नहुष के सर्प बनने और इंद्र के ब्रह्महत्या के पाप से छिपने के बाद स्वर्ग में अव्यवस्था फैल जाती है। ऐसे में, कौन संभालेगा सृष्टि का भार? इस एपिसोड में, हम देखेंगे कैसे स्वयंभू मनु के महान पुत्र, प्रियव्रत, अपनी गहरी तपस्या छोड़ ब्रह्मा जी के कहने पर राजधर्म स्वीकार करते हैं। उनकी दिव्य शक्ति से कैसे पृथ्वी पर सात द्वीप (सप्तद्वीप) और सात समुद्रों का निर्माण हुआ, जिसने सृष्टि को एक नया आकार दिया! यह कथा दर्शाती है कर्मयोग का महत्व और एक राजा का परम त्याग। #BhagavataPurana #Priyavrata #Saptadvipa #HinduMythology #DivineRule #S3Ep26 #पुराण #भागवतपुराण #राजाप्रियव्रत #सप्तद्वीप #हिंदूधर्म #पौराणिककथाएँ #कर्मयोग #स्वर्ग #इंद्र
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00:00महर्शी अगस्त्य के घोर श्राप से राजा नहुश एक विशालकाय सर्प बनकर स्वर्ग के वैभवशाली द्वारों से प्रित्वी की ओर
00:08नीचे गिरने लगा।
00:10इंद्रपुरी अमरावती के मुख्य राज सभा हौल में देवेंद्र का स्वर्णिन सिनहासन अब सर्वता सुना और अंधकार में पड़ा हुआ
00:18था।
00:19मानसरोवर की सुक्षम कमल नाल में छिपे देवराज इंद्रपर ब्रहम हत्या का भयानक काला आवर्ण मंडरा रहा था, जिससे वे
00:28बाहर आने में असमर्थ थे।
00:30देवेंद्र का दिव्य अस्त्रवजर अपनी प्राकृतिक दीप्तीक हो चुका था और लावारिस अवस्था में सिनहासन के चरणपीठ पर पड़ा हुआ
00:39था।
00:40शासक के अभाव में प्राकृतिक नियम डग्मगाने लगे, जिससे सूर्य का प्रकाश धुंधला हो गया और पवन बेकाबू होकर बहने
00:49लगी।
00:49स्वर्गलोग की रक्षा व्यवस्था को कमजोर देखकर पाताल के असुराधिप्ती अपनी विशाल सेनाओं के साथ सीमाओं पर मंडराने लगे।
01:00अगनिदेव, वायुदेव और वरुनदेव अमरावती के सुनसान आंगनों में एकत रहोकर उत्पन हुए इस भयंकर संकट पर अत्यंत चिंतित होने
01:09लगे।
01:11अपनी वीना पर चिंताजंक राग छेरते हुए देवर्शी नारत सभा में प्रकट हुए और उन्होंने सभी देवताओं को मंडराते विनाश
01:19की चेतावनी दी।
01:21देवगुरु ब्रहस्पती ने गंभीर स्वर में घोशना की की बिना किसी समर्थ शासक के ब्रहमांडिय व्यवस्था अतिशीग्र अधर्म के गर्त
01:30में गिर जाएगी।
01:32देवमाता अधिती अपने अलौकिक भवन में बैठ कर अपने पुत्रों के निश्प्रान हो रहे लोग की दुर्गशा पर अश्रु बहाने
01:40लगी।
01:41सब्तर्शियों ने मेरू परवत की मूची चोटियों पर एक आपात कालीन सभा बुलाई ताकि त्रिलोक की रक्षा के लिए एक
01:49योग्य राजा का चयन किया जा सके।
01:52महर्शी वशिष्ठ ने रिशियों को संबोधित करते हुए कहा कि अगला इंद्र वही हो सकता है जो पूर्णत जितेंद्रिय और
02:00वासनाओं से मुक्थ हो।
02:02महर्शी गौतम और कशप ने कई देवपुत्रों के नाम पर विचार किया, किन्तु कोई भी इस भारी उत्तरदायत्व का भार
02:10उठाने योग्य नहीं मिला।
02:12अंतह समस्थ देवगण और महर्शिगण अपनी अंतिम आशा लेकर परमपिता ब्रहमा जी के सत्यलोग की ओर प्रस्थान कर गए।
02:22सत्यलोग के स्वर्ण मंडप में बैठकर जगत्पिता ब्रहमा अपने अप्रतिम तेज से सम्पूर्ण सभा को आलोकित कर रहे थे।
02:31देवगुरु ब्रहस्पती ने ब्रहमा जी के चर्णों में नत्मस्तक होकर स्वर्ग के सिनहासन के खाली होने और ब्रहमांडिय संकट का
02:39पूरा वृत्तांत सुनाया।
02:42भगवान ब्रहमा ने अपने चारों नेत्र बंद किये और गेहन ध्यान में लीन होकर तीन काल की अवधी में उप्युक्त
02:49शासक की खोज शुरू की।
02:52ध्यान से जागकर ब्रहमा जी ने घोशना की कि स्वायंभोव मनु के पुत्र महात्पस्वी प्रियवरत ही इस ब्रहमांड के सर्वोच
03:00सिनहासन के योग्य अधिकारी हैं।
03:04रिशियों ने संशय व्यक्त किया कि जो प्रियवरत सांसारिक मोह त्याग कर घोर तपस्या में लीन हैं, क्या वे पुनह
03:11राजकाज स्विकार करेंगे।
03:14ब्रहमा जी ने देवर्शी नारद को तुरंत प्रियवरत के आश्रम जाकर उन्हें ब्रहमांड की रक्षा हेतु शासन संभालने के लिए
03:22प्रेरित करने का आदेश दिया।
03:46नारद मुनि अपने वीना के मधूर स्वरों को बजाते हुए, तेज गती से तीनों लोकों के उपर से उड़ते हुए
03:52आगे बढ़ रहे थे।
04:14छोटा सा आश्रम बना हुआ था, जो परम शांती और तपस्या का प्रतीक था, और यही महात्पस्वी प्रियवरत का निवास
04:22थान था।
04:24इसी आश्रम के एक शांत कोने में, प्रियवरत एक प्राचीन वरिक्ष के नीचे पदमासन में बैठे हुए थे।
04:31उनकी आखें आधी बंद थी, और वे गहन ध्यान में लीन थे। उनका शरीर तपस्या की अगनी से तेजोमय दिख
