दक्ष यज्ञ के विनाशकारी अंत के बाद, जहाँ शिव और विष्णु की अभेदता का दिव्य ज्ञान प्रकट हुआ, अब कहानी दिति की ओर मुड़ती है। दक्ष प्रजापति की पुत्री और महर्षि कश्यप की पत्नी दिति, अपने पुत्रों (दैत्यों) के वध से दुखी होकर, इंद्र को परास्त करने वाले एक शक्तिशाली पुत्र की कामना करती है। कश्यप मुनि की कठोर शर्तों पर दिति एक घोर तपस्या में लीन हो जाती है, लेकिन देवराज इंद्र उसकी मंशा भांप लेते हैं। क्या इंद्र दिति की तपस्या को भंग कर पाएंगे? क्या दिति का प्रतिशोध पूरा होगा, या एक अप्रत्याशित दिव्य खेल रचा जाएगा? देखिए कैसे दिति के गर्भ से 49 मरुतों का रहस्यमय जन्म हुआ! #BhagavataPurana #Diti #Indra #Maruts #HinduMythology #S3Ep21 #PuranaSeries #DivineBirth #VedicGods
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00:00दक्ष यग्य की समापती के बाद जहां चारों और आनंद और शान्ती का वातावर्ण था, वहीं दैतियों की माता दिती
00:07का हृदय अपने पुत्रों के वध के शोक में जर रहा था।
00:11स्वर्ग में देवताओं के उत्सव की ध्वनिया सुनकर दिती के मन में प्रतिशोध की ज्वाला और तीवर हो उठी, जिससे
00:19उसकी आँखों से आसु बहने लगे।
00:23दिती को बार-बार अपने उन शक्तिशाली असुर पुत्रों की याद आ रही थी, जिन्हें देवराज इंद्र ने अपने वजर
00:30से निर्दैता पूर्वक मार डाला था।
00:33पुत्रवियोग की इस असहनिय पीडा ने दिती के कोमल मात्रित्व को एक भयंकर और विनाशकारी संकल्प में बदल दिया।
00:42वह भूल नहीं पा रही थी की कैसे उसके मासूम और पराक्रमी बालकों को देवताओं ने शड्यंत्र रचकर युद्ध भूमी
00:50में वीर्गती दी थी।
00:52अपने बहते हुए आसूँ को पोँच कर दिती ने प्रतिज्याकी की वह देवराज इंद्र के अहंकार को मिट्टी में मिला
00:59कर ही दम लेगी।
01:02प्रतिशोध की इस अगनी को शांत करने के लिए दिती अपने पती परम तेजस्वी महर्शी कशप के आश्रम की गोर
01:09चल पड़ी।
01:11दिती भली भानती जानती थी कि केवल महर्शी कशप के तपोबल से ही उसे वह शक्ती प्राप्थ हो सकती है
01:18जो इंद्र का अंत कर सके।
01:20आश्रम के भीतर ब्रहमाजी के मानस पुत्र महर्शी कशप अपनी समाधी में लीन थे और उनका संपूर्ण शरीर दिव्य तेज
01:29से चमक रहा था।
01:30दिती ने अपने मन के अशान्त सागर को छुपाया और अत्यंत विनम्रता पूर्वक अपने तेजस्वी पती के निकट पहुँची।
01:40कशप मुनी के चारों और फैला हुआ तपोबल और शांत वातावर्ण दिती के भीतर सुलक्ती क्रोध की अगनी को भी
01:47शांत नहीं कर पा रहा था।
01:50अपनी समाधी पूर्ण कर जब महर्शी कशप ने नेत्र खोले तो उन्होंने अपनी पत्नी दिती को अत्यंत व्याकुल और उदास
01:58अवस्था में सामने पाया।
02:00दिती ने आगे बढ़कर महर्शी के चर्णों को स्पर्श किया और अत्यंत मधूर स्वर में उनकी सेवा करने की इच्छा
02:08प्रकट की।
02:10कशप मुनी ने अपनी अर्धांगिनी के मन को टटोलते हुए पूछा की उसके इस गहन दुख का मुख्य कारण क्या
02:17है।
02:19दिती ने रोते हुए अपने मृत पुत्रों की गाथा सुनाई और कहा की मात्रित्व के इस अपमान और पीडा को
02:26सहन करना अब उसके वश में नहीं है।
02:30महर्शी कश्यप ने उसे धर्म और सृष्टी के नियमों का बोध कराते हुए शांत रहने और देवताओं से द्वेश न
02:37रखने की सलाह दी।
02:40परंतु दिती के हृदय में सुलक्ती प्रतिशोध की ज्वाला इतनी प्रचंड थी की ज्यान के ये शीतल वचन उसे शांत
02:47न कर सके।
02:49अंत्ध दिती ने कश्यप मुनी से एक ऐसा पुत्र प्रदान करने का वर्दान मांगा जो देवराज इंद्र का वध करने
02:56में समर्थ हो।
02:58दिती की इस भयानक और विनाशकारी मांग को सुनकर महर्शी कश्यप का हृदय कांप उठा और वे गहरे धर्म संकट
03:06में पड़ गए।
03:07महर्शी ने विचार किया कि वे अपनी पत्नी के अधिकार को नकार नहीं सकते, परन्तु इंद्र का वध भी स्रिष्टी
03:15के संतुलन को बिगार देगा।
03:18धर्म और स्रिष्टी के संतुलन की रक्षा है तू महर्शी कश्यप ने एक सुक्ष्म उपाय खोज निकाला, जिससे पत्नी का
03:26मान भी रह जाए और इंद्र भी सुरक्षित रहे।
03:30महर्शी ने दिती से कहा कि उसे इंद्र को पराजित करने वाला पुत्र अवश्य प्राप्थ होगा, परन्तु इसके लिए उसे
03:37एक वर्ष तक कठोर पुन्सवन वरत का पालन करना होगा।
03:42कशप मुनी ने नियम निर्धारित करते हुए सचेत किया कि इस वरत के दौरान शारिरिक और मानसिक पवित्रता का पूर्न
