वामन अवतार के बाद, जब धर्म की स्थापना हुई, तब धरती पर एक नए प्रकार का अंधकार मंडराने लगा। इस एपिसोड में हम ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी रेणुका के पुत्र, परशुराम के जन्म और उनके प्रारंभिक जीवन की ओर बढ़ेंगे। रेणुका के एक क्षणिक विचार ने जमदग्नि के क्रोध को ऐसा भड़काया कि परशुराम ने एक अकल्पनीय आज्ञा का पालन किया। यह कहानी आगे बढ़ती है परशुराम की भगवान शिव के प्रति कठोर तपस्या, उनके दिव्य परशु (कुल्हाड़ी) की प्राप्ति, और अहंकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन के साथ बढ़ते संघर्ष तक, जो अन्याय के एक महाकाव्यिक शुद्धिकरण की शुरुआत करता है। #PadmaPurana #Parashurama #HinduMythology #Jamadagni #Renuka #KartaviryaArjuna #LordShiva #VishnuAvatars #PuranicStories
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00:00वामन अवतार के पश्चात तीनों लोकों में पुनह धर्म की स्थापना हुई थी, पर यह शांती अलपकालिक निकली क्योंकि कुछ
00:08शत्रे राजाओं के हृदय में अहंकार के बीज पन्पने लगे.
00:12शीर सागर में शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्णु ने इस सुक्ष्म परिवर्तन को अपनी अनंत द्रिष्टी से अनुभव किया, जानते
00:21हुए कि एक नए संधर्ष का बीज बोया जा रहा है.
00:26सम्रिध्धी और शक्ती के मद में चूर कईक शत्रे राजाओं ने अपने भव्य महिलों से सामान्य प्रजा पर अपनी पकड
00:34कस्नी शुरू कर दी, उनकी संपदा और अधिकारों को हडपते हुए.
00:39राजसी भवनों की स्वर्ण आभा के नीचे साधारन जनता की आहे दबने लगी, जिससे धर्ती पर एक अद्रिश गहरा असंतुलन
00:48जन्म लेने लगा.
00:50इन अभिमानी राजाओं ने धर्म के नियमों की अभहेलना करते हुए, तपस्वियों और ब्राहमनों का अनादर करना शुरू कर दिया,
00:58उनकी पवित्रता और ज्ञान पर प्रश्निचिन्ह लगाते हुए.
01:02स्रिश्टी के रचिता ब्रहमा और त्रिलोक गामी देवर्शी नारद अपने दिव्य लोकों से इस विचलित होती धर्ती का अवलोकन कर
01:10रहे थे, उनके चहरों पर गहरी चिंता स्पष्ट थी.
01:15एक कुख्यात राजा ने तो यहां तक दुस्सा हस किया कि एक रिशी के आश्रम में बलपूर्वक प्रवेश कर उनके
01:22यग्यकी अगनी को बुझा दिया और पवित्र सामगरी को अपवित्र कर डाला.
01:28इस प्रकार के अत्याचारों से त्रस्थ होकर धर्ती माता स्वया अपनी पीडा व्यक्त करने लगी, जिससे व्रिक्ष सुखने लगे और
01:36नदिया अपना शांत प्रवाह खोने लगी.
01:40जनजीवन अस्तव्यस्थ हो गया, व्यापार मंद पढ़ गया, क्रिशी चौपट हो गई और चारों और गरीबी तथाभय का साया मंदराने
01:49लगा.
01:50इंद्रलोक में देवतागण भी प्रित्वी की इस दुर्दशा को देख कर चिंतित हो उठे, क्योंकि धर्म का पतन उनके अपने
01:58अस्तित्व पर भी संकट ला रहा था.
02:01ब्राहमनों और रिशियों ने इन विकट परिस्थितियों में भी धैर्य नक होते हुए धर्म की रक्षा हेतु अनेकों यग्य और
02:09तपस्याए की, पर दुष्ट राजाओं ने उन्हें भी बाधित किया.
02:14ब्रहमान्दिय संतुलन की तुला, जो कभी समयक थी, अब ख्षत्रिय राजाओं के अन्याय और अत्याचारों के कारण एक ओर जुकने
02:22लगी, जिससे स्रिश्टी में हाहाकार मच गया.
02:26पूरे भूमंदल से उठने वाली पीडा की चीखें, आकाश को भेदती हुई, परमपिता ब्रहमा और भगवान विश्णु के कानों तक
02:34पहुँचने लगी.
02:36अपनी योग निद्रा से जागरित होकर, भगवान विश्णु ने समस्त स्रिश्टी के दुख को अपनी दिव्य आखों में समेटा, उनके
02:44मुख पर एक गहन विचार की रेखा उभी.
02:48इसी बीच एक शत्रिय राजा ने ब्राहमनों के विरुद्ध एक व्यापक अभियान छेडा, उनके मठों और गुरुकुलों को नश्ट किया,
02:57और उन्हें समाज से बहिश्कृत करने का आदेश दिया.
03:01स्रिष्टी का तानाबाना तूटने लगा, जैसे कोई विशालकाय वस्त्र फाड़ा जा रहा हो, और हर प्राणी के भीतर एक अज्यात
03:09भय घर कर गया.
03:11पूरा विश्व एक गहरी निराशा में डूब गया, जहां न्याय और धर्म की कोई आशाशेश नहीं दिख रही थी, बस
03:19अंधकार और उत्पीडन का राज था.
03:22तब वैकुंठ में भगवान विश्णू के मुख पर गेहन चिंतन के पश्चात एक द्रिड संकल्प उभरा, उनकी दिव्य आखों में
03:30स्रिष्टी को पुनह स्थापित करने की अगनी जल उठी.
03:34पीडित पृत्वी और उसके संतों की सामूहिक प्रार्थनाए एक उजजवल प्रकाश पुन्च के रूप में समस्त ब्रहमांड को पार करती
03:42हुई, सीधे वैकुंठ में भगवान विश्णू के चर्णों में पहुँच गई.
