द्वारका में अद्भुत लीलाओं के बाद, भगवान श्रीकृष्ण एक दिव्य यात्रा पर निकलते हैं। इस एपिसोड में हम देखेंगे कि कैसे कृष्ण राजर्षि जनक के भव्य महल में सम्मान पाते हैं, और कैसे एक गरीब परमसक्त भक्त श्रुतदेव की कुटिया में प्रेम से पधारते हैं। यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति धन या पद की मोहताज नहीं होती, बल्कि हृदय की पवित्रता से पनपती है। राजर्षि जनक के साथ कृष्ण के गहन दार्शनिक संवाद और श्रुतदेव के अटूट प्रेम की यह गाथा आपके मन को मंत्रमुग्ध कर देगी! #KrishnaLeela #BhagavataPurana #KingJanaka #ShrutaDeva #Bhakti #HinduMythology #DivineJourney #KrishnaStories #SpiritualLesson
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00:00अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप का दर्शन होने और मृत पुत्रों की वापसी के पश्चात द्वारकापुरी में
00:07एक अभूत पूर्व दिव्य शान्ती और हर्शोलास का संचार हो गया।
00:12प्रभात की बेला में द्वारकानाथ भगवान श्री कृष्ण अपने अलौकिक राजप्रासाद के सुसजित कक्ष में शया से उठकर संसार के
00:21कल्यान का ध्यान करते हैं।
00:24देवी रुकमिनी अत्यंत भक्तिभाव से स्वर्ण की आरती सजाकर साक्षात पूर्ण पुरुशोत्तम श्री कृष्ण की मंगल आरती उतारती हैं।
00:35सर्वेश्वर श्री कृष्ण सामान्य ग्रिहस्थ धर्म का पालन करते हुए पवित्र नदियों के जलसे स्नान और संध्यावंदन की नित्य लीला
00:43संपन्न करते हैं।
00:46ततपश्चात भगवान श्री कृष्ण वेदपाथी ब्राहमनों को वस्त्र और सुवर्ण से अलंकृत हजारो दुधारु गायों का निश्काम दान अर्पित करते
00:55हैं।
00:57वही निकट ही बैठे वीर अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के हाल ही में देखे गए अलोकिक विराट स्वरूप को स्मरण
01:04कर श्रद्धा और विस्मय से विभोर हो रहे थे।
01:08जानी उद्धवात जोडे नमरता पूर्वक श्री कृष्ण के निकट आते हैं और उनके चरण कमलों में मस्तक जुका कर अपनी
01:16भक्ती भावना व्यक्त करते हैं।
01:19ततपश्चात भगवान श्री कृष्ण द्वार्का की भव्य सुधर्मा सभा में पधारते हैं, जहां राजा उग्रसेन और पिता वसुदेव सहित समस्त
01:28यादव सभासद विराजमान थे।
01:31भगवान बल्राम अपनी विशाल और ओजस्वी कांती के साथ सुधर्मा सभा में प्रवेश करते हैं, जिससे पूरी सभा की शोभा
01:39द्विगुनित हो जाती हैं।
01:42द्वारका के नागरिक, गायक और विद्वान राजप्रासाद के बाहर एकत्र होकर जगतगुरु श्रीकृष्ण के पावन यश्का मधूर गान कर रहे
01:51थे।
01:51इसी बीच देवर्शी नारद अपनी महती वीना की मधूर जंकार पर हरिगुन गान करते हुए आकाश मार्क से द्वारका की
02:00ओर उतरते हैं।
02:03सुधर्मा सभा में प्रवेशकर देवर्शी नारद ने भगवान श्रीकृष्ण के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया और उनकी अलोकिक महिमा का
02:12बखान किया।
02:14देवर्शी नारद ने सभा में बताया कि मिथिला पुरी में दो परम अनन्य भक्त निवास करते हैं जो निरंतर श्रीकृष्ण
02:21के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
02:25नारद जी ने पहले भक्त मिथिला के धर्मनिष्ठ राजा बहुलाश्व का वर्णन किया, जो राजसी सुख्वैभव के बीच भी सदैफ
02:33प्रभु के ध्यान में मगन रहते हैं।
02:37ततपश्चात उन्होंने दूसरे भक्त अत्यंत दरिद्र किंतु परम ज्यानी ब्राहमन श्रुपदेव की निशकाम भक्ती का गुनगान किया, जो तूटी जोपडी
02:46में रहकर भी आननदित थे।
02:49नारत जी ने स्पष्ट किया कि राजा बहुलाश्व का राजमहल हो या श्रुपदेव की तूटी जोपडी दोनों का प्रेम भग्वान
02:56के प्रती समान रूप से अगाध और निश्चल है।
03:01अपने भक्तों की निश्काम भक्ती गाथा सुनकर भगवान श्री कृष्ण के मुखारविन पर मंद मुस्कान आई और उन्होंने स्वयन मिथिला
03:09जाने का संकल्प लिया।
03:12भग्वान की आग्या पाते ही सार्थी दारुक चार अलोकिक घोरों से जुते हुए विशाल और दिव्यरत को द्वारका के द्वार
03:20पर ले आया।
03:21महर्शी वेदव्यास, वामदेव और मैत्रे सहित अनेक महान रिशिमुनी भी भगवान श्री कृष्ण की इस पावन यात्रा में सहभागी बनने
03:30हेतु एकत्र हो गए।
03:32द्वारकावासी अश्रुपूरित नेत्रों से अपने प्रानप्रिय प्रभु को विदाई दे रहे थे और इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की मिथिला
03:41की ओर एतिहासिक अलोकिक यात्रा का आरंभ हुआ।
03:45भगवान श्री कृष्ण का दिव्यरत आकाश में स्वर्ण पत बनाता हुआ। द्वारका के भव्य द्वारों से निकल कर मिथिला की
