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इस पहले महाकाव्य एपिसोड में, हम भागवत पुराण के अलौकिक ब्रह्मांड में प्रवेश करते हैं। प्राचीन नैमिषारण्य के पवित्र वनों में, महान ऋषिगण एक सहस्रवर्षीय सत्र के लिए एकत्रित होते हैं, जो मानवजाति के परम कल्याण की खोज में लीन हैं। तभी, ज्ञान के प्रतीक, सूत गोस्वामी का आगमन होता है, और ऋषि उनके समक्ष अपने गहन प्रश्न रखते हैं। क्या है इस कलियुग में मोक्ष का मार्ग? कौन है वह परमसत्ता जो समस्त दुखों का नाश करती है? सूत गोस्वामी उत्तर देते हैं और भगवान श्रीकृष्ण की महिमा तथा श्रीमद्भागवतम् के महत्व का उद्घाटन करते हैं। यह एपिसोड भागवत की दिव्य यात्रा की भव्य शुरुआत है, जहां हर शब्द ज्ञान और भक्ति का सागर है। #BhagavataPurana #ShreeKrishna #SutaGoswami #Naimisharanya #HinduMythology #Puranas #SpiritualJourney #Vyasadeva #NaradaMuni #EpicTales #SanatanDharma #DivineKnowledge #FirstEpisode #Season3 #Moksha #BhaktiYoga
Transcript
00:00पवित्र और रहस्यमई नैमिशारणे के घने वनों में सूर्य की सुनहरी किरने छनकर आ रही थी, जहां सृष्टी के आरंभ
00:07से ही दिव्य उर्जा प्रवाहित हो रही थी.
00:11इस अलोकिक वन के बीच से बहती हुई पवित्र गोंती नदी का शांत जल सूर्योदय की लालिमा में सोने की
00:18तरहे चमक रहा था, जो रिशियों के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था.
00:24संसार के विभिन कोनों से तपस्वी रिशी और ज्यानी महात्मा इस पावन भूमी की ओर बढ़ रहे थे, उनके हाथों
00:31में कुशा और कमंडलू थे, जो उनके वैराग्य को दर्शाते थे.
00:36रिशियों के परम ज्यानी और तेजस्वी नेता, शोनक रिशी ने अपनी दिव्य आभासे संपूर्ण वन को आलोकित करते हुए सभी
00:45आगंतुकों का सत्कार किया.
00:48विशाल और भव्य यग्यशाला का निर्मान किया गया, जिसे ताजे गेंदे के फूलों, आम के पत्तों और केले के पत्तों
00:55से सजाकर पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था.
01:00शौनक रिशी ने युवा शिश्यों को बुला कर यग्य कुंड के निर्मान की बारिकियों को समझाया, जिससे ब्रहमांडिय शक्तियों का
01:08आहवान सुगम हो सके
01:10पवित्र वेदी के भीतर स्थापित त्रिकोनिय और चतुशकोनिय हवन कुंड में सूखी समिधा और शुद्ध गाय के घी की सुगंधित
01:18सामगरी को व्यवस्थित किया गया
01:21शौनक रिशी ने अपनी आखें बंद कर ली और उनके मुख से निकले पहले वैदिक मंत्रो चार के साथ ही
01:28संपून वनका वातावन एक अलौकिक कमपन से भर उठा
01:33हजारो रिशिगण यग्यकुंड के चारों और अर्धचंद्राकार पंक्तियों में बैठ गए जिनके मुख पर केवल धर्म की स्थापना और मानव
01:42कल्यान की गहरी चिन्ता थी
01:45मंत्रों के तीवर वेग के साथ ही सूखी समिधा से पवित्र अगनी देव की जाजवल्यमान स्वर्ण ज्वालाय प्रकट हुई जिन्होंने
01:53अंधकार को तत्क्षन मिटा दिया
01:56रिशियों ने स्वाहा के पवित्र घोश के साथ यग्य की अगनी में दिव्य आहुतिया डालना प्रारंब किया जिससे उठने वाली
02:04सुगंध चारों दिशाओं में फैल गई
02:08यग्यशाला से उठने वाला पवित्र और सुगंधित धुआ बादलों की ओर बढ़ने लगा, मानो प्रिथवी का संदेश लेकर स्वर्ग लोग
02:16की ओर जा रहा हो
02:18स्वर्ग में विराजमान देवताओं ने इस महान यग्य को देखा और प्रिथवी पर धर्म के इस पुनरजागर्ण पर अपनी सहमती
02:26प्रकट करते हुए पुष्पवर्शा की तयारी की
02:30सभी रिशियों के सामुहिक कंट से गूंचते हुए पुरुष सूप्त के मंत्रों ने ब्रहमांड के अंतिम छोर तक एक सकारात्मक
02:38उर्जा का संचार कर दिया
02:40शौनक रिशी ने अपनी समाधी अवस्था में उस परम पुरुष का ध्यान किया जिनके संकल्प मात्र से इस स्रिष्टी की
02:48रचना और संचालन होता है
02:51तभी अचानक वन में एक मंद और सुवासित वायू चलने लगी जो किसी महान दिव्य पुरुष के आगमन का मुख
02:59संकेट दे रही थी
03:01तपस्वियों के मध्य परम ज्यानी सूट गोस्वामी का आगमन हुआ जिनके चहरे की शांती और तेज उनके महान ज्यान का
03:09प्रमान दे रही थी
03:11शौनक रिशी सहित समस्त रिशियों ने उठकर सूत गोस्वामी का आदरपूर्वक स्वागत किया और उन्हें सर्वोच्छ आसन ग्रहन करने का
03:20अनुरोध किया
03:22सूत गोस्वामी ने विशाल वटवरिक्ष के नीचे बने कुशा के उंचे आसन पर विराज मान होकर अपने चारों और उचसुकता
03:30से बैठे रिशियों को देखा
