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वरुण देव की कृपा से पृथ्वी स्थापित हो चुकी है, लेकिन सृष्टि का चक्र फिर एक नए संकट की ओर बढ़ रहा है! पद्म पुराण के इस रोमांचक चौथे एपिसोड में, ब्रह्मा के सृजन के बाद, हम एक ऐसे युग में प्रवेश करते हैं जहाँ धर्म का पतन और विनाश की भविष्यवाणी मंडरा रही है। क्या मनु इस भयंकर प्रलय से पृथ्वी के जीवों और वेदों को बचा पाएंगे? भगवान विष्णु के अद्भुत मत्स्य अवतार की कहानी जानें, जिन्होंने एक छोटी मछली के रूप में प्रकट होकर सृष्टि के सबसे बड़े संकट से मानवता को बचाया। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि विश्वास और संरक्षण का एक अविश्वसनीय अध्याय है। #PadmaPurana #MatsyaAvatar #VishnuPralaya #HinduMythology #CosmicDeluge #ManuStory #SrishtiRahasya #Puranas #EpicTales
Transcript
00:00रुद्र के क्रोध को शांत करने के पश्चात, प्रजाप्ती ब्रहमा पुनह अपने स्रिजन की गहन प्रक्रिया में लीन हो गए,
00:07उनका मन शांत और संकल्प अटल था.
00:10अपनी दिव्यद्रिष्टी से ब्रहमा ने समस्थ शून्यता का अवलोकन किया और अनुभव किया कि स्रिष्टी को अब व्यवस्था और जीवन
00:19के सतत प्रवाह की आवश्चक्ता है.
00:22अपने मानस से ही उन्होंने नौ महान प्रजाप्तियों मरीची, अत्री, अंगिरा, पुलस्तिय, पुला, क्रतु, धेगु, वशिष्ट और दक्ष को जन्न
00:31दिया, जो ज्यान और तपस्या के पुंच थे.
00:35ये प्रजाप्ति, स्रिष्टी के आधार भूत स्तंभ बनकर, ब्रहमा के दिव्य संकल्प को प्रिथवी पर साकार करने के लिए उद्यत
00:43थे.
00:44ब्रहमा ने अपने नवजात मानस पुत्रों को आदेश दिया, कि वे प्रिथवी पर जीवन का विस्तार करें और विभिन प्रजातियों
00:52से इसे भर दें.
00:55प्रजाप्तियों ने विनमरता पूर्वक ब्रहमा के आदेश को स्विकार किया, उनके हृद्यों में स्रिष्टी के महान कार्य को पूर्ण करने
01:03का द्रिड संकल्प था.
01:05उन्होंने अपनी तपस्या और संकल्प शक्ती से देव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और मनुष्यों सहित अनेक प्रकार के प्राणियों को
01:14उत्पन्न करना आरंभ किया.
01:17जैसे ही प्रजाप्तियों की दिव्य ऊर्जा प्रवाहित हुई, प्रित्वी पर जीवन के नए अंकुर फूटने लगे, विविध्ता और अध्भुत सौंदर्य
01:25का स्रिजन हो रहा था.
01:28देखते ही देखते प्रित्वी हरेभरेवनों, कलकल करती नदियों और जीवन्त प्राणियों से युक्त एक भव्य और सुन्दर धाम में परिवर्तित
01:37हो गई.
01:38अपने मानस पुत्रों द्वारा रचित इस अध्भुत स्रिष्टी को देख कर, ब्रह्मा के चारों मुखों पर एक साथ संतोष और
01:46आनंद की दिव्य मुस्कान खिल उठी.
01:49हर प्राणी, चाहे वह छोटा हो या विशाल, स्रिष्टी के नैसर्गिक संतुलन का हिस्सा बन गया, एक दूसरे से जुड़ा
01:57हुआ और एक दिव्य लए में गतिमाग.
02:00वायू में बहती दिव्य सुगंध, जल में प्रतिध्वनित होती मधुर्ध्वनी और धर्ती में स्पंदित होती जीवन उर्जा स्रिष्टी के प्रत्येक
02:09कन को जोड रही थी.
02:11ब्रह्मा ने न केवल प्राणियों को बलकी परवत श्रिंख लाओं, विस्तरित महासागरों और गहरी घाटियों को भी आकार दिया, जो
02:19प्रित्वी को एक अनूठा स्वरूप प्रदान कर रहे थे.
02:24शीरसागर में विराजमान भगवान विश्णु अपने शेशनाग शया पर लेटे हुए ब्रह्मा की इस अद्भुत स्रिजनात्मक लीला को शांति पूर्वक
02:33निहार रहे थे.
02:35समय के चक्र को निर्धारित करने के लिए सूर्य और चंद्रमा अपने अपने स्थानों पर स्थापित हुए, जिससे दिन और
02:42रात का अद्भुत क्रम आरंभ हुआ.
02:46स्रिष्टी का प्रत्येक कन अब जीवन और उर्जा से स्पंदित हो रहा था, एक अद्भुत सामन जस्य और व्यवस्था में
02:53बंधा हुआ.
02:55यह एक ऐसा क्षन था जब स्विजन अपने चरम पर था, हर दिशा में जीवन का उत्सव मनाया जा रहा
03:02था और सौंदर्य अनन्त था.
03:05अपने दिव्य लोक से ब्रह्मा ने अपनी इस अद्भुत और जटिल रचना पर गहनता से विचार किया, जिसमें प्रत्येक तत्व
03:12का अपना महत्वपून स्थान था.
03:16मनुश्यों ने प्रिथवी पर अपने निवास स्थान बनाए, प्रकृती के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए सभ्यता की पहली नीम रखी.
03:25इस प्रकार वरा अवतार द्वारा प्रिथवी को स्थिर करने के बाद, ब्रह्मा ने एक ऐसी स्रिष्टी का निर्मान किया जो
03:33जीवन, सौंदर्य और दिव्य व्यवस्था का प्रतीक थी.