03:47यह वहक्षन था जब न्याय की पुकार ने एक नई अवतार कथा का आहवान किया, और ब्रहमांड एक बार फिर
03:55अपने सर्वोच पालक के दिव्य हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करने लगा.
04:00उसी समय इस धरा पर भ्रिगु वंश के तेजस्वी रिशी जमदगनी का आश्रम अपनी सादगी और गहन तपस्या से आलोकित
04:09था, जहां प्रकृती भी उनके साथ एकाकार हो चुकी थी.
04:13इस पवित्र भूमी पर भगवान विश्णू की दृष्टी एक नई लीला की प्रस्तावना रचने लगी, जहां धर्म की स्थापना हेतु
04:22एक नए अवतार का बीज बोया जाना था.
04:26रिशी जमदगनी एक शांत और प्रकर तपस्वी, अपनी धर्म प्रायन पत्नी रेनुका के साथ ज्यान और आध्यात्मिक्ता के मार्क पर
04:34ग्रिड़ता से अग्रसर थे.
04:37उनकी तपस्या की अग्नी इतनी प्रबल थी कि वह न केवल उनके आश्रम को बलकी पूरे ब्रहमांड को अपनी पवित्र
04:45उर्जा से प्रकाशित करती थी.
04:48वन्य प्राणी भी उनके आश्रम में सुरक्षित और भयमुक्त विचर्ण करते थे, मानों उन्हें दिव्य सनरक्षन प्राप्थो.
04:56रेनुका की निस्वार्थ सेवा और जम्दग्नी का गंभीर ध्यान उनके ग्रिहस्थ जीवन को एक अद्वितिय आध्यात्मिक आयाम प्रदान करता था.
05:06रिशी जम्दग्नी को दिव्य शक्तियां प्राप्थ थी, जिनसे वे बिना किसी उपकरण के मात्र अपनी संकल्क शक्ती से पानी एकत्र
05:15कर पाते थे.
05:17उनका जीवन साद्गी का एक ऐसा प्रमान था, जहां भौतिक इच्छाओं का कोई स्थान नहीं था, केवल आध्यात्मिक उन्नती ही
05:25सर्वोप्री थी.
05:27प्रत्येक प्रभात आश्रम में वैदिक मंत्रों की ध्वनी गूंच उठती थी, जिससे वातावर्ण और भी शुद्ध और पवित्र हो जाता
05:35था.
05:37रेणु का अपने पती की हर आवश्शक्ता का ध्यान रखती थी, उनका प्रेम और समर्पन अग्वितिय था.
05:45उनके तप और प्रेम के फलस्वरूप, उन्हें कई तेजस्वी पुत्र प्राप्थ हुए, जो उनके दिव्यवंश को आगे बढ़ाने वाले थे.
05:54उनका आश्रम केवल एक निवास स्थान नहीं, बलकि ज्ञान, धर्म और शांती का एक जीवंट प्रतीक था, जो दिव्य उर्जा
06:02से स्पंदित होता था.
06:05रेणु का प्रतिदिन पास की नदी से पवित्र जल लाती थी, जो उनके शुद्ध मन और शरीर का प्रतीक था.
06:23रेणु का नदी में स्नान कर रही थी, तब उनकी शुद्धता और पवित्रता को एक क्षनिक मानविय विचार ने विचलित
06:30कर दिया.
06:32उनके मन में उठी उस क्षन भंगुर तरंग ने उनकी तपस्या से अरजित अलौकिक शक्ती को क्षन भर के लिए
06:39अवरुद्ध कर दिया.
06:41अपने शुद्ध मन से जब वह जल लाने का प्रयास करने लगी, तो वह दिव्य शक्ती जो उनके साथ सदैव
06:48रहती थी, लुप्थ हो गई.
06:51आश्रम में बैठे रिशी जमदगनी को ततकाल अपनी पत्नी की तपस्या में हुए इस क्षनिक व्यवधान का आभास हो गया.
06:59उनके मुख पर गहन चिंतन और कुछ चिंता की रेखाएं उभी, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी पत्नी की पवित्रता
07:07पर कोई छाया पड़ी है.
07:10इस अद्रिश्य व्यवधान ने आश्रम की शांती को भंग नहीं किया, किन्तु आने वाली घटनाओं की एक अशुब आहट दे
07:18दी.
07:19आश्रम में बैठे रिशी जम्दगनी को अपनी गहन तपस्या के बीच ही, अपनी पत्नी की पवित्रता में हुएक शनिक व्यवधान
07:27का तीवर आभास हुआ, जिससे उनके मुख पर एक अद्रिश्य परंतु गहन चिंता की रेखाएं उभी.
07:35उनकी दिव्यद्रिश्टी ने ततकाल अद्रिश्य तरंगों को पकड़ लिया, जो उनकी पत्नी रेनुका के मन में उत्पन हुएक शनिक मोह
07:43का स्पष्ट संकेत थी, जिससे उनका मन गहन चिंतन में डूब गया.
07:48उधर पवित्र जल लाने के लिए देवी रेनुका अपने हाथ में कलश लिये हुए आश्रम के शांत मार्ग से हरे
07:56भरे व्रिक्षों और मधुर पक्षियों के कलरव के बीच नदी की ओर जा रही थी.
08:02जैसे ही रेनुका नदी के निकट पहुँची, पवित्र जल का शांत प्रवाह एक रहस्य में आहट के साथ बह रहा
08:09था, जो भविश्य में होने वाली अप्रत्याशित घटनाओं की एक अशुब पूर्व सूचना दे रहा था.
08:16रेनुका अपनी तपस्या और पवित्रता के आभास में धीरे धीरे नदी के निर्मल तट पर पहुँची, जहां जल का शांत
08:24स्पर्ष उनके मन को और भी शांती प्रदान कर रहा था.
08:29नदी में डुबकी लगाने की तैयारी करते हुए, उनकी द्रिष्टी अचानक कुछ दूर जल क्रीडा करते एक गंधर्व जोडे पर
08:37पड़ी, जिनकी मधूर हंसी और कामुक क्रीडा ने उनके मन में खशनिक मोह उत्पन्न कर दिया.