03:53ओर अग्रसर हुआ। जहां उनके अनन्य भक्त राजर्शी जनक उनकी प्रतीक्षा में थे।
03:59रत में भगवान कृष्ण के साथ महर्शी वेदव्यास, वामदेव और मैत्रे जैसे महान रिशिगन भी विराजमान थे, जिनकी उपस्थिती से
04:09यात्रा की दिव्यता और भी बढ़ गई थी।
04:13दिव्यरत ने अथाह वेग से अनेक वनों, परवत श्रिंख लाओं और कलकल करती नदियों को पार किया, जहां प्रकृती भी
04:20अपने प्रभु के आगमन पर पुलकित प्रतीत हो रही थी।
04:25जैसे ही भगवान श्री कृष्ण की यात्रा की खबर आसपास के राज्यों में पहुँची, चारों दिशाओं से उनके दर्शनों की
04:33अभिलाशा लिए भक्तगण मार्ग पर एकत्रित होने लगे।
04:37उधर विदेह राज्य की राजधानी मिथिला नगरी अपनी कला, ज्यान और आध्यात मिक्ता के लिए विख्यात थी, जहां प्रत्येक नागरिक
04:46धर्म और नैतिक्ता के मार्ग पर चलता था।
04:50इस पुन्य भूमी पर राजर्शी जनक राज करते थे, जो राजसी एश्वर्य के मध्य भी एक सच्चे वैरागी और परम
04:58ज्यानी थे, जिनकी ख्याती दूर-दूर तक फैली हुई थी।
05:19ने आकर भगवान श्री कृष्ण के मिथिला आगमन का शुब समाचार सुनाया। यह सुनकर जनत जी का हरिदय आनन्द से
05:28भर गया और उन्होंने तुरंत पूरी नगरी को कृष्ण के भव्य स्वागत के लिए तैयार करने का आदेश दिया।
05:35राजर्शी जनक के आदेश आनुसार मिथिला के हर घर और हर गली में उत्सव का वातावर्ण छा गया और नागरिगण
05:43प्रभु के स्वागत की तैयारियों में जुट गए।
05:46नगर के मुख्य मारगों पर तोरं द्वार बनाए गए, रंग बिरंगे फूल बिचाए गए और सुगंधित धूप से वातावर्ण महकने
05:55लगा।
05:56उधर भगवान श्री कृष्ण का रत अब मिथिला की सीमा के समीग पहुँच रहा था, जिसकी दिव्य आभा से पूरा
06:04वातावर्ण आलोकित हो रहा था।
06:06राजा जनक अपने मंत्रियों, पुरोहितों और प्रजा के साथ अपने प्रभू के स्वागत के लिए एक विशाल शोभायात्रा के रूप
06:15में नगर से बाहर निकले।
06:17इस भव्य शोभायात्रा में राजसी हाथी, सुसजित घोडे और हजारों भक्तगन धोलन गाडों की ध्वनी के साथ आगे बढ़ रहे
06:26थे, जिनका एक मात्र उद्देश प्रभू के दर्शन प्राप्त करना था।
06:31दूर क्षितिच पर जब राजा जनक ने भगवान श्री कृष्ण के दिव्य रत की जलक देखी, तो उनके नेत्रों से
06:39अश्रुधारा बहन निकली और वे भाव विभोर हो गए।
06:43ततकाल राजा जनक अपने हाथी से उतर कर नंगे पैर ही उस दिशा में डौडने लगे, जहां से उनके प्राणप्रिय
06:50प्रभू का आगमन हो रहा था।
06:53जैसे ही रत समीप आया, राजा जनक ने भक्तिभाव से हाथ जोड कर परम्पिता परमात्मा के समक्ष साष्टान प्रणाम किया,
07:02अपनी समस्त राजसी मर्यादा भूल कर।
07:06भगवान श्री कृष्ण ने प्रेम से मुस्कुराते हुए अपने भक्त को उठाया और दोनों महान आत्माओं का मिलन हुआ, जो
07:13युगों-युगों तक स्मर्णिय रहेगा।
07:16राजर्शी जनक ने प्रभू श्री कृष्ण का सप्रेम स्वागत करते हुए उन्हें अपने महल में पधारने का विनमर निमंत्रन दिया,
07:24जहां मिथिलावासी उनके दर्शनों के लिए आतुर थे।
07:29भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्त की श्रधा स्विकार की और जनक के साथ, रिशियों और द्वारकावासीों के साथ मिथिला
07:37नगरी की ओर प्रस्थान किया, जहां हर ओर मंगल ध्वनी गूंज रही थी।
07:42यात्रा के प्रथम चरण में भगवान श्री कृष्ण का दिव्यरत सघन वनों और हरीभी वादियों से होकर गुजर रहा था,
07:51जहां प्रकृती भी अपने रंगों से उनका स्वागत कर रही थी।
07:55मिथिला नगरी में हर गली और चौराहे को उत्सव के रंग से सजाया गया था, जहां मिथिला वासी अपने प्रिय
08:03भगवान के आगमन की आतुर्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे।
08:08जैसे जैसे यात्रा आगे बढ़ती गई, दिव्य सुगंध और मंगल ध्वनिया पत पर फैलती गई, जो हर हृदय को भक्ती
08:16और उल्लास से भर रही थी।
08:19अचानक शितिच पर, श्री कृष्ण का रत एक स्वर्णिम प्रकाश के साथ प्रकट हुआ, जिसने मिथिला के निवासियों के दिलों
08:26में एक अवर्णनिय आनंद भर दिया।
08:30मिथिला के भव्यद्वार, जो पुष्पों और अलंकर्णों से सजे थे, भगवान श्री कृष्ण के आगमन की महिमा को दर्शा रहे
08:38थे।
08:39भगवान श्री कृष्ण ने जैसे ही मिथिला नगरी में प्रवेश किया, जैजैकार और भक्ती गीतों की ध्वनी से आकाश गूंज
08:47उठा।
08:48जन्ता ने प्रभु के चर्णों में फूल बरसाए, भक्ती में लीन होकर कीर्टन गाये और उनके दिव्यदर्शन से अपनी आत्माओं
