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पद्म पुराण के 12वें अध्याय में देखिए अयोध्या के दिव्य राजकुमारों की शिक्षा और महर्षि विश्वामित्र के आगमन की अलौकिक गाथा! जब असुरों के आतंक से ऋषियों के यज्ञ बाधित हो रहे थे, तब विश्वामित्र ने राजा दशरथ से युवा श्रीराम और लक्ष्मण को मांगा। कैसे श्रीराम ने राक्षसी ताड़का का वध कर सिद्ध आश्रम को पापमुक्त किया? कैसे सुबाहु और मारीच के उपद्रव को शांत कर दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया? और कैसे जनकपुर में भगवान शिव के अभेद्य धनुष पिनाक का भंजन कर जगज्जननी सीता से विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ? जानिए पद्म पुराण के इस रोमांचक और रहस्यमयी प्रसंग में!
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00:00पुत्रकामिष्टी यग्य की दिव्य अगनी से अवतरित हुए राजा दशरत के चारों पुत्रों राम, भरत, लक्षमन और शत्रुघनर के आगमन
00:08से अयोध्या नगरी में आनंद की ऐसी लहर उठी मानो स्वयन स्वर्ग प्रित्वी पर उतर आया हो जहां हर दिशा
00:15में मं�
00:16अगल ध्वनी गूंज रही थी। रानी कोशल्या, सुमित्रा और कैकेई अपने ननहेन राजकुमारों को गोद में लिये हुए असीन वातसल्य
00:25और ममता से परिपूर्ण दिखाई दे रही थी, जिनकी आखों में अपने पुत्रों के भविश्य की सुनहरी कलपनाय जिल मि
00:34राजकुमार अब छोटे बालक बन अयोध्या के भव्य उपवनों में हिर्नों और पक्षियों के साथ अठखेलिया करते हुए अपनी मासूम
00:43हसी से पूरे वातावर्ण में मधुर्ता घोल देते थे, जिससे महल की दीवारे भी प्रफुलित हो उठती थी।
01:03ग्रहन करने नहीं, बलकि एक यूग की गाथा लिखने जा रहे हुँ।
01:41समस्त राजकुमार, विशेशकर, राम और लक्षमन, गुरु वशिष्ट के साननिध्य में धनुषबान, तलवार और गदा चलाने की कला में ऐसी
01:49निपुंता प्राप्त कर रहे थे।
01:51मानोवे युद्ध के मैदान में देवताओं के सेनाप्ती बनने के लिए ही जन्मे हो।
01:57राम ने अपनी अविचल एक आगरता और दिव्य लक्षय साधना से एक अत्यंत जटिल और दूरस्थ लक्षय को घेद दिया,
02:05जिससे गुरु कुल के सभी शिष्य और गुरु वशिष्ट स्वयंचकित रह गए, जैसे उन्होंने किसी अदरिश्य शक्ती का प्रक्तिकरण
02:13देखा हो. प्रत्येक प्रभात में, राजकुमार गुरुकुल के आश्रम में ब्रहमा मुहूर्त में उठकर पवित्रस नान के पश्चात सूर्य देव
02:22को अरग्य देते और वेदमंत्रों का जाब करते थे, जिससे उनकी दिन्चर्या अनुशासन और आध्यात्मिक्ता से �
02:30परिपूर्ण होती थी. लक्षमन का राम के प्रती अगाध प्रेम और अटूट निष्ठा उनके हर कार्य और हर वचन में
02:38जहलकती थी, मानों वे राम की छाया हों, जो कभी अपने अग्रट से दूर नहीं होना चाहते थे. भरत और
02:47शत्रुग्न भी अपने गुरु के मार्
02:49दर्शन में धर्म शास्त्र, नीति शास्त्र और विभिन कलाओं में अद्वितिय दक्षता प्राप्त कर रहे थे. अपनी बुद्धी और विनमर्ता
02:57से सभी का हरिदय जीत रहे थे. चारो राजकुमार ज्यान और शक्ती के संगम के रूप में एक साथ खड़े
03:05होकर गुर�
03:17पुल में शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, जब राजकुमार अल्पकाल के लिए अयोध्या लोटे, तो पूरी नगरी उनके स्वागत में
03:25उमड पड़ी, मानो देवता स्वयं प्रित्वी पर पधारे हो. राजा दशरत अपने पुत्रों को ज्यान और संसकार से परि
03:47ज्यान और विभिन शास्त्रों की गेहन समझ का प्रदर्शन किया, जिससे सभी दर्बारी और विद्वान उनकी प्रशंसा में मंत्रमुग्ध हो
03:55गए.
03:56राम का शांत, सौमय और प्रभावशाली व्यक्तित्व, जिसने गुरुकुल में भी सबको मोहित किया था, अब अयोध्या के राजभवन में
04:05भी उपस्थित सभी को अपनी दिव्य आभा से मंत्रमुग्ध कर रहा था, मानो वे स्वय धर्म के स्वरूप हो.
04:13गुरुकुल के अंतिम दिवस पर, राजकुमारों ने अपने गुरु वशिष्ट के चर्णों में श्रधापूर्वक प्रणाम किया, उनके हृदय में विदाई
04:21का भाव और भविश्य के लिए गुरु के आशिरवाद की कामना थी.
04:26गुरु वशिष्ट ने अपने शिष्यों को अंतिम उपदेश देते हुए, उन्हें धर्म, न्याय और प्रजापालन का महत्व समझाया, उनके हाथों
04:35में भविश्य की बागदोर सौंपने का संकेत दिया.
04:39गुरु वशिष्ट का आशिरवाद प्राप्त कर, चारों राजकुमारों ने विन्मृता पूर्वक उन्हें विदा किया और अयोध्या की ओर प्रस्थान करने
04:48के लिए तैयार हुए, उनके मन में गुरु के आदर्शों को जीवन पर्यंत धारन करने का संकल्प था.
