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अयोध्या लौट आए प्रभु श्रीराम, देवी सीता और लक्ष्मण के साथ विवाह दल का भव्य स्वागत होता है। प्रजा में आनंद और उत्सव का माहौल है, क्योंकि महाराज दशरथ श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा करते हैं। लेकिन यह खुशी अल्पकालिक साबित होती है, जब दासी मंथरा के विष भरे शब्दों से कैकेयी का मन दूषित हो जाता है। दो प्राचीन वरदानों का रहस्योद्घाटन होता है, और इन वरदानों की मांग से अयोध्या के भाग्य में कैसा भूचाल आता है? जानिए इस रोमांचक और हृदय विदारक कड़ी में पद्म पुराण के गहरे रहस्य! #PadmaPurana #Ramayan #RamRajyabhishek #KaikeyiVardan #RamVanvas #Dharma #Mythology #HinduPuranas #EpicStories
Transcript
00:00अयोध्या नगरी अपने भव्यद्वार पर श्री राम और देवी सीता के विवाह दल के आगमन की प्रतीक्षा में सजीध जी
00:07उत्सव के रंगों से जगमगा रही थी।
00:10उसी क्षण शीर सागर में भगवान विश्नु अपने विशालकाय शेशनाग पर विराजमान माता लक्षमी के साथ अयोध्या के इस शुभक्षण
00:20को मुस्कुराते हुए देख रहे थे।
00:22दूर से आते घोडों की टापों की ध्वनी और शंकनाद की गूंजने नगरवासियों के हृद्यों को हर्शोललास से भर दिया।
00:32जैसे ही श्रीराम और देवी सीता अपने रथ पर नगर में प्रवेश करते हैं, अयोध्या की हर गली दीपों से
00:39प्रकाशित होकर मानो स्वयन स्वर्ग से उतर आई हो।
00:44राजमहल के प्रांगण में महाराज दशरत, गुरु वशिष्ठ और अन्य कुलश्रेष्ठों के साथ अपने प्रिय पुत्र और पुत्रवधु का स्वागत
00:53करने के लिए खड़े थे।
00:55देवलोक में देवराज इंद्र अन्य देवताओं के साथ इस पवित्र मिलन को देखकर प्रसन्ता से मुस्कुरा रहे थे भविष्य की
01:04घटनाओं से अन्भिग्य।
01:06जैसे ही श्रीराम और सीता ने दशरत के चरण स्पर्ष किये, महाराज की आखों से अश्रुधारा बह निकली जो वर्षों
01:14के तप और प्रतीक्षा का परिणाम थी।
01:18अयोध्या का हर घर, हर गली, खुशियों के गीत गा रहा था। मानो स्वय देवी लक्ष्मी ने इस नगरी में
01:25अपना स्थाई वास कर लिया हो।
01:50महाराज ने कहा कि वे श्री राम को युवराज पद पर अभिशिक्त करना चाहते हैं क्योंकि राम ही राजधर्म का
01:57पूर्णत्या पालन कर सकते हैं।
02:18महार घर में खुशियों के दीपक जल उठे।
02:21नारग मुने अपनी वीना के साथ आकाश मार्ग से विचर्ण करते हुए, इन तयारियों को देखकर मंदमंद मुस्कुरा रहे थे,
02:29घटनाओ का पूर्वाभास रखते हुए।
02:33विशेश दूतों को दूर-दूर के राज्यों में आमंत्रित करने के लिए भेजा गया, ताकि सभी मित्र और संबंधित राजा
02:41इस भव्य समारोह का हिस्सा बन सकें।
02:44सर्यू नदी के घाटों पर पवित्रस नान और अनुष्ठानों के लिए भक्तों की भीड उमर पड़ी, मानो नदी भी इस
02:52शुब अफसर का उच्सव मना रही हो।
02:55राज्या भिशेक के दिन से ठीक पहले, अयोध्या का हर कोना, हर महल एक सुनहरी आभा से नहाया हुआ था,
03:03जो आने वाले शुब मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहा था।
03:07स्वर्ग लोक से अपसराय और गंधर्व, मधुर संगीत और नृत्य से वातावर्ण को और भी मनमोहक बना रहे थे, देवताओं
03:15की प्रसंता व्यक्त करते हुए।
03:18अयोध्या के बाजारों में स्वर्ण, वस्त्र और उफारों की दुकाने सज गई थी, जहां नागरिक अपने प्रिय राजा के लिए
03:26भेंट खरीदने उमड पड़े थे।
03:49जो अयोध्या के इस स्वर्णिन क्षन को अनंत काल तक अमर कर देने को आतुर थी।
04:44जो अयोध्या के भविष्य को बदल देने की क्षमता रखता था।
04:48उधर रानी कैकेई अपने कक्ष में बैठी थी।
04:53उनका मुखमंडल श्रीराम के राज्या भिषेक की कलपना मात्र से ही आनंद और संतोश से दमक रहा था।
05:01तभी कक्ष के द्वार पर मंत्रा प्रकट हुई, उसके आगमन से वातावर्ण में एक सुक्षमत असहज सा बदलावा गया, जैसे
05:09कोई काली छाया प्रवेश कर गई हो।
05:12मंत्रा ने कृत्रिन सहानु भूती का मुखोटा पहनकर कैकेई से बात शुरू की, उसके स्वर में एक अजीब सी मिठास
05:20थी जो भीतर से कड़वाहट लिये हुए थी।
05:23उसने श्रीराम के राज्याभिशेक की भव्यता की प्रशंसा करते हुए, धीरे से भरत के भविश्य पर संदेह के बीज बोए,
05:31जैसे मीठे शब्दों में विश मिलाया जा रहा हो।
05:35कैकेई ने पहले तो उसकी बातों को हंसी में उड़ा दिया, उन्हें अपनी प्रियदासी की अज्ञानता मात्र मान कर उनके
05:43मन में कोई दुरभावना नहीं थी।
05:46किन्तु मन्थरा ने अपनी बात पर द्रिढ रहते हुए, एक एक करके ऐसे तर्क दिये जो कैकेई के मन में
05:53संदेह का बीज बोने लगे, जैसे कठोर भूमी में छोटे-छोटे पत्थर रखे जा रहे हो।