08:57को त्रिप्त किया।
08:58भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्तजनों को एक शांत स्नहमई द्रिष्टी से देखा, जिससे प्रत्येक हृदय में असीम शांती और
09:07पर्मानंद की अनुभूती हुई।
09:10दिव्य शोभायात्रा मिथिला के राजपत से होकर धीरे-धीरे राजमहल की ओर बढ़ रही थी, जहां हर ओर उत्सव का
09:18माहौल था।
09:20अन्तर शोभायात्रा राजर्शी जनक के भव्य महल के सामने रुकी, जो स्वया दैविय सुन्दर्ता और वास्तुशिर्प का प्रतीक था।
09:29जनक ने स्वया अपने हाथों से भगवान श्री कृष्ण का स्वागत किया और उन्हें आदर पूर्वक अपने महल के भीतर
09:36पधारने का आगरह किया।
09:39महल के भीतर श्री कृष्ण को एक अत्यंत भव्य कक्ष में ले जाया गया, जहां हर वस्तु उनके दिव्य अनुरूप
09:47तैयार की गई थी।
09:49सायमकाल में एक भव्य सभा का आयोजन किया गया, जहां रिशी, विद्वान और मिथिला के प्रमुख जन भगवान की उपस्थिती
09:57में एकत्रित हुए।
10:00राजर्शी जनक ने अत्यंत विनमर्ता से भगवान श्री कृष्ण के प्रती अपनी अगाध भक्ती और कृतक्यता व्यक्त की, उनके आगमन
10:08को अपना सबसे बड़ा सौभाग्य बताया।
10:12भगवान श्रीक्रिष्ण ने अपने प्रियभक्त जनक को अपने दिव्य हाथों से आशिरवाद दिया, जिससे जनक का हृदय आनंद और शांती
10:20से भर गया
10:22फिर रिशियों और विद्वानों ने भगवान श्रीक्रिष्ण के साथ गेहन आध्यात्मिक और दार्शनिक विश्यों पर चर्चा की, जहां सत्य की
10:31गहराईया उजागर हुई
10:33भगवान की उपस्थिती में मिथिला नगरी ने एक अद्वितिय शांती और समरिद्धी का अनुभव किया, मानो स्वर्गी धर्ती पर उतर
10:42आया हो
10:44राजमहल के हर कोने में श्रीकृष्ण की दिव्य उपस्थिती से एक सकारात्मक उर्जा और आध्यात्मिक आभा व्याप्थ हो गई थी
10:53राजर्शी जनक का हरिदय अब केवल राजसी गौरव से नहीं, बलकि प्रभु के सामी पिसे प्राप्त अध्वितिय आध्यात्मिक आनन्द से
11:01परिपूर्ण था
11:04श्रीकृष्ण के आगमन से मिथिला नगरी के कंकन में एक नवजीवन और आध्यात्मिक जागर्ण की लहर दोड़ गई, जिसने इसे
11:12एक पवित्र तीर्थ स्थल में बदल दिया
11:15श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और मधुर वचनों ने मिथिला के वातावर्ण में एक ऐसा सम्मोहन घोल दिया था कि हर
11:23आत्मा अलौकिक प्रेम और भक्ती में डूग गई
11:27जनकपुरी के हर नागरिक ने, चाहे वह दरिद्र हो या धनी, स्वयन को प्रभु के चर्णों में समर्पित कर दिया,
11:34उनकी एक जलक पाने को आतुर होकर
11:37प्रभु ने स्वयन अपने श्री मुक्ष से मोक्ष और भक्ती के गहन रहसियों का उपदेश दिया, जिससे मिधिला की भूमी
11:45पर ज्ञान और वैराग्य का अमरित बरसने लगा
11:49राजर्शी जनक ने श्री कृष्ण के समक्ष अपनी आत्मा का सार प्रस्तुत करते हुए, उन्हें अपनी विदेह नगरी का शाश्वत
11:57समराट और हृदय का परम आराध्य घोशित किया
12:00कई दिनों तक मिधिला में वास करने के पश्चात, जब प्रभु के प्रस्थान का समयाया, तो नगर में एक गेहन
12:08उदासी छागई, जैसे सूर्य अस्थ हो रहा हो
12:12राजर्शी जनक ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान को विदाई दी, उनका हृदय इस अलगाव से विदियन हो रहा था, फिर
12:20भी प्रभु की इच्छा को स्विकार किया
12:23दारुक ने बड़ी श्रधा से रथ का अश्वारोहन किया, और प्रभु के संकेत पर रथ विदेह की ओर धीमी गती
12:31से आगे बढ़ने लगा
12:33रथ के पीछे-पीछे यादवों के कई वीर, रिशिमुनी और हजारों भक्त प्रभु की एक अंतिम जलत पाने की अभिलाशा
12:41में कुछ दूर तक चले
12:43यात्रा के प्रत्येक पड़ाव पर गाव-गाव और नगर्नगर से लोग उमड़ पड़े अपने आराध्य के दर्शन पाकर जीवन धने
12:51करने के लिए
12:53प्रभु का रत जहां-जहां से गुजरता था, वहां की मिट्टी पवित्र हो जाती और वातावर्ण में भक्ती की अलौकिक
13:01सुगंध फैल जाती थी
13:03दारुक प्रभु के रत को चलाते हुए अपने हिदय में परम आनंद का अनुभव कर रहा था, मानो वह स्वय
13:10वैकुंट की यात्रा कर रहा हो
13:13यादव वीर अपने अस्त्रशस्त्रों से सुसजित, रत के चारों और सुरक्षा घेरा बनाये हुए थे, अपने प्रभु की सेवा में
13:21गर्व का अनुभव करते हुए
13:24सायंकाल होते ही, रत एक शांत और सुरमय नदी के तट पर रुका, जहां विश्राम और रात्रिवास का प्रबंध किया
13:32गया
13:33प्रभु ने चंदर प्रकाश में नदी के किनारे बैठ कर ध्यान किया, जिससे संपून, वातावन, शांती और दिव्य उर्जा से
13:41भर उठा