04:55अब युवा और परिपक्व होकर, चारों राजकुमार अपने रथों पर बैठकर अयोध्या की ओर बढ़ रहे थे, उनके आत्मविश्वास भरे
05:04चहरों पर एक नए अध्याय की शुरुवात का ग्रिड संकल्प और भविश्य की चुनोतियों का सामना करने की तयारी स्प
05:11जलक रही थी, अयोध्या की सुरमय वादियों को चीरते हुए, चारों राजकुमारों के रत भव्य राजमहल की ओर तेजी से
05:20बढ़ रहे थे, उनके आगमन की सूचना से पूरी नगरी में उल्लास की लेहर डौड गई थी, पुत्रों के आगमन
05:28की प्रतीक्षा में, महारा
05:30राजदशरत अपने राजसिनहासन पर बैठे थे, उनके चहरे पर वातसल्य और गर्व का अनुपम तेज जलक रहा था, गुरु वशिष्ट
05:38भी उनके समीक विराजमान थे
05:42जैसे ही चारों राजकुमारों ने राजमहल में प्रवेश किया, उनकी युवावस्था और राजसी आभा ने समस्त सभा को मंत्र मुग्ध
05:50कर दिया, हर आख में उनके पराक्रम और भविश्य की जलक दिख रही थी
05:56राजगुरु वशिष्ट के दिव्य आशिर्वाद और माता पिताओं के सनहभरे स्पर्ष से राजकुमारों का हृदय कृतग्यता से भर उठा, उनकी
06:05आखों में भविश्य के दायत्वों का द्रिड संकल्प स्पष्ट था
06:10महाराज दश्रत ने अपने चारों पुत्रों को देख कर असीम सुख का अनुभव किया, उनके मन में एक युग के
06:17समाप्थ होने और दूसरे के आरंभ होने की सहज अनुभूती हो रही थी
06:23राजकुमारों ने अपने मातापिता और गुरु वशिष्ट के चर्णों में सादर प्रणाम किया, उनकी आखों में श्रध्धा और अपने संसकारों
06:31के प्रती अटूट निष्ठा स्पष्ट जलक रही थी
06:35पूरे महल में हर्शोलास का वातावर्ण था, संगीत की मधूर ध्वनी गूंज रही थी और नृत्ती की मोहक छटा बिखर
06:43रही थी, जैसे स्वर्ग स्वयं प्रित्वी पर उतर आया हो
06:48अचानक राजमहल के द्वार पर एक दिव्यध्वनी गूंजी जिसने उत्सव के वातावर्ण को भंग कर दिया और एक तेजस्वी महर्शी
06:56के आगमन की सूचना से सभा में सन्नाट आचा गया
07:01वहां थे महर्शी विश्वामित्र, जिनके तप और तेज से दिशायकाप उठती थी, उनका आगमन किसी अप्रत्याशित घटना का संकेत दे
07:10रहा था
07:11महाराज दश्रत ने सिनहासन से उठकर श्रधा पूर्वक महर्शी विश्वामित्र का स्वागत किया, उनका मन इस अप्रत्याशित आगमन के पीछे
07:20का कारण जानने को उच्सुक था
07:24महर्शी विश्वामित्र की तीक्षन द्रिष्टी सभा में उपस्थित राजकुमारों पर पड़ी विशेशकर भगवान राम पर जिनकी दिव्य आभा ने महर्शी
07:33के हृदय को छू लिया
07:35शान्त होते ही महर्शी विश्वामित्र ने अपनी तपस्या में आ रही बाधाओं का वर्णन किया कैसे दुष्ट राक्षस उनके पवित्र
07:43यग्यों को भरष्ट कर रहे थे
07:46उन्होंने ताड़का जैसी क्रूर राक्षसी के आतंक का भी उल्लेख किया जिसके भय से रिशिमुनी अपने आश्रमों में भी सुरक्षित
07:54नहीं थे और वन काप उठा था
07:57और फिर एक अप्रत्याशित और चौकाने वाली मांग के साथ महर्शी ने राजा दश्रत से युवा राजकुमार राम और लक्षमन
08:06को अपने साथ भेजने का अनुरोध किया
08:09अपने लाडले पुत्रों को जो अभी बालेकाल से ही बाहर निकले थे ऐसे भयावह जंगल में भेजने की बात सुनकर
08:17दश्रत का हृदय विदीन हो उठा
08:20अपने राजा की विकट स्थिती को भापते हुए राजगुरु वशिष्ठ ने आगे बढ़कर दश्रत को समझाया उन्हें धर्म के पत
08:29पर चलने और महर्शी की आग्या का पालन करने का महत्व बताया
08:34विश्वामित्र ने अपनी मांग पर द्रिढ रहते हुए राजा को समझाया की यह केवल उनकी इच्छा नहीं बलकी एक दिव्य
08:42योजना का हिस्सा है जिसके लिए राम ही उचित हैं
08:47धर्म संकट में पड़े महाराज दशरत ने एक बार फिर अपने पुत्रों विशेशकर राम की ओर देखा उनका हृदय वातसल्य
08:55और कर्तव्य के द्वंध्व में फसा था
08:59ऐसे कठिन चण में राजकुमार राम ने एक साहसी कदम आगे बढ़ाया अपने पिता और गुरु से अनुमती लेकर महर्शी
09:07विश्वामित्र के साथ जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की
09:11अपने भ्राता राम के इस द्रिढ निश्चय को देख लक्षमन भी तुरंत आगे आए उनकी आखों में भाई की रक्षा
09:19का अटूट संकल्प और अटूट निश्ठा स्पष्ट जलक रही थी
09:23दो सुकुमार बालकों को भयानक राक्षसों से युद्ध के लिए उद्यत देख राजा दशरत का हृदय मर्मान तक पीड़ा और
09:31वात्सल्य के आघात से काप उठा
09:35महर्शी विश्वामित्र के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े महाराज दशरत ने अपने कापते स्वर में निवेदन किया कि वे राम के
09:43स्थान पर अपनी चतुरंगिनी सेना लेकर स्वयन चलेंगे
09:47पुत्रमोह में व्याकुल राजा दशरत ने तर्क दिया कि केवल सोलह वर्ष के कोमल राम अभी अस्त्रशस्त्र की गूड कलाओं