03:37ब्रह्मा की अनुपम स्रिष्टी ने कई युगों तक अपने सौंदर्य और व्यवस्था को बनाय रखा, जहां जीवन का प्रत्येक स्पंदन
03:45एक दैविय लए में बंधा था, जो एक शांत और समरिध विश्व का प्रतीक थी
03:52परंतु जैसे जैसे कालचक्र आगे बढ़ा, ब्रह्मा के दिव्य नेत्रों ने स्रिष्टी में एक सुक्ष्म परिवर्तन अनुभव किया, एक ऐसी
04:00दरार जो धीरे-धीरे धर्म की नीम को कमजोर कर रही थी
04:05मनुष्यों के हृदय में लोब और अहंकार की अगनी प्रजवलित होने लगी, जिससे वे प्रकृती के साथ अपने सामनजस्य को
04:13भूल कर केवल स्वार्थ की दौड में शामिल हो गए
04:17धर्म के चार चरण जो कभी द्रिर्टा से खड़े थे, अब धीरे-धीरे डगमगाने लगे और अधर्म की काली छाया
04:25स्रिष्टी के कोनों में भयावह रूप से फैलने लगी
04:29नदिया सूखने लगी, वनस्पती मुर्जाने लगी और धर्ती का उपजावपन धूल में मिल गया, प्रकृती स्वय असंतुलन की अपनी पीड़ा
04:38व्यक्त कर रही थी
04:41शीरसागर में विराजमान भगवान विश्णू ने अपनी गेहन निद्रा से जागरित होकर स्रिष्टी के इस बिगड़ते स्वरूप को देखा, उनके
04:49हृदय में जीवों के प्रती असीम करुना उमड़ पड़ी
04:53वनों में तपस्यारत रिशिमुनियों ने अपने गेहन ध्यान में महाप्रलय के आसन्न संकेतों को अनुभव किया, जिससे उनके शांत चित्त
05:02में भी एक गंभीर बेचैनी छा गई
05:05आकाश में भयानक उलकापिंडों का गिरना और अकाल वर्षा का होना, आने वाले विनाश की स्पष्ट और दरावनी चेतावनी बन
05:14गए
05:15प्रित्वी कांप उठी, परवत खिसकने लगे और समुद्र अपनी सीमाओं को तोड़ने को आतुर होकर प्रचंड गर्जना करने लगा
05:24स्रिष्टी के नियंता ब्रह्मा ने पुनहक्षीर सागर की ओर देखा, भगवान विश्णु से इस आसन्न विनाश का समाधान खोजने का
05:32आगरह करते हुए
05:35अधर्म के बढ़ने से पाताल लोग के भयानक दानव और असुर्प अपनी गुफाओं से निकल कर प्रिथवी पर अत्याचार फैलाने
05:43लगे, जिससे मानवता त्राहित्राही कर उठी
05:47सूर्य का तेज मंद पढ़ने लगा, और चंद्र भी अपनी शीतलता खो बैठा, जैसे ब्रहमांड स्वय अपनी मृत्यू की ओर
05:55भयावा रूप से बढ़ रहा हो
05:58चारो दिशाओं में भूख, प्यास और भय का सामराज फैल गया, प्रत्येक जीव अपने जीवन के अंतिन क्षणों को भीशन
06:06कष्ट से महसूस कर रहा था
06:08भगवान विशनू ने अपनी आखे बंद कर ली, गेहन चिंतन में लीन होकर इस भयावः प्रलैसे स्रिष्टी को बचाने के
06:16लिए एक दिव्यमार्ग खोजने लगे
06:19तभी आकाश से मेगों का ऐसा गर्जन सुनाई दिया, जैसा पहले कभी नहीं सुना गया था, और जलधाराओं ने धर्ती
06:27पर प्रचंड वेक से गिरना आरंभ कर दिया
06:31भूमी जलमग नहोने लगी, जैसे धर्ती स्वयम विशालकाय समुद्र में विलीन हो रही हो और जीवन का प्रत्येक चिनह जल
06:39की अथा गहराईयों में समाता जा रहा था
06:43कुछ ही क्षणों में परवत, वन और नगर, सब कुछ विशालकाय लहरों के नीचे दब गए, केवल जल ही जल
06:50चहु और दिखाई दे रहा था
06:53इस घोर प्रलै के बीच, भगवान विश्नु ने जीवों को बचाने का द्रिड संकल्प लिया, उनके मन में मत्स्य अवतार
07:00का विचार प्रस्पुटित हुआ
07:03उन्होंने सभी पवित्रबीज, औश्धिया और सब्तरिशियों को एकत्रिप किया, ताकि स्रिष्टी का सार और आने वाले युग का ज्यान सुरक्षित
07:12रखा जा सके
07:14महाप्रलय का तांडव अपने चरम पर था, जब एक विशाल मत्स्य के रूप में भगवान विश्णु प्रकट होने की तैयारी
07:21कर रहे थे, एक नए युग के उदे की आशा लिए
07:26महाप्रलय के उस भीशन काल में, जब धर्ती का कणकन विनाश की गाथा कह रहा था, द्रविड देश की पावन
07:33भूमी पर एक धर्मात्मा राजा सत्यवरत अपने नियमों के प्रती अडिक खड़ा था
07:40देवलोक से भगवान विश्नु अपने अनन्त शेशनात पर विराजमान इस आसन प्रलय को शांत चित्त से देख रहे थे, उनकी
07:48दिव्य आखों में स्रिष्टी के प्रती अपार करुना झलक रही थी
07:53राजा सत्यवरत उस पतली होती नदी के किनारे सूर्य को अर्गे देने के लिए अंजली में जल भर रहे थे,
08:00जब एक अद्भुत प्रकाश उनके हाथों में कौन्ध उठा
08:05उनकी अंजली में एक छोटी सी सुनहरी मचली थी, जिसके सुक्षम शरीर से दिव्य चमक फूट रही थी, मानो वह
08:13स्वयन सूर्य का एक अंश हो
08:16विस्मय से राजा उसे देख ही रहे थे कि वह मचली मानविय स्वर में बोल उठी है राजन
08:22इन प्रल्यकारी जल में बड़े बड़े जीव मुझे खा जाएंगे, मेरी रक्षा करो
08:29राजा सत्यवरत उसकी इस असाधारन प्रार्थना से अभिभूत होकर उसे एक मिट्टी के कलश में रखा ताकि वह सुरक्षित रह
08:38सके
08:39एक ही रात में वह ननही मचली इतनी विशाल हो गई की कलश उसके लिए अत्यंत छोटा पड़ गया और