08:44गंधर्वों की मोहक छवी और उनकी प्रेम्मई जल क्रीडा को देख कर, शन भर के लिए रेनुका का मन भौतिक
08:51इच्छाओं से विचलित हो गया, जिससे उनकी तपस्याजन्य पवित्रता पर एक सुक्ष्म छाया पड़ गई.
08:58जल में गिर्ती हुई सूर्य की सुनहरी किरने, जैसे रेनुका के अस्थिर मन का प्रतीक हो, शन भर के लिए
09:05डगमगाती हुई दिखाई दी, मानों उनकी पवित्रता की चादर पर एक अग्रिश्य दरार पड़ गई हो.
09:12उसी क्षण आश्रम में बैठे रिशी जमदगनी को रेनुका के मन की यह क्षणिक दुरबलता, उनकी दिव्य चेतना में एक
09:20भीशन आग्हात की तरह महसूस हुई, जिससे उनके माथे पर क्रोध की लकीरें गहरी होने लगी.
09:27उनके मुखमंदल पर गहन क्रोध और दुख का मिश्रन उभराया, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी तपस्या का बल उनकी
09:35पत्नी की अखंड पवित्रता पर निर्भर करता था.
09:39उधर अपनी तुटी का आभास होते ही, रेनुका का मन पश्चाताप और गलानी से भर गया और वह भारी मन
09:47से चुपचाप अपने कलश के साथ आश्रम की ओर लोटने लगी.
09:52आश्रम के उपर धीरे-धीरे काले घने बादल चाने लगे, जो रिशी जमदगनी के भीतर उमरते भीशन क्रोध और आने
10:00वाले भयानक तूफान का एक अशुब संकेत दे रहे थे.
10:05अपने मन में भारी पश्चाताप और अनिश्चित्ता लिये हुए, रेनुका धीरे-धीरे आश्रम के द्वार पर पहुची, जहां का वातावर्ण
10:13अब पहले जैसा शान्त नहीं था, बलकि एक अजीब सी खामोशी से भरा था.
10:20जमदगनी अपनी कुटिया के बाहर एक स्थेर और भयावा मुद्रा में खड़े थे, उनकी आखों में जलती हुई क्रोध की
10:27अगनी रेनुका को देखते ही और भी प्रखर हो उठी.
10:32पती की आखों में उस प्रचंड क्रोध को देखकर, रेनुका भय से काप उठीन और उनके मन में अपने भविश्य
10:39को लेकर एक गहरा और भयानक अंदेशा जाग उठा.
10:44जम्दगनी के तपोबल से एक अग्रिश्य प्रचंड उर्जा उठने लगी, जो उनके क्रोध से और भी तीवर हो गई थी,
10:52जिससे आश्रम का वातावर्ण भारी और असहनिय हो चला था.
10:57क्रोध से कापते हुए, रिशी जम्दगनी ने अपनी कठोर वानी में अपने सभी पुत्रों को बुलाया, उनकी आवाज में वजर
11:05के समान गर्जना थी, जो आश्रम में गूँझ उठी.
11:09उनके पुत्रक भैभीत और असमंजस में अपने पिता के सामने उपस्थित हुए, जिनके मुख से निकलने वाला आदेश इतना भयावह
11:19था कि उनके रोंगते खड़े हो गए.
11:22जमदगनी के सभी पुत्रों ने परशुराम को छोड़ कर अपनी मा का वध करने के भयानक आदेश को सुनने के
11:29बाद भय और संकोच से अपने सिर जुका लिए, कोई भी पिता की आध्या मानने का साहस नहीं कर पाया.
11:37रिशी जमदगनी के क्रोध से ब्रहमांड हिल उठा, उनकी आखों से निकली अगनी ब्रहमांड में एक भयावह कमपन उत्पन कर
11:45रही थी, जो आने वाले महाविनाश का स्पष्ट संकेत था.
11:50रिशी जमदगनी ने अपनी आध्या टालने वाले जेश्ट पुत्रों को तत्क्षन अपने तपोबल की क्रोधागनी से चेतनाहीन और पाशानवत हो
11:59जाने का भयंकर श्राप दे दिया.
12:02उसी समय आश्रम परिसर में युवा परशुराम, जिन्हें तब राम कहा जाता था, अपने हाथ में प्रचंड फरसाधारन किये पिता
12:10के समक्ष आकर नमरता से खड़े हो गए.
12:14क्रोध से उबलते जमदगनी ने अपने कनिष्ठ पुत्र परशुराम को भी बिना किसी हिचकी चाहट के अपनी माता रेनुका का
12:22मस्तक धड़ से अलग करने का क्रूर आदेश दिया.
12:26पिता के वचनों को धर्म का परम कर्तव्य मानते हुए युवा राम के मन में तिल भर भी संशय या
12:32मोह उत्पन्न नहीं हुआ.
12:35माता रेनुका अपने पुत्र की अगाध पित्र भक्ती और काल के इस भीशन चक्र को समझते हुए अश्रुपूरित नेत्रों से
12:43मूग खडी रही.
12:45आकाश में उपस्थित समस्थ देवगण और रिशिमुनी इस अत्यंत कठिन धर्मसंकट को देख कर भय और आश्चर्य से कांप उठे.
12:54परशुराम ने अपने प्रचंड फरसे को वायू में तीवर गती से घुमाया और एक ही वजर्पात जैसे प्रहार से माता
13:02का शीश धड़ से अलग कर दिया.
13:05जैसे ही माता का मस्तक भूमी का स्पर्श करने लगा, संपून प्रित्वी थर्रा उठी और तीनों लोकों में हाहाकार मच
13:13गया.
13:14संपून आश्रम परिसर में एक अलौकिक दिव्य जोती फैल गई जिसने प्रकृती के कणकण को स्थब्ध कर दिया.
13:22भगवान विश्नु और महादेव शिव ने अपने अपने दिव्य धामों से पर्शुराम की इस कठोर कर्तव्यनिष्ठा और अकल्पनिय त्याग को
13:31देखा.
