Skip to playerSkip to main content
पद्म पुराण के 11वें अध्याय में देखिए कैसे रावण के भयंकर अत्याचारों से त्रस्त होकर भू-देवी ब्रह्माजी की शरण में पहुंचीं। जानिए राजा दशरथ के पुत्रकामेष्टि यज्ञ का वो गुप्त रहस्य जिससे अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए और भगवान विष्णु के सातवें पूर्ण अवतार श्रीराम का पावन जन्म हुआ! #PadmaPurana #LordRama #RamJanm #HinduMythology #Puranas
Transcript
00:00भगवान पर शुराम के महेंद्रगिरी प्रस्थान करते ही लंकाधिप्ती रावन का अत्याचार तीनों लोकों में प्रचंड अगनी की भांती भड़क
00:08उठा।
00:09दस शीश और बीस विशाल भुजाओं वाले अहमकारी रावन ने अपने दिव्य पुष्पकारत पर सवार होकर सुरों और असुरों को
00:18भयभीत कर दिया।
00:20रावन की सेना ने स्वर्ग लोक पर आक्रमन कर देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं को युद्ध भूमी में निर्दैता पूर्वक
00:28परास्त कर दिया।
00:30स्वर्ग का सिनहासन छिन जाने से संपूर्ण ब्रहमांड में धर्म की जोती मध्यम पड़ गई और अधर्म का अंधकार फैलने
00:37लगा।
00:39पवित्र आश्रमों में रिशियों द्वारा किये जाने वाले महायग्यों में राक्षस रक्त और हविश्य का दूशित कचरा फैंक कर उन्हें
00:47अपवित्र करने लगे।
00:49महर्शियों के तप और वेदपाठ पर कड़ा प्रतिबंध लगा कर रावण ने केवल अपनी पूजा का दंभपून विधान लागू कर
00:57दिया।
00:58भयभीत रिशियों और मुनियों को निर्जन गुफाओं में छिपकर प्रभु ध्यान करने के लिए विवश होना पड़ा।
01:05नवग्रहों को पराजित कर रावण ने उन्हें अपने राजसभा के चर्णों के नीचे सीधियों की तरह बंदी बना कर रख
01:13लिया।
01:13काल पुरुष यम्राज और पवंदे भी रावण के वर्दान और शक्ती के भय से उसके अधीन होकर सेवा करने लगे।
01:23सज्जनों के सहार, गौहत्या और अधर्म के असहय भार से संपून पृत्वी देवी कामपने लगी।
01:30पवित्र नदिया सूख गई, लताओं के पुष्प मुर्जा गए और दिशाओं में केवल चीतकार और क्रंदन गूंजने लगा।
01:39अधर्म के इस प्रचंड दंश से दुखी होकर पृत्वी देवी ने एक असहाय रूदन करती हुई कामधेनु गाय का रूप
01:46धारन किया।
01:48आखों में अश्रु और कापते शरीर के साथ वह रोती हुई गोमाता ब्रहमा जी की शरण में जाने हेतु सत्यलोग
01:56की ओर बढ़ी।
01:57सत्यलोग के परमदिव्य और अलौकिक वातावर्ण में प्रवेश करते ही गोरूपी प्रिथवी की वेदना और अधिक फूट पड़ी।
02:06ब्रहमस्भा के मध्य पहुँचकर उस असहाय गौ माता ने पितामह ब्रहमा के चरंटमलों में अपना मस्तक तिका दिया।
02:14चारों वेदों के रचिता ब्रहमा जी ने अपने चारों मुखों से गोरूपी प्रिथवी को अत्यंत वात्सल्य और करुणा से देखा।
02:23प्रित्वी माता ने कापते स्वर में रावन के कुरूर अत्याचारों और नश्ट होते धर्म की व्यथा ब्रहमा जी के समक्ष
02:31कही
02:32ब्रहमा जी ने अपने तपोबल से विचार किया कि रावन को प्राप्त वर्दानों के कारण केवल भगवान नारायन ही उसका
02:40वद्ध कर सकते हैं
02:43पितामा ब्रहमा ने समस्ट देवगणों, रिशियों और गंधर्वों को श्री हरी विष्णु के क्षीरसागर चलने का आहवान किया
02:51समस्ट देवगण प्रिथवी के उद्धार की अंतिम पुकार लेकर सर्वव्यापी भगवान विष्णु की शरण में क्षीरसागर की ओर प्रस्थान करने
03:00लगे
03:01समस्ट देवगण महर्शी ब्रहमा के दिव्य नेत्रित्व में अधाक शीरसागर के तटपरा पहुँचे जहां स्रिष्टी के पालक भगवान विष्णु का
03:10वास है
03:12पितामा ब्रहमा ने गेहन चिंतन के पश्चात समस्ट देवों को एकत्रित कर उन्हें आदी पुरुष श्री हरी विष्णु के आहवान
03:21हेतु पुरुष सूप्त के पाठ का निर्देश दिया
03:25ततपश्चात ब्रहमांड के सभी देवताओं ने अपने हृदय में रावन के अत्याचारों का गेहन दुरहक लिए पूर्ण श्रद्धा और एकागरता
03:34के साथ पवित्र पुरुष सूप्त का पाठ प्रारंब किया
03:38जैसे जैसे सूप्त की पवित्र ध्वनी वायुमंडल में गूंजती गई, शीर सागर की शांत लहरों से एक अलोकिक स्वर्निंग उर्जा
03:46का प्रवाह उठने लगा, जो समस्त ब्रहमांड में व्याप्त हो गया
03:51देवों का हृदय शुद्ध भक्ती से उतप्रोथ था और उनकी सामोहिक प्रार्थना की शक्ती से क्षीर सागर का वातावर्ण और
03:59भी अधिक उर्जावान और दिव्य प्रतीत होने लगा
04:04ब्रहमांड के इस दिव्य आहवान को सुनकर अनंत क्षीर सागर की गहराईयों से एक अप्रत्याशित नीले सुनहरे प्रकाश का स्रोत
04:12धीरे धीरे उपर की ओर उठने लगा
