श्रीकृष्ण के वैकुंठ गमन के बाद, द्वारका नगरी पर क्या बीता? 🌌 अर्जुन कैसे खो बैठे अपनी दिव्या शक्तियां? 💔 इस एपिसोड में, हम देखेंगे द्वारका का महाविनाश और समुद्र में उसके जलमग्न होने की हृदय विदारक गाथा। साथ ही, महर्षि वेद व्यास करेंगे कलयुग की ऐसी भविष्यवाणियाँ, जो धर्म, समाज और मानव जीवन के गहरे परिवर्तनों को उजागर करती हैं। कैसे होगा धर्म का पतन, राजा बनेंगे क्रूर और मानव जीवन में आएंगे नैतिक मूल्यों के भीषण बदलाव? कलयुग में भी मुक्ति का मार्ग क्या है? जानिए इन सभी रहस्यों को इस अद्भुत गाथा में! #विष्णुपुराण #कलयुग #द्वारका #अर्जुन #कृष्ण #भविष्यवाणी #हिंदूधर्म #पौराणिककथाएँ #धर्म
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00:00श्री कृष्ण के वैकूंट गमन के साथ ही द्वार का नगरी पर एक असहनिय शूनि उतर आया, जैसे किसी महाकाव्य
00:07का अंतिम प्रिष्ट अचानक ही फट गया हो, हर कोने से उनका दैविय स्पर्ष अद्रिश्य हो गया था.
00:14जो द्वार का कभी भगवान कृष्ण की अनुपम आभा से दैदी प्यमान रहती थी, आज वह किसी प्रियजन के अंतिम
00:22संस्कार के बाद के घर सी सूनी हर और गहरा सन्नाटा लिए खड़ी थी.
00:28भवन अब केवल पत्थर के ढाचे प्रतीत होते थे, जिन में जीवन का कोई स्पंदन शेश नहीं था, और हवा
00:35में केवल एक भारी उदासी घुल चुकी थी.
00:39इसी विकट स्थिती में हस्तिनापूर से एक अकिंचन सार्थी अर्जुन द्वारका के द्वार पर पहुँचा, जिसका हृदय भी इस अप्रत्याशित
00:48रिक्तता की आहट से भारी हो चला था.
00:52शेहर में प्रवेश करते ही, अर्जुन ने अनुभव किया कि यह वही द्वारका नहीं थी जिसे वह श्री कृष्ण के
00:59साथ हंसी और उच्सवों में डूबा देखता था, बलकि अब वह एक विशाल समाधिस्थल प्रतीत होती थी.
01:07उनकी आखों के सामने द्वारका का वैभव अब धूल में लिप्ता हुआ था, और हर गली से मातम और शोक
01:14की चीखें गूंज रही थी.
01:16आगे बढ़ते हुए अर्जुन ने देखा कि यादव स्त्रिया, जिनके माते कभी सिंदूर से दमकते थे, अब सूनी मांग और
01:25बिखरे केशलिये बिलख रही थी.
01:28उनका विलाप आकाश तक पहुँच रहा था, हर स्वर में अपने स्वामी, अपने प्रियतम क्रिश्न के अनुपस्थिती का गहरा विशाद
01:36छलगता था.
01:38अर्जुन ने अपने भीतर भी एक गहरे रिक्ट स्थान का अनुभव किया, जैसे उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय एकाएक
01:46समाप्थ हो गया हो.
01:48श्रीक्रिश्न की दिव्य उपस्थिती, उनकी रक्षा कवच, उनकी अनुपम आभा, सब कुछ ऐसे विलीन हो गया था, जैसे एक प्रचंड
01:57जोती अचानक बुझ गई हो.
02:00द्वार का, जो कभी देवताओं की राजधानी सी सुरक्षित थी, अब एक खुले द्वार सी प्रतीत होती थी, जहां किसी
02:08भी अनिष्ट का प्रवेश संभव था.
02:10अर्जुन ने अपने अश्रु भरे नेत्रों से उन शोकाकुल यादव महिलाओं को देखा और उनके समीप जाकर उन्हें सांत्वना देने
02:19का अस्फल प्रयास किया.
02:21परंतु उनकी पीड़ा इतनी गहरी थी कि कोई भी शब्द, कोई भी सांत्वना उन्हें उस शूने से बाहर नहीं निकाल
02:29सकती थी.
02:31अर्जुन को स्मरण हुआ कि कैसे श्री कृष्ण ने उसे गीता का ज्यान दिया था और कैसे हर संकट में
02:38उनके दिव्य मार्गदर्शन ने ही उसे पार लगाया था.
02:42आज वही मार्गदर्शक, वही मित्र अद्रिश था और अर्जुन के मन में एक अज्यात भय का बीज अंकुरित होने लगा
02:50था.
02:51जिन भव्य महलों में कभी उत्सव की गूंच सुनाई देती थी, वहां अब एक ठंडी और भयावः चुप्पी पसर चुकी
02:59थी, दीवारों पर अतीत की कहानिया धूमिल हो रही थी.
03:04अर्जुन ने कृष्ण के निजी कक्ष में प्रवेश किया, जहां उनकी अनुपस्थिती इतनी तीवर थी कि मानो कमरे की हर
03:11वस्तु उनकी प्रतीक्षा कर रही हो.
03:14युद्ध का अन्त भले ही हुआ था, किन्तु अब एक नया और अधिक भयानक अन्त द्वारका के क्षितिच पर मंडरा
03:22रहा था, एक ऐसा अन्त जिसकी भविश्यवानी स्वयन श्री कृष्ण ने की थी.
03:28अपने परमसखा और गुरु को खोकर, अर्जुन का हृदय एक बार फिर कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल सा विरान हो गया था,
03:35जहां जीत भी हार सी लगती थी.
03:39द्वारका के जलसमाधी की यह शांत शुरुवात मात्र थी, एक ऐसी कथा का प्रस्तावना, जो धर्म के पतन और कल्युप
03:47के आरंभ की ओर संकेट कर रही थी.