03:33शौनक रिशी ने दोनों हाथ जोड़कर पहला प्रशन पूछा कि इस घोर कलीव में भटके हुए मनुश्यों के उद्धार का
03:40मार्ग क्या है जिसने इस महापुरान के आरंभ की नीम रखी
03:45शौनक रिशी के परम कल्यानकारी प्रशन को सुनकर सूत गोस्वामी के मुख पर एक अलोकिक मंध हास्य बिखर गया
03:53मानो तपते हुए मरुस्थल पर शीतल अम्रित की वर्शा होने वाली हो
03:58सूत गोस्वामी ने अपने दोनों नेत्रों को धीरे से बंद कर लिया और अपने आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण तथा
04:06अपने महान गुरुदेव श्री शुकदेव गोस्वामी के चर्णों में मौन प्रार्थना अर्पित की
04:12जब सूत गोस्वामी ने आखें खोली तब उनके तेजोमय मस्तक से एक दिव्यस वर्णिम प्रकाश प्रस्पुटित हुआ जिसने पूरे नैमिशारण्य
04:21वन को एक नई चेतना से सराबोर कर दिया
04:25सूत गोस्वामी की गंभीर और मधुरवानी जब गूंजी तो ऐसा लगा मानों मेघों के गर्जने के बीच शीतल मंद समीर
04:34बह रही हो जो समस्त रिशियों के संशियों को हरने लगी
04:38उन्होंने शौनक रिशी की प्रशनसा करते हुए कहा कि उनका यह प्रशन संपून ब्रहमांड के जीवों के कल्यान के लिए
04:46है क्योंकि यह सीधे परम पुरुशोत्तम भगवान के दिव्य लीलाओं से जुड़ा है
04:52सूत जी ने बताना आरंभ किया कि इस घोर कलिकाल में मनुष्यों की बुद्धी मंद आयू अल्प और मन सदा
04:59अशांत रहता है जिससे बाहर निकलने का एक मात्र साधन भगवान की कथा ही है
05:06उन्होंने कहा कि जिस प्रकार उदित होता हुआ सूर्य संपून अंधकार का नाश कर देता है उसी प्रकार श्रीमत भागवत
05:14महापुरान इस कलिक के अंधकार में ज्ञान का परम प्रकाश है
05:20सभी रिशिगन अपने अपने आसनों पर ऐसे स्थेर होकर बैठ गए मानोवे साक्षात ज्यान की गंगा के प्रवाह में बहने
05:28के लिए अपनी चेतना को पूरी तरह समर्पित कर चुके हूँ
05:32सूत गोस्वामी ने कहा कि यह वही महान ग्रंथ है जिसे स्वयन स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा ने भगवान नारायन
05:40के हृदय से प्राप्त किया था
05:43स्रिष्टी के प्रारंभ में जब चारों और केवल महाप्रलय का जल था, तब भगवान विश्णु ने ब्रहमा जी को चार
05:50श्लोकों के रूप में यह ज्यान प्रदान किया था
05:54इसके बाद सूत जी ने व्यासदेव जी के व्याकुल मन की कथा सुनाना शुरू किया, जिन्होंने वेदों का वर्गी करण
06:01करने के बाद भी अपने हृदय में एक भारी शून्यता महसूस की थी
06:07सरस्वती नदी के पावन तट पर बैठे व्यासदेव जी इसी सोच में मगन थे कि धर्म का इतना विस्तार करने
06:15पर भी उनके मन को परम संतोष क्यों नहीं मिल रहा था
06:19तभी अचानक वहां देवर्शी नारत का आगमन हुआ जो हाथ में अपनी वीना लिये और भगवान के नाम का संकीर्टन
06:27करते हुए आकाश मार्ग से उतरे
06:30नारत मुनी के मुख पर दिव्य तेज था और उनके कानों में कुंडल चमक रहे थे जो उनकी अलोकिक स्थिती
06:37को दर्शा रहे थे
06:40नारत जी ने व्यासदेव जी को समझाया कि जब तक वे भगवान की शुद्ध भक्ति में लिलाओं का सीधे गान
06:47नहीं करेंगे तब तक उनका और जगत का मन शांत नहीं होगा
06:52गुरु नारत की आग्या पाकर व्यासदेव जी ने समाधी में बैठकर भगवान की दिव्य लिलाओं का साक्षात दर्शन किया और
07:00इस महान भागवत पुराण की रचना की
07:04व्यासदेव जी ने यह गोपनिय ज्यान सबसे पहले अपने महान विरक्त पुत्र शुकदेव गोस्वामी को सिखाया जो जन्म से ही
07:12माया के बंधनों से मुक्त थे
07:15शुकदेव गोस्वामी वनवन भटकते रहते थे उनका मन केवल परब्रम में लीन रहता था और उन्हें संसार के किसी भी
07:23नियम या रूप की परवाह नहीं थी
07:26उसी महान शुकदेव गोस्वामी ने गंगा के पावन तट पर मृत्यू के मुख में बैठे राजा परीच्षित को इस दिव्य
07:33भागवत का उपदेश साथ दिनों तक दिया था
07:37सुत गोस्वामी ने हाथ जोड कर कहा कि उस महान सभा में उपस्थित रहकर मैंने जो कुछ भी सुना वही
07:45अमरित आज मैं आप सभी परम रिशियों को सुनाने जा रहा हूँ
07:50सूत गोस्वामी के इन वचनों को सुनते ही रिशियों के कुलपती शौनक जी अत्यंत प्रसन्न होकर अपने पूजय आसन से
07:58उठ खड़े हुए
08:00शौनक जी ने समस्थ 86,000 रिशियों की ओर से अपने दोनों हाथ जोड़कर व्यास्पीठ पर विराजमान सूत गोस्वामी को
08:08सादर प्रणाम किया
08:10उन्होंने गदगद कंड से कहा कि है सूत जी आपका यहां आगमन हम सभी मुमुक्षु आत्माओं के लिए इश्वर की