06:00कैकेई का सरल हरिदय अब धीरे-धीरे मन्थरा के विशैले शब्दों से प्रभावित होने लगा था, उनके मुख मंडल पर
06:07चिन्ता की पहली रेखा उभराई।
06:12कि अनिश्चित्ता को कैकेई के सामने अैसे प्रस्तुत किया, मानूश्री राम के राज्या भिशेक से भरत और उनके सभी पुतरों
06:20का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
06:23कैकेई जो कभी राम को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती थी, अब मंथरा के शब्दों के प्रभाव में
06:30आकर अपने पुत्र भरत के प्रती चिंता में डूगने लगी थी
06:34तब मंथरा ने अंतिम प्रहार किया, कैकेई को राजा दश्रत द्वारा दिये गए दो अमूल्य वर्दानों की याद दिलाई, जिन्हें
06:43उन्होंने अतीत में युद्ध भूमी में दश्रत की जान बचाने पर प्राप्त किया था
06:48उन वर्दानों की स्मृती कैकेई के मन में बिजली की तरह कौन्ध गई, जो अब उनके पुत्र के भविश्य का
06:56एक मात्र मार्ग प्रतीत हो रहे थे
06:59मन्थरा ने कैकेई को समझाया कि यही सही समय है उन वर्दानों का उप्योग करने का, ताकि भरत का अधिकार
07:07सुरक्षित रहे और श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिले
07:12कैकेई का हृदय दो राहे पर खड़ा था, एक और श्रीराम के प्रती उनका अगाथ प्रेम और दूसरी और भरत
07:19के भविश्य की कालपनिक चिंता, जो अब वास्तविक्ता का रूप ले चुकी थी
07:25आखिरकार मंथरा की कुटिल चाल सफल हुई और कैकेई का मन मंथरा के विशैले शब्दों से पूरी तरह विदीन हो
07:33गया, उन्होंने अपने पुत्र के लिए अपने प्रियराम के विरुध जाने का निश्चय कर लिया
07:39अयोध्या पर अब एक गहरा, अंधकार मैं साया मंदराने लगा था, मानो स्वयन नेती ने श्री राम के राज्याभिशेक के
07:47क्षण को त्रास्दी में बदल देने का संकल्प कर लिया हो
07:51कैके इन्हें अपने महल के सबसे एकांत कक्ष, जिसे कोप भवन कहा जाता था, में स्वयन को बंद कर लिया
07:59था, जहां अंधकार और घोर उदासी का सामराज जिस्थापित हो चुका था
08:04जैसे ही यह विपत्ति जन्ग घटना घटित होने लगी, वैकुंठ में भगवान विश्नु, अपनी पत्नी लक्ष्मी और गरुर के साथ
08:12इस मानवियत रास्दी के मूख साक्षी बने हुए थे, उनके मुख पर नेती की गंभीरता स्पष्ट थी
08:20महाराज दश्रत, श्रीराम के राज्याभिशेक की प्रसन्नता में डूबे हुए, कैके के अचानक कोप भवन में चले जाने की खबर
08:28सुनकर विचलित हो उठे और तुरंत उन्हें मनाने हेतु उनकी ओर चल पड़े
08:34कोप भवन के द्वार पर आकर महाराज दश्रत ने एक पल को ठिटका, जहां से एक अनकही त्रासदी की काली
08:42चाया उन्हें अंदर खीच रही थी, मानो द्वार के पीछे स्वया नेती प्रतीक्षा कर रही हो
08:49भीतर कैकेई मैले वस्त्रों में अपने बाल बिखेरे जमीन पर पड़ी हुई थी, उनकी आखों से आसू तो नहीं बह
08:57रहे थे, पर उनका मुख पत्थर की भाती कठोर हो चुका था
09:02कैलाश परवत पर भगवान शिव जिनका विशालकाय और ध्यानमगन स्वरूप सदैव स्थिर रहता है, उन्होंने भी अपनी योगनिद्रा में इस
09:11आगामी विपदा के संकेट महसूस किये, उनके त्रिपुंडर पर चिन्ता की हलकी रेखा उभराई
09:18दशरत ने प्रेम से उन्हें उठाया और उनके बिखरे केशों को समबारते हुए समझाया कि राज्याभिशेक का शुभ महुर्ट निकट
09:26है और उनका ऐसा व्यवहार पूरे राज्य को दुखित कर रहा है
09:32किन्तु कैकेई की ओर से कोई उत्तर नहीं आया, केवल एक गहरी, लंबी सांस की ध्वनी ही उनके होठों से
09:39निकली, जो आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी
09:44दश्रत ने अपनी प्रियरानी को शांत करने के लिए उनसे किसी भी इच्छा की पूर्ती का वचन दिया, यह स्मरन
09:51दिलाते हुए कि वे उनके दो वर्दानों के रिनी है
09:56ब्रहमांड के रचिता, चतुरमुखी भगवान ब्रहमा, अपने कमल के आसन पर विराजमान होकर दिव्य द्रिष्टी से अयोध्या की ओर देख
10:05रहे थे
10:05उनकी आखों में स्विजन के अनंत चक्र का ज्यान और इस मानविय दुर्बलता पर हलका विस्मय था
10:13तभी कैकेई ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों से दशरत की ओर देखा, उनके स्वर में एक ऐसी द्रिड़ता थी जो हृदय
10:20विदारक थी, और उन्होंने अपने पहले वर्दान की मांग रखी, भरत को अयोध्या का राज्याभिशेक दिया जाए
10:29यह सुनते ही दशरत के हाथ कैकेई के कंधे से फिसल गए, उनका मुख पीला पड़ गया, और उनके हृदय
10:36में एक तीखा दर्द उठा, जैसे किसी ने उनके स्वपनों को खंजर से बेध दिया हो
10:43दशरत ने भरत को राज्याभिशेक देने के प्रस्ताव पर विस्मय से कहा कि यह कैसे संभव है, जब श्री राम
10:50को युवराजपद के लिए पहले ही निश्चित कर दिया गया है, और अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही है