08:46वह पुनह राजा से बड़े स्थान की आचना करने लगी
08:51राजा ने ततकाल उसे एक बड़े जल पात्र में रखा पर वह मचली इतनी तेजी से बढ़ रही थी कि
08:57वह पात्र भी शीघ्र ही उसके लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ
09:02विस्मय से भरे सत्यवरत ने उसे एक विशाल कुए में स्थानांतरित किया जहां उसने पलक जपकते ही पूरे कुए को
09:10अपनी काया से भर दिया
09:12अब राजा को यह स्पष्ट हो चला था कि यह कोई साधारन मचली नहीं अपितु स्वयन कोई दिव्यसत्ता है जो
09:20उनके समक्ष प्रकट हुई है
09:23उसकी अविश्वसनी वृद्धी जारी रही और राजा ने उसे एक विशाल जील में छोड़ा जोक्षन भर में उसके बढ़ते शरीर
09:32के लिए छोटी पड़ गई
09:34उस दैवी मचली की अद्भुट शक्ती और आकार को देखकर राजा का हृदैश रधा से भर गया और उन्होंने समझ
09:42लिया कि यह स्वय भगवान विश्णु का ही रूप है
09:47अंतह राजा सत्यवरत ने उस मचली को महासागर में प्रवेश कराया जहां उसकी विशाल काया ने पूरे जल को आच्छादित
09:55कर लिया
09:56उस विशाल काय मत्स्य को देखकर सत्यवरत ने हाथ जोड़कर विन्यपूर्वक कहा है प्रभु
10:03आप कौन है और किस प्रयोजन से इस रूप में प्रकट हुए है
10:09मत्स्य रूप में स्थित भगवान विश्णु ने अपने मधुर और गंभीर स्वर में उत्तर दिया
10:15मैं सृष्टी का पालक नारायन हूँ और मैं तुम्हें प्रलय के रहस्य बताने आया हूँ
10:21भगवान ने बताया कि साथ दिनों के भीतर एक भयंकर प्रलय आएगा
10:26जो सब कुछ लील लेगा और उन्हें ही समस्त जीवों का आश्रे बनना होगा
10:32उन्होंने राजा सत्यवरत को एक विशाल नौका बनाने का निर्देश दिया
10:37जिसमें वे सभी पवित्र बीज, औश्धिया और सब्तरिशियों को सुरक्षित रख सकें
10:43जब महाप्रलय आएगा तो मैं एक विशाल मचली के रूप में प्रकट होकर
10:48तुम्हारी नौका को अपने सीम से बांध लूँगा और तुम्हें सुरक्षित ले चलूँगा
10:53भगवान ने आश्वासन दिया
10:56राजा सत्यवरत ने भगवान के चर्णों में नमन किया और उनके आदेश का पालन करने का द्रिड संकल्प लिया
11:04क्योंकि वे जानते थे कि यही एक मात्र आशा थी
11:08इस प्रकार स्रिष्टी को बचाने की दिव्य योजना आकार लेने लगी
11:13जहां एक राजा की भगवान का मत्स्य अवतार एक नए यूग की आधारशिला बनने वाले थे
11:21सूर्य की पहली किरने जैसे ही उस प्राचीन नदी के तट पर पड़ी
11:25राजा सत्यवरत अपने दैनिक अनुष्ठान में लीन थे
11:29तभी उनकी द्रिष्टी जल में अटकी एक अत्यंत छोटी मचली पर पड़ी
11:34जो असहाय प्रतीत हो रही थी
11:37राजा का हृदय उस ननही प्राणी की दशा देखकर दया से भर उठा
11:42और उन्होंने अपने कमंडल को जल में डुबो कर उसे साबधानी से अपनी हथेली पर उठा लिया
11:49कमंडल के भीटर जाते ही उस लगु मचली ने आश्चर्यजनक रूप से बढ़ना शुरू कर दिया
11:55जैसे किसी अद्रिष्य शक्ती ने उसे उर्जा प्रदान की हो
12:00शन भर में वह मचली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल का छोटा पात्र उसके लिए अपर्याप्त लगने लगा
12:07मानो स्वयन स्रिष्टी उसके विकास की साक्षी बन रही हो
12:11राजा सत्यवरत ने विस्मय और भक्ती से मचली को देखा
12:15जो अब उनके कमंडल में मुश्किल से समापा रही थी
12:19और उन्होंने महसूस किया कि यह कोई साधारन जीव नहीं हो सकता
12:25राजा ने तुरंट उसे अपने कक्ष में ले जाकर एक बड़े अलंकरित मटके में स्थानांतरित कर दिया
12:31यह सोच कर कि अब वह वहां आराम से रह सकेगी
12:36परन्तु यह क्या
12:38मटके में पहुचते ही मचली एक बार फिर इतनी तेजी से बढ़ी कि उसका विशाल का शरीर मटके को भी
12:45छोटा लगने लगा
12:46जैसे वह सीमाओं को चुनौती दे रही हो
12:50उसकी आखों में एक गहन चमक थी
12:52मानो वह राजा से किसी और विशाल निवास का संकेट दे रही हो
12:58राजा सत्यवरत ने विसमय से भर कर देखा कि मचली अब उस मटके में भी असहज महसूस कर रही थी
13:05जैसे उसकी दिव्यता को कोई पात्र रोक नहीं सकता
13:10उन्होंने ततपरता से उसे निकट के एक प्राचीन और गहरे कोई में स्थानांतरित करने का निर्ने लिया
13:16जहां पानी अथाह था और विशालकाय कच्छुए भी रहते थे
13:21कोई के शीतल जल में पहुँचते ही मचली ने एक बार फिर अपनी काया का विस्तार किया
13:27जिससे कोई का घेरा भी उसके लिए छोटा पड़ने लगा जैसे वह हर सीमा को पार करने पर तुली हो
13:35उसकी विशालकाय आकरती कोई के गहरे जल में एक जीवन्त रहस्य की तरह तैर रही थी
13:41जिससे आसपास की शान्ती और भी गहरी प्रतीत होती थी
13:46राजा सत्यवरत ने अब मचली के चमतकारी स्वरूप को पहचान लिया था
13:51जिसकी विशालता कोई को भी बौना बना रही थी और उनकी भक्ती और भी द्रिड हो गई
