विष्णु पुराण के इस महाएपिसोड में, हम चंद्रवंश की उस गाथा में उतरेंगे जहाँ यदु के वंशज, महाप्रतापी सहस्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) अपने चरमोत्कर्ष पर हैं। लेकिन शक्ति के मद में चूर होकर, वे महर्षि जमदग्नि के आश्रम पर आक्रमण करते हैं और उनकी दिव्य कामधेनु गाय का हरण कर लेते हैं। इस महाअपराध के बाद, भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का क्रोध जागृत होता है और वे धरती से अहंकारी क्षत्रियों के विनाश का महासंकल्प लेते हैं। यह कहानी आने वाले भयंकर युद्ध और धर्म की पुनर्स्थापना की नींव रखेगी! #VishnuPurana #SahasrabahuArjuna #Parashurama #Kamadhenu #Yaduvansh #Chandravansh #HinduMythology #Puranas #EpicTales
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00:00प्राचीन भारतवर्ष की भूमी पर चंद्रवंश की एक शक्तिशाली शाखा है है कुल में एक ऐसा प्रतापी समराट जन्मा जिसका
00:08नाम इतिहास के पन्नों में स्वन अक्षरों में अंकित होने वाला था कार्तवीर्य अर्जुन
00:15बाल्यकाल से ही कार्तवीर्य अर्जुन में एक असाधारन तेज एक अदमय महत्वा कांक्षा और अकल्पनिय शक्ती की ज्वाला धधक रही
00:24थी जो उन्हें अन्य राजकुमारों से भिन्द बनाती थी
00:29युवावस्था में पदारपन करते ही उनके मन में ब्रह्मांड की समस्थ शक्तियों को स्वय में समाहित करने की तीवर लालसा
00:36जागरित हुई जिससे वे प्रिथवी पर अधवितिय शासक बन सकें
00:40इस अदमय इच्छा को पूर्ण करने हेतु उन्होंने स्वयं को कठोर तपस्या की अगनी में जोकने का निश्चय किया ताकि
00:49देवों और रिशियों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकें
00:54उन्होंने अपनी राजधानी महिश्मती त्याग कर एकांत, घनेवन और दुर्गम परवतों की ओर प्रस्थान किया जहावे एकाग्रचित होकर परमेश्वर का
01:04ध्यान कर सकें
01:06अनेक वर्षों तक उन्होंने अनजल त्याग कर भीशन गर्मी और कडाके की ठंड सहते हुए अपनी इंद्रियों को वश्मे कर
01:14अविचल तपस्या की
01:17उनकी इस अद्वितिय तपस्या से तीनों लोकों में हल्चल मच गई और देवतागन भी उनके द्रिड संकल्प को देखकर विस्मित
01:25रह गए
01:26अंतह उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वय भगवान दत्तात्रे जो की विश्नु के अवधूत अवतार हैं अपने दिव्य स्वरूप में
01:36प्रकट हुए
01:37भगवान दत्तात्रे के दिव्य दर्शन पाकर कार्टवीर्य अर्जुन ने अपनी आखें खोली और उनके चर्णों में साष्टान प्रणाम किया उनका
01:47हृदय कृतग्यता और विस्मय से भरूठा
01:51दत्तात्रे ने मधुरवानी में उनसे कहा कि वे उनकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हैं और उन्हें इच्छित वर्दान मांगने को
01:59कहा
02:01कार्तवीर्य अर्जुन ने विनमरता पूर्वक पहला वर्दान मांगा उन्हें एक हजार भुजाय प्रदान की जाएं जो युद्ध में अदमय शक्ती
02:09का प्रतीक हो
02:11उन्होंने दूसरा वर्दान मांगा कि उन्हें इतनी अतुलनिय शक्ती प्राप्थ हो कि वे तीनों लोकों में किसी भी शत्रु से
02:19पराजित न हो सकें
02:21तीसरा वर्दान था कि वे धर्म प्रायन राजा बने जो अपनी प्रजा का न्याय पूर्वक पालन करें और उन्हें कभी
02:29घमंड न धेरे
02:31भगवान दक्तात्रे ने मुस्कुराते हुए उसके सभी वर्दान सहर्ष स्विकार किये और उसे असीम शक्ती, सहस्त्र भुजाय और अप्रतिम पराक्रम
02:41का आशिर्वाद दिया
02:43शन भर में एक अलौकिक प्रकाश पुंजने कार्तवीर्य अर्जुन को घेर लिया और उनकी काया में अध्भुत परिवर्तन होने लगे
02:52उनकी भुजाय एक के बाद एक प्रकट होने लगी, जब तक कि वे एक हजार शक्तिशाली भुजाओं से सुशोभित नहीं
03:00हो गए, प्रत्येक में एक दिव्य अस्त्र चमक रहा था
03:05सहस्रबाहु अर्जुन के नाम से विख्यात होकर, वे अपने राज्य महिश्मती लोटे, जहां उनका भव्य स्वागत किया गया और उनके
03:13आगमन से समस्त प्रजाहर्शित हुई
03:16अपनी नवप्राप्ट शक्ती से उन्होंने अल्पकाल में ही प्रिथवी के अनेक राज्यों पर विजय प्राप्ट की, अपनी दिगविजय यात्रा से
03:25एक विशाल सामराज्य स्थापित किया