04:38रहा था, जो सांसारिक इच्छाओं से पूर्ण विरक्ती का प्रमान था।
04:43नारद मुनी ने आश्रम में प्रवेश करते ही प्रियवरत को ध्यान मगन देखा और कुछ क्षणों तक उन्हें विचलित किये
04:51बिना। उनके तपस्या की पवित्र उर्जा का सम्मान करते हुए दूर से ही खड़े रहे, उनके चहरे पर श्रधा और
04:58सम्मान के भाव थे।
05:00कुछ समय पश्चात, नारद ने धीरे से अपनी वीना पर एक मधुर धुन छेड़ी, जिससे प्रियवरत का ध्यान भंग हुआ
05:08और उन्होंने अपनी आखें खोली, नारद ने तुरंत उनके सामने हाथ जोड़कर विनमरता पूर्वक प्रणाम किया।
05:15प्रियवरत ने नारद को देखकर अपने मुख पर एक शांत और सौमय मुस्कान लाई, अपने तपस्या के प्रभाव से तेजस्वी
05:24दिखते हुए, और अपनी दिव्यद रिष्टी से उनके आगमन के उद्देश को जानने का प्रयास किया।
05:31नारद ने गंभीरता से अपनी बात शुरू की, देवलोग की बिगर्ती स्थिती और इंद्र के खाली सिनहासन का विवर्ण दिया,
05:39और बताया कि किस प्रकार ब्रहमा जी ने प्रियवरत को इस संकट से उबारने के लिए चुना है।
05:46उन्होंने विस्तार से समझाया कि वृत्रासूर के वद के बाद इंद्र की अनुपस्थिती और नहुष के अहमकार पूर्ण शासन ने
05:54किस प्रकार तीनों लोकों में अराजक्ता और अधर्म को जन्म दिया है, जिससे सभी प्राणी कष्ट भोग रही है।
06:03नारद ने प्रियवरत को याद दिलाया कि वे स्वायंभोव मनु के पुत्र हैं और उनके अंदर वह दिव्यशक्ती और धर्म
06:10प्रायंता है, जो इस ब्रहमांड को पुना व्यवस्थित कर सकती है, जिससे वह सर्वोच्च पद के लिए पूर्णता योग्य हैं।
06:20प्रियवरत ने नारद के शब्दों को धैर्य पूर्वक सुना, फिर अपनी आखे जुका कर विनमरता पूर्वक उत्तर दिया कि वे
06:27सांसारिक मुहमाया से विरक्थ होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हैं और राजकाज उनके आध्यात्मिक लक्ष में बाधा उत्पन करे
06:50नारद ने फिर अपनी वीना के तारों पर हात फेरा और गंभीर स्वर में प्रियवरत को उनके क्षत्रिय धर्म का
06:58स्मरण कराया, यह बताते हुए कि एक राजा का कर्तव्य केवल स्वयन के मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रजा
07:05के कल्यान के लिए भी होता है
07:09देवर्शी ने तर्क दिया कि स्रिष्टी की सेवा करना भी परमेश्वर की सेवा का ही एक रूप है, और इस
07:15प्रकार राजकाज को धर्म और न्याय के साथ निभाना स्वयन एक महान यग्य के समान है, जो मोक्ष की ओर
07:23ले जाता है
07:25नारद ने चेतावनी दी कि यदि प्रियवरत ने इस समय शासन का भार नहीं संभाला, तो अधर्म और अंधकार पूरे
07:32ब्रहमांड में फैल जाएगा, जिससे देवता और मनुष्य दोनों ही अथा, कष्ट भोगेंगे, और स्रिष्टी का संतुलन बिगड जाएगा
07:41तभी एक दिव्य प्रकाश पुन्च के साथ स्वय भगवान ब्रहमा प्रकट हुए, उनके चार मुख और तेजस्वी स्वरूप से पूरा
07:50आश्रम आलोकित हो उठा, और उनकी उपस्थिती से हवा में एक अलोकिक सुगंध भर गई
07:57ब्रहमा जी के आगमन को देखकर प्रियवरत और नारत तुरंत उनके सामने साश्टांग दंडवत प्रणाम करने लगे, उनकी आखों में
08:05अपार श्रधा और सम्मान था, क्योंकि वे स्रिष्टी के रच्चिता के समक्ष थे
08:12ब्रहमा जी ने अपने चार मुखों से एक साथ प्रियवरत को सम्बोधित किया, उनके स्वर में दिव्य अधिकार और स्नेह
08:19था, उन्हें समझाते हुए कि यह शासन उनका कर्तव्य ही नहीं, बलकि एक दिव्यकार्य है, जिसे उन्हें पूर्ण करना ही
08:27होगा
08:29उन्होंने प्रियवरत को समझाया कि ब्रहमांड में प्रत्येक प्राणी का अपना विशिष्ट स्थान और भूमिका है, और उनकी तपस्या भी
08:37एक बड़े दिव्य विधान का हिस्सा है, लेकिन इस क्षण उनका सर्वोच धर्म लोक कल्यान के लिए राजकाज संभालना ह
08:46ब्रहमा जी के अकाट्य तरकों और दिव्य आदेश को सुनकर प्रियवरत ने अंत्ध अपने तपस्या का मोहत्याग कर भारी मन
08:55से लेकिन द्रिड संकल्प के साथ ब्रहमांड के सर्वोच सिनहासन को स्वीकार करने के लिए अपना सिर जुका दिया
09:03भगवान ब्रहमा ने प्रियवरत के मस्तक पर अपना अभय हस्त रख कर उन्हें दिव्य राजा बनने का आशिर्वाद दिया और
09:10राजधर्म पालन का मार्ग प्रशस्त किया
09:14ब्रहमा जी के अंतरध्यान होते ही संपूर्ण वनक्षेत्र स्वर्ण में आभा और दिव्य सुगंध से सराबोर हो उठा
09:22प्रियवरत के आध्यात्मिक गुरु देवर्शी नारद ने मुस्कुराते हुए उन्हें निश्काम भाव से संसार के कल्यान हेतु शासन करने की
09:31प्रेणा दी
09:33प्रियवरत ने परम भक्ती से देवर्शी नारद के चरण स्पर्ष किये और अपने गुरु से राजसी जीवन में भी वैराग्य
