कुरुक्षेत्र में हुए भव्य समागम और वसुदेव के महायज्ञ के बाद, विभिन्न लोकों से आए ऋषि-मुनि इस बात पर मंथन करते हैं कि त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से कौन परम श्रेष्ठ है और मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है। इस गहन जिज्ञासा को शांत करने के लिए, सभी ऋषि महर्षि भृगु को तीनों देवताओं की परीक्षा लेने का कार्य सौंपते हैं। भृगु ऋषि किस प्रकार ब्रह्मा, शिव और अंततः भगवान विष्णु की परीक्षा लेते हैं? भगवान विष्णु की कौन सी लीला उनके सर्वोच्च गुणों को प्रकट करती है और कैसे ऋषि भृगु का अनुभव अंततः विष्णु की परम सत्ता को स्थापित करता है? इस एपिसोड में देखें भक्ति, सहिष्णुता और परम ज्ञान की यह अद्भुत गाथा! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #VishnuSupremacy #BhriguRishi #TrimurtiTest #HinduMythology #SpiritualJourney
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00:00कुरुक्षेत्र में हुए भव्य मिलन और वसुदेव के सफल यग्य की पवित्र उर्जा अभी भी गंगा तटपर व्याप्थ थी, जहां
00:07अनेक सिध्ध रिशिमुनी गेहन चिंतन में लीन थे।
00:11यग्य की अग्नी शान्थ हो चुकी थी, परंतु सत्य की खोज की अग्नी उनके हृद्यों में और भी प्रखर्ता से
00:18जल रही थी, जिसने उन्हें एक गूर प्रशन पर मन्थन करने के लिए प्रेरित किया।
00:24इस दिव्य सभा में देवर्शी नारद, महर्शी अत्री और वशिष्ट जैसे त्रिकालदर्शी संत भी उपस्थित थे, जिनकी उपस्थिती ने वातावर्ण
00:34को और भी गंभीर बना दिया था।
00:37देवर्शी नारद, जिनकी वीना की ध्वनी ब्रहमांड में गूंजती थी, अपने शांत गहरे नैनों से उपस्थित जन समूह को निहार
00:45रहे थे, उनके चहरे पर एक गंभीर विचार की छाया थी।
00:51महर्शी अत्री अपने गहन तप और शांत स्वभाव के लिए विख्यात गंभीर मुद्रा में बैठे थे, उनके मुख मंडल पर
00:59सृष्टी के रहसियों को समझने की जिग्यासा स्पष्ट जलक रही थी।
01:04और महर्शी वशिष्ट, जिनके ग्यान की थाह पाना असंभव था, अपनी दिव्यद रिष्टी से सभा के प्रत्येक सदस्य को देख
01:12रहे थे, मानों वे आने वाले प्रश्ण को पहले ही भाप चुके हों।
01:17धीरे धीरे गंगा की शांत लहरों के बीच सभा में एक मूख प्रश्ण तैरने लगा, एक ऐसा प्रश्ण जो सदियों
01:25से संतों के हरिद्यों को आंदोलित करता आया था।
01:29एक वृद्ध रिशी ने अपनी शांत भंकी और धीनी गंभीर वानी में कहा, हम सभी मोक्ष के पथिक हैं, परंतु
01:37क्या हम जानते हैं कि कौन सा मार्ग और कौन सा आश्रय हमें परम सत्य तक ले जाएगा।
01:43उनकी इस बात ने अन्यरिशियों के हरिद्यों में भी दबे हुए प्रश्न को जागरित कर दिया, जिससे सभा में एक
01:50सुक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण कमपन उत्पन हुआ।
01:54नारद मुनी ने अपनी वीना को एक ओर रख कर कहा, स्रिष्टी के त्रिदेवों, ब्रह्मा, विश्नु और शिव में से
02:01कौन वास्तव में परंश्रिष्ट है, जो सच्चे अर्थों में मोक्ष प्रदान कर सकता है।
02:08उनके इस प्रत्यक्ष प्रश्न ने सभा में एक गहरी खामोशी ला दी, जिसके बाद हर रिशी के मन में यही
02:15विचार घूम रहा था, सर्वोच्छ शक्ती का स्वरूप क्या है।
02:20यह केवल एक दार्शनिक बहस नहीं थी, बलकी स्वय को और स्रिष्टी को समझने की एक गहन आध्यात्मिक यात्रा का
02:28आहवान था।
02:30महर्शी अत्री ने अपनी ध्यान मुद्रा भंग करते हुए कहा, क्या यह संभव है कि हम सभी अलग-अलग मार्गों
02:37पर चल कर एक ही सत्य को खोज रहे हो या एक ही परम आश्रे हो।
02:43वशिष्ठ मुनी ने अपनी शांत परंतु द्रिढवानी में प्रत्युप्तर दिया, सत्य एक ही है, परंतु उसे पाने के मार्ग अनेक
02:51हो सकते हैं, प्रश्न तो यह है कि उस परम सत्य का स्वरूप क्या है?
