पिछले एपिसोड में राजा नाभि को स्वयं श्री हरि का वरदान मिला था। इस एपिसोड में जानिए कैसे इस दिव्य वरदान से भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में अवतार लिया। राजसी वैभव में जन्म लेकर भी कैसे ऋषभदेव ने वैराग्य का सर्वोच्च मार्ग अपनाया और 'अवधूत' बनकर संसार को परम ज्ञान दिया। इस अद्भुत गाथा में देखिए एक राजा का सिंहासन त्यागकर, दिगंबर होकर, संसार को मोह-माया से मुक्त होने का संदेश देना। यह कहानी आपको बताएगी कि सच्चा सुख और स्वतंत्रता भौतिक संपदा में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और पूर्ण त्याग में है। #Rishabhdev #BhagavataPurana #Avadhuta #वैराग्य #त्याग #S3E28
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00:00श्रीहरी विश्णु का दिव्य संदेश पूर्ण होते ही उनका चतुर्भुज रूप तेजोमय प्रकाश में विलीन हो गया और राजा नाभी
00:07तथा रानी मेरुदेवी अत्यंत भक्तिभाव से साष्टान प्रणाम करने लगे।
00:13परमेश्वर के वैकुंठ लोग से एक अत्यंत देधी प्यमान नील्मनी और स्वर्ण सा चमकता हुआ दिव्य प्रकाश पुंच पृत्वी लोग
00:21की और तीवर गती से प्रवाहित होने लगा।
00:25राजमहल के भव्य अंतहपुर में बैठी रानी मेरुदेवी के वक्षस्थल और गर्भ में वह श्री हरी का अलोकिक अंश आकर
00:33सौमयता से प्रविष्थ हो गया।
00:35भगवान विष्णु का दिव्य अंश गर्भ में स्थापित होते ही रानी मेरुदेवी का शरीर दिव्य सुवर्ण कांतिमय होकर अलोकिक तेज
00:44से दमकने लगा।
00:45अपनी प्रिय पतनी के मुखमंडल और शरीर पर भगवान की अद्वितिय माया का अनुपम प्रकाश देखकर महाराजा नाभी गदगद हृदय
00:55से उनके समक्ष नत्मस्तक हो गए।
00:57पवित्र अजनाव वर्ष का संपूर्ण राजप्रासाद एक सुवर्णमय आध्यात्मिक आभा से आच्छादित हो गया और गगन से मंदार पुष्पों की
01:07व्रिष्टी होने लगी।
01:09वनप्रांतर में तपस्यारत सप्तरिशियों और महान योगियों ने इस अलोकिक स्पंदन को महसूस कर ध्यानमगन होकर प्रभु के होने वाले
01:18प्राकट्य की वंदना की।
01:20गर्ब के इस पावन प्रभाव से राज्य के सभी हिंसक पशु और म्रिग अपनी स्वाभाविक शत्रुता भूल कर एक साथ
01:28नदियों के तट पर प्रेम पूर्वक विचर्ण करने लगे।
01:32सामराज्य की समस्त नदिया अत्यंत शीतल निर्मल तथा अमरित्तुल्य मिठास से परिपूर्ण हो गई और उनके तट सहसरों खिले हुए
01:41कमलों से महक उठे।
01:42आकाश में सब्तरंगी इंद्रधनुशी बादलों की छटाचा गई और अद्रिश्य गंधर्वों ने अपनी वीना की तानों से मधुर मंगलगान गूजाना
01:52प्रारंभ कर दिया।
01:55इस परम मांगलिक समाचार की अनुभूती पाकर राजा नाभी ने अपने संपूर्ण राज्ज में निर्धनों और याचकों के लिए अपार
02:03धंधान्य तथा वस्त्रों के दान का आयोजन किया।
02:07राजभवन के विशाल यग्यमंडप में विद्वान वेदपाथी ब्राहमनों ने वैदिक रिचाओं का सुस्वर गायन करते हुए प्रदीप्त अग्निदेव को पवित्र
02:16आहुतिया अर्पित की।
02:18राणी मेरुदेवी रत्नजडिक जूले पर विश्राम करते हुए दासियों द्वारा चंदन लेपन और स्वर्ण व्यंजनों की सेवा स्विकार कर रही
02:27थी।
02:28सत्यलोक में विराजमान पद्मनाभ ब्रहम देव ने प्रित्वी पर नारायन के वैराग्य अवतार के आगमन का द्रिश्य देखकर अपनी चारों
02:37अंजली जोड कर वंदना की।
02:40शीर सागर में विराजमान जगच जन्नी माता लक्ष्मी ने नाभी के संपून राज्य पर अपनी अपार समरिध्धी और आध्यात्मिक श्री
02:48की वर्षा कर दी।
02:50राजा नाभी ने अपने कुलगुरु और तपोनिष्ठ महर्शियों को आमंत्रित कर राणी के गर्भ से प्रकट हो रहे अलोकिक लक्षनों
02:58के विशय में विचार विमर्ष किया।
03:01कुलगुरु ने मुस्कराते हुए राजा से कहा कि स्वय परात पर ब्रहमाही संसार को परम वैराग्य और मोक्ष धर्म का
03:09मार्ग दिखाने के लिए उनके पुत्र रूप में अवतरित हो रहे हैं।
03:15ध्यानमग्न अवस्था में रानी मेरुदेवी को अपने गर्भ में संपूर्ण ब्रहमाण और श्री हरी के जगनमोहन स्वरूप का अलोकिक साक्षातकार
03:23प्राप्थ हुआ।
03:25पूरे नगर के नागरिकों ने प्रसन्नचित्थ होकर सडकों को रंग बिरंगी पताकाओं, उश्पमालाओं और सुवर्ण दीपों से आच्छा दित कर