03:50द्वारका के उजरते वैभव को पीछे छोड़ते हुए, शोक में डूबे अर्जुन ने रोति बिल्खती यादव स्त्रियों और अनाथ बच्चों
03:58को हस्तिनापुर ले जाने के लिए एकत्र किया.
04:02जैसे ही शर्णार्थियों का यह विशाल दल द्वारका के मुख्य द्वार से बाहर निकला, सभी ने अपने उस स्वर्ध जैसे
04:10घर को अंतिम बार अश्रुपूर्ण नेत्रों से देखा.
04:13उनके प्रस्थान करते ही समुद्र की विशाल, प्रल्यंकारी लहरेंग उग्र होकर द्वारका के विशाल स्वर्ण महलों और मंदिरों को निगलने
04:22के लिए आगे बढ़ने लगी.
04:25अपने रत पर सवार अर्जुन के मन पर गहरी उदासी चाई हुई थी और उन्हें अपने ही अंग किसी अद्रिश्य
04:32भार के नीचे दबे हुए महसूस हो रहे थे.
04:47रत की कमान संभालते हुए अर्जुन ने अपने उन हाथों को देखा, जिन्होंने कभी कुरुक्षेत्र में हाहाकार मचाया था, पर
04:55आज वे बिना किसी कारण के काम परहे थे.
04:59एक उजार और सुनसान वन में रात्री विश्राम के लिए जब यह काफिला रुका, तो सुने आस्मान के नीचे केवल
05:07भैभीत बच्चों और स्त्रियों की रोने की आवाजे गूंज रही थी.
05:12इसी अंधकार का लाब उठाकर, लाठियों और जंगली हतियारों से लैस दस्यों के एक क्रूर जुंड ने इस असहाय काफिले
05:20को चारों ओर से घेर लिया.
05:23यादव स्त्रियों के बहुमूल्य आभूशनों और धनसंपत्ती पर ग्रिष्टी गडाय वे लाल्ची और आक्रामक लुटेरे हिंसक अटहास करते हुए आगे
05:32बढ़े.
05:33अपने कर्तव्य की वेदी पर खड़े अर्जुन ने अपनी पुरानी वीर्ता को समेकते हुए शत्रूओं को भस्म करने के लिए
05:41अपने दिव्य गांडीव धनुष को उठाया.
05:44परन्तु उनके आश्चर्य और भय का ठिकाना न रहा जब वही दिव्य गांडीव धनुष आज उन्हें एक विशाल परवत की
05:52भांती अत्यंत भारी और निश्प्रान प्रतीत हुआ.
05:56कुरुक्षेत्र के सबसे बड़े योध्धा को धनुष उठाने में हाम्फते और असमर्थ देखकर उन अज्ञानी लुटेरों के होसले और अधिक
06:05बढ़ गए और वे अर्जुन का उफास उड़ाने लगे.
06:09अत्यंत व्याकुल होकर अर्जुन ने अपनी दिव्य शक्तियों और अस्त्रों को जागरित करने वाले मंत्रों का स्मरण करने का प्रयास
06:17किया, किन्तु उनका मस्तिश्क पूरी तरह शून्य हो गया.
06:21जिन देवताओं के अस्त्र कभी एक पुकार पर अर्जुन के हाथों में प्रकट हो जाते थे, आज उन्होंने जैसे इस
06:29धरा से अपना नाता हमेशा के लिए तोड लिया था
06:33असाय अर्जुन के सामने ही वे निर्दई लुटेरे चीक्ती चिलाती यादव स्त्रियों को बंदी बनाकर उनके स्वर्णिम आभूशनों को लूटने
06:41लगे
06:43जब अर्जुन ने एक साधारन बान को भी प्रत्यंचा पर चढ़ाने का प्रयास किया, तो उनकी उंगलिया शिथिल हो गई
06:50और वह बान धूल में जागिरा
06:53बचे हुए पीडित और भैभीत लोग अपनी जान बचाने के लिए अंधकार से भरे घने जंगलों की ओर भागने लगे,
07:01जिससे पूरा शिविर पूरी तरह बिखर गया
07:05धूल से सने और आसुओं से भीगे अर्जुन अपने रत से नीचे गिर पड़े और अपनी इस विवश्टा पर फूट
07:12-फूट कर रोने लगे
07:14शुन्य आकाश की ओर देखते हुए अर्जुन को अंतह समझाया कि उनके सखा श्री कृष्ण के जाने के साथ ही
07:22द्वापर युग समाप्थ हो चुका है और कल्युग का क्रूर प्रभाव आरंभ हो गया है
07:28अपने तूटे हुए मन और शक्तिहीन शरीर को समेट कर अर्जुन ने हस्तिनापूर की ओर अपना अत्यंत दुखद और एका
07:36की मार्ग पुनह प्रारंभ किया
07:40हस्तिनापूर की ओर बढ़ते हुए अर्जुन का हृदय दुख और निराशा के बोज तले और भी अधिक दब गया
07:46मानोस्वयन नेती ने उनसे सब कुछ छीन लिया हो
07:50अपने तूट चुके साहस को बटोर कर उन्होंने शेश बची यादव महिलाओं, बच्चों और वृद्धों को एक सुरक्षित मार्ग पर
07:59ले जाने का निश्चय किया
08:01पंचजने छेत्र की शुष्क और धूल भरी धर्ती पर उनके रथों और पैदल यात्रियों का काफिला धीरे-धीरे एक दर्धनाक
08:09गती से आगे बढ़ रहा था
08:12चारों और पसरा सूखा और वीरान परिद्रिश्य अर्जुन के मन की असीम उदासी और खालीपन को दर्शाता था
08:21सहसा दूरक्षितिज से उर्ती धूल के गुबार में घोडों के खुरों की एक धीमी भयावः गड़गडाहट सुनाई दी जो एक
08:29आने वाले खत्रे का संकेत थी
08:32वीरान भूमी की गहराईयों से लुटेरों का एक क्रूर और अशिष्ट गिरोह अपनी नीच नियत के साथ काफिले की ओर
08:40तेजी से बढ़ने लगा
08:42उनका सरदार एक क्रूर और लालची व्यक्ति अपनी चमकती आखों से निहत्थे काफिले को घूर रहा था
08:50मानो वह उनका शिकार हो
