बजाते हुए, श्रीराम की महिमा और उनके पराक्रम की गाथाओं से
18:38समस्त लोकों को मंत्र मुग्ध कर रहे थे
18:41राजा दशरत, गर्व और विन्मर्ता के एक अनोखे मिश्रण के साथ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को प्रतीक्षा करती हुई प्रजा
18:49के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिनके मुख मंडल पर अब दैविय आभा और भी प्रबल थी
18:56अयोध्या नगरी पर एक अलौकिक प्रकाश छाजाता है, जो धर्म, न्याय और दैविय शासन के राम राज्य के सूत्रपात का
19:04प्रतीक है, एक ऐसे युग का, जहां प्रत्येक आत्मा को परम शांती प्राप्थ होगी
19:11अयोध्या के विशाल राज महल के प्रांगण में, नवस्थापित राम राज्य की उर्जा से स्पंदित वातावर्ण में, उत्सव का उल्लास
19:19चारों दिशाओं में गूँज रहा था
19:22राजा दश्रत, जिनका हरिदय पुत्र प्रेम और प्रजा के प्रती कर्तव्यभाव से उत्प्रोथ था, श्री राम की ओर गर्व से
19:30देख रहे थे, उनकी आखों में अश्रूओं की हल्की चमक थी
19:35श्री राम अपने दिव्य नीले वर्ण और सौमे मुख मंडल के साथ प्रजाजनों के अभिनंदन को शांत चित्ट से स्विकार
19:42कर रहे थे, उनकी आभा से सारा वातावर्ण प्रकाशित था
19:47तभी एक अप्रत्याशित खगोलिय घटना ने आखाश में एक गहन अंधकार फैला दिया, जिससे उत्सव का उल्लास एक क्षण के
19:56लिए ठहर गया, मानों आने वाली चुनौती का संकेत दे रहा हो
20:01वायू में एक अजीब सा कमपन महसूस होने लगा, जैसे किसी अग्यात प्रचंड शक्ती के आगमन की घोशना हो रही
20:09हो, जिसने उत्सव के वातावर्ण में एक अप्रत्याशित सन्नाटा भर दिया
20:15महर्शी विश्वामित्र और वशिष्ट, जो अब तक शांत बैठे थे, एक दूसरे की ओर चिंता भरी द्रिष्टी से देखने लगे,
20:23उनके अनुगवी चेहरों पर आने वाली विपदा की परचाई थी
20:28एकाएक एक भयंकर गर्जना से पूरा प्रांगन कांप उठा, जैसे प्रित्वी स्वयं विचलित हो गई हो और एक तेज प्रकाश
20:36पुन्च क्षितिज से तेजी से निकट आता दिखाई दिया
20:41परशुराम अपने कंधे पर प्रचंद परशु धारण किये, क्रोध और प्रतिशोध की अगनी में जलते हुए एक दिव्य योध्धा की
20:49भांती प्रकट हुए, जिनकी प्रत्येक चाल में ब्रहमांध हिल उठता था
20:54उनकी उपस्थिती मात्र से अयोध्या के विशाल प्रांगण में उपस्थित सभी लोग भैभीत हो गए, उनके चहरे पर आतंक और
21:03विस्मय के भाव स्पष्ट थे
21:06परशुराम ने अपनी तेजस्वी आखों से सभा को चीरते हुए, सीधे श्रीराम पर अपनी कुरुध द्रिष्टी केंद्रित की, मानो वे
21:14ही उनके क्रोध का मूल कारण हो
21:17उन्होंने गरच्ते हुए पूछा, किसने मेरे गुरु शिव के धनुष को तोड़ा? कौन है वहक्षत्री जिसने इस संसार में मेरे
21:26क्रोध को चुनौती देने का दुस्साहस किया है?