08:18सबसे बड़ी कृपा का प्रमाण है
08:21महर्शी शौनक ने आदे कहा कि आप भगवान व्यासदेव के प्रिय और सर्वशास्त्रग्य शिष्य हैं जिन्हें समस्थ वेदों और पुरानों
08:30का पूर्ण मर्म ज्यात है
08:33आपने अपने परम ज्ञानी गुरुओं की सेवा करके उस परम ज्ञान को प्राप्त किया है जो साधारन तपस्वियों के लिए
08:41भी अत्यंत दुरलभ माना गया है
08:44सूट जी गुरुजन अपने उन शिश्यों को ही सबसे गूड और गुप्त रहस्य बताते हैं जो निश्कपट, सरल और अटूट
08:52भक्ती से संपन्न होते हैं
08:56इसलिए हम जानते हैं कि आपकी जिहवा से केवल वही सत्य प्रकट होगा जो मनुष्य के समस्त दुखों और संश्यों
09:03का नाश कर सकता है
09:06शौनक रिशी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आने वाले कलिपिंड काल में मनुष्य की आयू अल्प, भाग्यमंद और
09:14बुद्धी अत्यंत चंचल हो जाएगी
09:17संसार के इस घोर अंधकार में जीव अनेक प्रकार के व्यर्थ के अनुष्ठानों में भटकते रहेंगे और परम कल्यान का
09:24मार्ग नहीं खोच पाएंगे
09:27इसलिए है महाभाग, आप समस्थ शास्त्रों का सार निकाल कर हमें कोई ऐसा एक सुगम उपाय बताईए जिससे आत्मा को
09:35तुरंत शांती मिल सके
09:38कृपा करके हमें बताईए कि जीवों के लिए इस संसार में सबसे बड़ा और सर्वोकरी परम धर्म अथ्वा परमहित क्या
09:45है
09:47वह कौन सा पावन तत्व है जिसके श्रवन मात्र से मनुष्य इस भवसागर के भयानक भय और मृत्यू के चक्र
09:54से मुक्त हो जाता है
09:57शौनक जी ने पूछा कि उस सर्वशक्तिमान जगदीश्वर ने माता देवकी के गर्ब से भगवान श्री कृष्ण के रूप में
10:04जन्म क्यों लिया था
10:06हम जानते हैं कि भगवान के अवतार केवल जीवों के कल्यान, सनरक्षन और उनकी आध्यात्मिक जागरिती के लिए ही होते
10:14हैं
10:16भगवान के पावन नाम का महिमागान तो इतना प्रभावशाली है कि भःभीत व्यक्ती भी यदि विवश होकर नाम ले तो
10:24तुरंत पापों से छूट जाता है
10:28जो गंगाजल केवल शरीर को पित्र या पावन करता है, वही हरिनाम और हरिक्था का श्रवन तो मन को क्षण
10:35भर में निश्पाप बना देता है
10:38इसलिए है सरवग्य सूट जी, भगवान के उन परम पवित्र अवतारों की कथाएं सुनाकर हमारी इस अत्रिप्थ आत्मा को त्रिप्थ
10:46कीजिए
10:48जब लीला पुरुशोत्तम श्रीकृष्ण अपने परमधाम लोट गए, तब इस पृत्वी पर धर्म ने किसके शरण में आश्रय लिया, यह
10:56भी हमें बताए
10:58सूत जी, आपके मुखारविन से टपकने वाला यह कथामरित हम सभी रिशियों के लिए अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाली
11:07सूर्यकिरण जैसा है
11:09शौनक रिशी की इस अत्यंत पावन और निशकाम प्रार्थना को सुनकर सूत गोस्वामी ने मंदमंद मुस्कुराते हुए श्रीहरी का ध्यान
11:18किया
11:19मंदमंद मुस्कुराते हुए सूत गोस्वामी ने अपने हिदय में श्रीहरी का ध्यान कर उन परम ज्यान के सागर से निकले
11:27शब्दों को संकलित करना आरंभ किया
11:30सूत जी ने सभी रिशियों की ओर देखा जिनके मुख पर जिग्यासा और आशा के भाव स्पष्ट थे और अपनी
11:38मधुरवाणी में उत्तर देना प्रारंभ किया
11:42उन्होंने कहा कि हे रिशिवरो आप सभी ने धर्म के आश्रय और कलियुग में परम कल्यान के मार्ग के विशय
11:49में अत्यंत महत्वपून प्रश्न किया है
11:52सूट जी ने विस्तार से बताया कि जब भगवान श्री कृष्न अपने धाम पधारे तभी से यह घोर कलियुग धर्ती
12:00पर अपने पैर पसारने लगा
12:02इस युग में धर्म, सत्य, पवित्रता, शमा, दया और आयू का निरंतर हरास होता चला जाता है जैसे किसी नदी
12:11का जल सूखता चला जाएं
12:13मनुष्य की बुध्धी भरष्ट होती जाती है, उसकी स्मरण शक्ती क्षीन हो जाती है और वह क्षन भंगुर सांसारिक सुखों
12:21के पीछे भागता रहता है
12:24यह वर्णन सुनकर शौनक रिशी के मुख पर चिन्ता की गहरी लकीरें उभराईं जैसे किसी महासागर में तूफान आने से
12:33पहले की शांती तूट रही हो
12:36उन्होंने सोचा की इस अंधकार्मय युग में क्या पारंपरिक यग्य और तपस्याय वास्तव में मोक्ष का मार प्रशस्त कर पाएंगी
12:45चारों और केवल अधर्म, कलह और अशांती का सामराज्य फैल रहा था, जिससे जीवों का चित्त निरंतर विक्षुब्ध रहता था
12:54शौनक रिशी ने सूट गोस्वामी की और गहरी आशा और आतुर्ता से देखा, जैसे एक प्यासा यात्री जल स्रोत की
13:02तलाश में हो
13:14चारों सी ऐसी सारगर्भित विधी है, जो समस्त दुखों का नाशकर परम शांती प्रदान कर सकती है, हमें कृपा करके