04:15जैसे जैसे प्रकाश तीवर होता गया समस्त देवगणों ने अनुभव किया कि स्रिष्टी के पालक भगवान नारायन की अव्यक्त उपस्थिती
04:24उनके समक्ष प्रकट होने को आतुर है
04:27उसी क्षन शीरसागर की लहरों पर सहसरों स्वर्ण कमल पुष्प खिल उठे जो भगवान विश्णू के प्रित्वी पर अवतरण के
04:36शुब संकेत थे
04:38और फिर उस दिव्य प्रकाश के मध्य से अनन्त नागराज शेशनात पर विराज मान होकर स्रिष्टी के पालक भगवान श्री
04:46हरी विश्णू की अलौकिक छवी धीरे-धीरे प्रकट होने लगी
04:50समस्थ देवगणों के नेत्रों में अश्रू और हृदय में अनन्त श्रद्धा लिए वे परमेश्वर के इस अद्भुत दर्शन को निहारते
04:58रह गए
05:00पूर्णत्य प्रकट होकर भगवान विश्णू अपने चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये नागराज शेशनाग के सहस्त्र फनों
05:09की शीतल चाया में विराजमान थे
05:12उनके दिव्यतेज से समस्ट ब्रहमांड आलोकित हो उठा और उनके चारों और ब्रहमांडी उर्जा का एक सुरक्षात्मक आवर्ण स्पन्दित हो
05:22रहा था
05:22तब ब्रहमाजी ने समस्ट देवों के साथ परंपिता भगवान विश्णु के चरण कमलों में साष्टान प्रणाम कर विनमरता पूर्वक अपनी
05:32व्यथा सुनानी आरंभ की
05:35भगवान विश्णु ने अपनी शांत और करुणामई द्रिष्टी से ब्रहमाजी और समस्ट देवगणों को निहारते हुए उनके मौन कश्टों को
05:44अपने दिव्य ज्यान से आत्म साथ किया
05:47देवताओं ने कापते हुए स्वर में रावन के अजे होने और उसके द्वारा प्रिथवी पर मचाए गए अथा हाहाकार की
05:55करुण गाथा भगवान के समक्ष रखी
05:58परमेश्वर ने स्रिष्टी के पालक के रूप में समस्ट ब्रहमांड की पीडा को अपने हृदय में अनुभव किया उनके मुख
06:06पर गेहन करुणा का भाव छा गया
06:09और फिर भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवानी में घोशना की कीवे रावन के विनाश के लिए प्रिथवी पर एक नश्वर
06:17राजकुमार के रूप में अवत्रित होंगे
06:20उनकी अमरत्मई वानी ने समस्थ देवगणों के हृदय में आशा और नवजीवन का संचार कर दिया
06:26मानों अंधकार के बाद एक नई भोर का उदे हुआ हो
06:31उन्होंने घोशना की की वे दशरत के पुत्र श्रीराम के रूप में जन्म लेंगे और धर्म की पुनहस्थापना हेतु रावन
06:39तथा उसकी समस्थ आशुरी शक्तियों का सहार करेंगे
06:43यह सुनकर समस्थ देवगणों ने हर्शातिरेक से भगवान विश्नु की जयजयकार की क्योंकि पृत्वी के उद्धार और धर्म की विजयका
06:52मार्ग अब स्पष्ट हो चुका था
06:55देवताओं की हर्शध्वनी अभी भी गूंज रही थी जब भगवान विश्नु ने अपनी चिर्निग्रा का त्याग कर ब्रहमांड के कल्यान
07:03हेतु पृत्वी की ओर द्रिष्टी डाली
07:06इसी समय अवधपुरी के भव्य राजमहल में महाराजा दशरत एक गंभीर चिन्ता से घिरे हुए थे उनका हृदय पुत्रहींता के
07:15दुख से व्याकुल था
07:17उनकी आखों में एक गहरा विशाद स्पष्ट जलक रहा था क्योंकि वे अपने गौरवशाली इक्षवाकु वंश को आगे बढ़ाने वाले
07:26उत्तराधिकारी की कमी से पीडित थे
07:30समरिध्धी और वैभव से परिपून होते हुए भी अयोध्या का राजमहल उनके लिए सूना प्रतीत होता था
07:36मानो भविश्य का मार्ग अंधकार मय हो
07:39अपने राज्य के भविश्य को लेकर चिंतित महाराज दश्रत ने अंत्ता अपने पूजनिय राजपुरोहित महर्शी वसिष्ट की शरणली
07:50महर्शी वसिष्ट के शांत आश्रम में प्रवेश करते ही दश्रत ने अपने हृदय की पीड़ा और राजवन्ष के उत्तराधिकारी के
07:58अभाव में अपने गहन दुख को व्यक्त किया
08:01रिशी वसिष्ट ने धैर्यपूर्वक राजा की व्यथा सुनी उनकी शांत आखों में गहन करुणा और समझ की जलक थी
08:10राजा के शब्दों में छिपी आशा की किरण को पहचानते हुए वसिष्ट ने अपने दिव्य ज्यान से उनके दुख का
08:18समाधान खोजने का निश्चय किया
08:21गहन विचार विमर्ष के पश्चात महर्शी वसिष्ट ने महाराज दश्रत को कुत्र प्राप्ती के लिए अश्वमेध यग्य करने का सुझाव
08:29दिया जो समस्त बाधाओं को दूर करने वाला था
08:33इस दिव्य सुझाव को सुनकर दश्रत के हृदय में आशा की एक नई किरन जगी मानो वर्षों के अंधकार के
08:41बाद सुर्योदय हुआ हो
08:43राजा ने ततकाल अपने मंत्रियों और सभास्दों को बुला कर भव्य अश्वमेध यग्य की तैयारियों में जुट जाने का आदेश
08:51दिया
08:53समस्त अयोध्या नगरी में उच्साह की लहर दोड गई मानो एक नया युग आरम होने वाला हो
09:00राजसी शिल्पकार और कारीगर तुरंत यग्यस्थल के निर्माण में जुट गए जहां देवताओं का आहवान किया जाना था