03:34दिया।
03:35जैसे जैसे प्राकट्य का समय निकट आने लगा, पूरा अजनाभ वश्प्रभु के स्वागत हेतु परम भक्ती, शान्ती और दिव्य आनंद
03:44के महासागर में डूब गया।
03:46शुभ मुहूर्क में जब गगनमंडल के समस्त ग्रहनक्षत्र अत्यन्त अनुकूल और कल्यानकारी योग में स्थापित हुए, तब संपूर्ण स्रिष्टी में
03:55एक अलौकिक शान्ती छा गई।
03:57रानी मेरु देवी के प्रांगण में अचानक एक कूटी सूरियों के समान अत्यन्त तेजस्वी और दिव्य प्रकाश प्रस्पुटित हो उठा,
04:06जिसने रात्री के अंधकार को मिटा दिया।
04:09उस परम जोती के मध्य से स्वयन श्री हरी विश्णू एक नवजात बालस्वरूप में प्रकट हुए, जिनका प्राकट्य भूमी को
04:18परम पवित्र कर गया।
04:20बाल रूप धरने पर भी भगवान के श्रीयंग पर साक्षात नारायन का श्याम वर्ण, अती कोमल कांती और अनुपम सौंदर्य
04:28चलक रहा था।
04:30नवजात शिशु के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का शुब चिनह और चर्णों में ध्वज, वजर तथा कमल की रेखाएं सपष्ट सुशोगित
04:38हो रही थी।
04:39माता मेरुदेवी अपने नेत्रों से अश्रु बहाती हुई अपने नवजात बालक के इस असीम अलोकिक सौंदर्य और तेजोमय स्वरूप को
04:49निहार कर भाव विभोर हो गई।
04:52महाराजा नाभी हाथ जोड कर भूमी पर नत्मस्तक हो गए और अपने कुल की रक्षा करने वाले पूर्ण पुरुशोत्तम प्रभु
05:00के चर्णों में बारंबार प्रणाम करने लगे।
05:03उसी क्षण स्वर्ग लोक में देवताओं द्वारा बजाये जाने वाले दुन्दुभी नगाडे स्वयंबस उठे, जिनकी गूंच से तीनों लोक आनन्दित
05:12हो उठे।
05:14आकाश मार्ग में दिव्य बादलों के उपर अपसराएं प्रकट हुई और भगवान के स्वागत में मनमोहक निरित्य करने लगी।
05:23गंधरवों ने अपनी वीना और वंशी की मधूर तानों पर सर्वेश्वर श्री हरी के दिव्य अवतार की स्तुती में मधूर
05:30गान प्रारंब कर दिया।
05:33देवराज इंद्र के आदेश पर स्वर्गलोक से पारिजात और कल्पवरिक्ष के सुगंधित पुष्पों की अविरल वर्षा राजा नाभी के राजमहल
05:41पर होने लगी।
05:43ब्रहम लोक में विराजमान ब्रहमाजी और कैलाशपती भगवान शिव ने भी अपने धाम से इस वैराग्य अवतार के प्राकटे पर
05:51शीश नवाकर नमन किया।
05:54राजपुरोहितों और वेदान्ती महर्शियों ने पवित्र वेदमंत्रों का सस्वर उच्चारन करते हुए यग्यकुंड में आहुतिया दी और जातकर्म संसकार संपन
06:04किया।
06:04अन्य नवजात शिशुओं के विप्रीत बाल रिश्भदेव शांत और गंभीर मुद्रा में धारन किये हुए पूर्ण ध्यानमगन अवधूत समान प्रतीत
06:14हो रहे थे।
06:16उनके विशाल नेत्रों की शांत और वीतरागी द्रिश्टी जिस किसी पर भी पड़ती, उसका मन स्वतह ही भौतिक मोहमाया से
06:23मुक्थ होकर परम शांती का अनुभव करने लगता।
06:28संपूर्ण अजनाब वर्ष की नदिया निर्मल जल से भर गई, व्रिक्ष असमय ही फलोंफूलों से लद गए और संपूर्ण प्रकृती
06:36लहलहा उठी।
06:38भगवान के प्राकट्य के प्रभाव से हिसंक पशु और शांत हिरन एक साथ बैर त्याग कर राजमहल के उध्यानों में
06:45प्रेम पूर्वक विचरने लगे।
06:47राजा नाभी ने असीम प्रसन्नता में भरकर ब्राहमनों और प्रजाजनों को अंगिनत सुवर्ण मुद्राएं, वस्त्राभूशन और अलंकृत गौए दान में
06:57दी।
06:59देवर्शी नारद और ब्रहम देव ने बालक के श्रेश्थतम गुनों को देखकर उनका नाम रुशब रखा, जिसका अर्थ है धर्म
07:07के सर्वोच रक्षक और शिरोमनी।
07:10रानी मेरुदेवी ने उस परम ब्रहमा रूपी शिशु को अपने वक्ष से लगा लिया। यह जानकर कि यह बालक भविश्य
07:17में जगत को परम वैराग्य और मोक्ष का मार्ग दिखाएगा।
07:22जैसे जैसे समय बीटता गया, बालक रिश्भदेव का दिव्य तेज दिन प्रति दिन बढ़ता गया, किन्तु उनका मन संसार के
07:30किसी भी बालसुलब मोहमाया में नहीं उलचता था।
07:34जहां अन्य राजपुत्र स्वर्ण के खिलोनों और रथों से खेलते थे, वहीं बालक रुशब शांत भाव से किसी विशाल व्रिक्ष
07:42के नीचे बैठ कर गहन ध्यान में लीन हो जाते थे।
07:46राजा नाभी जब अपने पुत्र को इस प्रकार समाधिस्थ देखते, तो उनके हृदय में वातसल्य और भक्ती का एक साथ
07:54संचार होने लगता था।
07:56रानी मेरुदेवी जब भी उन्हें मिष्ठान और मक्षन खिलाने आती, तो रिश्भदेव केवल माता के संतोश के लिए थोड़ा सा