13:32अपनी आग्या का अक्षर शहपालन होते देखकर महर्शी जमदगनी का भयानक क्रोधागनी क्षन भर में शान्थ हो गया.
13:41भीशन कृत्य करने के पश्चात भी पर्शुराम के मुख पर पश्चाताप के स्थान पर केवल अचल पित्रभक्ती का अलौकिक तेज
13:49चमक रहा था.
13:51अत्यंत प्रसन्न होकर जमदगनी ने अपने पुत्र परशुराम से कहा कि वे अपनी इस अध्वितिय भक्ती के बदले कोई भी
13:59मन्चाहा वर्दान मांग लें.
14:02बिना किसी स्वार्थ के परशुराम ने हाथ जोड़कर पहला वर्दान मांगा कि उनकी माता रेनु का पुनह जीवित हो जाएं
14:09और उन्हें इस वद का कोई स्मरण न रहे.
14:13इसके साथ ही उन्होंने अपने पाशान बने भाईयों को पुनह चेतना प्रदान करने और स्वयन के लिए सरवदा अजय रहने
14:21का वर्मांगा.
14:23महर्शी जमदगनी के तपोबल के प्रभाव से माता रेनु का तुरंत पूर्णत है स्वस्थ और जीवित होकर ऐसे उठीन जैसे
14:31वे किसी गहरी निद्रा से जागी हो.
14:34परशुराम के सभी भाई भी अपने पूर्व रूप में लौट आये और संपूर्ण आश्रम पुनह पवित्रता और शांती के प्रकाश
14:42से जग्मगा उठा.
14:44माता रेनुका ने अपने पुत्र राम को गले से लगा लिया, अंजाने में हुए इस पूरे घटनाक्रम का कोई भी
14:51दुखद स्मरण उनके मन में नहीं था.
14:55स्वर्गलोक से देवताओं ने परशुराम की अतुलनिय पित्रिभक्ती और बुद्धिमत्ता पूर्ण वर्दान की सराहना करते हुए उन पर पुष्पवर्शा की.
15:05इस महागाथा ने सिद्ध कर दिया कि परशुराम केवल प्रचंड शस्त्र के स्वामी नहीं, बलकी धर्म और पित्रिभक्ती के उच्चतम
15:13आदर्श हैं.
15:16जम्दगने रिशी की कुटिया के प्रांगण में एक अविस्मनिय शांती छा गई, जहां नवजीवन प्राप्त रेनुका अपने पुत्रों के साथ
15:24पुनह खड़ी थी, अंजाने में हुई भीशन घटना की कोई स्मृती उनके मन में नहीं थी.
15:31ब्रहमांड के विभिन लोकों में इस अद्भुत घटना की गूंच सुनाई दी, जिससे देवगन और सिद्धजन परशुराम की अलोकिक शक्ती
15:39और पित्र भक्ती पर विचार विमर्ष करने लगे.
15:43रिशी जमदगनी ने अपने पुत्र परशुराम को गर्व और करुणा से देखा, उनकी आखों में एक पिता की असीम संतुष्टी
15:51जलक रही थी, जिसने अपने पुत्र की धर्मनिष्ठा का चरम देखा था.
15:57पवित्र यज्यवेदी से अब भी धुआ उठ रहा था, जो अगनी के साक्षीत में पूर्ण हुए इस दिव्य संकल्प और
16:04पुनह स्थापित धर्म का प्रतीक था.
16:07इस गेहन घटना के बाद, रेनुका ने अपने दैनिक आश्रम के कारियों को पुनह संभाला, उनके चहरे पर वही सहट
16:15शांती थी, मानो कुछ हुआ ही न हो.
16:19देवर्शी नारद वीना बजाते हुए कैलाश परवत पर भगवान शिव और देवी पारवती के समीग पहुँचे, परशुराम की अतुलनिय पित्रभक्ती
16:28का गुनगान करने लगे.
16:31परशुराम अपने कंधे पर फरसा टिकाए, शांत भाव से नदी तट पर ध्यानस्थ बैठे थे, उनके मन में एक नए
16:38दैविय जीवन पत का उद्भव हो रहा था.
16:42जल में परिलक्षित उनका प्रतिबिंब, भविश्य की कठोर चुनोतियों और उनके अजे संकल्प की जाकी प्रस्तुत कर रहा था.
16:51अन्य पुत्रों ने भी अपने जीवन की इस दूसरी पारी को स्विकार किया, अपने बड़े भाई परशुराम के प्रति उनके
16:58मन में असीम श्रधा जागरित हुई.
17:02भगवान विश्णु, गरुर पर विराजमान, शीर सागर में अपनी शया पर लेटे हुए थे, उनकी आखों में संपून ब्रहमांड की
17:10शांती और परशुराम के भविश्य की योजनाय नहित थी.
17:15जम्दगनी रिशी ने परशुराम को वेदाध्ययन और दिव्यास्त्रों के और गहन ज्यान के लिए प्रेरित किया, ताकि वह अपने अजे
17:23वर्दान का सदुपियोग कर सके.
17:26परशुराम के फरसे से परावर्तित होता सूर्य का प्रकाश, उनके भावी कर्मों और न्याय के मार्ग को प्रकाशित करने का
17:34संकेत दे रहा था.
17:36आश्रम का वातावर्ण पुनह उर्जा और सौहार्थ से भर गया, जहां एक दुखद घटना ने अब एक नई, गहन समझ
17:44और पारिवारिक एकता को जन्म दिया था.
17:47स्वर्ग में देवगुरु ब्रिहस्पती ने देवताओं को समझाया कि यह घटना धर्म की सुक्षमता, आज्याकारिता और पित्र भक्ती के अकाट्य
17:56महत्व को दर्शाती है.
18:00परशुराम ने अपने गुरु और पिता जमदगनी से युद्ध कला और आध्यात्मिक्ता के उच्चतम रहसियों को आत्मसाथ करना शुरू कर
18:08दिया, उनकी शक्ती को एक नए स्तर पर ले जाते हुए.