09:09विभिन राज्यों से आये निपून पंडितों और शिल्पकारों की देखरेख में प्रत्येक संरचना को वेदों के अनुसार शुद्धता और सटीक्ता
09:18से बनाया जा रहा था
09:20यग्य की वेदी को पवित्र सामग्रियों और सोने चादी के अलंकर्णों से सजाया जा रहा था जो दिव्य शक्तियों को
09:28आकर्षित करने के लिए तयार थी
09:31सूर्य की सुनहरी किर्ने भव्य यग्य मंडप पर पड़ रही थी जो अब पूर्णता की ओर अग्रसर था एक पवित्र
09:39और आशावादी वातावर्ण का निर्मान कर रहा था
09:43दूर-दूर के राज्यों से राजा, महाराजा और सिध्ध रिशिम्मुनी अपनी उपस्थिती दर्स कराने के लिए अयोध्या की ओर प्रस्थान
09:52कर रहे थे
09:53यग्य के शुभ मुहूर्थ पर महाराजा दश्रत अपनी तीनों रानियों, कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा के साथ वेदी के समीप आसन
10:02ग्रहेन कर रहे थे
10:05पुत्रकामिष्टी यग्य को संपन्न करने के लिए महान रिशी रिशिश्रिंग, जिनके सिर पर हिरण के सींग थे, ने पवित्र अगनी
10:13प्रजवलित की
10:15यग्य की पवित्र अगनी प्रजवलित होते ही, वातावर्ण दिव्य उर्जा से भर गया, और देवताओं की उपस्थिती का आभास होने
10:23लगा, जिसने संपूर्ण यग्यशाला को एक अलोकिक आभासे परिपूर्ण कर दिया
10:39शीरसागर में विराजमान भगवान विश्नु अपने अनंत विस्तार में अयोध्या में हो रहे इस पवित्र यग्य की महिमा को अपनी
10:47दिव्यद रिष्टी से अवलोकन कर रहे थे, उनके मुख पर एक शांत मुस्कान थी
10:54यग्यवेदी पर महान रिषी रिष्यश्रिंग अपने हिरन के सिंगों और तपस्या के तेज से युक्त मंत्रो चारण की गहराई में
11:01लीन थे, उनकी वानी से पवित्र वेद ध्वनी गूंज रही थी
11:06जैसे जैसे आहुतिया अगनी को समर्पित हो रही थी, यग्य की ज्वाला एक स्वर्णिम प्रकाश में परिवर्तित हो गई, जिसने
11:14संपूर्ण यग्यशाला को एक अध्भुत पवित्र आभा से घेर लिया
11:19उसी क्षण यद्य की प्रज्वलित अगनी से एक तेजस्वी और विशालकाय दिव्य पुरुष प्रकट हुए, जिनका रूप सूर्य के समान
11:28देदी प्यमान था
11:30दूर अपने कमल सिनहासन पर विराजित स्रिष्टिकर्ता ब्रहमाभी इस अभूत पूर्व घटना के साक्षी बन रहे थे, उनके चारों मुखों
11:39पर संतोष और प्रसन्निता का भाव था
11:42उस दिव्य पुरुष के हाथों में एक स्वर्ण पात्र था, जो खीर से भरा था और उसमें से अमरित के
11:49समान सुगंध निकल रही थी, जिससे पूरा वातावर्ण मेहक उठा
11:55उस खीर की अलौकिक सुगंध ने यग्य में उपस्थित सभी हृद्यों को एक अनूठी शांती और आशा से भर दिया,
12:02जैसे ही वह वातावर्ण में फैलने लगी
12:06दिव्य पुरुष ने अपनी गंभीर किन्तु शांत वानी में महाराजा दशरत को संबोधित किया, उनके शब्दों में ब्रहमांड की शक्ती
12:15और आशिर्वाद नहित था
12:17महाराजा दशरत इस अप्रत्याशित दिव्य दर्शन से अभिभूत होकर अवाक रह गए और उनके नेत्रों में श्रद्धा और कृतग्यता के
12:26आसु छलक उठे
12:29दिव्य पुरुष ने समझाया कि यह अमरत्मई खीर स्वय भगवान विश्नु का प्रसाद है, जो पुत्र प्राप्ती की इच्छा रखने
12:37वाले राजा के लिए विशेश रूप से लाई गई है
12:41खीर से भरा वह स्वर्ण पात्र अब और भी अधिक तेजस्विता से चमक रहा था, जैसे उसमें समूचे ब्रहमांड की
12:49स्रिजनात्मक शक्ती समाहित हो गई हो
12:52दिव्य पुरुष ने अत्यंत सम्मान पूर्वक वह स्वर्ण पात्र महाराजा दशरत की ओर बढ़ाया, जिनका हृदय अब आशा और आनन्द
13:01से भर चुका था
13:02रिशी रिशिश्रिंग और महर्शी वशिष्ट इस पवित्रक्षन के साक्षी बनकर एक दूसरे की ओर देखकर संतोश और एक गहरी रहस्य
13:12में मुस्कान बिखेर रहे थे
13:15महाराजा दशरत ने कापते हाथों से वह दिव्य स्वर्ण पात्र ग्रहन किया, जैसे वे ब्रहमांड का सबसे अन्मोल वर्दान प्राप्त
13:23कर रहे हो, उनके रोमरों में भक्ती समाई हुई थी
13:28खीर के स्वर्ण पात्र को हाथ में लिए दशरत के मुख पर एक दिव्य शान्ती छा गई और संपूर्ण यग्यशाला
13:35में एक अद्वितिय आनंद और आशा की लहर दोड़ गई
13:39अपना दिव्य कार्य संपन्न कर वह तेजस्वी पुरुष महाराजा दशरत को आशिरवाद दे कर धीरे धीरे उसी यग्य की पवित्र
13:48अगनी में विलीन हो गए जिससे वे प्रकट हुए थे
13:52दिव्य पुरुष के अद्रिश्य होते ही दशरत ने इस नहपूर्ण द्रिश्टी से अपनी तीनों रानियों की ओर देखा जिनके मुख
14:00पर अब प्रतीक्षा और उतकंठा का भाव था
14:04राजेश्री दशरत ने उस पवित्र खीर को अपनी रानियों में वित्रित करने का मन बनाया, उनकी आखें भविश्य के सुखद
14:12स्वपनों से चमक रही थी