08:05अन्न ग्रहन कर पुनह अपने ध्यान में चले जाते।
08:09रिश्भदेव की उपस्थिती का ऐसा प्रभाव था कि वन के हिंसक जीव जैसे सिंह और शांत म्रिग भी उनके चर्नों
08:17के समीप आकर परसपर बैरभाव भूल बैठते थे।
08:20एक समय जब बरहिश्मती नगरी पर भयंकर अकाल की चाया पड़ी और प्रजाजन वर्षा के अभाव में व्याकुल होकर राजसभा
08:29में एकत्र हुए तब स्थिती अत्यंत विकट थी।
08:33प्रजा की ऐसी दैनिय स्थिती देख कर बालक रिश्भदेव ने करुणा से भर कर अपने कमल नैनों को सूखे आकाश
08:41की ओर उठाया।
08:42उनके मात्र एक द्रिश्टिपात से ही नीले आकाश में घने मेग उमर पड़े और समूचे सामराज्य पर शीतल वर्षा की
08:51अमरित धारा बरसने लगी।
08:53यह अलौकिक चमतकार देखकर राजा नाभी समझ गए कि उनका पुत्र साक्षात भगवान विश्णु का ही अंश अवतार है जो
09:02जगत कल्यान हेतु पधारा है।
09:05राजमुकुट और भावी विशाल सामराज्य का स्वामी होने के बाद भी रिश्भदेव राजप्रसाद के सुंदर उध्यानों में नंगे पैर विचर्ण
09:14करते और सादगी प्रिय थे।
09:16जब राज्य के ज्ञानी रिशिमुनी और विद्वान राजसभा में आते तो बालक रिश्भदेव के मुख से निकले वेदग्यान के गूड
09:25वचनों को सुनकर हत प्रभ रह जाते थे।
09:29राजसेव को द्वारा लाए गए बहुमूल्य रत्नजडित वस्त्रों को वे अत्यंत विनमर्ता से अस्विकार कर देते और सादे वेश में
09:37ही सुख का अनुभव करते थे।
09:39एक दिन जब राजसी क्रीडावन में अचानक भीशन अगनी भड़क उठी और चारों और हाहाकार मच गया, तब समस्त प्रजा
09:48भयभीत हो उठी।
09:50किन्तु बालक रिश्भदेव निर्भय होकर उस धधकती हुई ज्वालाओं की ओर बढ़े और उनके स्पर्ष मात्र से अगनी शीतल कमलवायू
09:59में परिवर्तित हो गई।
10:00इस चमतकार को देखकर रानी मेरुदेवी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने पुत्र के चर्णों में प्रणाम किया और जाना की
10:09यह बालक जगत को परम वैराग्य का मार्ग दिखाने आया है।
10:13राजा नाभी अब राज्य के महत्वपूवन प्रशासनिक विश्यो में भी अपने बालक रिश्भदेव से परामर्श लेते और उनके उत्तर पूर्नत्या
10:23धर्म और न्याय पर आधारित होते थे।
10:27बरहिश्मती के समस्त नागरिक बालक रिश्भदेव को केवल एक भावी राजा नहीं, अपितु साक्षात अवधूत स्वरूप परमेश्वर मानकर उनका आधर
10:36करते थे।
10:38देवराज इंद्र ने भी जब स्वर्गलोक से बालक रुशब के इस असीम तेज और निरहंकार भाव को देखा, तो उनका
10:46भी मस्तक गर्व से रहित होकर जुप गया।
11:08समझ गये कि अब उनका राजपाट सौक कर वन गमन का समय निकट आ गया है।
11:14महाराजा नाभी ने राजप्रासाद के उच्च जरोखे से शांत भाव में लीन अपने पुत्र रिश्भदेव को देखा और उनका हृदय
11:23सांसारिक मोह को त्याग कर पूर्ण वैराग्य से भर उठा।
11:27महाराजा नाभी ने बिना किसी विलंब के अपने मुख्य मंत्रियों, राजपुरोहितों और वयोवरिध सभासदों की एक विशाल आपात कालीन राजसभा
11:37का आयोजन किया।
11:39भरी सभा में राजा नाभी ने अत्यंत ग्रिड और शांत वानी में घोशना की की उनका सांसारिक दायत्व अब समाप्त
11:47हो चुका है और वे राजकाज त्यागना चाहते हैं।
11:51राजा की इस अकस्मात वैराग्यमे घोशना को सुनकर पूरी सभा में सन्नाटा चा गया और मंत्रियों की आखें अश्रुपूरित हो
12:00गई
12:02राजपुरोहित और महर्शियों ने नाभी के इस महान निर्नय को धर्मानुकूल माना और राजकुमार रिश्भदेव के राजजाभिशेक का पूर्ण समर्थन
12:11किया
12:11सभा समाप्त करके राजा नाभी सीधे अपनी महारानी मेरुदेवी के अंतहपुर पहुँचे टाकीवे उन्हें वन्गमन के अपने अंतिन संकल्प से
12:21अवगत करा सके
12:24महारानी मेरुदेवी ने अपने पती के पच्चहनों का अनुसर्ण करते हुए सहर्ष राजसी ठाटबाट त्याग कर उनके साथ वन जाने
12:32का पवित्र निर्ने लिया
12:34अगले ही प्रभात संपूर्ण राज्ज में धोलन गाडो और शंकध्वनी के साथ युवराज रिश्भदेव के भव्य राज्याभिशेक का समाचार प्रसारित
12:44कर दिया गया
12:46राज्याभिशेक के पावन अफसर पर संपूर्ण राजदर्बार को सोने के कलशों, ताजे कमल पुष्पों और सुगंधित धूप से अलोकिक रूप
12:54से सजाया गया