09:40बनाए रखने का आशिरवाद लिया
09:43पुत्र के निर्नै से प्रसन्न होकर स्वयंभू मनु अपने मंत्रियों के साथ वन में पधारे और प्रियवरत को हृदय से
09:51लगा लिया
09:53प्रियवरत ने अपने पिता के चर्णों में शीश नवाकर घोशना की की वे सृष्टी के संतुलन के लिए राजकाज का
10:00उत्तरदायत्व स्वीकार करते हैं
10:03तपस्वी के साधारण वस्त्रों में सुशोभित प्रियवरत अपने पिता और विशियों के साथ अपनी भव्य राजधानी बरहिश्मती की ओर प्रस्थान
10:12करने लगे
10:14राजधानी में प्रवेश करते ही प्रजाजनों और वैदिक ब्राहमनों ने मंत्रों चार तथा पुश्पवर्षा के साथ अपने नए समराठ का
10:22अभूत पूर्व स्वागत किया
10:25पवित्र नदियों के जल से भरे स्वर्ण कल्षों से प्रियवरत का महाभिशेक किया गया जिससे उनका दिव्य तेजोवले और अधिक
10:33प्रदीक्त हो उठा
10:35प्रियवरत को बहुमूल्य रतनों से जड़ा राजमुकुट, रेश्मी पीतांबर और दिव्य आभूशन पहना कर एक चक्रवर्ती समराठ के रूप में
10:44सुसज़ित किया गया
10:46नवभिशिक्ट समराठ प्रियवरत ने स्वयंभू मनु के भव्य सिनहासन पर विराजमान होकर समस्त ब्रहमांड के कल्यान का संकल्त लिया
10:56स्वयंभू मनु ने अपने पुत्र को धर्मदंड सौंप कर राज्य का संपूर्ण भार उन्हें सौपा और स्वय अंतिम तपस्या के
11:03लिए वन की ओर प्रस्थान किया
11:06विश्वकर्मा की परमसुंदरी और गुनवती पुत्री बरहिश्मती के साथ समराट प्रियवरत का अत्यंत वैदिक एवं भव्य विवाह संपन्न हुआ
11:16महारानी बरहिश्मती और राजा प्रियवरत ने एक साथ अगने कुंड में आहुतियां देकर प्रजा की समरिध्धी और सुक्षान्ती के लिए
11:25महान यज्य आयोजित किया
11:28विशाल सामराज्य और असीन राजसी वैभव के बीच रहते हुए भी राजा प्रियवरत का चित्त सदैव भगवान विश्नु के ध्यान
11:36में पूर्णत है लीन रहता था
11:39मंत्रियों और रिशियों द्वारा प्रस्तुत जटिल शास्किये समस्याओं को राजा प्रियवरत अपनी दिव्य बुद्धी और न्याय प्रियता से क्षन भर
11:47में सुलजा देते थे
11:49समराट प्रियवरत के धर्मनिष्ट शासनकाल में राज्ज में अधर्म, भय और दरिद्रता का पूर्णत विनाश हो गया तथा चारों और
11:57समरिध्धी छा गई
11:59एक रात्री राजप्रासाद के उच्छ शिखर पर खड़े होकर प्रियवरत ने देखा कि सुमेरु परवत के कारण प्रिथवी का आधा
12:07भाग अंधकार में डूबा रहता है
12:11संसार के एक हिस्से में लगातार अंधकार रहने से दुखी होकर प्रियवरत ने अपनी योगशक्ती से एक नया सूर्य जैसा
12:19प्रदीप्त रत बनाने का द्रेड संकल्प लिया
12:22रातरी के अंधकार को मिटा कर संपूर्ण प्रिथवी को निरंतर प्रकाश्मय करने के अपने अध्भुत संकल्प के साथ समराट प्रियवरत
12:31अपने दिव्यकार्य की तैयारी में जुट गए
12:35समराट प्रियवरत ने अपने संकल्प को साकार करने हेतु गेहन तपस्या और ध्यान में स्ववयं को लीन कर लिया
12:42उनकी योग शक्ती पृत्वी को प्रकाश्मय करने के अपने लक्ष पर केंद्रित थी
12:48उनकी तपस्या की तीवर्ता से प्रियवरत के चारों और एक अलौकिक तेज पुंज एकत्रित होने लगा, जो उनकी संकल्प शक्ती
12:56का प्रत्यक्ष प्रमान था
12:59स्वर्गलोक में बैठे देवगणों ने प्रित्वी पर प्रियवरत की असाधारन, योग शक्ती और उनके अध्भुत संकल्प को विस्मय भरी द्रिश्टी
13:07से देखा
13:09वे देवगण चिंतित थे कि यदि प्रियवरत ने वास्तव में दूसरा सूर्य रच दिया, तो स्रिष्टी का नैसर्गिक संतुलन और
13:17उसका कालचक्र गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है
13:22अपनी आशंकाओं और स्रिष्टी के संतुलन की चिंता को लेकर सभी देवगण त्रिलोकी के पितामः भगवान ब्रहमा जी की शरण
13:30में पहुँचे
13:32भगवान ब्रहमा ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से प्रिवरत के पवित्र संकल्प और उसके संभावित परिणामों को एक साथ देखा और
13:40स्रिष्टी के सुक्ष्म संतुलन को समझा
13:43उन्होंने अनुभव किया कि इस समय प्रिवरत को उनके तब के फल को राजधर्म में परिवर्तित करने के लिए दिव्य
13:50मार्ग गर्शन की आवश्चक्ता है
13:54देवलोग से उतरते हुए एक दिव्य स्वन आभा ने प्रिवरत के वनवास थल को अचानक प्रकाशित कर दिया जो भगवान
14:02ब्रहमा के आगमन का संकेत था
14:05शन भर में प्रिवरत के सामने स्वयं प्रजाप्ती ब्रहमा प्रकट हुए जिनका तेज करोडों सूर्यों के समान प्रकाशित हो रहा
14:13था
14:14प्रिवरत ने आखें खोली और सहसा अपने सामने भगवान ब्रहमा को देखकर विस्मय और श्रद्धा से अभिभूत हो गए उनकी
14:23तपस्या भंग हो चुकी थी