10:58देवर्शी नारद अपने वीना के मधुर स्वरों को थामे हुए, तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए, इस अप्रत्याशित घटना के
11:06साक्षी बने, उनके मुख पर गंभीर, चिंतन और भविश्य की घटनाओं का पूर्वा भास पश्ट था
11:13कैके इने दशरत की व्याकुलता को अंदेखा करते हुए, अपनी आखें सीधी उनकी आखों में गड़ा दी और अविचल भाव
11:21से अपने दूसरे और अधिक भयावह वर्दान की माम की श्री राम को 14 वर्षों का वनवास दिया जाए
11:29यह घोशना सुनते ही दशरत की आत्मा काप उठी, उनके शरीर से जैसे प्राण निकल गए और वे कोप भवन
11:36के फर्ष पर मूर्चित होकर गिर पड़े, उनका मुकुट उनसे दूर छिटक गया
11:42कोप भवन में सन्नाटा चा गया, केवल दशरत की धीमी, कश्टमय सासों की ध्वनी ही सुनाई पड़ रही थी, और
11:50कैकेई की आखें अब भी स्थिर, पर भीतर ही भीतर पश्चाताप की अगनी से जल रही थी
11:57स्वर्ग में देवगन और गंधर्व जो अयोध्या के इस दुखद क्षण को देख रहे थे, उनके चहरे पर चिंता और
12:04निराशा के भाव स्पष्ट थे, जैसे कोई अप्रत्याशित वजर्पात हुआ हो
12:10महाराज दशरत को कुछ देर बाद होशाया, पर उनकी आवाज लडखडाने लगी थी, उन्होंने अपनी रानी के चर्णों में गिरकर
12:19इस क्रूर वर्दान को वापस लेने की भीख मांगी, उनके अश्रु अन्वरत बह रहे थे
12:25परंतु कैकेई मंत्रा के वचनों से बंधी हुई, अपने निश्चय पर अटल रही, उनके चहरे पर एक कठोर्ता थी जो
12:33प्रेम और करुणा की हर किरण को भस्न कर रही थी, और अयोध्या का भाग्य अब एक अनिश्चित अंधकार की
12:40ओर बढ़ रहा था
12:42महाराज दश्रत अत्यंत व्यथित होकर कैकेई की ओर देखने लगे, जिनकी कठोर्ता उनके हृदय को एक तीखे प्रहार की भांती
12:51चलने कर रही थी
12:53उधर देवलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवता दुखी मन से इस द्रिश्य को देख रहे थे, क्योंकि वे जानते
13:01थे कि नेती के इस करूर चक्र को रोकना असंभव था
13:06कापती हुई आवाज में महाराज ने कैकेई को रगुकुल की उस पवित्र मर्यादा का स्मरण कराया, जिसे उनका यह कठोर
13:14निर्ने सदा के लिए दूशित कर देता
13:17कक्ष में टिम्टिमाते दीपक मानो इक्ष्वाकु वंश के उस महान यश के बुझने का संकेत दे रहे थे, जो अब
13:24तक पूरे ब्रहमांड में आलोकित था
13:28दशरत ने कैकेई को चेतावनी भी दी कि यदी श्रीराम वन गए, तो अयोध्या की पूरी प्रजा इस अन्याय के
13:35विरुध रोश से भर उठेगी
13:38परंतु कैकेई के चेहरे पर गया का कोई भाव नहीं आया, और उन्होंने राजा को उनके दिये गए दो वचनों
13:45की अचल सत्यता याद दिलाई
13:48अपने ही धर्म और सत्यनिष्ठा के बंधन में बंधे महाराज दश्रत का हरिदय इस भयानक असहे पीडा से विदीर्ण होने
13:56लगा
13:57फर्ष पर गिरी हुई स्वर्ण मालाये और बिखरे हुए आभूशन उस महान सामराज्य के बिखराव का मुख प्रतीक बन चुके
14:05थे
14:18सत्यलोक में ब्रहमाजी और ब्रहमर शिगन इस कठोर धर्म संकट को देख कर मौन रहे क्योंकि वे कालचकर के विधान
14:26को भली भानती समझते थे
14:29दशरत ने अंतिम प्रयास करते हुए कैकेई से अपना सर्वस्व, अपना जीवन और सिनहासन मांगने की भीख मांगी पर राम
14:37को न छोड़ने की विंती की
14:40कैकेई की विशाल पर छाई राजा के टूट चुके स्वरूप पर इस प्रकार पड़ रही थी मानो अंधकार ने अयोध्या
14:47के सूर्य को पूरी तरह ढख लिया हो
14:50भोर की पहली किरण आने ही वाली थी, लेकिन उस कक्ष के भीतर का अंधकार और अधिक गहरा और असहय
14:58होता जा रहा था
15:00कैके इने निश्ठुर्ता पूर्वक अंतिम शब्द कहे कि यदी वचन पूरा न हुआ, तो महाराज संसार में असत्यवादी और कलंकित
15:08कहलाएंगे
15:10यह कठोर आघात सहने में असमर्थ होकर वृद्ध राजा का शरीर कामप उठा और वे अपने स्थान से पीछे की
15:18ओर धै गए
15:20प्राची दिशा में उदित होता प्रभात तारा अयोध्या पर आने वाले अथांग दुख के महास्मुद्र की पूर्वसूचना दे रहा था
15:29पूरा कोप भवन एक भयावह सन्नाटे में डूब गया जहां अयोध्या के प्रतापी राजा अपनी ही रानी के चर्णों में
15:36पराजित पड़े थे
15:39अद्रिश्य रूप से आकाश में उपस्थित देवगणों की आखों से अश्रुबह निकले जब उन्होंने एक पिता की यह हृदय विदारक
15:47स्थिती देखी
15:49महाराज के मुख से अंतिमबार श्रीराम का नाम एक कापती हुई फुस्फुसाहट के रूप में निकला जिसके बाद वे पूरी
15:57तरह संग्याहीन हो गए
15:59मूर्चित राजा को घेरते हुए अंधकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि अयोध्या का सूर्य अब अस्थ होने की कगार
16:07पर पहुंच चुका है
16:10संग्याहीन महाराज दश्रत के इर्दगिर्द खडी रानिया और सेवक गण उनकी आखों में भय और आगामी अन्होनी का स्पष्ट आभास