13:21वह मार्ग बताए
13:23और कहां से वह दिव्य ज्यान प्राप्त किया जा सकता है, जो हमें इस भवसागर से पार उतार सके
13:31शौनक रिशी के इस प्रश्ण ने समस्त उपस्थित रिशियों की हृदैगत आकांक्षाओं को स्वर्दिया, और सभी की आखे सूट जी
13:39पर टिकी हुई थी
13:41वातावर्ण में एक गहन चुप पीछा गई, केवल पवित्र अगनी की मंदमंद ध्वनी और पत्तियों की सरसराहट ही सुनाई दे
13:49रही थी
13:50सूट गोस्वामी ने शौनक रिशी की गंभीर जिग्यासा और सभी रिशियों की व्याकुलता को भली भानती समझा, उनकी आखों में
13:59करुणा जलक रही थी
14:01उन्होंने अनुभव किया कि यह केवल एक प्रश्न नहीं, अपितु कलियुग में भटकते जीवों के लिए परम कल्यान का सबसे
14:09बड़ा रहस्य जानने की तीवर अभिलाशा थी
14:13अपने हृदय में श्री व्यासदेव और परम पुरुशोत्तम भगवान श्री कृष्न का स्मरण कर सूत्जी ने अपनी बानी को और
14:21अधिक शान्त और गंभीर बनाया
14:24उन्होंने एक गहरी सांस ली मानोवे ब्रहमांड के समस्त ज्यान को अपने भीतर समेट रहे हूं और एक नए अध्याय
14:32का उद्धाटन करने को तक पर हुए
14:35सभी रिशियों ने परमशान्ती और मुक्ती के उस अध्वितिय मार्ग को सुनने के लिए अपनी इंद्रियों को एकाग्र कर लिया
14:43जिनकी वे युगों से प्रतीक्षा कर रहे थे
14:47तत पश्चात रिशियों ने सूत जी की और गहन जिग्यासा भरी द्रिश्टी से देखते हुए अपनी आत्मा के उद्धोश के
14:54समान एक महत्वपून प्रश्ण रखा थे सूत पुत्र हमें भगवान के उन अध्भुत अवतारों का रहस्य बताएं जो इस ब्रहमांड
15:02में
15:31प्रकट हुए हैं।
15:34उनकी आत्माय मुक्ती की पुकार कर रही थी जैसे 85 धर्ती वर्शा की प्रतीक्षा करती है और वे जानते थे
15:42कि सूत जी ही उन्हें इस दिव्य ज्ञान से त्रिप्त कर सकते हैं।
16:02अपनी वानी को दिव्यता से भर दिया जैसे एक नदी अनंत सागर की ओर प्रवाहित होती है।
16:10सुक्ष्म से भी सुक्ष्म और विराट से भी विराट भगवान ही समस्थ सृष्टी के आदी मध्य और अन्त हैं।
16:17उन्ही से ये दिव्य अवतार प्रकट होते हैं।
16:20उन्होंने कहा सत्युक के आरंभ में भगवान ने मध्य अवतार धारन किया एक विशाल मचली के रूप में जो जलप्रलय
16:30के महासंकट से सृष्टी को बचाने के लिए प्रकट हुई थी।
16:34मध्य देव ने वेदों को हिरन्याक्ष से बचाया और मनु को ज्यान प्रदान कर नई सृष्टी के बीज बोए।
16:42दूसरा अवतार कूर्म देव का था एक विशाल कचुए का रूप जिसने सागर मन्थन के समय मंदराचल परवत को अपनी
16:50पीठ पर धारन कर ब्रहमांड को स्थिर्टा प्रदान की।
16:54उस अद्भुत लीला में देवता और असुरों ने मिलकर अम्रित के लिए सागर मन्थन किया और कूर्म देव ने अपनी
17:02स्थिर्टा से स्रिष्टी का संतुलन बनाये रखा।
17:05फिर आया वराह अवतार भगवान का एक शक्तिशाली शुकर रूप जिसने रसातल में डूबी प्रित्वी को अपने दातों पर उठाकर
17:14ब्रहमांड में पुनह स्थापित किया।
17:17हिरन्याक्ष नामक दैत्य ने प्रित्वी को पाताल में छिपा दिया था और वराह देव ने उसे परास्त कर जगत को
17:25महाविनाश से बचाया।
17:27ततपश्चात भगवान का नरसिन्ह अवतार आया जो आधा मानव और आधा सिन्ह था जिसने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए
17:36स्तंभ फाड़ कर प्रकट हुआ।
17:38नरसिन्ह देव ने दुष्ट दैत्यराज हिरनेकशप को अपने तीक्षन नखों से विदीर्ण कर धर्म की पुनस्थापना की और अपने भक्त
17:47की लाज रखी।
17:48पंचम अवतार वामन देव का था एक बौने ब्राहमन बालक के रूप में जिसने दैत्यराज बली से तीन पक भूमी
17:57का दान मांकर संपूर्ण ब्रहमांड को नाप लिया।
18:01उस लीला में वामन देव ने विराट रूप धारण कर दो पगों में पृत्वी और स्वर्ग को नापा और तीसरे
18:08पक के लिए बली को अपना शीश अर्पित करना पड़ा।
18:12शष्ट अवतार भगवान परशुराम का था एक भयंकर योद्धारिशी जो हाथ में परशु धारण कर दुष्ट क्षत्रियों का सहार करने
18:21के लिए प्रकट हुए।
18:2321 बार उन्होंने प्रिथवी को अहंकारी और अधर्मी क्षत्रियों से मुक्त किया ताकि धर्म पुनह स्थापित हो सके।
18:3121 इन अवतारों के माध्यम से भगवान ने न केवल ब्रहमांड को विनाश से बचाया, बलकि जीवों को धर्म और
18:39मोक्ष का मार्ग भी दिखाया।
18:4121 सुक्ष्म से भी सुक्ष्म और विराट से भी विराट, भगवान ही समस्थ स्रिष्टी के आदी, मध्य और अन्त हैं,
18:49उनहीं से ये दिव्य अवतार प्रकट होते हैं।