08:53अर्जुन अपनी शेश रही शक्ती को बटोरते हुए अपनी गांडीव धनुष से उनका सामना करने के लिए आगे बढ़े
09:00मानो यह उनका अंतिम युद्ध हो
09:04लेकिन जैसे ही उन्होंने गांडीव की प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया
09:08उनके हाथ कापने लगे और वह धनुष उन्हें असाध्य रूप से भारी लगने लगा
09:15उनकी दिव्यशक्ती जो कभी effortlessly प्रकट होती थी अब कहीं खो चुकी थी
09:21मानो स्वयंकाल ने उसे उनसे छीन लिया हो
09:25अर्जुन की इस विविश्टा को भाम पकर लुटेरोंने क्रूरता से भरी आखों से काफिले पर हमला कर दिया
09:32उनके अस्त्रशस्त्र हवा में चमक रहे थे
09:36उन्होंने एक तीर चलाया पर उसमें वह दिव्यशक्ती नहीं थी
09:40और वह अस्त्र लुटेरों तक पहुँचने से पहले ही बेजान होकर धर्ती पर गिर पड़ा
09:45यादव महिलाय चीख उठीन जब लुटेरे उन्हें बलपूर्वक घसीट कर अपने साथ ले जाने लगे उनका प्रतिरोध व्यर्थ था
09:56अर्जुन ने अपने भीतर की अंतिम चिंदारी से एक दिव्य अस्त्र का आहवान करने का प्रयास किया पर आकाश मौन
10:03रहा कोई शक्ती प्रकट नहीं हुई
10:06स्वर्ग की शक्तिया शांत थी, देवलोग का कोई संकेत नहीं, मानो अर्जुन को उनके भाग्य पर अकेला छोर दिया गया
10:15हो
10:16वह खाली हाथों ही लुटेरों से भिड़ गये, पर उनकी संक्या और क्रूरता के आगे वह अकेला योध्धा असहाय और
10:24शक्तिहीन था
10:26देखते ही देखते, कई यादव महिलाओं को लुटेरे, धूल के गुबार में उन्हें घसीटते हुए, अपनी अंधेरी नेती की ओर
10:34ले गए
10:36अर्जुन अपने घुटनों पर गिर पड़े, उनकी आखें विवश्टा से भरी थी, उन्होंने इस भयानक ग्रिश को अपनी आखों के
10:44सामने घटित होते देखा
10:46एक अकेला आसू उनकी धूलसने गाल पर बह निकला, जो एक महान योध्धा की अंतिम असफलता और लाचारी का प्रतीक
10:55था
10:56बिखरे हुए सामान और अपने तूटे हुए गौरव के बीच, अर्जुन अकेले और पूर्णत्या पराजित पड़े रहे, उनका हृदय असहनिय
11:05पीडा से भरा था
11:07अर्जुन की असहनिय पीडा के बीच, द्वार का नगरी पर एक रहस्यमय शान्ती छा गई, जो आने वाले प्रलै का
11:15शान्त पूर्वसंकेत थी
11:17फिर समुद्र की गहराई से एक धीमी अथा गर्जना उठी, जैसे स्वयंकालदेव अपनी अनंत निंद्रा से जागरित हो रहे हो
11:27अचानक तट पर खड़े लोगों की फुस्फुसाटें भैभीत चीखों में बदल गई, जब उन्होंने देखा की समुद्र का जल अप्रत्याशित
11:36रूप से उपर उठ रहा था
11:38देखते ही देखते, विशाल लहरे परवतों की तरह उठने लगी और अपने क्रूर आलीगन में नगर की बाहरी दिवारों को
11:47निगलती चली
11:48गई
11:49आलीशान महल जिनके शिखर कभी आकाश को छूते थे, अब धीरे-धीरे समुद्र के अथा अंधकार में समाते जा रहे
11:57थे, जैसे कोई विशालकाय जीव उन्हें निगल रहा हो
12:02पवित्र मंदिर जहां सदियों से देवस्तुती गूंजती थी, अब लहरों की गर्जना में विलीन हो रहे थे, उनकी घंटिया जलमगन
12:10होने से पहले अंतिमबार बस उठी
12:14हर घर, हर गली, हर वह स्थान जहां जीवन की कहानिया बुनी जाती थी, अब नीररंग में रंकर एक अनंत
12:21अतीत का हिस्सा बन रहा था
12:24बचे हुए लोग अपनी जान बचाने के लिए निराशा में भागे, लेकिन चारों और से उठता जल उन्हें हर कोने
12:32से घेर रहा था, जैसे काल स्वयां उनका पीछा कर रहा हो
12:37समुद्र अब शान्त नीले जल का एक निर्मल रूप नहीं था, बल्कि वह एक विशाल, क्रोधित देवता था जो अपने
12:44अधिकारों को पुनह प्राप्त कर रहा था
12:48आकाश में काले, गर्जते बादल उमर पड़े, बिजली कड़कने लगी और तूफानी हवाय द्वारका के अंतिम अवशेशों पर शोक गीत
12:57गाने लगी
12:58दूर एक टीले पर अरजुन अभी भी जड़वत खड़े थे, उनके भीतर का योध्धा शान्त हो गया था और अब
13:06वे केवल एक मुख गवाह थे इस महाविनाश के
13:10भगवान कृष्ण का भव्य महल, जिसके एक-एक पत्थर में दिव्य उर्जा समाहित थी, अब धीरे-धीरे जल की गहराई
13:18में विलीन हो रहा था, जैसे कोई विराठ रिदय धड़कना बंद कर रहा हो
13:23नगर के कोलाहल और लोगों की चीखों पर अब समुद्र की भयानक गर्जना हावी हो चुकी थी, जो इस परिवर्तन
13:31की अंतिम और अजे ध्वनी थी
13:34एक-एक करके, उंची मीनारें, किले की दीवारें और अंतिम भूमी के टुकडे भी जल में समा गए, केवल एक
13:43भवर और विशाल लहरें शेश रहे गई
13:45जहां कुछ क्षण पहले एक भव्य नगरी थी, अब वहां सिर्फ अनन्त गहरा नीला समुद्र फैला हुआ था, जिसमें लहरें
