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पद्म पुराण के अध्याय 10 में देखिए भगवान परशुराम का 21 बार पृथ्वी का संहार, स्यमंतपंचक के रक्त सरोवर का रहस्य, और महर्षि कश्यप को पृथ्वी दान करने की गाथा! जानिए कैसे परशुराम ने समुद्र को पीछे धकेल कर नई भूमि का निर्माण किया और महेंद्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए। इसके बाद अयोध्या में राजा दशरथ के शासनकाल और रावण के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु द्वारा श्रीराम के रूप में अवतार लेने की प्रतिज्ञा की अद्भुत कथा! Subscribe for more epic divine lore from Padma Purana!
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00:00जम्दगनी के वध और कामधेनों के अपमान के प्रतिशोध में भगवान परशुराम ने अपनी दिव्यकुलहाडी से क्षत्रिय अधर्मियों का सहार
00:08करने की शपत ली, जिससे प्रिथवी पर एक भयानक और अविस्मनिय युद्ध का सूत्रपात हुआ.
00:16परशुराम के विक्राल क्रोध ने देवताओं को भी चिंतित कर दिया, जिन्होंने स्वर्ग से प्रिथवी पर मची इस विनाशलीला को
00:24हत प्रभ हो कर देखा.
00:26परशुराम अपने कंधे पर दिव्य परशु रखे, क्रोध से लाल आखों और गरच्ती हुई गर्जना के साथ एक ध्वस्त किले
00:34के द्वार से अकेले ही आगे बढ़ रहे हैं.
00:38प्रत्येक वार के साथ परशुराम का परशु अधर्मियों के रक्ट से प्रिथवी को लाल कर रहा था, मानो प्रिथवी अपनी
00:46पीड़ा से कराह रही हो.
00:4821 बार परशुराम ने प्रिथवी को क्षत्रे राजाओं के अत्याचारों से मुक्त करने के लिए घूम भूम कर भयंकर युद्ध
00:56किये, जिससे हर सामराज्य ध्वस्त हो गया.
01:00ब्रहमा अपने दिव्य लोक से परशुराम के अविश्वस्निय पराक्रम और उनके अटल संकल्प को गहन चिन्ता के साथ देख रहे
01:08थे.
01:10परशुराम का परशु बिना किसी भेदभाव के उन सभी राजाओं पर कहर बनकर तूट रहा था जिन्होंने अपने राज्य में
01:17अधर्म फैलाया था.
01:20धूल और रक्ट से सनी युद्ध भूमी पर योध्धाओं के गिरे हुए मुकुट और तूटे हुए अस्त्र अधर्म के पतन
01:27की कहानी कह रहे थे.
01:30परशुराम के क्रोध की ज्वाला में अनेको राज्य भस्म हो गए और शक्तिशाली सेनाए धूल में मिल गई, उनकी विजय
01:37का निशान सर्वत्र अंकित था.
01:41रिशिमुने परशुराम के इस भयानक युद्ध को शांत करने के लिए अपने आश्रमों में बैठकर देवताओं से लगातार प्रार्थना कर
01:49रहे थे.
01:50एक क्रूर क्षत्रिय राजा, जो अपने हाथी पर सवार होकर युद्ध के मैदान से भागने का प्रयास कर रहा था,
01:58परशुराम के एक ही प्रहार से भूमी पर धराशाई हो गया.
02:02रक्त की नदिया बह रही थी और हवा में मृत्यु का आर्थनाद गूंज रहा था, जो युगों तक इस विनाश
02:10की गवाही देता.
02:12परशुराम का प्रतिशोध एक अटल सत्य बन चुका था, जिसने संपून प्रित्वी को अधर्मी राजाओं के अहंकार से मुक्त करने
02:20का द्रिड संकल्प लिया था.
02:23देवर्शी नारद अपने वीना पर शांत स्वर बजाते हुए, परशुराम के इस विक्राल कार्य की सूचना सभी लोकों में प्रसारित
02:31कर रहे थे.
02:33परशुराम ने एक विशाल सामराज्य के अंतिम सेनाप्तियों को घेरा, जिनके चहरे पर भय और हार की निराशा स्पष्ट थी.
02:42ध्वस्ट सामराज्यों की राख और धुए के बीच परशुराम का दिव्य परशु चमक रहा था, अधर्म के अंत का प्रती.
02:50अंतह 21 चक्रों के बाद, जब प्रित्वी अधर्मीक शत्रिय शास्कों से मुक्ठ हो गई, तब परशुराम ने अपने अस्त्रों को
02:59त्यागने का निर्णय लिया.
03:01भगवान विश्णु अपने शेशनाग शया पर विराजे परशुराम के इस कठिन कार्य को पूर्ण होते देख संतुष्ट भाव से मुस्कुरा
03:09रहे थे.
03:11परशुराम ने पवित्र समंत पंचक शेतर में अपने दिव्य परशु को जल में विसर्जित कर अपनी प्रतिग्या पूर्ण होने का
03:19प्रतीक स्थापित किया.