13:43भोर होते ही, पक्षियों के मधुर कल्रव और रिशियों के मंत्रों चार से यात्रा का पुनह आरंभ हुआ, एक नई
13:50उर्जा और उच्साह के साथ
13:53विदेह के अंतिम छोरों को पार करते हुए, रथ अब उन ग्रामीन क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा था जहां भक्त
14:00शुरुपदेव का निवास था
14:03राजसी वैभव और ग्रामे साथगी का यह विरोधाभास अद्भुद था, जहां एक और इश्वर का एश्वर्य और दूसरी और भक्त
14:11की निष्ठा का प्रतीक था
14:14श्री कृष्ण ने दारुक को धीरे चलने का आदेश दिया, उनकी आखें दूर एक छोटे से गाउ में किसी विशेश
14:21स्थान को ढूंद रही थी
14:23गाउ के प्रवेश द्वार पर रत अचानक रुख गया, जैसे किसी अद्रिश शक्ती ने उसे वही स्थिर कर दिया हो
14:32दूर एक छोटी मिट्टी की जोपडी दिखाई दे रही थी, जहां भक्त शुरुपदेव अपने नित्य कर्मों में लीन भगवान के
14:40आगमन से अन्भिग्य थे
14:43व्रिक्षों की ओट से भगवान श्री कृष्ण की कमल नयन दूर मिट्टी की जोपडी में ध्यानमगन भक्त शुरुपदेव पर टिक
14:50गई, जिनके मुख पर अगाध शान्ती और श्रधा का तेज चमक रहा था
14:56सार्थी दारुक भगवान के इस अप्रत्याशित थहराव और मौन अवलोकन से विस्मित उनके अगले आदेश की प्रतीक्षा में शान्त खड़ा
15:05रहा
15:06एक क्षण बाद श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्ण नेत्रों से दारुक की ओर देखा और उसे वही रत के पास रुकने का
15:13संकेत दिया
15:14मानो किसी गोपनिय मिलन का क्षण निकट आ गया हो
15:19देवों के देव ने सहच्टा से रत से उतर कर अपनी भव्यता को एक पल के लिए पीछे छोड़ दिया
15:25मानो वे मात्र एक साधारन पथिक हों अपने भक्त से मिलने को आतुर
15:31शांत कदमों से भगवान श्रीकृष्ण उस चोटी सी पकडंडी पर आगे बढ़े
15:36जहां धूल के कण भी उनके दिव्यस पर्ष से पवित्र हो रहे थे
15:40उनकी दिशा बस उस जोपडी की ओर थी
15:44जोपडी के भीतर भक्त शुरुपडेव एका ग्रचित होकर अपने आराध्य का ध्यान कर रहे थे
15:51उनके होठोन पर निरंतर प्रभु नाम का जाप था और उनकी आत्मा प्रेम में लीन थी
15:57तभी जोपडी में एक अलौकिक सुगंध फैल गई
16:01जिसने वातावर्ण को पवित्रता और दिव्यता से भर दिया
16:04मानो स्वर्ग से कोई पुष्प वर्षा हुई हो
16:08जैसे ही शुरुपडेव ने अपनी आखें खोली
16:11उनके सामने द्वार पर साक्षाक भगवान श्री कृष्न खड़े थे
16:15जिनकी अनुपम छवी से पूरा कुटीर जगमगा उठा था
16:20यह देखकर शुरुपडेव का हरिदय भक्ती और आश्चर्य से भर गया
16:25उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्वय उनके प्रभु उनके द्वार पर खड़े हैं
16:32उनकी आखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी और उनका शरीर पुलकित हो उठा
16:38मानो वर्षों की प्रतीक्षा आज समाप्थ हो गई हो
16:42शुरुपडेव ने तुरंट अपनी चटाई बिच्छाई और भगवान को उस पर विराजने का आगरह किया
16:48और उनके चरण धोने के लिए पवित्र जल प्रस्तुत किया
16:53करुणा के सागर श्री कृष्ण ने भक्त के प्रेमपूर्ण आतित्य को सहर्ष स्विकार किया
16:58मानो उनके लिए यह राजमहल के व्यंजनों से भी अधिक स्वादिष्ठ हो
17:04भगवान ने श्रुपदेव से उनके तप और भक्ती के विशय में पूछा
17:08और भक्त ने अपनी सरलवानी में अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाया
17:14ततपश्चात श्री कृष्ण ने प्रेमपूर्वक श्रुपदेव को मिथिला नगरी चलने का निमंतरन दिया
17:20जहां उन्हें अपने प्रियसखा, राजा जनक से मिलना था
17:25श्रुपदेव इस अप्रत्याशित निमंतरन से क्षन भर के लिए स्तब्ध रह गए
17:29फिर उनके हृदय में अपार हर्ष और कृतग्यता की लेहर गौड गई
17:35अपने प्रभु के साथ चलने के लिए तयार होकर
17:38श्रुपदेव ने अपनी सरल जोपडी को एक अंतिम श्रधापून ग्रिष्टी से देखा
17:43और भगवान के साथ यात्रा पर निकल पड़े
17:47उधर्क मिथिला नगरी को दुलहन की तरह सजाया गया था
17:51हर गली, हर चौराहा फूलों और रंगीन पताकाओं से शोभाय मान था
17:56जैसे कोई भव्य उत्सव निकट हो
17:59महाराज जनक स्वया अपने मंत्रियों और प्रजाजनों के साथ नगर के मुख्य द्वार पर खड़े थे
18:05उनकी आखों में अपने आराध्य के आगमन की आतुर्ता स्पष्ट जलक रही थी
18:12दूर से भगवान श्री कृष्न का रत अब शुत देव के साथ मिथिला के भव्य प्रवेश द्वार की ओर बढ़ता
18:19हुआ दिखाई दिया
18:20जिससे पूरे नगर में हर्शोल लास की लेहर दोड़ गई