03:50पालन करना अनिवार्य होगा।
03:53उन्होंने सपष्ट रूप से चेतावनी दी की यदी वरत का एक भी नियम तूटा, तो वह गर्भस्थ बालक देवहनता न
04:00बनकर देवताओं का परम मित्र बन जाएगा।
04:04प्रतिशोध की तीवर ज्वाला में जल रही दिती ने बिना किसी संकोच के महर्शी की इन सभी अतिक्थिन शर्तों को
04:11तुरंट स्विकार कर लिया।
04:14ततपश्चात महर्शी कश्यप ने अपने तपोबल से दिती के गर्भ का आधान किया और वे स्वयन तपस्याहेतु एकांत वन की
04:22ओर प्रस्थान कर गए।
04:24दिती ने अपनी कुटिया में जाकर अत्यंत निष्ठ पूर्वक उस नियंबध साधना का प्रारंब किया, मानो उसका संपूर्ण अस्तित्व केवल
04:33प्रतिशोध पर टिका हो।
04:35समय के साथ दिती के गर्भ में वह प्रतापी शिशुपलने लगा, जिसकी अंतरनेहित शक्ती के तेज से तीनों लोकों का
04:43तापमान बढ़ने लगा।
04:46स्वर्गलोक में देवराज इंद्र को जब दिती के इस कठोर व्रत और उसके विनाशकारी उद्देश की सूचना मिली, तो वे
04:54सिहर उठे।
04:55इंद्र जानते थे कि यदि यह पुत्र सकुषल उत्पन्न हो गया, तो उनका सिनहासन और देवलोक का अस्तित्व सदा के
05:03लिए समाप्थ हो जाएगा।
05:06सीधे युद्ध में पराजित करने में असमर्थ होने के कारण, इंद्र ने छल और कपट के माध्यम से दिती के
05:12व्रत को भंग करने की योजना बनाई।
05:15वे एक विनमर और आज्याकारी भांजे का छद्म रूप धारन करके प्रिथवी पर दिती के आश्रम में पहुँचे और उनकी
05:23सेवा में लीन हो गए।
05:25इंद्र प्रतिदिन दिती के लिए फल, जल और पूजा की सामगरी लाते और अत्यंत तत्पर्ता से उनकी हर आज्याका पालन
05:34करते।
05:35दिन और रात केवल एक अवसर की प्रतीक्षा में रहने वाले इंद्र दिती की हर गतिविधी और नियम पालन पर
05:42पैनी द्रिष्टी बनाए हुए थे।
05:45महीनों के कठोर तप और कड़े नियमों के लगातार पालन के कारण दिती का शरीर धीरे-धीरे अत्यधिक ठक चुका
05:53था।
05:54एक संध्या अत्यंत थकावट के कारण दिती अंजाने में बिना आचमन किये और पैर धोय बिना ही अपने लंबे केश
06:02बिखेर कर सो गई।
06:04नियम के इस एक मात्र उलंगन को देखते ही इंद्र ने योगमाया से अपना आकार अत्यंत सुक्ष्म कर लिया और
06:12दिती के गर्भ में प्रवेश कर गए।
06:15इंद्र ने दिती के पेट के भीतर अपनी वजर से उस शक्तिशाली गर्भ को साथ टुक्डों में विभाजित कर दिया।
06:23जब वे साथ टुक्डे रोने लगे तो इंद्र ने कहा मारुद अर्थात मत रो और फिर प्रत्येक टुक्डे के साथ
06:30साथ भाग कर दिये।
06:32कश्यप के तपोबल के कारण वे नश्ट नहीं हुए, बलकि इंद्र के मारुद कहने से वे उननचास मरुद देव बने
06:40और इंद्र के परम सहायक बन गए।
06:43अपने पुत्रों को इंद्र का सहायक बनते देखकर देवी दिती अत्यंत व्यथित हो उठीन और उनके मन में प्रतिशोध की
06:51ज्वाला पुनह धधकने लगी।
06:54क्रोध और शोक से भरी दिती अपने पती परम ज्यानी महर्शी कश्यप के शांट आश्रम की ओर प्रस्थान करती हैं
07:01ताकि वे अपने हृदय का संताप प्रकट कर सकें।
07:05कुटिया के समीब पहुँचकर उन्होंने देखा कि महर्शी कश्यप अपने तपोबल से देधी प्यमान होकर शांत मुग्रा में बैठे इश्वरिय
07:14ध्यान में लीन थे।
07:16दिती जैसे ही कश्यप मुनी के समक्ष पहुची, उनकी आखों से अविरल आसु बहने लगे और उनका पूरा शरीर प्रतिशोध
07:25और निराशा से कामपने लगा।
07:28अपनी व्यथा को रोक न पाते हुए दिती ने अपने पती से कहा कि किस प्रकार देवराज इंद्र ने उनके
07:35गर्ब के टुक्रे टुक्रे करके उनके साथ घोर छल किया है।
07:40दिती की दुहक भरी बाते सुनकर महर्शी कश्यप ने धीरे धीरे अपनी आखें खोली और उनकी दृष्टी में केवल अगात
07:48करुणा और अनंत शांती दिखाई दे रही थी।
07:52महर्शी कश्यप ने अत्यंत मधुर और गंभीर स्वर में अपनी पत्नी को समझाना प्रारंभ किया कि संसार में सुख और
07:59दुहक केवल हमारे अपने कर्मों का ही परिणाम है।
08:04उन्होंने कहा कि प्रतिशोध की अगनी केवल दूसरों को ही नहीं, बलकि स्वय अपनी ही आत्मा को जलाकर भस्म कर
08:12देती है।
08:14कशप मुनी ने दिती को सचेत किया कि पुनह किसी विनाशकारी और क्रोधी पुत्र की कामना करना पूरे ब्रहमांड के
08:21संतुलन को बिगाड़ देगा और अनर्थ को जन्म देगा।
08:26उन्होंने अपनी पत्नी के समक्ष एक ऐसे शांत और सुन्दर संसार का चितर खीचा जहां सभी जीव वैर्भाव त्याग कर
08:34परसपर प्रेम और सद्भाव से रहते हैं।