18:53रिशियों के गंभीर प्रशनों को सुनकर सूत गोस्वामी का हृदय गेहन प्रसन्नता और आध्यात्मिक उत्साह से भर उठा, मानों उनके
19:02भीतर ज्यान का एक अनंत सागर हिलोरे ले रहा हो।
19:06उनकी द्रिश्टी, जिसमें सहसरों वर्शों का ज्यान समाहित था, एक-एक रिशी पर ठहरती थी, जो उत्सुकता और श्रद्धा से
19:14भरे हुए, उनके अगले शब्दों की प्रतीक्षा कर रहे थे।
19:18अपने आसन से उठकर, सूत गोस्वामी ने सभी उपस्थित रिशियों को विनमर्ता पूर्वक नमन किया, मानोवे स्वयन ज्यान के इन
19:28सागरों से आशिरवाद ले रहे हुँ।
19:31उनकी वानी में शहद सी मिठास और हिमाले सी द्रिडता थी, जब उन्होंने रिशियों के प्रती अपनी अपार प्रसन्नता व्यक्त
19:39की कि उन्होंने ऐसे महत्वपून और सारगर्भित प्रशन पूछे हैं।
19:45उन्होंने रिशियों की इस ज्यान पिपासा को सराहा, जिसने न केवल सत्य की खोज को प्रेरित किया, बलकि समस्त ब्रहमांड
19:53के कल्यान का मार्ग भी प्रशस्त किया।
19:56सूत गोस्वामी ने घोशित किया कि ऐसे प्रशनहरिदय को शुद्ध करते हैं और व्यक्ती को परम सत्य की दिव्य अनुभूतियों
20:04के करीब ले जाते हैं, जैसे एक स्वच्छ दरपन सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिम्बित करता है।
20:11उन्होंने अपनी विनमर्ता प्रकट करते हुए कहा कि वे स्वय मात्र एक साधारन व्यक्ती हैं और अपनी सीमिक बुद्धी से
20:20कुछ भी कहने में असमर्थ हैं।
20:23उनके शब्दों में कृतग्यता का भाव था, जब उन्होंने अपने परम पूज्य गुरु भगवान व्यासदेव का नाम लिया, जिन्होंने वेदों
20:32को लिपिबध कर मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया।
20:36उन्होंने फिर अपने दूसरे गुरु परम ज्ञानी शुकदेव गोस्वामी का स्मरण किया, जिनकी कृपा से उन्होंने श्रीमत धागवत पुरान का
20:44यह दिव्य अमरित पान किया था।
20:47सूत गोस्वामी ने कहा कि वे जो कुछ भी जानते हैं, वह केवल इन महान आध्यात्मिक गुरुओं की असीन कृपा
20:55और उनके पवित्र उपदेशों का ही फल है।
20:59उन्होंने सभी से प्रार्थना की की वे इन गुरुओं का आशिर्वात प्राप्त करें, ताकि वे बिना किसी त्रुटी के आगे
21:07की दिव्यकथाओं का यथार्थ वर्णन कर सकें।
21:10गुरुओं की कृपा का स्मरण कर सूत गोस्वामी ने एक गहरी सांस ली और उनका ध्यान सीधे परम भगवान श्रीकृष्ण
21:18की ओर केंद्रित हो गया।
21:21उनकी वानी में अब एक नई भक्तिमय तीवर्ता आ गई, जैसे कोई वीना पर सीधे इश्वरिय धुन छेड रहा हो
21:28और वे भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुनगान करने लगे।
21:33उन्होंने घोषणा की की भगवान श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं, समस्त स्रिष्टी के आधार और सभी जीवों के एक मात्र
21:41आश्रय हैं।
21:44उन्होंने जोर देकर कहा की ब्रह्मा, विश्णू और शिव सहित जितने भी अवतारों का वर्णन किया गया है, वे सभी
21:51इसी एक परम व्यक्तित्व भगवान श्रीकृष्ण से ही प्रकट हुए हैं।
21:57सूत गोस्वामी ने श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, विश्णू और शिव स्रिष्टी के रचैता, पालक और संहारक तीनों का मूल स्रोत बताया।
22:06उन्होंने श्रीकृष्ण को शाश्वत अप्रिवर्तनिय परमसत्ता के रूप में वर्णित किया, जो भौतिक जगत की सीमाओं से परे और सभी
22:15प्रकार की धार्णाओं से अचुते हैं।
22:19सूत गोस्वामी ने द्रिडता से कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ती ही मुक्ती का उच्चतम मार्ग है और यह आध्यात्मिक
22:27संतुष्टी का एक मात्र स्रोत है।
22:30उन्होंने समझाया कि श्रीकृष्ण को समझना ही वास्तव में पूरे ब्रहमांड और उसके दिव्य उद्देश को समझना है, क्योंकि वे
22:39ही सभी रहस्यों के मूल हैं।
22:42सूत गोस्वामी ने रिशियों से आग्रह किया कि वे एक आग्रचित होकर सुने, क्योंकि वे अब भगवान श्रीकृष्ण की अनंत
22:50लीलाओं और दिव्य कथाओं को उजागर करने वाले हैं।
22:55सूत गोस्वामी ने गर्जनापूर्ण स्वर में घोशना की की श्रीमत भागवतम केवल एक कथा नहीं, बलकि समस्त वेदों और उपनिश्दों
23:04का सबसे परम और शुद्ध सार है।
23:08उन्होंने वेदों की तुलना एक विशाल दिव्य कल्प वरिक्ष से की, जिसका सबसे पका हुआ और रसीला फल स्वयन श्रीमत
23:15भागवतम ग्रंथ है।
23:18जब इस दिव्य फल को शुकदेव गोस्वामी रूपी शुक ने अपने मुक से छुआ, तो इसका अमरित रस ब्रहमांड के