02:57कुछ रिशियों ने तर्क दिया कि ब्रह्मा, स्रिष्टी के रचिता होने के नाते, निश्चित रूप से सर्वोच्च हैं, क्योंकि उनके
03:05बिना संसार की कलपना भी नहीं की जा सकती।
03:09परंतु दूसरे रिशियों ने प्रतिवाद किया कि विश्नु ही जगत के पालक और संरक्षक हैं, जो संतुलन बनाए रखते हैं
03:16और धर्म की स्थापना करते हैं, आथ वे ही परमेश्वर हैं।
03:22कुछ अन्य रिशियों ने शिव की संहारक और पुनह सर्जक शक्ती पर बल दिया, यह तर्क देते हुए कि विनाश
03:29के बिना नूतन्ता का जन्म असंभव है, इसलिए शिव ही अंतिन सत्य हैं।
03:35यह बहस गहन और जटिल होती चली गई, हर रिशी अपने तर्क में द्रिड था और कोई भी सर्वसम्मत निशकर्ष
03:43पर नहीं पहुँच पा रहा था।
04:06मैं त्रिदेवों की परीक्षा लूंगा।
04:37महर्शी कश्यप ने अपनी गंभीर वानी में पूछा कि तीनों लोकों के स्वामियों के क्रोध से स्वयन को सुरक्षित रखते
04:44हुए वे यह परीक्षा कैसे पूर्ण करेंगे।
04:47महर्शी भेगु ने अपने पवित्र दंड को उठा कर कहा कि वे अपने आत्मबल और सत्य के प्रभाव से देवताओं
04:55की परीक्षा लेंगे जहां भय का कोई स्थान नहीं होगा।
05:00ज्यानवरिद्ध महर्शी अंगिरा ने भेगु के इस साहसिक प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि केवल ब्रहमा के मानस पुत्र
05:08भेगु ही इस महा कठिन कार्य के योग्य हैं।
05:11इस पर सभा में उपस्थित समस्त रिशियों ने एक स्वर में मंत्रो चार करते हुए भेगु रिशी को अपनी सामुहिक
05:19तपोबल की उर्जा समर्पित की।
05:22भेगु ने शांत भाव से अपनी आखें बंद कर ली और इस महान ब्रहमांडिय दायत्व को सफलता पूर्वक पूर्ण करने
05:30के लिए परम सक्ता का ध्यान किया।
05:33उन्होंने अपने चमकदार पीतल के कमंडलू से पवित्र गंदाजल लेकर आचमन किया, जिससे उनके मुख मंडल पर एक अलोकिक दिव्य
05:42चमक बिखर गई।
05:44यग्यशाला के केंद्र में प्रजवलित पवित्र अग्नी देव ने भी अपनी लप्टों को तीवर कर दिया, मानों वे भ्रेगु के
05:51इस महान संकल्प का स्वागत कर रहे हूं।
05:54भ्रेगु रिशी ने अपनी योजना की घोशना करते हुए कहा कि वे सर्वप्रथम सत्यलोक जाएंगे और अपने ही पिता, स्रिष्टी
06:04के रचिता भगवान ब्रहमा की परीक्षा लेंगे।
06:06इसके पश्चात वे कैलाश परवत की ओर प्रस्थान करेंगे जहाँ वे सहार के स्वामी और परमयोगी भगवान शिव के धैर्य
06:16का परीक्षन करेंगे।
06:17अंत में ध्रेगु ने कहा कि वे वैकुंठ लोक में जाकर पालनहार भगवान विश्णु की सहनशीलता और उनके सत्वगुन की
06:26अंतिम परीक्षा लेंगे।
06:28संपूर्ण यग्यमंडप पवित्र ओमध्वनी के गंभीर उद्घोष से गूंज उठा जिसने इस अभूत पूर्व धर्मयात्रा को अपनी आध्यात्मिक स्विकृती प्रदान
06:39की।
06:39यात्रा की तयारी करते हुए घ्रेगु रिशी ने अपनी म्रिग्छाला को व्यवस्थित किया और अपने विशाल वक्ष पर यग्योपवीत को
06:48श्रधा पूर्वक सुधारा।
06:51उपस्थित रिशियों ने परम आदर के साथ उन्हें विदाई देते हुए उनके हाथ में सुरक्षा और विजय के प्रतीक स्वरूप
06:59पवित्र कुशा घास भेंट की।
07:02तपोवन के चारों ओर की प्रकृती और शांत वातावर्ण में एक रहस्य में हलचल होने लगी। मानो समस्थ चराचर जगत
07:10इस परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा हो।
07:14अपने गुरूं और जेश्थ रिशियों को प्रणाम कर भेगु ने यग्यवेदी की पवित्र सीमा से बाहर अपना पहला कदम बढ़ाया
07:21और उनके खडाओं की ध्वनी गूंज उठी।
07:25उनके पीछे यग्यवेदी से उठता हुआ सुवासित और पवित्र धुआ आकाश की ओर उठने लगा, जो मानवता के कल्यान के
07:33लिए उनकी प्रार्थना को उपर ले जा रहा था।