08:38कशप जी ने दिती से आग रह किया कि वे अपनी सौत अदिती और उनके देव पुत्रों के प्रती अपने
08:45मन में छिपे इर्शा के विश्को सदैव के लिए त्याग दें।
08:49पती के मुख से धर्म और सत्य के वचनों को सुनकर दिती का हरिदय अपने मात्र सुलभमों और परम सत्य
08:56के बीच द्वंद्व में फस गया।
08:59महर्शी कश्यप ने अपने तपोबल से दिती को देवों और दानवों के बीच होने वाले अंथीन और निरर्थक युद्धों का
09:07एक भयानक द्रिश दिखाया।
09:10उन्होंने समझाया कि सच्ची विजय इंद्रियों को जीतने और मन को शांत रखने में हैं न कि किसी बाहरी शत्रों
09:17को पराज़त करने में।
09:19कशप मुनी के तपों में वचनों की शीतलता से दिती के भीतर धधक रही प्रतिशोध की अगनी धीरे-धीरे शांत
09:27होने लगी।
09:29महर्शी ने दिती को परामर्ष दिया कि वे प्रतिशोध के स्थान पर आत्मशुद्धी के लिए एक अत्यंत कठिन और पवित्र
09:36तपस्या का मार्ग चुने।
09:39उन्होंने दिती से कहा कि भगवान विश्नु की अनन्य भक्ती और समर्पन ही उनके जीवन के सारे कश्टों और कलेशों
09:47का अंत कर सकता है।
09:49कशप मुनी के ज्ञान और प्रेन से अभिभूत होकर देवी दिती ने अपना मस्तक जुका दिया और अपने अहंकार तथा
09:57प्रतिशोध की भावना का पूर्ण त्याग कर दिया।
10:01महर्शी कशप ने अत्यंत स्नेह पूर्वक दिती के सिर पर अपना वर्देहस्त रखा, जिससे उनके संपूर्ण अस्तित्व में एक दिवय
10:09शान्ती और संतोष का संचार हो गया।
10:13इस प्रकार कशप मुनी के दिवय विवेक से दिती का क्रोध समाप्थ हो गया और वह पवित्र आश्रम इश्वरिय शान्ती
10:20और दिवयता के प्रकाश से जग्म का उठा।
10:24क्रोध शान्त होने के पश्चात देवी दिती ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनमरस्वर में कशप मुनी से एक ऐसे तेजस्वी पुत्र
10:32की याचना की जो देवराज इंद्र के समान पराक्रमी और शक्तिशाली हो।
10:38उन्होंने भारी हृदय से कहा कि पुत्रों के शोक और पराजय के कष्ट को मिटाने के लिए मुनिवर की संतान
10:45के रूप में एक महान वीर का जन्म होना अति आवश्यक है।
10:50महर्शी कष्यप ने अपनी पत्नी की करुनाजनक और गंभीर वानी को सुना और उनके भीतर अपनी अरधांगिनी के लिए अपार
10:59गया एवन समवेदना का भाव जागरित हुआ।
11:02कशप मुनी ने गंभीरता से समझाते हुए कहा कि केवल प्रतिशोध की भावना से जन्मी संतान विनाश लाती है, परंतु
11:11धर्म तथा भक्ती के मार्ग से जन्मा पुत्र ही संसार में यश पाता है।
11:17दिती ने अडिग होकर उत्तर दिया कि वह प्रतिशोध की दुर्भावना को त्याग कर केवल धर्म के मार्ग पर चलने
11:24तथा कठोर से कठोर तपस्या करने को सहर्ष तयार है।
11:29अपनी पतनी के इस अटूट और निश्चल संकल्प को देख कर महर्षी कश्यप ने अंतह उन्हें एक महान पुत्र की
11:37प्राप्ती का वर्दान देने का निर्णय किया।
11:40महर्षी ने दिती को बताया कि इस दिव्यगर भधारन के लिए उन्हें पूरे एक वर्ष तक पुन्सवन नामक अत्यंत कठिन
11:48और पवित्र वरत का निश्ठा पूर्वक पालन करना होगा।
11:52उन्होंने नियम बताते हुए कहा कि इस वरत के दौरान मन, वचन और कर्म की पूर्ण पवित्रता बनाये रखनी होगी,
12:00सदा सत्य बोलना होगा और संध्याकाल में भोजन या शयन वर्जित रहेगा।
12:06मुनि कश्यप ने आगे सावधान किया कि तपस्या के दौरान केश नहीं संबारने होंगे, ना खून नहीं काटने होंगे और
12:14कभी भी अपवित्र अवस्था में पृत्वी या शया पर स्पर्ष नहीं करना होगा।
12:20उन्होंने स्पष्ट किया कि यदी यह व्रत बिना किसी त्रोटी के संपूर्ण हो गया, तो उत्पन होने वाला पुत्र इंद्र
12:27के समान अजय और देवताओं द्वारा भी अवध्य होगा।
12:32इसके साथ ही उन्होंने कठोर चेतावनी भी दी कि यदी व्रत के नियमों में तनिक भी भूल या अपवित्रता हुई,
12:39तो इस तपस्या का स्वरूप और परिणाम परिवर्तित हो सकता है।
12:45देवी दिती ने कश्यप मुनी के प्रत्येक कठिन नियम को शिरोधार्य करते हुए हाथ जोड कर अत्यंत निष्ठा और द्रिड़ता
12:52के साथ इस कठोर व्रत को स्वीकार किया।
12:56महर्शी कश्यप ने कमंडल से पवित्र गंगाजल लेकर मंत्रो चार करते हुए दिती पर छिड़का और उन्हें इस महान और
13:04दुश्कर व्रत के लिए विधिवत दीख्षित किया।
13:07पवित्र मंत्रों की ध्वनी के साथ ही दिती के स्वरूप में एक दिव्य स्वर्ण आभा समाहित हो गई, जिससे उनके
13:14उदर में श्रिष्ट तेजस्वी गर्भ का बीजारोपन हुआ।
13:19कशप मुनी ने उनकी रक्षा हेतु अभिमंत्रित कुशाधास और यग्य की पवित्र भस्म प्रदान की, ताकि कोई असुरिया विधनकारी शक्ती