23:25हर जीव के लिए और भी अधिक मधुर हो गया।
23:30नेमिशारने के सभी सहसरों रिशिमुनी इस अलौकिक सत्य को सुनकर परम आनंद और अश्रुपूरित भक्ती में लीन हो गए।
23:38सूत जी ने सपश्ट किया कि जब भगवान श्री कृष्ण इस धराधाम से स्वधाम लोटे, तब धर्म और ज्यान की
23:45रक्षा के लिए भागवत रूपी सूर्य का उदे हुआ।
23:49कलियुक के घने अंधकार और अज्यान रूपी अंधकार को मिटाने के लिए यह पावन पुराण एक अमर और अविनाशी जोती
23:57स्तंभ है।
23:59अन्य सभी शास्त्र मार्ग दिखाते हैं, परंतु श्रीमत भागवतम सीधे भगवान के चर्णों की निश्काम प्रेमाभक्ती का मार्ग खोलता है।
24:09इसके प्रतेक्ष लोक में स्वया भगवान श्रीकृष्न की दिव्य उपस्थिती और उनकी अनंत लीलाओं का अमूल्य माधुर्य बसा हुआ है।
24:19सूत गोस्वामी ने उद्गोश किया कि जो भी मनुश्य निश्था पूर्वक इस कथा का पान करता है, उसके हृदय के
24:27सारे संशय और पाप क्षन भर में भस्म हो जाते हैं।
24:32यह ज्यान केवल सन्यासियों के लिए ही नहीं, बलकि संसार के ताप से जल रहे हर ग्रिहस्थ और साधक के
24:39लिए परम औश्धी है।
24:42उन्होंने रिशियों को उस एतिहासिक क्षन का स्मरण कराया, जब शुकदेव जी ने गंगा तट पर राजा परीच्षित को यह
24:49महान ज्यान प्रदान किया था।
24:52मृत्यू के निकट खड़े राजा परीच्षित ने इस भागवत कथा रूपी अमरित का पान करके अपने मन से तक्षक नाग
25:00और मृत्यू के सारे भय को समाप्त कर दिया था।
25:03जब देवराज इंद्रस्वर्ग का साधारन अमरित लेकर आए तो शुकदेव जी ने उसे तुछ मान कर ठुकरा दिया क्योंकि भागवत
25:12रस अमर्ता से भी परे हैं।
25:15देवगण भी इस दुरलब भागवत मृत को पाने के लिए तरस्ते हैं, जो केवल अनन्य भक्तों के प्रेम से ही
25:22सुलब होता है।
25:24सत्य लोक में जब ब्रहमा जी ने एक तराजू पर सभी वेदों और दूसरी तरफ भागवत को रखा, तो श्रीमत
25:32भागवतम का पलड़ा सबसे भारी सिद्ध हुआ।
25:34यह ग्रंथ भगवान श्री कृष्ण का वामय स्वरूप है, जिसका आश्रय लेते ही जीव संसार के जन्ममर्ण के चक्र से
25:43सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
25:46सूट जी ने भर्राए हुए कंट से सभी श्रोताओं का आहवान किया कि वे जीवन के अंत तक इस रसका
25:53निरंतर पान करते रहें।
25:56कथा के इस सर्वोच उतकर्ष पर पूरा नैमिशारणिय असीम अलौकिक उर्जा और श्री कृष्ण के दिव्यतेज से जग्मगा उठा।
26:05शौनक आदी रिशियों ने हाथ जोड कर और मस्तक जुका कर इस महान पुराण की महत्ता को प्रणाम किया।
26:12इस प्रकार श्रीमत भागवतम के महिमागान का यह प्रथम अध्याय संपन हुआ और लिलाओं के महास्मुद्र का द्वार खुल गया।
26:22किन्तु यह कथा हमें समय के गर्भग्रह में वापस ले जाती है, जहां एक महान रिशी समस्त ज्ञान के सागर
26:30अपने हृदय में एक अनकही रिक्तता का अनुभव कर रहे थे, जैसे कोई अप्रकट पीडा उन्हें भीतर ही भीतर मत
26:37रही हो।
26:39उन्होंने वेदों को अथा ज्ञान के प्रस्फुटित स्त्रोतों में विभाजित किया, मानवता के लिए ज्ञान के अन्मोल रत्न बिखेरे, मानो
26:47आकाश गंगा को अर्बों तारों में पिरो दिया हो।
26:51फिर उन्होंने महाभारत की रचना की, जिसमें धर्म, न्याय और कर्तव्य का एक ऐसा महाकाव्य पिरोया गया, जो युगो युगो
27:00तक मानव जाती का मार्ग गर्शन करने वाला था।
27:04इसके उपरांत उन्होंने अठारा पुराणों को संकलित किया, जिनमें देवी देवताओं की लिलाएं और ब्रहमांड के रहस्य समाहित थे, मानो
27:13ज्यान के अठारा महासागरों को एक ही पात्र में भर दिया हो।
27:18फिर भी उनके हृदय के सूनेपन को कोई भी रचना भर नहीं पा रही थी, जैसे विशाल सागर में एक
27:25बूंद पानी की कमी खटकती हो।
27:28वे एकांत में प्रकृती की गोद में, गहरे चिंतन में मगन थे, जैसे कोई खोया हुआ यात्री अपनी मन्जिल की
27:36तलाश में भटक रहा हो।
27:38उनके मन में एक ही प्रशन बार-बार उठ रहा था, आखिर उनकी महान रचनाओं में किस तत्व की कमी
27:45रह गई है, जो उन्हें पूनता का अनुभव नहीं दे पा रही।
27:50ठीक उसी समय आकाश गंगा में घूंगते हुए, देवर्शी नारत का आगमन हुआ, जिनके वीना के तार से ब्रहमांड में
27:58प्रेम और भक्ती का मधुर संगीत गूंचता रहता है।
28:03नारत ने व्यासदेव के उदास चहरे को देखा और उनकी गहन पीडा को तुरंक पहचान लिया, जैसे एक अनुगवी चिकित्सक
28:11रोगी के गुप्त रोग को समझ लेता है।