18:12उनके मन में कोई पश्चाताप नहीं था, केवल एक अटूट संकल्प था धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने
18:20का, जिसे वे अब अपना परंकर्तव्य मानते थे.
18:25आश्रम के व्रिक्षों की पत्तियों पर ओस की बूदे मोतियों सी चमक रही थी, जो एक नए प्रभात और परशुराम
18:32के उजवल आने वाले भविश्य का संकेट दे रही थी.
18:37ब्रहमा, विश्नु और महेश ने गुप रूप से परशुराम के हृदय में एक अलौकिक शक्ती और उद्देश को जागरित किया,
18:45जो आगे चलकर संसार के लिए महान परिवर्तन लाएगा.
18:50परशुराम ने अपनी मा और भाईयों को पुनह सहर्ष जीवन जीते हुए देखा, और इस क्षण ने उनके मन में
18:57धर्म की रक्षा के लिए आजीवन संधर्ष का प्रण और भी द्रेड कर दिया.
19:02इस प्रकार परशुराम की पित्र भक्ती ने उन्हें केवल एक पुत्र ही नहीं, बलकि एक युग पुरुष के रूप में
19:09स्थापित किया, जो धर्म के संतुलन के लिए आने वाले समय में भीशन युद्धों का सूत्रपात करेगा.
19:17अपने हृदय में धर्मस्थापना का वजर संकल्प धारण कर, परशुराम ने अन्याय के बढ़ते अंधकार को मिटाने के लिए हिमालय
19:25की दुर्गम चोटियों की ओर प्रस्थान किया, जहां वे महादेव की घोर तपस्या करने वाले थे.
19:32शीन होती देवशक्तियों को पुनह सशक्त करने के इस दिव्य संकल्प को परमपिता ब्रह्मा और भगवान विश्णु ने अपने अपने
19:40लोकों से निहारते हुए, एक दूसरे की ओर रहस्यमय मुस्कान के साथ देखा, जैसे वे आने वाले समय की गाथा
19:48को पहले से ही ज
20:17जानते हों।
20:19दिन सप्ताह और महीने एक दूसरे में विलीन होते गए, जैसे जैसे परशुराम की तपस्या कैलाश के कठोर और बरफीले
20:27मौसम के बीच और भी तीवर होती गई, उनके संकल्प की अगनी बढ़ती जा रही थी।
20:49परशुराम एक पैर पर खड़े, भुजाएं आकाश की ओर उठाए, पवित्र मंत्रों का जाप करते हुए, उनका शरीर पाले से
20:56धका था।
20:57फिर भी एक आंतरिक अगनी उनके भीतर जड रही थी।
21:01जैसे जैसे उनकी तपस्या की शक्ती बढ़ती गई, परशुराम के चारों और की धर्ती हलकी सी दरकने और चमकने लगी,
21:10जो उनकी अपार आध्यात्मिक उर्जा के प्राकृतिक व्यवस्था को भंग करने का संकेत था।
21:16कैलाश के उपर का निर्मल नीला आकाश, परशुराम की अटूट भक्ती के सीधे परिणाम स्वरूप ब्रहमांडी उर्जाओं से तरंगित होने
21:25लगा, मानो स्वर्ग स्वयं उनके तपकी प्रचंडता को महसूस कर रहा हो।
21:31स्वय भगवान शिव भी कैलाश में अपनी गहन समाधी में लीन होते हुए भी इस असाधारन हलचल और तपस्या की
21:39शुद्धता को महसूस करने लगे, उनके तीसरे नेत्र में एक सुक्ष्म चमक उत्पन हुई।
21:46परशुराम अब पंच अगनी के भीशन चक्र के बीच अचल बैठे थे, उनकी दृष्टी अनंत पर टिकी हुई थी, शरीर
21:54स्वय द्वारा उत्पन्न अगनी में तप रहा था, मानो वे ब्रहमांड को अपने संकल्प से जला रहे हुँ।
22:01अगनी की एक प्रचंड आभा ने परशुराम को भेर लिया था, जो बरफीली चोटियों पर नाटकिये छाया डाल रही थी,
22:09यह उनकी अदमय इच्छा शक्ती का एक ज्वलंत प्रमार था।
22:13उच्छतम स्वर्ग से लेकर पाताल के गहनतम स्थर तक तीनों लोग भीशन रूप से हिलने लगे, जो परशुराम की तपस्या
22:21के बढ़ते दबाव को सहन करने में असमर्थ थे।
22:26देवी पारवती उनके चहरे पर चिन्ता और प्रशंसा का मिश्रण लिए भगवान शिव के कंधे को धीरे से स्पर्श करती
22:34हैं, जैसे उन्हें हस्तक शेप करने के लिए प्रेरित कर रही हो।
22:39देवता और असुर शन भर के लिए भई से एक जुठ होकर उपर आकाश की ओर देखते हैं, परशुराम के
22:46कारण हुई ब्रहमांडी उथल पुथल को चकित होकर देख रहे थे।
22:51एक विशाल अलौकिक तूफान कैलाश के चारों और दिव्य उर्जा में घूम रहा था, जो सार्वभौमिक अशान्ती और आगामी घटना
23:00की प्रतीक्षा को दर्शाता था।
23:02तब उच्चतम शिखर से एक तेजस्वी चका चौंध कर देने वाला प्रकाश उतर आया, जो सर्वोच देवता के आसन्न प्रक्तिकरण
23:12का स्पष्ट संकेत था।
23:14अपनी आखें खोलते ही, परशुराम ने प्रकाश से निकलते हुए भगवान शिव के तेजोमय रूप को देखा, उनका हृदय भक्ती
23:22और कृतजिता से भर गया।
23:25भगवान शिव ने एक क्रिपालू मुस्कान के साथ धीरे से अपना हाथ उठाया, जो इस कठिन तपस्या के अंत का
23:33संकेत था, और ब्रहमांड ने राहत की सांस ली।
23:38ब्रहमांडिय कमपन थम गए, उनकी जगह शांती और दिव्य उपस्थिती की एक प्रबल भावनाने लेली, जैसे ही शिव ने अपने