13:58उन्होंने उसे एक बड़े पवित्र तालाब में ले जाने का निश्चय किया
14:03जहां कमल खिलते थे और पक्षियों का कलरव गूंजता था
14:07यह सोचते हुए कि शायद वहां उसे अनंत स्थान मिलेगा
14:12जैसे ही मचली को तालाब के विशाल जल में छोड़ा गया
14:15उसका आकार इतना विराठ हो गया कि तालाब भी उसके लिए
14:19एक छोटी कटोरी जैसा प्रतीत होने लगा
14:22मानो वह पूरे ब्रहमांड को अपने भीतर समेटे हो
14:27तालाब का हर कोना अब उसकी दिव्य उपस्थिती से भर गया था
14:31जिससे जल का हर अनुजीवन्त और शक्तिशाली प्रतीत होता था
14:36राजा सत्यवरत ने अब पूर्ण रूप से समझ लिया था
14:40कि यह मचली स्वय भगवान विश्नु का अवतार है
14:43जो स्रिष्टी को बचाने के लिए प्रकट हुए है
14:48मचली ने अब अपने दिव्य रूप का आशिक प्रक्ति करण किया
14:52और एक गेहन मधुर ध्वनी में राजा से अनुरोध किया
14:55कि उसे अब महासागर में स्थान दिया जाए
14:59राजा सत्यवरत ने श्रधा पूर्वक अपनी प्रार्थनाए अर्पित की
15:04और उस विशाल मत्स्य अवतार को अपनी शेश शक्ती लगा कर एक विशालकाई जील की ओर निर्देशित किया
15:12और जब मत्स्य भगवान उस असीम जलराशी में समाए
15:16तो समस्थ स्रिष्टी में एक दिव्य उर्जा का संचार हुआ
15:19जो आने वाले महाप्रलय की तयारी का संकेत था
15:24जैसे ही मत्स्य भगवान असीम जलराशी में समाए
15:27उनका दिव्य आकार ख्षन प्रतिक्षन और विशाल होता चला गया
15:32मानो समस्थ ब्रह्मांड को ही अपने भीतर समाहित करने को उद्यत हो
15:37राजा सत्यवरत अपने तपोबल से प्राप्ट ग्रिष्टी से उस अध्भुत वृद्धी को देखकर स्तब्ध रह गए
15:44उनके हृदय में विस्मय और श्रधा का एक विचत्र संगम उमड रहा था
15:50मचली का आकार इतना विशाल हो गया कि जिस जील में उसे छोड़ा गया था
15:55वह भी उसे छोटी पढ़ने लगी और उसकी विशालता से जलराशियां विचलित होने लगी
16:02प्रकृती की हर ध्वने शांत हो गई केवल उस विशाल मत्स्य के जल में विचरने की गर्जना सुनाई दे रही
16:09थी
16:09जो प्रलय के आगमन का संकेट दे रही थी
16:13राजा सत्यवरत अब पूर्ण विश्वास के साथ यह समझ चुके थे कि यह कोई साधारन जीव नहीं
16:20बलकी स्वयं कोई देवत्व है जो उनकी परीक्षा ले रहा है
16:26उन्होंने श्रधा पूर्वक उस दिव्य मत्स्य के समक्ष अपने सिर जुकाएं और विनमर्ता से उसकी वास्तवित पहचान जानने की इच्छा
16:34व्यक्त की
16:36तब उस विराट मत्स्य के मुख से एक गंभीर ब्रहमांडिय ध्वनी निकली जिसने समस्थ जलराशियों और आकाश को अपनी दिव्य
16:44उपस्थिती से भर दिया
16:47मत्स्य ने अपनी ध्वनी में कहा हे राजन मैं तुम्हें आगामी महाप्रलय की सूचना देने आया हूँ जिसके माध्यम से
16:56यह स्रिष्टी एक नए युग का आरंभ करेगी
17:00जैसे ही मत्स्य ने महाप्रलय शब्द का उच्चारण किया आकाश में बिजली कौंधने लगी और दूर क्षितिच पर गहरे बादलों
17:08की भयानक गर्जना सुनाई देने लगी
17:12मत्स्य भगवान ने राजा सत्यवरत को समझाया कि यह प्रलय केवल विनाश नहीं बलकि स्रिष्टी के शुद्धिकरण और एक नए
17:20स्वर्णिम युग की नीम होगी
17:23उसने राजा को आदेश दिया कि वह एक विशाल नौका का निर्माण करे जो सभी प्रजातियों और पवित्र वेदों को
17:31इस विनाश से बचा सकेगी
17:33राजा ने बिना किसी संशय के उस दिव्य आज्या को स्विकार किया, उनका हृदैश रधा और कर्तव्यनिष्ठा से उतप्रोथ था
17:43मत्स्य ने समझाया कि उस नौका में सब्तर्शियों, सभी प्रकार के बीजों, औश्धिय पौधों और प्रत्येक प्राणी के एक जोडे
17:51को सनरक्षित करना होगा
17:54उसने यह भी निर्देश दिया कि प्रलय के समय वही मत्स्य एक विशाल सींग के साथ प्रकट होगा, जिससे नौका
18:01को बांधा जा सकेगा
18:04राजा सत्यवरत ने पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ मत्स्य भगवान के प्रतेक वचन को अपने हृदय में अनकित कर
18:12लिया
18:13मत्स्य भगवान ने राजा को आशवासन दिया कि प्रलय की भीशनता में भी वह स्वय उनकी और नौका की रक्षा
18:21करेगा
18:22उसकी दिव्य प्रभा बढ़ने लगी और मत्स्य का रूप कुछ क्षणों के लिए और भी अधिक अलौकिक तथा विराथ प्रतीत
18:30होने लगा
18:30यह प्रक्टीकरण मात्र एक मचली का नहीं बलकि साक्षात भगवान विश्णों के मत्स्य अवतार का था जो स्रिष्टी के रक्षक
18:40के रूप में प्रकट हुए थे
18:42मत्स्य भगवान ने एक अंतिम आशिरवाद दिया और फिर राजा को आगामी प्रलय के लिए स्वयन को तयार करने की
18:50प्रेणा दी
18:52और फिर वह दिव्य मत्स्य गहरे महासागर की असीन गहराईयों में विलीन हो गया, मानो अपनी विशाल भूमिका के लिए
19:00अद्रिश्य होकर प्रतीक्षा कर रहा हो