07:37जैसे ही वे तपोवन की सीमाओं को पार करने लगे, उनके भौतिक शरीर के चारों और एक सुनहरी दिव्य आभा
07:45प्रकट होने लगी जो उन्हें लोकोत्तर यात्रा के लिए तयार कर रही थी।
07:50हृदय में द्रेड संकल्प और सत्य की शक्ती लेकर महर्शी भेगु ने भूमी का परित्याग किया और अंतरिक्ष मार्ग से
07:58सर्वप्रथम ब्रहम लोग की ओर अपनी यात्रा आरंब की।
08:03महर्शी भेगु तीवर गती से अंतरिक्ष में विचर्ण करते हुए अंतर स्वर्णधूली से आच्छादित और अंगिनत दिव्य लोकों से परेस्थित
08:11ब्रहम लोग के विशाल आकाशिये द्वारों के समीक पहुँचे जहां स्रिष्टी का गूढ रहस्य स्वयन ब्रहम
08:18के मुख से प्रतिध्वनित होता था द्वारों को पार करते ही उन्हें ब्रहम लोग की दिव्यवायू का अनुभव हुआ जो
08:26सहसरों कमल पुष्पों की सुगंध और वैदिक मंतरों की सुक्षम ध्वनी से भरी थी मानो स्वयन स्रिष्टी का स्पंदन वहां
08:33व्याप्थ ह
08:35वे सीधे उस भव्य सभा मंडप की ओर बढ़े जहां चारों दिशाओं से ज्ञान की किरने फूट रही थी और
08:42सभी लोगपाल रिशिमुनी तथा देवगन ब्रहमा की उपस्थिती में ज्ञान चर्चा में लीन थे
08:49सभा के केंद्र में एक विशाल कमल सिनहासन पर स्रिष्टी के अधिपती भगवान ब्रहमा अपने चार मुखों के साथ विराजमान
08:57थे जिनसे चारों वेदों की ध्वनी प्रवाहित हो रही थी और उनका तेज तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था
09:06महर्शि भेगु ने सभा में प्रवेश किया और ब्रहमा सहित समस्त उपस्थित देवों, रिशियों और लोगपालों को नमस्कार किये बिना
09:14सीधे भगवान ब्रहमा की ओर तीवर द्रिष्टी से देखा जिससे सभा में एक सुक्ष्म सन्नाटा चा गया
09:22ब्रहमा के चारों मुखों पर पहले आश्चर्य की एक लेहर दोड़ी, फिर एक क्षण के लिए एक सुक्ष्म अनादर का
09:29भाव जलका, क्योंकि ऐसा कृत्य उनकी सभा में पहले कभी नहीं हुआ था
09:35उपस्थित समस्थ देवगण और रिशिगण महर्शी भेगु के इस अप्रत्याशित आचर्ण से स्तब्ध रह गए, उनके कानों में ब्रहमा के
09:44प्रती इस सीधे अनादर की प्रतिध्वनी गूंजने लगी
09:48ब्रहमा के मुखों पर क्रोध की लालिमा धीरे धीरे बढ़ने लगी, उनके दिव्य नेत्रों में एक अद्रिश्य अगनी प्रजवलित होने
09:56लगी, जो उनके असीम धैर्य की सीमाओं को तोरने का संकेट दे रही थी
10:02उनके भौहे संकुचित होने लगी, और उनके होठों पर एक ऐसी द्रिड़ता आ गई जो आमतोर पर स्रिश्टी के नियमों
10:09के उलंधन पर ही प्रकट होती थी
10:13सभा का वातावर्ण अत्यन्त तनाव पूर्ण हो गया, और सभी देवगण भयभीत होकर अपने स्थान पर निश्चल हो गए, उनकी
10:21सासे मानो थमसी गई थी
10:24फिर भी महर्शि भेगु अविचल खड़े रहे, उनकी आखों में सत्य की एक तीक्षन चमक थी, मानो वे ब्रह्मा के
10:31क्रोध की गहराई को मापने आये हो
10:35ब्रह्मा ने अपनी एक भुजा उठाई, मानो किसी कठोर वचन को उच्चारित करने वाले हो
10:41और उनके होंट खुलने ही वाले थे, जब एक दिव्य प्रेणा ने उन्हें रोक लिया
10:47अपनी दिव्यद रिष्टी से उन्होंने क्षन भर में अपने समक्ष खड़े उस तेजस्वी रिशी को पहचान लिया
10:54वह उनका प्रिय पुत्र तपस्वी भिगु था, जो किसी गूर प्रयोजन से यहां आया था
11:01पिता के हृदय में पुत्र के प्रती असीम स्नेह की एक शक्तिशाली लेहर उमर पड़ी, जिसने क्रोध की समस्ट अगनी
11:08को क्षन भर में शांत कर दिया
11:11क्रोध की जगह अब उनके मुखों पर एक गहरा वात्सल्य और शांती व्याप्त थी, मानो एक पिता ने अपने पुत्र
11:19की हर शरारत को सहज भाव से स्विकार कर लिया हो
11:23उन्होंने अपनी अमोग मानसिक शक्ती का उपियोग किया, जिससे उनके मन के भीतर उत्पन हुआ क्रोध का अंतिम अवशेश भी