18:25राजर्शी जनक ने साश्टान प्रणाम किया और स्वय प्रजा तथा मंत्रियों के साथ अपने प्रभु और उनके प्रिय भख्त का
18:32मिथिला में भव्य स्वागत किया
18:35भव्य स्वागत के उपरांत भगवान श्री कृष्न, राजर्शी जनक और भक्त शुर्पदेव को विशाल शोभायात्रा के साथ मिथिला के राजमहल
18:44की ओर ले जाया गया
18:46जहां हर ओर पुश्पों की वर्शा हो रही थी
18:50राजमहल में प्रवेश करते ही, जनक ने स्वया अपने हाथों से भगवान के चरण धोए और उन्हे रत्नजडित सिनहासन पर
18:58विराजमान होने का विनमर आगरह किया
19:00उनकी आखों में असीम श्रद्धा थी
19:04भगवान श्रीकृष्ण ने जनक के प्रेमपून आगरह को स्वीकार कर उस दिव्य सिनहासन को सुशोभित किया
19:11उनकी मोहिनी मुस्कान से पूरा वातावर्ण आलोकित हो उठा
19:16ततपश्चात महाराज जनक ने स्वयन शृत्देव को आदरपूर्वक अपने समीप एक उच्चासन पर बिठाया
19:23यह दर्शाते हुए कि भगवान के भक्त स्वय भगवान से भी अधिक प्रिय है
19:29मिथिला नरेश ने भगवान और उनके परम भक्त का शोडशोपचार विधी से पूजन किया
19:35जिसमें हर एक वस्तु शुद्धता और समर्पन की पराकाश था थी
19:40पूजन के उपरांत जनक ने हाथ जोड़ कर भगवान से प्रार्थना की कीवे अपनी दिव्यवानी से मिथिला को धन्य करें
19:48और उनके सभी संश्यों का निवारण करें
19:52श्री कृष्ण ने जनक के भक्तिमय अनुरोध को स्विकार करते हुए अपनी मधुर और गंभीर वानी में धर्म, वैराग्य और
20:00भक्ती के गूढ रहसियों पर प्रकाश डालना आरंब किया
20:04उन्होंने समझाया कि वास्तविक वैराग्य सांसारिक वस्तूओं का त्याग नहीं, अपितु उनके प्रती अनासक्ती का भाव है, जो कर्म करते
20:13हुए भी मन को निरलिप्त रखता है
20:17भगवान ने आगे कहा कि धर्म का पालन केवल बाहरी आडंबर नहीं, बलकि अपनी प्रकृती के अनुसार निष्ठापूर्वक करतवियों का
20:25निर्वाह करना और सभी प्राणियों के प्रती करुणा भाव रखना है
20:31जनक ने प्रश्ण किया कि क्या ज्यान मार्ग और भक्ती मार्ग दोनों ही मोक्ष की ओर ले जाते हैं, अथवा
20:38उनमें से एक अधिक श्रिष्ट है
20:41भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया कि दोनों ही मार्ग परम सक्त्य तक पहुँचने के भिन्न भिन्न सोपान
20:49हैं, परंतु प्रेम्मई भक्ती सभी के लिए सुलब और शीघ्र फलदाई है
20:55उन्होंने भक्ती के महत्व पर बल दिया, जहां भक्त अपने सभी कर्म, इच्छाएं और यहां तक की अपने अस्तित्व को
21:03भी भगवान को समर्पित कर देता है
21:06श्रीकृष्ण ने उदाहर्णों सहित समझाया कि कैसे भक्ती मार्ग पर चलने वाला भक्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम आनंद
21:15को प्राप्त करता है
21:17उन्होंने राजर्शी जनक को कर्म करते हुए भी अनासक्त रहने के रहस्य का बोध कराया
21:23ठीक वैसे ही जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे निरलिप्त रहता है
21:30जनक ने अपने हृदय में गहन शांती और संतोश का अनुभव किया
21:34मानो उन्हें युगों से जिस ज्ञान की खोज थी वह आज पूर्ण हो गई हो
21:40उन्होंने परम्पिता परमात्मा के रूप में श्रीकृष्ण को पहचानते हुए
21:45उन्हें ब्रहमांड का एक मात्र सत्य और मोक्ष का दाता स्विकार किया
21:51भगवान श्रीकृष्ण ने जनक की भक्ती और ज्ञान की गहराई को देखकर उन्हें आशिरवाद दिया
21:57जिससे जनक का हृदय आनन से भर गया
22:01दूर एक कोने में बैठे भक्त श्रुपदेव इस दिव्य समवाद और राजर्शी जनक की भक्ती को देखकर अवाक रह गए
22:08उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली
22:12जनक ने पुना हाथ जोड़कर प्रार्थनाकी की भगवान उन्हें ऐसा सामर्थ्य दें कि वे श्रुपदेव जैसे निस्वार्थ भक्तों की सेवा
22:20कर सकें
22:22श्री कृष्ण ने स्नेह पूर्वक जनक को बताया कि सभी जीवों में मेरी आत्मा का वास है
22:28आत्व प्रत्यक प्राणी विशेशकर मेरे भक्तों की सेवा ही मेरी सच्ची सेवा है
22:35श्री कृष्ण ने अपने करुणामय स्वरूप में जनक को समझाया कि सच्ची सेवा का अर्थ है
22:41हर जीव में व्याप्त परमात्मा का सम्मान करना जो किसी भी बाह्य पूजा से बढ़कर है
22:48यह सुनकर राजर्शी जनक ने परम संतोष और कृतग्यता से अपने दोनों हाथ जोड लिए उनके हरिदय में सेवा का
22:56एक नया प्रकाश जग्मगा उठा
22:59सहसा भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यद्रिष्टी दूर एक कोने में बैठे भक्त शुरुपदेव पर पड़ी जिनकी आखों में अन्वरत भक्ती के
23:08अश्रु टपक रहे थे
23:11शुरुपदेव का हरिदय भगवान के नाम के जाब से परिपूर्ण था और वे बिना किसी बाहरी दिखावे के केवल आंतरिक