03:21परशुराम के इस भीशन कार्य ने प्रित्वी को अधर्म से मुक्त कर, भविश में धर्म की स्थापना और श्री राम
03:28अवतार के मार्क को प्रशस्त कर दिया
03:32जैसे ही समन्त पंचक के पांच महासरोवर अधर्मी राजाओं के रक्त से भर गए, कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमी पर
03:39एक अभूत पूर्वलाल प्रभा फैल गई
03:43स्वर्गलोक में सिनहासन पर विराजमान देवराज, इंद्र और समस्थ देवता इस प्रल्यंकारी द्रिशे को देखकर भय और आश्चर्य से सिहर
03:52उठे
03:53भगवान परशुराम ने अपने हाथ जोड कर पूर्वजों का ध्यान किया, जिससे आकाश में पित्रिगन दिव्य जोती के रूप में
04:01प्रकट होकर आशिरवाद देने लगे
04:05रक्त से भरे उन कुंडों से उठती हुई लाल तरंगे संपूर्ण ब्रहमांड के क्षितिच को स्पंदित कर रही थी
04:13धीरे धीरे ब्रहम लोग से दिव्य मंत्रो चार की ध्वनी गूंज उठी और आकाश से समंत पंचक तीर्थ पर दिव्य
04:20पुश्पों की वर्षा होने लगी
04:23ब्रहम देव अपने कमलासन पर विराजित होकर नारद मुनी से इस धर्म स्थापना के दूरगामी परिनामों पर चर्चा करने लगे
04:32परशुराम के पित्री रिचीक और जमदगनी के दिव्य आत्माओं ने प्रकट होकर अपने तेजस्वी पुत्र की प्रतिग्यापूर्ती पर संतोष व्यक्त
04:41किया
04:42वह भयंकर परशु जिसने 21 बार अधर्मी राजाओं का सहार किया था अब शान्थ होकर दिव्य जोती में परिवर्तित होने
04:50लगा
04:52समंत पंचक के वे पांच सरोवर रिशियों और पित्रों के तरपन के प्रभाव से धीरे धीरे पवित्रतीर्थ जल में बदलने
05:00लगे
05:01कैलाश परवत्पर भगवान शिव और माता पारवती ने परशुराम की इस प्रचंड तपस्या और धर्मरक्षन की सराहना की
05:10परशुराम ने उन पवित्र कुंडों के जल से अपने हाथों में कुशा घास लेकर पित्रों के लिए मंत्र मुग्ध कर
05:17देने वाला तरपन आरंभ किया
05:20आकाश मार्ग में सूर्य देव की स्वर्णिन किरने सरोवर के जल को पावन और निर्मल बना कर एक अलोकिक कांती
05:27प्रदान करने लगी
05:30संपून प्रित्वी मंदल पर वर्षों से चाया हुआ भय और अत्याचार का अंधकार समाप्थ होकर एक नए युग की भोर
05:38का आगमन हुआ
05:40वैकुंठ में शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु ने गरूर से कहा कि अब त्रेतायुग में श्रीराम रूप में अवत्रित होने
05:48का समय समीप आ रहा है
05:51परशुराम ने समन्त पंचप की उस पवित्र भूमी को महर्शी कश्यप को दान स्वरूप सौंप कर स्वय महेंद्र परवत की
05:58ओर प्रस्थान करने का संकर्प लिया
06:02कुरुक्षेत्र की भूमी पर बने वे पांच कुंड युगों-युगों के लिए पापों का नाश करने वाले महातीर्थ के रूप
06:08में अमर हो गए
06:10महेंद्र परवत की उत्तुंग और शान्त शिकरों पर चारों और दिव्य प्राकृतिक सुन्दर्ता और असीम शान्ती चागई
06:18गंधर्वों और अपसराओं ने आकाश में मधुर वीना वादन और नित्य प्रस्तुत कर ब्रहमांड में शान्ती का उद्गोश किया
06:27परशुराम ने महेंद्र परवत की एक एकांत गुफा में बैठ कर अपनी अस्त्रशस्त्र की शक्ती को समेटते हुए घोर समाधी
06:35धारण कर ली
06:37समंत पंचक के जल से उठती दिव्यज्योती ने भविश में अयोध्या में जन्म लेने वाले प्रभु श्री राम के अवतार
06:44पत को आलोकित कर दिया
06:46अपने पिता की स्मृती में तरपन अर्पित करने के लिए भगवान परशुराम समंत पंचक शेत्र के पवित्र जलाश्यों के तटपर
06:55उपस्थित हुए
06:57परशुराम ने भक्तिभाव से भर कर अपने हाथ जोडे और पित्रों की आत्मा की त्रिप्ती के लिए वैदिक मंत्रों का
07:04सस्वर उच्चारण आरंभ किया
07:07जैसे ही अंजली से जलधारा प्रित्वी पर गिरी वैसे ही संपूर्ण आकाश दिव्य प्रकाश और अलौकिक सुगंध से आच्छादित हो
07:16उठा
07:17आकाश मंडल में एक सुवर्ण में जोतिर्मय द्वार प्रकट हुआ जिससे समस्त ब्रहमांड में शांत वेद मंत्रों की ध्वनी गूंजने
07:25लगी
07:26उस परम जोती के मध्य से ब्रहमर्शी जमदगनी और पूर्वजों के दिव्य पित्रिगन आकाश में भव्य स्वरूप में प्रकट हुए
07:35अपने पूज़ पिता जमदगनी को आकाश में मुस्कुराते देख भगवान परशुराम का हृदय वातसल्य और अपार भक्ती से भर गया
07:45महर्शी जमदगनी ने अपने अभय वरध हस्त को उठा कर अपने प्रिय पूत्र परशुराम के प्रती अगाध्स ने प्रकट किया
07:54पित्रिगनों की गूंजती हुरी दिव्यवानी ने गगन को अलौकिक स्पंदन और परमशांती के आनन्द से भर दिया