16:18था
16:20सुदूर वैकुंठ में भगवान विश्णु अपनी शांत मुद्रा में भी अयोध्या पर मंडराते इस गंभीर संकट को भलीभाती देख रहे
16:28थे
16:29मानो वे ब्रहमांड की हर पीडा को आत्मसाथ कर रहे हूँ
16:34सुमंत्र ने व्याकुल हृदय से कौसल्या माता को सहारा दिया जिनकी आखों से अश्रुधारा अविरल बह रही थी जबकी वे
16:42महाराज के निर्जीव शरीर को एक तक देख रही थी
16:47जैसे जैसे अंधकार की चादर घनी होती गई अयोध्या के भव्य राज महल की हर दिवार पर एक अनकहा भय
16:54और शोक की छाया पसरने लगी मानो भविष्य अपनी विक्राल आकरिती दिखा रहा हो
17:01महल के भीतर धीरे धीरे यह भयावह समाचार फैलने लगा और हर सेवक के चहरे पर चिंता की रेखाएं गहराती
17:09जा रही थी
17:09मानो वे किसी अद्रिश्य आपदा के आगमन का पूर्वाभास कर रही हूँ
17:15कैलाश परवत के शांत शिखर पर विराजमान भगवान शिव अपनी गहन समाधी में भी अयोध्या के इस अप्रत्याशित संकट को
17:24अपने त्रिकालदर्शी नेत्रों से अनुभव कर रहे थे
17:28अपने कक्ष में बैठी रानी कैकेई के मुख पर एक अविचल द्रिडता थी, उनकी आखें किसी गहरी प्रतिज्या की साक्षी
17:36थी, मानो वे अपने भविश्य के हर कदम को पहले ही तै कर चुकी हो
17:42अयोध्या के राजसिनहासन के उपर लटकी हुई शाही छत्रचाया अब डग्मगा रही थी, मानो स्वयन नेती भी इस अनपेक्षित मोर
17:50पर विचलित हो उठी हो
17:53दूर्ग श्रीराम के महल में अभी भी राज्याभिशेक की प्रसन्ता भरी तैयारिया चल रही थी, जहां हर और उत्सव का
18:01एक अद्रिश्य स्वर गूँज रहा था
18:04अपने कमलासन पर विराजमान स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा भी इस अलौकिक द्रिश्य के मूख साक्षी थे, जो जानते थे कि
18:12यह नेती का ही एक क्रूर खेल है
18:16इसी बीच अत्यंत व्याकुल सुमंत्र अपने घोडे को सरपट डोडाते हुए, श्री राम के महल के द्वार पर पहुँचे, उनके
18:24चहरे पर चिंता और कर्तव्य का स्पष्ट मिश्रन था
18:28श्री राम अपने सहज सौमे स्वभाव में लीन, आने वाली इस विकट परिस्थिती से अन्भिग्य अपने कक्ष में धर्म ग्रंथों
18:36का अध्ययन कर रहे थे
18:39श्री राम अपने पिता के कष्ट का समाचार सुनकर तुरंत कैकेई के कक्ष की गोर चल पड़े, उनके हर कदम
18:46में चिंता और शीघरता का भाव था
18:50देवर्शी नारद अपने वीना के मधूर तारों को छेड़ते हुए इस ब्रहमांडिय नाटक के हर पल को अपनी दिव्यद्रिष्टी से
18:58देख रहे थे और धर्म की महिमा का गुनगान कर रहे थे
19:03कैकेई के कक्ष में प्रवेश करते ही, श्रीराम ने एक ही पल में अपने पिता की असहनिय पीडा और माता
19:10के कठोर निश्चय को भाप लिया
19:13उसक्षन समय थमसा गया, और कैकेई के मौन में एक तूफान छिपा था, जिसकी आहट श्रीराम के धैर्यवान हृदय तक
19:21पहुँच रही थी
19:23कैकेई ने अपने दोनों वर्दानों की मांग करना शुरू किया, और उनके हर शब्द के साथ अयोध्या का भविश्य एक
19:31गहरी खाई में धनस्ता जा रहा था
19:34स्वर्गलोक में उपस्थित देवगण अपनी आखों में अशुरूलिये इस हृदय विदारक ग्रिश को देख रहे थे, जहां धर्म की परीक्षा
19:43एक पुत्र के सर्वोच बलिदान की मांग कर रही थी
19:47बिना किसी हिचकिचाहट या क्रोध के, श्रीराम ने पिता की प्रतिग्या और माता के वचनों को सहर्ष स्विकार कर लिया,
19:55उनके मुख पर अलौकिक शांती और ग्रिड़ता थी
19:59राज्या भिशेक का स्वप्न बिखर चुका था, पर श्रीराम के शांत स्विकार ने धर्म के एक नए अध्याय की नीम
20:06रखी, जहां त्याग ही सर्वोच राजधर्म था
20:11अयोध्या का भव्य प्रांगन, जहां कुछ क्षन पूर्व खुशियों का उच्सव मनाया जाने वाला था, अब एक गहरी चुप्पी और
20:18अनश्चित्ता के भारी साए में डूब चुका था
20:22मा कौशलया, जिनका हृदय पुत्र वियोग की आशंका से विदीन हो रहा था, अपनी आखों में उमरते अश्रुलिये, श्री राम
20:30के इस अटल निर्नय को विवश्टा से देख रही थी
20:35महल के कक्ष में, श्री राम ने अपने राजसी वस्त्रों का त्याग कर, तपस्वी के समान साधारन वलकल वस्त्रधारन करना
20:43आरंभ किया, उनका मुखमंडल अभी भी शांत और अविचल था
20:48स्वर्ण जडित राजमुकुट, जो कुछ क्षन पहले तक उनके शीश पर शोभायमान होने वाला था, अब एक कोने में पड़ा,
20:56वैभव और त्याग के बीच की गहरी खाई का प्रतीक बन गया था
21:01जैसे ही वंगमन का दारोन समाचार देवी सीता तक पहुँचा, उनका हृदय विलाप से भर उठा, पर तुरंत ही वह
21:09अपने पती के चर्णों में जाने के लिए द्रिड संकल्पित हो गई
21:14व्याकुल हृदय लिए देवी सीता श्री राम के समक्ष उपस्थित हुई, उनकी आखों में असीम प्रेम और पतिवर्ता धर्म का