11:31तुरंत विलीन हो गया
11:34सभा में उपस्थित सभी देवगण और रिशिगण इस अलौकिक परिवर्तन को विस्मय से देख रहे थे, ब्रहमा के क्रोध का
11:42ऐसा शांत होना उनके लिए अविश्वसनिय था
11:46ब्रहमा का मुख मंडल अब पूरी तरह से शांत और दिव्य प्रेम से भरा हुआ था, उनकी आखों में पुत्र
11:53के लिए एक गहरा आशिरवाद और समझ थी
11:57महर्शी भेगु ने अपने पिता के शांत और करुणामय मुख को देखा, और उनके हृदय में भी एक गहरी संतुष्टी
12:04का भाव जागा, क्योंकि वे अपने प्रथम चरण में सफल रहे थे
12:09पूरी तरह से शांत और स्थिर होकर, भगवान ब्रह्मा ने अब भेगु की ओर अपनी दिव्य करुणामय द्रिष्टी डाली, जैसे
12:17वे उसके गूर उद्देश को जान गए हूँ
12:21ब्रह्मा के आशिरवाद और अपने मन में अगला लक्षय तै करके, महर्शि भेगु अब कैलाश परवत की ओर अपनी यात्रा
12:29पर निकल पड़े, उनके कदम द्रिड और उद्देश पूर्ण थे
12:34अपनी तपस्या और आध्यात्मिक शक्ती के बल पर ध्रेगु ने तीनों लोकों को पार करते हुए शीघरही देवभूमी कैलाश के
12:42हिमशिकरों की ओर प्रस्थान किया, जहां देवाधिदेव महादेव निवास करते थे
12:48जल्द ही ध्रेगु रिशी उस परम पवित्र भूमी पर पहुँच गए, जहां चारों और अलोकिक शान्ती और दिव्य उर्जा का
12:56प्रवाह था, और जहां स्वयन शिव अपनी अनंत समाधी में लीन थे
13:02गुफा के भीतर, उन्होंने भगवान शिव को गहन समाधी में देखा, उनकी आभा चंद्रमा के समान शीतल और शांत थी,
13:10लेकिन भ्रेगु के मन में कुछ और ही योजना चल रही थी
13:15महर्शी भ्रेगु ने जानबूच कर कैलाश के शांत वातावर्ण में कोई अभिवादन नहीं किया, नहीं उन्होंने शिव के प्रती सामान्य
13:23सम्मान प्रदर्शित किया, बल्कि एक मौन अवमानना का भाव धारण किया
13:29अपनी समाधी से जागरित होकर भगवान शिव ने अपने प्रिय भ्राता भ्रेगु को देखा और स्नेहवश उन्हें गले लगाने के
13:37लिए अपने आसन से उठे
13:40महादेव अपने स्वाभाविक प्रेम और दयालुता से भरे भ्रेगु की ओर बढ़े उन्हें अपना भाई मानकर एक हार्दिक आलिंगन देना
13:48चाहते थे
13:50परंतु भ्रेगु ने शिव के प्रेम भरे आलिंगन को अस्वीकार करते हुए उनके दिव्य स्वरूप और तपस्या का अपमान करते
13:58हुए कठोर शब्दों का प्रयोग किया
14:01उन्होंने महादेव को अंधकार में अशून्य और अपवित्र कहकर संबोधित किया जिससे ब्रहमांड में एक पल के लिए सन्नाट आचा
14:09गया
14:11भ्रेगु के अपमान जनक और निंदनिय शब्दों ने शिव के शान्त स्वभाव को जख जोर दिया और उनके दिव्यनेत्रों में
14:18धीरे-धीरे क्रोध की ज्वाला धधकने लगी
14:22महादेव का मुखमंडल जोक्षन भर पहले प्रेम से भरा था अब एक भयंकर रुद्र रूप में परिवर्तित होने लगा उनकी
14:30भौहें तन गई और होंट कस गए
14:33इस अपमान से व्यथित होकर स्रिष्टी के संहारक ने अब अपनी भुजा को अपने प्रिय अस्त्र दिव्य त्रिशूल की ओर
14:41बढ़ाया जिसे धारन कर वे ब्रहमांड का विनाश कर सकते थे
14:46शन भर में महादेव ने अपने प्रचंड त्रिशूल को अपनी शक्तिशाली भुजा में उठा लिया जिससे कैलाश कांप उठा और
14:54स्वर्गलोक में हाहाकार मच गया
14:58तभी अपनी दिव्य द्रिश्टी से सब कुछ देख रही देवी पारवती जो अपने पती के क्रोध से परिचित थी तुरंट
15:05उस स्थान पर प्रकट हुई
15:08उन्होंने महादेव के भयानक रूप और उनके हाथ में विनाशकारी त्रिशूल को देखा और समझ गई कि स्थिती कितनी गंभीर
15:16थी
15:18पारवती ने तुरंट अपने पती के समक्ष आकर उनकी क्रोधित आखों में देखा और अपनी शांत करुणामई द्रिश्टी से उनके
15:26रुद्र रूप को शांत करने का प्रयास किया
15:29देवी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और महादेव के बलशाली हाथ को जिसमें त्रिशूल था धीरे से पकड़ लिया जैसे