23:18प्रेम में लीन थे
23:23शुरुपदेव की अगाध निस्वार्थ भक्ती से अत्यंत प्रसन्न हुए, मानों उनके अपने हरिदय में ही शान्ती का अनुभव हो रहा
23:31हूँ
23:32उन्होंने मन ही मन निर्णे लिया कि वह शीघर ही इस परम भक्त के हमबल कुटिया को अपने चरण कमलों
23:39से पावन करेंगे
23:41कुछ क्षण पश्चात, श्रीकृष्ण ने राजर्शी जनक की ओर मुर्ते हुए प्रेमपूर्वक कहा कि उन्हें एक विशेश भक्त से मिलने
23:50जाना है
23:52जनक आश्चर्यचकित रह गए, उनके मन में जिग्यासा उमड पड़ी की आखिर कौन सा ऐसा भाग्यशाली भक्त है, जिससे मिलने
24:00स्वया भगवान जा रहे है
24:03श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा, वह भक्त संसार की किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, उसका एक मात्रधन मेरा नाम
24:12है
24:14तकपश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने राजर्शी जनक को अपने साथ आने का संकेत दिया और दोनों उस भव्य महल से निकल
24:22पड़े
24:23वे दोनों प्राजा और भगवान विदेह की शांत और धूल भरी गलियों से होते हुए एक साधारन बस्ती की ओर
24:31अग्रसर हुए
24:33जनक ने देखा कि जैसे जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, महलों की भव्यता धुन्धली पड़ती जा रही थी और
24:40एक साधगी पूर्ण जीवन शैली उजागर हो रही थी
24:44उसी शांत और निर्धन बस्ती में एक छोटे से कुटिया में शुरुपदेव अपने नित्यकर्म में लीन थे, उनके चहरे पर
24:52एक अलौकिक शांती विराज रही थी
24:56उनकी कुटिया के पास एक तुलसी का पौधा लगा था, जिसकी उन्होंने बड़े सने से सेवा की थी, मानो वही
25:03उनका सबसे बड़ा धन हो
25:06शुरुपदेव ने हृदय से प्रार्थना की, है प्रभु
25:09मैं तो एक निर्धन भक्त हूँ, आप कब मेरे इस तुछ कुटिया को अपने आगमन से पावन करेंगे
25:17ठीक उसीक्षन, श्रीकृष्ण और राजर्शी जनक शुरुपदेव की कुटिया के द्वार पर पहुंच चुके थे, एक दिव्य आभा पूरे वातावर्ण
25:26में फैल गई
25:28कुटिया के भीतर से बाहर आते ही शुरुपदेव ने द्वार पर भगवान श्रीकृष्ण को साक्षात खड़ा देखा और विश्वास नकर
25:36पाने की स्थिती में स्तम्भित रह गए
25:39शुरुपदेव के नेत्रों से अशुरुधारा बह निकली और वे दोड़ कर भगवान के चर्णों में गिर पड़े उनके हृदय से
25:46भक्ती का उद्दाम वेग फूट पड़ा
25:49राजर्शी जनक ने शुरुपदेव की इस अद्भुत नहस्वार्थ भक्ती को देखकर स्वयं को धन्य महसूस किया और उनकी आखों में
25:58भी प्रेम के अशुरुआ गए
26:00श्री कृष्ण ने अपने भक्त को उठाया और प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा हे शुरुपदेद
26:08तुम्हारा यह प्रेम ही मेरा सबसे बड़ा आभूशन है
26:13भगवान श्री कृष्ण ने प्रेम पूर्वक अपने भक्त शुरुपदेव को उठाया और उनके अशुरु पोंचते हुए उनकी भक्ती की निर्मल
26:21धारा को सराहा, जिससे पूरा राजदर्बार भाव विभोर हो गया
26:26शन भर के लिए राजदर्बार में सन्नाट आचा गया, जहां हर दर्बारी और विश्यमुनी भगवान और उनके भक्त के इस
26:34अलोकिक मिलन को विस्मय भरी आखों से देख रहा था
26:38तभी भगवान श्रीकृष्ण ने अपना दिव्यनेत्र राजर्शी जनक की ओर घुमाया, उनकी आखों में एक ऐसा भाव था जो संसार
26:47के सभी रहसियों को समेटे हुए था
26:50हे राजर्शी जनक, श्रीकृष्ण की वानी गंभीर और मधुर्थी, इस भक्त शुरुपदेव ने अपनी निष्ठा से मुझे जीत लिया है,
26:59और अब मैं इनके दर्शन से त्रिप्त नहीं हूँ, मुझे इनके घर जाना है
27:05भगवान के ये शब्द सुनते ही राजदर्बार में एक अध्भुत हल्चल मच गई, जहां हर कोई इस अप्रत्याशित घोशना पर
27:13अपनी आखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था
27:17राजर्शी जनक ने सम्मान पूर्वक अपने आशन से उठकर कहा, हे प्रभु, यह कैसे संभव है कि आप जैसे परंब्रहम
27:26एक निर्धन भक्त की कुटिया में पदारपन करें
27:30श्री कृष्ण ने सने से मुस्कुराते हुए जनक की ओर देखा और समझाया, जनक प्रेम और भक्ती से बढ़कर मेरे
27:37लिए कोई स्थान नहीं है, राजमहल या कुटिया मेरे लिए सब समान है
27:44भगवान ने आगे कहा, जो भक्त मुझे अपने हृदय में धारण करता है, मैं उसके घर को अपना वैकुंठ मानता
27:51हूँ, और शुर्ट देव ने अपने हृदय में मेरे लिए एक अमर सिनहासन बनाया है
27:58यह सुनकर राजर्शी जनक का हृदय भक्ती से भराया, और उन्होंने तुरंत भगवान की इच्छा पूर्ण करने के लिए आवश्यक