13:28उनकी साधना में बाधा न डाल सके।
13:31देवी दिती ने अपने पूजय पती के चर्णों में शीश नवाकर उनके इस अपार अनुग्रह और दिव्यमार्ग दर्शन के लिए
13:39अनंत कृतग्यता व्यक्त की।
13:41इसके उपरांत देवी दिती आश्रम की अत्यंत एकांत और पवित्र कुटिया के भीतर प्रवेश कर गई, जहां उन्हें एक वर्ष
13:50की कठिन साधना पूर्ण करनी थी।
13:53उन्होंने कुटिया में अखंड दीप प्रजवलित किया और बाह्य संसार से ध्यान हटा कर पूर्णत है ईश्वरभक्ती तथा ध्यान में
14:01लीन हो गई।
14:03दिती के इस कठोर तप और निश्कलंग पवित्रता से उठी आध्यात्मिक उर्जा से संपूर्ण वन छेत्र एक दिव्य और दीप्तिमान
14:12प्रकाश से जग्मगाने लगा।
14:14वहीं दूसरी ओर स्वर्गलोक में सिनहासन पर विराजमान देवराज इंद्र को दिती के इस प्रचंड तप का भान हुआ, जिससे
14:23उनका सिहासन डोलने लगा और वे भयभीत हो उठे।
14:27देवराज इंद्र ने घबराकर अपने मंत्रियों और गुरु ब्रिहस्पती की ओर देखा, क्योंकि उन्हें भय था कि दिती का यह
14:35पुत्र उनके सिनहासन को छीन लेगा।
14:38इंद्र ने अत्यंत चिन्ताकुल होकर स्वर्ग के देवताओं से कहा कि यदि दिती का यह व्रत निर्विधन पूरा हो गया,
14:46तो उत्पन होने वाला बालक संपूर्ण देवलोग का विनाश कर देगा।
14:50अपने सिनहासन की रक्षा हेतु इंद्र ने स्वयं पृत्वी लोग पर जाकर माता दिती की दैनिक गतिविधियों और तपस्या के
14:59नियमों पर सुक्ष्म द्रिश्की रखने का निर्णे लिया।
15:02इधर वन में माता दिती सूर्य की प्रचंड किर्णों के नीचे एक पैर पर खड़ी होकर अपने शरीर को घोर
15:10कष्ट देते हुए निरंतर मंत्र जब कर रही थी।
15:14महर्शी कश्यप के कठोर निर्देशों के अनुसार दिती केवल संध्याकाल में जल की कुछ गूंदे अथवा अल्प फलाहार ग्रहें करके
15:22नियमबधता का पालन कर रही थी।
15:25वे अपने मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाये रखने के लिए प्रत्येक अनुष्ठान से पूर्व पवित्र नदी के जल
15:33से आचमन और स्नान करती थी।
15:36हफ्तों और महीनों के कठिन नियम सन्यम के कारण दिती का शरीर अत्यंत शीन हो गया, किन्तु उनके मुख मंडल
15:44का दिव्य तेज दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा था।
15:48उनके इस निशकलंग तब से उत्पन्नत अपोबल की अगनी सम्पूर्ण दिशाओं में फैलने लगी, जिससे समस्त लोक उनके अध्भुत धैर्य
15:56को देखकर चकित रह गए।
15:59आकाश मार्ग से इंद्र बादलों की ओट में छिपकर दिती के हर एक चरण और नियम पर पैनी नजर रखे
16:06हुए थे, ताकि वे किसी चूप की प्रतीक्षा कर सकें।
16:11परंतु कई दिन बीट जाने पर भी इंद्र को दिती के नियम पालन में रत्ती भर भी तुटी या असोच
16:17दिखाई नहीं दिया, जिससे उनकी हताशा और बढ़ गई।
16:22देवराज समझ गए कि तपोबल से रक्षा कवच में बंधी दिती को प्रत्यक्ष युद्ध या बलप्रयोग से पराजित कर पाना
16:29सर्वथा असंभव है।
16:32अंता छल का मार्ग चुनते हुए इंद्र ने एक कप्टी योजना बनाई कि वे सेवा भाव का ढोंग करके दिती
16:39के समीप जाएंगे और उचित अफसर की प्रतीक्षा करेंगे।
16:44इंद्र ने एक अत्यंत विनम्र और सेवा भावी नव्युवक तपस्वी का रूप धारण किया और अपने हाथों में कुशा तथा
16:52जल का पात्र थाम लिया।
16:54अपनी दिव्य शक्तियों को छिपा कर कप्टी रूप में इंद्र अत्यंत धीमे और शांत कद्मों से दिती की पावन कुटिया
17:02की ओर बढ़े।
17:04प्रातकालीन जब समाप्त करने के पश्चात जब दिती ने आखे खोली तो उन्होंने अपने सामने एक विनीत बालक को भक्तिभाव
17:12से हाथ जोड़े खड़े देखा।
17:15छद्मवेशी इंद्र ने दिती के चर्णों में प्रणाम करते हुए कहा कि वे उनकी नहस्वार्थ सेवा करके उनके कठिन नियम्वरत
17:23को पूर्ण कराने में सहायता करना चाहते हैं।
17:27दिती के मन में उस बालक के प्रतिवात सल्य और विश्वास जागरित हो उठा और उन्होंने उसे पूजा सामगरी तथा
17:35जल लाने की अनुमती दे दी।
17:38इंद्र बड़ी कुशलता से दिती की हर छोटी मोटी सेवा करने लगे ताकि वे दिती का पूर्ण विश्वास जीत सकें
17:46और नियम तूटने के एक क्षण का लाब उठा सकें।
17:50दिनरात निश्ठावान सेवक का अभिनय करते हुए भी इंद्र की गिद्ध द्रिष्टी केवल इसी बात पर टिकी थी कि कब
17:57दिती से कोई छोटी सी भी नियम भूल हो।
18:01छल से अनभिज्य दिती अपने कठोर तप में लीन रही, जबकि कप्टी इंद्र उनके आसपास साय की तरह मंदराते हुए