28:15देवर्शी ने आदर पूर्वक व्यासदेव से पूछा, हे महर्शी, आपके मुख पर यह उदासी क्यों है, जबकि आपने समस्त वेदों
28:23और पुराणों को संकलित कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है।
28:28व्यासदेव ने अपनी निराशा व्यक्त की, हे नारद, मैंने संसार को ज्ञान के अनेक रक्न दिये, पर मेरा हृदय अब
28:36भी अशांत है, मानो मैंने कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण छोड़ दिया हो।
28:41नारद ने एक शन के लिए अपनी वीना पर हाथ रखा और फिर शांत स्वर में बोले आपने धर्म के
28:48नियमों का वर्णन तो किया, किन्तु भगवान की मधुर लिलाओं का गुनगान नहीं किया।
28:54उन्होंने आगे कहा के महर्शी केवल भगवान श्री कृष्ण की लिलाओं का वर्णन ही भक्तों के हृदय को सच्ची शांती
29:02और पर्मानंद प्रदान कर सकता है, जो समस्त कामनाओं से परे हैं।
29:08देवर्शी ने अपनी स्वयं की कहानी सुनाई, कैसे उन्होंने पूर्वजन में देवताओं की सेवाकर भक्ती का मार्ग अपनाया और दिव्यज्ञान
29:17प्राप्त किया, जो उन्हें आज भी मार्ग दर्शन देता है।
29:22उन्होंने व्यासदेव को भगवान के गुनों और लीलाओं का विस्तरित वर्णन करने के लिए प्रेरित किया, जो स्वय भक्ती का
29:29सर्वोच मार्ग है, मानों उन्हें एक भूले हुए खजाने की कुन्जी सौंक दी हो।
29:36नारद के वचनों से व्यासदेव के हृदय में एक नई आशा का संचार हुआ, जैसे बंजर भूमी पर पहली वर्षा
29:43की बूंद गिरी हो।
29:45उन्होंने तक्षन एकाग्र होकर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लिलाओं पर गेहन ध्यान किया, मानों अपने भीतर ही ब्रहमांड के सबसे
29:54भव्यन रित्य को निहार रहे हुँ।
29:57अपनी तपस्या और ध्यान की गहरायों से उन्हे भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात कार हुआ, जो अपनी अनुपम छवी और दिव्य
30:05तेश से पूरे ब्रहमांड को प्रकाशित कर रहे थे।
30:09इस दिव्य दर्शन से व्यासदेव का हृदय पर्मानंद से भर गया, उनकी आत्मा त्रिप्थ हो गई, जैसे प्यासे को अमरित
30:17मिल गया हो।
30:19अब उन्हें पूर्णता का अनुभव हुआ, जो उनकी सभी रचनाओं में अनुपस्थित थी, और उन्होंने श्रीमत भागवतम की रचना का
30:27दिव्य संकल्प लिया।
30:30महा भारत और चारों वेदों का वर्गी करण करने के बाद भी, महर्शी व्यासदेव के मन में एक अनकही और
30:37रहस्य में उदासी चाई हुई थी।
30:40तभी व्यासदेव की कुटिया के भीतर एक अत्यंत दिव्य और अलोकिक वीना की मधूर जंकार गूंच उठी, जिसने संपूर्ण वातावर्ण
30:49को असीम शान्ती से भर दिया।
30:52स्वर्गलोक से उतरते हुए देवर्शी नारद अपनी चम्चमाती वीना के साथ व्यासदेव के शांत और पवित्र आश्रम में प्रकट हुए।
31:01देवर्शी नारद के कदम रखते ही आश्रम का कोना-कोना दिव्य पारिजात, पुष्पों की सुगंध और एक अनूठी आध्यात्मिक चेतना
31:10से महक उठा।
31:11अपने परम हितैशी और गुरु देवर्शी नारद को सम्मुख देखकर व्यासदेव ने अत्यंत श्रधा पूर्वक उठकर उनके चर्णों में अपना
31:21मस्तक जुकाया।
31:22व्यासदेव ने अत्यंत भक्ती भाव से गंदाजल लाकर नारद मुनी के चर्णों को धोया और उन्हें सम्मान पूर्वक कुशासन के
31:31उचे आसन पर बिठाया।
31:34हाथ में महती वीनाधारन किये हुए नारद जी ने अपनी करुणा से भरी द्रिष्टी से उदास बैठे व्यासदेव के मुखमंडल
31:42को ध्यान से देखा।
31:44नारद जी ने अत्यंत मधुर और गंभीर वाणी में पूछा कि है महरशी संसार को समस्त ज्यान देने के बाद
31:51भी आपके मन में यह अशान्ती क्यों है।
31:55व्यासदेव ने अत्यंत व्याकुलता से स्वीकार किया कि सब कुछ रचने के बाद भी उनके अंतर्मन को वह परमशान्ती और
32:03संतोष प्राप्ट नहीं हुआ है।
32:07देवर्शी नारद ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे व्यासदेव के इस मानसिक कष्ट और उनके हृदय की इस गहरी रिक्तता
32:14का वास्तविक कारण भली भानती जानते हैं।
32:18उन्होंने समझाया कि व्यासदेव ने अब तक केवल नियमों, कर्तवियों और परमात्मा के निराकार एवन निर्गुन स्वरूप का ही विस्तृत
32:27वर्णन किया है।
32:29नारत जी ने कहा कि केवल शुष्प ज्यान और कठिन धार्मिक नियमों की व्याख्या कभी भी मनुष्य की आत्मा को
32:36वास्तविक आनंद नहीं दे सकती।
32:40उन्होंने व्यासदेव को बताया कि जब तक वे भगवान श्रीकृष्ण की मधुर और दिव्य लीलाओं का खुल कर गुनगान नहीं
32:47करेंगे, उनका हृदय खाली ही रहेगा।