03:27उनका प्रताप इतना बढ़ा कि तीनों लोक में उनका यश गूंजने लगा और वे प्रिथवी के सबसे शक्तिशाली अप्रतिरोध्य समराट
03:37बन गए
03:38परंतु इस असीम शक्ति और विजय के साथ ही, उनके हृदय में धीरे-धीरे अहंकार की एक सुक्ष्म भावनाघर करने
03:46लगी थी, जो भविश्य में बड़े संकटों को जन्म देने वाली थी
03:52माहिश्मती के स्वर्ण सिनहासन पर विराज मान होकर, सहस्र बाहु अर्जुन ने अपने धर्म सम्मत शासन और अपार शक्ती से
04:00एक अखंड सामराज्य की स्थापना की
04:03उनकी न्याय प्रियता ऐसी थी कि उनके राज्य में कोई भी प्राणी दुखी, निर्धन या असुरक्षित नहीं था और चारों
04:11और केवल सुक्षमृध्धी का बास था
04:15भगवान दक्तात्रे के विशेश आशिरवाद से सहस्रबाहु का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि उनके सामराज्य में चोरी और अन्याय
04:24का विचार भी विलुप्थ हो गया था
04:27सुदूर राज्यों से आय चक्रवर्ती राजा सहस्रबाहु की सर्वोप्री सत्ता को स्विकार करते हुए उन्हें बहुमुल्य उपहार और रत्न अर्पित
04:36करते थे
04:37राज्य में निरंतर महान वैदिक यग्यों का आयोजन किया जाता था, जिनसे प्रसन्न होकर देवता माहिश्मती पर अन्न और धन
04:46की वर्षा करते थे
04:48माहिश्मती की प्रजा अपने प्रतापी समराट के सहस्रबाहु रूप और उनके धर्मनिष्ट आचर्ण की गाथाए घर-घर में गाती थी
04:57अपने विशाल सैन्य दल और स्वर्णिम रथों का निरीक्षन करते हुए सहस्रबाहु का मन अपनी अतुलनिय शक्ती पर अत्यंत गर्व
05:05से भरने लगा
05:07पवित्र नर्मदा नदी के तटपर स्थित उनका राजप्रसाद, उनकी अपार शक्ती और विलासिता का जीवंत प्रतीक बना हुआ था
05:17उनके शासनकाल में प्रजाने समरिध्धी का वह स्वर्णिम काल देखा जहां अकाल और भय का कोई नामोनिशान न था
05:25एक समय जलक्रीडा के दौरान सहसर बाहु ने अपनी हजार भुजाओं को फैला कर नर्मदा नदी के प्रचन प्रवाह को
05:33खेल ही खेल में रोक दिया
05:35उनके इस अध्भुत शक्ति प्रदर्शन के कारण नदी का बहाव रुप गया और तट पर सूखी भूमी पर उनकी रानिया
05:43विश्राम करने लगी
05:45प्रकृती पर विजय पाने की इस असीम सामर्थ्य ने सहसर बाहु के भीतर यह भावना उत्पन करदी की तीनों लोकों
05:53में उनसे श्रिष्ट कोई नहीं है
05:57आकाशमार्ग से गुजरते हुए सिद्ध मुनी और देवगन समराठ के इस अभूत पूर्व पराक्रम को देखकर चकित भी थे और
06:04चिंतित भी
06:06वे अपने राज्य के अंतिन छोर तक न्याय का पालन कराते थे जिससे प्रजा उन्हें किसी साक्षात देवता की भाती
06:14पूजने लगी थी
06:16अपने निजी कक्षों में स्वयन को निहारते हुए सहस्रबाहु अपनी अजे भुजाओं के सौंदर्य और शक्ती पर बार-बार मुग्ध
06:25होते थे
06:26दर्बार के मंतरी और चाटुकार उनकी प्रशनसा में ऐसे स्टुतिगान करते थे जिससे उनके अहंकार को नित्य नई उर्जा मिलती
06:35थी
06:36जो शक्ती प्रारंभ में धर्म और प्रजा के संरक्षन का साधन थी वह धीरे-धीरे समराट के मन में व्यक्तिगत
06:44अहंका रूप लेने लगी
06:46अपनी दिग्विजय यात्राओं के स्मरण मात्र से वे सोचने लगे थे कि काल और नेती भी उनके सहस्रबाहु के अधीन
06:54है
07:06सिनहासन के शिखर पर खड़े होकर सहस्रबाहु अर्जुन ने अपनी अखंड भूमी पर द्रिश्टी डाली जहां उनका अहंकार अब अंतिम
07:15पराकाश्ठा पर पहुँच चुका था
07:18सहस्रबाहु अर्जुन का अहंकार अब इतना गहरा हो गया था कि वे अपने ही मन में स्वयंको देवताओं से भी
07:25उपर समझने लगे, मानो ब्रहमांड उनके इशारों पर चलता हो
07:31राजसभा में जब उनके एक व्रिद्ध मंत्री ने विनमर्ता से धर्म की मर्यादा का स्मरण कराया, तो अर्जुन ने उसे
07:38क्रोधित द्रिष्टी से देखा और चुप रहने का आदेश दिया
07:43उन्होंने खुले आम घोशना की की उनकी शक्तित्रिदेवों के विधान से भी उपर है और अब वे स्वयाही नेती का
07:50निर्धारन करेंगे, उनका दंभ आकाश चु रहा था
07:55एक बार वन में शिकार के दौरान, उन्होंने एक शांत रिशी के आश्रम को अपनी सेना के मनोरंजन के लिए
08:02उजार दिया, और रिशी के विरोध को उफास से टाल दिया
08:07अपमानित रिशी ने कोई शब्द नहीं कहा, किन्तु उनकी आखों में एक ऐसा मौन संकल्प था जो भविश्य की भयावः
08:15चेताबनी दे रहा था