08:02पित्रों ने परशुराम की अटूट पित्र भक्ती और धर्म की पुनह स्थापना के महान कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा की
08:10महर्शी जमदगनी ने कहा, हे पुत्र, तुमने धर्म स्थापना का कार्य पूर्ण कर दिया है, अब इस युद्ध और सहार
08:18को यहीं विराम दो
08:21परशुराम ने अपने पिता की आग्या शिरोधार्य करते हुए अपने अस्त्र को सदा के लिए विश्राम देने का द्रिड संकल्प
08:28लिया
08:30प्रतिशोध की अगनी पूर्णत है शांत हो गई और उसके स्थान पर क्षमा तथा तपस्या का पावन प्रकाश प्रज्वलित हो
08:37उठा
08:39पित्रों ने परशुराम को अजर्मर चिन्रजीवी होने का वर्दान दिया और उन पर सुर्भित दिव्य पुष्पों की वर्षा की
08:47आशिर्वाद देने के पश्चात महर्शी जमदगनी और अन्य पित्रिगन मंदमंद मुस्कुराते हुए अपने लोग को प्रस्थान कर गए
08:57परशुराम ने समंत पंचक के जल का अभिमंतरन कर उसे जगत के कल्यान के लिए परम पवित्र तीर्थ में परिवर्थित
09:04कर दिया
09:05इस प्रकार समंत पंचक का यह पावन छेत्र ब्रहमांड का महांतम मुक्ती तीर्थ बनकर सदा के लिए अमर हो गया
09:14परशुराम ने जीती हुई समस्थ पृत्वी को महर्शी कश्यप और निश्पाप रिशियों को दान कर संपूर्ण स्वामित्व त्याग दिया
09:23समस्थ भौतिक मोह और क्रोज से मुक्थ होकर भगवान परशुराम ने शांत चित्त से महेंद्र परवत की ओर कदम बढ़ाए
09:32महेंद्र परवत के उच्चतम शिखर पर बैठकर परशुराम घोर समाधी और अखंड तपस्या में लीन हो गए
09:40इस प्रकार भगवान परशुराम की यह लीला पूर्ण हुई जिसने त्रेतायुग में प्रभु श्री राम के भावी अवतार का मार्ग
09:47प्रशस्त किया
09:49महेंद्र परवत पर गेहन तपस्या पूर्ण कर भगवान परशुराम ने अपनी दिव्य उर्जा को प्रिथवी के हरकण में प्रवाहित होते
09:57हुए अनुभव किया
09:59तभी एक स्वर्णन प्रकाश पुझ में उनके पूर्वज महर्शी जमदगनी और भेगुदेव प्रकट हुए जिन्होंने उन्हें प्रिथवी शुद्धी के महायग्य
10:09का आदेश दिया
10:11अपने पूर्वजों के निर्देश पर परशुराम ने अपने अस्त्र परशु को त्याग कर एक शांत रिशी का रूप धारण किया
10:19और परवत से नीचे उतरना आरंभ किया
10:22उनके प्रत्येक कदम के साथ धर्ती के घाव भरने लगे और जहां रक्त बहा था वहां नवजीवन का संचार होने
10:30लगा मानो प्रिथवी स्वयन शुद्ध हो रही हो
10:34अंतहत परशुराम एक विशाल पवित्र मैदानी क्षेत्र पर पहुँचे जिसे उन्होंने महायग्य के लिए चुना था जहां पवित्र नदिया शांती
10:44से बहती थी
10:46आकाश में देवगण और नारद मुनी अद्रिश्य रूप से प्रकट होकर इस पवित्र कार्य के आरंभ का उच्सुकता से अवलोकन
10:53करने लगे
10:55परशुराम ने स्वयही अत्यंत श्रद्धा और निपुन्ता से विशाल यग्य वेदी के निर्मान का कार्य आरंभ किया जिसकी रूपरेखा दिव्य
11:04ज्यान से प्रेरित थी
11:07जैसे जैसे वेदी का निर्मान पूर्ण होता गया उस पवित्र स्थल से एक कोमल स्वर्णिम आभा फूटने लगी जो आसपास
11:15के वातावर्ण को शुद्ध कर रही थी
11:18दूर दूर से आये असंख्य रिशी मुनी और ज्यानी ब्राहमन यग्य स्थल पर एकत्रित हुए जिनकी उपस्थिती से पूरा वातावर्ण
11:27दिव्य उर्जा से भर गया
11:30परम्पिता ब्रहमा अपने चार दिव्य मुखों से आकाश में प्रकट होकर इस महायग्य को अपनी स्विकृती और दिव्य आशिर्वात प्रदान
11:39करने लगे
11:41परशुराम अब पूर्णत है एक विनमर रिशी के रूप में यग्य वेदी के सम्मुख खड़े हुए उनके चहरे पर गहन
11:48शान्ती और संकल्प का भाव था
11:51विध्यविधान से पवित्र अगनी प्रजवलित की गई जिसकी लप्टें आकाश की ओर उठकर प्रार्थनाओं को देवलोग तक पहुचाने लगी
12:00पवित्र मंत्रों के उच्चारण के साथ एक शुद्ध श्वेत अश्वक दिव्य अलंकर्णों से सुसजित स्वतंत्रता पूर्वक प्रिथवी पर विचर्ण करने
12:09के लिए विमोचित किया गया
12:12शीरसागर में विराजमान भगवान विश्णु अपने शांत नीले स्वरूप में इस पुन्यकार्य को अपनी दिव्य सहमती प्रदान करते हुए मुस्कुराएं
12:22रिशियों द्वारा उच्चारित शक्तिशाली वैदिक मंत्र वातावर्ण में गूंचते हुए पृत्वी के हर कोने को पवित्र कर रहे थे और
12:31कॉजमिक एनरजी को जागरित कर रहे थे
12:34आकाश से स्वर्णिन प्रकाश की किर्ने प्रित्वी पर अवतरित होने लगी जो विगत के सभी पापों और अशुद्धियों को धोकर
12:42कॉजमिक एनरजी को संतुलित कर रही थी
12:46यह महायग्य अनेक दिनों और रातों तक निर्बाध रूप से चलता रहा जहां पवित्र अग्नी अखंड रूप से जलती रही