09:55और निशाचरों के कपट से पूर्णत्य अनभिग्य है
10:00दशरत की इस मनाही और संकोच को देखकर महर्षी विश्वामित्र का मुनहरिदय भयंकर क्रोध से प्रजवलित हो उठा और उनकी
10:08भ्रिकुटिया तन गई
10:11विश्वामित्र ने गर्जना करते हुए महाराज को स्मरण कराया कि इक्षवाकु वन्ष के राजा कभी अपने दिये गए वचन से
10:18पीछे नहीं हटते
10:21महर्षी के प्रचंड कोप से संपूर्ण राजसभा में सन्नाट आचा गया और स्वर्ण स्तंभो पर उकेरी गई आकृतिया भी मानो
10:29भयभीत हो उठी
10:31राजसभा को संकट में देख कुलगुरु महर्षी वशिष्ठ अपनी दिव्यवेदी से उठे और उन्होंने महाराज दशरत का ध्यान धर्म के
10:40परम मार्ग की ओर आकर्शित किया
10:42गुरु वशिष्ठ ने दशरत के पास जाकर उनके कापते कंधों पर हाथ रखा और अत्यंत शांत एवं ओजस्वी वाणी में
10:51उन्हें सत्य का आभास कराया
10:54महर्शी वशिष्ठ ने गुप्त रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा कि श्री राम साधारन बालक नहीं अपितु संपून ब्रहमांड के
11:02स्वामी साक्षात भगवान श्रीहरी विश्नु के अवतार है
11:07वशिष्ठ जी ने बताया कि महर्शी विश्वामित्र स्वयंपरम समर्थ हैं वे केवल श्री राम के जगत कल्यानकारी अवतारकार्य को गती
11:16देने हेतु यहां पधारे हैं
11:19कुलगुरु के इन अमूल्य ब्रहमग्यान रूपी वचनों को सुनते ही राजा दशरत के हरिदय से अग्यान और मोह का अंधकार
11:27छंटने लगा
11:29गुरुदेव ने आश्वस्त किया कि विश्वामित्र के संरक्षन में रगुनात की विजय निश्चित है और वे अमोग अस्त्रशस्त्रों का दिव्य
11:37ज्ञान प्राप्त करेंगे
11:40आत्मसाक्षातकार और कर्तव्यबोध से पुनरजागरत होकर महाराज दशरत ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों को पोँचा और अपने प्रिय पुत्रों को विश्वामित्र
11:49के चर्णों में समर्पित कर दिया
11:52महर्शी विश्वामित्र के मुख मंडल पर एक संतुष्ट और तेजस्वी मुस्कान तैर गई क्योंकि अब धर्म युद्ध का प्रथम चरण
12:00प्रारंभ होने वाला था
12:03महारानी कौसल्या और सुमित्रा ने भी भारी मन किन्तु अगाध गौरव के साथ अपने वीर पुत्रों के मस्तक पर विज्यतिलक
12:11लगा कर उन्हें आशिर्वाद दिया
12:14भगवान श्री राम और भाता लक्षमन ने सिर जुका कर अपने पूज्य मातापिता और गुरुजनों के चर्णों का स्पर्ष कर
12:22उनकी अनुभ्या प्राप्त की
12:24पूरी अयोध्या नगरी अपने प्रिय राजकुमारों की रक्षा हेतु प्रार्थना करने लगी और राजप्रासाद की अटारियों से पुश्पवर्षा होने लगी
12:35धनुषबान धारन की ये दिव्यबालतेज से दीप्तिमान श्री राम और लक्षमन महर्शी विश्वामित्र के पीछे पच्चहनों पर चलने लगे
12:44राजमहल के विशाल स्वर्ण द्वारों को पार करते हुए तीनों तपस्वियोध्धा उस भयानक ताड़कावन की दिशा में आगे बढ़ चले
12:52जहां धर्म और अधर्म का महा संग्राम प्रतीक्षा कर रहा था
12:57इस प्रकार अयोध्या से प्रस्थान करते हुए श्री राम का प्रत्थम चरण संपून ब्रहमांड को रावन के आतंक से मुक्त
13:04कराने के महाभियान की ओर अग्रसर हुआ
13:08सूर्य की अंतिम किरने ढलते ही श्री राम, लक्षमन और महर्शी विश्वामित्र उस अत्यंत भयावः और निर्जन ताड का वन
13:16की सीमा में प्रवेश कर गए
13:18वन की दंगोंटू स्तब्धता और विशैली गंध को भामपकर, महर्शी विश्वामित्र ने दोनों राजकुमारों को रोकते हुए इस स्थान के
13:28भयानक अतीत का आभास कराया
13:31श्रीराम ने अत्यंत गंभीरता पूर्वक उस अस्थ बिखरी दग्ध भूमी का अवलोकन किया, जहां किसी प्राणिया पक्षी की चहचहाहट तक
13:39सुनाई नहीं दे रही थी
13:42चारों और बिखरे विशाल, शिलाखंड और विशालकाय वरिक्षों के अवशेश इस बात का गवाह थे कि यहां किसी दानवी शक्ती
13:50का अखंड तांडव चर रहा है
13:53महर्शी विश्वामित्र ने बताया कि यह सुन्दर और समरिध प्रदेश कभी मलद और करूश नाम से जाने-जाने वाले अत्यंत
14:01पवित्र जन्पध हुआ करते थे
14:05विश्वामित्र जी ने श्री राम को इस विनाश की सूत्रधार यक्ष राज कुमारी ताड़का की जन्मगाथा सुनानी प्रारंभ की
14:13प्राचीन काल में सुकेतु नामक एक अत्यंत पराक्रमी यक्ष था जो संतान हीन होने के कारण घोर तपस्या में लीन
14:21हो गया था
14:23उसकी अनन्य भक्ती से प्रसन्न होकर परम्पिता ब्रहमाजी प्रकट हुए और उसे एक सहस्त्र हाथियों के बल से संपन्न पुत्री
14:31का वर्दान दिया
14:32उसी वर्दान के फलस्वरूप ताड़का का जन्म हुआ जो बालेकाल से ही अतुल्निय सौंदर्य और अगाध शक्ती की स्वामिनी थी
14:43कालंतर में ताड़का का विवाह महाबली सुन्द दैत्य के साथ हुआ जिससे मारीच नामक अत्यंत मदांध और शक्तिशाली पुत्र का