15:38वे उनकी प्रचन शक्ती को नियंत्रित कर रही हो
15:42उनके स्पर्ष मात्र से महादेव के अंदर का क्रोध कुछ पल के लिए थम गया और त्रिशूल से निकलती विनाशकारी
15:50उर्जा थोड़ी शांत होने लगी
15:53पारवती ने नमरता से परग्रिडता से महादेव से बात की उन्हें याद दिलाया कि उनका क्रोध ब्रहमांड के लिए कितना
16:01विनाशकारी हो सकता है और उन्हें सन्यम बरतने का आगरह किया
16:06धीरे धीरे देवी पार्वती की प्रेमपूर्ण मध्यस्थता और उनके शांत शब्दों से शिव का प्रचंड क्रोध शांत होने लगा और
16:15उन्होंने अपने हाथ से त्रिशूल नीचे कर दिया
16:19महादेव के क्रोध के पूर्णत है शांत हो जाने और उनके सहज शांत स्वरूप में लौट आने पर महर्शी भ्रेगु
16:26ने गहरी द्रिश्टी से उन्हें निहारा उनके शक्तिशाली सन्यम की परीच्षा को स्विकार करते हुए यद्यपी उनके भीतर के क्रोध
16:34की ज्वाला
16:35को महसूस किया भ्रेगु ने मन ही मन स्विकार किया कि महादेव शक्तिशाली तो थे परंतु उनका क्रोध ब्रहमांड को
16:44विचलित करने की क्षमता रखता था जो उनकी तपस्या और धैर्य की अगनिप्रीक्षा में एक चुनौती थी
16:52अपने मन में तीनों देवों के स्वभाव का मूल्यांकन करते हुए महर्शी भ्रेगु ने अब अपनी अंतिम और निर्नायक परीक्षा
17:00के लिए भगवान विश्णू की ओर प्रस्थान करने का द्रिध निश्चय किया
17:05जैसे ही भ्रेगु रिशी कैलाश परवत से निकले वे ब्रहमांड के अनंत विस्तार में विभिन लोकों और नक्षत्रों को पार
17:13करते हुए वैकुंठ लोक की ओर अग्रसर हुए उनकी गती दिव्य शक्ती से परिपूर्ण थी
17:20शीघ्र ही उन्होंने क्षीरसागर के उपर स्थित वैकुंठ लोक के सुनहरे द्वार को देखा जो दिव्य उर्जा और शांती से
17:28उतप्रोत था जहांसे स्वर्गिय सुगंध और मधुर संगीत की ध्वनी आ रही थी
17:34भ्रेगु रिशी बिना किसी अनुमती के अपने कठोर तप के बल पर सीधे वैकुंठ लोक के भीतर प्रवेश कर गए
17:42उनकी दिव्य आभाने सामान्य प्रोटोकॉल को पार कर लिया
17:47वैकुंठ का वातावर्ण अत्यंत शांत और मधुर था जहां हर कण में दिव्य आनंद और प्रेम का अनुभव हो रहा
17:54था और भ्रेगु रिशी ने इस पवितर भूमी की अतुलनिय सुन्दर्ता को महसूस किया
18:00अपनी परीक्षा की अंतिन घडी निकट जानकर घ्रेगु रिशी सीधे क्शीरसागर के तटकी ओर बढ़े जहां उन्होंने ब्रहमांड के पालक
18:09को विश्राम करते हुए देखने की आशा की
18:13और फिर उनके सामने वह अविस्मनिय द्रिश प्रकट हुआ भगवान विश्नुक शीरसागर के अनंत जल पर विशाल शेशनाग के फनों
18:22के नीचे अनंत निद्रा में लीन थे और देवी लक्षमी उनके चर्णों की सेवा कर रही थी
18:29भगवान विश्नुका मुखमंडल दिवे शान्ती से आलोकित था उनकी चार भुजाय शस्त्रों को धारण किये हुए थी किन्तु उनका संपूर्ण
18:38विग्रह ब्रहमांडिय स्थिर्ता का प्रतीक था
18:41देवी लक्षमी जिनका स्वर्णमय रूप अनुपम सौंदर्य से दमक रहा था अत्यन्त श्रद्धा और प्रेम से भगवान के चरण दबा
18:50रही थी उनकी सेवा में कोई बाधा नहीं थी
18:54इस शांति पूर्ण और भक्तिमय द्रिश को देखकर भ्रेगु के मन में एक क्षण के लिए विचार उठा कि क्या
19:01यह शांती ही सर्वोच्छता का वास्तविक प्रमान है या यह भी एक आवर्ण मात्र है
19:08अपने उद्देश को अटल रखते हुए भ्रेगु ने यह अंतिम और कठोर परीक्षा लेने का संकल्थ किया ताकि वे तीनों
19:16लोकों के वास्तविक पालक की पहचान कर सकें
19:20धीरे धीरे किंटु द्रिर्ता से भ्रेगु रिशी बिना किसी को सूचित किये भगवान विश्नु के समीप पहुँचे उनके चर्णों की
19:28सेवा में लीन देवी लक्षमी को भी इस आने वाले घटनाक्रम का आभास नहीं हुआ