12:54जिसकी देखभाल ब्रहम वित्ता ब्राहमन करते रहे
12:58इस शुब अवसर पर देवराज, इंद्र और अन्य देवगण आकाश में क्षण भर के लिए प्रकट हुए और यज्यस्थल पर
13:06पुश्प वर्शाकर आशिरवाद प्रदान किये
13:09अत्यंत विनमर्ता और गेहन पश्चाताप के साथ परशुराम ने पवित्र अग्नी में आहुतिया अर्पित की अपनी पिछली लीला के लिए
13:18क्षमा मांगते हुए और विश्व शान्ती की कामना करते हुए
13:22अंत्य यग्य की पूर्णा हुति पर एक शक्तिशाली स्वर्णिम आभा ने संपूर्ण यग्यस्थल को अपने आबर्ण में ले लिया जो
13:31पृत्वी की शुद्धी और आगामी राम अवतार के मार्ग का प्रतीक थी
13:36स्वर्णिम आभा के शान्थ होते ही भव्य यग्य मंडप में रिशियों के मध्य प्रतिष्थित महर्शी कश्यप की परम तेजस्वी और
13:44गंभीर उपस्थिती प्रकट हुई
13:47भगवान परशुराम हाथ में पवित्र गंगाजल से भरा स्वर्णिम कलश लेकर अत्यंत भक्ती और नमर्ता के साथ महर्शी कश्यप के
13:55समक्ष उपस्थित हुए
13:58परशुराम ने वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ महर्शी कश्यप की हतेलियों में पवित्र जल्धारा प्रवाहित करते हुए संपूर्ण पृत्वी
14:06के दान का महासंकल्प पूर्ण किया
14:10इस अभूत्पूर्वदान के क्षण में स्वय भूदेवी एक दिव्य तेजोमय रूप में प्रकट होकर इस पवित्र अधिकार हस्तांतरण को अपना
14:18मंगल आशिर्वाद प्रदान करने लगी
14:22महर्शी कश्यप ने अनंत करुणा और गंभीरता के साथ इस विशाल पृत्वी का भार स्वीकार किया जिससे उनके चहरे पर
14:30दिव्य उत्तरदायत्व का प्रकाश चमक उठा
14:34महर्शी कश्यप ने गदगद कंट से परशुराम की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनका यह त्याग और धर्मस्थापना का कारिय
14:42युगो-युगो तक अमर रहेगा
14:44पूर्ण विरक्ती का परिचय देते हुए परशुराम ने अपने सर्वशक्तिशाली फरसे और शस्त्रों को महर्शी कश्यप के चर्णों में समर्पित
14:53कर दिया
14:54भूमी पर रखे दिव्य परशु से एक अलौकिक प्रकाश पुंच प्रस्फुटित हुआ जिसने यह संकेत दिया कि क्रोध और प्रतिशोध
15:03के युग का अब अन्थ हो चुका है
15:06व्यवस्था बनाए रखने हे तू महर्शी कश्यप ने परशुराम से आग्रह किया कि एक दानी को अपनी दान की हुई
15:13भूमी पर निवास नहीं करना चाहिए इसलिए वे दक्षिन समुद्र तटकी ओर प्रस्थान करें
15:20महर्शी कश्यप की आग्या को शिरोधार्य करते हुए परशुराम ने सहर्ष स्विकार किया कि उनका कार्य अब पूर्ण हो चुका
15:28है और सन्यासी के लिए पूर्ण त्याधी परमधर्म है
15:34परशुराम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर एक बान समुद्र की ओर चलाया जिससे जलनिधी को पीछे हटने का आदेश
15:42प्राप्थ हुआ
15:44परशुराम के तपोबल के समक्ष नत्मस्तक होकर उफंते समुद्र ने अपनी लहरेंग पीछे समेट ली और ध्यान हेतु महेंद्रगिरी परवत
15:53का नया तटियक शेत्र निर्मित हो गया
15:56प्रित्वी का शासन संभालते ही महर्शी कश्यप ने महान रिशियों और धर्मनिष्ठ राजाओं की सभा बुलाकर मानव समाज के पुरुद्धार
16:05और धर्म की मर्यादा तै की
16:08सभा में उपस्थित, सभी रिशियों और प्रजाजनों ने महर्शी कश्यप के प्रतीश रधा जुका कर वैदिक नियमों के पालन का
16:15द्रिड संकल्प लिया
16:18महर्शी कश्यप के आशिरवचन से समस्थ प्रित्वी पर न्याय का शासन स्थापित हुआ और अन्याय से जुलसी भूमी पुना हरीभी
16:26हो उठी
16:27प्रकृती के पाचों तत्व संतुलित हो गए जिससे समस्थ नदियों में निर्मल जल प्रवाहित होने लगा और संपून ब्रहमांड में
16:35शांती का प्रसार हुआ
16:38अपने अवतार कार्य को विश्राम दे कर परशुराम मंद गती से महेंद्रगिरी परवत की धुन्धली और शांत चोटियों की और
16:46घोर तपस्या हेतु प्रस्थान करने लगे
16:50शीरसागर से सर्वव्यापी भगवान विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ अपने इस उग्र अवतार के सफल समर्पन और निश्काम कर्म
16:58को स्विकार किया
17:00समुद्र तटके उच्च शिखर पर पदमासन में विराज मान होकर भगवान परशुराम अनंत शांती और आत्मानंद के ध्यान में लीन
17:09हो गए
17:10पूर्व दिशा में उदित होते नए सूर्य की स्वर्णन किरने संपूर्ण प्रित्वी को आलोकित कर रही थी जो भावी श्रीराम
17:18अवतार और रामराज्य के शुभागमन का शंखनाद कर रही थी
17:23उन्हीं क्षणों में एक दिव्य जोती ने क्षितिज से प्रकट होकर गुरुत्वा कर्शन की परवाह किये बिना उस पावन तटकी