14:14तीनों रानिया, कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा उस दिव्य प्रसाद की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए बैठी थी, उनके हृद्यों में मातरित्व
14:24की अलौकिक आशा जागरित हो चुकी थी
14:27दश्रत ने अत्यंत प्रेम और भक्ती से उस पवित्र खीर का पात्र उठाया, जिसकी दिव्य सुगंध से पूरा राजभवन महेक
14:36रहा था
14:37उन्होंने सर्वप्रथम कौशल्या को उस दिव्य खीर का आधा भाग प्रदान किया, जिनके नैनों में असीन कृतग्यता जहलक रही थी
14:47ततपश्चात उन्होंने अपने दूसरे पुत्र की माता बनने वाली रानी कैकेई को खीर का एक चौथाई हिस्सा स्नेहपूर्वक दिया
14:56शेश खीर के आधे भाग को उन्होंने सुमित्रा को दिया और फिर बचे हुए आधे भाग को भी पुन्ह सुमित्रा
15:04को ही प्रदान किया क्योंकि उन्हें दो पुत्र प्राप्थ होने थे
15:08दिव्य खीर का सेवन करते ही तीनों रानियों के हृद्यों में एक अलोकिक स्पंदन हुआ जैसे ब्रहमांड की उर्जा उनके
15:16भीतर समाहित हो गई हो
15:19उनके मुखमंडल पर दिव्य तेज व्याप्थ हो गया और उनके अंतरात्मा में भावी चक्रवर्ती पुत्रों की अलोकिक आभा जागरित हो
15:27उठी
15:29समय चक्र अपनी गती से आगे बढ़ता रहा और माताओं के गर्भ में दिव्य अन्शों का पोशन होने लगा प्रकृती
15:36स्वयन उच्सव मना रही थी
15:39चैत्र मास के शुकलपक्ष की नवमीति थी उश्य नक्षत्र और कर्क लग्न में भगवान विश्नु स्वयन कौशल्या के गर्भ से
15:47श्री राम के रूप में अवतरत होने को उध्यत थे
15:52अयोध्या नगरी के कणकण में अद्भुत उच्साह चा गया पवन में दिव्य सुगंध घुल गई और आकाश से पुष्प वर्षा
15:59होने लगी
16:01कौशल्या के प्रसवकक्ष से मंगल ध्वने गूंज उठी जैसे स्वयन ब्रह्मांद नवजीवन के आगमन का शंकनाद कर रहा हो
16:10और फिर एक दिव्य शिशु की किलकारी से पूरा अयोध्या धाम गूंज उठा जिसके तेज से सारा कक्ष प्रकाशित हो
16:17गया
16:19कौशल्या ने अपने प्रथम पुत्र श्यामल वर्ण, कमल नयन और आजानु बाहु श्री राम को देखा जिनका मुखमंडल सूर्य के
16:27समान तेजस्वी था
16:30उसी शुब घडी में रानी कैकेई ने भरत को जन्म दिया, जिनकी कांती चंद्रमा के समान शीतल और मनमोहक थी
16:39तदुप्रांत रानी सुमित्रा ने दो तेजस्वी पुत्रों, लक्षमन और शत्रुघन को जन्म दिया, जिन्होंने क्रमशय श्री राम और भरत का
16:47अनुसर्ण करने का संकल्प लिया था
16:51दश्रत का हृदय आनन्द से भर गया, उन्होंने अपने चारों पुत्रों को देख कर स्वयन को इस स्रिष्टी का सबसे
16:58भाग्यशाली पिता माना
17:00स्वर्ग लोक में देवतागन और रिशिमुनी अयोध्या में जन्में इन दिव्य बालकों पर पुश्प वर्शा कर रहे थे, तथा मंगल
17:08गीत गा रहे थे
17:10राजा दश्रत ने शुभ मुहूर्त में अपने गुरु महर्शी वशिष्ट को बुलाकर नवजात राजकुमारों के नामकरन संसकार की तयारी का
17:19आदेश दिया
17:21महर्शी वशिष्ट अपनी दिव्य द्रिष्टी से भविश्य का अवलोकन करते हुए, प्रत्येक पुत्र के नाम का गूड अर्थ समझाते हुए
17:29आगे बढ़े
17:31उन्होंने जेश्ट पुत्र को राम नाम दिया, जिसका अर्थ है जो सबको आनन्दित करे और इसी प्रकार अन्य राजकुमारों को
17:39उनके दिव्य गुनों के अनुरूप नाम प्रदान किये
17:42इस प्रकार अयोध्या में चार तेजस्वी राजकुमारों राम, भरत, लक्षमन और शत्रुघन का नामकरन संस्कार संपन हुआ और पूरा राज्य
17:52उत्सव में डूग गया
17:54उत्सव के इस पावन वातावर्ण में महर्शी रिश्य श्रिंग और वशिष्ट के मार्ग दर्शन में संपन हुए उस महान पुत्र
18:02कामिष्टी यग्य का अनुपम स्वरूप पुनह सब के मानस पटल पर जीवन्थ हो उठा
18:08राजा दश्रत ने परम भक्ती से जुगकर पवित्र यग्यवेदी के समक्ष हाथ जोडे जबकी महर्शी रिश्य श्रिंग ने पूर्ण आहुती
18:16देने के लिए स्वर्ण पात्र सेगी की अंतिम धारा अर्पित की
18:21जैसे ही अंतिम आहुती जलती हुई समिधाओं पर पड़ी संपूर्ण यग्यशाला में प्रचंड मंत्रो चार के साथ अगनी की लप्टे
18:30गगन्चुम्बी उचाईयों को छूने लगी
18:33उसक्षन संपूर्ण आकाश में देवदुन्दु भी बज उठी और स्वर्ग से रंगविरंगे सुर्भित पुष्पों की अविरल वर्षाय अज्यमंदपर होने लगी
18:43प्रचंड अगनी की ज्वालाओं के मध्य से एकाएक एक अलोकिक और देधी प्यमान प्रकाश पुन्च प्रकट हुआ
18:50जिसने संपूर्ण अयोध्या नगरी को अपने प्रभाव से आलोकित कर दिया
18:55अगनीदेव के इस अलोकिक प्रकट्य को देखकर राजादशरत और महर्शी वशिष्ठ का हृदय अपार विस्मय और श्रद्धा से भर गया