28:06व्यवस्थाय करने का आदेश दिया
28:09कुछ ही क्षणों में महल के सेवक और सैनिक शुर्ट देव की कुटिया की ओर जाने वाले मार्ग को स्वच्छ
28:15करने और यात्रा के लिए रथ तयार करने में जुट गए
28:20श्रीकृष्ण ने एक बार फिर शुरुपदेव को आलिंगन किया और कहा चलो शुरुपदेव आज मैं तुम्हारे घर का अतिथी बनूँगा
28:28यह मेरा सौभाध्य है
28:31इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण शुरुपदेव और राजर्शी जनक के साथ भव्य रत में आरूड होकर शुरुपदेव की कुटिया की और
28:40प्रस्थान करने के लिए तयार हुए
28:43रत धीरे धीरे राज महल के द्वार से निकला और मिथिला की हरीभरी भूमी से होकर शुरुपदेव के गाउ की
28:50ओर अग्रसर हुआ
28:51जिसके पीछे राजसी सम्मान और आगे एक भक्त का प्रेम था
28:57मार्ग में गाउ के लोग और वनवासी भगवान के दर्शन पाकर स्वया को धन्य महसूस करने लगे
29:03वे हाथ जोड कर प्रभु का अभिवादन कर रहे थे
29:08जैसे ही रत शुरुपदेव के छोटे से गाउ के समीत पहुँचा
29:12एक अनोखी दिव्य आभा पूरे वातावर्ण में फैल गई जिससे प्रकृती भी पुलकित हो उठी
29:19शुरुपदेव ने अपने गाउ और अपनी कुटिया को दूर से ही देखा
29:23उनका हृदय अपार आनन्द और कृतग्यता से भर गया कि स्वय भगवान उनके घर आ रहे है
29:31रत एक छोटे से टीले पर रुका जहां से शुरुपदेव की साधारन सी कुटिया स्पष्ट दिखाई दे रही थी
29:38जो अब भगवान के आगमन से दिव्य लगने लगी थी
29:43शुरुपदेव के परिवारजन उनकी पतनी और बच्चे जो घर के बाहर थे
29:48अचानक इस भव्यरत और भगवान की उपस्थिती से चकित होकर वहीं जडवत खड़े रह गए
29:55भगवान श्रीकृष्ण ने रत से उतर कर अपनी अलोकिक आभा से उस साधारन कुटिया को प्रकाशित किया
30:02मानो वैकुंठ स्वयं प्रिथवी पर उतर आया हो
30:16करुणा कर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य हाथों से श्रुपदेव के परिवार को उठाया उनके नैनों से प्रेम और आशीश
30:24की वर्षा हो रही थी
30:26कुटिया के भीतर श्रुपदेव ने द्वार पर उमर्ती दिव्य उर्जा और अपने परिवार की आनंदित पुकारों को सुनकर एक अज्यात
30:34रोमाज का अनुभव किया
30:37भगवान श्री कृष्ण अपनी अनुपम आभा और राजर्शी जनक जैसे गण्मान्य व्यक्तियों के साथ उस साधारन कुटिया की ओर धीरे
30:46धीरे बढ़े जहां भगती का सच्चा निवास था
30:50जैसे ही भगवान ने कुटिया के द्वार से प्रवेश किया, पूरा वातावर्ण दिव्य प्रकाश से भर उठा और कनकन चैतन्य
30:58हो गया
30:59अपने आराध्य को प्रत्यक्ष सामने देख कर शुपदेव की आखें श्रधा और विस्मय से चौड़ी हो गई, मानो उनका वर्षों
31:08का स्वपन साकार हो उठा हो
31:10वे तुरंत अपने स्थान से उठे और प्रभु के चर्णों में साश्टां दंडवत प्रणाम किया, उनके हृदय से केवल जय
31:18श्रीक्रिश्न की ध्वनी निकल रही थी
31:21करुणा से उतप्रोत भगवान ने श्रुपदेव को प्रेमपूर्वक उठाया और अपने कमल समान हाथों से उनके आसू पोचे, मानो एक
31:30पिता अपने पुत्र को सांत्वना दे रहे हो
31:34अपने घर में प्रभु के आगमन से अतिप्रसन होने के बावजूद, शुरुत्देव को अपनी निर्धनता और अभावगरस्त कुटिया पर लज्जा
31:43का अनुभव हुआ
31:45उनके पास अपने प्रिय भगवान को भेंट करने के लिए कुछ भी मूल्यवान नहीं था, सिवाए अपने हृदय की शुद्ध
31:52भक्ती और पवित्र प्रेन के
31:55अंतर उन्होंने निश्चय किया कि शुद्ध जल ही सबसे पवित्र भेंट है और तुरंट एक लोटा लेकर पास के जरने
32:03की ओर भागे
32:05कुछ ही क्षणों में शुद्ध देव पवित्र जल से भरा लोटा लेकर वापस लोटे उनके मुख पर संतुष्टी और उत्साह
32:12का दिव्यभाव था
32:15उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से उस पवित्र जल को भगवान श्री कृष्ण के समक्ष प्रस्तुत किया मानो वह स्वया गंदा जल
32:22हो
32:24भगवान ने प्रसनता पूर्वक वह जल क्रहन किया यह दर्शाते हुए कि उन्हें भाव और भक्ती ही सबसे अधिक प्रिय
32:31हैं न की भौतिक संपदा
32:34जल अर्पित करने के पश्चात शुर्पदेव ने घर में पड़े कुछ साधारन फल और कंदमूल एकत्र किये जिन्हें वे प्रभु
32:42को भेंट कर सकें
32:45अपनी भक्ती के प्रतीक के रूप में उन्होंने उन साधारन फलों को भगवान के चर्णों में श्रधा पूर्वक अर्पित किया
32:52प्रत्येक फल में उनका अगाध प्रेम समाहित था
32:57भगवान श्री कृष्ण ने उन विनम्र फलों को भी प्रेम से स्विकार किया, यह पुना सिद्ध करते हुए कि वे
33:03केवल भक्त के निस्वार्थ भाव को ही देखते हैं