19:03मत्स्य अवतार के अद्रिश्य होते ही, राजा सत्यवरत उस अध्भुत अनुभव के भारतले अपने राजमहल के शांत एकांत में बैठ
19:12कर उस दिव्य भविश्यवानी पर गहन चिंतन करने लगे, जिसके अनुसार साथ दिनों में महाप्रलय आने वाला था
19:20उनके मन में एक और आने वाले विनाश का भय था, तो दूसरी और भगवान विश्णु के साक्षात दर्शन का
19:27असीम आनंद और जीवन के बीज बचाने के पुनीत कार्य का संकल्प, जो उन्हें मनु के रूप में एक नई
19:33स्रिष्टी का जनक बनाएगा
19:36दिव्य आदेश का पालन करते हुए, राजा ने तुरंत अपने विश्वासपात्र शिल्पकारों और मंत्रियों को गोपनिय रूप से एक विशाल
19:45और द्रिढ नौका, नाव के निर्मान का कार्य सौपा, जो आने वाले महाप्रलय का सामना कर सके
19:52जैसे जैसे दिन धलने लगे, आकाश में धीरे धीरे एक अजीब सा परिवर्तन दिखने लगा, सूर्य का सुनहरा प्रकाश फीका
20:01पड़ रहा था और दूर्क्षितिज पर गहरे, अप्षकुनी बादल मंडराने लगे थे, जो आने वाली आपदा का संकेट दे रहे
20:09थे
20:10राज्य के नागरिक अभी भी अपने दैनिक कारियों में लीन थे, अनजाने में कि उनके उपर एक भयंकर प्रलै का
20:18संकट मंडरा रहा है, जबकि राजा सत्यवरत की तैयारी तीवर गती से आगे बढ़ रही थी
20:25राजा सत्यवरत ने अपने सबसे विश्वस्निय मंत्रियों को बुलाया और उन्हें प्रलै के बारे में बताते हुए, उन्हें राज्य के
20:33महत्वपून अभिलेखों, पवित्र वेदों और ज्यान की अन्य पुस्तकों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया
20:40गुप रूप से विशाल नौका का निर्मान तेजी से प्रक्ती कर रहा था, जिसमें कुशल बढ़ी और कारीकर दिनरात काम
20:48कर रहे थे, ताकि यह भगवान के निर्देशानुसार समय पर तयार हो सके
20:54दूसरे दिन की संध्या होते होते, शितिच पर छाय गहरे बादलों ने और भी घनी काली चादर ओढ़ ली थी,
21:02और समुदर की लहरें असाधारन रूप से बेचैन होकर तटों से टक्राने लगी थी, मानों आने वाले तूफान का संकेट
21:09दे रही हो
21:11अगले कुछ दिनों में मौसम और भी तेजी से बदलने लगा, आकाश में घनघोर गर्जनाय सुनाई देने लगी और वर्शा
21:19की बूंदे धीरे-धीरे बड़ी होती गई, जिसने पूरी प्रित्वी को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया
21:27राजा सत्यवरत ने द्रिड निश्चय के साथ अपने परिवार और कुछ चुने हुए रिशियों को नौका पर चड़ने के लिए
21:34तैयार रहने का निर्देश दिया, क्योंकि प्रलै का अंतिम क्षन करीब आ रहा था
21:40उन्होंने विभिन प्रकार के बीजों, पौधों और छोटे बड़े जानवरों के जोड़े को इकठा करना शुरू कर दिया, जो भविश्य
21:48की सृष्टी के लिए आवश्चक थे और उन्हें सावधानी पूर्वक नौका में सुरक्षित रखा जाने लगा
21:55अचानक एक प्रचंड गर्जना के साथ आकाश से जल की मूसलाधार वर्शा होने लगी और समुदर की लहरेंग विशालकाय परवतों
22:04सी उची उठने लगी, जो पूरी प्रिथवी को निगलने के लिए आतुर थी
22:10राज्य की गलियां और बाजार तेजी से जलमगन होने लगे, लोग घबराहट में उचे स्थानों की ओर भाग रहे थे,
22:17लेकिन जल का स्तर इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि बचने का कोई रास्ता नहीं था
22:24राजा सत्यवरत अपने चहरे पर ग्रिड़ता और आशा का भाव लिये, नौका के डेक पर खड़े होकर इस भयावः प्रलय
22:32को देख रहे थे, उनका मन भगवान के वचन पर अडिग विश्वास से भरा था
22:38जैसे ही जलस्तर ने अपने उच्चतम बिंदु को छुआ, राजा सत्यवरत ने अंतिन प्राणियों को नौका में चढ़ाया और शक्तिशाली
22:46रस्सियों को खोलने का आदेश दिया, जो उन्हें भगवान के निर्देशानुसार जीवन के नए सफर पर ले जाएगी
22:54एक अंतिन भीशन गर्जना के साथ महाप्रलय ने अपनी चरम सीमा को छुआ, पूरी प्रित्वी जल में समा गई और
23:02केवल वह दिव्य नौका ही अशान्त सागर की लहरों पर एक छोटे से बिंदु के समान तैर रही थी
23:09अब केवल विशाल जलराशी और आकाश ही दिख रहा था, जिसमें कहीं कहीं प्राचीन मंदिरों के शिखरों की अंतिम जलकिया
23:17जलमगन होने से पहले दिख रही थी, जो एक सभ्यता के अंत का प्रतीक थी
23:23नौका के डेक पर खड़े होकर, राजा सत्यवरत ने अपनी आखों में एक गहन संकल्प और इश्वर पर अटूट श्रद्धा
23:31के साथ उस अनंत जलराशी को देखा, जहां से एक नई स्रिष्टी का आरंभ होना था
23:38उनकी नौका एक छोटे से द्वीब के समान उस भयावह महासागर में अकेली तैर रही थी, जिसमें जीवन के सभी
23:46बीज और वेदों का ज्ञान सुरक्षित था, जो एक नए युक का मार्ग प्रशस्थ करेगा
23:53और इस प्रकार गेहन अंधकार और जल के बीच एक नई सुभह की उम्मीद लिए, मत्स्य अवतार का यह दिव्य
24:01विधान जारी रहा, जिसने स्रिष्टी को फिर से आकार देने का मार्ग प्रशस्थ किया