23:46समर्पित भक्त पर परोबकारी द्रिष्टी डाली।
24:02अपनी गंभीर वानी से महादेव ने मौन को भंकिया, उनके शब्द ब्रहमांड के हर कण में गूंज उठे, जो परशुराम
24:10की तपस्या की सफलता का उद्धोश कर रहे थे।
24:14शिव के वचनों को सुनकर परशुराम की आखों से भक्ती के आसुबह निकले, उनके वर्षों की तपस्या का फल अब
24:22सामने था।
24:24दिव्य आनंद की एक लहर परशुराम के रोम रोम में समा गई, जैसे स्वयन ब्रहमांड ने उनके पवित्र संकल्प को
24:31स्विकार कर लिया हो।
24:34महादेव ने परशुराम को न्याय के पत पर चलने और अधर्म का नाश करने के लिए शक्ती और मार्कदर्शन प्रदान
24:41करने का बचन दिया, जिससे धर्म की पुनरस्थाप ना हो सके।
24:46भगवान शिव ने अपना दिव्य हाथ उठाया, जिसमें ब्रहमांडिय उर्जा का एक स्पंदन समाया हुआ था, जो एक असाधारन वर्दान
24:55को प्रकट करने वाला था।
24:57एक चमकदार प्रकाश पुन्च से शिव का प्रिय शस्त्र परशु दिव्य कुलहाडी आकाश से अवतरित हुआ, जिसकी चमक से कैलाश
25:06परवत भी जगमगा उठा।
25:09दिव्य परशु अपनी अदमे उर्जा से स्पंदित हो रहा था, उसकी चमक ने वातावर्ण को एक अद्वितिय आभा से भर
25:17दिया, जो स्वय महादेव की शक्ती का प्रतीक थी।
25:21फिर भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्तियों से सुसजित उस शक्तिशाली परशु को अपने समर्पित भक्त परशुराम को प्रदान किया।
25:31परशुराम ने पूरी श्रध्धा और सम्मान के साथ उस दिव्य शस्त्र को ग्रहन करने के लिए अपने हाथ बढ़ाए, उनकी
25:38आखों में एक नया संकल्प चमक रहा था.
25:42जैसे ही दिव्य परशु परशुराम के हाथों में आया, एक उर्जा का विस्फोट हुआ, जिसने उन्हें एक शक्तिशाली योध्धा के
25:50रूप में रुपांतरित करना शुरू कर दिया.
25:53अब परशुराम के हाथों में परशु चमक रहा था, और उनके पूरे अस्तित्व से एक अजे शक्ती की आभा निकल
26:01रही थी, जो उनके नए जन्म का संकेत थी.
26:05महादेव ने परशुराम को समस्त युद्ध कलाओं में निपुन्ता का वर्दान दिया, जिससे वे किसी भी शत्रू का सामना करने
26:13में सक्षम हो सकें.
26:15ज्यान की दिव्यधारा परशुराम के मस्तिष्क में प्रवाहित हुई, जिससे वेक्षन भर में सभी युद्धरन नीतियों और अस्त्रशस्त्रों के रहस्य
26:24जान गए.
26:25फिर शिव ने परशुराम को अजेता का वर्दान दिया, जिससे उन्हें कोई भी शत्रू पराजित न कर सकें और वे
26:33धर्म की रक्षा में सदा विजी रहें.
26:36अजेता का वर्दान परशुराम के शरीर में समा गया, जिससे उनके चारों और एक अभेद्य आभा निर्मित हो गई, जो
26:44उन्हें हर प्रहार से सुरक्षित रखती थी
26:48भगवान शिव ने घोशना की, आज से तुम परशुराम कहलाओगे और तुम्हारा लक्ष इस प्रित्वी से अधर्म का नाश करना
26:56होगा
26:57परशुराम की आखों में एक अटूट संकल्प और द्रिडता जहलक रही थी, उन्होंने अपने नए नाम और ब्रहमांडिय कर्तव्य को
27:05पूर्ण रूप से स्विकार कर लिया
27:08महादेव का तेजोमय स्वरूप धीरे धीरे प्रकाश में विलीन होने लगा, उनकी दिव्य उपस्थिती कैलाश परवत पर एक गहन शान्ती
27:17छोड़ गई
27:18अब परशुराम दिव्य परशु धारण किये, कैलाश के बरफीले शिकरों पर अकेले खड़े थे, उनका लक्षिस पष्ट था और वे
27:27अपने भाग्य को पूरा करने के लिए तयार थे
27:31कैलाश की दिव्य शान्ती को पीछे छोड़ते हुए, यह कथा अब नर्मदा नदी के तट पर बसे समरिध और वैभवशाली
27:39है है सामराज्य की ओर मुर्ती है
27:42उसी कालखंड में है है वन्ष का चक्रवर्ती समराट कार्तवीर्य अर्जुन अपने असीम बल और सामराज्यिक सत्ता के चर्मोतकर्ष पर
27:51विराजमान था
27:53अपनी शक्तियों को अद्वितिय बनाने है तू, उसने गहन जंगलों में बैठकर अत्रिपुत्र भगवान दत्तात्रे की घोर तपस्या की थी
28:03प्रसंद होकर गत्तात्रे प्रभु ने उसे 1000 बलशाली भुजाएं और तीनों लोकों में अजे रहने का अमरवर्दान प्रदान किया था
28:13वर्दान पाते ही राजा के शरीर से एक साथ एक हजार शक्तिशाली भुजाएं प्रकट हो गई
28:19जिसने पूरे ब्रहमांड को चकित कर दिया
28:23अपनी एक हजार स्वर्णमंडित भुजाओं के गर्व में चूर होकर
28:27कार्टवीर्य अर्जुन स्वयं को देवताओं से भी श्रिष्ठ मानने लगा था
28:32एक दिन अपनी अनंत शक्ती के प्रदर्शन हेतु
28:36उसने अपनी हजार भुजाओं से बहती हुई नर्मदा नदी का प्रवाही रोक दिया