12:56युवराज रिश्भदेव जब अलोकिक तेज और शांत मुद्रा में राजसभा में प्रविश्थ हुए, तो उनकी उपस्थिती मात्र से पूरी सभास्तब्ध
13:05और भक्तिमय हो गई
13:08रिशियों और वेद पाठियों ने पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बीच सप्त नदियों के पावन जल से बालक रिश्भदेव का
13:15जलाभिशेक प्रारंभ किया
13:18राजा नाभी ने कापते हुए किन्तु अपार भक्ती से भरे हाथों से अपना वन्शानुगत मुकुट उठाया ताकि वे उसे अपने
13:26पुत्र के मस्तक पर सुशोभित कर सके
13:29राजा नाभी ने जैसे ही वह अलौकिक मुकुट रिश्भदेव के शीश पर रखा आकाश से देवताओं ने पुश्पवर्षा शुरू कर
13:37दी और जैकारे गुंजुठे
13:40मुकुट धारन करने के पश्चात भी रिश्भदेव के चहरे पर अहमकार का एक भी भाव नहीं था वे पूर्ण अनासक्त
13:48और शान्त बने रहे
13:50राज्या भिशेक पूर्ण होते ही राजा नाभी ने स्वय अपने ही पुत्र और नए समराठ रिश्भदेव के चर्णों में जुपकर
13:58उन्हें प्रणाम किया
14:00पूरी राज सभा ने नवस्मराट रिश्भदेव के जैजैकार के नारे लगाए और संपूर्ण राज्य उत्सव के आनंद में डूग गया
14:09इसके तुरंत बाद राजा नाभी ने अपने राजसी वस्त्रों और रत्नों को उतार कर वलकल वस्त्र और रुद्राक्ष की मालाएं
14:17धारन कर ली
14:19महारानी मेरुदेवी ने भी अपने स्वर्ण आभूशनों का त्याग कर दिया और अपने पती की तरह साधारन साधवी का वेश
14:27धारन कर लिया
14:29राजा नाभी और रानी मेरुदेवी ने अपने राज महल और प्रजा को अंतिन बार निहारा और मोक्ष की खोज में
14:37बदरिकाश्रम के मार्ग पर प्रस्थान किया
14:40महल के मुख्य द्वार पर खड़े होकर नए समराट रिश्भदेव ने अपने वनगामी मातापिता को हाथ उठा कर अपना अलोकिक
14:48आशिरवाद प्रदान किया
14:51मातापिता के वनप्रस्थान के पश्चात भगवान रिश्भदेव ने भारी मन से राजमहल की ओरुख किया और धर्म पूर्वक प्रजा की
15:00रक्षा का संकल्प लिया
15:02महर्शियों और श्रिष्ट ब्राहमनों ने वैदिक मंत्रों के उच्चारन के बीच भगवान रिश्भदेव का भव्य राज्याभिशेक संपन्न किया
15:11दिव्य सिनहासन पर विराज मान होकर नए समराथ रिश्भदेव ने अपनी प्रजा को आश्वस्त किया कि उनका शासन सत्यक न्याय
15:20और करुणा की नीन्व पर खड़ा रहेगा
15:23रिश्भदेव के अलौकिक गुनों और धर्म प्रायनता से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र अपनी परम सुंदरी पुत्री जयनती के साथ राज
15:31सभा में उपस्थित हुए
15:34देवराज इंद्र ने बड़े आदर पूर्वक अपनी पुत्री जयनती का हाथ समराट रिश्भदेव के करक्मलों में सौंपने का प्रस्ताव रखा
15:43रिशियों के पावन सानिध्य और गंधर्वों के मधुर गायन के बीच समराट रिश्भदेव और राजकुमारी जयनती का विवाह संसकार अत्यंत
15:52धूमधाम से संपन्न हुआ
15:55महारानी जयनती के साथ रिश्भदेव ने ग्रिहस्थ आश्रम में प्रवेश कर एक आदश और धर्मनिष्ट दामपत्य जीवन का उदाहरन प्रस्तुत
16:04किया
16:06समय बीचने के साथ महारानी जयनती की कुक्षी से एक सौ महा प्राक्रमी और अत्यंत गुनवान पुत्रों का जन्म हुआ
16:15उन सौ पुत्रों में सबसे जेश्ट थे भरत जो बालेकाल से ही अध्भुत तेज, बल और चक्रवर्ती समराट बनने के
16:22गुनों से सुशोगित थे
16:25भरत के अतिरिक्ट नौ अन्य पुत्र परम भागवत और वैरागी बने, जिनहें नवयोगी श्वर के रूप में जाना गया और
16:32वे अध्यात्म के शिखर पर पहुँचे
16:35शेश एकासी पुत्रों ने अत्यंत, विनम्र और ज्यानी बनकर वेदवे दांगों में पारंगत होकर समाज में ज्यान और धर्म का
16:43प्रचार प्रसार किया
16:46समराट रिश्भदेव ने अपने राज्य में ऐसी न्याय व्यवस्था स्थापित की जहां हर प्राणी को समान अधिकार और वात्सल्य प्राप्त
16:54था
16:55उनके न्यायप्रिय शासन में राज्य से दरिदर्ता, भय और अन्याय का पूर्णत विनाश हो गया और चारों और सुक्सम्रिद्धी छा
17:04गई
17:05रिश्भदेव के तप और प्रभाव से प्रकृती भी अनुकूल हो गई, समय पर वर्षा होती, व्रिक्ष फलों से लज जाते
17:13और हिंसक जीव भी वैर भाव भूल गए
17:16समराट रिश्भदेव ने स्वयन शास्त्रों के अनुसार अनेक भव्य यग्यों का अनुष्ठान कर प्रजा के समक्ष एक आदश धर्म पालक
17:25का उदाहरन रखा