24:07नौका अब पूरी तरह से निर्मित और जीवन के स्पंदन से परिपूर्ण विराट जलराशी में अपनी धीमी और द्रिढ यात्रा
24:15आरंभ करती है, जहां वह कॉजमिक प्रलय के विस्तार के सामने एक बिंदु मात्र प्रतीत होती है
24:22मत्स्य भगवान अपनी दिव्यद रिष्टी से नौका की सुरक्षा का निरंतर अवलोकन करते हैं, उनके नेत्रों में सुरिष्टी के प्रती
24:30असीम करुना और सनरक्षन का भाव स्पष्ट है, जो अंधकार में एक मार्ग दर्शक प्रकाश स्तंभ के समान चमक रहा
24:38है
24:40सब्तर्शी अपने शांत, चित्त और अगाध ज्ञान के साथ नौका के सुद्रिध डेक पर ध्यानपूर्वक आसन ग्रहन करते हैं, मानोवे
24:49ब्रहमांडिय उथल पुथल के बीच शाश्वत ज्ञान के जीवन्त स्तंभ हों
24:54प्रलै की भयावः गर्जना के बीच भी नौका से निकलने वाली एक मंध स्वर्णिम आभा अंधकार को चीरती हुई, जीवन
25:02की अटल आशा और वेदों के अमर ज्ञान का प्रतीक बन रही थी
25:08विभिन प्रजातियों के जीवजन्तूओं के जोडे अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ती को त्याग कर शान्ति पूर्वक नौका के सुरक्षित आश्रे में एकत्रित
25:17होते हैं, उनके भयभी चेहरों पर भी एक अलौकिक सुरक्षा का भाव जलक रहा है
25:23राजा सत्यवरत मनु अपने अटल विश्वास और गंभीर चिंतन के साथ नौका पर उपस्थित प्रत्येक जीव के प्रती अपनी गेहन
25:32जिम्मेदारी महसूस करते हुए, दिव्य निर्देशों का सावधानी पूर्वक पालन करते हैं
25:39रिशियों द्वारा सावधानी पूर्वक संग्रहित किये गए सभी प्रकार के बहुमूल्य बीज और जीवन दायनी ओश्धियां भविश्य की स्रिष्टी के
25:48लिए अमूल्य संपदा के रूप में नौका के भीतर सुरक्षित कक्षों में रखे जाते हैं
25:55नौका अब केवल एक भव्य जहाज नहीं बलकी एक चलती फिर्ती नई स्रिष्टी की गर्भ थी जो महाप्रलय के गर्भ
26:02से एक नए युग को जन्म देने के लिए तयार दिव्य उर्जा से उतप्रोथ थी
26:09भयावह जल्प्रलय की प्रचंड लहरें नौका से लगातार टकराती हैं परंतु वह दिव्य शक्ती से अविचलित अपने निर्धारित पत पर
26:17आगे बढ़ती रहती हैं मानो किसी अद्रिष्य दैविय हाथ से निर्देशित हो
26:23मत्स्य अवतार अपने विशालकाई स्वर्णिम रूप में नौका के ठीक आगे तैरते हुए अपनी दिव्य पूँच से बंधी एक स्वर्णिम
26:32रज्जु द्वारा उसे सुरक्षित खीचते हुए अनन्त जल में मार्ग प्रशस्त करते हैं
26:39सत्यवरत मनू और सब्तर्शी नौका के डेक से प्रलै के इस विशालकाई और विस्मेकारी द्रिश्य को देखते हैं उनके चेहरों
26:47पर भय नहीं बलकी गहरी समझ और दैविय योजना में अटूट विश्वास जलक रहा है
26:54जल और आकाश का मिलन एक विस्मेकारी अंधकार में हो रहा था जहां केवल मत्स्य के दिव्य नेत्रों से निकलने
27:01वाला प्रकाश ही सत्य का मार्ग दिखा रहा था एक कॉजमिक बीकॉन के समान
27:07नौका के भीतर जीवजन्तूओं का प्रारंभिक भय कुछ हद तक शान्त हो गया था क्योंकि वे दिव्य उर्जा की उपस्थिती
27:15में स्वयन को एक अलोकिक सुरक्षा और शान्ती में महसूस कर रहे थे
27:21सब्तर्शी निरंतर और लैबध धंग से वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं जिससे नौका के चारों और एक शक्तिशाली सुरक्षात्मक
27:30उर्जा कवच निर्मित होता है जो प्रलय की विनाशकारी शक्ती को शान्त करता है
27:36मनु अपने हाथों में एक पवित्र दीपक लिए नौका के आंतरिक कक्षों का सावधानी पूर्वक निरीच्षन करते हैं सुनिश्चित करते
27:45हुए की प्रत्येक जीव और प्रत्येक बीस प्रलय के प्रकोप से सुरक्षित है
27:51स्वर्निम रज्रुक जो नौका को मत्स्य से द्रिडता से जोड़े हुए थी अंधकार में चमकती हुई इश्वर और मानव के
27:59बीच के अटूट संबंध और अस्तित्व की निरंतर्ता का शाश्वत प्रतीक बन गई
28:05प्रलय का चरम भयावता बीच चुकी थी और अब विशाल जल धीरे-धीरे शान्त होने लगा था हालांकी आकाश अभी
28:13भी बादलों से घिरा हुआ था और एक अजीब सी शान्ती चाई हुई थी
28:19मत्स्य भगवान अपने दिव्य मुख मंडल पर एक संतुष्टी भरा भाव लिए आने वाली नई स्रिष्टी के लिए उप्युक्त भूमी
28:27के उभरने की प्रतीक्षा करते हुए शान्त नौका की ओर देखते हैं
28:33सत्यवरत मनौ नौका के अगरभाग पर द्रिड़ता से खड़े होकर दूर क्षितिच पर टकटकी लगाए हुए नई प्रित्वी के पहले
28:41संकेत की उचसुपता से प्रतीक्षा कर रहे हैं उनके हृदय में अदमे आशा है
28:48और इस प्रकार अनन्त जल्राशी के बीच यह दिव्य नौका एक नए आरंभ की घोशना कर रही थी जो प्रलय
28:56के बाद ब्रहमांड को फिर से जीवन से भरने के लिए तयार आशा की किरण बन चुकी थी
29:02शांत अनन्त जल्राशी पर तैरती हुई नौका के उपर एक रहस्यमय निरवता चाई हुई थी जो आने वाली स्रिष्टी के