14:51जन्म हुआ
14:53आमकार में अंधे होकर जब सुन्द ने महर्शी अगस्त्य के पवित्र आश्रम पर आक्रमन किया तो रिशी ने अपने तपोबल
15:01से उसे भस्न कर दिया
15:02पती की मृत्यू के क्रोध में बौखला कर ताड़का और उसका पुत्र मारीच महर्शी अगस्त्य को निगलने के लिए उनकी
15:11ओर जप्टे
15:13क्रोधित होकर महर्शी अगस्त्य ने ताड़का को श्राप दिया कि वह अपना सुन्दर रूप खोकर एक विक्राल नर्भक्षी राक्षसी में
15:21परिवर्तित हो जाए
15:23महर्शी के शाप से मारीच भी राक्षस बन गया और भईभीत होकर दूर दक्षिन के समुद्र तटकी ओर पलायन कर
15:31गया
15:33ततपश्चात उस भयानक राक्षसी ताड़का ने इस पूरे सुन्दर वन को उजाड़कर इसे नरक तुल्य वीरान शेत्र में बदल दिया
15:41उसके भय से इस मार्ग का संपूर्ण व्यापार और रिशियों के धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह नश्ठ हो गए
15:49इस प्रकार मलद और करूश के सुन्दर नगर इस ताड़का वन के नाम से विख्यात होकर मृत्यू के महाजाल बन
15:56गए
15:58महर्शी विश्वामित्र ने श्री राम को आदेश दिया कि स्त्री समझकर संकोच न करें और धर्म की रक्षा हेतु इस
16:06पापिनी का तुरंत वद करें
16:08गुरू की आग्या मिलते ही श्री राम ने अपने विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चड़ाई और एक भयंकर तंकार उत्पन्न की
16:16जिससे संपूर्ण वन काम्प उठा
16:19धनुष की उस मेग गर्जन जैसी ध्वनी को सुनते ही ताड का अत्यंत क्रोध में भरकर लाल नेत्रों के साथ
16:26गरजती हुई श्री राम की ओर बढ़ी
16:29ताड का क्रोध में अट्टहास करती हुई अपने विशालकाई शरीर को प्रिथवी पर पटकती हुई श्री राम की ओर भयानक
16:38वेग से जप्टी
16:40महर्शी विश्वामित्र ने द्रिड़ता से नेत्र बंद किये मन ही मन धर्म की विजय और दैविय न्याय की स्थापना का
16:47संकल्प दोहराते हुए
16:50ताडका ने एक विक्राल गर्जना के साथ अपने भयानक मुह से विशैली अगनी और आकाश से विशालकाई शिलाए श्री राम
16:58की ओर फेंकी
17:00श्री राम ने शांत चित्त से अपने दिव्यधनुष को संभाला उनके चारों और एक अद्रिश्य उर्जा चक्र उन्हें भयंकर आक्रमन
17:08से बचा रहा था
17:11ताड़का के प्रहारों से पूरा वन डग्मगा उठा व्रिक्ष जड़ से उखड रहे थे और प्रित्वी चीतकार कर रही थी
17:18जैसे प्रलया गया हो
17:21लक्षमन ने विस्मित होकर अपने गुरु की ओर देखा जिनके मुख पर अब भी अटूट विश्वास और शांती का भाव
17:28स्पष्ट था
17:30श्री राम ने एक चम्चमाता हुआ बान अपने तरकश से निकाला और उसे अपने विशाल धनुष पर ऐसे चड़ाया जैसे
17:38काल स्वयम मुस्कुरा रहा हो
17:41बान की प्रत्यंचा खीचते ही एक अलौकिक प्रकाश पुँझ उत्पन हुआ जिसने संपूर्ण वन को क्षण भर के लिए प्रकाशित
17:49कर दिया
17:50श्री राम ने आखे मुंद कर लक्ष साधा और पलक जपकते ही वह बान प्रचंड वेग से ताड़का की ओर
17:57बढ़ा जैसे मृत्यू का दूथ हो
18:01विश्वामित्र ने शांति पूर्वक अपने आखें खोली उनके मुख पर दिव्य संतुष्टी का भाव था मानों वे जानते थे कि
18:09धर्म की विजय निश्चित है
18:12वह दिव्यबान सीधे ताड़का के हरिदय में जा लगा जिससे एक असहनिय चीतकार वन में गूंच उठी और उसकी सारी
18:20शक्ती क्षीन होने लगी
18:22जैसे ही बान ने ताड़का के हरिदय को भेदा उसके विशाल शरीर से एक काली विशैली उर्जा का प्रवाह होकर
18:30ब्रहमांड में विलीन होने लगा
18:33ताड़का का विशालकाय शरीर लड़ खडाया और एक भयंकर गर्जना के साथ वह प्रित्वी पर गिरी जिससे पूरी धर्ती थर्रा
18:41उठी
18:43वन के जीवजन्तु अपनी मांदों से बाहर आने लगे उनकी आखों में भय के स्थान पर अब शान्ती और मुक्ती
18:50का भाव था
18:52श्री राम और लक्ष्मन ने अपने धनुष नीचे किये उनके चहरों पर दैविय शान्ती और कर्तव्य पालन की संतुष्टी स्पष्ट
19:00जलक रही थी
19:02महर्शी विश्वामित्र एक शान्त मुस्कान के साथ श्री राम की ओर बढ़े उनके मुख पर गर्व और कृतग्यता का संगम
19:10था
19:12ताड़का वन की काली चाया अब दिव्य प्रकाश में बदल गई थी जहां हर पत्ता और कनकन मुक्ती की गाथा
19:19गा रहा था
19:21स्वर्ग से देवता अद्रिश्य रूप से पुष्प वर्शा कर रहे थे श्री राम के इस धर्म स्थापना कार्य की जैजैकार
19:28करते हुए
19:30श्री राम ने बान को ताड़का के शरीर से निकाला और उसके शरीर से एक दिव्य जोती निकली जो आकाश
19:37में विलीन हो गई
19:39अब त्रय रिशिकुमार एक पवित्र मार्क पर आगे बढ़ते हुए नए अभियानों और धर्म की स्थापना की ओर अग्रसर हुए