14:26भगवान ब्रहमा ने एक मधुर और गंभीर वानी में प्रिवरत को संबोधित किया उनके तप और द्रिड संकल्प की प्रशंसा
14:33करते हुए
14:35उन्होंने प्रिवरत को समझाया कि एक राजा के रूप में राजधर्म का पालन करना भी स्रिष्टी के दिव्य विधान का
14:42एक अनिवार्य हिस्सा है
14:45ब्रहमा जी ने कर्मयोग के महत्व पर बल देते हुए कहा कि निस्वार्थ भाव से लोग कल्यान के कार्य करना
14:52भी इश्वर की सच्ची भक्ती है
14:56प्रियवरत ने नमरता पूर्वक अपनी इच्छा व्यक्त की की वे सानसारिक मोहमाया से दूर रह कर आत्मग्यान और आध्यात्मिक मुक्ति
15:04प्राप्त करना चाहते हैं
15:07ब्रह्मा जी ने उन्हें धैर्य पूर्वक समझाया कि मुक्ती केवल वैराग्य से नहीं, बलकि सेलफलेस कर्मों द्वारा भी प्राप्त की
15:15जा सकती है, यदि वे कर्तव्यनिष्था से किये जाएं।
15:19उन्होंने प्रियवरत को बताया कि इस समय पृत्वी अत्यंत अशान्थ है और उसे उनके धर्मात्मा शासन और दिव्य शक्तियों की
15:28परम आवश्शक्ता है।
15:31प्रियवरत अपने सन्यास के मार्ग और ब्रह्मा जी के डिवाइन आदेश के बीच असमंजस में थे, एक गहरा आंतरिक संधर्ष
15:39उनके हृदय में उमड रहा था।
15:42भगवान ब्रह्मा ने उन्हें विश्वास दिलाया कि राजधर्म का पालन करते हुए भी उनकी आध्यात्मिक उन्नती कभी बाधित नहीं होगी,
15:51बलकि यह उनके तपको और अधिक फलदाई बनाएगा।
15:55आथक कर्तव्य के महान बोध से प्रेरित होकर, प्रियवरत ने ब्रह्मा जी के डिवाइन आदेश को स्विकार करते हुए श्रधा
16:03पूर्वक मस्तक जुकाया।
16:06ब्रह्मा जी ने प्रियवरत को राज्याभिशेक का आशिरवाद दिया और एक अध्भुत दिव्य उर्जा उनके भावी समराट के रूप में
16:14चारों और फैल गई।
16:15ब्रह्मा जी के वचनों से नवजीवन पाकर प्रियवरत ने अपने भीतर करतव्य निष्ठा और वैराग्य का एक अध्भुत सामंजस्य अनुभव
16:25किया जिसके तेज से उनका मुखमंडल और भी दैदी प्यमान हो उठा।
16:30समस्ट देवलोक में हर्ष की लहर दौड गई क्योंकि उन्होंने अपने भावी समराट में न केवल एक शक्तिशाली शासक बलकी
16:39एक दिव्यत अपस्वी के दर्शन किये जो धर्म और आध्यात्मिक्ता का प्रतीक बनने वाला था।
16:45शीघ्र ही राज्याभिशेक की भव्यत अयारिया आरंभ हो गई। देवशिल्पी विश्वकर्मा और मायावी शिल्पकारों ने स्वर्गलोक को एक अध्भुत उत्सव
16:56मंडप में बदल दिया।
16:59राज्याभिशेक के शुभ मुहूर्थ पर ब्रह्मांड के कोने कोने से रिशी, देव, गंधर्व और सिधगन उस पवित्र समारोह का साक्षी
17:06बनने हेतु एकत्र हुए, जिनकी उपस्थिती से वातावर्ण और भी पावन हो उठा।
17:13उस मंगल में अवसर पर स्वया भगवान ब्रह्मा चार मुखों से वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए, अपनी परम दिव्य
17:21उपस्थिती से समारोह को और अधिक गरिमा में बना रहे थे।
17:26फिर एक दिव्य शंकनाद के साथ प्रियवरत ने पवित्र सिनहासन की ओर कदम बढ़ाए, उनके हर पग में आध्यात्मिक द्रिड़ता
17:34और राजसी गरिमा का समनवय था।
17:37मंत्रोच चार और दिव्य जल के अभिशेक के साथ प्रियवरत ने राजमुकुट धारण किया और उनके सिर पर रखते ही
17:45ब्रहमांड में एक अध्भुत जोती प्रस्पुटित हुई।
17:49अब प्रियवरत त्याद और तपस्या के प्रतीक एक दिव्य समराठ के रूप में तीनों लोकों के अधिपती बन गए जिनकी
17:57द्रिष्टी में धर्म और न्याय का अटल संकल्प था।
18:00अपने शासन के प्रारंभिक काल में ही उन्होंने प्रिथवी पर व्याक्त अन्याय और अधर्म का नाश किया, प्रजा को भयमुक्त
18:08और समरिध जीवन प्रदान किया।
18:11परंतु एक दिन उन्होंने देखा कि सूर्य का रथ प्रिथवी के कुछ भागों को निरंतर प्रकाशित करता है, जबकि अन्यभाग
18:20अंधकार में डूबे रहते हैं, जिससे प्राणियों को कष्ट होता है।
18:25यह अस्मान्ता उनके न्यायप्रिय हरिदय को स्वीकार्य नहीं थी, उन्होंने संकल्प लिया कि वे स्वयन इस प्राकृतिक असंतुलन को दूर
18:34करेंगे।
18:35अपनी तपस्या और योग बल से उन्होंने एक अध्भुत रत का आहवान किया, जो स्वयन सूर्य के रत से भी
18:43अधिक वेगवान और तेजस्वी था।
18:45उस दिव्य रत पर आरूड होकर प्रेवरत ने प्रिथवी की परिक्रमा की और उनके रत के पहियों ने साथ विशाल
18:53रेखाये खीची, जिन्होंने सब्तद्वीपों की नीम रखी।
18:58इस प्रकार उनके रत के पहियों के निशान साथ विशाल महासागर बन गए, जो एक दूसरे से भिंता रखते हुए
19:06भी प्रिथवी को एक सूत्र में पिरोते थे।
19:28प्रजा का पालन करते थे, जिससे हर जगह धर्म और व्यवस्था का सामराज जिस्थापित हुआ।
19:35इस प्रकार प्रिवरत ने प्रिथवी पर दिन और रात की अस्मानता को दूर किया, जिससे सभी प्राणियों को समान रूप