19:05ज्वालाओं को चीरते हुए प्रत्यक्ष अगनीदेव साक्षात प्रकट हुए
19:09जिनका स्वरूप पिघले हुए स्वर्ण और जलते हुए सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी था
19:16अगनीदेव के चार हाथों में एक देदी प्यमान स्वर्ण पात्र शोभा पा रहा था
19:21जिसमें साक्षात भगवान विश्नु का तेजो में अंश दिव्य पायसम के रूप में चमक रहा था
19:28अगनीदेव के दिव्य शरीर से बहती हुई उश्मा और सुगंध ने यग्यमंडप के कोने कोने को पवित्रता और अमूत आनंद
19:36से सराबोर कर दिया
19:39अगनीदेव ने अपनी गंभीर और मेघमंदर वानी में राजा दशरत को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी कठिन तपस्या और
19:47यग्य से परंपिता परमेश्वर प्रसन्न हुए है
19:52अगनीदेव ने अपने हाथों में सुशोभित उस अलौकिक पायसम पात्र को आगे बढ़ाते हुए राजा दशरत को उसे स्विकार करने
20:00का निर्देश दिया
20:01उस दिव्यखीर में संपूर्ण ब्रहमांड के स्वामी श्रीहरी विश्णु के चार रूपों में अवतार लेने का अमोग संकल्प स्पंदित हो
20:09रहा था
20:11जैसे ही राजा दशरत ने वह पावन स्वर्ण पात्र प्राप्त किया संपूर्ण अयोध्या में शंकध्वनी और साधुवाद के स्वर्गूंठ उठे
20:21अग्निदेव ने राजा दशरत को आदेश दिया कि इस चरू रूपी प्रसाद को वे अपनी रानियों में उचित विधी से
20:28विभाजित कर दें
20:30अपना अलौकिक कार्य पूर्ण करके अग्निदेव पुनह प्रचंड अग्नी ज्वालाओं में विलीन होकर अपने दिव्य लोग को लोट गए
20:39यग्यवेदी से उठने वाली पवित्र सुगंध ने ऐसा वातावर्ण निर्मित कर दिया कि समस्थ चराचर जगत में शांती और आनंद
20:47का प्रसार होने लगा
20:50प्रसन्नचित होकर राजा दशरत उस अलौकिक प्रसाद पात्र को अत्यंत सावधानी से लेकर अपने राजप्रासाद की ओर प्रस्थान करने लगे
21:00राजप्रासाद के अंतहपुर में पहुँचकर राजा दशरत ने अपनी तीनों महारानियों कौसल्या, सुमित्रा और कैकेई को सादर आमंत्रित किया
21:10राजा दशरत ने अपार स्नेह और नियमबध रीती से उस दिव्य अमरित्रूपी प्रसाद का आधाभाग महारानि कौसल्या को प्रदान किया
21:20इस प्रकार, श्रीहरी के इस अलौकिक प्रसादम ने ही प्रित्वी पर धर्म की स्थापना और दुष्ट रावन के अंत की
21:27नीव रखी थी
21:30कौसल्या को प्रसाद देने के पश्चात, राजा दश्रत ने अपने हृदय में शेश अमरित तुल्य प्रसाद को अन्य प्रिय रानियों
21:37में प्रेम पूर्वक बाटने का संकल्प लिया, मानों वे अपने भाग्य का ही विभाजन कर रहे हूँ
21:44उन्होंने उस बचे हुए दिव्य प्रसाद को अत्यंत सावधाने और नियंबध धरीती से दो बराबर भागों में विभाजत किया, जैसे
21:52एक अनुभवी जोहरी बहुमूल्य रत्न को बाट रहा हो
21:57ततपश्चात उन्होंने उस पवित्र प्रसाद का एक भाग अपनी दूसरी महारानी सुमित्रा को सादर प्रदान किया, जिनकी शांत और सौमय
22:06प्रकृती पूरे राज्ज में पूजनिय थी
22:09सुमित्रा ने उस दिव्य अम्रित को अपनी हथेलियों में भक्तिभाव से ग्रहन किया, और उनके मुख पर तातकालिक रूप से
22:17एक अलोकिक शीतल शांती की आभा फैल गई, जैसे रात्री में चांदनी छिटकती हो
22:23अब राजा दश्रत ने अंतिम बचा हुआ अत्यंत पवित्र प्रसाद अपनी सबसे प्रिय महारानी कैकेई की ओर बढ़ाया, जिनका अनुपम
22:32सौंदर्य और पराक्रमी भाव राजमहल में अद्वितिय था
22:37कैकेई ने उस पवित्र प्रसाद को अपार प्रसन्नता और भक्तिभाव से अपने हाथों में लिया, जिसकी सुनहरी चमक उनके प्रफुलिक
22:46चहरे पर भी स्पष्ट रूप से प्रतिलक्षित हो रही थी
22:50तीनों महारानियों ने अपने अपने भागों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहन करते हुए उस दिव्यखीर का सेवन
22:58किया, जिससे उनके भीतर एक अध्भुत अलोकिक उर्जा का संचार हुआ
23:04प्रसाद के सेवन करते ही, तीनों के चहरों पर दैविय प्रकाश की स्वर्णिन किरने फूट पड़ी, मानो स्वयन स्वर्ग की
23:11आभा धर्ती पर उतर आई हो और उनके रोमरों में समा गई हो
23:16यह अलोकिक द्रिश देखकर राजा दश्रत का हरिदय आनंद और विस्मय से भर गया, उन्होंने अपनी रानियों के चहरों पर
23:25प्रकट हो रहे, उस अध्भुत तेज को अपलक निहारा
23:29महारानी कौसल्या का मुख मंडल एक शांत स्वर्णिम आभा से दीप्तिमान हो उठा, जो उनके भीतर समाय धर्म, मर्यादा और
23:38आने वाले पुत्र के सार्वभौमिक गुनों का प्रतीक था
23:42उसी क्षण महारानी सुमित्रा के चहरे पर शांती और ज्ञान की एक शीतल चंद्रमा जैसी चमक छाई, जैसे रात के
23:50गहन आकाश में नक्षत्र जग्म गाते हुँ