08:17माहिश्मती नगरी में भोग विलास का बोलबाला था, जहां शाही महलों की भव्यता बढ़ती जा रही थी, वहीं सामान्य प्रजा
08:25की पीड़ा और अभाव भी बढ़ रहे थे
08:29हिमालय की एकांट कंदराओं में कुछ सिद्ध रिशी सहस्रबाहु के बढ़ते हुए अभिमान और धर्म के पतन पर गंभीर चर्चा
08:37कर रहे थे
08:39प्रजा में एक अजीब साडर और बेचैनी फैलने लगी थी, क्योंकि राजा का न्यायप्रिय रूप अब उनके स्वेच्छाचारी व्यवहार के
08:48पीछे छिप गया था
08:50एक विशाल वन में सहस्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ निर्दैता से वन्य जीवों का सहार कर रहे थे, अपनी
08:58असीमित शक्ती का प्रदर्शन करते हुए
09:01उसी शिकार के दौरान उन्होंने एक व्रिद्ध वन्वासी तपस्वी को भी अपनी राह से हटने का आदेश दिया और उसके
09:09पवित्र अनुष्ठान को बाधित किया
09:12तपस्वी ने केवल एक गहरी सांस ली और आकाश की ओर देखा, मानो उच्छ शक्तियों से इस अन्याय का न्याय
09:20करने का आहवान कर रहा हो
09:23राजसभा में उन्होंने एक ऐसा अनुचित फर्मान जारी किया जिसने निर्धन किसानों की भूमी हडपली और अपने चहेते सामन्तों को
09:32दे दी
09:34किसानों की आखों में अश्रुत है, किन्तु वे राजा के डर से एक शब्द भी नहीं बोल पाए, बस देवताओं
09:40से सहायता की प्रार्थना करते रहे
09:44देवलोक में देवर्शी नारद अपनी वीना बजाते हुए माहिश्मती के बढ़ते अधर्म को देख रहे थे, उनके चहरे पर चिन्ता
09:52की गहरी लकीरें उभर आई थी
09:56सहसरबाहों ने एक स्वपन देखा जहाँ वे स्वय को ब्रहमांड के केंदर में त्रिदेवों के सिन्हासन पर आसीन और समस्थ
10:03स्रिष्टी को नियंतरित करते हुए पाते हैं
10:07इस मद में उन्होंने नदियों के प्रवाह को मोरने, पहारों को हटाने और मौसम के चक्र को बदलने की असंभव
10:15आग्याए दी
10:17प्रकृती ने भी उनके इस दुस्साहस का मौन विरोध किया, जहाँ सूखे और अकाल का प्रकोप बढ़ने लगा और भूमी
10:25अपनी उर्वर्ता खोने लगी
10:27आमकार में चूर होकर, उन्होंने एक प्राचीन शिव मंदिर के गर्भग्रह में प्रवेश किया और मूर्तियों पर अपने शाही चिन्ह
10:36अंकित करने का आदेश दिया
10:38मुख्य पुजारी ने सहस्रबाहु की ओर देखा, उसकी आखों में पवित्र क्रोध और प्रतिशोध की अटल ज्वाला जल रही थी,
10:46मानो विनाश की भविश्यवानी कर रहा हो
10:50अपने सिन्हासन पर लोट कर सहस्रबाहु ने अपनी नई जीतों और अपमानों पर अट्थास किया, अंजान की उनका यह अहंकार
10:59ही उनके पतन का कारण बनेगा
11:02सहस्रबाहु के अहंकार की गूंच दूर-दूर तक फैल चुकी थी, जैसे कोई विशालकाय व्रिक्ष अपने ही जहरीले फल से
11:10जमीन पर गिरने को आतुर हो
11:13किन्तु प्रिथवी के दूसरे चोर पर, इस कोलाहल से दूर प्रकृती की गोद में एक ऐसा शांत स्थान था जहां
11:20तपस्या और ज्ञान की अविरल धारा बहती थी
11:23यह महर्शी जमदगनी का पवित्र आश्रम था, जहां व्रिक्षों की फुस्फुसाहट और पक्षियों का कलरव ही जीवन का एक मात्र
11:32संगीत था
11:34महर्शी जमदगनी अपनी दिव्य आभा और गेहन ज्ञान से परिपूर्ण नित्य अपनी कुटिया के बाहर पदमासन में गेहन तपस्या में
11:42लीन रहते थे
11:44उनकी पतनी रेनुका, सरलता और पवित्रता की साक्षात प्रतिमा आश्रम के दैनिक कारियों में निमगन रहती थी
11:52उनका प्रत्येक कर्म सेवा और प्रेम से उत्परोत था
11:57उनके जीवन का आधार सत्य, अहिंसा और सादगी थी, जिसने उनके आश्रम को ज्ञान और आध्यात मिक्ता का एक जीवन्त
12:06केंद्र बना दिया था
12:08उनके पुत्र, जिन में तेजस्वी परशुराम भी थे, गुरुजनों के मार्ग गर्शन में वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करते हुए,
12:16ज्यान और शौर्य दोनों में प्रवीन हो रहे थे
12:20इस पवित्र भूमी पर एक और अनुपम शक्ती निवास करती थी, दिव्य कामधेनु गाए, जो अपनी अलौकिक शक्तियों से आश्रम
12:28को सदैव समरिध रखती थी
12:31कामधेनु की क्रिपा से आश्रम में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती थी, वह सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने
12:39वाली साक्षात इश्वरिय शक्ती थी