19:42से सूर्य के प्रकाश का लाभ मिल सके।
19:45उनके दिव्य शासनकाल में प्रिथवी पर स्वर्णयुक का सूत्र पात हुआ, जहां हर जीव आनंद और समरिध्धी से परिपूर्ण था
19:54और धर्म का ध्वज सर्वत्र लहरा रहा था।
19:57राजसी सुखभोग में लिप्ट न होकर उन्होंने अपने आध्यात्मिक पत का अनुसर्ण जारी रखा, जिससे उनका जीवन कर्मयोग का साक्षात
20:07उदाहरन बन गया।
20:08इस प्रकार राजा प्रियवरत ने न केवल प्रिथवी का नवसरिजन किया बलकि अपने त्याग और कर्तव्य प्रायंता से आने वाली
20:17पीढियों के लिए एक अध्वितिय आदर्श स्थापित किया।
20:20दिव्य शासन की बागदोर संभालने के बाद राजा प्रियवरत ने अनुभव किया कि इस विशाल प्रिथवी पर और अधिक व्यवस्था
20:30तथा संतुलन स्थापित करने की आवश्शक्ता है।
20:34ब्रहमा जी की सुक्ष्म प्रेना से उनके मन में एक भव्य योजना आकार लेने लगी जिससे प्रिथवी के बिखरे हुए
20:42भूभागों को एक सुव्यवस्थित रूप दिया जा सके।
20:46उन्होंने अपने विश्वसनिय राजगुरूओं और दिव्य रिशियों को आमंत्रित किया ताकि इस महती कार्य की रूप रेखा पर गहन विचार
20:54विमर्ष किया जा सके।
20:56उस समय प्रिथवी एक विशाल अविभाजित भूभाग के रूप में विस्तरित थी, जिसे भोग भूमी के नाम से जाना जाता
21:04था, जहां मानव निवास करते थे।
21:08अपनी दिव्यद्रिष्टी और संकल्प शक्ती से प्रिवरत ने इस विशाल भूमी को साथ खंडों में विभाजित करने का निश्चय किया,
21:16ताकि व्यवस्था और शासन की सुविधा हो सके।
21:20इस कार्य हेतु, उन्होंने सूर्यदेव के समान तेजस्वी एक दिव्यरत पर आरूढ होकर प्रिथवी का भ्रमन आरंभ किया, जिसका वेग
21:29वायू से भी तीव्र था।
21:31जहां जहां उनके रत के पहिये चले, वहां वहां विशाल गहरी खाईया बनी, जो आगे चलकर अथा समुद्रों में परिवर्तित
21:39हो गई।
21:41पहियो द्वारा बनी पहली खाईय ने जम्बू द्वीप को अन्यभू भागों से प्रिथक किया, जो अपने विशाल जम्बू व्रिक्ष के
21:48लिए प्रसिद्ध हुआ।
21:50दूसरी खाई से प्लक्षद्वीप का स्रिजन हुआ, जहां से प्लक्ष व्रिक्षों की अध्गुत सुन्दर्ता और सुगंध वायुमंडल में फैल गई।
22:00इसी क्रम में तीसरी गहरी खाई ने शालमली द्वीप को जन्म दिया, जो अपने विशाल शालमली, सेमल, व्रिक्षों और सुगंधित
22:08पुष्पों के लिए विख्यात हुआ।
22:11चौथी खाई से कुषद्वीप अस्तित्व में आया, जिसकी विशेष्टा वहां के पवित्र और निर्मल कुषा घास के विस्तृत मैदान थे।
22:19फिर पांचवी खाई ने क्रौँच अद्वीप को आकार दिया, जो अपने दुर्गम परवतों और क्रौँच पक्षियों के मधुर कलरव से
22:28गुझायमान रहता था।
22:30छठी खाई के निर्मान से शकद्वीप का उद्धव हुआ, जहां बडेब्रे शाक व्रिक्षों, टीक व्रिक्ष के घने जंगल अपनी चाया
22:39फैलाते थे।
22:41अंतह सात्वी और अंतिन खाई ने पुषकर द्वीप को स्रिजित किया, जो अपने विशाल और अलोकिक कमल पुषपों के लिए
22:48विश्व विख्यात हुआ।
22:51इस प्रकार, राजा प्रियवरत ने अपनी दिव्य शक्ती से पृत्वी को साथ विशाल द्वीपों, जंबू, लक्ष, शालमली, कुष, क्रॉंच, शक
22:59और पुषकर्प में विभाजित किया।
23:02कार्य संपन्य होने पर प्रियवरत ने अपने योग्य 10 पुत्रों में से साथ को इन नवस्रिजित द्वीपों का अधिपती नियुक्त
23:10किया।
23:10पिता के आदेश को शिरोधार्य करते हुए, प्रत्येक पुत्र ने अपने अपने द्वीब का शासनभार ग्रहन किया और धर्म प्रायनता
23:19से प्रजाका पालन करने का संकल्प लिया
23:23प्रियवरत ने प्रत्येक द्वीब के लिए धर्म, न्याय और नैतिक्ता पर आधारित सार्वभौमिक नियम स्थापित किये जो युगो लुगो तक
23:31मार्ग गर्शक बने
23:33उनके कुशल प्रशासन और पुत्रों के धर्मनिष्ट शासन में सातों द्वीब शान्ती, समरिध्धी और आध्यात्मिक उन्नती के शिखर पर पहुँच
23:43गए
23:44अपने कर्तव्य को पूर्ण कर प्रिवरत ने अनुभव किया कि उन्होंने न केवल प्रिथवी का नवस्रिजन किया है, बलकि आने
23:52वाली पीधियों के लिए धर्म का एक सुद्रिड मार्ग भी प्रशस्त किया है
23:58एक दिन अपने नवस्रिजित द्वीपों का निरीक्षन करते हुए, राजा प्रिवरत ने अनुभव किया कि सूर्य की तेजस्वी किरने प्रिथवी
24:06के कुछ हिस्सों को निरंतर प्रकाशित करती हैं, जबकि अन्यभाग घोर अंधकार में डूबे रहते हैं, जिससे जी�
24:16इस असमान वितर्ण ने उनके हृदय में पीडा जगा दी, क्योंकि उन्होंने देखा कि कुछ प्राणी कभी सूर्य का प्रकाश
24:24नहीं देख पाते और अपने जीवन को गेहन अंधकार में व्यतीत करने को विवश हैं, प्रजा के इस दुख को