32:51नारद जी ने विरिंदावन की पावन भूमी और वहां के गोप गोपियों के निश्चल प्रेम का उदाहरन देकर भक्ती मार्ग
32:58की सर्वोच्छता को सिद्ध किया।
33:01उन्होंने बताया कि आने वाले कल्यव के मनुश्यों के परम कल्यान के लिए केवल श्रीहरी के मधुर नाम और उनकी
33:08गाथाएं ही एक मात्र सहारा हूंगी।
33:12अपने उकदेश को पुष्ट करने के लिए नारत जी ने अपने पूर्व जन्म की प्रेरक कथा सुनाई जब वे एक
33:19साधारन दासी के पुत्र थे।
33:22उन्होंने बताया कि कैसे संतों के मुख से श्रीहरी की पावन लीलाएं सुनकर उनके भीतर भक्ती का अंकुर फूटा और
33:29वे देवर्शी के पदपर प्रतिश्ठित हुए।
33:33नारत जी ने व्यासदेव को आदेश दिया कि वे अब केवल और केवल भगवान विश्णू और उनके भक्तों की महिमा
33:41को समर्पित एक नए महापुरान की रचना करें।
33:45गुरुदेव के इन परम कल्यानकारी और दिव्य वचनों को सुनते ही व्यासदेव के हृदय का सारा अंधकार दूर हो गया
33:52और एक नया प्रकाश फैल गया।
33:55परम संतोष का अनुभव करते हुए व्यासदेव ने देवर्शी के चर्णों में पुनह प्रणाम किया और श्रीमत भागवत महापुरान लिखने
34:03का पावन संकल्प लिया।
34:06व्यासदेव का यह द्रिड संकल्प देखकर देवर्शी नारद ने मुस्कुराते हुए अपना दाहिना हाथ उठाकर उन्हें अनंत आशिर्वात प्रदान किया।
34:16इसके पश्चात नारद मुनी ने अपनी दिव्यवीना की मधोर्तान छेडी जिससे शमयाप्रास आश्रम का पूरा वातावर्ण अलोकिक भजनों से गुनजायमान
34:27हो उठा।
34:28भगवान विष्णों के पावन नाम का संकीरतन करते हुए देवर्शी नारद धीरे धीरे आकाश मार्ग की ओर प्रस्थान करने लगे
34:37और स्वर्णिन जोती में लीन हो गए।
34:39महर्शी व्यासदेव अपने गुरुदेव को जाते हुए देखते रहे और उनका हृदय पूर्ण शांती, दिव्य प्रेणा और असीम ज्यान से
34:48भर गया।
34:50व्यासदेव सरस्वती नदी के पवित्रतट पर स्थित अपने शांत आश्रम में एक दिव्य वटवरिक्ष की शीतल चाया में ध्यान मुद्रा
34:58में विराज मान हुए।
35:00उन्होंने अपने आखे मूद ली और भक्तियोग के माध्यम से अपने मन को पूर्ण रूप से परमेश्वर के चर्णों में
35:08समाहित कर लिया।
35:10समाधी की स्थिती में व्यासदेव ने अपने अंतहकरण में साक्षात परंब्रहम भगवान श्री कृष्ण का अत्यंत तेजोमय और मनमोहक स्वरूप
35:19देखा।
35:20उन्होंने देखा कि भगवान श्री कृष्ण के पीछे उनकी बहिरंगा शक्ती माया देवी नत्मस्तक होकर लजजित भाव से खड़ी थी।
35:29व्यासदेव ने स्पष्ट रूप से अनुभव किया कि कैसे अज्ञानता के कारण जीव माया के वशीभूत होकर त्रिगुनों के चक्रवियों
35:38में दुख भोगता है।
35:40इस सांसारिक कष्ट का एक मात्र निवारन उन्होंने भगवान की अनन्य भक्ती और उनकी लीलाओं का निरंतर श्रवन की इर्तन
35:48ही पाया।
35:49कल्युक के जीवों पर परम दया से भर कर महर्शी व्यासदेव ने अपनी आखें खोली और उनका हृदय करुणा से
35:57चलक उठा।
35:59उन्होंने तुरंत भोजपत्र, मोरपंख की कलम और प्राकृतिक दिव्यस्याही एकत्र की ताकीवे इस महापुरान को लिपिबध कर सकें।
36:09परमेश्वर के ध्यान में लीन होकर व्यासदेव ने श्रीमत भागवतम का प्रथम मंगलाचरन श्लोक भोजपत्र पर अंकित करना आरंभ किया।
36:19जैसे ही व्यासदेव के हाथों से प्रथम अक्षर लिखे गए, उस पवित्र भोजपत्र से एक अलौकिक स्वर्णिन प्रकाश प्रस्फुटित होने
36:28लगा।
36:29व्यासदेव के मानस पटल पर श्रीमत भागवतम के बारह सकंध साक्षात भगवान श्री कृष्ण के बारह दिव्य अंगो के रूप
36:37में प्रकट होने लगे।
36:38इस महांद्रिश को देख कर स्वर्गलोक से देवताओं ने व्यासदेव के आश्रम पर सुगंधित पारिजात पुष्पों की मुसलाधार वर्शा की।
36:48सरस्वती नदी के तटपर पक्षी और वन्यजीव भी शांत होकर उस दिव्यवातावर्ण की असीम शांती और स्पंदन का आनंद लेने
36:58लगे।
36:59ग्रंथ की रचना करते हुए व्यासदेव के मन में विचार आया कि इस असीम ज्यानमरित को संसार में प्रचारित करने
37:07योग्य पात्र कौन होगा।
37:08तभी उनके मन में अपने आत्म ज्यानी और वित्रात पुत्र महर्शी शुकदेव का स्मरण हुआ जो इस पावन वानी को
37:17धारन करने में पूर्णत है समर्थ थे।
37:20व्यासदेव ने संपूर्ण श्रीमत भागवत महापुरान की रचना करके इसे शुकदेव जी को पढ़ाने का द्रिड संकल्क लिया जो कल्युब
37:29में समस्त जीवों के कल्यान का मार्ग बना।
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