28:42नदी के जल को उल्टा बहने पर मस्बूर कर देने से आसपास के तटियक शेत्र जल्मगन होने लगे और स्रिष्ठी
28:50का संतुलन डग्मगा गया
28:51इसी दोरान लंका का अभिमानी राक्षस राज रावन भी अपनी विशाल चतुरंगिनी सेना के साथ नर्मदा के रमनिये तटपरा पहुँचा
29:02जब रावन ने कार्तवीर्य अर्जुन के इस उद्धंड कृत्य का विरोध किया तो दोनों अतिशक्तिशाली योद्धाओं के बीच भीशन युद्ध
29:11छिड़ गया
29:13कार्तवीर्य अर्जुन ने अपनी सहस्र भुजाओं का उप्योग करते हुए रावन के प्रहारों को निश्फल कर दिया और उसे भूमी
29:20पर पटक दिया
29:22उसने घमंडी रावन को एक असहाय पशुकी भांती बंदी बना कर महिश्मती के अंधकार में कारागार में डाल दिया
29:31जब रावन के दादा महर्शी पुलस्त्य ने हस्तक शेप किया और क्षमा मांगी तब कहीं जाकर अर्जुन ने रावन को
29:39मुक्त किया
29:40इस महान विजय के बाद कार्तवीर्य अर्जुन का अहमकार आकाश चुने लगा और वह धर्म की मर्यादाओं को पूरी तरह
29:48भूल गया
29:50आमकार के वशी भूत होकर राजा ने अपने सामन्तों को आग्यादी की वे रिशिमुनियों के पवित्र आश्रमों को लूटेन और
29:58नश्ट करें
30:00है है सेना की बरबरता से चारों और तबाही मच गई यग्य कुंड खंडित कर दिये गए और पवित्र वेदध्वनी
30:07हिंसा के शोर में दब गई
30:10धैभीत और प्रताडित ब्राहमन अपने वेदों वधार्मिक चिन्हों को बचाते हुए घने जंगलों की शरण लेने पर विवश हो गए
30:19पीडित रिशियों और मुनियों ने एकत रहोकर कंदन किया और ब्रहमांडिय शक्तियों से इस अत्याचारी राजा के अंत्की प्रार्थना की
30:28धर्म के पतन और ब्राहमनों के इस अपमान से बेखबर राजा अर्जुन अपने विशाल दलबल के साथ शिकार के लिए
30:36वन की ओर निकल पड़ा
30:39आमकार से अंधा हुआ यह शक्तिशाली समराट अंजाने में ही महर्शी जमदगनी के शांत आश्रम की सीमा में प्रवेश करने
30:47जा रहा था जहां उसका काल प्रतीक्षा कर रहा था
30:51विशाल सैन्यबल के साथ राजा कार्तवीर्य अर्जुन का दल महर्शी जमदगनी के शांत और पवित्र आश्रम के निकट पहुँच रहा
31:00था, जहां प्रकृती स्वयन शांती का आवर्ण ओढे थी
31:04महर्शी जमदगनी अपनी कुटिया में गहरे ध्यान में लीन थे, ब्रहमांडिय उर्जा के साथ एकाकार आने वाले अपशकुन से अन्भिग्य
31:14अपनी शक्ती और अहंकार से मदमस्थ, राजा के सैनिक बिना किसी मर्यादा का पालन किये, आश्रम की पवित्र भूमी में
31:22प्रवेश करने लगे
31:24सहमी हुई हिर्णिया और छोटे वन्य जीव मानवीय हल्चल से भैभीत होकर वन की गहराई में भागने लगे एक आसन्न
31:33आपदा का संकेट देते हुए
31:35अंतह राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपने भव्यरत से उतर कर अपने सैनिकों से घिरे महर्षी जमदगनी के आश्रम के मुख्य प्रांगड
31:44में जा पहुँचा
31:46भंग हुरी शान्ती को अनुभव करते हुए महर्षी जमदगनी ने धीरे धीरे अपनी आखें खोली और सामने खडी भव्य सेना
31:55को विस्मय से देखा
31:57अपनी सहज उदार्ता और अतिथी धर्म का पालन करते हुए रिशी ने राजा और उसके दल का शान्त भाव से
32:04स्वागत किया उन्हें विश्राम और जल्पान का प्रस्ताव दिया
32:09इसी क्षण महर्शी की दिव्यगाए कामधेनु आश्रम के भीतर से प्रकट हुई जिसकी आभा से पूरा वातावर्ण प्रकाशित हो उठा
32:19कामधेनु के अलोकिक सौंदर्य और उसकी चमतकारी आभा को देखकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन की आखे लालट से चमक उठीन और
32:28उसकी पूरी सेना उसे विस्मय से निहार रही थी
32:32अपने अहंकार में चूर होकर राजा ने सीधे सीधे महर्शी से कामधेनु को अपने राज्य के लिए मांग लिया मानो
32:40वह कोई सामान्य वस्तु हो
32:43महर्शी ने शांत और ग्रिड स्वर में उत्तर दिया कि कामधेनु केबल एक गाय नहीं बलकि दिव्य शक्ती का स्रोत
32:50है और उसे किसी भी मूल्य पर नहीं दिया जा सकता
32:55रिशी के स्पष्ट इनकार से राजा का अहमकारी मन क्रोध से जल उठा उसकी आखे लाल हो गई और मुठिया
33:03कस गई
33:04अबला कामधेनों को बलपूर्वक छीनने का निश्चय करके राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उसे ततकाल अपने
33:13साथ ले जाए
33:15अधर्म को होते देख महर्शी जमदगनी ने राजा के मार्ग में खड़े होकर उसे रोकने का अंतिम प्रयास किया, अपने
33:22सिध्धानतों पर अडिग रहते हुए