21:30उनके शब्दों की गून से वातावर्ण में एक भय मिश्रित चुपपी छा गई, मानो समस्त ब्रह्मान उनके इस प्रश्ण का
21:37उत्तर जानने के लिए ठहर गया हो
21:41राजा दश्रत अपने पुत्र के जीवन की चिन्ता से व्याकुल होकर कापते हाथों से परशुराम के सम्मुखाय, उनसे क्षमा याचना
21:49करते हुए, उन्हें शान्त करने का प्रयास कर रहे थे
21:54दश्रत के भयभीत निवेदन पर भी परशुराम का क्रोध शान्त नहीं हुआ, उनकी आखों में अब भी वही प्रचंड अगनी
22:01धधक रही थी
22:03सभी उपस्थित देवता और मनुष्य श्रीराम की ओर देख रहे थे, उनकी आखों में आशा और भय का मिश्रण था,
22:11क्योंकि वे ही इस अप्रत्याशित संकट का एक मात्र समाधान थे
22:17एक गहन नीरवता ने पूरे वातावर्ण को घेर लिया, केवल परशुराम की प्रचंड उर्जा और श्रीराम की शान्त उपस्थिती के
22:25बीच का अद्रिश्य तनाव ही महसूस हो रहा था
22:29श्रीराम अपने दिव्य नीले वर्ण और सौमे मुख मंडल के साथ ग्रिढता और अलोकिक तेज से युक्त शान्त भाव से
22:37परशुराम की चुनोती स्विकार करने के लिए आगे बढ़े
22:41उनकी आखों में एक अविचलित ग्रिढता और एक ऐसा अलोकिक तेज था जो उनके दिव्य स्वरूप की प्रत्यक्ष जलक दे
22:50रहा था जिससे स्वयम परशुराम भी एक क्षण के लिए विस्मित हो गए
22:55परशुराम जिनके क्रोध ने कभी किसी को जुकने नहीं दिया था श्रीराम के अलोकिक तेज से क्षण भर के लिए
23:02अपनी क्रुद्ध मुद्रा भूल गए उनकी आखों में एक अप्रत्याशित आश्चर्य था
23:08इस दिव्यक्षण में ब्रहमांड के सभी लोकों में एक शांत उर्जा प्रवाहित हुई जैसे कोई महान रहस्य उजागर होने वाला
23:17हो जो धर्म की पुनह स्थापना का मार्ग प्रशस्त करेगा
23:22उस शांत उर्जा के बीच समस्त वातावर्ण एक अज्यात प्रतीक्षा से भर गया जैसे स्वयंकाल भी अपनी गती धीनी कर
23:30चुका हो जो एक युग परिवर्तन का साक्षी बनने को आतुर था
23:35वैकुंठ लोक में भगवान विश्नु जिनके शामनी वर्ण का तेज सहस्त्र सूरियों से भी अधिक प्रखर था अपनी आनंदमई मुद्रा
23:44में मंदमंद मुस्कुराए मानों वे इस क्षण की प्रतीक्षा युगों से कर रहे थे
23:51परशुराम ने अपने बल्शाली हाथों में वैश्नव धनुष को संभाला हुआ था जिसका दिव्य तेज अब कुछ शांत पड़ गया
23:58था जैसे वह स्वया अपने नए स्वामी की प्रतीक्षा कर रहा हो
24:04धनुष से निकल रही दिव्य आभा जो कभी परशुराम के क्रोध की ज्वाला थी अब एक शांत सुनहरी रोश्नी में
24:11बदल गई थी जो आसन्न परिवर्तन की प्रतीक थी
24:16श्री राम ने अत्यंत शांत और गंभीर भाव से अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया उनकी आखों में एक असीन धैर्य
24:24और ब्रहमांडिय शक्ती का संगम था
24:28उपस्थित रिशिमुनी और देवगण जिन में नारद मुनी भी थे अपने नित्रों में विस्मय लिए इस अध्भुत द्रिश को देख
24:35रहे थे उनकी वीना से भी अनायास ही शांत सुर निकलने लगे थे
24:41एक गेहन निश्वास के साथ परशुराम ने वैशनव धनुष को श्री राम के हाथों में सौंप दिया उनके चहरे पर
24:48पहली बार क्रोध के स्थान पर एक अध्रिश्य सम्मान का भाव झलक रहा था
24:54जैसे ही धनुष ने हाथ बदले एक सुक्ष्म उर्जा तरंग पूरे ब्रहमाड में फैल गई जैसे युगों से प्रतीक्षित एक
25:02दिव्य धरोहर अपने वास्तविक स्वामी के पास लौट आई हो