17:27वे अपनी प्रजा को निरंतर उपदेश देते थे कि यह मनुष्य शरीर केवल भौतिक सुखों के लिए नहीं, बलकि भगवत
17:35भक्ती और आत्म कल्यान के लिए है
17:39रिश्भदेव ने अपने सबसे बड़े पुत्र भरत को राजधर्म, प्रजापालन और नीतिशास्त्र का गेहन ज्यान प्रदान कर उन्हें भविश्य के
17:47समराठ के रूप में तयार किया
17:50संपूर्ण आर्यावर्त में रिश्भदेव के धर्मराज्य की कीर्ति दिशादिशाओं में फैल गई और राज्य का हर नागरिक आध्यात्मिक शान्ती का
17:59अनुभव करने लगा
18:01प्रजाजन अपने प्रिय राजा की दीरगायू और कल्यान की प्रार्थना करते हुए उनके दर्बार में उफार अर्पित करते और उनके
18:10चर्णों में शीश नवाते
18:12संपूर्ण प्रित्वी पर धर्म की स्थापना करने के उपरांत भगवान रिश्भदेव के मन में अब परम वैराग्य और अवधूत अवस्था
18:21को अंगीकार करने की इच्छा जागरित होने लगी
18:25अपनी लीला के अंतिन सोपान की ओर बढ़ते हुए भगवान रिश्भदेव ने ब्रहमावर्थ देश में अपने सौ पुत्रों और समस्त
18:33प्रजाजन की एक महास्भा आमंत्रित की
18:37सामने बैठे अपने पुत्रों और प्रजा को सम्बोधित करते हुए रिश्भदेव का स्वर दिवे शांती और अगाध आत्म ज्यान की
18:45वर्षा करने लगा
18:47भगवान रिश्भदेव ने उपदेश देते हुए कहा कि यह मनुष्य शरीर केवल मलमूत्र और क्षन भंगुर सांसारिक भोगों के लिए
18:56नहीं बलकी केवल तपोमय इश्वर प्राप्ती के लिए मिला है
19:01उन्होंने समझाया कि जब मनुष्य पवित्र तपस्याद्वारा अपने चित्त का शोधन करता है तभी उसे अनन्त और अविनाशी परमसुख की
19:10प्राप्ती होती है
19:13रिश्भदेव ने चेतावनी दी की अज्ञानता के कारण भौतिक सुखों में लिप्ट जीव कर्मों के बंधन में जकड कर बार
19:20-बार जन्मर्ण के चक्र में भटकता रहता है
19:24उन्होंने अहंकार और मोह की बेडियों को रेखांकित करते हुए कहा कि मैं और मेरा का भाव ही आत्मा को
19:31संसार के भ्रमजाल में बांध कर रखता है
19:35रिश्भदेव ने अपने पुत्रों को शिक्षादी की संतों और महापुरुषों की सेवा ही मोक्ष का द्वार खोलती है, जबकी कामियों
19:43की संगती अज्ञान का अंधकार बढ़ाती है
19:47उन्होंने सच्चे संत के लक्षन बताते हुए कहा कि जो शांत, समदर्शी, क्रोधरहित और सर्वथा इश्वर्भक्त होते हैं, वही समाज
19:57के वास्तविक मार्ग दर्शक हैं
20:00प्रजा को संबोधित करते हुए राजा रिश्भदेव ने आग्रह किया कि केवल धन और परिवार के संग्रह में जीवन नश्ट
20:08न करें, अपितु आत्मा के कल्यान को ही परम लक्ष माने
20:13उन्होंने अपने पुत्रों को निर्देश दिया कि वे भगवान वासुदेव के चर्णों में अनन्य प्रेम और भक्ती स्थापित करके अपने
20:21ह्रदय की अज्ञान ग्रंथी को काट डालें
20:25रिश्भदेव ने सत्यक अहिंसा, इंद्रे निग्रह और समस्ट जीवों में इश्वर का दर्शन करने के परम धर्म का विस्तार से
20:32निरूपन किया
20:35रिश्भदेव के जेश्ट पुत्र भरत जो परम गुनवान और धर्मनिष्ट थे, अपने पिता के इन अमरित्मई वचनों को अत्यन्त ध्यान
20:43और भक्ती से सुन रहे थे
20:45सभा में उपस्थित समस्त रिशियों और प्रजाजनों के अश्रुच छलकाए क्योंकि वे समझ गए थे कि उनके प्रियराजा अब वैराग्य
20:54का मार्ग चुनने वाले हैं
20:58तदुप्रांत रिश्भदेव ने भरत की ओर देखकर उनके महागुनों, न्याय प्रियता और भगवत भक्ती की प्रशनसा की
21:06उन्होंने घोशना की की वे इस संपूर्ण प्रित्वी के शासन का भार अपने जेश्ट पुत्र भरत को सौंप रहे हैं
21:13और स्वया अवधूत वृत्ती को धारण करेंगे
21:17रिश्भदेव ने अपने शेश निन्यानवे पुत्रों को आदेश दिया कि वे अपने बड़े भाई भरत को ही राजा मान कर
21:25उनकी आज्या का पालन करें और धर्म की रक्षा करें
21:29उन पुत्रों में से नौ पुत्र जो महान योगेश्वर बनने वाले थे अपने पिता के उपदेशों को रध्यंदम कर अलोकिक
21:37तपोबल से चमकने लगे
21:40भगवान रिश्भदेव ने वैदिक मंत्रोच्चार और शंकध्वनी के बीच राजकुमार भरत का समराट के पदपर पवित्र राज्याभिशेक संपन्न किया
21:50आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्शा की और संपूर्ण सभा रिश्भदेव के अनुपम त्याग और ज्यानवप देश की जैजैकार करने लगी