33:25क्रूर सैनिकों ने निर्दई होकर कामधेनु को घेर लिया और उसकी इच्छा के विरुध उसे खीच कर अपने साथ ले
33:33जाने लगे, जिससे आश्रम की शांती भंग हो गई
33:37अपनी दिव्यगाय को बलपूर्वत ले जाते देख, महर्शी का धैर्य तूट गया, और उनकी शांत आखों में धर्म के अपमान
33:45का क्रोध भड़क उठा
33:47रिशी के विरोध से और अधिक क्रोधित होकर, कार्थवीर्य अर्जुन ने अपनी दानवी शक्ती का प्रदर्शन करते हुए, रिशी पर
33:56अपनी घातक तलवार उठाली
33:59अपनी मृत्यू निश्चित जानते हुए भी, महर्शी जमदगनी ने अंतिन क्षन तक धर्म और सत्य के पक्ष में अपनी गरिमा
34:06बनाये रखी, कोई भ़य नहीं दिखाया
34:10एक क्रूर जटके में अहंकारी कार्तवीर्य अर्जुन ने अपनी तलवार से महर्शी जमदगनी का वध कर दिया, जिससे एक महान
34:18संथ का जीवन समाप्थ हो गया
34:21इस भीशन अधर्म के कारण ब्रहमांड में एक तीवर कमपन हुआ, तारे काप उठे और आकाश में गहरा अंधकार छा
34:29गया, जो न्याय के उलंधन का प्रतीक था
34:33महर्शी जमदगनी के वध केक्षन, वन की चिर्शान्ती भंग हो गई, प्रकृती स्वयं इस अक्षमय पाप पर कराह उठी और
34:41व्रिक्षों के पत्ते भय से काप उठे
34:44दूर वैकुंठ में, भगवान विश्नु ने अपने कमल नेत्र खोले, उनके शांत मुख मंडल पर एक सुक्षम चिन्ता की लकीर
34:53उभराई, मानो उन्होंने ब्रहमांड में फैले इस महान अधर्न को अनुभव कर लिया हो
34:59इसी समय परशुराम, जो दूर एक गुफा में गहन तपस्या में लीन थे, अचानक एक असहनिय पीडा से विचलित हुए,
35:07जैसे उनके हृदय पर वजर्पात हुआ हो
35:11एक अशुब आभा ने उन्हें घेर लिया, और अंतरग्यान ने उन्हें बताया की कुछ भयानक घटित हुआ है, जिसने उनके
35:19जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया है
35:23अपनी तपस्या भंकर, परशुराम ततकाल अपने आश्रम की ओर तीवर गती से बढ़े, उनके मन में एक अज्यात भय और
35:31व्याकुलता व्याप्त थी
35:34कैलाश पर समाधी में लीन भगवान शिव ने भी अपनी आखें खोली, उनके त्रीतिय नेत्र से एक क्षण के लिए
35:41दिव्य प्रकाश चमका, ब्रहमांडिय संतुलन के भंग होने का संकेत
35:46जैसे ही परशुराम अपने आश्रम के निकट पहुँचे, उन्हें एक भयावध द्रिश्य दिखाई दिया, उनका शांत तपोवन अब युद्ध और
35:55बरबादी के निशान समेटे हुए था
35:58वायू में जलती हुई लकडियों की गंध और खून की तीवर महक घुल गई थी, जो एक भयावध कहानी सुना
36:05रही थी
36:07उनकी आखें अपने पिता के पार्थिव शरीर पर पड़ी, जो खून से लथपत धर्ती पर निश्क्रिय पड़ा था, एक वीभत्स
36:15और हृदय विदारक ग्रिश
36:17पिता के निस्तेड शरीर को देखकर परशुराम का क्रोध प्रजवलित हो उठा, और उनके भीतर प्रतिशोध की एक भीशन अगनी
36:26धधकने लगी
36:28उन्होंने कामधेनों के अफ़रन का समाचार भी सुना, जिससे उनके क्रोध की जवाला और अधिक भड़क उठी, अब उनका लक्षिस
36:36पष्ट था
36:38आकाश में गर्जना गुमजी और परशुराम ने अपने दिव्य परशु को उठाया, जिसकी चमक ने अंधेरे आकाश को चीर दिया
36:47उनकी आखों में प्रतिशोध की जवाला जल रही थी, उन्होंने धर्ती को अहंकारी और पापी क्षत्रियों से मुक्त करने की
36:55भीशन प्रतिग्या की
36:58तीनों लोकों ने उस प्रतिग्या की गुम्ष सुनी, एक ऐसा संकल्प जिसने ब्रहमांड के संतुलन को हिला दिया और आने
37:05वाले भीशन युद्ध की घोशना कर दी
37:09परशुराम ने तुरंट अपनी दिव्यपर्शू और धनुष धारण किये एक विक्राल योध्धा के रूप में परिवर्तित होकर न्याय के लिए
37:17तैयार
37:18उन्होंने कार्टवीर्य अर्जुन की राजधानी की ओर प्रस्थान किया, उनके हर कदम से धर्ती काप रही थी, जैसे स्वयन महाकाल
37:27ने अपना तांडव आरंब किया हो
37:31राजधानी के द्वार पर पहुँचकर परशुराम ने कार्टवीर्य अर्जुन को भीशन युध के लिए ललकारा, उनकी गर्जना से किले की
37:39दिवारे भी काप उठी
37:41राजमहल से कार्टवीर्य अर्जुन ने अपनी अटहास भरी हसी के साथ परशुराम के आहवान का उत्तर दिया, अपनी अहंकारी शक्ती
37:50का प्रदर्शन करते हुए
37:53दोनों महान योध्धा एक दूसरे के सम्मुख खड़े थे, उनकी आखों में प्रतिशोध और अहंकार की आग धधक रही थी,
38:01जो आने वाले विनाश का संकेत थी
38:04और फिर एक भीशन संधर्श शुरू हुआ, जिसके परिणाम से तीनों लोग हिल उठे और ब्रहमांड ने नियाय और प्रतिशोध
38:13की इस गाथा को अपने गर्भ में समेट लिया