19:48ताड़का के वध के उपरांत जब महर्शी विश्वामित्र श्रीराम और लक्षमन ने पवित्र सिधाश्रम में प्रवेश किया तो संपूर्ण वन
19:57छेत्र में अलोकिक शांती और वेदध्वनी गूंज उठी
20:02महर्शी विश्वामित्र ने अत्यंत प्रसन्न चित्थ होकर दोनों दिव्य राज कुमारों को अपने पवित्र आश्रम के मुख्य मंडप में साधर
20:10आमंत्रित किया
20:12प्रातैकाल की पावन बेला में महर्शी विश्वामित्र ने श्री राम को पवित्र नदी तट पर आच्मन करवाकर दिव्यास्त्र प्रदान करने
20:20का अनुष्ठान प्रारंभ किया
20:23स्वर्गलोक से ब्रह्मा, विश्णू और महेश सहित समस्त देवगन अद्रिश्य होकर श्री राम के इस पावन दिव्यास्त्र ग्रहन उच्सव को
20:32देखने के लिए लालायत हो उठे
20:35सिध्धाश्रम के विशाल वटवरिक्ष की छाया में चारों और होमधूप की सुगंध और रिशियों का मंत्रो चार गूज रहा था
20:44महर्शी विश्वामित्र ने श्री राम से कहा कि वे उन्हें प्रजापती क्रिशाश्व द्वारा निर्मित उन सभी परम अस्त्रों का ज्यान
20:51देंगे जिनका उप्योग केवल धर्म रक्षा हेतु होता है
20:57महर्शी ने सर्वप्रथम श्री राम और लक्षमन के मस्तक पर अपना हस्त रख कर उन्हें बला और अतिबला नामक गुप्त
21:04महामंत्रों की दीख्षा दी
21:07इन गुप्त विद्याओं के प्रभाव से दोनों राजकुमारों का तेज अचानक सहस्र सूरियों के समान प्रजवलित हो उठा और उनकी
21:15ठकान सदा के लिए दूर हो गई
21:18संपूर्ण सिधाश्रम परिसर उस समय अलोकिक उर्जा और मंत्र में तरंगों से आंदोलित होकर सूरिय समान दमकने लगा
21:27तकपष्चात महरशी विष्वामित्र ने अत्यंत उगरम मंत्रों का उच्चारण करते हुए दंडचक्र, धर्मचक्र और कालचक्र जैसे भयंकर दिव्यास्त्रों का आहवान
21:37किया
21:39विश्वामित्र के आहवान करते ही आकाश का सीना चीर कर प्रल्यंकारी आगने और रौधर अस्त्र श्रीराम के सम्मुख अवत्रित होने
21:47लगे
21:49सर्वशक्तिमान विश्णुचक्र और इंद्र का वजरास्त्र तीवर विद्युत तरंगों के साथ प्रकट होकर श्री राम के शौर्य को नमन करने
21:57लगे
21:59सिध्धाश्रम का प्राकृतिक वातावर्ण इस अलौकिक द्रिश्य को देखकर अत्यंत सुरमय और प्रकाशमान हो उठा
22:07महर्शी ने केवल अस्त्रों को चलाना ही नहीं, अपितु उनके उपसनहार और पुनह लोटाने के अतिगुप्त मंत्र भी श्री राम
22:15के हृदय में स्थापित कर दिये
22:17श्री राम ने अपने दोनों हाथ जोड़कर परम नमर्ता से उन सभी दिव्यास्त्रों को स्विकार किया और उन्हें अपने अंतर्मन
22:26में समाहित कर लिया
22:27वे समस्थ दिव्यास्त्र सुक्ष्म दिव्य शरीर धारन करके श्री राम के सामने प्रकट होकर बोले है रगुनन्दन
22:35हम सदैव आपकी आज्या के अधीन रहेंगे
22:39अब सिध्धाश्रम केवल रिशियों का निवास स्थान नहीं बलकि समस्थ ब्रह्मांड की सबसे अभेद्य और दिव्यास्त्रों से सुसज़ित भूमी बन
22:49चुका था
22:50महर्शी विश्वामित्र ने वीर लक्षमन को भी अनेक दुर्जय रक्षाक्वच और अभेद्य दिव्यास्त्र प्रदान कर उन्हें महाप्राक्रमी बना दिया
23:00दिव्यास्त्र प्रदान करने के उप्रांत महर्शी विश्वामित्र ने अपने मुख्य छे दिवसिय महायग्य का पावन संकल्प लिया और वेधी प्रजवलित
23:09की
23:10श्री राम और लक्षमन अपने हाथ में प्रत्यंचा चढ़ा धनुष लेकर महायग्य की रक्षा हेतु अत्यंत सजग होकर वेधी के
23:18दोनों और प्रहरी बनकर खड़े हो गए
23:22पाँच दिनों तक सिध्धाश्रम का तपोवन पूरी तरह शांत रहा और श्री राम व लक्षमन की सजग ग्रिष्टी के बीच
23:29पवित्र यग्य की अगनिशिखाए निर्विधन प्रजवलित होती रही
23:34चठवें और अंतिन दिन जब महर्शी विश्वामित्र पूर्णाहूती की तयारी कर रहे थे तब आकाश में सहसा अनिश्टकारी काली घटाए
23:42घिरने लगी
23:44अचानक भीशन गर्जना के साथ आकाश से राक्षसी किलकिल ध्वनी गूंच उठी और संपूर्ण तपोवन का वातावर्ण भयानक अंधकार से
23:54भर गया
23:55लंकापती रावन के इशारे पर यग्य में विघिन डालने आय भीशन राक्षस मारीच और सुबाहु विशाल सेनाप्ती रूप में गगन
24:04में प्रकट हुए
24:06राक्षसी माया से सुबाहु और मारीच ने पावन यग्यवेदी को दूशित करने के लिए आकाश से मास त्रक्ट और हड्डियों
24:14की वीभत्स वर्षा प्रारंभ कर दी
24:17यग्यवेदी को अपवित्र होता देख रिशिमुनी भैभीत होने लगे तब श्री राम ने अत्यंत शांत किन्तु द्रिड भाव से लक्षमन
24:25को ततपर होने का संकेत दिया
24:28श्री राम ने बिना एक क्षण भी विलंब किये अपने तेजपुंच को दंड धनुष पर महाविनाशकारी दिव्यास्त्र का संधान किया
24:37बान के प्रजवलित होते ही उसकी अलौकिक कांती ने तपोवन के अंधकार को चीर कर पूरे आकाश को पुनह स्वर्ण
24:44में आभासे प्रदीप्त कर दिया