12:42दूर-दूर तक इस शांत और पवित्र आश्रम की ख्याती फैली हुई थी, जहां स्वयन देवताभी मार्गदर्शन और शांती पाने
12:51आते थे
12:52किन्तु सहसर बाहु का अहंकार अब और भी विशालकाय रूप ले चुका था, उसकी विज्यगाथाय हर दिशा में क्रूरता और
13:00लालच का संदेश फैला रही थी
13:03उसके दर्बारी, उसके यशोगान में लीन, उसे और अधिक विज्यों के लिए उकसाते थे, मानों वे जानते ही नहों की
13:12अती सर्वत्र वर्जय धीरे धीरे कामधेनों की चमतकारी शक्तियों की अफवाहें सहसर बाहु के महल तक जा पहुँची, जैसे हवा
13:21में तैरता को
13:49कोई मीठाज है।
13:54उधर महर्शी जमदगनी के आश्रम में एक अपरत्याशित बेचैनी ने शांती के इस सागर को हिलाना शुरू कर दिया, जैसे
14:02दूर कहीं उठने वाली आधी की पहली आहट।
14:22द्रिश्टी ने आने वाले संकट को पहले ही भाप लिया था।
14:26और फिर सुदूर क्षितिज से धूल का एक विशाल बवंडर उठता दिखाई दिया, जो सहस्त्रबाहु की सेना के आश्रम की
14:34ओर बढ़ते कदमों का क्रूर संकेट था।
14:38सुदूर क्षितिज से उठता धूल का विशाल बवंडर अब स्पष्ट रूप से सहस्त्रबाहु अर्जुन की क्रूर और ठकी हुई सेना
14:46का नजारा बन चुका था, जो शांतिपूर्ण आश्रम की ओर बढ़ रही थी।
14:52सूर्य की तेज किर्णे उनके कवच पर पड़ती थी, जिससे वन की शांती भंग होती और उनका कठोर संकल्प वातावर्ण
15:00में गूंजता था।
15:51प्रकृती की निस्तब्धता व्याप्त थी।
15:52एक असहस बदलाव महसूस किया, उसकी दिव्यद रिष्टी ने आने वाले संकट के गहरे रंग को पहचान लिया।
15:59राजा अर्जुन अपने घोडे से उत्रा, उसका भारी कवच हलकी धूल उडाता हुआ, उसकी आखें आश्रम की सादगी को अविश्वासी
16:08भाव से निहार रही थी।
16:11उसने अपनी बुलंद आवाज में आश्रम की शान्ती भंग करते हुए आश्रय और अपनी विशाल सेना के लिए भोजन की
16:19मांग की।
16:20महर्शी जमदगनी अपने चहरे पर एक अविचल शान्ती के साथ धीरे से आगे बढ़े उनकी उपस्थती में एक दिव्याभा चमक
16:29रही थी।
16:30अर्जुन ने अपने भारी सैन्य बल की ओर इशारा करते हुए महर्शी से ततकाल और परियाप्त भोजन की मांग की
16:38उसकी आवाज में राजा का अधिकार स्पष्ट था।
16:43महर्शी ने एक शान्त मुस्कान के साथ राजा को आश्वस्थ किया कि उनका आश्रम सभी का स्वागत करता है और
16:51कोई भी अतिथी भूखा नहीं रहेगा।
16:54रेनु का जो दूर खड़ी थी महर्शी की इस बात से की वे इतनी विशाल सेना को कैसे भोजन कराएंगे
17:02उनके मन में चिन्ता और विस्मई छा गया।
17:05फिर महर्शी जमदगनी ने अपनी दृष्टी दिव्य कामधेनु की और मोडी उसके आशिरवाद और असीमित शक्ती को इन्वोकेटिंग करते हुए।
17:15कामधेनु महर्शी के आहवान को समझ कर एक दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो उठी जो उसकी असीमित इच्छा पूर्ती की
17:23शक्ती का संकेत था।
17:25शन भर में आश्रम के चारों और सैकडो भातिभाती के व्यंजन मीठे पकवान और शीतल पे प्रकट हो गए जो
17:34पूरी सेना के लिए परियाप्त थे।
17:37सैनिकों और उनके सेनाप्तियों ने विसमय से देखा, उनकी ठकावट एक क्षण के लिए भूल गई क्योंकि उनके सामने एक
17:45अद्भुत भोज प्रकट हुआ था।
17:48राजा अर्जुन अपनी भुजाओं को मोड कर उस दिव्यकामधेनू और उसकी असीमित शक्ती को निहार रहा था। उसके भीतर एक
17:56नई घातक लालसा जागरित हो रही थी।
18:00वह सोचने लगा कि यदि ऐसी अद्भुत शक्ती उसके राज्य में होती तो वह कितना अजे और समरिध हो सकता
18:08था। उसके विचार अंधेरे और कपट पूर्ण होते जा रहे थे।
18:12अर्जुन की आखों में एक भयानक संकल्प चमक उठा। एक ऐसा संकल्प जो इस शांतिपूर्ण आश्रम और उसके पवित्र निवासियों
18:22पर एक गहरा संकट लाने वाला था।
18:25अर्जुन की आखें कामधेनु के दिव्य सौंदर्य और असीमित शक्ती पर टिकी रही। उसके भीतर लोग का एक घना अंधकार
18:33उमड पड़ा, जो अब उसे पूरी तरहे ग्रसने लगा था।
18:38उसने अपने सेनापतियों की ओर मुड कर अपनी आखों में एक क्रूर चमक के साथ कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ
18:46ले जाने का आदेश दिया, मानो वह कोई निर्जीव वस्तु हो।
18:51विशाल सैन्यदल शस्त्रों की खनकनाहट के साथ महर्शी के आश्रम की शांती भं करते हुए उस दिव्यगाय की ओर बढ़ा,