23:53और महारानी कैकेई के मुख पर उच्साह और अदमय पराक्रम की एक तेजस्वी अगनी चमक उठी, जो उनके भावी पुत्र
24:02के शौर्य और वीर्ता का स्पष्ट संकेत थी
24:06यह विस्मयकारी द्रिश देखकर राजा दशरत का हृदय पुत्र प्राप्ती की उस अदमय आशा से भर गया, जिसके लिए उन्होंने
24:14वर्षों तक कठोर तपस्या और महायज्य का अनुष्ठान किया था
24:19उन्होंने अपनी आखे बंद कर, अपने हाथ जोड कर आकाश की ओर देखा, दिव्य शक्तियों के प्रती अपनी असीम कृतग्यता
24:28और विन्य पूर्वक धन्यवाद व्यक्त किया
24:32राजप्रासाद की उसकक्ष में एक पवित्र और अत्यंत शक्तिशाली दिव्य उर्जा का प्रवाह बढ़ गया, जो हर कण को पावन
24:39कर रहा था और भविश्य के आगमन का संकेट दे रहा था
24:44अद्रिश्य रूप से ब्रह्मांडिय उर्जा के सुक्ष्म और तेजस्वी कन उन तीनों महारानियों के गर्भ में प्रवेश करने लगे, जो
24:52उनके भाग्य को ही नहीं, बलकि संपूर्ण युग को एक नया आकार दे रहे थे
24:59उस दिव्य प्रसाद के प्रभाव से तीनों रानिया अब एक अभूत पूर्व शान्ती और गेहन संतोष का अनुभव कर रही
25:06थी, मानो उन्होंने स्वयंपरम सत्य और ब्रहमांडिय उर्जा को अपने भीतर आत्म साथ कर लिया हो
25:14उन्होंने एक दूसरे की ओर देखकर मंदमंद मुस्कान बिखेरी जो आने वाले शुब समाचार की मौन स्वीकृती और उनके अटूट
25:23बंधन की अभिव्यक्ती थी
25:26राजा दशरत के चहरे पर एक गहरी, शांत और संतोष भरी मुस्कान थी, जिसने वर्षों के इंतजार, तपस्या और असीम
25:34प्रयासों के फल को स्पष्ट रूप से दर्शाया
25:38इस प्रकार, अयोध्या के राजमहल में भगवान विश्णों के अंशों के आगमन की दिव्यनीम रखी गई, जो युगो-युगो तक
25:46प्रित्वी पर धर्म का अविनाशी प्रकाश फैलाते रहे और अधर्म का अंत करते रहे
25:52अयोध्या में मंगलमय उद्भव के साथ ही, लंका की धर्ती पर एक अभूत पूर्व बेचैनी छा गई, मानो पूरी प्रकृती
26:00किसी महा विनाशकारी परिवर्तन का संकेट दे रही हो
26:05अपने भव्य अंधकार्मय सिनहासन पर बैठा लंकापती रावन जिसकी दस शीशों पर अहंकार स्पष्ट था, अचानक महसूस हुए एक हलके
26:14भूकंप से क्षण भर के लिए विचलित हो उठा
26:18उसके राजमहल के विशालकाई स्तंभों में दरारें पढ़ने लगी और फर्ष की भव्य शिलाएं एक भयावह गर्जना के साथ हिलने
26:26लगी, जिससे रतनों और सोने के आभूशन बिखर गए
26:32ततपश्चात लंका के आस्मान में अचानक गहरे काले बादल मंदराने लगे, जो एक विशालकाई दैत्य के क्रोधित मुख के समान
26:40प्रतीत हो रहे थे
26:42एक भयंकर भूकंप ने पूरी लंका नगरी को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे विशालकाई किलेबंदी और मीनारे ढहने लगी,
26:51और धर्ती से डरावनी चीखें सुनाई देने लगी
26:55रावन के प्रमुख सेनाप्ती और दर्बारी, जिनकी क्रूरता सर्वविदित थी, अब भयभीत आखों से एक दूसरे को देख रहे थे,
27:04उनके चहरे पर पहली बार आतंग स्पष्ट दिख रहा था
27:08लंका के स्वर्ण और रतनों से भरे राजकोश में रखी अमूल्य कलाकृतिया और शस्त्रधर्ती के कमपन से गिरकर टुक्रे-टुक्रे
27:16हो गए, जिससे धनसंपत्ती का एक भयानक नाश हुआ
27:21लंका के चारों और का महासागर उनमत्थ हो उठा, विशालकाय काली लहरेन ज्वाला मुखी चट्टानों से ऐसे टक्रा रही थी,
27:30मानो स्वयं वरुन देव क्रोध में गर्जना कर रहे हूँ
27:34फिर एक रक्तवर्नी सूर्य ग्रहेन ने अचानक लंका के आकाश को ढख लिया, दिन के उजाले को एक भयावा लालिमा
27:42में बदल दिया, जिससे सर्वत्र एक अपवित्र अंधकार फैल गया
27:47रावन यद्यपी अपनी दस मुखों पर अहंकार का मुखोटा बनाए हुए था, पर उस रक्तवर्नी ग्रहें और अविश्वसनिय प्राकृतिक प्रकोपों
27:56से उसके मन में भी एक गहरी अशान्ती खैल गई
28:00अशुब संकेट के रूप में बड़े-बड़े मासाहारी पक्षी आकाश से मृत होकर गिरने लगे, उनकी डरावनी चीखें अचानक शान्त
28:09हो गई, जिससे लंका के वायुमंडल में भयावह सन्नाटा चा गया
28:14अचानक लंका की धर्ती से अपवित्र बैंगनी काली ज्वालाए फूटने लगी, जो बिना किसी इंधन के जल रही थी, जिससे
28:22सर्वत्र नरक जैसा द्रिश उत्पन हो गया
28:26समूची लंका नगरी में भयभीत राक्षसों की चीख पुकार गूंज उठी, जो किसी अंजानी आसन्न विनाश की आशंका से घबराकर
28:35इधर उधर भाग रहे थे
28:38मंदोधरी अपने कोमल मुख पर गहरी चिन्ता लिये हुए, रावन के समीप आकर उन अप्षकुनों का अर्थ समझाने का प्रयास
28:46कर रही थी, पर उसके पती के मुख पर अभी भी कठोरता थी