29:10उद्भव से पहले की अंतिम शांती का प्रतीक थी
29:15मत्स्य भगवान जल के गर्भ में स्थित होकर अपने दिव्य ज्यान से प्रित्वी के गहरे अंतरात्मा में हो रहे सुक्ष्म
29:22परिवर्तनों को अनुभव कर रहे थे जो महा प्रलय का संकेट था
29:28सहसा मनुने दूरक्षितिच पर गहरे बादलों के बीच एक अकल्पनिय परिवर्तन को उभरते हुए देखा जिसने उनके हृदय में एक
29:37विस्मयकारी आशंका और गहन चिन्ता जगाई
29:41आकाश का रंग शन भर में बदल गया, काले और बैंगनी रंग के भयंकर बादल एक साथ घुमडने लगे, मानोस्वयन
29:49ब्रहमांड अपने प्रचंड क्रोध का प्रदर्शन कर रहा हो
29:53फिर बादलों की गर्जना के साथ मुसलाधार वर्शा आरंभ हुई, जिसकी बूंदे समुदर के शांत प्रिष्ट को चीरते हुए एक
30:02भयंकर और अवर्णनिय ध्वनी उत्पन कर रही थी
30:06जल के नीचे से मत्स्य भगवान का विशाल रूप धीरे-धीरे उपर उठा, उनकी आखों में संसार की रक्षा का
30:14द्रिड संकल्प और असीम करुना स्पष्ट चमक रही थी
30:18नौका हिचकोले खाने लगी, लहरों के विशाल थपेडों से जूचते हुए और मनुद रिड़ता से रसी को पकड़े हुए अपने
30:26अटूट विश्वास को बनाए रख रहे थे
30:30समुद्र का जलस्तर अविश्वस नियगती से बढ़ने लगा, प्रिथवी के अंतिम परवत शिखर भी धीरे-धीरे इस जल प्रलय में
30:37समाते जा रहे थे, स्रिष्टी के अंत का प्रती
30:41अब पूरी प्रिथवी एक अनन्त उफनते हुए जल के विशाल सागर में विलीन हो चुकी थी, जहां केवल मनु की
30:49नौका ही आशा की अंतिम और एक मात्र निशानी थी
30:54मत्स्य भगवान ने अपनी विशाल आखों से मनु की ओर देखा, मानो उन्हें यहां आश्वासन दे रहे हो कि इस
31:01अंधकार और विनाश में वे अकेले नहीं है
31:05तभी लहरों के बीच से एक अविश्वस्नीय स्वर्णिम चमक उभी और मनु ने पहली बार मत्स्य भगवान के विशाल सीन
31:14वाले दिव्य रूप को देखा, जो उनके सामने प्रकट हुआ
31:18वह मत्स्य भगवान थे, जिन्होंने स्वयन स्रिष्टी को इस भयंकर प्रलै से बचाने का वचन दिया था, उनका रूप दिव्य
31:26शक्ती और असीम करुणा का साकार प्रतीक था
31:30विशाल मत्स्य भगवान धीरे-धीरे नौका की ओर बढ़ने लगे, उनके हर एक चाल से जल की धाराय विचलित हो
31:38रही थी, पर उनकी उपस्थिती में एक अग्धुत शान्ती थी
31:43उनकी आखों में ब्रह्मांड का ज्यान और भविश्य की आशा थी, जो मनु के हृदय में एक नई शक्ती और
31:50अटूट विश्वास का संचार कर रही थी
31:53मनु ने श्रद्धा पूर्वक नौका के रसी का एक सिरा मत्स्य भगवान के विशाल सींग से बांध दिया, एक ऐसे
32:01बंधन का निर्मान करते हुए जो स्रिष्टी को बचाने वाला था
32:05अब वह नौका जो पहले अकेली भटक रही थी, मत्स्य भगवान के दिव्य मार्ग दर्शन में एक निश्चित मार्ग पर
32:13आगे बढ़ चली, जो नई स्रिष्टी की ओर अग्रसर थी
32:17जल प्रलय की प्रचंडता धीरे-धीरे कम होने लगी और मत्स्य भगवान की उपस्थिती से वातावर्ण में एक नई उर्जा
32:26और आशा का संचार होने लगा
32:29मत्स्य भगवान का शांत मुख मंडल आने वाले युग के निर्मान की अदमय इच्छा और संतुलन को दर्शाता हुआ, आगे
32:37के उज्वल मार्ग को निहार रहा था
32:40मनु अपने हृदय में कृतग्यता और शांती का अनुभव करते हुए मत्स्य भगवान के पीछे-पीछे चल रहे थे, एक
32:48नई जीवन और भविश्य की अदमय आशा लिये हुए
32:52इस प्रकार मत्स्य भगवान और मनु अनंत जलराशी पर एक साथ यात्रा कर रहे थे, जो केवल एक अन्त नहीं
33:00बलकी एक भव्य नए आरंभ का दिव्य प्रतीक था
33:05महाराज मनु ने नागराज वासुकी के दिव्य शरीर से बने रस्य को मत्स्य भगवान के विशाल का इस्वर्णिन सीन पर
33:12पूरी निष्ठा के साथ द्रिड़ता पूर्वक बांध दिया
33:16जैसे ही मत्स्य अवतार ने नौका को प्रलै के भयंकर जलमार पर खीचना आरंभ किया, अनंत जल्राशी में एक दिव्य
33:24प्रकाश में राह बनने लगी
33:27प्रलै के विशाल थपेडों के बीच नौका पर सवार महाराज मनु और सब्तरिशी हाथ जोड़कर मत्स्य भगवान के मुख से
33:35बहने वाली परम वानी सुनने को आतुर हो उठे
33:39चारू और छाय भयंकर अंधकार को चीरते हुए भगवान मत्स्य का अलोकिक प्रकाश नौका और आकाश को एक साथ आलोकित
33:48करने लगा
33:49मत्स्य भगवान ने अपने मत्होर और ओजस्वी स्वर में उपदेश देते हुए मनु को आत्मा की अमर्ता और ब्रह्मा के
33:57सनातन स्वरूप का ज्यान प्रदान करना प्रारंभ किया
34:02परमपिता भगवान विश्णु के इस दिव्य मत्स्य रूप से प्रकट होते ज्यानामरित को महाराज मनु ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ती
34:09भाव के साथ अपने हृदय में धारण किया
34:14सब्तरिशियों ने इस परम ज्यान को भावी मानव सभ्यता के कल्यान हेतु अपने मन में सहेचते हुए वैदिक रिचाओं का