25:07श्री राम ने वैशनव धनुष को ऐसे सहचता से ग्रहन किया मानो वह कोई साधारन वस्तु हो उनके मुख मंडल
25:14पर एक अलौकिक शान्ती और द्रिड़ता विराज मान थी
25:19ब्रहम लोक में चतुर मुखी ब्रहमा जिनकी आभा दिव्यस वर्णिम थी अपने कमंडल से पवित्र जल छिड़कते हुए इस एतिहासिक
25:28खण के साक्षी बन रहे थे उनके होठोन पर मंत्रों का जाप था
25:33श्री राम ने अत्यंत सहचता और बिना किसी प्रयास के वैशनव धनुष की प्रत्यंचा को चड़ा दिया जिससे एक गहरी
25:41गूंजती हुई ध्वनी पूरे वातावर्ण में फैल गई
25:45उस ध्वनी ने देवलोक से पाताल लोक तक समस्त चौधा भुवनों में एक कमपन पैदा कर दिया जैसे स्वयन स्रिष्टिकर्ता
25:54ने इस अध्वितिय पराक्रम का अनुमोधन किया हो
25:58अब श्री राम वैशनव धनुष को धारण किये हुए खड़े थे जिसकी प्रत्यंचा चड़ चुकी थी और उनका पूरा व्यक्तित्व
26:06एक अध्वुत दिव्यता और शक्ती से परिपूर्ण दिख रहा था
26:11परशुराम जो स्वयन एक महान धनुर्धर थे इस अध्वुत पराक्रम को देखकर अवाक रह गए उनके चहरे पर व्याप्त आश्चर्य
26:19की गहराई किसी भी शब्द से परे थी
26:23श्रीराम ने अपने तरकश से एक दिव्यबान निकाला जो स्वर्णिम आभा से चमक रहा था और उसे सहच्ता से वैशनव
26:31धनुष पर स्थापित कर दिया
26:34जैसे ही बान धनुष पर चढ़ा वह एक तीवर नीली सुनहरी रोशनी से प्रजवलित हो उठा जिसकी चमक ने क्षण
26:42भर के लिए समस्त द्रिश्य को आलोकित कर दिया
26:45श्री राम ने अपनी शांत भेदक द्रिश्टी परशुराम पर स्थिर की उनके नेत्रों में एक गहरा प्रश्न था जो ब्रहमांड
26:53की व्यवस्था को चुनोती देने को तयार था
26:57देवता और रिशिगन जिन्होंने ऐसे कई दिव्य लीलाएं देखी थी इस अप्रत्याशित क्षण को देखकर मंत्र मुग्ध हो गए उनके
27:06हृदय श्रद्धा और विस्मय से भरे हुए थे
27:10श्रीराम ने शांत स्वर में परशुराम से पूछा ये भार्गवश्रिष्ट वैशनव धनुष का यह बान कभी व्यर्थ नहीं जाता तो
27:18बताएए इसे किस लक्ष पर छोड़ा जाएं
27:22परशुराम के मुख पर अब कोई क्रोध नहीं था केवल एक गेहन आत्मचिंतन और एक ऐसे दिव्य सत्य का बोध
27:29था जिसने उनके युगों के अभिमान को एक पल में भंग कर दिया था
27:35आत्मचिंतन में डूबे परशुराम की दृष्टी में अब केवल श्री राम का शांत दिव्य मुख मंडल था जिसने उनके भीतर
27:42युगों से संचित अहंकार की अंतिम परत को भी विदीर्ण कर दिया था
27:48उनके हृदय में चिरकाल से बैठा क्रोध और अभिमान अभभय और भक्ती के एक अप्रत्याशित संगम में बिलीन हो रहा
27:56था जैसे प्रचंड अगनी शांत सरोवर में मिल रही हो
28:01परशुराम ने धीरे से कहा हे रगुननदन आपने मेरे युगों के तब को आज शुनौती दी है मेरे इस वैशनव
28:08तेज को मेरे ही अभिमान से मुक्त कर दीजिए
28:12श्रीराम ने मौन स्वीकृती में अपने वैशनव बान को और उपर उठाया जिसकी नोक पर संपूर्ण ब्रहमांड का तेज केंद्रित
28:21हो रहा था
28:22परशुराम ने अपने आखें बंद कर ली और बोले हे प्रभु मेरे समस्थ तपबल मेरी सिद्धियों और स्वर्गिय लोकों तक
28:31निर्बाध गती से विचर्ण करने की मेरी शक्ती को इस बान का लक्ष बनाए
28:36श्रीराम ने शांत और गंभीर मुद्रा में परशुराम की प्रार्थना स्विकार की उनकी दिव्य आखों में असीम करूना जहलक रही
28:44थी