19:34एक गहरे श्वास के साथ उन्होंने अपने दाहिने पैर को उपर उठाया उनकी आखों में एक निरनायक चमक थी जो
19:43उनके गंभीर इरादे को दर्शा रही थी
19:46बिना किसी हिचकी चाहट के महर्शि भेगु ने अपने पैर से सीधे भगवान विश्णू के विशाल वक्षस्थल पर प्रहार किया
19:54मानों उन्हें उनकी गहन निद्रा से अप्रत्याशित रूप से जगा रहे हूँ
19:59इस अप्रत्याशित प्रहार से भगवान विश्णू ने अपनी आखे धीरे-धीरे खोली उनकी द्रिश्टी पहले भ्रमित थी फिर उसमें सौमें
20:09आश्चर्य की जलक दिखाई दी
20:12भगवान के चर्णों में बैठी देवी लक्ष्मी का मुख मंडल उस प्रहार को देखकर भय और क्रोध से विचलित हो
20:19उठा उनकी सुन्दर्ता क्षन भर के लिए चिन्ता की रेखाउं से घिर गई
20:24परंतु भगवान विश्णू ने तुरंथ ही अपने दिव्य स्वभाव का परिचय देते हुए क्रोध या प्रतिकार के बजाए एक शांत
20:32और प्रेमपूर्ण मुस्कान के साथ रिशी भेगु की ओर देखा
20:38अविश्वस्निय विनमर्ता और क्षमा के साथ भगवान विश्णू ने भेगु रिशी से कहा है महरशी क्षमा करें क्या मेरे कठोर
20:46वक्षस्थल से आपके कोमल चर्णों को चोट तो नहीं पहुँची
20:50अगाध करुणा से भरे भगवान विश्णू के हाथ अत्यंत विनमर्ता के साथ तुरंत महरशी भेगु के चर्णों की ओर बढ़े
20:58उनकी आखों में परम चिन्ता और आदर का भाव छलक रहा था
21:03भगवान विश्णू ने अपनी सहज दयालुता का परिचय देते हुए रिशी भेगु के चर्णों को धीरे से अपनी गोद में
21:11ले लिया मानों वे किसी अन्मोल रत्न को सहज रहे हूँ
21:16देवी लक्ष्मी जो भगवान के चर्णों के पास विराज मान थी अपने प्रभू की इस अप्रत्याशित नमर्ता को देख कर
21:24अचम्भित और भावुक द्रिश्टी से उन्हें निहारती रही उनके मुख मंडल पर अवर्णनिय भावनाय उमड रही थी
21:32महर्शी भेगु जो अपने क्रोध में थे अब भगवान विश्णु के इस अप्रत्याशित आचर्ण से पूरी तरह से स्तब्ध और
21:40भ्रमित खड़े थे उनका शरीर क्षण भर के लिए जडवत हो गया था
21:45भगवान विश्णु ने अपने मुख पर शांत भाव धारन किये हुए अत्यंत कोमलता से महर्शी भेगु के चर्णों की मालिश
21:53करना आरंब किया उनकी यह सेवा असीम करुणा से परिपूर थी
21:59एक खिलते हुए कमल के समान मृदुस्वर में भगवान विश्णु ने अपनी विनमर्ता भरी बात जारी रखते हुए विशी के
22:07कोमल चर्णों को पहुँचे किसी भी संभावित कष्ट के लिए गहरा खेद व्यक्त किया
22:13महर्शी भेगु के मुखमंडल पर एक धीमा परिवर्तन आया उनकी प्रारंभिक घबराहट धीरे धीरे गहरी श्रद्धा और पश्चाताप की भावना
22:22में बदलने लगी
22:24भगवान विश्णु ने अपने दिव्यक्रिपा से समझाया कि उनका वक्षस्थल वजर के समान कठोर है और उन्हें यह भय है
22:33कि इससे रिशी के अत्यंत कोमल चर्णों को कहीं चोट न पहुँच गई हो
22:38अपने प्रभु की असीन करुणा और नमरता से अभिभूत होकर देवी लक्ष्मी की बड़ी अभिव्यंजक आखों में धीरे धीरे शांत
22:47अश्रु उमड आये जो उनके हृदय की गेहन भावनाओं को दर्शा रहे थे
22:53रिशी भेगु के चरण अभी भी अपनी गोद में लिये हुए भगवान विश्णों ने विनमरता पूर्वक उनसे अपने वक्षस्थल को
23:01आशिरवाद देने का अनुरोध किया जिसे वे अब उनके पवित्रस पर्ष से शुद्ध मानते थे
23:08श्रिश्थता की परीक्षा से भरा महर्शी भेगु का हर गय अब भगवान की इस असाधारन दिव्य नमरता को देख कर
23:15पूरी तरह पिघल गया वे ऐसी अकलपनिय करुणा को समच नहीं पा रहे थे
23:21भगवान विश्णू ने रिशी भेगु द्वारा किये गए प्रहार को एक पवित्र आशिर्वाद बताते हुए इस घटना को अपने लिए
23:29एक बहुत बड़ा सम्मान बताया जिससे रिशी के मन में गहरा पश्चाताप उभ्या