22:00इस प्रकार अपने कर्तवियों को पूर्ण कर भगवान रिश्भदेव ने राजसी वस्त्रों और आभूशनों को त्याग कर पूर्ण वैराग्य के
22:08मार्ग पर कदम बढ़ाया
22:11राजमहल के विशाल स्वर्ण द्वारों को पीछे छोड़ते हुए अवधूत रूपधारी भगवान रिश्भदेव मौन भाव से घने वनों की ओर
22:19बढ़ चले
22:20अपने सर्वप्रिय राजा को राजसी वैभव का पूर्ण त्याग कर धूल भरे मार्ग पर चलते देख संपूर्ण प्रजा का हृदय
22:28अत्यंत भावुखो उठा
22:31संसार की समस्त भौतिक लालसाओं से परे होकर भगवान रिश्भदेव ने घने जंगल के भीतर एक विशाल वट्वरिक्ष के नीचे
22:39समाधी लगाई
22:41उनके भीतर की परम अहिंसा और शांत चेतना के प्रभाव से हिंसत पशु और म्रिग एक साथ बैठकर असीम शांती
22:49का अनुभव करने लगे
22:52अवधूत वेश में विचरते हुए जब वे नगरों में पहुँचे तो अज्यानी लोगों ने उनके मौन और फटे पुराने रूप
22:59को देखकर उफास उडाया
23:02मान और अपमान दोनों को एक समान मानते हुए भगवान रिश्भदेव के मुख पर सदैव एक दिव्य और मंदमुस्कान बनी
23:10रही
23:12तीखी धूप कडाके की ठंड और भूखप्यास जैसी शारिरिक समवेदनाओं से मुक्थ होकर वे केवल अपनी आत्मा में लीन रहे
23:21आकाशमार्ग से गुजरते हुए देवर्शी नारद ने भगवान रिश्भदेव के इस अनुपम परमेहन्स भाव को देखकर उन्हें प्रणाम किया
23:31उनकी देह से उठती हुई अलोकिक आध्यात्मिक उर्जा संपूर्ण वन छेत्र को एक दिव्य प्रकाश से जग्मगा देती थी
23:40भगवान रिश्भदेव ने अपने जीवन से यह शिक्षादी की वास्तविक मुक्ती देहभाव और अहंकार के पूर्ण त्याग में ही नहित
23:48है
23:50स्वर्ग से देवराज, इंद्र और अन्य देवता रिश्भदेव की इस निशकाम साधना को देखकर चकित और आनन्दित हो रहे थे
23:59उधर महल में समराट भरत अपने पिता के अवधूत जीवन का स्मरण कर अत्यंत नमरता के साथ न्यायपूर्वक शासन करने
24:07लगे
24:08दक्कन और दक्षिन भारत के कुटक, वेंक तथा कोंकन क्षेत्रों में विचरते हुए रिश्भदेव ने सर्वत्र शान्ती का संचार किया
24:18प्रकृती भी अपने भगवान की सेवा में तत्पर होकर उनके पथ में पुष्बिछाती और शीतल पवन से उनका स्वागत करती
24:26थी
24:36उनके शरीर से निरंतर प्रवाहित होने वाली परम पवित्र सुगंध से कई योजन दूर तक का वातावर्ण सुवासित हो उठता
24:44था
24:45अंतर कुटकाचल परवत की पवित्र भूमी पर पहुँचकर भगवान रिश्भदेव ने अपनी लीला को विश्राम देने का निश्चय किया
24:53बांस के व्रिक्षों के आपस में टक्राने से उठी प्राकृतिक दावानल की लप्टों ने समाधिस्थ रिश्भदेव के भौतिक स्वरूप को
25:02आच्छादित कर लिया
25:05भगवान रिश्भदेव की परम आत्मा परब्रहम परमात्मा में लीन हो गई जिससे संपूर्ण ब्रहमांड में परम शान्ती छा गई
25:14स्वर्ग से देवताओं ने इस परम अवधूत की अंतिम लीला पर अनवरत पुश पवर्शा कर उनके त्याग और ज्ञान की
25:21अमर गाथा का गान किया
25:24महाराजा रिश्भदेव अपनी प्रजा और पुत्रों को सुयोग्य बनाने के उपरांत अपने अवतार के मुख्य उद्देश अर्थात मुक्ष और वैराग्य
25:33के परम मार्ग को संसार के सामने प्रकट करने का निश्चय करते हैं
25:39राजसभा के मध्य अपने सो तेजस्वी पुत्रों को उपस्थित देख भगवान रिश्भदेव के हृदय में उनके कल्यान और संपूर्ण मानव
25:48जाती के मार्गदर्शन की दिव्य इच्छा जागरित हुई
25:52गंभीर और मेग के समान गंभीर स्वर में बोलते हुए भगवान रिश्भदेव ने सभा को संबोधित किया और बताया कि
26:00यह मानव शरीर केवल क्षनभंगुर भौतिक सुखों के उपभोग के लिए नहीं है
26:06उन्होंने अपने पुत्रों को उपदेश दिया कि मनुष्य को अपनी इंद्रियों को वश्मे कर तपस्या का मार्ग अपनाना चाहिए जिससे
26:14अंतहकरन शुद्ध होता है और परम आनंद की प्राप्ती होती है
26:20पिता के इन अन्मोल और परम ज्यान से भरे वचनों को सुनकर भरत सहित सभी सौ पुत्रों ने अत्यंत श्रद्धा
26:27और मौन रहकर अपने मस्तक जुका लिए
26:31इसके पश्चात भगवान रिश्भदेव ने अपने जेश्ट पुत्र भरत की ओर संकेट करते हुए उन्हें सामराज्य का नया स्वामी और
26:39धर्म का रक्षक घोशित किया
26:42राज्या भिशेक के लिए पवित्र नदियों का जल स्वर्ण कल्षों में लाया गया और रिशियों ने मंत्रों चार के साथ
26:49वातावर्ण को अत्यंत पवित्र और दिव्य बना दिया