34:21शांत स्वर में पाठ किया
34:23श्रीहरी के इस अवतार ने मनु को स्रिष्टी के निर्मान उसके संरक्षन तथा प्रलै काल के पूर्ण और अचूक रहसियों
34:31से अवगत कराया
34:33सर्पराज वासुकी ने भी पूर्ण समर्पन भाव से भगवान के सींग और नौका के बीच अटूट बंधन बनकर उस प्रचंड
34:41प्रलै का आघात सहा
34:44भगवान मत्स्यने आने वाले नए युगमे न्याय, धर्म और मानव कर्तव्यों की स्थापना के लिए मनु को विस्त्रत नियम और
34:52सिध्धान्त सिखाए
34:54महर्शी वशिष्ट और अन्यरिशियों ने प्रभू के वचनों को सुनकर अपनी समस्थ शंकाओं को दूर किया और उनका हृदय असीम
35:02शांती से भर गया
35:04जल प्रलय के बीच नौका के चारों और स्वर्नेम वैदिक मंत्रों की एक अभेद्य सुरक्षात्मक तरंग निर्मित हो गई
35:13मत्स्य भगवान ने चार युगों के चक्र और काल चक्र की महिमा बताते हुए मनु को भावी मनवंतर की बागदोर
35:20संभालने का मार्ग दर्शन दिया
35:23महाराज मनु ने अपनी आखें बंद कर भगवान विश्नु के श्रीचर्णों का ध्यान किया और बाह्य प्रलय के बीच आंतरिक
35:31समाधी का आनंद लिया
35:34नौका में सुरक्षित रखे गए औश्धियों, दिव्य बीजों और वेदों के ज्यान पात्रों से अलोकिक उर्जा की किरने निकलने लगी
35:43आकाश से गिरते हुए प्रल्यंकारी मेग भी मत्स्य अवतार की दिव्य किरनों से टकरा कर शांत होने लगे
35:50भगवान ने मनु और रिशियों को आश्वस्त किया कि यह प्रल्य केवल विनाश नहीं, बलकि पुरानी बुराईयों का अंत और
35:58नवस्रिजन का महान अफसर है
36:02ज्यान का यह पावन भंडार प्राप्त कर महाराज मनु का हृदय मत्स्य रूपी श्रीहरी के प्रती परम कृतग्यता से भर
36:09गया
36:11नागराज वासुकी ने भी शांत मन से अपनी सेवा पूर्ण की, जिससे नौका प्रलय के जल में पूरी तरह सुरक्षित
36:18और स्थिर बनी रही
36:20उगदेश समाप्त होते ही क्षितिच पर नए मनवंतर के सूर्य का भव्य आगमन हुआ और प्रलय का अंधकार सदा के
36:28लिए छंट गया
36:30जैसे जैसे प्रलय का जल कम होने लगा, विशाल नौका धीरे-धीरे हिमालय की गगंचुंबी बरफीली चोटियों की ओर बढ़ने
36:38लगी
36:40भगवान मत्स्य ने महाराज मनु को संकेत देते हुए नौका को परवत की सबसे उची शिंखला से बांधने का निर्देश
36:47दिया
36:49महाराज मनु ने नागराज वासुकी रूपी रज्लु से नौका को सुरक्षित रूप से हिमशिखर पर कसकर बांध दिया
36:57देखते ही देखते प्रल्यंकर जलधाराएं शान्थ होकर प्रित्वी के विशाल कंदराओं में समा गई और नए युग की भूमी दिखाई
37:05देने लगी
37:06उसी क्षण विशाल मत्स्य रूप धारण किये श्रीहरी ने अपना अत्यंत मनमोहक और अलोकिक चतुर्भुज विश्नु रूप प्रकट किया
37:16महाराज मनु और सब्तर्शियों ने अश्रुपूरित नेत्रों और श्रधा से भरकर भगवान विश्नु के उस दिव्य स्वरूप की स्तुती की
37:25भगवान विश्नु ने अपने अभय हस्त से सभी रिशियों को आशिरवाद दिया और उन्हें नई स्रिष्टी के पुनिर्मान का उत्तरदायत्व
37:34सौपा
37:35शितिजपर देवों ने पुश्पवरिष्टी की और संपूर्ण वातावर्ण वेदमंत्रों की अलोकिक ध्वनी से गुन्जायमान हो उठा
37:44नौका से उतर कर महाराज मनु और सबतर्शियों ने पहली बार नए मनवंतर की पवित्र और नवनिर्मित भूमी पर अपने
37:52चरण रखे
37:54महर्शी वशिष्ट और भेगु ने वेदों के सुरक्षित रहने पर परम्पिता परमेश्वर के प्रती कृतग्यता व्यक्त की
38:02महाराज मनु ने नौका में सुरक्षित रखे गए समस्त जीवजन्तूओं के बीजों को नए मनवंतर की उपजाओं मिट्टी में बोना
38:10प्रारंभ किया
38:12देखते ही देखते धर्ती की गोज से हरे भरे अंकुर फूट पड़े और परवत की धलानों पर जीवन का नया
38:19प्रसार होने लगा
38:21नौका से निकल कर विभिन पशुपक्षी और प्राणी स्वतंत्रता पूर्वक नए नवपल्लवित वनों में विचर्ण करने लगे
38:29महर्शी कश्यप और अन्य सब्तर्शियों ने मिलकर नई स्रिष्टी के प्रथम पावन यज्य का आयोजन किया
38:37महाराज मनु और देवी शत्रूपा ने यज्यवेदी में आहुतिया देकर धर्म और न्याय के नए युग का शंकनाद किया
38:45यज्य की पवित्र सुगंध और उठते हुए होमधूम ने संपून वायुमंडल को विशुद्ध और कल्यानकारी बना दिया
38:54श्रीहरी विश्णु ने अपने भक्तों को सदारक्षा का आश्वासन देकर अंतरध्यान रूप धारन कर लिया
39:02सब्तर्शियों ने एक स्थान पर बैठ कर वेदों के ज्यान को आने वाली पीढियों तक पहुचाने का द्रिड संकल्प लिया
39:10महाराज मनु ने मानव सभ्यता के संचालन के लिए सत्य, अहिंसा और धर्म पर आधारित नए नियमों की स्थापना की
39:18इस प्रकार भगवान मत्स्य के परम सनरक्षन में एक नई सुन्दर और धर्मनिष्ट स्रिष्टी का मंगल में आरंभ हुआ

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