17:31ओर प्रस्थान किया जहां परशुराम गहन ध्यान में लीन थे जो किसी महान कार्य के आहवान का संकेत था
17:38यह परम पूज रिशी कशप थे जिन्होंने प्रित्वी पर धर्म और व्यवस्था के आगामी पुनरगठन की अग्रिश्य योजना को साकार
17:47करने के लिए परशुराम के समक्ष उपस्थित होने का निर्ने लिया
17:52कशप मुनी ने शांत चर्णों से परशुराम की ओर बढ़ना आरंभ किया जिनके ध्यान की गहनता से स्वयं प्रकृती भी
18:00मौन साथ चुकी थी मानो किसी दिव्यवार्तालाप की प्रतीक्षा में हो
18:06परशुराम की पदमासन में स्थिर मुद्रा एक शांत ज्वाला मुखी के समान थी जिसके भीतर असीम शक्ती का सागर उफान
18:14पर था जो उनके युगों के तपका प्रमान थी
18:18जैसे ही रिशी कश्यप परशुराम के समक्ष पहुँचे उन्होंने श्रधा से मस्तक जुकाया और मौन भंग करते हुए एक अत्यंत
18:26महत्वपूर्ण निवेदन प्रस्तुत करने के लिए उचित क्षण की प्रतीक्षा की
18:32मौनी कश्यप ने अपने करबध हाथों से परशुराम का ध्यान भंग करने का साहस किया और अत्यंत विनमरता से भूदान
18:40के नियमों का समरण कराते हुए निवेदन किया कि उन्हें इस प्रित्वी को छोर देना चाहिए जिसे उन्होंने दान में
18:47दिया था
18:49परशुराम ने अपने ध्यान से बाहर आकर कश्यप मुनी के धर्मसंगत शब्दों को स्विकार किया उनकी दिव्यद्रिष्टी ने इस नए
18:57आदेश के पीछे की ब्रहमांडिय योजना को तुरंत भांप लिया
19:02परशुराम ने अपने दिव्यपर्शु पर हात फेरा एक क्षण के लिए उस अस्त्र की असीम शक्ती और उसके त्याग की
19:10भावना उनके चहरे पर जलक उठी जो एक नए युग के आगमन का संकेत था
19:17ततपश्चात भगवान परशुराम ने अपने ध्यान के आसन से उठकर कशप मुनी को सादर प्रणाम किया और अपनी विशालकाया को
19:25पश्चिन दिशा की ओर मोडा जहां अनंत सागर फैला हुआ था
19:30कशप मुनी ने परशुराम के इस अभूत पूर्व निर्नय को देखा उनके चहरे पर संतोश और भविश्य के लिए आशा
19:38की एक शांत आभा थी क्योंकि उन्हें पता था कि यह ब्रहमांडिये व्यवस्था का एक आवश्यक चरण था
19:46महान धनुर्धर परशुराम ने अपने कंधे से दिव्य धनुष उतारा, उसकी प्रत्यंचा को खींचा और एक अत्यंत तेजस्वी बान का
19:54चुनाव किया, जो ब्रहमांड की शक्तियों से उत्प्रोथ था
19:59उनके संकल्प की अगनी ने बान को और भी दीप्तमान कर दिया, जिसकी नोप पर एक ब्रहमांडिये उर्जा एकत्र हो
20:07रही थी, जो अनन्त जलराशी को भी विचलित करने में सक्षम थी
20:12परशुराम ने पश्चन दिशा में स्थित अथाह समुद्र की ओर अपने लक्षे को साधा, जहां नीले जल का विस्तार अनन्त
20:20शितिच तक फैला हुआ था, उनकी द्रिष्टी में अटूट विश्वास और एक आगरता थी
20:26वैकुंठ लोक से सर्वव्यापी भगवान विश्णु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ इस दिव्य लीला का अवलोकन किया, जानते हुए
20:35कि यह उनकी ही महान योजना का एक महत्वपूर्ण अध्याय था
20:40एक गगनभेदी गर्जना के साथ परशुराम ने बान को प्रत्यंचा से छोड़ा, जिसने बिजली की गती से अंधकार में समुद्र
20:48की ओर प्रस्थान किया, मानो स्वयंकाल का दूठ हो
20:53बान जैसे ही समुद्र के हरिदय में प्रविष्थ हुआ, एक तीवर भूकंप आया और जल कांप उठा, जिसके कारण विशाल
21:01लहरें आकाश की ओर उठने लगी और जल के देवता वरुन को भयभीत होकर प्रकट होना पड़ा
21:08जल के देवता वरुन अपनी नीलिहरी काया के साथ समुद्र से भयभीत होकर बाहर आये, उनका चहरा चिन्ता और आश्चर्य
21:16से भरा था, क्योंकि उन्होंने इस अप्रत्याशित दिव्य हस्तक शेप का अनुभव किया
21:23वरुन ने हाथ जोड कर परशुराम से विंती की, उनकी आखों में भय और समर्पन का भाव था, और उन्होंने
21:30बिना किसी विलंब के उस स्थान से पीछे हटने का वचन दिया, जहां बान गिरा था
21:36समुद्र ने आदेश का पालन करते हुए तीवर गती से पीछे हटना आरंभ कर दिया, जिससे एक विशाल भूभाग धीरे
21:44-धीरे जल के भीतर से प्रकट होने लगा, जो प्रकृती के चमतकारी परिवर्तन का साक्षी था
21:50इस प्रकार बान द्वारा निर्धारित सीमा तक समुद्र पीछे हट गया और अपरांत नामक एक नया, शांत और उपजाव तटियक
22:00शेत्र अस्तित्व में आया, जो अपनी शुद्धता से जगमगा उठा
22:05ततपश्चात, परशुराम ने शांत और उर्वर अपरांत भूमी पर अंतिन द्रिश्टी डाली, अपने युक्के कार्य की पूर्णता को एक संतुष्ट