33:07उस साधारन कुटिया में उपस्थित सभी गण्मान्य व्यक्ती राजर्शी जनक सहित इस अलोकिक ग्रिश को देखकर भाव विभोर हो उठे
33:16जहां भगवान स्वयन एक गरीब भक्त की सेवा स्विकार कर रहे थे
33:22भगवान श्रीकृष्ण ने श्रुपदेव की भक्ती की सराहना करते हुए उन्हें प्रेम, विश्वास और निस्वार्थ सेवा के महत्व पर अन्मोल
33:31उपदेश दिये
33:33भगवान के दिव्यवचनों को सुनकर श्रुपदेव का हृदय परम, आनंद और संतोष से भर गया, उन्हें लगा मानों उनके जीवन
33:41का उद्देश पूरा हो गया हो
33:44श्रुपदेव के परिवार जनभी उनके साथ इस दिव्यक्षण के साक्षी बने और भगवान की महिमा का अनुभव कर सभी ने
33:52मिलकर भक्तिभाव से उनका गुनगान किया
33:56भगवान कृष्ण ने अपनी कमलसी आखों से शुरुपदेव और उनके परिवार को एक और अत्यंत करुणामई द्रिष्टी प्रदान की, जिससे
34:04उनके हृद्यों में अविस्मनिय शांती और परम आनंद भर गया
34:09परम प्रभु की इस असीम कृपा को अनुभव कर, शुरुपदेव का हृदय कृतग्यता से भर उठा और वे तुरंत भगवान
34:17के चर्णों में साश्टान प्रणाम करने लगे
34:21अपनी अध्भुत शक्ती से भगवान कृष्ण ने शुरुपदेव को सहेज ही उपर उठाया और उन्हें अपने दिव्य आलिंगन में भर
34:28लिया, जो समस्त ब्रह्मान को सुख प्रदान करने वाला था
34:33ततपश्चात भगवान कृष्ण ने राजर्शी जनक और अन्य सभी उपस्थित साधुसंतों तथा राजाओं की ओर मुर कर एक मुस्कान बिखेरी
34:42जो उनके हृदय में भक्ती का सच्चा अर्थ जागरित कर गई
34:47उन्होंने राजर्शी जनक और सभी विद्वत जनों को संबोधित करते हुए कहा कि भौतिक संपत्ति आपद नहीं बलकि निर्मल हृदय
34:55और सच्ची भक्ती ही उन्हें सरवाधिक प्रिय है
35:00भगवान के दिव्य वचनों को सुनकर राजर्शी जनक का हृदय ज्ञान और भक्ती से परिपूर्ण हो गया और उन्होंने गहरे
35:08सम्मान के साथ पुना प्रभु को नमन किया
35:12सभी उपस्थित साधुसंतों और राजाओं ने भी कृष्ण की अहैतु की कृपा और भक्ती के वास्तविक अर्थ को समझ कर
35:19आनंद और संतोष से भरे हुए सिर जुकाए
35:23अपनी लीला पूर्ण कर भग्वान कृष्ण ने अब द्वार का लोटने का संकेत दिया उनके दिव्य चहरे पर एक संतोष
35:31भरी मुस्कान थी
35:33एक स्वर्गिय रत जिसमें चार श्वेत अश्व जुते थे चमतकारी रूप से प्रकट हुआ और भग्वान कृष्ण उस पर आरूढ
35:41हो गए जिससे सभी के नेत्र चकाचौन्ध हो गए
35:46भग्वान का रत आकाश की ओर उचा उठने लगा, पीछे दिव्य प्रकाश की एक सुनहरी लकीर छोड़ते हुए, जैसे सूर्य
35:54देव अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हुँ
35:58भग्वान के प्रस्थान के बाद भी शुर्ट देव और उनके परिवार का हृदय परम आनंद और संतोष से उतप्रोथ था,
36:05मानो उन्हें ब्रह्मान का सर्वोच धन प्राप्थ हो गया हो
36:10राजर्शी जनक ने उपस्थित सभी विद्वानों और राजाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज उन्होंने साक्षात देखा कि भगवान
36:19की सच्ची भक्ती किसी भी धन या पद से बढ़कर है
36:23अन्य साधुसंतों ने भी इस अनुपम लीला का गहरा अर्थ समझाया कि कैसे भगवान स्वयं एक गरीब भक्त के द्वार
36:31आते हैं उसकी निस्वार्थ सेवा से प्रसन्न होकर
36:36उपस्थित सामान्य जन्भी कृष्ण की इस दयालुता से अभिभूत हो गए उनकी आखों में आस्था और भक्ती की नई चमक
36:44दिखाई दे रही थी
36:46भगवान कृष्ण के शुरुपदेव के घर आने और उन्हें आशिरवाद देने की खबर जंगल की आग की तरह चारों दिशाओं
36:54में फैल गई, हर और उनकी लीला का गुनगान होने लगा
36:58इस बीच भगवान कृष्ण का स्वर्गिय रथ तीवर गती से आकाश मार्ग से द्वारका की ओर अग्रसर था, जैसे कोई
37:06तेजस्वी तारा अपने पत पर बढ़ता हो
37:10भगवान श्री कृष्ण अपने दिव्य रथ में विराजमान, अपने मुख पर शांती और संतोष का भाव लिये हुए अपनी अनुपम
37:18लीला का चिंतन कर रहे थे
37:21दूर्क्षितिच पर प्रकाशमान द्वारका नगरी अपने भव्य महलों और स्वर्णमंदित प्रांगणों के साथ दिखाई देने लगी, मानो स्वर्ग धर्ती पर
37:30उतर आया हो
37:32धीरे धीरे स्वर्गिय रत द्वारका के शाही महल के विशाल प्रांगण में उत्रा, जहां सभी नगरवासी अपने प्रिय भगवान का
37:40स्वागत करने के लिए एकत्र थे
37:43द्वारका लोटकर भगवान कृष्ण ने अपने हिदय में उस अनुपम संतुष्टी को संजोया, जो एक सच्चे भगत के निर्मल प्रेन
37:52को स्विकार कर प्राप्थ हुई थी, अपनी इस लीला को पूर्ण करते हुए
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