13:54अतीत के रहसियों को दफन कर रही थी
13:58द्वारका का जल समाधी यह सिखाती थी कि संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है, न वैभव, न शक्ती, नहीं
14:05मनुष्य का अहंकार
14:07इस महा विनाश के साथ ही द्वापर युग का परदा गिर गया, और समय के चक्र ने एक नए कठिन
14:14युग की ओर करवटली
14:17अंधकार और अनिश्चित्ता का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था, जहां धर्म की मर्यादाए धुमिल पड़ जाएंगी और अधर्म
14:25का बोलबाला होगा
14:27अर्जुन ने अन्तिमबार उस स्थान की ओर देखा जहां कभी उनके प्रियद्वार का नगरी स्थित्थी, उनकी आखों में युगों के
14:35दुख और आने वाले कल्युग की आशंका स्पष्ट दिख रही थी
14:40द्वार का अब केवल किमबदंतियों में जीवित एक स्मृती, समुद्र की गहराईयों में अनंत काल तक विश्राम करती रहेगी, युगों
14:49लुगों तक एक दुख़द गाथा सुनाती हुई
14:52अर्जुन का हृदय अथाह पीडा से भरा था, जब उन्होंने अपनी आखों के सामने द्वार का को समुद्र की अतल
15:00गहराईयों में समाते देखा, मानो उनके स्वयन के अस्तित्व का एक अंश भी उसके साथ विलीन हो रहा हो
15:08विनाश का यह तांडव और अपनी अक्षमय कमजोरी उन्हें अंदर तक जख जोर रही थी, मानो स्वयन नियती ने उनसे
15:15सब कुछ छीन लिया हो और उन्हें एक शूने में छोर दिया हो
15:20उन्होंने महसूस किया कि यह केवल यादवों का अहंकार या एक श्राप का परिणाम नहीं था, बलकि किसी विशालतर अद्रिश
15:29शक्ती का खेल था जो युगों का अंत कर रहा था
15:33इस असीम दुख और अनिश्चित्ता के भमवर से निकलने के लिए अर्जुन ने महर्शी व्यास की शरण लेने का निश्चय
15:40किया, जो युगों के ज्यान के एक मात्र जीवित प्रतीक थे
15:45अपने मन में गेहन प्रशनों और हृदय में अथा शोक लिये, अर्जुन ने निर्जन वनों और पत्रीले मार्गों को पार
15:52करते हुए उस पवित्र आश्रम की और अपनी यात्रा आरंभ की, जहां महर्शी व्यास निवास करते थे
16:00जैसे जैसे वह आगे बढ़ रहे थे, प्रकृती का बदलता स्वरूप भी उन्हें कल्यव के आगमन का आभास करा रहा
16:08था, जहां हरियाली की जगह शुश्कता और जीवन की जगह क्षीनता हावी हो रही थी
16:14अंत्र कई दिनों के कठिन सफर के बाद, अर्जुन एक शांत और पवित्र आश्रम के समक्ष पहुँचे, जो अशांत विश्व
16:22के बीच एक शांती के द्वीप सा प्रतीत होता था
16:27आश्रम में प्रवेश करते ही, अर्जुन ने तुरंत महर्शी व्यास को एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे ध्यानस्थ अवस्था में बैठे
16:35देखा और श्रधा पूर्वक उनके चर्णों में नमन किया
16:39महर्शी व्यास ने अपनी दिव्यद रिष्टी से अर्जुन के हृदय की पीडा को तुरंत भाप लिया, मानों शब्दों की आवश्शक्ता
16:47ही न रही हो
16:49अर्जुन ने तूटे हुए स्वर में द्वार्का के जल्मगन होने, यादवों के विनाश और अपनी स्वयंकी विवशता की दुखत कहानी
16:57महर्शी को सुनाई, उनकी आखों से अश्रुधारा भह निकली
17:02व्यास देव ने धैर्य पूर्वक अर्जुन की हर बात सुनी, उनके मुख पर युगों के ज्ञान की शान्ती और आने
17:09वाले परिवर्तनों की अटूट समझ स्पष्ट दिख रही थी
17:13उनकी कथा समाप्थ होते ही, महर्शी व्यास ने अपनी आखें खोली और उनकी वानी में ब्रह्मांडिय सत्य की प्रतिध्वनी गूंजने
17:22लगी, जैसे स्वयंकाल उनसे बोल रहा हो
17:26उन्होंने समझाया कि ये घटनाय व्यक्तिगत आपदाय नहीं, अपितू युग परिवर्तन का संकेत हैं, द्वापर युग का अंट और कल्युग
17:34के पूर्ण आगमन की भविश्यवानी
17:38महर्शी ने बताया कि यह वह समय है, जब धर्म अपनी महिमाख होने लगेगा, और मानव समाज में नैतिक्ता का
17:45पतन होगा, जिससे अधर्म का सामराज्य स्थापित होगा
17:50उन्होंने विस्तार से समझाया कि कल्युग में मनुष्य की सत्यनिष्ठा, दया और करुणा जैसे गुनक्षीन होते जाएंगे और स्वार्थ तथा
17:59लोग का बोलबाला होगा
18:01व्यास ने बताया कि इस युग में देवत्व का हस्तक्षेप धीरे-धीरे कम हो जाएगा, और मानवता को अपने कर्मों
18:09के परिणामों का सामना स्वयं करना होगा
18:12अर्जुन ने महर्शी की बातों को गहनता से समझा और उनके हृदय में युगों के इस महान परिवर्तन की एक
18:20दुखत स्वीकृती जागरित हुई
18:23महर्शी व्यास ने अर्जुन को समझाया कि यद्यपी कल्युग अंधकार में होगा, फिर भी धर्म का मार्ग अपनाने वालों के
18:30लिए आशा की किर्णे सदैव विद्यमान रहेंगी