24:47श्रीराम ने सर्वप्रथम मारीच पर अत्यंत शक्तिशाली मानवास्त्र छोड़ा ताकि वह बिना मृत्यू के यग्यभूमी से सहसरों योजन दूर फेंक
24:56दिया जाए
24:58मानवास्त्र के प्रचन आघात से मारीच अचेत हो गया और पवन के तीवर वेग में बहता हुआ सो योजन दूर
25:05समुद्र पार जागिरा
25:08अपने भाई मारीच को दूर फेंके जाते देख क्रोधित सुबाहु विशाल गदा लेकर सीधे यग्यवेदी को नश्ट करने हेतु जप्टा
25:17श्री राम ने तुरंट अपने धनुष पर प्रजवलित आगनेयास्त्र का संधान किया जिसकी लप्टे प्रल्यकारी अगनी के समान प्रजवलित हो
25:26उठी
25:27श्री राम का आगनेयास्त्र वायु में तैरते सुबाहु के वक्षस्थल को घेदता हुआ पार निकल गया और राक्षस्क्षन भर में
25:35भस्म होकर गिर पड़ा
25:38उसी समय वीर लक्षमन ने वाय व्यास्त्र का प्रयोग कर राक्षसों की शेश सेना को चक्रवात के वेग से दूर
25:45उड़ा कर नश्ट कर दिया
25:48दिव्यास्त्रों के प्रभाव से आकाश में व्याप्त सारा रक्त और मास्तक्षन भस्न हो गया और संपूर्ण सिधाश्रम में शुद्ध सुगंध
25:56फैल गई
25:57आकाश से काले बादल छंट गए और देवताओं ने श्री राम तथा लक्षमन के इस अतुलनिय पराक्रम पर तपोवन में
26:05पुश्पवर्शा की
26:06विग्न समाप्थ होने पर महर्शी विश्वामित्र ने पूर्णा हूती दे कर अपना मुख्य छे दिवसिय महायग्य सफलता पूर्वक संपन्न किया
26:17यग्य संपन्न होते ही गदगद कंट से महर्शी विश्वामित्र ने श्री राम और लक्षमन को गले से लगा कर उनके
26:24शौर्य की भूरी-भूरी प्रशनसा की
26:27आश्रम के सभी महर्शियों ने श्री राम के चर्णों में नत्मस्तक होकर उन्हें लोकरक्षक अवतार मानकर आशिश प्रदान किये
26:36रात्री के शांत वातावर्ण में सिध्धाश्रम की रक्षा पूर्ण कर विश्वामित्र जी ने भोर होते ही जनकपुरी मिथिला की और
26:44प्रस्थान की योजना बनाई
26:47भोर की स्वर्णिन किर्णों ने सिध्धाश्रम के वातावर्ण को पावन किया और महर्शी विश्वामित्र श्रीराम तथा लक्षमन के साथ मिधिला
26:56की पवित्र भूमी की ओर चल पड़े उनके पच्चिहन एक नए यूग की गाथा लिखने को तत पर थे
27:03मार्ग में चलते हुए महर्शी विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्षमन को जनकपुरी के भव्य राजसभा और वहा स्थापित अद्वितिय शिवधनुष
27:12पिनाग के दर्शन का दिव्य उद्देश बताया जिससे दोनों राजकुमारों के मन में कौतुहल जागरित हु�
27:19वे तीनों धीरे-धीरे घने वनों से होकर गुजर रहे थे जहां प्राचीन व्रिक्षों की विशाल शाखाय आकाश को छूती
27:27प्रतीत होती थी और पथरीले रास्तों पर उनके चरण द्रिड़ता से पढ़ रहे थे
27:33उपर मंडराते हुए बास के शांत उडान और दूर से आती हुई किसी अद्रिश्य जहरने की कलकल ध्वनी ने वन
27:41के इस मार्ग को एक दिव्य शांती से भर दिया था जैसे प्रकृती स्वय उनके आगमन की साक्षी बन रही
27:48हो
27:49कुछ समय बाद वे एक निर्मल नदी के किनारे पहुँचे जिसका जल सूर्योदय की नारंगी और सुनहरी आभा को प्रतिबिम्बित
27:57कर रहा था और उन्होंने नदी के शांत प्रवाह को पार किया
28:02नदी पार करने के पश्चात विश्वामित्र जीने मिथिला के सम्रिद इतिहास और उसके न्यायप्रिय राजा जनक की प्रजाप्रेन की कहानिया
28:11सुनानी आरंभ की जिससे राज कुमारों के चहरे पर उचसुकता स्पष्ट जलक रही थी
28:18राम और लक्षमन वन के मार्ग पर चलते हुए गुरु विश्वामित्र के मुख से निकली प्रत्येक कथा को बड़े ध्यान
28:25और श्रद्धा से सुन रहे थे
28:27मानों वे इतिहास के जीवंत प्रिष्ठों में स्वयंगोते लगा रहे हुँ
28:33जैसे जैसे वे आगे बढ़ रहे थे दूर प्राचीन खंधरों और सदियों पुराने मंदिरों के अवशेश उन्हें किसी खोए हुए
28:41सामराजिकी महानता की याद दिला रहे थे जिसकी कहानिया हवा में गूंज रही थी
28:47कई दिनों की यात्रा के पश्चात शितिच पर अंतह एक विशाल प्राचीन नगर की भव्य दीवारें और उंचे गोपुरम उभरने
28:56लगे यह मिथिला नगरी थी जो अपनी दिव्यता से प्रकाश मान थी
29:01मिथिला के द्वार पर पहुँचकर महर्शी विश्वामित्र ने राजकुमारों को शिवधनुष पिनाक की उत्पत्ती की गूड कथा सुनानी आरंभ की
29:10जो स्वयन देवों के देव महादेव की शक्ती का प्रतीक था
29:15उन्होंने बताया कि कैसे भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस धनुष को गढ़ कर देवों को दान दिया था
29:21जो उनकी अविनाशी शक्ती और समहारक क्रोध का अप्रतिम रूप था और जिसे कोई सामान्य मानव उठा भी नहीं सकता
29:29था
29:31विश्वामित्र के शब्दों के साथ ही एक पल के लिए वातावर्ण में एक अग्रिश्य प्रचंड उर्जा का आभास हुआ