18:09सही अफसर की ताक में टिके रहे।
18:12दिती के गर्ब से छनकर आती हुई तीवर ज्वालामी कांती को देखकर इंद्र का हृदय काप उठा, क्योंकि वे भली
18:19भानती समझ चुके थे कि इस बालक का तेज उनके सिनहासन को भस्म करने के लिए परियाप्ट था।
18:27दिती के शरीर से उठसर्जित होती तपोगनी इतनी भयंकर थी कि उनके समीट खड़े देवराज इंद्र को भी अपनी आसुरी
18:35शक्ती के पराभव का स्पष्ट अनुमान होने लगा था।
18:39इंद्र के मन में भय का एक ऐसा भयावह द्रिश उत्पन हुआ जहां एक अजे दानव पुत्र उत्पन होकर स्वर्गलोग
18:47का विनाश कर देवताओं को दास बना रहा था।
18:51अपनी वास्तविक घबराहट को छिपाते हुए इंद्र ने अत्यंत विनमर्ता से स्वर्ण कलश उठा कर दिती के प्रातहकाल स्नान के
18:59लिए पवित्र जल का प्रबंध किया।
19:02जैसे जैसे दिती का गर्भ परिपक्व हो रहा था। उसमें संचित होती दिव्य और विनाशकारी शक्ती स्वर्ग के अस्तित्व पर
19:10सीधा आधात प्रतीत हो रही थी।
19:13कुटीर के प्रांगण में निश्ठावान सेवक का नाटक करते हुए इंद्र मन ही मन गर्भस्ट शिशु के सामर्थ्य और उसकी
19:21संभावित मृत्यु के योग का आकलन कर रहे थे।
19:25देवराज भली भानती जानते थे कि इस आने वाले संकट को केवल शस्त्रों से नहीं, बलकि अत्यंत सुक्ष्म और कूटनीतिक
19:33चाल से ही रोका जा सकता था।
19:36इंद्र ने मीठे वनों के ताजे फल एक नकाशिदार थाल में सजाकर दिती को अर्पित किये, किन्तु उनकी द्रिष्टी केवल
19:44दिती की ठकान और असावधानी पर टिकी रही।
19:48छल प्रपंच से सर्वथा अनभिग्य दिती ने पुत्र प्राप्ती के आनंद में इंद्र की सेवा को सहर्ष स्विकार किया और
19:56अपने कठोर नियमों का पालन करती रही।
20:00रात्री के सन्नाटे में जब संपूर्ण वन विश्राम कर रहा था, तब भयभीट इंद्र कुटीर के द्वार पर पहरा देते
20:07हुए दिती की हर सास पर ध्यान लगाए बैठे थे।
20:11चंद्रमा और नक्षत्रों की अनुकूल स्थिती को देख कर इंद्र का भय और बढ़ गया, क्योंकि संपूर्ण ब्रहमाण उस होने
20:19वाले शिशु का पक्ष लेता दिख रहा था।
20:23दिनराथ सेवक का धर्म निभाते हुए इंद्र दिती के चर्णों को सहला रहे थे, ताकि उनकी भक्ती पर लेशमात्र भी
20:30संदेह न हो सके।
20:32दिती के पुन्सवन वरत की शक्ती से पाताल लोग तक में कमपन होने लगा था, जिससे इंद्र को विश्वास हो
20:39गया कि यह शिशु साधारन देवों के वश्का नहीं होगा।
20:44इंद्र ने अपने मन में पुन्सवन वरत के सभी कड़े नियमों को याद किया और केवल उसी पल का प्रतीक्षा
20:51करने लगे जब दिती से कोई छोटी सी अशुद्धी हो जाएं।
20:55महीनों का कठोर समय बीटता गया और जैसे जैसे वरत की पूनता निकट आ रही थी। देवराज इंद्र का धैर्य
21:03अंतिम सीमा तक पहुँच शुका था।
21:06संध्या समय जब दिती कड़े नियमों के साथ अपनी नित्य संध्यावंदन कर रही थी। तब इंद्र उनकी एक-एक मुद्रा
21:14और गती को ध्यान से परक रहे थे।
21:17इंद्र ने निश्चय कर लिया था कि वे पलक तक नहीं जपकाएंगे क्योंकि एक क्षण का आलस्य भी उनके सिनहासन
21:25की बली दे सकता था।
21:27गर्भस्थ शिशु का तेज दिती के पूरे शरीर से फूट कर चारों और फैल रहा था, जिससे कुटीर का प्रत्येक
21:35कोना दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठा।
21:38इंद्र को भली भांती ग्यात था कि यदि यह व्रक बिना किसी भूल के पूल्न हो गया, तो त्रिभुवन में
21:45कोई भी इस होने वाले दानव को परास्ट नहीं कर पाएगा।
21:49दिती की तीवर तपस्या के प्रभाव से पसीने से लथपत इंद्र अत्यंत व्याकुल होकर उस एक मात्रक्षन का इंतजार करने
21:57लगे जो इतिहास बदल सकता था।
22:01देवराज इंद्र ने अपने दिव्य रूप और वजर को त्याग कर एक अत्यंत सीधे सादे, विनीत और निश्कपट तपस्वी सेवक
22:09का छद्म रूप धारन कर लिया ताकि वे दिती के निकट जा सकें।
22:14मन में छिपे कुटिल इरादों को दबाए हुए, छद्मवेशी इंद्र अत्यंत मंद गती से चलते हुए दिती की कुटिया के
22:22द्वार पर पहुँचे, जहां चारों और तपोबल की तीवर उश्मा व्याप्त थी।
22:27दिती के सम्मुख पहुँचकर, इंद्र ने अपने कप्ती सिर को उनके चर्णों में जुका दिया और अत्यंत मधुर तथा विनीत
22:35स्वर में उनसे अपनी सेवा स्विकार करने की प्रार्थना की।
22:40गर्भीनी दिती ने उस सेवक के कपट को न पहचानते हुए उसे अपने आश्रम का सहायक नियुक्त कर लिया, जिससे