18:34उन्होंने अर्जुन को अपने कर्तवियों का पालन करने और धर्म के सिध्धान्तों को हृदय में धारन करने का उपदेश दिया,
18:42चाहे युग कितना भी प्रतिकूल क्यों न हो
18:46महर्शी ने उसे समझाया कि सच्चा धर्म बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता, बलकि यह आत्मा की शाश्वत जोती है,
18:54जो हर युग में प्रजवलित रहती है
18:57इस गेहन ज्यान को आत्मसात कर, अर्जुन ने अब एक शांत किंतु द्रिढ निश्चय के साथ महर्शी से विदाली, कल्यग
19:06के आरंभ का भार और अपनी भूमिका को स्वीकार करते हुए
19:11महर्शी व्यास ने अर्जुन को विदा करते हुए, भविश्य के अंधकार में आवर्ण को देखा, जहां युगों का परिवर्तन अपनी
19:19कुरूर छाया डाल रहा था
19:21जों-जों कल्युग अपनी पकड मजबूत करने लगा, क्योंतियों धर्म के प्रकाश को अज्यानता के घने बादल ढखते चले गए,
19:29चारों और एक आध्यात्मिक रात्री का आगमन हो रहा था
19:34कल्युग में राजा अपनी प्रजा के रक्षक नहीं, बलकि अन्याई शासक बन जाएंगे, जिनकी शक्ती केवल भय और शोशन पर
19:42आधारित होगी
19:44उनकी आखें सोने और रत्नों की चमक से चकाचौंध होंगी, और उनकी त्रिशना असीमित धन संग्रह के लिए निर्दोशों का
19:52रक्त बहाने से भी नहीं हिचकेगी
19:55सक्ता के मद में चूर्प वे अपनी प्रजा को मात्र मुहरे समझेंगे, जिनका उप्योग केवल अपनी महत्वाकांख्शाओं की पूर्ती के
20:04लिए किया जाएगा
20:06भारी और अन्याय पूर्ण करों के बोज तले दबी प्रजा, एक एक दाने के लिए तरसेगी, जबकी राजा अपने शाही
20:14सुखों में लिप्त रहेंगे
20:16उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं होगा, कमजोर और असहाय लोग शक्तिशाली के अत्याचारों के आगे घुटने टेकने को मजबूर
20:25होंगे
20:26न्याय के मंदिर स्वयं भरष्टता से दूशित होंगे, जहां सत्य की बजाय धन और बल की जीत होगी और निर्दोशों
20:34को दंडित किया जाएगा
20:36धर्म के पवित्र मार्ग को लोग स्वार्थ की संकरी गलियों में बदल देंगे, जहां व्यक्तिगत लाभी एक मात्र प्रेरक शक्ती
20:45बन जाएगी
20:46चारो और पीड़ा, भोख और निराशा का सामराज्य होगा, जहां हर आत्मा एक अनवरत संधर्ष में फंसी रहेगी
20:55सामाजिक व्यवस्था तारतार हो जाएगी, कानोन का कोई भय नहीं होगा और अराजकता ही नए युग का एक मात्र नियम
21:03बनेगी
21:05इन भयावध रिश्यों को देखकर महर्शी व्यास का हरिदय करुणा से भर उठा, वे जानते थे कि कलिग में धर्म
21:12की रक्षा करना सबसे बड़ी चुनौती होगी
21:16सत्य और इमानदारी केवल पुस्तकों में सिमट कर रह जाएंगे, जबकी छल, कपट और जूट हर संबंध की बुनियाद बन
21:24जाएंगे
21:26लोग बिना किसी संकोच के शप्थों को तोडेंगे, प्रतिग्याओं को भूल जाएंगे और अपने निजी लाब के लिए किसी भी
21:34हद तक गिरने को तैयार होंगे
21:37परिवार की पवित्रता मिट जाएंगी, बच्चे बड़ों का अनादर करेंगे और व्यवाहिक संबंध केवल स्वार्थ और वासना के बंधन रह
21:45जाएंगे
21:47प्रकृती भी मानव के पापों से पीडित होगी, नदिया सूख जाएंगी, वन उजाड हो जाएंगे और धर्ती अपनी उर्वर्ता खो
21:55देगी
21:57यग्य अनुष्ठान और पवित्र मंत्रों की गूंच शान्थ हो जाएंगी, क्योंकि लोग अपनी आत्मा के पोशन की बजाए भौतिक सुखों
22:05में लीन हो जाएंगे
22:07इश्वर में आस्था कमजोर पड़ जाएगी और लोग केवल वही मानेंगे जो वे अपनी आखों से देख सकें, विज्ञान और
22:16भौतिक्ता ही उनके नए देवता होंगे
22:19इन घोर अंधकार में भी कुछ आत्माए धर्म की मशाल जलाए रखेंगी, अकेले ही सही, किन्तु सत्य और नैतिक्ता के
22:27पत पर अडिग रहेंगी
22:30कल्यूग का यह भयावः चित्रदर्शाता है कि बाहरी दुनिया चाहे कितनी भी बिगड़ जाए, अंतरात्मा का धर्म ही व्यक्ती को
22:38मोक्ष की ओर ले जाएगा
22:40कल्यूग में समाज की वर्ण व्यवस्था चिन्नभिन हो जाएगी, जहां जन्म से नहीं, बलकि धन और शक्ती से व्यक्ती की
22:48पहचान होगी, जिससे सामाजिक तानाबाना पूरी तरह बिखर जाएगा
22:54विवा की पवित्रता लुक्त हो जाएगी, जहां रिष्टे केवल सुविधा और क्षणिक सुख के आधार पर बनेंगे, और प्रेम तथा
23:02निष्ठा जैसे उच्च मूल्य अर्थहीन हो जाएगे
23:06पति-पत्नी के संबंध मात्र दिखावा रह जाएंगे, जहां विश्वास और सम्मान की जगह संदे और स्वार्थ ले लेंगे, जिससे
23:14परिवारों की नीम कमजोर पड़ जाएगी
23:18नैतिक मूल्यों का पतन इतना गहरा होगा कि सत्य और इमानदारी को मूर्खता माना जाएगा, और छलत पठी सफलता का