21:22अडिक संकल्प स्पष्ट जलक रहा था
21:25श्री राम ने सीता को वन के कश्टों और पेरिल्स का वर्णन कर उन्हें अयोध्या में ही रहने का आग्रह
21:32किया, पर सीता का द्रिड निश्चे किसी भी तर्क से डिगने वाला न था
21:37उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था, मानो वह कह रही हों कि पती के बिना उनका जीवन निर्विहीन सरिता
21:45के समान निश्प्राण है
21:48इसी बीच भ्रात्री प्रेम से उतप्रोत लक्षमंड भी उस कक्ष में पहुँचे, उनका हृदय अपने अग्रच के वनगमन के विचार
21:56से विचलित और क्रोधित था
21:59लक्षमंड ने श्रीराम के चर्णों में गिरकर उनके साथ वन जाने की अनुमती मांगी अपने भ्रात्रिधर्म का पालन करने का
22:07द्रिड संकल्प व्यक्त करते हुए
22:09श्री राम ने लक्षमन को भी अयोध्या में रुक कर परिवार और राज्य की रक्षा करने का आदेश दिया, पर
22:16लक्षमन की भ्रात्र भक्ति किसी भी तर्क से उपर थी
22:21लक्षमन का द्रिड संकल्प उनके नेत्रों में अगनी के समान प्रजवलित था, मानों वे कह रहे हों कि श्री राम
22:28के बिना उनका अस्तित्व अर्थहीन है
22:31अंतर सीता के पतिवर्ता धर्म और लक्षमन की अध्वितिय भ्रात्र भक्ती को देख कर श्री राम ने उन्हें अपने साथ
22:39वन ले जाने का निर्णय कर लिया, उनके हृदय में प्रेम और त्याग का अध्भुत संगम था
22:46श्री राम के मुख पर अब स्विकार का एक शांत भाव था, उन्होंने अपने प्रियजनों के अटूट प्रेम और निष्ठा
22:53के सामने अपनी चिन्ता को त्याग दिया था
22:57सीता और लक्षमन ने भी अपने राजसी वैभव का त्याग कर तपस्वियों के समान साधारन, वस्त्र और आभूशन धारन कर
23:05लिये, वन्गमन के लिए स्वयन को तयार करते हुए
23:09महल के द्वार से बाहर दिखने वाला घनावनमार्प अब उनके लिए एक नई अनिष्चित यात्रा का आहवान कर रहा था,
23:17जहां परीक्षाएं और त्याग प्रतीक्षा कर रहे थे
23:21अब अयोध्या का वह भव्य प्रांगण, जहां कभी राज्याभिशेक की तयारिया चल रही थी, उन तीनों के अंतिम प्रस्थान की
23:29प्रतीक्षा में एक उदास चुप्पी ओढ़े खड़ा था
23:34दूर खड़ी माता कौशल्या और सुमित्रा, अपने पुत्रों के इस्तियाग को देख, फ्रिदय में अपार पीडा लिये भी उनके द्रिड
23:41संकल्प पर गर्व महसूस कर रही थी
23:45श्रीराम, सीता और लक्षमन ने सभी राजसी सुखों का परित्याग कर अयोध्या के भव्य द्वारों से वनकी ओर अपने पहले
23:54कदम बढ़ाए एक नए युग की शुरुवात करते हुए
23:58जैसे ही वे तीनों अयोध्या की सीमा पार कर गये, अस्थ होता सूर्य अपनी अंतिम किर्णों से अयोध्या को अल्विदा
24:06कह रहा था, मानों एक गौरवशाली अध्याय का समापन हो रहा हो
24:11अयोध्या की सीमाओं को पार करते ही, श्रीराम, सीता और लक्षमन ने अपने हृदय में एक अथा पीडा के साथ
24:19अज्यात वन मार्ग पर अपने कदम बढ़ाए, जहां भविश्य अंधकार्मय लग रहा था
24:25वैकुंठ में भगवान विश्णु अपनी गंभीर मुद्रा में तीनों के इस अप्रत्याशित त्याग और आने वाले संधर्शों को शांत भाव
24:34से देख रहे थे, क्योंकि यह सब एक व्रिहत दिव्य योजना का ही अंग था
24:40राजसी सुखों और वैभव को त्याग कर उनके पैरों ने अब वन की कंटीली राहों पर नंगे चलना शुरू कर
24:47दिया था, जो उनके द्रिड संकल्प और धैर्य का प्रतीक था
24:52आदे का मार्ग अंजाना और घना जंगल था, जहां संध्या की गहरी होती चायाएं भविश्य की अनिश्चित्ता और कठिन परीक्षाओं
25:00का संकेट दे रही थी
25:03अयोध्या की भव्यता को पीछे छोड़ कर, तीनों ने अब घने वन में प्रवेश किया, जहां प्रकृती की शांत खामोशी
25:11उनके हृदय के गहरे विशाद को और बढ़ा रही थी
25:15कैलाश परवत पर भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे, किन्तु उनके त्रिनेत्र में अयोध्या के इस हृदय विदारक द्रिशी
25:23की करुना साफ जहलक रही थी
25:26अयोध्या वासी अपने प्रिय राजकुमारों के जाने के गम में नगर के द्वारों पर अश्रुपूर्ण नेत्रों से खड़े थे, मानो
25:34उनका जीवन ही रिक्थ हो गया हो
25:37अयोध्या के भव्यद्वार जो कभी उत्सवों से गूंचते थे, अब सूने और उदास खड़े थे, मानो अपने प्रिय राजकुमार के
25:46साथ उनकी चमक भी लुप्थ हो गई हो
25:49वे तीनों अब और भी गहरे जंगल में उतर गए थे, जहां पेडों की पत्तियां और शाखाएं एक दूसरे से
25:56मिलकर एक प्राकृतिक छत बना रही थी, जो उन्हें बाहरी दुनिया से अलग कर रही थी
26:03स्रिष्टिकर्ता ब्रह्मा अपने दिव्य लोग से इस विरह की बेला को ध्यान पूर्वक देख रहे थे, जिसके परिणाम में धर्म
26:11की पुनह स्थापना होनी थी
26:14महाराज दशरत अपने महल के एकांत कक्ष में, श्रीराम के वियोग में गहरे शोक में डूब गए थे, उनका हरिदय
26:21पीडा से विदीर्ण हो रहा था