22:14मौन में स्वीकार करते हुए
22:17दूर वैकुंट से भगवान विश्णु ने अपने शेशनाग शया पर विराज मान होकर परशुराम के त्याग और उनके अवतार के
22:25पूर्ण उद्देश को एक दिव्य मुस्कान के साथ निहारा
22:29फिर अपने कंधों पर दिव्य परशु को रखते हुए वह ब्रह्मांडिय कर्तव्य और आध्यात्मिक आकांक्षा के एक पवित्र आहवान से
22:38प्रेरित होकर महेंद्र परवत की ओर मुड़ गए
22:42जैसे जैसे वह आगे बढ़ते गए नवनिर्मित अपरांथ शेत्र में एक अलोकिक शांती और सम्रिध्धी की आभा फैल गई जैसे
22:51प्रकृती ने उनके त्याग का सम्मान किया हो
22:55परशुराम ने धीरे धीरे परवत की धलानों पर चड़ना शुरू किया हर कदम प्रकृती के साथ एक आत्मता की ओर
23:02बढ़ते हुए सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़ते हुए
23:07ब्रह्मा स्रिष्टी के देवता ने अपने चार मुखों से परशुराम की इस गहन तपस्या की घोशना करते हुए स्वर्डिक मंडलों
23:15में उनकी महिमा का गुनगान किया
23:18उचाई पर पहुँचकर उन्होंने एक प्राचीन गुफा के मुख को खोजा जो सदियों से संतों की तपस्या का साक्षी रहा
23:26था और वहीं अपने स्थाई निवास का निश्चय किया
23:30परवत की हवा में एक अजीब सी पवित्रता घुल गई जैसे उसकी आत्मा ने युगों के तप के लिए एक
23:37नए संरक्षक का स्वागत किया हो
23:40गुफा के भीतर परशुराम ने अपनी योग मुद्रा स्थापित की जहां केवल परवत की शाश्वत शांती ही उनके ध्यान को
23:49भंग कर सकती थी
23:51देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर तारों को छेड़ते हुए अपने गायन में परशुराम के अग्वितिय तप और उनके परोपकारी
23:59कारियों का बखान कर रहे थे
24:02उन्होंने अपनी इंद्रियों को भीतर की ओर मोड लिया बाहरी दुनिया के सभी शोर और भ्रम से स्वयं को विच्छेदित
24:09करते हुए पूर्ण एकागरता में प्रवेश किया
24:13उनकी दिव्य आभा ने गुफा की दीवारों पर एक सुनहरी चमक बिखेर दी जो उनकी गहन तपस्या की शक्ती और
24:21पवित्रता का प्रतीक थी
24:24वर्षों और युगों का प्रवाह धीमा पड़ गया क्योंकि परशुराम की तपस्या ने समय की अवधार्ना को ही अतिक्रमित कर
24:31दिया
24:33सब्तर्शी अपनी दिव्यद्रिष्टी से प्रित्वी पर हो रही इस असाधारन तपस्या को देख रहे थे और उसके गहन महत्व को
24:41समझ रहे थे
24:43परशुराम का मुखमंडल अब गेहन तपस्या से और भी अधिक शांत और तेजमय हो गया था जो उनकी आंतरिक दिव्यता
24:51को प्रतिबिन्बित करता था
24:54उनकी तपस्या की उर्जा ने महेंद्र परवत को एक जीवन्त आध्यात्मिक केंद्र में बदल दिया जहां प्रकृती की हर वस्तु
25:02उनके ध्यान से जुड़ी हुई महसूस होती थी
25:06सहसरों वर्षों के इस अनन्त तप ने उन्हें भविश्य की लीलाओं के लिए तयार किया जब धर्म की रक्षा के
25:12लिए उनका पुरुथान होगा
25:15शीर सागर में विराजमान भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए परशुराम के इस महान बलिदान और तपस्या को अपनी लीला का
25:24एक महत्वपूर्ण अध्याय माना
25:27गुफा के भीतर परशुराम स्थिर और अडिक थे उनकी चेतना ब्रहमांड के साथ एक आकार हो गई थी एक अनंत
25:35शांती में ली
25:37इस प्रकार महेंद्र परवत पर उनकी शाश्वत तपस्या श्रीराम अवतार की भावी घटनाओं के लिए एक मुख प्रस्तावना बन गई
25:45जो दिव्य चक्र को गतिमान कर रही थी
25:49परशुराम की तपस्या के साथ ही अनंत काल्चकर ने एक नया मोड लिया जहां युगों का अंत और नवीनता का
25:57प्रादुर्भाव दिव्य योजना के अनुसार प्रित्वी पर व्याप्थ होने लगा
26:02शीरसागर के अनंत विस्तार में भगवान विशनु ने अपने शेशनाग शया पर दिव्य मुस्कान के साथ ब्रहमांडी लीला के इस
26:10अगले चरण को स्वीकृती दी
26:13काल के इस प्रवाह में प्रित्वी ने धर्म प्रायन राजाओं के अधीन अभूतपूर्व समरिध्धी और शांती का अनुभव किया जहां
26:22हर और खुशाली और न्याय का सामराज्य था
26:26सूर्य अस्थ होता रहा और नए दिन उगते रहे मानो प्रकृती स्वयन एक स्वर्णिन युग की कहानी लिख रही हो
26:34इसी क्रम में इक्षवाकू वंश के राजाओं द्वारा शासित अयोध्या नगरी अपनी भव्यता और धर्म प्रायनता के प्रतीक के रूप
26:42में ब्रहमांड में दैदी प्यमान हुई
26:46अयोध्या के सिनहासन पर महाराजा दशरत एक प्रतापी और न्यायप्रिय शासक के रूप में विराजमान थे जिनके धर्म प्रायन शासन
26:55में प्रजा सुखी और सुरक्षित थी