28:51राजमहल के भीतर स्थापित प्राचीन दानव देवताओं और पूर्वजों की मूर्तियों से रक्त की धाराय बहने लगी, मानो वे भी
28:59इस आसन्न विनाश का शोक मना रही हो
29:03लंका का पूरा वातावर्ण भारी और दमनकारी हो गया, जैसे स्वयन धर्ती पर कोई भयानक अभिशाप उतर आया हो, जिससे
29:12हर आत्मा बोजिल महसूस कर रही थी
29:15रावन ने अपने भयभीत दर्बारियों को एक शाही हावभाव से यह दिखाते हुए विदा किया कि वह इन अप्शकुनों से
29:23अप्रभावित है, अपनी अटूट शक्ती का प्रदर्शन कर रहा था
29:28किन्तू अपने एकांत में, जब उसके चारों और केवल विशालकाय पर चाया थी, रावन के अहंकार के कवच में भी
29:36एक अंजाना थंडा भय धीरे-धीरे घर करने लगा
29:41एक अत्यंत सुक्ष्म, दिव्य गुन्जन, जो सामान्य राक्षसों के लिए अगोचर था, लंका के मूल में कमपन करने लगा, जो
29:49एक अप्रिहार्य और युग परिवर्तक बदलाव का संकेट था
29:54इन अप्षकुनों ने लंका के भविश्य पर एक काली छाया डाल दी, एक ऐसी नेती का संकेट देते हुए जिसे
30:01स्वयन ब्रहमाण भी अब बदल नहीं सकता था
30:05लंका में अंजाने भय के साथ साथ, तीनों लोकों में एक अप्रत्याशित उर्जा का संचार हो रहा था, जैसे कोई
30:13महान दिव्य शक्ती अपने आगमन की तैयारी कर रही हो
30:17देवलोक में समस्थ देवता, जिन में तेजस्वी देवराज, इंद्र और अन्य प्रमुख देवगन शामिल थे, भयभीत होकर भगवान विश्नु के
30:26समक्ष प्रकट हुए, जहां वे ब्रहमांड के भाग्य पर विचार विमर्ष कर रहे थे
30:32इधर अयोध्या में महाराज दशरत अपने भव्य कक्ष में चिन्ताग्रस्त मुद्रा में बैठे थे, उनकी आखों में संतानहींता का गहरा
30:41दुख और एक अनकही आशा दोनों ही साफ जलक रही थी
30:46उसी पल आकाश से एक दिव्य, अलोकिक किरण, जो मात्र शुद्ध हाशा का प्रतीक थी, सीधे अयोध्या की ओर उतरी,
30:55जैसे ब्रहमांड स्वय अपनी करुणा बरसा रहा हो
30:59रिश्यमुनियों के परामर्ष से अयोध्या में पुत्रकामिष्टी यग्य की भव्य तैयारिया शुरू हुई, जहां स्वर्नश्टित वेदियों और सुगंधित समिधाओं से
31:08वातावर्ण पवित्र हो उठा
31:11महर्शी वशिष्ट और रिश्यश्रिन मुनि अपनी दिव्य आभासे मंडित महाराज दश्रत को यग्य की जटिल विधियों और उसके फलदाई प्रभाव
31:20के बारे में समझा रहे थे
31:22पवित्र मंत्रों चार और वैदिक स्तुतियों के साथ पुत्रकामिष्टी यग्य की अग्नी प्रजवलित हुई जिसकी लप्तें आकाश को छूने लगी
31:31और संपूर्ण वातावर्ण को शुद्ध कर दिया
31:35जैसे ही यग्य अपने चरम पर पहुँचा अग्नी के मध्य से एक तेजस्वी दिव्यपुरुष प्रकट हुए जिनके हाथ में खीर
31:43से भरा एक स्वर्णिम पात्र था
31:46उस दिव्यपुरुष ने दश्रत को वह चमतकारी खीर प्रदान की जिसे संतान प्राप्ती के लिए अमरित के समान माना गया
31:54और उनका हृदय कृतग्यता से भर उठा
31:58महाराज दश्रत ने उस दिव्यप्रसाद को अत्यंत श्रद्धा और हर्ष के साथ ग्रहन किया उनकी आखों में बरसों की प्रतीक्षा
32:06का सुख और भविश्य की उम्मीद चमक उठी
32:10दश्रत ने वह खीर अपनी प्रियरानियों कोशल्या, कैकेई और सुमित्राक में समान रूप से वित्रित की जिन्होंने इसे परमश्रद्धा और
32:20संतान सुख की कामना के साथ ग्रहन किया
32:23खीर के प्रत्येक अंशने रानियों के भीतर प्रवेश करते ही एक अलौकिक उर्जा का संचार किया, जिससे उनके गर्भ में
32:32दिव्य चेतना का अंकुरन हुआ
32:35आने वाले महीनों में अयोध्या का पूरा राज्य एक उचसवपून उम्मीद में डूब गया, जैसे कि प्रकृति स्वयें एक महान
32:43आगमन की प्रतीक्षा कर रही हो, रानियों के गर्भ में जीवन पल रहा था
32:49स्वर्ग में देवतागन प्रसन्नता से जूम उठे, पुष्प वर्षा करते हुए अयोध्या की ओर निहार रहे थे, क्योंकि उन्हें ग्यात
32:57था कि ब्रह्मांड का उद्धार करता अब प्रित्वी पर अवतरित होने वाला है
33:03चैत्रमास की नवमी तिथी और अभिजीत मुहूर्ट का वह शुभक्षन आया, जब रानी कौशल्या ने अपने गर्भ में पल रहे
33:11दिव्य बालक के आगमन का संकेत महसूस किया
33:15पूरा ब्रह्मांड उस असाधारन पल के लिए अपनी सासे रोक कर खड़ा था, जब ग्रह और नक्षत्र स्वयं को एक
33:22पूर्नक दिव्य संरेखन में स्थापित कर रहे थे
33:26ठीक नवमी के दिन दोपहर के अभिजीत मुहूर्त में, रानी कौशल्या के कक्ष में एक अग्धुत प्रकाश फैल गया और
33:34भगवान श्री राम का पृत्वी पर अवतरण हुआ
33:39देवलोक में उत्सव मनाया गया, जहां देवता और गंधर्व जैगोश करते हुए, धोलन गाड़े बजाते और सुगंधित फूलों की वर्षा