26:24महल के एकांत गलियारों में एक अकेला दीप तिम्टिमा रहा था, जो राजा दशरत के हरिदय में शेश बची आशा
26:32की एक शीन लौ का प्रतीक था, जो बुझने को थी
26:37जैसे जैसे रात गहराती गई, वे तीनों एक शांत नदी के किनारे रुके, जहां तारों भरा आकाश उनके लिए एक
26:45मात्र छत था और धरती ही उनका शयन था
26:49देवर्शी नारद अपनी वीना के मधूरतारों पर करुणा का राग छेड़ते हुए, इस अलौकिक ग्रिश के साक्षी बन रहे थे,
26:57जानते हुए कि यह त्याग अंत्त विजय में बदलेगा
27:02देवी सीता सभी कष्टों को धैर्य पूर्वक सहते हुए, अपनी साधारन वेशभूशा को ग्यवस्थित कर रही थी, उनके चहरे पर
27:10कोई शिकन नहीं थी, केवल एक शान्त ग्रिड़ता थी
27:15पूर्ण चंद्रमा आकाश में अपनी शीतल चांदनी बिखेर रहा था, जिसकी लंबी चायाएं वन की गहन शान्ती और उनके अकेलेपन
27:24को और गहरा कर रही थी
27:26प्रातय काल के प्रथम प्रकाश के साथ, तीनों ने पुनह अपनी यात्रा प्रारंभ की, अब जंगल ही उनका एक मात्र
27:34साथी और गंतव्य था
27:37भूमी देवी अपने पुत्रों के इस्तियाग और ग्रिडता को देख करुणा से भर उठीन, उनके कनकन में पीडा और गौरव
27:45दोनों समाहित थे
27:47लक्षमन अपनी निस्वार्थ भक्ती के साथ, श्रीराम और सीता के आगे-ागे चल रहे थे, हर बाधा को दूर करते
27:55हुए, उनकी सुरक्षा का संकल्प लिए
27:58घनी पर्णशाला से छनकर आती सूर्य की किरने, एक नए अज्यात और चुनोती पूर्ण मार्ग पर प्रकाश डाल रही थी,
28:07जिसके हर मोड पर एक नई परीक्षा उनका इंतजार कर रही थी
28:12श्रीराम, सीटा और लक्षमन आगे बढ़ते रहे, उनके पैरों के नीचे की सूखी पत्तिया उनके वनगमन की मौन गाथा कह
28:20रही थी
28:22स्वर्ग लोक में भगवान विश्णू, जो समस्थ स्रिष्टी के पालक हैं, इस अनहोनी को शांट चित्त से देख रहे थे,
28:30उनके हृदय में एक गहरा अर्थ छिपा था
28:33उधर अयोध्या में महाराज दश्रत अपने कक्ष के एकांत में, श्रीराम के वनगमन के विचार से हृदय विदारक पीडा में
28:42डूबे हुए थे
28:43पूरी अयोध्या नगरी पर शोक की एक गहरी चादर बिच गई थी, जहां कभी उद्सवों की गूंज होती थी, वहां
28:51अब सिर्फ मौन और उदासी पसरी थी
28:55महाराज के निजी कक्ष, जो कभी उनके राजसी वैभव के साक्षी थे, अब उनकी अनुपस्थिती में गहरे शून्य और वीरानगी
29:03से भरे थे
29:05देवर्शी नारद अपने वीना के तारों पर एक विशाद भरा राग छेड़ते हुए, इस दुखद घटना को उपर से देख
29:13रहे थे, जिसके पीछे की दैविय योजना उन्हें स्पष्ट दिख रही थी
29:18दुहक से संतप्त महारानी कौशल्या और सुमित्रा महाराज दशरत के पास बैठी थी, उन्हें धान्स बंधाने की हर संभव कोशिश
29:27कर रही थी
29:29महल के एक कोने में एक दीपक की लौ टिंटिमा रही थी, मानो अयोध्या की आशा भी उसी के साथ
29:37मंद पड़ रही हो
29:39राज दर्बार जो कभी न्याय और निर्नय का केंद्र था, अब वीरान पड़ा था, समराट के बिना उसकी भव्यता भी
29:47फीकी पड़ गई थी
29:49स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा भी अपने कमल सिनहासन पर विराजित इस दुखद नेती पर चिंतन कर रहे थे, जिसके सूत्र उन्ही के
29:57द्वारा बुने गए थे
29:59पुत्र वियोग में दशरत को अचानक श्रवन कुमार के माता पिता द्वारा दिया गया, वह भयावः श्राप यादा गया, जिसने
30:08उनके वर्तमान दुख की भविश्यवानी की थी
30:11उस श्राप की छाया उनके मन पर गहराती जा रही थी, जैसे श्रवन कुमार की छवी एक धुन्धली स्मृती बनकर
30:19उन्हें सता रही हो
30:21महल के गलियारे जो कभी शाही कदमों और खुशियों की आवाज से गूँजते थे, अब एक गहरी चुप्पी और अनिष्ट
30:29की छाया से ढखे हुए थे
30:32कैलाश परवतपर, भगवान शिव और देवी पारवती, तपस्यामेलीन इस दुखद घटना को ब्रहमांडिय संतुलन के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप
30:42में देख रहे थे
30:44पुत्रवियोग की असहनिय वेदना ने महाराज दशरत के शरीर को जरजर कर दिया था और उनका जीवंदीप मंद पढ़ने लगा
30:52था
30:53उनकी आखों की चमक मंद पढ़ती जा रही थी, जैसे प्राण धीरे धीरे उनके शरीर का साथ छोड़ रहे हुँ
31:02महल के सेवक और दासिया दर्वाजों के पीछे खड़ी, आखों में आसूलिये, अपने प्रिय महाराज के अंतिन क्षणों की साक्षी
31:10बन रही थी
31:12आकाश में देवगण और रिशिमुनी एक दिव्य सभा में एक महान राजा के दुखद अंत को मौन श्रद्धा से देख
31:20रहे थे, जिसके भाग्य में यह वियोग लिखा था
31:24श्रीराम का नाम फुस्फुस आते हुए, महाराज दशरत ने अंत्ता अपने प्राण त्याग दिये, उनके मुख पर एक शांत अंतिन
31:32संतोष का भाव था
31:35महाराज के देहांत के साथ ही, अयोध्या नगरी पर एक अथा अंधकार छा गया, मानो सूर्य भी अपने प्रियराजा के