19:00जिसका आभास अब खत्रे की घंटी बन गया था।
19:04महर्शी जमदगनी ने अपने ध्यान से उठकर राजा के सैनिकों को कामधेनु की ओर बढ़ता देख, उनके चहरे पर चिंता
19:12की गहरी लकीरें उभराई, जो आने वाले अनिष्ट का संकेत थी।
19:17उन्होंने शांत स्वर में राजा अर्जुन से कामधेनु के प्रती अपने लोब को त्यागने और उसके दैविय महत्व को समझने
19:25का आग्रह किया, मानो एक पिता अपने भटकते पुत्र को समझा रहा हो।
19:31किन्तु अहंकार में डूबे अर्जुन ने महर्शी की विनमर प्रार्थना को अनसुना कर दिया, उसकी आखों में केवल कामधेनु की
19:39दिव्य शक्ती को हथियाने की ही लाल सा थी।
19:43राजा के सैनिकों ने महर्शी की उपस्थिती की अभहेलना करते हुए, बलपूर्वक कामधेनु को पकड़ने के लिए आगे बढ़े, उनके
19:51हाथों में रस्सिया और उनकी आखों में क्रूर्ता स्पष्ट थी।
19:56कामधेनु ने अपनी बड़ी कोमल आखों में एक गेहन दुख के साथ महर्शी की ओर देखा, मानों उनसे इस अधर्म
20:04से बचाने की प्रार्थना कर रही हो।
20:07तभी कामधेनु के भीतर की दिव्य शक्ती जागरित हुई, उसकी आखों से स्वर्णिम प्रकाश फूट पड़ा और उसके शरीर से
20:15एक अगभुत उर्जा का चक्र निकलना शुरू हुआ।
20:19उसके रोमरोम से, धर्ती से और आकाश से शन भर में अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित एक विशाल दिव्य सेना प्रकट हो
20:27गई, जो धर्म की रक्षा के लिए ततपर थी।
20:31राजा अरजुन की सेना और कामधेनु द्वारा उत्पन्दिव्य वोरियर्स की सेना के बीच एक भीशन युद्ध छिड़ गया, जिससे आश्रम
20:40की भूमे रक्त और धूल से रंग गई।
20:43कामधेनु की अध्भुट शक्ती से उत्पन्द वीरों के सामने अरजुन की विशाल सेना भी टिक न सकी और वे एक
20:50एक कर हार मानने लगे, मैदान में उनकी हार स्पष्ट दिख रही थी।
20:56अपनी सेना की इस दुर्गशा को देख, अरजुन का अभिमान क्रोध में बदल गया, उसकी आखों में प्रतिशोध की अगनी
21:04और भी तीवर हो गई।
21:06उसने अपनी दिव्य शक्ती का आवाहन करते हुए एक अत्यंत भयंकर अस्त्र का प्रयोग किया, जिसका प्रहार तीनों लोकों को
21:14कम्पित करने की क्षमता रखता था।
21:17उस शक्तिशाली अस्त्र के वार से कामधेनु द्वारा उत्पन दिव्य सेनाक्षन भर के लिए विचलित हो गई, उनकी चमक मंद
21:25पढ़ने लगी और वे धीरे-धीरे अद्रिश होने लगे।
21:29इस अफसर का लाब उठा कर अरजुन के सैनिकों ने पुनर जीवित होकर कामधेनु को घेड लिया और अंत्त उसे
21:37कठोर रस्सियों से बांध कर अपने नियंत्रण में ले लिया।
21:42महर्शी जमदगनी ने अपने आंगन से अपनी आखों के सामने कामधेनु को ले जाते हुए देखा, उनके हृदय में गहरा
21:49आगहात लगा और उन्होंने पीडा से भर कर अश्रु बहाए।
21:54विजी अर्जुन अपनी कैप्चरड कामधेनु के साथ अपने रत पर आरूड हुआ, उसके चहरे पर एक क्रूर विजय की मुस्कान
22:02थी, मानो उसने स्वर्ग ही जीत लिया हु।
22:06महर्शी का पवित्र आश्रम अब खंडहर बन चुका था, शांती की जगह केवल उदासी और विनाश के निशान थे, जो
22:14राजा के लोब की भयावः गाथा कह रहे थे।
22:18जमदगनी की आत्मा में बसा यह गहरा घाव, अब उनके प्रिय पुत्र परशुराम के हृदय में प्रतिशोध की एक अखंड
22:26ज्वाला प्रजवलित करने वाला था, जिसका परिणाम अत्यंत भीशन होगा।
22:31रिशी जमदगनी के पुत्र परशुराम, जो अपनी तपस्या में लीम थे, एक अंजाने आवेक से प्रेरित होकर अपने आश्रम की
22:40ओर तीवर गती से लोट रहे थे, उनके मन में एक अज्यात अन्होनी की आशंका बलवती हो रही थी।
22:47जब परशुराम ने अपने पवित्र आश्रम के खंधरों को देखा, तो उनका हृदय गहरे आधात से काप उठा, क्योंकि जहां
22:55कभी शांती और ज्ञान का वास था, वहां अब केवल राख और विनाश का सामराज्य था।
23:02खंधरों के बीच उन्होंने अपने व्रिद्ध पिता महरशी जमदगनी को देखा, जो गंभीर रूप से घायल थे और कामधेनु के
23:10अफरन के दुहक से व्याकुल होकर भूमी पर अचेक पड़े थे।
23:15परशुराम की मारेनुका, अपने पती के घावों और आश्रम के विनाश पर विलाप करती हुई एक तूटे हुए कलश के
23:23पास बैठी थी, उनकी आखों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी।