23:26एक मात्र मार्ग समझा जाएगा
23:29लोग अत्यंत धोखेबाज हो जाएंगे, हर बात में जूट और फरेब का सहारा लेंगे, अपने निजी स्वार्थ के लिए दूसरों
23:38को चलने से भी नहीं हिचकिचाएंगे
23:41धन की लालसा इतनी तीवर होगी कि लोग धन समपत्ती के पीछे पागल होकर किसी भी हद तक गिरने को
23:48तयार हो जाएंगे, बिना किसी धर्म या नैतिक्ता का विचार किये
23:53क्रोध की अगनी हर हृदय में प्रजवलित रहेगी, छोटी-छोटी बातों पर लोग हिंसक हो उठेंगे, और शान्ती तथा धैर्य
24:01दुरलब वस्तु बन जाएंगे
24:04माता-पिता का कोई सम्मान नहीं होगा, बच्चे अपने बड़ों की आग्या का उलंधन करेंगे, और परिवार में कल है
24:12वविग्टन सामान्य बात होगी
24:15गुरुओं और शिक्षकों का अनादर किया जाएगा, ज्यान केवल आजिविका का साधन बन जाएगा, और विद्या का वास्तविक महत्व धूमिल
24:23हो जाएगा
24:25पारंपरिक रितिरिवाज और धर्म ग्रंथों का उपहास किया जाएगा, उन्हें पुराना और अर्थ ही मानकर त्याग दिया जाएगा, जिससे सांस्कृतिक
24:34विरासत नश्ट हो जाएगी
24:37अतिति सत्कार की भावना लुक्त हो जाएगी, लोग केवल अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहेंगे, और दूसरों के प्रती दया
24:45वह करुणा का भाव सूख जाएगा
24:48सजजन और धर्मात्मा लोग समाज से किनारा कर लेंगे, अपने विवेक और शान्ती की तलाश में एकांत का मार्ग अपनाएंगे,
24:57क्योंकि उन्हें समाज में कोई स्थान नहीं मिलेगा
25:01शासक वर्ग अन्याय पून और स्वार्थी हो जाएगा, वे प्रजा के हितों की बजाए अपनी धनसंपदा बढ़ाने पर ध्यान देंगे,
25:09जिससे जन्ता का कश्ट बढ़ेगा
25:12कानून और न्याय की व्यवस्था भ्रष्ट हो जाएगी, जहां धन्वान और शक्तिशाली लोग कानून को अपने अनुसार तोड मरोड सकेंगे,
25:20और निर्बलों को कोई सहारा नहीं मिलेगा
25:24अकाल और बीमारिया आम हो जाएंगी, जलवायू असंतुलित होगी, जिससे प्रित्वी पर जीवन दूभर हो जाएगा और प्राकृतिक आपदाए बढ़
25:34जाएंगी
25:35लोग आध्यात्मिक ज्यान से विमुख हो जाएंगे, वे केवल भौतिक सुखों के पीछे भागेंगे, आत्मा की शांती और मोक्ष की
25:43अवधार्नाय हास्यास्पद लगेंगी
25:47समाज में अनाचार और दुराचार अपनी पराकाश्था पर होगा, जहां नैतिक मर्यादाए तूट जाएंगी और पाप को पुन्य समझने की
25:56प्रवृत्ती बढ़ जाएगी
25:58यहां तक की सबसे पवित्र स्थानों, नदियों और जंगलों को भी मनुष्य के स्वार्थ और लालच के कारण प्रदूशित और
26:05नश्ट कर दिया जाएगा, जिससे प्रकृती का संतुलन बिगड़ जाएगा
26:11अंतर लोग अलपायू होंगे, रोगों से ग्रस्त रहेंगे और मानसिक शान्ती दुरलब हो जाएगी, जिससे जीवन निरंतर संधर्ष और पीड़ा
26:20से भरा रहेगा
26:22परंतु इस घोर अंधकार और पतन के बीच भी, जो आत्माए अपने अंदर धर्म का प्रकाश प्रजवलित रखेंगी, वे ही
26:30इस युग की चुनोतियों का सामना कर पाएंगी और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होंगी
26:37महर्शी व्यास अपनी उंगली से क्षितिच की ओर इशारा करते हैं, जहां आकाश में काले और बैंगनी रंग के अमंगलकारी
26:44बादल चा रहे हैं, जो भीशन सूखे की शुरुवात का संकेट दे रहे हैं
26:51जब आसमान से वर्षा की एक बूंद भी नहीं गिरती, तब उपजाओ भूमी सूख कर फटने लगती हैं और उसमें
26:59गहरी दरारे पड़ जाती हैं
27:02कभी जीवन दाइनी और पवित्र मानी जाने वाली नदिया पूरी तरह सूख जाती हैं, जिससे केवल सूखी रेत और मरी
27:10हुई मचलिया ही शेश रह जाती हैं
27:13बिना किसी मानविय भूल के भी, विशाल और घने जंगलों में अचानक भयानक दावानल भड़क उठता है, जो सब कुछ
27:21राख में बदल देता है
27:24तेज और विनाशकारी धूल भरी आंधिया निर्जन गाओं के उपर से गुजरती हैं, जिससे मिट्टी के घर मलबे के धेर
27:32में तबदील हो जाते हैं
27:35भीशन अकाल के कारण भूख से तडपते हुए कमजोर लोग पानी की एक बूंद और अन्न के एक दाने के
27:42लिए भटकने को मजबूर हो जाते हैं
27:46प्रिथवी अचानक तीवर कमपनों से काम्प उठती है, जिससे प्राचीन नगरों के भव्य पत्थरों के महल और मंदिर ढहकर मलबे
27:54में मिल जाते हैं
27:57क्रोधित समुद्र अपनी सीमाय लांध कर विशाल लहरों के रूप में तटिय नगरों को अपने विशाल और काले जल में
28:04लीन कर लेता है
28:07महर्शी व्यास बताते हैं कि इस युग में मनुश्यों का शारिरिक कद अत्यंत छोटा हो जाएगा और उनकी प्राकृतिक शक्ती