28:46फिर एक गर्जना के साथ उन्होंने वैशनव बान को धनुष पर खीचा और उसे परशुराम के तपबल की दिशा में
28:54अद्रिश उर्जा के लक्ष पर छोड़ दिया
28:57बान एक प्रकाश पुन्च की तरह वायुमंडल को चीरता हुआ निकला उसकी गती इतनी तीवर्थी की समय भी क्षन भर
29:05के लिए थमसा गया
29:07जैसे ही बान ने परशुराम के अद्रिश तपबल को चुआ एक अध्भुत उर्जा का विस्फोट हुआ जिसने उनकी समस्थ शक्ती
29:16को अपने भीतर समाहित कर लिया
29:18शन भर में परशुराम की आखों के सामने उनके युगों की तपस्या का तेज फीका पड़ने लगा
29:25उनकी दिव्य आभा मंध होती चली गई
29:29उन्होंने स्वयां को अनायास ही शक्तिहीन पाया जैसे किसी विशाल व्रिक्ष से उसकी जड़े छीन ली गई हो
29:35और यहां एहसास उनके हिदय को गहराई तक जगजोर गया
29:40उनके अंदर का अहंकार चूर-चूर हो गया
29:43और एक गहरा पश्चाताप उनके मन में जागरित हुआ
29:47जिसने उन्हें अपने परम सत्य से विमुख होने का बोध कराया
29:52इसी क्षण परशुराम को श्रीराम के अंदर भगवान विश्णु का परम स्वरूप साकार होता दिखा
29:58एक अध्भुत दिव्य प्रकाश ने पूरी स्रिष्टी को आलोकित कर दिया
30:03उन्होंने श्रीराम के विराट स्वरूप में चतुर्भुज भगवान विश्णु को देखा
30:08जिनके एक हाथ में शंक, दूसरे में चक्र, तीसरे में गदा और चौथे में कमल सुशोभित था
30:15समस्त देवतागन और रिशिमुनी जो इस अध्भुत दिश्य के साक्षी थे
30:20अपने स्थानों पर ही अंजलिबध होकर इस परम लीला का गुनगान करने लगे
30:26परशुराम को अपनी अज्यानता पर तीवर पश्चाताप हुआ
30:30उन्हें बोध हुआ कि वह स्वय भगवान विश्नु के ही अंशावतार हैं जो श्री राम के समक्ष खड़े थे
30:38उन्होंने उठकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्री राम की ओर देखा और अपने अभिमान के लिए करबध क्षमा याचना की
30:46श्री राम ने परशुराम को प्रेमपूर्वक उठाया और आश्वासन दिया कि उनका तपबल नश्ट नहीं हुआ है बल्कि एक उच्चतर
30:55अधिक शुद्ध रूप में परिवर्तित हो गया है
31:00परशुराम ने अपने दिव्यध हनुष को श्री राम को समर्पित किया जो अब उनके स्वयं के अहमकार का प्रतीक नहीं
31:07बल्कि उनके आत्मज्ञान का चिन्ह बन चुका था
31:11ततपश्चात परशुराम ने श्री राम से विदाली और महेंद्र परवत की ओर प्रस्थान किया एक विनम्र और आत्मज्ञानी रिशी के
31:20रूप में जो अब अपनी तपस्या को नए अर्थ के साथ जिएंगे
31:25महेंद्र परवत की ओर परशुराम का मौन प्रस्थान उनके प्रत्येक कदम में ब्रहमांडिय सत्य की नई समच समाहित थी, जो
31:33उनके पूर्व क्रोध को निर्मल शांती में बदल रहा था
31:38उनके मुखमंडल पर गहन शांती और संतुष्टी का भाव था, अतीत के समस्थ संधर्ष विलीन हो चुके थे, अब केवल
31:46आत्मज्यान का दिव्य तेज चमक रहा था
31:49उन्होंने प्राचीन वन पथों पर ग्रिड़ता से कदम बढ़ाए, जहां व्रिक्षों और शिलाओं ने भी उनके बदले हुए शांत स्वरूप
31:57का मौन अभिननदन किया
32:00घने व्रिक्षों की वितान से एक स्वर्णिम प्रकाश पुन्च पृत्वी पर उत्रा, जैसे स्वयम प्रकृती उनके हृदय में प्रजवलित आत्मज्यान
32:09का अनुमोधन कर रही हो
32:11उन्होंने एक उची, खतरनाग परवत श्रंखला को पार किया, जिसके नीचे दुनिया दूर, छोटी और भौतिक बंधनों से मुक्त होती
32:20दिख रही थी
32:21उनकी दृष्टीक शितिज की ओर स्थिर थी, जहां अनंत ब्रह्मांड का रहस्यमय विस्तार उनके हृदय में शांत भाव से प्रकट