23:29अपने माता पिता की इस दैनिय दशा को देखकर, परशुराम के हृदय में एक तीवर पीड़ा उठी, जिसने उनके अंतर्मन
23:37में क्रोध की एक प्रचंड ज्वाला प्रजवलित कर दी।
23:41उसक्षंड परशुराम ने अपने पिता के अचेत शरीर को सहारा दिया और उनके सिर को अपनी गोद में रखकर, उनके
23:49घावों पर आसुओं का अभिशेक किया।
23:52कुछ देर बाद जमदगनी महरशी ने आखें खोली, उनकी द्रिष्टी अपने पुत्र पर पड़ी और उन्होंने तूटी हुई आवाज में
24:00सहस्रबाहु अर्जुन के अत्याचार की भयावह गाथा सुनाई।
24:05महरशी ने बताया कि कैसे लोग में अंधा होकर सहस्रबाहु अर्जुन ने कामधेनु की मांग की थी और मना करने
24:13पर अपने क्रूर बल से आश्रम को ध्वस्त कर दिया और गाय का हरण कर लिया।
24:19कामधेनु जो केवल एक गाय नहीं बलकि उनके आश्रम की आत्मा और उनकी वर्षों की तपस्या का फल थी अब
24:27दुष्ट राजा के हाथों में थी।
24:30परशुराम ने अपने पिता की बात ध्यान से सुनी और जैसे जैसे वह सुनते गए उनके भीतर प्रतिशोध की जवाला
24:38और भी तीवर होती गई उनका धैर्य जवाब दे रहा था।
24:43जमदगनी ने अपने पुत्र को शांत रहने और क्षमा का मार्ग अपनाने की सलाह दी। यह जानते हुए भी कि
24:50इस अपमान का घाव बहुत गहरा था।
24:53किन्तु परशुराम का हरिदय अब क्षमा के बजाय न्याय और धर्म की स्थापना की पुकार सुन रहा था, जिसे केवल
25:01शस्त्रों के बल पर ही पुनह स्थापित किया जा सकता था।
25:04उनकी मा रेनुका अपने पुत्र के चहरे पर उभे इस भीशन संकल्प को देखकर भयभीत हो उठीन क्योंकि उन्होंने अपने
25:14पुत्र की आखों में एक ऐसे युद्ध की ज्वाला देखी जिसका परिणाम अत्यंत विनाशकारी होगा।
25:21परशुराम ने अपनी मा को धांधस बंधाया। यह कहते हुए कि धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश ही अब
25:28उनका एक मात्र लक्ष्य है। भले ही इसके लिए उन्हें कोई भी मूले चुकाना पड़े।
25:35आकाश में अचानक भीशन गर्जना हुई और बिजली कड़कने लगी, मानुस्वयन देवताओं ने परशुराम के इस महासंकल्प को अपनी स्वीकृती
25:44प्रदान की हो।
25:46परशुराम ने अपनी शक्तिशाली परशु, कुलहाडी को उठाया, जो उनके दिव्यक्रोध और प्रतिशोध का प्रतीक थी, और उसे आकाश की
25:55ओर गर्व से उचा किया।
25:57उन्होंने देवताओं और अपने पूर्वजों को साक्षी मान कर प्रतिग्याकी की वे प्रित्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त करेंगे और
26:06धर्म की पुनरस्थापना करेंगे।
26:10परशुराम का संकल्प केवल प्रतिशोध नहीं था, बलकि एक महान यग्य था, जिसका उद्देश्य धर्ती से अहंकार और अधर्म को
26:18समूल नश्ट करना था।
26:20महर्शी जमदगनी ने अपने पुत्र की आखों में इस दिव्य शक्ती को देखा और यह समझते हुए कि यह स्वय
26:28भगवान विश्नु की इच्छा है, उन्हें भारी मन से आशिरवाद दिया।
26:33अपने मातापिता से अंतिन विदा लेकर परशुराम ने अपने कंधे पर अपनी परशु धारण की और एक अडिग योध्धा की
26:41तरह प्रतिशोध और धर्म की स्थापना के पथ पर निकल पड़े।
26:46सहसर बाहु अर्जुन का अहंकार उसके अंतर्मन में क्रोध की अगनी प्रजवलित कर रहा था। कामधेनु के इनकार से उसका
26:54अभिमान चूर-चूर हो गया था।
26:57अपने अपमान का प्रतिशोध लेने और अपनी इच्छा पूर्ण करने के लिए उसने बल पूर्वक कामधेनु को छीनने का क्रूर
27:05संकल्प किया।
27:07उसने अपने सबसे क्रूर सेनापतियों और सैनिकों को तुरंत जमदगनी रिशी के आश्रम पर आक्रमन करने का आदेश दिया।
27:17हजारों सैनिकों की एक विशाल सेना ने राजाग्या का पालन करते हुए अरने के शांत मारगों से आश्रम की ओर
27:24कूच किया, उनकी पच्चाप धर्ती को कमपा रही थी।
27:28आश्रम में महर्शी जमदगनी शांत भाव से ध्यान में लीन थे, किन्तु उनके हृदय में एक अप्रत्याशित संकट का आभास
27:37हो रहा था।
27:39अचानक सैनिकों की गर्जना और हतियारों की खडखडाहट से आश्रम की शांती भंग हो गई, जैसे कोई भीशन तूफान ना
27:47गया हो।
27:49रिशिपुत्र और तपस्वी भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे, आश्रम के पशुभी आतंकित होकर अपनी जान बचाने के लिए दोड़
27:57पड़े।