31:43निधन पर शोक मना रहा हो
31:46महाराज के देहांत के साथ ही, अयोध्या नगरी पर एक अथा अंधकार छा गया, मानो सूर्य भी अपने प्रियराजा के
31:53निधन पर शोक मना रहा हो
31:55इसी गहन शोक के बीच अपने मामा के यहां से लोटकर राजकुमार भरत और शत्रुभन का रत उदास और सुनसान
32:03अयोध्या के द्वार पर आकर रुका
32:06नगर की असामान्य चुप्पी और उदासी देखकर बलशाली राजकुमार भरत जिनका चहरा यात्रा की थकान से थोड़ा मैला था
32:15अपने विशाल और मजबूत काया के बावजूद अचानक छाय सन्नाटे से अचमभित थे उनके गहरे भावक नेत्रों में एक अजीब
32:24सी बेचैनी उभराई
32:26भरत के छोटे भाई साहसी शत्रुगन अपने भाई के समान ही तेजस्वी लेकिन स्वभाव से अधिक त्वरित ने एक पहरेदार
32:34को देखा जो उदासी में सिर जुकाए था और उससे नगर की इस तब्धता का कारण पूछा जिसकी आवाज उदास
32:42हवा में गूंज उठी
32:44पहरेदार ने आसु भरी आखों से कुछ बुद्बुदाया जिसके बाद महल के भीतर से एक रिदय विदारक चीक और रोनेधोने
32:52की आवाजे सुनाई दी जिसने भरत और शत्रुगन को यह भयानक सत्य समझा दिया कि अयोध्या पर कोई गंभीर संकट
33:00आया है
33:03भयभीत और विचलित होकर भरत ने बिना किसी और पल की देरी के अपने मजबूत पैरों पर दोड़ते हुए उदास
33:10पड़े महल के भीतर कदम रखा जहां हर कोने से शोक और अनाथता की गहरी पीडा फूट रही थी
33:18अंदर पहुचते ही भरत ने अपने पूजय गुरु महर्शी वशिष्ट को देखा जो अपनी लंबी सफेद दाढ़ी और शांत तेजस्वी
33:27चहरे पर गहरी पीडा लिये बैठे थे और उनके पास दोड़ कर उन्होंने अपने पिता और श्री राम के कुशलक्षेम
33:34के बा
33:47और लक्षमन के उनके साथ जाने का दुखद समाचार सुनाया जिससे भरत का हृदय विदीन हो गया
33:55जैसे ही गुरु के शब्द उनके कानों में पड़े भरत का पूरा संसार डगमगा गया वे एक तूटे हुए पेड
34:02की तरह जमीम पर गिर पड़े उनका शक्तिशाली शरीर शोक और अविश्वास के अथा सागर में डूग गया और एक
34:10चीक उनके हृदय से निकली जिसने म
34:12महल की दीवारों को हिला दिया फृदय विदारक समाचार ने भरत को तोर दिया था और क्रोध की ज्वाला उनके
34:20भीतर भड़क उठी वे अपने आसू पोंचते हुए महल के उन गलियारों से गुजरे जहां से वे बचपन में श्रीराम
34:28के साथ खेलते थे अब सीधा अपनी
34:30माता कैकेई के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे भरत अपने क्रोधित कद्मों से कैकेई के कक्ष में घुसे जहां
34:39कैकेई अपने शाही आसन पर बैठी थी उनका रूप अभी भी रीगल और सजीला था लेकिन उनकी आखों में एक
34:46अजीब सी शितलता और एक अद्रिश अपराध
34:49बोध की जलक थी जो अयोध्या के शोक के विप्रीत थी भरत उनके विशाल शरीर में क्रोध की आग भड़क
34:58रही थी ने अपनी मा कैकेई के सामने खड़े होकर गरचते हुए पूछा की उन्होंने यह सब क्यों किया उनके
35:05वचन और उनके प्रियराजा के जीवन का क्या ह�
35:10क्रोधिप भरत ने अपनी माता को धिकारते हुए कहा कि उनके दो वर्दानों ने केवल श्रीराम को वनवास नहीं भेजा
35:17बलकि अयोध्या के सूर्य महाराज दशरत को भी सदा के लिए अस्त कर दिया जिससे उनके कुल और राज्य पर
35:25घोर कलंक लगा है
35:27भरत के कड़वे वचनों से शत्रुघन का हरिदय भी क्रोध से भर उठा और उन्होंने तुरंट महल के भीतर मंथरा
35:35की खोज शुरू कर दी जो इस पूरी त्रास्दी की जड़ थी उनके मुख पर प्रतिशोध का भाव स्पष्ट था
35:43शत्रुघन ने जल्द ही कुबडी मंथरा को पा लिया उसका शरीर व्रिधावस्था और भय से कांप रहा था और अपने
35:50क्रोधांध भाई की तरह ही शत्रुघन ने उस पर जपटकर उसे बाल से पकड़ लिया उसका भयावा चेहरा आसु और
35:58डर से भर गया
36:00क्रोधित शत्रुघन मंत्रा को घसीटते हुए ले जा रहे थे और उसे दंडित करने वाले थे जब भरत ने अपने
36:08गहरे दुरख और क्रोध के बावजूद भाई को रोक कर समझाया कि ऐसी अधर्म भरी क्रूरता भले ही कितनी भी
36:15योग्य क्यों न लगे उचित नहीं है
36:29पर नहीं बैठेंगे जिस पर उनके बड़े भाई श्री राम का अधिकार है अपनी प्रतिग्या के साथ भरत ने घोशना
36:38की की वे स्वयन श्री राम को वन से वापस लाने के लिए प्रस्थान करेंगे और जब तक उनके प्रिय
36:44भाई वापस नहीं आ जाते तब तक वे अय
36:59कि वे उनके छोटे भाई के रूप में उनका राज्य और उनके आदर्शों की रक्षा करेंगे जब तक कि वह
37:06लोटकर अपना राइटफुल स्थान ग्रहेंड न कर लें
37:10इसके बाद भरत ने तुरंट अपने मंत्रियों और सेनाप्तियों को आदेश दिया कि वे श्री राम को वन से वापस
37:17लाने के लिए एक विशाल सेना और सामगरी तयार करें अपने मुख पर एक द्रिड संकल्प का भाव लिये हुए