29:38मानो साक्षात महादेव की शक्ती उसक्षन उनके चारों और व्याप्थ हो गई हो
29:44गुरु विश्वामित्र ने आगे बताया की कैसे महादेव ने अपने इस शक्तिशाली धनुष को राजा जनक के पूर्वज देवरात को
29:52सौंप दिया था
29:53जब वे शिव्यग्य के दौरान इंद्र के मानमर्दन के लिए उसे धारन कर पाए थे
30:00राम और लक्षमन गुरु के मुख से शिव्धनुष की अविश्वस्निय कथा सुनकर विस्मय से भर गए उनकी आखों में जिग्यासा
30:08और श्रद्धा का एक अध्भुत मिश्रन था
30:11विश्वामित्र जी ने स्पष्ट किया कि कैसे यह धनुष सदियों से मिथिला के राजपरिवार की धरोहर रहा है जिसकी रक्षा
30:19करना राजा जनक अपना परम धर्म मानते हैं
30:23उनके शब्दों में यह केवल एक धनुष नहीं अपितु महादेव की शक्ती का साक्षात अवतार है जिसे कोई सामान्य बलशाली
30:32नहीं बलकि एक दिव्य आत्मा ही उठा सकता है
30:37इसके बाद महर्शी ने राजा जनक की उस प्रतिज्या का वर्नन किया जिसके अनुसार जो कोई भी उस शिव्धनुष को
30:45उठा कर उसकी प्रत्यंचा चड़ाएगा उसी के साथ उनकी पुत्री सीता का स्वयमवर होगा
30:51यह सुनकर श्रीराम के शांत मुखमंडल पर एक अलौकिक ग्रिड़ता का भाव उभरा जबकि लक्षमन के नेत्रों में रोमाच और
31:00उत्साह की एक नई चमक देखी जा सकती थी
31:04जैसे ही वे मिथिला के मुख्यद्वार से नगर में प्रवेश करने को उद्यत हुए सूर्य की सुनहरी किर्णे नगर के
31:11भव्य महलों और विस्तरित बाजारों पर पड़ रही थी जिससे नगर एक स्वर्गिय आभा से जगमगा रहा था
31:19मिथिला नगरी का विहंगम द्रेश जहां भव्य महल और सजेद्जे मार्ग स्वर्णिन प्रकाश में नहाए हुए थे उनके सामने एक
31:28नए अध्याय के भव्य उद्घाटन का संकेट दे रहा था
31:32जनक्पुर के उस विशाल और अलौकिक स्वयंवर मंडप में चारों दिशाओं से पधारे पराक्रमी राजा और मुनिगन अपने अपने आसनों
31:41पर विराजमान थे
31:43रत्नजरित स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान राजा जनक के चहरे पर एक और आशा की चमक थी तो दूसरी और एक
31:51अंजाना संकोच जलक रहा था
31:54महर्शी विश्वामित्र के साथ पधारे भगवान श्री राम और लक्षमन दर्शकों की उच्च दीरगा में बैठ कर इस एतिहासिक द्रिश
32:02को शांत भाव से निहार रहे थे
32:05सभा के ठीक मध्य में आठ पहियों वाले विशाल लौह रत पर रखा हुआ भगवान शिव का दिव्य और अभेद्य
32:12धनुष पिनाक अपनी प्रचन आभा बिखेर रहा था
32:17राजपुरोहित के संकेट पर दूतों ने स्वयमवर की प्रतिग्या की घोशना की जिसे सुनते ही गर्विले राजाओं के नेत्र अहंकार
32:25से चमक उठे
32:27अपनी शारिरिक शक्ती और पराक्रम के मद में चूर कई शक्तिशाली भूपाल धनुष की ओर बढ़ने लगे
32:34मानो यह उनके लिए अत्यंत सहच कार्य हो
32:38एक बलवान राजा ने आगे बढ़कर अपने पूरे शरीर का बल लगाते हुए धनुष को उठाने का प्रयास किया
32:45किन्तु वह तस से मस न हुआ
32:48धनुष की गुरुता के सम्मुख उस राजा की कांती क्षीन हो गई और वह लजजजित होकर अपने स्थान पर वापस
32:55लोट आया
32:57ततपश्चात एक के बाद एक कई प्रसिध योध्धा उस वेदी के समीप गए
33:02परन्तु किसी को भी सफलता का एक कण भी प्राप्त न हुआ
33:07किसी राजा का मुकुट गिर पड़ा तो किसी का गर्व धूल धूसरित हो गया
33:12और सभा में धीरे-धीरे निराशा की एक ठंडी लहर दौडने लगी
33:17जब अकेले किसी से यह संभव न हुआ
33:20तो कई बलशाली राजा मिलकर उस प्रचंड धनुष को हिलाने के लिए एक साथ आगे बढ़े
33:27परन्तु सहसरों वीरों का संयुक्त प्रयास भी उस शिवधनुष के एक तिल मात्र अंश को भी भूमी से उपर न
33:34उठा सका
33:36समस्त निरिपगन लज्जा और अपमान से भर कर अपने अपने आसनों पर वापस बैठ गए और स्वयंबर मंडप में सन्नाट
33:44आचा गया
33:45यह देखकर मिठिलापती राजा जनक का हरिदय अत्यंत व्यतित हो उठा और उनका धैर्य पूरी तरह तूट गया
33:54उन्होंने अपनी विशाल सभा पर द्रिश्टिपात किया और उनका स्वर्शोक तथा निराशा से भर उठा
34:02राजा जनक ने दुख भरे स्वर में कहा है प्रिथवी के वीर योध्धाव
34:06क्या अब इस संसार में कोई ऐसा पुरुष नहीं बचा जो शिव के धनुष को उठा सके
34:13उनके कड़वे शब्दों ने सभा में उपस्थित सभी राजाओं के मस्तक लज्जा से नीचे जुका दिये
34:21जनक ने अत्यंत संताप में आकर कहा
34:24मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह वसुंधरा अब वीरों से शून्य हो चुकी है
34:29और मेरी पुत्री सीता का विवाह अब असंभव है
34:34राजा जनक के इन कठोर और निराशाजंक वचनों ने संपूर्ण सभा में एक तहल का मचा दिया और शांती छिन्न
34:41भिन्न कर दी