27:59देवदुख्ध देने वाली कामधेनु अपने दैविये तेज के बावजूद इस अचानक हुए हमले से विचलित हो गई और भै से
28:07रंभाने लगी।
28:08क्रूर सैनेकों ने अपने बल का प्रयोग कर कामधेनु को चारों ओर से घेर लिया और उसे बलपूर्वक बांधने का
28:16प्रयास करने लगे।
28:18दूर खड़े सहसर बाहु अर्जुन ने अपनी अनेक भुजाओं को गर्व से फैलाए हुए इस द्रिश्य को एक अधर्मी विजय
28:26की भांती देखा उसके चहरे पर क्रूर संतुष्टी थी।
28:30महर्शी जमदगनी अपने शांत स्वभाव के बावजूद इस अधर्म को अपनी आखों के सामने होते देख रहे थे। उनके हृदय
28:39में गहरा आगहात लगा था।
28:42कामधेनु को पकड़ने के बाद सैनिकों ने पूरे आश्रम को तहसनहस करना शुरू कर दिया, पवित्र कुटियाओं को ध्वस्ट कर
28:50और यज्यवेदी को अपवित्र कर दिया।
28:53कुछ सैनिकों ने महर्शी जमदगनी के पास जाकर उन्हें कटू वचनों से अपमानित किया, उनके तपस्वी जीवन का उपहास उडाया।
29:02जो आश्रम कभी शांती और ज्ञान का धाम था, वह अब केवल धूल, खंडहर और तूटी हुई आशाओं का धेर
29:10बनकर रह गया था।
29:13कामधेनू और अपने सैनिकों के साथ प्रस्थान करने से पहले, सहसरबाहु अर्जुन ने एक अंतिन ध्रेनित ग्रिष्टी जमदगनी रिशी पर
29:21डाली, जो उसकी विजय का प्रतीक थी।
29:25गर्जना करते हुए, राजा सहसरबाहु अपनी विशाल सेना और हरन की गई कामधेनू के साथ धूल उड़ाते हुए वापस अपने
29:34राज्य की ओर लोट पड़ा।
29:36आश्रम के खंधरों के बीच महर्शी जमदगनी अकेले खड़े थे, उनके शांत मुखमंडल पर गहन दुख की चाया थी, लेकिन
29:45क्रोध का कोई चिन्ह नहीं था।
29:48उनके हृदय में मानवता के अधर्म और अहंकार की पीडा गूज रही थी, जिससे वे अत्यंत दुखित थे, मानोस्वयं प्रकृती
29:56रो रही हो।
29:58जिस धर्ती पर उन्होंने वर्षों तक तपस्या की थी, उसी धर्ती पर यह क्रूर अन्याय हुआ था, जिसने उनके शांत
30:06जीवन को जखजोर दिया था।
30:09उन्हें पता था कि उनके पुत्र परशुराम के लोटने पर इस अधर्म का प्रतिशोध अवश्य लिया जाएगा, और यह विचार
30:17उन्हें एक शांत प्रतीक्षा में लीन कर गया।
30:20संध्या की ढलती लालिमा के बीच, अपने कंधे पर भारी फरसा रखे भगवान परशुराम के शक्तिशाली कदम अपने तपोवन की
30:29ओर बढ़ रहे थे।
30:32जैसे ही उन्होंने आश्रम के मुख्य द्वार में प्रवेश किया, वहां का विनाश देखकर उनकी आखों में एक शन के
30:39लिए गहरा विस्मई छा गया।
30:42पवित्र यग्यशाला को पूरी तरह ध्वस्त देखकर परशुराम का हृदय किसी अन्होनी की आशंका से तीवरता से स्पंदित होने लगा।
30:51तभी धूल और राख के बीच उन्हें अपने पिता परम ज्यानी महर्शी जमदगनी अत्यंत दैनी अवस्ता में बैठे दिखाई दिए।
31:01परशुराम तुरंट अपने पिता के चर्णों में गिर पड़े और उनके कापते हाथों को ठाम कर उनकी आखों के आसु
31:08पोचने लगे।
31:10महर्शी जमदगनी ने भारी मन से अपने पुत्र की ओर देखा और उनकी आखों से बहते आसुओं में असहनिय पीडा
31:18और अपमान की गाथा साफ दिख रही थी।
31:21कमपती आवाज में पिता ने बताया कि कैसे अभिमानी राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने अपनी सहसर भुजाओं के बलका दुरुप्योग कर
31:30इस शांत तपोवन को उजाड़ दिया।
31:33उन्होंने बताया कि किस प्रकार वह राजा बलपूर्वक और क्रूरता से दिव्यकाम धेनुगाए और उसके बच्छडे को यहां से छीन
31:41ले गया।
31:43अपने मातापिता के इस घोर अपमान और आश्रम की ऐसी दुर्दशा की बात सुनकर परशुराम का हृदय क्रोध की प्रचंड
31:50अगनी से जल उठा।
31:53क्रोध के उस अतिरेक में उनकी आखें लाल अंगारे की तरहें चमकने लगी, मानो प्रलै का साक्षात काल उनके भीतर
32:01जागरत हो गया हो।
32:23परशुराम ने अपने हाथ में भगवान शिव द्वारा प्रदत उस दिव्य और अमोख परशु को अत्यंत द्रिडता से थाम लिया।
32:32उन्होंने उस चमकते हुए परशु को आकाश की ओर उपर उठाया और उसकी धार से दिव्य ऊर्जा की किरने चारों
32:39ओर फूट पड़ी।
32:41पिता के चर्णों की धूल को माथे पर लगा कर उन्होंने उस पवित्र मिट्टी को अपने क्रोध की अगनी से
32:48सीचते हुए महासंकल्त लिया।
32:51उन्होंने प्रतिग्या की की वे अभिमानी कार्थवीर्य अर्जुन की उन सहसर भुजाओं को सूखी टहनियों की तरहे काट डालेंगे जिन्होंने