22:47इंद्र को उनकी दिंचर्या की प्रत्येक सुक्ष्म क्रिया पर ग्रिष्टी रखने का अफसर मिल गया।
22:54अपने गुप्त उद्देश को सिध्ध करने के लिए इंद्र बिना थकेवन से सूखी समिधाय चुनकर लाने और कुटिया की सफाई
23:02करने जैसे कठिन कारियों में लीन रहने लगे।
23:06वे प्रतिदिन भोर के शांत वातावर्ण में पवित्र नदी से शीतल जल के घड़े भर कर लाते थे, ताकि दिती
23:13के यग्य और शुद्धी अनुष्ठानों में लेशमात्र भी विलंब न हो।
23:18पवित्र कुटिया के भीतर दिती अपने कठोर नियम के अनुसार निरंतर गायतरी मंत्र का जाप और ध्यान कर रही थी,
23:25जिससे उनके शरीर की दीपती और अधिक प्रखर होती जा रही थी।
23:31कुटिया के द्वार पर बैठा इंद्र बिल्ली की भाती अत्यंत सतर्क होकर दिती की प्रत्येक सास और गती पर ध्यान
23:38दे रहा था, ताकि वह उनकी तपस्या में एक छोटी सी तुटी का लाब उठा सके।
23:45इंद्र ने अत्यंत सुक्षमता से पवित्र कुशा घास के आसनों और यग्य की सामगरियों को इस प्रकार व्यवस्थित किया ताकि
23:52दिती को सेवा में कोई कमी न दिखे और उनका विश्वास बना रहे।
23:58मध्याहन के समय जब दिती कडी धूप में मंत्रो चार कर रही थी, तब इंद्र हाथ में ताड का पंखा
24:04लेकर उन्हें हवा करने लगे, जिससे उनकी सेवा की पराकाश्था सिध्ध हो सके।
24:11जैसे जैसे दिन बीटते गए, दिती की तपस्या और निराहार रहने के कारण उनके शरीर में थकान के लक्षन दिखाई
24:19देने लगे, जिससे इंद्र के मन में आशा की एक नई किरण जगी।
24:36संध्याकाल की लालिमा जब आकाश में फैलने लगी, तब दिती अपनी संध्यावंदना के लिए उठीन और उनके डगमगाते कदमों पर
24:44इंद्र की गिध जैसी द्रिष्टी टिकी रही।
24:48व्रत के नियमों की कठोर्ता इतनी अधिक थी कि एक भी भूल दिती के गर्भ में पल रहे उस होने
24:55वाले महाबलशाली शिशु के तेज को नश्ट कर सकती थी।
24:59इंद्र जानते थे कि दिती का मन और शरीर अब उपवास के अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहे हैं और
25:06यही वह समय है जब असावधानी की पूरी संभावना थी।
25:12दिती ने अपनी संध्या पूजा पूर्ण की और अत्यंत शिथिलता के कारण उनके लिए अपने शरीर को संभालना अत्यंत कठिन
25:20प्रतीत हो रहा था।
25:22थकान के अतिरेक में दिती बिना हाथ पेर धोये और बिना आचमन किये ही सीधे अपने बिछोने पर लेट गई
25:30जो की शुद्धी के नियमों का घोर उलंधन था।
25:34कुटिया के कोने में छिपे इंद्र ने जैसे ही दिती की इस महाभूल को देखा उनकी आखों में एक भयावः
25:41और विजी चमक कौन्ध गई।
25:44व्रत भंग होने के उसक्षन का लाब उठा कर इंद्र ने तुरंत योगमाया के बल से स्वयंको अत्यंत सुक्ष्म रूप
25:51में परिवर्तित कर लिया ताकि वे दिती के शरीर में प्रवेश कर सकें।
25:57बिना किसी बाधा के वह सुक्ष्म रूप धारी इंद्र सोती हुई दिती के मुख के मार्ग से उनके गर्भ में
26:03प्रविष्ठ हो गए जहां उनका सामना उस तेजस्वी शिशु से होने वाला था।
26:09सुक्ष्म रूप में गर्भ में प्रविष्ठ हुए इंद्र का सामना भीतर पर रहे उस तेजस्वी अप्रिमे शक्ती वाले शिशु से
26:17हुआ जो दिती की कठोर तपस्या का चरम प्रतिफल था।
26:20उस शिशु के अध्भुत तेज और भविष्य की दानवी शक्ती को भापकर स्वयन देवराज इंद्र का हृदय एक पल के
26:29लिए आशंका से भर गया क्योंकि यह बालक तीनों लोकों के लिए एक गंभीर खत्रा बन सकता था।
26:36अपने भविष्य के शत्रु के इस अप्रतिम बल को देख कर इंद्र ने त्वरित निर्नय लिया और अपनी मायावी शक्ती
26:44से एक अत्यंत सुक्ष्म वजर को प्रकट किया, जो उस गर्भ के भी तर भी अपना कार्य करने में सक्षम
26:50था।
26:52एक निर्नायक पल में इंद्र ने उस सुक्ष्म वजर को तीवरता से तेजस्वी शिशु की और प्रक्षेपित किया, जिसका उद्देश
27:00उस अविनाशी गर्भ को साथ टुक्डों में विभक्त करना था।
27:05वजर के प्रहार से शिशु का तेजस्वी शरीर साथ भागों में तूट गया, और प्रत्येक भाग से एक तीवर रुदन
27:12की ध्वनी गूंज उठी, जो गर्भ के भीतर एक मर्मसपर्शी पीडा का संकेत था।
27:18इंद्र का हृदय अभी भी भाय से मुक्त नहीं हुआ था, क्योंकि प्रत्येक खंड से भी वही अप्रतिम उर्जा फूट
27:25रही थी, और उसने सोचा कि यदि ये भी बढ़ गये, तो विपत्ती और बड़ी होगी।
27:32आथक क्रूरता के वशीभूत होकर, इंद्र ने प्रत्येक साथ टुकडे को फिर से साथ साथ भागों में काट दिया, जिससे
27:40कुल उन्चास सुक्ष्म खंड हो गए और गर्भ में रुदन की ध्वनी और तीवर हो उठी।