32:29हो रहा था
32:30एक पवित्र परवत जर्ने के निर्मल जल से उन्होंने अपनी प्यास बुझाई, प्रत्येक घूट में शुद्धिकरण और आंतरिक नवीनी करण
32:40का अनुभव करते हुए
32:42जर्ने के शांत जल में उनका प्रतिबिंद दिखाई दिया, एक शांत और आत्म ज्यानी रिशी का, जो अब क्रोध और
32:50अहंकार के सभी दागों से मुक्थ हो चुका था
32:54वे धीरे-धीरे उचाई पर चड़ते गए, जहां हवा अधिक शुद्ध और वातावर्ण गेहन आध्यात्मिक उर्जा से परिपूर्ण होता गया
33:03उनकी आखों में अब एक ब्रह्मांडिय समझ धलक रही थी, जैसे वे अपनी यात्रा के दिव्य उद्देश्य और प्रकृती के
33:11साथ अपने गहरे संबंध को पहचान रहे हुँ
33:15उन्होंने प्राचीन मौन ध्यान गुफाओं के पास से गुजरते हुए, शताब्दियों की तपस्या की गुंच को अपनी आत्मा में महसूस
33:24किया
33:25एक शीतल सुगंधित पवन का जोंका उन्हें चुकर गुजरा, जैसे प्राचीन जड़ी बूटियों और आध्यात्मिक शान्ती की सुगंध उनके हृदय
33:34को शुद्ध कर रही हो
33:36अंतर महेंद्र परवत की भव्य चोटी उनके सामने प्रकट हुई, उसका शिखर एक अलौकिक प्रकाश में नहाया हुआ था, जैसे
33:45उसका आहवान कर रहा हो
33:47वे एक क्षण रुके अपने अंतिन गंतव्य को देख कर एक गहरी आत्मियता और अपने निर्णय की पूर्णता का अनुभव
33:56करते हुए
33:58उन्होंने एक एकांत गुफा का पता लगाया, जो प्राचीन लताओं से सुसजित थी, अपनी शेश तपस्या के लिए एक आदश
34:06स्थान
34:07गुफा का प्रवेश द्वार स्वय ही दिव्य शक्ती से गुझायमान प्रतीत हो रहा था, जैसे वह अपने नए निवासी का
34:15हार्दिक स्वागत कर रहा हू
34:17गुफा के भीतर उन्होंने ध्यान मुद्रा में आसन ग्रहन किया, बाहरी दुनिया की हल्चले धीरे-धीरे महत्वहीन होती जा रही
34:26थी
34:27उनका मुखमंदल परमशांत था, एक आंतरिक दीप्ती से प्रकाशित, उनकी श्वास एक ब्रहमांडिय लए में विलीन होती जा रही थी
34:37उनका शरीर निश्चल हो गया, मानो वह गुफा की प्राचीन शिलाओं के साथ एकाकार हो गया हो, उनकी चेतना भौतिक
34:45सीमाओं से परे उरने लगी
34:47एक मंद स्वर्णिम आभा उन्हें घेरने लगी, जो उनकी चिरस्थाई तपस्या के आरंभ और एक महान युग के आध्यात्मिक समापन
34:57का प्रतीक थी
34:59परशुराम की अंतरध्यान प्रक्रिया पूर्ण होने पर वहां व्याप्त भय की उर्जा धीरे-धीरे एक अलोकिक शान्ती में घुलने लगी,
35:07मानो प्रकृती ने स्वयन एक गेहन श्वास ली हो
35:11दूर वैकुंठ में, शीरसागर के मध्य अनंत शेशनात पर विराजमान भगवान विश्णु ने अपनी चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा
35:20और पद्मधारन किये हुए
35:22इस परिवर्तन को एक मंद मुस्कान के साथ देखा, उनके नेत्रों में स्विष्टी का गेहन ज्यान प्रतिबिंबित हो रहा था
35:30जहां कुछ क्षण पहले परशुरान की तपस्या की अगनी धधक रही थी, वहां अब केवल शीतल वायू का स्पर्श था,
35:38जो वातावर्ण में घुली दिव्य सुगंध को और भी मधुर बना रहा था
35:43एक नए अध्याय के आरंभ का प्रतीक, सूर्य की किरने अब उस पत पर सीधी पड़ रही थी, जिसे श्रीराम
35:51और अन्य राजकुमारों ने अयोध्या की ओर अपनी वापसी यात्रा के लिए चुना था, भय और आशंका के बादल छंट
35:58चुके थे
36:00मनुष्य, रिशिमुनी और देवता सभी एक साथ राहत की सांस लेकर, श्रीराम और उनके भाईयों के साथ अयोध्या की ओर