28:14पूरी तरह समाप्थ हो जाएगी
28:17लोगों की रोग प्रतिरोधक शमता नश्ट हो जाएगी जिससे वे नए और असाध्य रोगों की चपेट में आकर निरंतर पीड़ा
28:25भोगेंगे
28:27मनुश्य की ओसत आयू घटकर बहुत कम रह जाएगी जिससे युवावस्था में ही लोग व्रिद्ध और जरजर दिखाई देने लगेंगे
28:36वातावर्ण की वायू इतनी विशैली और प्रदूशित हो जाएगी कि सास लेना भी एक अत्यंत कष्ट दायक और जानलेवा संधर्ष
28:45बन जाएगा
28:46अत्यधिक ठंड और जुलसा देने वाली गर्मी बिना किसी रितू चक्र के पड़ेंगी जिससे बची कुछी फसले उगने से पहले
28:54ही नश्ट हो जाएगी
28:57भोजन और पानी के अभाव में वन के पशू और पालतू जीव लाखों की संख्या में तड़पत कर अपने प्राण
29:03त्याग देंगे
29:05अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए मनुष्य आपस में ही हिंसक पशूओं की भांती लड़ने लगेंगे और भाई-भाई
29:13का शत्रू बन जाएगा
29:15शारिरिक पतन के साथ साथ मनुष्यों की मानसिक शक्ती भी क्षीन हो जाएगी जिससे वे हर समय भय, चिंता और
29:23अव से घिरे रहेंगे
29:25पवित्र हिमालय की बरफीली चोटियां भी कल्यक के काले बादलों और नकारात्मक उर्जा के कारण अपनी दिव्य चमक खोने लगेंगी
29:35धूल और धुएं की घनी चादर के पीछे छिपा सूर्य अपनी तेज किर्णों को खोदेगा, जिससे दिन में भी धुंधला
29:42और उदास वातावर्ण चाया रहेगा
29:45इस घोर शारिरिक और प्राकृतिक पतन के बीच भी महर्शी व्यास समझाते हैं कि केवल भगवान विश्णु का नाम ही
29:53मोक्ष का एक मात्र साधन बचेगा
29:57अपनी इस गंभीर भविश्य वानी को समाप्त करते हुए, व्यास जी बचे हुए धर्मनिष्ठ लोगों को अपने हिदय में नारायन
30:05की भक्ती को द्रिड़ता से थामे रखने का संदेश देते हैं
30:10महर्शी व्यास अपनी गंभीर और अमरित्मई वानी में समझाते हैं कि कल्यग के अंधकार में भी भक्ती का एक ऐसा
30:18सरल मार्ग है जो मनुष्य को सीधे मोक्ष तक ले जा सकता है
30:23वे कहते हैं कि जो फल सत्ययुग में कठिन तपस्या और समाधी से मिलता था वह कल्युग में केवल भगवान
30:31विश्नु के नाम का संकीरतन करने मात्र से प्राप्थ हो जाता है
30:36सत्ययुग के वे महान रिशिमुनी जो हजारों वर्षों तक कड़े जाड़े और दहक्ती अगनी के बीच निराहार रहकर मोक्ष की
30:44प्राप्थी करते थे उनके उस कठिन पुरुशार्थ को व्यास जी याद करते हैं
30:50त्रेटा युग में बड़े बड़े यग्यों, अनुष्ठानों और वेदमंत्रों के सस्वर पाठ के माध्यम से देवता प्रसन्न होते थे और
30:58मनुष्यों को दिव्य लोकों की प्राप्थी होती थी
31:02द्वापर्युग में भव्य मंदिरों में होने वाली विधिविधान, युक्त, अर्चना और कठिन मूर्ती पूजाही परमात्मा से मिलन का मुख्य साधन
31:10मानी जाती थी
31:12किन्तु कल्यव में व्यास जी के अनुसार न तो शरीर में वैसी शक्ती होगी और नहीं मन में वैसी एकागरता,
31:21इसलिए केवल नामस्मरण ही तारणहार बनेगा
31:25नारायन शब्द का केवल एक बार सच्चे हृदय से उच्चारन करने मात्र से कल्यव के सारे पाप और क्लेश क्षन
31:32भर में भस्म हो जाते हैं
31:35आकाश में बादलों के बीच भगवान विश्नु का वहद्दिव्य और परम क्रिपालू रूप प्रकट होता है, जो त्रिलोग के प्राणियों
31:43को अभयदान दे रहा है
31:46व्यास जी अपने शिश्यों को उस परम जोतिर्मय रूप की ओर संकेट करते हुए भक्ती के इस महामार्ग पर चलने
31:53का अटूट विश्वास दिलाते हैं
31:56गुरू के वचनों को सुनकर सभी उपस्थित रिशी और शिश्य भाव विभोर हो जाते हैं और अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान
32:05श्री हरी के चर्णों में दंडवत प्रणाम करते हैं
32:09आने वाले कल्युग का एक साधारन ग्रिहस्थ भी यदि अपने व्यस्थ जीवन के बीच मौन रहकर प्रभु का नाम जबता
32:16है तो वह भी परमगती को प्राप्ट करता है
32:21प्रभु के नाम की इस दिवियर शक्ती के सामने कल्युग के प्रतीक काले बादल और नकारात्मक शक्तियां थर-थर कापते
32:28हुए पीछे हट जाती हैं
32:31इस युग में किसी उचेकुल, धंदौलत या गूड शास्त्रों के ज्ञान की आवश्शक्ता नहीं है केवल आत्मा की सच्ची पुकार
32:40ही श्री हरी को बांधने के लिए परियाप्त है
32:44अनंत आकाश में ओम नमो नारायनाय के महामंत्र के अक्षर स्वर्ण अक्षरों में चमक उठते हैं, जो समस्त ब्रहमांड को
32:52अपनी उर्जा से गुंजायमान करते हैं
32:56केवल गंगा जल की एक बून्द और तुलसी का एक पत्ता भी यदि प्रेम पूर्वक अर्पित किया जाएं तो भगवान