26:58उनकी प्रजा, मर्यादा और नीती के पत पर चलते हुए, कला, विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में निरंतर उन्नती
27:06कर रही थी
27:08अयोध्या की यह शान्ती और समरिध्धी एक आदर्ष राज्य का प्रतीक थी, जो दिव्य आशिर्वाद से परिपूर्ण था
27:17किन्तु सुदूर दक्षिनी द्वीप लंका से अंधकार की एक छाया धीरे धीरे तीनों लोकों पर मंडराने लगी थी
27:26वह छाया कोई और नहीं, बलकी अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी राक्षस राज रावन था, जिसने अपनी तपस्या से अजे शक्तियां
27:35प्राप्त कर ली थी
27:37अपनी नवर्जित शक्तियों से मदांध, रावन ने सबसे पहले देवों, रिशियों और यक्षों को अपनी अधिनता स्विकार करने के लिए
27:46विवश किया
27:47जैसे जैसे लंका का अंधकार फैलता गया, आकाश पर भी उसकी काली छाया पड़ने लगी, जो आने वाले भयंकर तूफानों
27:56का संकेत थी
27:58रावन के आतंक का सामराज तीनों लोकों में फैल गया, जहां देवलोक, मर्त्य लोक और पातालोक सभी उसकी क्रूरता के
28:06साक्षी बने
28:08स्वर्ग में बैठे देवतागन, रावन के बढ़ते अत्याचारों को देखकर चिंतित और भयभीट थे, उन्हें अपने सिनहासन और अस्तित्व का
28:17भय सता रहा था
28:20रावन का अहंकार इतना बढ़ गया था कि उसने किसी भी देवता या रिशी की मर्यादा का सम्मान नहीं किया,
28:27अपनी शक्ती के मद में चूर वह सबको तुछ समझता था
28:31पूरा ब्रहमान उसके आतंक से काम प्रहा था और प्रिथवी अपने बच्चों के कष्ट से पीडित होकर आहे भर रही
28:39थी
28:40पीडित पृत्वी गौरूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रहमा के पास अपनी व्यठा लेकर पहुँची अपने संतानों के उध्धार के
28:49लिए प्रार्थना करने
28:52देवताओं और ब्रहमाने मिलकर भगवान विश्नु से प्रार्थना की इस घोर संकट से ब्रहमांड को बचाने का मार्ग प्रशस्त करने
29:00के लिए
29:01भगवान विश्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे शीघ्र ही प्रित्वी पर अवतार लेकर रावन का सहार करेंगे और
29:09धर्म की पुनरस्थापना करेंगे
29:11इस प्रकार श्रीराम अवतार की दिव्य योजना निश्चित हुई जिससे तीनों लोकों में आशा की एक नई किरन जग्मगा उठी
29:22भगवान विश्णों की मंगलकारी घोशना सुनते ही क्षीर सागर का संपून द्रिश अलोकिक कांती और निलेस्वन प्रकाश से आलोकित हो
29:30उठा
29:33सर्वशक्तिमान प्रभु ने देवराज, इंद्र और समस्थ देवताओं को आदेश दिया कि वे प्रिथवी पर वानर और भालू के रूप
29:40में अवतार लेकर श्रीराम के कार्य में सहायता करें
29:44प्रभु का आदेश पाकर ब्रहमाजी ने सभी गंधरवों, अपसराओं और देवगणों को त्रेतायुक के उस महान धर्मयुद के लिए तत्पर
29:53होने का निर्देश दिया
29:56प्रिथवी देवी जो अब तक रोती हुई गौ के रूप में व्यथित थी, प्रभु के वचनों को सुनकर परम संतोष
30:03और नवजीवन की अनुभूती से भर गई
30:07शीरसागर के तट से विदा होकर समस्थ देवता अत्यधिक आनंदित मन से अपने अपने दिव्य लोकों की ओर प्रस्थान करने
30:14लगे
30:16कैलाश परवतपर महादेव शिव जी ने ध्यान अवस्था में श्री राम अवतार के भावी आगमन का बोध किया और अत्यंत
30:24प्रसन्न हुए
30:26भगवान शिव ने माता पारवती को बताया कि वे स्वय भगवान विश्णू की इस पावन लीला में सहायता हेतु हनुमान
30:33के रूप में अवतरित होंगे
30:36वायुदेव ने प्रभु के संकल्प को शिरोधार्य करते हुए रुद्र अवतार महावीर हनुमान के जन्महेतु अपनी शक्ती को संचित करना
30:44प्रारंभ किया
30:46देवराज, इंद्र और सूर्यदेव ने भी प्रित्वी पर अपने अंश से महाबलशाली वानर शूरवीरों को प्रकट करने का दिव्य संकल्प
30:55लिया
30:56महर्शी वशिष्ठ और प्रित्वी के सिध्ध रिशियों ने ध्यान योग में ही भगवान विश्णू के अवतरण की इस अलौकिक सूचना
31:04को प्राप्त कर लिया
31:06पवित्र सर्यू नदी के तटपर स्थित अयोध्या नगरी में भी वायू और प्रकृती का वातावन स्वतही अत्यंत सुख़द और पवित्र
31:14हो गया
31:15तीनों लोकों में रावन के अत्याचारों से आकरांत प्राणियों के हृद्यों में अचानक असीम शान्ती और नवजीवन की उमंग जाग
31:24उठी
31:25ब्रहमा जी के आदेश अनुसार समस्त देवन्शच प्रित्वी के किश्किंधा और दंड कारने के घने वनों में धीरे-धीरे प्रकट
31:33होने लगे
31:35देवराज इंद्र ने अमरावती में अपने सिनहासन पर बैठकर संतुष्टि पूर्वक घोशना की की अब अधर्म के अंत का समय