33:00धर्म की मर्यादा लांगी है।
33:03उनका स्वर बादलों की गर्जना की तरहे गूंज उठा कि वे इस प्रित्वी से उन सभी अत्याचारी और अहंकारी राजाओं
33:11का सर्वनाश कर देंगे जो प्रजा का शोशन करते हैं
33:16परशुराम ने संकल्प लिया कि वे एक बार नहीं बलकि पूरे 21 बार इस धरा को दुष्ट और अन्याईक शत्रियों
33:24से विहीन कर देंगे
33:26महर्शी जमदगनी ने अपने पुत्र के इस उग्र रूप को देखा और उन्हें आभास हुआ कि यह कोई साधारन क्रोध
33:34नहीं बलकि साक्षात श्रीहरी का ही न्याई चक्र है
33:39हाथ में चमकता हुआ फरसा लिये और आखों में धर्म की स्थापना का संकल्प संजोए परशुराम ने महिश्मती नगरी की
33:47ओर अपने विनाशकारी कदम बढ़ा दिये
33:50क्रोध की ज्वाला से प्रज्वलित परशुराम के प्रत्येक पक से धरा थर्रा रही थी जैसे स्वयं प्रित्वी माता भी आने
33:58वाले महाविनाश की आहट सुन रही हो
34:01उधर महिश्मती नगरी अपने एश्वर्य और भव्यता में लीन आसन्न संकट से पूर्णता अन्भिग्य अपनी चकाचोंध में डूबी हुई थी
34:12अपने भव्य राज सिनहासन पर आसीन सहस्र बाहु अर्जुन अपनी अजे शक्ती के मद में चूर्प स्वयं को तीनों लोकों
34:20का सर्वोपरी समराट मान रहा था
34:23देवर्शी नारद तीनों लोकों में विचर्ण करते हुए इस आसन्न धर्मयुद्ध के संकेतों को समझ रहे थे और इसके दूरगामी
34:32परिणामों का अनुमान लगा रहे थे
34:35वहीं परमज्यानी भगवान दत्तात्रे अपनी दिव्यद्रिष्टी से अधर्म के इस बढ़ते अंधकार और धर्म की पुनरस्थापना के इस महाभियान को
34:44शान्त भाव से निहार रहे थे
34:48अंतहक परशुराम के तीवरपग महिश्मती के विशाल स्वर्णज्रित द्वारों तक पहुँच गए उनकी आकरती स्वयं मृत्यू के भयावध दूद्सी प्रतीत
34:57हो रही थी
34:59द्वार पर तैनात वीर सैनिक पहले तो अडियल भाव से खड़े थे परंतु परशुराम की दिव्य क्रोधागनी से भरी आखों
35:07को देखकर वे जड़वत भयभीत हो गए
35:09एक भयभीत संदेशवाहक हाफता हुआ राजदर्बार में पहुचा और उसने परशुराम नामक एक अत्यंत क्रोधी ब्राहमन के आगमन की सूचना
35:20दी
35:22अपने अहंकार में चूर सहसरबाहुने ब्राहमन के इस दुस्साहस को मात्र एक तुछ उपद्रव मानकर उसे सिरे से खारिस कर
35:30दिया
35:32किन्तु कुछ दूरगर्शी मंत्रियों और व्रिध सलाहकारों ने प्राचीन गाथाओं का स्मरण करते हुए उसे परशुराम की अकल्पनिय शक्ती के
35:41प्रती आगाह करने का प्रयास किया
35:44अपने मद और अज्यान में सहस्र बाहु ने अपनी सेना को उस ब्राहमन को बंदी बनाने या वद करने का
35:51आदेश दिया
35:52उसे एक सामान्य विद्रोही से अधिक कुछ नहीं समझा
35:57महिश्मती के द्वार पर खड़े परशुराम की दिव्य आभाक्षन प्रतिक्षन बढ़ती जा रही थी जो पूरी नगरी को एक अद्रिश्य
36:05चुनौती दे रही थी
36:07सहस्रबाहु की गरवोनमत सेना की पहली लहर अपनी संख्या के बल पर आश्वस्थ गरजना करती हुई परशुराम की ओर बढ़ी
36:17परशुराम ने अपने दिव्य फरसे का आहवान किया और वह प्रचंड अस्त्र साक्षात काल के दूटसा चमकता हुआ उनके हाथ
36:25में और भी तेजस्वी हो उठा
36:28अपने प्रचंड पराक्रम से परशुराम ने क्षण भर में शाही सेना के एक बड़े भाग को धराशाई कर दिया उनका
36:36फरसा विनाश का तांडव कर रहा था
36:39शेश सैनिक भाय से काप उठे यह समझते हुए कि वे किसी नश्वर मनुष्य से नहीं बलकि एक साक्षात दिव्यशक्ती
36:47से लड़ रहे हैं
36:50अपने महल से इस विनाश को देख कर सहस्रबाहु का घमंड चूर-चूर होने लगा और उसका क्रोध एक भयावह
36:58ज्वाला मुखी की तरह बढ़ने लगा
37:01परशुराम ने एक गरजना की जिसने महिश्मती के भव्य महलों की नीम्ग तक हिला दी सीधे सहस्रबाहु को द्वंदवयुद्ध के
37:09लिए ललकारा
37:11पूरी नगरी में अब सन्नाटा चा गया था एक तूफानी शान्ती थी जो परशुराम और सहस्रबाहु अर्जुन के बीच होने
37:19वाले महा संग्राम की प्रतीक्षा कर रही थी
37:23आकाश में भी अद्भुत और भयावह उमन प्रकट होने लगे थे जो इस बात का संकेट दे रहे थे कि
37:30यह युद्ध केवल मनुश्यों का नहीं बलकि स्वयन देवताओं का न्याय है
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