24:33देखकर, प्रिवरत ने अ�
24:35जोकिक शक्तियों का उपियोग कर इस ब्रहमांडी असंतुलन को ठीक करने का द्रिड संकल्प लिया, ताकि हर प्राणी को सूर्य
24:43का न्यायपूर्ण प्रकाश प्राप्थ हो सके।
25:06जिससे एक भव्य स्वर्नरत उनके समक्ष प्रकट होने लगा।
25:35जैसे वे स्वयन सूर्य के साथ एक आकार हो गए हो।
25:39रत ने एक गर्जना के साथ गती पकड़ी आकाश को चीरते हुए आगे बढ़ा।
25:45प्रियवरत के नियंत्रण में यह सूर्य की परिक्रमा करने वाले एक दूसरे सूर्य की भांती प्रतीत हो रहा था।
25:53प्रियवरत ने अपनी दिव्य शक्ती से रत को प्रित्वी के चारों और साथ बार घुमाया।
25:59प्रत्येक घुमाव एक नए मार्ग का निर्मान करता हुआ।
26:02जैसे वे ब्रहमांडिय कमपास से प्रित्वी को विभाजित कर रहे हुँ।
26:07उनके रत के पहियों से निकली गहरी दरारे महासागरों में परिवर्तित हो गई।
26:12और इस प्रकार पृत्वी सात महाद्वीपों और सात समुदरों में विभाजित हो गई, जो अब सूर्य के प्रकाश को समान
26:20रूप से प्राप्ट करते थे
26:23प्रत्येक पहिये के निशान ने प्रित्वी पर एक गहरा निशान छोड़ा, जो धीरे-धीरे विशाल नीले महासागरों में परिवर्तित हो
26:31गया, जिसने सातों द्वीपों को स्पष्ट और स्थाई रूप से सीमांकित कर दिया
26:37अब सूर्य का स्वर्णिम प्रकाश प्रित्वी के प्रत्येक कोने तक समान रूप से पहुँचता था, जिससे कोई भी भाग अंधकार
26:45में नहीं रहता और सभी प्राणियों को जीवन और उर्जा मिलती थी
26:50प्रियवरत की इस अनुपम रचना ने ब्रहमांडिय संतुलन को पुनर स्थापित किया, जहां दिन और रात का चक्र अब न्याय
26:58संगत था, जिससे जीवन चक्र सुचारू रूप से चलने लगा
27:03प्रित्वी के कोने कोने में स्थित प्राणियों ने इस नए संतुलित प्रकाश व्यवस्था का आनंद लिया, उनके हृद्यों में कृतग्यता
27:11और प्रसन्नता की लेहर दोड़ गई, जिसने संपूर्ण वातावर्ण को भक्तिमय कर दिया
27:17अपने कार्य को पूर्ण कर प्रिवरत ने रत से उतर कर प्रित्वी को निहारा, उनके चहरे पर एक गहरी शांती
27:24और पर्मानंद की अभिव्यक्ती थी, यह जानते हुए कि उन्होंने अपनी प्रजा के लिए चिरस्थाई कल्यान सुनिश्चित किया है
27:33इस महान उपलब्धी के बाद प्रिवरत ने अनुभव किया कि उन्होंने अपने राजधर्म का सर्वोच पालन किया है और अब
27:42उन्हें संसार के बंधनों से मुक्त होकर आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए
27:48उन्होंने अपने योग्य पुत्रों को बुला कर उन्हें सातों द्वीपों का शासनभार सौपा उन्हें धर्म, न्याय और प्रजाकल्यान के सिध्धान्तों
27:57पर चलने का उपदेश दिया
28:00समस्त राजसी वैभव और सांसारिक मोह को त्याग कर प्रियवरत ने वन की ओर प्रस्थान किया, उनका हृदय पूर्णत है
28:08परमात्मा के ध्यान में लीन था, मुक्ती के मार्ग पर चलते हुए
28:13उनके पुत्रों ने अपने पिता के पच्चहनों पर चलते हुए, सातों द्वीपों पर धर्मनिष्ट और न्यायपूर्ण शासन किया, जिससे प्रियवरत
28:22की स्थापित व्यवस्था पीढ़ी दर्पीढी पुश्पित होती रही
28:26इस प्रकार, राजा प्रियवरत ने न केवल प्रित्वी को एक नई संग्रचना दी, बलकी धर्म और सुशासन का एक ऐसा
28:34चिरस्थाई आदर्श स्थापित किया, जिसने युगों तक मानवता का मार्ग दर्शन किया
28:39सूर्य की असमान गती से प्रित्वी के कुछ हिस्से अंधकार में डूबे रहने से विचलित चक्रवर्ती समराथ प्रियवरत ने न्यायपून
28:48प्रकाश की सार्वभौमिक व्यवस्था का संकल्प लिया
28:52अपनी दिव्य तपस्या से अरजित असीम शक्ती को स्मरण करते हुए, उन्होंने इस खगोलिय विश्मता को सुधारने का अटल निश्चय
29:01किया
29:02तभी आकाश में एक अध्भुत सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य रत प्रकट हुआ, जो स्वयन ब्रहमा द्वारा प्रदत था और
29:11ब्रहमांडिय उर्जा से उतप्रोत था
29:14उस रत के पहिये ब्रहमांडिय समय के चक्रों के समान विशाल और शक्तिशाली थे, जो किसी भी बाधा को पार
29:21करने में सक्षम थे
29:24राजा प्रियवरत ने अपनी पूरी दिव्यता और राजसी गरिमा के साथ उस तेजस्वी रत पर आरूड होकर अपने असाधारण अभियान
29:32का सूत्रपात किया
29:35सूर्य देव के पीछे-पीछे चलते हुए, उनका रत अनंत आकाश में तीवर गती से आगे बढ़ने लगा, प्रित्वी पर
29:42अपनी दिव्य चाया बिखेरते हुए
29:46जैसे ही रत का पहिया प्रित्वी से स्पर्श करता, उसकी उर्जा से एक विशाल गहरा खाचा बनने लगता, जो भूमी
29:53को भेदता हुआ आगे बढ़ता
29:56यह खाचा, प्रियवरत के संकल्प और दिव्य शक्ती का प्रतीक, प्रित्वी के भूभाग को चीरता हुआ एक विशाल खाई में