33:03विश्नु भक्त के रिनी हो जाते हैं
33:07देवर्शी नारद भी वीना की मधुर जंकार के साथ तीनों लोकों में नारायन नारायन का गान करते हुए कल्यग के
33:14इस सरल मोक्ष मार्ग की पुष्टी करते हैं
33:18शीरसागर में शेशनाग की शया पर विश्राम करते हुए नारायन संपूर्ण चराचर जगत पर अपनी दयालू द्रिश्टी डालते हैं, जिससे
33:27कल्युग का भय शांत हो जाता है
33:30व्यास जी अपने प्रवचन का समापन करते हुए सभी रिशियों को आशिरवाद देते हैं और उन्हें कल्युग के दुश्प्रभावों से
33:39निर्भय रहने का संदेश देते हैं
33:42उनके वचनों से पूरे आश्रम में एक अभूत पूर्व शांती चा जाती है और डूपते सूर्य की सिंदूरी किरने इस
33:50बात का प्रतीक बनती हैं कि कल्युग के बाद फिर सत्ययुक का उदे होगा
33:55इस प्रकार समस्थ अंधकार और पतन के बीच भी भगवान विश्णु की भक्ती का यह पावन मार्ग मानव जाती को
34:03सदास्दा के लिए मुक्ती का मार्ग दिखाता रहेगा
34:07महर्शी व्यास ने दुखी अर्जुन की ओर द्रिश्टिपात करते हुए समझाया कि कल्युग का यह अंधकार अनन्त नहीं है बलकि
34:15यह समय के महान चक्र का एक अनिवार्य चरण मात्र है
34:20अर्जुन ने अपने अश्रु पोँचते हुए महर्शी व्यास से प्रश्ण किया कि जब पाप अपनी चरम सीमा पर होगा तब
34:28इस संसार की रक्षा कौन और किस प्रकार करेगा
34:32व्यास जी ने कल्युक की अंतिम अवस्था का द्रिश्य प्रस्तुत करते हुए बताया कि जब समाज में सत्य, पवित्रता और
34:40धर्म पूरी तरह लुप्थ हो जाएंगे तब चारों और अराजकता फैल जाएगी
34:46प्रित्वी माता अधर्म के भारी बोज और अन्याई शासकों के अत्याचारों से तडपकर पुनः श्री हरी विश्नु की शरण में
34:53अपनी गुहार लगाएगी
34:56तब कल्युक के अंत में धर्म की पुनरस्थापना के लिए संभल नामक पवित्र ग्राम में भगवान विश्नु का दस्वा अवतार
35:03यानि भगवान कलकी का जन्म होगा
35:07पवित्र ब्राहमन विश्णुयश के ग्रह में जन्म लेकर भगवान कल की समस्त वेदों और अस्त्रशस्त्रों की विद्या में पारंगत होकर
35:15महान योध्धा के रूप में प्रकट होंगे
35:18भगवान कल की देवगत्त नामक एक दिव्य और तीवरगामी श्वेट अश्व पर सवार होकर दुष्टों का सहार करने के लिए
35:26निकल पड़ेंगे
35:28उनके एक हाथ में भगवान शिव द्वारा प्रदत अलौकिक रतनों से जड़ी तेजपुंच तलवार होगी जिसकी चमक मात्र से अधर्मियों
35:37का हृदय काम उठेगा
35:39महाकाल के इस स्वरूप में वे प्रिथवी के कोने-कोने में छिपे पापियों, लुटेरों और अधर्मिक राजाओं का सामना एक
35:47भयंकर महासंग्राम में करेंगे
35:50कलकी अवतार का प्रतेक प्रहार प्रिथवी से अन्याय का समूल नाश कर देगा और अधर्म का पक्ष लेने वाले सभी
35:58दुष्टों को यमलोक भेज देगा
36:00अधर्म के समराट और कल्यूग के मूर्त रूप का वद करके भगवान कलकी अंधकार के सामराज्य को सदा के लिए
36:08समाप्त कर देंगे
36:10संसार को पापमुक्त देखकर आकाश से देवतागन भगवान कलकी पर अलोकिक पुष्पों की वर्षा करेंगे और समूचा
36:18ब्रम्हांड उनके जैकारों से गूंज उठेगा
36:22इस प्रकार कालचक्र पुनह घूमेगा और कल्युग की समाप्ती के साथ ही एक नए
36:28पवित्र और धर्मनिष्ट सत्ययुग का प्रारंब होगा
36:33सत्ययुग के आगमन पर प्रकृती पुनह अपने पूर्ण सौंदर्य में खिल उठेगी
36:39पवित्र नदिया निर्मल जल से भर जाएंगी और चारों और शांती का सामराज्य होगा
36:45मानव जाती पुनह सत्य, अहिंसा और भक्ती के मार्ग पर चलकर विशिमुनियों के साथ यग्य और वेट पाठ में लीन
36:53हो जाएगी
36:55महर्शी व्यास के इन परम ज्यानवर्धक वचनों को सुनकर अर्जुन का हृदय पूर्णत शांत हो गया और उनका सारा शोक
37:03मिट गया
37:04व्यास जी ने अंतिम उपदेश देते हुए कहा कि समय की हर धारा और युगों का परिवर्तन केवल श्री हरी
37:12की लीला का ही एक अंश है
37:16व्यकुंठनात श्री विष्णु ही इस स्विष्टी के स्रिजक, पालक और समहारक हैं जिनकी भक्ती ही जीव को जन्ममर्ण के चक्र
37:23से मुक्त करती है
37:26आश्रम में उपस्थित सभी रिशियों ने व्यास जी के चर्णों में नमन किया और जैश्री हरी के पवित्र घोश से
37:33वातावर्ण को गुंजायमान कर दिया
37:36इस प्रकार द्वारका के जल्मगन होने और कल्युक के आगमन के बीच भी भगवान विश्नु की अनंत क्रिपा की यह
37:44कथा हमें सदैव धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेणा देती रहेगी
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