37:25भरत की इस द्रिड प्रतिग्या और निस्वार्थ प्रेम ने अयोध्या पर छाए घने अंधकार में आशा की एक छोटी किरन
37:33जगाई जिससे शोक संतप्ट नागरिकों के हृदय में यह विश्वास जागा कि उनका राज्य अभी भी धर्म के मार्ग पर
37:41चलेगा
37:42भरत ने अपने विशाल सैन्य दल के साथ अयोध्या से चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया जिसका प्रत्येक कदम श्री राम
37:50को वापस लाने की उनकी अडिक प्रतिग्या की गवाही दे रहा था और अयोध्या की उम्मीदों का भार वहन कर
37:57रहा था
37:59यात्रा के दोरान भरत के चहरे पर करुणा और ग्रिड़ता का एक अध्भुत मिश्रण था जो उनके भाई के लिए
38:06उनके हृदय के गहरे प्रेम और धर्म के प्रती उनकी अटूट निश्था को दर्शाता था
38:12उसी समय चित्रकूट के शांत कुटिया में श्रीराम, सीता और लक्षमन अपनी सरल वनवासी जीवनशैली में लीन थे, प्रकृती की
38:21गोद में शांती और एकांत का अनुभव कर रहे थे
38:26जैसे जैसे भरत की सेना चित्रकूट के करीब आ रही थी, वन की शांती भंग होने लगी, जो आने वाले
38:33तीवर भावनात्मक मिलन का अग्रदूद थी
38:37भरत की सेना चित्रकूट की तलहटी में पहुँची, जिससे पूरे वन में एक चहल पहल फैल गई और एक विशाल
38:44अस्थाई शिवर स्थापित किया गया, जो श्री राम के प्रती उनके समर्पन का प्रतीक था
38:51भरत ने श्री राम को वनवास से अयोध्या वापस लाने के लिए विन्मृतापूर्वक प्रार्थना की, उनके सामने घुटनों के बल
38:59बैठ गए और अपने हृदय की सारी पीड़ा और भक्ती उडेल दी
39:04अपने पिता दश्रत के वचन की मर्यादा का पालन करते हुए, श्री राम ने अपने छोटे भाई के भावुक अनुरोध
39:11को द्रिड़तापूर्वक अस्विकार कर दिया, उन्हें धर्म के उच्छ मार्थ पर अडग रहने का उपदेश दिया
39:19श्री राम की अटल प्रतिज्या को सुनकर भरत गेहन निराशा में डूब गए, परंतु उनके हृदय में अपने भाई के
39:26प्रती श्रध्धा और सम्मान और भी बढ़ गया
39:30अंतिम उपाय के रूप में भरत ने श्री राम से उनकी खड़ाओ, पादुका, मांगी ताकि वे उसे अयोध्या के सिनहासन
39:38पर रख कर उनके प्रतिनिधी के रूप में शासन कर सके
39:43श्री राम ने अपने छोटे भाई के त्याग और भक्ती से द्रवित होकर अपने पवित्र चरण पादुकाओं को भरत को
39:50सौंक दिया, जो उनके अनुपस्थिती में अयोध्या के सिनहासन का प्रतिनिधित्व करने वाली थी
39:57पादुकाओं को प्राप्त कर भरत ने उन्हें अपने सिर पर धारण किया, यह प्रतिज्या करते हुए कि वे इन पवित्र
40:04प्रतिकों के माध्यम से अयोध्या का शासन धर्म पूर्वक चलाएंगे
40:10पादुकाओं को लेकर भरत अपने दल के साथ अयोध्या लोट पड़े उनके हृदय में एक गहरा दर्द और एक असीम
40:17संकल्प था
40:19अयोध्या के पास नंदिग्राम में पहुँचकर भरत ने अपनी स्वयं की साथगी भरी कुटिया स्थापित की यह घोशना करते हुए
40:28कि वे सिनहासन पर नहीं बैठेंगे बलकि अपने भाई के नाम पर शासन करेंगे
40:34भरत ने श्रीराम की पादुकाओं को अयोध्या के सिनहासन पर प्रतिस्थापित किया
40:39स्वयं सिनहासन के पास एक साधारन आसन पर बैठ गए जिससे उनका त्याग और अगाध प्रेम स्पष्ट रूप से प्रकट
40:47हो रहा था
40:49प्रतियक दिन भरत सिनहासन पर आसीन पादुकाओं की पूजा करते थे
40:54उन्हें अपने भाई श्रीराम की उपस्थिती मान कर अपने राज्य के प्रतियक निर्णय में उनका मार्ग गर्शन प्राप्त करते थे
41:03नंदिग राम से शासन करते हुए भरत ने राजसी वस्तरों और विलासिता का त्याग कर दिया, एक तपस्वी के समान
41:10जीवन व्यतीत किया और श्री राम की वापसी का बेसबरी से इंतजार किया
41:16दूर जंगल में श्री राम, सीता और लक्षमन अपने वनवास के अगले पड़ाव की ओर अग्रसर थे, अयोध्या के कश्टों
41:24से अन्भिज्य अपनी यात्रा के उद्देश को पूरा करने के लिए द्रिड संकल्पित
41:30उनकी यात्रा हर गुजरते दिन के साथ जंगल की गहराई में बढ़ती जा रही थी, प्रतेक कदम एक नए सासिक
41:38कार्य और अपने दिव्य उद्देश की पूर्ती के करीब ले जा रहा था
41:43सीता अपने पती श्री राम के साथ द्रिडता से खड़ी थी, जंगल की हर चुनोती को स्विकार करती हुई, उनकी
41:51अडिक भक्ती और त्याग की भावना को दर्शाती हुई
41:55लक्षमन अपनी पूरी शक्ती और समर्पन के साथ अपने बड़े भाई और भावी के साथ हर पत पर छाया बनकर
42:03चलते रहे, उनके पत का रक्षक बनकर
42:06इस प्रकार अयोध्या और नंदिग्राम में त्याग और कर्तव्य की अगनी प्रजवलित थी, जबकी वनमे श्रीराम, सीता और लक्षमन धर्म
42:15की रक्षा के लिए अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहे थे, नेती के अटल विधान का पालन करते हुए

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