30:04बदल गया
30:06देखते ही देखते, उन गहरी खाईयों में दिव्य जल भर गया, जो चम्चमाते हुए साग्रों में परिवर्तित होकर प्रित्वी को
30:14विभाजित करने लगे
30:15इस प्रकार पहला विशाल द्वीप, जम्बू द्वीप अपने स्वयं के प्रकाश और प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अस्तित्व में आया
30:25प्रियवरत ने बिना रुके अथक गती से प्रित्वी की साथ बार परिक्रमा की प्रत्यक परिक्रमा में एक नया सागर निर्मित
30:33करते हुए
30:35दूसरा खाचा बना और फिर दूसरा सागर प्रकट हुआ जिसने एक और विशाल भूभाग को प्रित्वी से अलग कर दिया
30:43फिर तीसरे द्वीब का निर्मान हुआ, जब तीसरा समुद्र अपनी असीन गहराई के साथ धर्ती पर अपनी जगह बना रहा
30:51था
30:52और फिर चौथा, पांचवा, छठा और अंतमे सात्वा द्वीब प्रियवरत के अविस्मर्निय पराक्रम से क्रमबध रूप से आकार लेने लगे
31:03हर एक महासागर अपने अध्वितिय जल से एक विशाल भूभाग को घेरता हुआ, उसे एक प्रिथक द्वीब का रूप दे
31:11रहा था
31:11इस प्रकार प्रित्वी साथ विशाल द्वीपों, सब्तद्वीप और साथ विशाल महासागरों में विभाजित हो गई, जहां हर कोने में समान
31:21रूप से प्रकाश पहुचता था
31:24आकाश से देवगण और गंधरवगण इस अध्भुत स्विजन को देखकर चकित और आनन्दित हो उठे, प्रियवरत के पराक्रम की स्तुती
31:32कर रहे थे
31:34प्रियवरत ने संतुष्टी से मुस्कुराते हुए अपने अभियान को पूर्ण किया, ब्रहमांडिय संतुलन को पुनर स्थापित करते हुए
31:43प्रिथवी अब एक सुव्यवस्थित, समरूप द्रह बन गई थी, जहां प्रत्येक प्राणी को जीवन के लिए आवश्चक प्रकाश समान रूप
31:51से प्राप्थ होता था
31:53इस प्रकार, राजा प्रिवरत ने न केवल प्रिथवी को एक नई संरचना दी, बलकी धर्म और सुशासन का एक ऐसा
32:02चिरस्थाई आदर्श स्थापित किया, जिसने युगों तक मानवता का मार्ग दर्शन किया
32:08राजा प्रिवरत के न्याय पूर्ण शासनकाल में प्रिथवी पर एक अभूत पूर्व स्वर्ण युग का सूत्रपात हुआ, जहां हर जीव
32:16निर्भय और समरिध जीवन जीता था
32:19उनके प्रत्येक निर्णय में प्रजा का हित सर्वोप्री था, जिससे राज्ज में शान्ती और सम्रिधी की धारा अविरल बहती रही
32:28अपने राजसी कर्तवियों के बीच, राजा प्रिवरत के जीवन में बरहिश्मती का आगमन हुआ, जो अपनी सौमयता और सुन्दर्ता से
32:37पूरे महल को प्रकाशित करती थी
32:40उनकी उपस्थिती ने प्रिवरत के जीवन में एक नई पूर्णता ला दी और शीघर ही दोनों का विवाह भव्य समारोहों
32:48के साथ संपन्न हुआ
32:50समय बीतने के साथ उनके अटूट प्रेम ने एक मजबूत नीम रखी, जिसने उनके राज्य और परिवार को और भी
32:58मजबूत बनाया
33:00कुछ समय बाद महल में खुशियों की लहर दोड़ गई जब यह शुब समाचार आया कि महारानी बरहिश्मती गर्भवती है
33:10और फिर एक शुब महुर्त में एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने अगनिध्र रखा, जो उनके वन्ष
33:18का पहला चिराग था
33:20इस शुब अफसर पर पूरे राज्ज में उत्सव मनाया गया, जहां प्रजा ने अपने नए राजकुमार के आगमन पर हर्शोलास
33:28प्रकट किया
33:30समय के साथ बरहिश्मती ने नौ और पराक्रमी पुत्रों को जन्म दिया, जिससे प्रियवरत का वन्ष और भी विशाल हो
33:38गया
33:39इन पुत्रों के अतिरिक्ट उन्हें एक पुत्री भी प्राप्थ हुई, जिसका नाम उन्होंने उजस्वती रखा, जो अत्यंत रूपवान और तेजस्वी
33:48थी
33:49अपने ग्यारह बच्चों को देखकर प्रियवरत का हृदय गर्व और संतुष्टी से भर गया, क्योंकि उन्होंने एक समरिध और धार्मिक
33:58वन्ष की स्थापना की थी
34:00उनके पुत्रों ने अपने पिता के सत्गुनों को आत्मसाथ किया, और युवावस्था में ही पराक्रमी राजकुमारों के रूप में ख्याती
34:08अर्जित की
34:10राज्य का विस्तार और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए प्रियवरत ने अपने विशाल सामराज्य को व्यवस्थित करने का विचार किया
34:19उन्होंने महसूस किया कि इतनी बड़ी प्रित्वी का संचालन अकेले करना कठिन होगा और प्रत्येक शेत्र को समर्पित शास्कों की
34:28आवश्चक्ता होगी
34:30एक दिन उन्होंने अपने सभी पुत्रों को दर्बार में बुलाया और उन्हें अपने सामराज्य के भावी विभाजन की योजना समझाई
34:39उन्होंने अपनी अद्वितिय योग शक्ती का उप्योग करके प्रिथवी को साथ विशाल द्वीपों, सब्तद्वीपों में विभाजत किया, प्रत्येक को एक
34:49विशिष्ट पहचान दी
34:51ततपश्चात उन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र अगनिध्र को जम्बू द्वीप का समराट घोशित किया, जो सभी द्वीपों में सबसे प्रमुख