26:52स्वय भगवान रिश्भदेव ने अपने हाथों से अत्यंत सुन्दर और रत्नों से जडित स्वन् मुकुट को भरत के मस्तक पर
27:01सुशोबित कर उने राजा घोशित किया
27:04मुकुट धारन करते ही महाराज भरत के नेत्रों से अश्रु बहने लगे और उन्होंने अपने पूज पिता के चर्णों में
27:12गिरकर आशिर्वाद प्राप्त किया
27:15रिश्भदेव ने अपने पुत्र के सिर पर अपना वर्देहस्त रखा और उन्हें न्यायपूर्वक प्रित्वी का पालन करने तथा धर्म के
27:23मार्ग पर चलने का अंतिम उपदेश दिया
27:25अब अपने समस्त उत्तरदायत्वों से मुक्त होकर भगवान रिश्भदेव ने भरे दर्बार में अपने राजसी जीवन के पूर्ण परित्याग और
27:35अवधूत बनने की घोषणा की
27:38इस अप्रत्याशित घोषणा को सुनकर संपूर्ण राजसभा, मंत्री, रानिया और प्रजा हाहाकार कर उठी तथा सभी की आँखों से आसुओं
27:47की धारा बहने लगी
27:50अपनी घोषणा के साथ ही भगवान रिश्भदेव ने अपने शरीर से रेश्मी पीतामबर और राजसी वस्त्रों को उतारना प्रारंभ कर
27:58दिया, जो संसार से उनके विच्छेद का प्रतीक था
28:03उन्होंने अपने अमूल्य रत्नजडित मुकुट, कुंडल, स्वर्ण हार और कंगन एक एक कर उतार कर राजसी वेदी पर रख दिये
28:12समस्त अलंकारों का त्याग कर, वे केवल एक साधारन कौपीन धारन किये हुए, परम तेज से चमकते हुए पूर्ण वैराग्य
28:20की मूर्ती बन गए
28:22प्रजा ने जब अपने परम कृपालु राजा को इस तपस्वी रूप में देखा, तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा और
28:29वे प्रभो को रोकने के लिए हाथ जोड कर प्रार्थना करने लगे
28:34बिना पीछे मुडे और बिना किसी मोह के, भगवान रिश्भदेव ने राजसिनहासन की उची स्वर्ण सीधियों से अपने पहले कदम
28:43नीचे की ओर बढ़ाए
28:45महल के द्वारों पर तैनात पहरेदार भी अपनी अश्रुधारा को रोक न सके, जब उन्होंने अपने स्वामी को मौन और
28:53अत्यंत शांत भाव से महल से बाहर जाते देखा
28:58विशाल राजप्रसाद के मुख्य द्वारों को पार करते हुए, उन्होंने अपनी माया और सामराज्य की सीमा से सदा के लिए
29:05प्रस्थान किया
29:07धूल और धूप से सनेपत पर नंगे पैर चलते हुए, अवधूत रिश्भदेव ने घने जंगलों की ओर रुख किया, जहां
29:15उनका प्रत्येक शन केवल परब्रम में लीन रहने के लिए था
29:20घने और बीहड वनों के मध्य पहुँचकर भगवान रिश्भदेव ने लोकमर्यादाओं के अंतिन तंतु को भी पूर्णतय छिन्न भिन्न कर
29:28दिया
29:30उन्होंने एक विशाल वटवरिक्ष के तले बैठ कर अपने दीर्ग केशों को बिखेर लिया, जिससे उनका रूप पूर्णत है एक
29:37विरक्त अवधूत जैसा प्रतीत होने लगा
29:41वनों के हिंसक पशुभी उनकी परम शान्ति पूर्ण उपस्थिती से प्रभावित होकर बिना किसी भय और वैर के उनके समीप
29:49आकर शान्ती से बैठ गए
29:52कंकर पत्थरों और नुकीले कांटों से भरे मार्गों पर वे इस प्रकार चलने लगे, मानों शरीर के सुख और दुख
29:59से उनका कोई नाता ही न रहा हो
30:02वन के निकट रहने वाले ग्रामीनों ने जब इस तेजस संपन्न अवधूत को देखा, तो वे उनके अगात आलोक और
30:10विचित्र अवस्था को देख कर स्थब्ध रह गए
30:14सांसारिक मनुष्यों को अपने समीब आने से रोकने के लिए उन्होंने गुंगे, बहरे और जड के समान आचर्ण करना आरंभ
30:22कर दिया
30:23जब अज्यानवश कुछ मूढ लोगों ने उन पर धूल फेंकी और दुर्वचन कहे, तब भी अवधूत रिश्भदेव की आत्मा में
30:32आनंद की मंद मुस्कान बनी रही
30:35उनके लिए सोने के पात्र और मिट्टी के ढिले में कोई भेद नहीं बचा था, क्योंकि उनकी दृष्टी सर्वत्र केवल
30:42परब्रह्म को ही देख रही थी
30:45छोटे बालकों का समोह कौतुकवश उनके पीछे भागता और रिश्भदेव निश्पाप शिशुकी भांती उन बालकों की ओर वात्सले से देखते
30:55कठोर और पत्रीली भूमी पर विश्राम करते हुए भी उनका दिव्य शरीर अलोकिक कांती से जग्मगाता रहता था
31:14अर्ग से देवगण इस द्रिश्य को देखकर अचरच से भर गए और उन्होंने इस महान अवधूत पर पुष्पों की वर्षा
31:21आरंभ कर दी
31:23महर्शी नारद ने अपनी वीना की तान पर अवधूत रिश्भदेव के इस अध्वितिय वैराग्य और आत्मस्थिती का यश्गान किया
31:32त्रिशा आतूर होने पर वे पशुओं की भांती सीधे जलधारा में मुख लगा कर जल पीते मानोवे देहाभिमान को पूर्णतह