23:35ब्रहमांड के अद्रिश्य लोकों में इस असाधारन घटना की फुस्पुसाहट फैलने लगी क्योंकि दिव्य प्राणी भगवान विश्णू की सर्वोच्च सहनशीलता
23:45और अनुपम विनमर्ता से चकित थे
23:48परम गंभीर्ता के साथ भगवान विश्णू ने घोशना की की महर्शी भेगु के चरण का चिनह उनके दिव्य वक्षस्थल पर
23:56सदैव एक शाश्वत आभूशन एक पूजनिय प्रतीक के रूप में अनकित रहेगा
24:02महर्शी भेगु की आखों में अब पश्चाताप और भक्ती के आसू भराए वे भगवान विश्णू के सक्चे, सर्वव्यापी और परोपकारी
24:11स्वरूप को पूरी तरह से समझ गए थे
24:15भगवान विश्णू ने अपने मुकुटधारी सिर को थोड़ा जुका कर रिशी के प्रती अंतिम आदर और विनय प्रदर्शित किया, उनकी
24:23विनमर्ता की कोई सीमा नहीं थी
24:26भगवान की अतुलनिय प्रतिक्रिया से अभिभूत होकर महर्शि भेगु को कोई शब्द नहीं सूज रहे थे, उनका गलाभावनाओं और बोध
24:35से रुन्ध गया था
24:37देवी लक्ष्मी अभी भी अपनी दिव्य मुद्रा में बैठी हुई, अपने करोणा में प्रभु के प्रती मौन कृत अज्यता का
24:45एक प्रार्थना अर्पित कर रही थी, उनका हृदय प्रेम और प्रशंसा से परिपूर्ण था
24:51भगवान विश्णु ने महर्शी भेगु को एक कोमल आश्वस्थ करने वाली मुस्कान दी, जिससे रिशी को उनके शुद्ध इरादों और
24:59किसी भी प्रकार के द्वेश की पूल्न अनुपस्थिती का आभास हुआ
25:04अन्तह भगवान विश्णु की असीम क्रिपा से पूरी तरह तूटकर महर्शी भेगु भूमी पर गिर पड़े और शुद्ध मिलावट रहित
25:13भक्ती के एक भाव में प्रभु के चर्णों में साश्टान प्रणाम किया
25:18महर्शी भेगु अपनी समस्थ अज्यानता और दर्प को त्याग कर प्रभु के चर्णों में अश्रुपूर्ण हृदय से पड़ा था उसकी
25:26आत्मा शुद्ध पश्चाताप से परिपूर्ण थी
25:30भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य करुणा से उतप्रोत होकर धीरे से अपना कोमल हाथ उठाकर महर्शी भेगु के सिर पर
25:37रखा उन्हें अपनी असीम दया का अनुभव करा रहे थे
25:42प्रभु के स्पर्ष से महर्शी भेगु के शरीर में एक अध्भुत उर्जा का संचार हुआ जिससे वे धीरे धीरे उठकर
25:50प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए उनके होंट काप रहे थे
25:55देवी लक्ष्मी अपनी कमल जैसी आखों से महर्शी भेगु की ओर देख रही थी उनके चहरे पर किसी भी द्वेश
26:03का नामों निशान नहीं था केवल शुद्ध और निर्मल करुणा ही जलक रही थी
26:09भगवान विश्नु ने अपनी दिव्यवानी में कहा के महर्शी भेगु मैंने तुम्हे क्षमा किया क्योंकि तुम्हारे हृदय में कोई कपट
26:17नहीं था केवल सत्य की खोज की प्रबल इच्छा थी
26:22महर्शी भेगु ने भगवान विश्णु की यह अकलपनिय सहनशीलता और विनमर्ता देखकर महसूस किया कि वही परमसत्य और सर्वोच ब्रहमा
26:31है
26:33उन्होंने भगवान विश्णु के नीले मेघसमान शरीर, चतुर्भुज रूप और श्रीवत्स चिन्ह में समस्त ब्रहमांड का आश्रय देखा, जिससे उनकी
26:42सभी शंकाये दूर हो गई
26:45भ्रेगु को अपनी पुरानी भूले याद आई, जब उन्होंने अहमकारवश तीनों लोकों के देवों की परीक्षा लेने का दुस्सा हस
26:53किया था
26:55उन्होंने स्मरण किया कि कैसे ब्रहमा और शिव ने उनके क्रोध पर तीवर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जबकि भगवान विश्णू
27:03ने उन्हें पूर्णतर सहन किया था
27:06इस तुल्ना ने उनके हृदय को शुद्ध भक्ती के एक अवर्णनिय आनन्द से भर दिया, जिससे उनकी आत्मा प्रभो के
27:13प्रेम में लीन हो गई
27:15उनकी आत्मा से स्वतही स्थुती के शब्द फूट पड़े, जैसे सूखे रेगिस्तान में जीवंदाई जल्धारा प्रवाहित हो रही हो
27:25आरंभ में उनकी वानी लडखडा रही थी, पर जैसे जैसे वे भगवान विश्णों की महिमा का गुनगान करते गए, उनका