35:00था
35:01शेश पुत्रों को भी क्रमश अन्यद्वीपों, जैसे प्लक्ष, शालमली, कुष, क्रॉंच, शाक और पुषकर के शासक नियुक्त किया गया
35:10इस प्रकार प्रियवरत के राज्य का विस्तार हुआ और उनके पुत्रों ने अपने अपने द्वीपों में धर्म और न्याय की
35:17स्थापना की
35:19प्रियवरत के इस दिव्यशासन और वंश विस्तार ने युगों तक एक आदर्श स्थापित किया, जिसने प्रिथवी पर धर्म और सुशासन
35:27की नीम्व को चिरस्थाई बना दिया
35:31प्रियवरत महाराज, जिन्होंने युगों तक प्रित्वी पर धर्म का ध्वज फहराया था, अब अपने विशाल सामराज्य और यशस्वी पुत्रों को
35:39देखकर एक गहन संतोश में डूबे थे, किन्तु उनके भीतर वैराज्य की अगनी पुनह प्रजवलित होने लगी थी
35:48राजसी वस्त्रों और अलंकर्णों के बीच भी उनकी आखों में अब एक अद्वितिय शान्ती और अनासक्ती का भाव स्पष्ट जलक
35:56रहा था, जैसे वे भौतिक संसार से धीरे-धीरे विमुक हो रहे हूँ
36:01उन्हें अपने युवावस्था के वेपल्स मरण होने लगे, जब उन्होंने ब्रहम लोग की यात्रा कर ब्रहमाजी से वैराग्य त्याग कर
36:10ग्रिहस्थ जीवन अपनाने का निर्देश प्राप्त किया था
36:14एक और उनका कर्तव्यबोध था, जो उन्हें प्रजापालक के रूप में बांधे रखता था, और दूसरी और वैराग्य की प्रबल
36:22इच्छा, जो उन्हें मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने को प्रेरित करती थी
36:28उन्होंने अपने सक्षम पुत्रों को देखा, जो अपने अपने सब्तद्वीपों में धर्म और न्याय के साथ कुशलता पूर्वक शासन कर
36:36रहे थे, और उनके हृदय में एक गहरा विश्वास जागा की उनका कार्य अब पूर्णता की ओर है
36:44वर्षों के न्यायपूर्ण शासन, प्रजा के कल्यान और धर्म की स्थापना के बाद, उन्हें यह स्पष्ट प्रतीती हुई की उनके
36:52सांसारिक कर्तव्य अब पूरे हो चुके हैं
36:56अब उनका मन राजसी सुखों से विरक्थ होकर उन्हा उस परम सत्य की खोज में लीन होने लगा, जिसके लिए
37:03उन्होंने कभी सांसारिक मोहमाया का त्याग किया था
37:07प्रत्यक सूर्यास्त के साथ उनके हृदय में वैराग्य की ज्वाला और तीवर होती जा रही थी, जो उन्हें संसार के
37:15बंधनों से मुक्थ होने का स्पष्ट संकेट दे रही थी
37:19गेहन चिंतन और आत्म प्रीक्षन के उपरांत, उन्होंने अंत्ता अपने राजसी जीवन को त्याग कर पुना वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश
37:28करने का द्रिढ निश्चय कर लिया
37:30एक भव्य सभा का आयोजन किया गया, जहां महाराज प्रियवरत ने अपने सभी मंत्रियों, गुरुजनों और प्रमुख पुत्रों को एकत्रित
37:39कर अपने हृदय की बात बताई
37:42उनके शब्दों ने सभा में गेहन सन्नाटा भर दिया, मंत्रियों और पुत्रों के चहरे पर आश्चर्य और चिंता के मिश्रित
37:50भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
37:53शांत स्वर में प्रियवरत ने अपने जीवन के उद्देश, राजधर्म की पूनता और अब मोक्ष के मार्क पर अग्रसर होने
38:01की अपनी तीवर आकांख्षा को व्यक्त किया
38:05उन्होंने अपने जेश्ट पुत्र अग्निध्र को बुलाया और उसे अपने पास बिठाकर राज्य के भावी उत्तराधिकारी के रूप में उसके
38:13कर्तवियों का स्मरण कराया
38:16प्रियवरत ने अग्निध्र के हाथों में शासन की बागदोर सौंपते हुए उसे धर्म और न्याय के पथ पर चल कर
38:23प्रजाका कल्यान करने का आशिरवाद दिया
38:27राजसी रीतिरिवाजों के अनुसार अग्निध्र को विधिवक युवराज पद से महाराजा के पद पर अभिशिक्त किया गया जिससे राज्य को
38:35नया शासक प्राप्थ हुआ
38:38राज्या भिशेक संपन्न होते ही प्रिवरत ने ततकाल अपने समस्त राजसी वस्त्र और आभूशन उतार दिये और मात्र एक सरल
38:47भगवा वस्त्रधारन कर लिया
38:49अपने पुत्रों, बहुओं और अन्य परिजनों से विदा लेते हुए उनके चहरे पर कोई शोक नहीं था बलकि एक अद्वितिय
38:58शांती और आध्यात्मिक संतोश का भाव था
39:02उन्होंने राजमहल के भव्यद्वारों से बाहर कदम रखा, जहां उनका जीवन वर्षों तक राजसी वैभव से घिरा रहा था, अब
39:10वे एक मुक्ट आत्मा के समान थे
39:13उनके पीछे राजसी ठाटबाट और सामने अनंत आध्यात्मिक यात्रा थी, जिसमें वे बिना किसी मोह के द्रिड संकल्प के साथ
39:22आगे बढ़ रहे थे
39:24इस प्रकार महाराज प्रियवरत ने अपने जीवन के अंतिम लक्षे की ओर बढ़ते हुए एक सच्चे त्यागी का मार्ग अपनाया,
39:32जिसने न केवल अपने राज्य को बलकी स्वयं को भी परमात्मा को समर्पित कर दिया
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