31:40मिटा चुके हो
31:43ब्रहमावर्थ के परवतों और कंदराओं में विचर्ण करते हुए उनकी द्रिश्टी केवल उस अध्रिश्य परम सत्यपर्टी की थी
31:51जो लोग उनसे धर्म का गूड प्रश्न पूचते उन्हें रिश्भदेव के मौन से ही ब्रहमाण्डिय शांती और उत्तर प्राप्थ हो
31:59जाते
32:00विशैले सर्प भी उनके शरीर पर निश्भय होकर रेंगते मानों वे उन्हें प्रकृती का ही एक अविभाज अंग मानते हुँ
32:09उनकी विशाल आखों में वह अनंत बोध चमक रहा था जो जन्म और मृत्यू के चक्र से परे सर्वव्यापी ब्रहमा
32:17को दर्शाता है
32:19दूर से यह द्रिश देख रहे तत्वग्यानी रिशियों ने रिश्भदेव को साक्षात सर्वेश्वर श्री हरी का अवतार मानकर दंडवत प्रणाम
32:28किया
32:30रिश्भदेव की यह अवधूत अवस्था युगो युगो तक समस्त मोक्षा भिलाशी साधकों के लिए परम वैराग्य की सर्वोच मिसाल बन
32:37गई
32:39परम हंस अवस्था को प्राप्त कर भगवान रिश्भदेव ने समस्त भौतिक आवरणों का त्याग कर दिया और नगन अवधूत रूप
32:47में दिशाओं को ही अपना वस्त्र बना लिया
32:50कटीई जाडियों और कठोर चट्टानों से भरे दुर्गम मार्गों पर चलते हुए भी उनके कोमल चर्णों में तनिक भी पीडा
32:58का भाव नहीं जलकता था
33:00अज्यानी नगरवासियों ने उन्हें उनमत मानकर उन पर धूल और कंकर बरसाए किन्तु वे अपनी सहज आत्मानंद की स्थिती में
33:09अविचलित रहे
33:11निंदा और स्तुती दोनों से परे रिश्भदेव के तेजस्वी मुखमंडल पर सरवदा एक शान्त और आनंदमई अलोकिक मुस्कान विद्यमान रहती
33:20थी
33:22उनकी असीम शान्ती से प्रभावित होकर अनेक जिग्यासु साधक और बालक अंजाने ही उनके पीछे-पीछे चलने लगे
33:31हिंसक वन्यजीव जैसे बाग, सिंह और विशैले सर्प भी उनके समताभाव और अहिंसा के प्रभाव से उनके निकट शान्त भाव
33:39से बैठ जाते थे
33:42रिश्भदेव के इस दिव्य प्रेम ने सम्पूर्ण वन्चेत्र को भयमुक्त कर दिया, जहां केवल करुणा और सद्भाव का ही सामराज्य
33:50था
33:51वे कभी अजगर की भान्ती एकांत स्थान में स्थिर पड़े रहते, तो कभी गायों के समान मोहोकर भूमी पर ही
33:59शयन करते थे
34:01शुधा और त्रिशा से पूरी तरह मुक्त होकर वे केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोजन को ग्रेहन करते अथवा कई दिनों तक
34:08उपवास में ही लीन रहते
34:11यद्यपी उनका शरीर धूल से धूसरित था, फिर भी उनके अंगन से निकलने वाली दिव्य सुगंध से संपूर्ण वंदिशाय सुगंधित
34:20हो उठती थी
34:22आकाश मार्ग से विचर्ण करते हुए देवतागन अवधूत रिश्भदेव की इस परम वेराग्यमी स्थिती को देख कर उन पर पारिजात
34:30पुष्पों की वर्षा करने लगे
34:33स्वर्ग के राजा इंद्र ने स्विकार किया कि समस्त लोकों के वैभव से कहीं अधिक महिमामई यह निस्प्रहता और आत्मग्यान
34:41की अवस्था है
34:43परवत शिखरों और पवित्र नदियों के तटों पर रमण करते हुए रिश्भदेव प्रत्यक्ष रूप से स्वयन को सर्वव्यापी ब्रहमा में
34:51लीन रखते थे
34:53मार्ग में मिलने वाले दुलब मुमुक्षूओं को वे गूड आध्यात्मिक उपदेश देते हुए कहते कि यह मानव शरीर केवल भोगों
35:01के लिए नहीं अपितु आत्मसाक्षातकार के लिए मिला है
35:06उन्होंने शिक्षादी की संसार के संतापों से मुक्ती पाने का एक मात्र साधन मन की वासनाओं का विनाश और कर्म
35:14बंधनों का उच्छेद है
35:17भगवान श्री हरी के चर्णों में अनन्य भक्ती भाव स्थापित करने को ही उन्होंने जीवन का सर्वोच्च लक्षय और परम
35:24पुरुशार्थ घोशित किया
35:27अपनी अन्वरत यात्रा के अंतिन चरण में वे दक्षिन भारत के कुटकाचल परवत के सधन वनों की ओर अग्रसर हुए
35:35वहां उन्होंने मौन वरत धारण कर अपनी समस्थ इंद्रियों और मन को पूर्णतय परमात्मा के विग्रह में विलीन कर दिया
35:44बासों के परस्पर घर्षन से प्रजवलित हुई दावानल की ज्वालाओं ने रिश्भदेव के भौतिक शरीर को एक महान यग्यकी आहुती
35:52की भांती भस्म कर दिया
35:54इस प्रकार रिश्भदेव की यह आलोकिक यात्रा समाप्थ हुई जिसने भावी पीडियों के लिए परम स्वतंत्रता और निश्कान कर्मयोग का
36:04अमर मार्ग प्रशस्त किया
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