27:46प्रत्येक खंड से निकलती चीखें और दिती के भीतर की असहस्ता स्वर्गलोग तक पहुँचने लगी, जिससे स्वयं ब्रहमाजी का दिव्या
27:55आसन भी विचलित हो उठा।
27:57ब्रहमाजी ने तुरंट अपनी दिव्यद्रिष्टी से दिती के गर्भ में हो रही इस क्रूर घटना को देखा और इंद्र के
28:04अनैतिक कृत्य पर क्रोधित होते हुए, उन्हें ततकाल रुकने का आदेश दिया।
28:10ब्रहमा की वानी, जो साक्षात ब्रहमनाद थी, गर्भ के भीतर तक गूंज उठी और इंद्र को क्षन भर के लिए
28:17अपने क्रूर हाथों को रोकने पर विवश कर दिया। उनके मन में एक सुक्ष्म भय उत्पन हो गया।
28:24इंद्र ने ब्रहमाजी के आदेश का सम्मान करते हुए अपने सहारक कार्य को रोक दिया, परन्तु अब उसके मन में
28:32इन खंडित आत्माओं के भविश्य को लेकर एक नई योजना बन रही थी।
28:37यह सोचकर की ये शिशु देवश्त्रु न बने। इंद्र ने उन रुदन करते हुए खंडों को सम्मबोधित किया और उन्हें
28:45मरुद कहकर शांत करने का प्रयास किया, जिसका अर्थ था मत रो।
28:51इंद्र के मारुद कहने के पश्चात उन्चास शिशु धीरे धीरे शांत होने लगे, उनकी पीडा कम होने लगी और वे
28:58इंद्र की इस वाणी के जादू से प्रभावित होने लगे।
29:02तब इंद्र ने उन्हें अपनी छत्रचाया में लेने का निर्णय लिया और वर्दान दिया कि वे सब उनके ही समान
29:10बल्वान और तेजस्वी मरुत कहलाएंगे और उनके सहचर बनकर स्वर्ग में रहेंगे
29:16इस दिव्यवर्दान के प्रभाव से उन्चास खंडित शिशु तुरंत सुन्दर और तेजस्वी देवताओं के रूप में परिवर्तित होने लगे प्रत्येक
29:25एक छोटा शक्तिशाली वायु देव बनने की ओर अग्रसर था
29:30इधर कुटिया में सोई हुई दिती को एक अद्भुत अनुभव हुआ उसने अपने गर्भ में एक की बजाय उन्चास नवजीवन
29:38की स्पंदन महसूस की जिससे उसका हृदय आश्चर्य और विस्मय से भर गया
29:44धीरे धीरे जागरित होते ही दिती ने स्पष्ट रूप से अपने गर्भ में एक अद्भुत सामुहिक स्पंदन को पहचाना जैसे
29:52असंख्य हवाई भीतर एक साथ खेल रही हो यह सामान्य गर्भावस्था से बहुत भिन्न था
30:00यद्यपी उसे इस चमतकार का मूल कारण ग्यात नहीं था फिर भी एक मातरित्व की सहज भावना से उसने उन
30:07सभी जीवों को स्विकार किया और उनके आगमन की प्रतीक्षा में निश्चिन्थ हो गई
30:13नियम समय पर दिती ने उन्चास तेजस्वी और बल्वान शिशुओं को जन्म दिया जो वायू के समान चंचल और बिजली
30:21के समान तीवर थे और सामुहिक रूप से मरुत कहलाए
30:26इन नवजात मरुतों को देख कर इंद्र ने अपनी दिव्य पहचान प्रकट की और उन्हें अपना अनुज मान कर अपने
30:34लोक में सम्मानित स्थान प्रदान करने का प्रस्ताव रखा
30:38इंद्र ने अत्यंत संकोच और विनीत भाव से दिती के समक्ष अपनी उस गुप्त योजना का रहस्य खोला, जिसके तहट
30:46उन्होंने दिती के गर्भ में प्रवेश किया था
30:50उन्होंने बताया कि कैसे दिती की अप्वित्र अवस्था में सोने की चूप का लाब उठाकर उन्होंने सुक्ष्म रूप धारण किया
30:58और गर्भस्थ शिशु पर अपने वजर से प्रहार किया
31:02इंद्र ने स्पष्ट किया कि जब वे गर्भस्थ शिशु रोने लगे तब उन्होंने स्नेहपूर्वक मारुद अर्थात रो मत कहकर उन्हें
31:10शांत किया जिससे उनका नाम मरुत पड़ा
31:14दिती अपने पुत्रों के इस अध्भुत जन्म की गाथा सुनकर स्तब्ध रह गई जहां भय और वात्सल्य के मिलेजुले भाव
31:22उनके मुख पर झलक रहे थे
31:24यह समझते हुए कि उनकी अपनी ही भूल के कारण उनके विनाशकारी संकल्प का अंत हुआ, दिती के मन का
31:32सारा क्रोध और प्रतिशोध शांत हो गया
31:35सभी उन्चास मरुत बालक अपनी माता के चर्णों में लिपट गए और अपनी मंद बयार जैसी कोमल चुवन से उनके
31:43मातरित्व को त्रिप्ट करने लगे
31:46देवराज इंद्र ने अत्यंत पश्चाताप के साथ जुपकर अपना मुकुट दिती के चर्णों में रख दिया और अपने इस छल
31:54के लिए उनसे क्षमा याचना की
31:57दिती ने अपने विशाल हृदय का परिचय देते हुए इंद्र को क्षमा किया और स्विकार किया कि स्रिष्टी के कल्यान
32:04के लिए ही विधाता ने यह लीला रची थी
32:08शमा प्राप्त करने के बाद इंद्र ने अपने उन्चास नए भाईयों को स्वर्ग लोग चलने के लिए एक विशाल और
32:15भव्य स्वर्ण रथ पर आमंत्रित किया
32:19उन्चास मरुतों ने अपनी माता दिती के चर्णों में शीश नवाया और दिव्य प्रकाश पुंज में परिवर्तित होकर रथ की
32:26ओर प्रस्थान किया