36:08अपनी यात्रा पर निकल पड़े, उनका हृदय अब आनंद और कृतग्यता से भर चुका था
36:15शीरसागर में भगवान विश्नु के मस्तक पर विराजित शेशनाग ने अपनी हजारों फणों को धीरे से हिलाया, मानो ब्रहमांड की
36:24शांती का अनुभव कर रहे हों, और उनकी निल्मनिसी आखें शांत आनंद से चमक उठी
36:31श्रीराम अपने भाईयों और देवी सीता के साथ रत पर विराज मान थे, उनके मुख मंडल पर एक दिव्य तेज
36:38था, जो आने वाले युग के गौरव का आभास करा रहा था, और अयोध्या की दिशा में एक आत्म विश्वास्पूर्ण
36:46यात्रा जारी थी
36:48मार्ग में पुश्पों की वर्षा हो रही थी और भक्तगण जैकार कर रहे थे, मानो पूरी प्रकृती इस दिव्य यात्रा
36:55का अभिनंदन कर रही हो, जो अयोध्या में एक नए युग की शुरुवात थी
37:01इस बीच अयोध्या में राजा दश्रत ने अपने दूतों को मारगों को सुसज्जित करने और नगर में उच्सव का माहौल
37:09बनाने का आदेश दिया, क्योंकि उनके पुत्रों की विजय और विवाह का समाचार पहुंच चुका था
37:16रानी कौशलिया, सुमित्रा और कैकेई अपने कक्षों में बैठकर पुत्रों की वापसी की कलपना से भावुक हो रही थी, उनके
37:24चेहरों पर मातरित्व का असीम प्रेम और गौरव झलक रहा था
37:29अयोध्या के हर घर में दीपक जलाए गए और मंदल गीत गाए जाने लगे, जैसे कोई दिव्यशक्ती पूरे नगर को
37:37एक महाउचसव के लिए तयार कर रही हो
37:40नगर के मुख्यद्वार पर तोरंद्वार भव्य रूप से सजाए गए थे, जिन पर कमल और आमरपल्लव के सुन्दर बंधनवार लटक
37:49रहे थे, जो समरिध्धी और शुभता का प्रतीक थे
37:53अंत्र शाही काफिला अयोध्या के भव्य द्वारों से प्रवेश करता है और नागरिक जैजैकार करते हुए अपने प्रिय राजकुमारों और
38:02नई वधों का स्वागत करते हैं, जिनका आगमन एक युग परिवर्तन का सूचक था
38:09श्रीराम अपने दिव्यतेज और शांत मुस्कान के साथ अयोध्यावासियों के प्रेम को स्विकार करते हुए आगे बढ़ रहे थे, उनके
38:18नेत्रों में एक गहरा संतोष और अपने राज्य के प्रती अगाध प्रेम झलक रहा था
38:24पूरे नगर में शंकनाद और ढोल की गूंच सुनाई दे रही थी, और हर नागरिक अपने घरों से निकल कर
38:31इस एतिहासिक पल का साक्षी बन रहा था, जो श्रीराम के शौर्य और मर्यादा की विजय का प्रतीक था
38:39उत्सव का माहौल इतना गहरा था कि आस्मान में उर्ते पक्षी भी रुक कर इस भव्य द्रिश्य को देख रहे
38:45थे, मानों वे भी इस पावन अफसर का हिस्सा बन गए हूँ
38:50महल के विशाल प्रांगण में राजा दशरत अपनी रानियों और गुरु वशिष्ट के साथ खड़े थे, उनकी आखें गर्व और
38:58प्रेम से नम थी, अपने पुत्रों को इतनी वीर्ता के साथ लोटते देख
39:04राजा दशरत ने श्री राम को अपने आलिंगन में भर लिया, उनके हृदय में एक साथ पिता का प्रेम, राजा
39:11का गौरव और एक विजी पुत्र के प्रती असीम कृतग्यता उमड रही थी
39:17देवी सीता को रानियों ने अपने हृदय से लगाया, उनके कोमल स्पर्ष और आशिर्वात से नववधु का भविश्य उजवल हो
39:25उठा, और अयोध्या को अपनी नई महारानी मिल गई
39:29इस शुब आगमन के साथ ही अयोध्या नगरी में एक अध्वितिय शांती और समर्धी का नया अध्याय आरंभ हुआ, जिसका
39:38तेज श्री राम के दिव्य पराक्रम और मर्यादा से प्रकाशित था, जो आने वाले युगों तक प्रेना देगा