31:43निकट है
31:45महर्शी विश्वामित्र ने अपनी तपो भूमी में यग्य की वेदी के समक्ष प्रभु नारायन का समरण कर दिव्य आहुतिया समर्पित
31:53की
31:54धर्म की देवी ने अपने लुप्थ होते तेज को पुन समेटना प्रारंब किया जिससे ब्रहमांड का संतुलन धीरे-धीरे सुधरने
32:03लगा
32:04सुर्यदेव ने अपनी दिव्य किर्णों को अयोध्या के राजा दशरत के राजमहल पर केंद्रित कर दिया, जिससे संपूर्ण राजप्रासाद अलोकिक
32:13कान्ती से जगम का उठा
32:15राजा दशरत और महारानी कौशल्या के अंतहकरण में संतान प्राप्ती की एक तीवर और पवित्र अभिलाशा जागरित होने लगी
32:25देवताओं ने आकाश मार्ग से पवित्र अयोध्या भूमी पर दिव्यकल्प वरिक्ष के सुगंधित पुष्पों की वर्षा करके अपना सम्मान प्रकट
32:33किया
32:34इस प्रकार जब आकाश और प्रित्वी दोनों में अनुकूल योग सिध्ध हुए तब मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम के अवतार का
32:43मार्ग पूरी तरह निश्कंटक हो गया
32:46तभी देवलोक में ब्रहमांड की चिरपुरातन शांती भंग करते हुए रावन के अत्याचारों से त्रस्ट देवताओं की सामुहिक पुकार वैकुंठ
32:55के परम पावन धाम तक जा पहुँची
32:58आर्तनाद सुनकर देवताओं के नेत्रित्वकर्ता ब्रहमा और इंद्रक अपने चिंतित मुखों पर गहन विचार लिए परमपिता विश्नु के प्राकट्य की
33:08प्रतीक्षा में अधीर हो उठे
33:11सहसा वैकुंठ के हरिदय से एक असहिय दिव्य प्रकाश पुंज उत्पन हुआ जिसने समस्त लोकों को अपनी स्वर्ण आभा से
33:19आपलावित कर दिया
33:21उसी प्रकाश के गर्ब से चतुर्भुज भगवान विश्नु, ब्रह्मांडिय नीलिमा और स्वर्ण कांतियुक्ट आभा के साथ समस्त देवगणों के समक्ष
33:30प्रकट हुए
33:32विश्नु के दिव्यदर्शनकर समस्त देवगण, रिशिमुनी और अपसराय श्रद्धा से नत्मस्तक हो गए, उनकी आखों में आशा और विश्वास की
33:42चमक भराई
33:43शांत और गंभीर स्वर में भगवान विश्नु ने देवगणों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे उनकी पीडा से अवगत
33:51हैं और रावन का विनाश अब निश्चित है
33:55भगवान के आश्वासन से ब्रहमा और इंद्र सहित सभी देवों के हृदय से भय का बोज हलका हो गया और
34:02उनके मुखों पर संतोष की एक नई आभा चलक उठी
34:07इस क्षण्क ब्रहमांडिय उर्जा एक नई दिशा में प्रवाहित होने लगी जिसमें न्याय और धर्म की स्थापना का एक अटूट
34:15संकल्प नहित था
34:17भगवान विश्णू ने घोशना की कीवे स्वयम प्रित्वी पर दशरत नंदन श्री राम के रूप में अवतरित होंगे जिससे त्रेता
34:25युग का स्वर्नकाल प्रारंभ होगा
34:28यह सुनकर देवगणों में हर्ष की लहर दौड गई और उन्होंने जैजैकार करते हुए भगवान विश्णू की स्थुती में मधुर
34:36गीत गाए
34:38आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी जिन में से प्रत्येक एक पवित्र प्रार्थना और नए युग के आगमन
34:45का प्रतीक था
34:47सूर्य की किरने वैकुंठ में नए उद्साह से चमकने लगी जैसे वे त्रेता युग के आने वाले स्वर्नकाल की उद्घोशना
34:55कर रही हो
34:57अपना दिव्य संदेश देने के उपरांत भगवान विश्णों ने धीरे धीरे अपनी ब्रहमांडी आभा में विलीन होना प्रारंब किया
35:05परंतु उनकी प्रतिग्या वायुमंडल में गूंजती रही
35:10देवगणों के मुखों पर अब केवल विश्वास और कृतग्यता के भाव थे क्योंकि उन्हें पता था कि ब्रहमांड का संतुलन
35:18पुनह स्थापित होने वाला है
35:21वैकुंट से एक दिव्य उर्जा पुन्ष प्रित्वी की ओर प्रवाहित हुआ जिसका लक्ष अयोध्या नगरी था जहां दशरत और कौशल्या
35:30की प्रतीक्षा चरम पर थी
35:32यह उर्जा जैसे एक अग्रिश सेतु का निर्मान कर रही थी जो देवलोक और प्रित्वी लोक के बीच के रिक्त
35:40स्थान को पाट रही थी
35:42विश्णू के प्रस्थान के बाद वैकुंठ में शान्ती और सामंजस्य पुनह स्थापित हो गया परन्तु अब एक नई गहन प्रतिग्या
35:51के साथ
35:53देवर्शी नारद अपनी वीना के साथ मधुर धुन बजाते हुए इस दिव्य घटना के साक्षी बने उनके मुख पर भविश्य
36:00के लिए एक रहस्य में मुस्कान थी
36:04जैसे ही वैकुंट का संदेश पृत्वी पर उतरने लगा अयोध्या के आकाश में एक अद्रिश्य दिव्य बीज बोया गया जो
36:12श्री राम के अवतार का आधार बनेगा
36:15इस प्रकार समस्त ब्रहमांड ने एक जुठ होकर मर्यादा पुरुशोत्तम के आगमन की प्रतीक्षा की जब धर्म की ध्वजा पुनह
36:24स्थापित होगी