32:28हजारों श्वेत अश्वों से खिंचता हुआ वह दिव्य रथ बादलों को चीरता हुआ अमरावती की ओर अत्यंत तीवर गती से
32:36उर्चला
32:38देवराज इंद्र की नगरी अमरावती की सुधर्मा सभा में सभी देवताओं और गंधर्वों का समूह इन नए वायुदेवताओं के स्वागत
32:46के लिए एकत्रित हुआ
32:49इंद्र ने मरुत भाईयों का हाथ पकड़ कर उन्हें सभा के मध्य मेला कर खड़ा किया, जहां उनकी बिजली जैसी
32:56चमक से पूरी सभा आलोकित हो उठी
33:00देवर्शी नारद ने अपनी वीना की मधूर्तान छेड़ कर इस अभूत पूर्व संधी और मरुतों के दिव्य जन्म की महिमा
33:07का गान आरंभ किया
33:09उसी समय स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा एक परम पावन स्वर्ण जोती के गोले के भीतर से वहां प्रकट हुए
33:18ब्रहमा जी ने मरुतों को ब्रहमांड की प्राणवायू और इंद्र के स्थाई सहायक देवताओं के रूप में प्रतिष्थित करने का
33:25वर्दान दिया
33:26दिव्य पुरोहितों ने सोने के कल्षों से पवित्र गंगाजल लेकर उन्चास मरुतों का भव्य राज्याभिशेक संपन्न किया
33:36धर्ती पर अपने आश्रम से महर्शी कश्यप ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से इस मिलन को देखा और अपनी संतानों के
33:43बीच शत्रुता के समाप्थ होने पर संतोश व्यक्त किया
33:47इधर दिती भी अपने आश्रम में प्रतिशोध की भावना से पूर्णता मुक्ठ होकर एक शांत और दिव्य तपस्या में लीन
33:55हो गई
33:57इस प्रकार देवों के शत्रु बनने के लिए जन्मे मरुत अपनी माता के आशिरवाद और इंद्र के प्रेम से स्वर्ग
34:04के अमर रक्षक बन गए
34:06जब दिती की निद्रा खुली तो उसे अपने गर्भ में एक विचित्र हल्चल और असहनिय वेदना का आभास हुआ
34:15अपने सामने वजर हाथ में लिए खड़े इंद्र को देखकर दिती का हरिदय अत्यंत गहरे आघात और विस्मय से भर
34:22गया
34:24अपने शरीर से फूटते हुए दिव्य प्रकाश के उन्चास तुकडो को देखकर दिती स्तब्ध रह गई और उसकी आखों में
34:31आसुआ गई
34:33अपने अजन में शिशु के साथ हुए इस क्रूर कृत्य पर दिती का शोक तुरंथ ही धधकते हुए प्रचंड क्रोध
34:40में बदल गया
34:42दिती के भयंकर क्रोध को भामपकर देवराज इंद्र ने तुरंथ अपना वजरत्याग दिया और उनके चर्णों में गिरकर क्षमा याचना
34:50करने लगे
34:52कापते हुए स्वर में इंद्र ने स्विकार किया कि स्वर्ग के सिनहासन को खोने के भय से ही उन्होंने कपटपूर्वक
34:59गर्भ में प्रवेश किया था
35:02तभी भूमी पर बिखरे हुए प्रकाश के उन्चासकन दिव्य बालकों के रूप में परिवर्तित होकर मधुर्स्वर में रुदन करने लगे
35:11उन दिव्य और सुन्दर बालकों को देखकर दिती का कोमल मात्रहृदय उमर पड़ा और उनके प्रती उसका सारा क्रोध शान्त
35:19हो गया
35:19इंदर ने विनमरता पूर्वक समझाया कि ये बालक दैत्य नहीं बलकी मरुत नामक दिव्य वायु देवता बनकर आकाश पर शासन
35:29करेंगे
35:31इंदर ने वचन दिया कि ये उन्चास मरुत देवराज के परम सखा बनेंगे और यग्यों में सोमरस के समान अधिकारी
35:39होंगे
35:40इंदर के वचनों को सुनकर दिती के मन का प्रतिशोध पूर्णता विलीन हो गया और उसे इश्वर की परम इच्छा
35:47का भान हुआ
35:49देखते ही देखते वे उन्चास शिशु तेजस्वी और बल्वान तरोन योध्धाओं के रूप में विक्सित होकर आकाश में तैरने लगे
35:57उसी क्षण तपोवन में महर्शी कश्यप का आगमन हुआ जिनकी दिव्य आभासे संपूर्ण वातावर्ण शांत और पवित्रहो उठा
36:08महर्शी कश्यप ने दिती को समझाया कि यह सब भगवान विश्णु की ही माया थी जिसने एक विनाशकारी शत्रु को
36:16स्वर्ग का रक्षक बना दिया
36:17वे उन्चास मरुत देवगन वायू की भानती गतिमान होकर अपनी माता दिती और पिता कश्यप के चर्णों में श्रधा पूर्वक
36:27नत्मस्तक हुए
36:29इंद्र ने आगे बढ़कर मरुतों के सेनाप्ती को प्रेम पूर्वक गले लगाया और उन्हें स्वर्ग की रक्षा का दायत्व सौंक
36:37दिया
36:38अपने पुत्रों को इंद्र के साथ मैत्री पूर्ण भाव में देखकर दिती के हृदय का सारा पुराना संताप सदा के
36:45लिए समाप्त हो गया
36:48स्वर्ग से देवताओं ने इस अध्भुत मिलन पर मरुतों का स्वागत करते हुए दिव्यकर्प्वरिक्ष के फूलों की वर्षा की
36:56इंद्र की आग्या पाकर मरुत देवगन प्रांदायनी शीतल वायू और मेगों को संचालित करने के लिए गगनमार्ग में विलीन हो
37:04गए
37:05दिती एक बार फिर अपने तपोवन में बैठ गई उनका मन अब शांत प्रतिशोध से मुक्त और परम चेतना में
37:13लीन था
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