33:47करते हुए, पृत्वी पर इस दिव्य आग्मन का अभिनंदन कर रहे थे
33:53इसके तुरंत बाद, रानी कैकेई ने भरत को और रानी सुमित्रा ने लक्षमन तथा शत्रुगन को जन्म दिया, जिससे अयोध्या
34:01का राजमहल चार दिव्य बालकों के आग्मन से जग्मगा उठा
34:06अयोध्या के प्रत्येक कोने में खुशी आछा गई, धोलन गाड़े बजने लगे और पूरा राज्य अपने चार राजकुमारों के आग्मन
34:14का जश्न मनाते हुए एक नए स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर हुआ
34:20अयोध्या के राजपथों पर आनंद की लहरें हिलोरें ले रही थी, जहां नागरिक नृत्य करते, गीत गाते और एक दूसरे
34:28को बधाया देते हुए इस अग्वितिय शुभ घडी का उत्सव मना रहे थे
34:34स्वर्गलोक में प्रजाप्ती ब्रहमा, अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन प्रित्वी पर हो रहे इस अग्वुत उत्सव को देखकर मंदमंद मुस्कुरा
34:42रहे थे, उनके चहरे पर संतुष्टी का भाव था
34:47महाराज दशरत तीनों रानियों के साथ अपने नवजात पुत्रों को गोद में लिये हुए एक अलोकिक प्रेम और आनन से
34:55उत्परोत थे, उनकी आखों में भविश्य की सुनहरी आशा चमक रही थी
35:00यह केवल चार राजकुमारों का जन्म नहीं था, बलकि धर्म की पुनरस्थापना और युग परिवर्तन के एक स्वर्णिम प्रभात का
35:09संकेत था, जो प्रित्वी पर शांती और न्याय का मार्ग प्रशस्त करेगा
35:15राजमहल में नामकरण संसकार की तैयारिया पूरे जोरशोर से चल रही थी, जहां हर कोना सुगंधित फूलों और दिव्य अलंकर्णों
35:23से सजाया जा रहा था, मानो स्वयन स्वर्ग उतर आया हो
35:28शीरसागर में भगवान विश्णु अपने शेशनाग शया पर विराजे, मंदमंद मुस्कुराते हुए प्रित्वी पर हो रहे इन शुब संकेतों का
35:37अवलोकन कर रहे थे, उनके नेत्रों में स्रिष्टी का कल्यान नहित था
35:42इसी शुब वेला में परम ज्यानी महर्शी वशिष्ट अपनी दिव्य आभासे मंदित राजमहल में प्रवेश कर रहे थे, उनके आगमन
35:51से वातावर्ण और भी पवित्र हो गया
35:54शुब मुहूर्त में यग्यवेदी पर प्रज्वलित अगनी पवित्र मंत्रो चार के साथ धधक उठी, जिसकी लप्टे आकाश की ओर उठकर
36:03देवलोक को संदेश दे रही थी
36:06नामकरण संसकार के लिए पूरा राजपरिवार और सभी प्रमुख रिशिमुनी यग्यशाला में एकत्रित थे, जहां दिव्यता और भक्ती का अनुपम
36:15संगम हो रहा था
36:18कैलाश परवत पर भगवान शिव गहन समाधी में लीन थे, किन्तु उनके तीसरे नेत्र में प्रित्वी पर हो रहे इस
36:25दिव्यकार्य का प्रतिविम्व स्पष्ट जहलक रहा था
36:29महर्शी वशिष्ठ ने प्रथम शिशु को गोध में लिया और वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए उसे राम नाम से पुकारा,
36:37जिससे वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा का संचार हो गया
36:42जैसे ही राम नाम का उच्चारण हुआ, आकाश से देवदुन्दुभी की ध्वनी गूंच उठी और स्वर्णिन पुष्पों की वर्षा होने
36:50लगी, मानो स्वयन देवलोक ने इस नाम को स्विकार कर लिया हो
36:55तदनंतर्क वशिष्ठ ने भरत, लक्षमन और शत्रुगन को भी क्रमशय उनके दिव्य नामों से अलंकृत किया, जिससे चारों दिशाओं में
37:04हर्ष और उल्लास की लेहर दोड़ गई
37:07स्वर्गलोक में देवराज इंद्र अपनी पतनी शची के साथ मंदार पुश्पों की वर्षा करते हुए इस अलौकिक द्रिश का अभिनंदन
37:16कर रहे थे, उनके चहरे पर प्रसंता जहलक रही थी
37:21नामकरण के उपरांत, महर्षी वशिष्ठ ने भविश्यदवानी की कि श्री राम धर्म की स्थापना करेंगे और प्रित्वी को अज्यान तथा
37:29अंधकार से मुक्त करेंगे
37:31यह केवल एक नाम नहीं, बलकि एक युग का संकल्प था, रामराज्य की स्थापना का, जहां हर प्राणी, सुख, शांती
37:40और सम्रिधी का अनुभव करेंगा
37:43वशिष्ठ ने आगे कहा कि श्री राम न केवल सनातन धर्म को पुनर स्थापित करेंगे, बलकि प्रित्वी पर व्याप्त सर्वोच
37:51अंधकार का भी विनाश कर, सत्य और न्याय का मार्ग प्रशस्त करेंगे
37:57वैकुंट में देवी लक्ष्मी, अपने पती भगवान विश्नु के साथ, इस दिव्य उद्गोशना को सुनकर आनन्दित थी, उनके मुख पर
38:06गर्व और सनेह का भाव स्पष्ट जलक रहा था
38:10उनकी गर्जनापूर्ण वानी में, रावन के अत्याचारों से पीडित प्रित्वी के लिए एक नए युग की आशा थी, जो शीघर
38:18ही अंधकार को चीर कर प्रकाश की ओर बढ़ेगी
38:22इस प्रकार अयोध्या, चार दिव्य बालकों के आगमन और वशिष्ट की भविश्यदवानी से आलोकित होकर एक भव्य और गौरवशाली भविश्य
38:31की ओर अग्रसर हुई, जहां धर्म का पता का सदैव उचा लहराएगा

Recommended