34:43जनकपुर के उस विहंगम द्रिश में राजा जनक की चिंता चरम सीमा पर थी तभी वीरों की उस सभा में
34:50एक नया मोड आने की पूर्व संध्या चा गई
34:54जनकपुर के सभाकक्ष में जहां राजा जनक की निराशाजंक वानी ने सभी को स्तंभित कर दिया था
35:00वही महर्शी विश्वामित्र ने अपनी शांत तेजस्वी द्रिश्टी से राजकुमार राम की ओर देखा जैसे किसी दिव्य संकेत की प्रतीक्षा
35:09हो
35:10रिशिवर के मौन निमंतरन को समझ कर शांतचित राजकुमार राम ने अपने तेजस्वी अनुज लक्षमन की ओर देखा
35:18जिनके मुख पर अपने भ्याता की क्षमता का अटल विश्वास झलक रहा था
35:24समस्थ सभा के बीच से भगवान राम जिनका हृदय गुरु के आदेश से और आत्मबल से परिपून था
35:31अत्यंत शांत और धीर गंभीर मुद्रा में उस धनुष की ओर बढ़ने लगे
35:36जिसे उठाने का साहस अब तक कोई वीर नहीं कर पाया था
35:41उनकी शांत आखों में एक अदमे आत्मविश्वास की चमक थी
35:45जैसे वे किसी चिरपरिचित वस्तु की ओर बढ़ रहे हों
35:49और धनुष स्वया उनके आगमन की प्रतीक्षा में अपनी अलोकिक आभा बिखेर रहा था
35:56राजकुमार राम के प्रत्येक कदम के साथ सभा में एक अध्भुत चुपपी चा गई
36:02मानो समय स्वया रुक गया हो और हर ग्रिष्टी उन पर टिकी थी
36:06जिन्होंने अब तक किसी भी प्रतियोगिता में पराजय का मुख नहीं देखा था
36:12राजा जनक जिनके हृदय में आशा और आशंका का द्वंद्व चर रहा था
36:17अपने आसन से उठ खड़े हुए उनके चहरे पर एक ऐसी विस्मय भरी जिग्यासा थी जो युगो युगो से किसी
36:24ने नहीं देखी थी
36:26सीता अपनी सखियों के साथ महल की बालकनी से यह अध्भुत द्रिश देख रही थी
36:32उनके दिव्य मुख मंडल पर एक अज्यात पुलकन और प्रार्थना का भाव था
36:37मानो उनके चिरप्रतीक्षित स्वपन का साकार होने का क्षण आ गया हो
36:43वही रंग्धूमी के केंद्र में महादेव का वह पिनाक धनुष जो सहसरों वर्षों से अचल पड़ा था
36:50अब किसी दिव्य उर्जा के स्पंदन से कमपायमान प्रतीत हो रहा था
36:54जैसे वह अपने स्वामी के स्पर्ष की प्रतीक्षा कर रहा हो
36:59राम अब धनुष के अत्यंत निकट पहुँच चुके थे
37:02उनकी चाल में कोई जल्दबाजी नहीं थी
37:05बलकि एक सहच संतुलन और द्रिढ निश्चय था
37:09जैसे वे कोई साधारन वस्तु उठाने जा रहे हो
37:13विश्वामित्र की आखें संतोष से चमक उठीन
37:16मानो उन्होंने अपने शिश में उस दिव्य शक्ती को देख लिया हो
37:21जो त्रैलोक्य को भी विस्मच कित कर सकती थी
37:24राम ने धनुष के समीप जाकर उसे प्रणाम किया
37:28मानो वह किसी जीवित देवता को आदर दे रहे हो
37:31और फिर अपने बलवान हाथों से उसे उठाने की तयारी की
37:36एक शन के लिए पूरा जनकपुर यहां तक की आकाश भी सास थामे हुए था
37:43जैसे किसी अद्भुत और अविश्वसनिय घटना का साक्षी बनने वाला हो
37:48और फिर एक सहजता से जिसे देखकर सभी की आखे फटी रह गई
37:53राम ने शिव के उस वजनी धनुष को ऐसे उठा लिया
37:57मानो वह कोई खिलो ना हो बिना किसी प्रयास के उसे भूमी से उपर उठा दिया
38:03राजा जनक के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली
38:07यह केवल प्रसन्ता के नहीं बलकी एक युगों युगों की प्रतिग्या के पूल्न होने के अश्रुधे
38:13जो उनके हृदय के भार को हलका कर रहे थे
38:17राम ने धनुष को उठाया और उतनी ही सहजता से उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने लगे
38:23प्रत्येक हरकत में अद्भुत कोशल और दैविय शक्ती का समनवय था
38:28और जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाई गई एक ब्रहमांड कमपक्पी ध्वनी के साथ
38:33पिनाप धनुष बीच से दो टुक्रों में तूट गया
38:36उसकी गरजना ने दिशाओं को थर्रा दिया और स्वर्ग से फूलों की वर्षा होने लगी
38:43धनुष तूटने की ध्वनी से पूरी सभा आनंद और विस्मय से भर गई
38:47सभी ने जैश्री राम के उद्गोश से आकाश गूजा दिया
38:51और एक नया उत्साह जनकपुर में छा गया
38:56प्रफुलित सीता जिनके मुख पर अब लाज और प्रेम का संगम था
39:00अपनी सक्खियों के साथ धीरे धीरे उस रंग्भूमी की ओर बढ़ी
39:04जहां उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षन उनकी प्रतीक्षा कर रहा था
39:10उस एतिहासित पल में सीता ने अपने कोमल हाथों से उस दिव्य पुश्पमाला को राम के गले में डाला
39:17जिससे केवल दो आत्माओं का नहीं बलकी दो युगानतरकारी शक्तियों का मिलन हुआ
39:24दिव्य युगल, राम और सीता एक दूसरे के समक्ष खड़े होकर अपने प्रेम और भाग्य के अटूट बंधन में बंधे
39:32उनके मिलन से स्वर्ग में भी उत्सव मनाया गया और प्रित्वी पर एक नए युग का सूत्र पात हुआ