27:33स्वर्द्रिड और आत्म विश्वास से भर गया
27:36आकाश में देवगन और सिध्धजन अद्रिश रूप से इस अद्भुत द्रिश को देख रहे थे, महर्शी भ्रेगु की भक्ती से
27:44भावविभोर हो उठे
27:46भगवान विश्णुने भ्रेगु की इस निर्मल भक्ती और हृदय परिवर्तन को देख कर एक सौमे मुस्कान बिखेरी जो समस्थ लोकों
27:55को प्रकाशित कर रही थी
27:57भ्रेगु ने घोशना की की भगवान विश्णु ही परम सत्वगुन के साक्षात स्वरूप हैं, जो समस्थ स्रिष्टी के पालक और
28:05आधार है
28:08उन्होंने समझाया की अन्य देवगन चाहे जितने भी शक्तिशाली हो, केवल भगवान विश्णु ही हैं, जो बिना किसी प्रतिक्रिया के
28:16सब कुछ सह सकते हैं और क्षमा कर सकते हैं
28:21भेगु को स्पष्ट हो गया की वे ही समस्थ लोकों के आश्रे, परम शांती के प्रदाता और मोक्ष के मार्ग
28:27दर्शक हैं
28:30उनके हृदय से सारी शंकाएं और अहंकार पूर्णता मिट गए, और वे एक नए दिव्य अनुभव से भर गए, जिसे
28:38उन्होंने कभी सोचा भी न था
28:41महर्शी भेगु ने स्वयंको पाप और संशय के समस्थ भार से मुक्ट पाया, उनकी आत्मा अब परम शुद्धता और शांती
28:49में विलीन हो गई थी
28:51अंतह परम ज्यान और असीन भक्ती से उतप्रोत होकर, महर्शी भेगु ने पुनह भगवान विश्नु के चर्णों में साष्टान प्रणाम
28:59किया, इस बार पूर्ण श्रधा और आनंद के साथ
29:04परम आनंद और आत्मिक शुद्धी की अनुभूती से उतप्रोत महर्शी भेगु ने वैकुंठ लोक से पृत्वी की और अपनी यात्रा
29:12पुनहा आरंभ की, उनका हृदय अब किसी भी संशय से परे, केवल भक्ती के प्रकाश से जग्मगा रहा था
29:20आकाश मार्ग से नीचे उतरते हुए, भेगु रिशी ने अपने अंतर्मन में उस अद्वितिय सहनशीलता और प्रेन को बार-बार
29:28स्मरण किया जो उन्होंने भगवान विश्नु के चर्णों में अनुभव किया था, जिसने उनके समस्त पूर्वाग्रहों को भस्म कर दि
29:41महर्शी भ्रिगु उस पवित्र सरस्वती नदी के तट पर अवत्रित हुए जहां अनेक रिशिमुनी उनकी प्रतीक्षा में एकत्रित थे, उनकी
29:49आखों में जिग्यासा और उचसुक्ता चमक रही थी
29:53उन्हें देखकर समस्त रिशी समुदाय में एक हलचल मची, सभी अपने स्थानों से उठ खड़े हुए और श्रद्धा पूर्वक उस
30:02महान संत की ओर उन्मुक हुए जिन्होंने तीनों लोकों की यात्रा कर सत्य की खोज की थी
30:09महर्शी भेगु ने शान्तचित होकर विशिस मुख की ओर देखा, उनके चहरे पर अब कोई क्रोध या निराशा नहीं थी,
30:16केवल एक गहरी शान्ती और सर्वव्यापी प्रेम का भाव परिलक्षित हो रहा था
30:22सभी रिशियों ने एक स्वर में उनका अभिनंदन किया, स्वागत है, हे महर्शी भेगु
30:29हमें विश्वास है कि आप उस सत्य के साथ लोटे हैं, जिसकी हम सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं
30:37प्रमुख रिशियों में से एक ने आगे बढ़कर कहा, हे तपस्वी, कृप्या हमें बताईए कि आपकी यह पवित्र यात्रा कैसी
30:45रही और क्या आपने त्रिदेवों में से किसी एक की सर्वोच्चता सिद्ध कर ली है
30:51घ्रेगु रिशी ने एक क्षण के लिए अपनी आखें बंद कर ली, जैसे वे अपने भीतर उस गेहन अनुभव को
30:58फिर से जी रहे हो, उनके हुठों पर एक हलकी रहस्यमय मुस्कान तैर रही थी
31:04फिर उन्होंने अपनी आखें खोली और अपनी शांत, गंभीर आवाज में अत्यंत सम्मान और स्पश्टता के साथ अपने अध्भुत अनुभवों
31:14का वर्णन करना आरंभ किया
31:17उन्होंने सर्वप्रथम ब्रहमलोग का वर्णन किया, जहां ब्रहमाजी अपने राजसी सिनहासन पर विराजमान थे, उनके चारों मुख वेदों का उच्चारण
31:26कर रहे थे, और उनके चारों और दिव्य प्रकाश फैल रहा था
31:32भ्रहमाजी ने बताया कि जब उन्होंने ब्रहमाजी को प्रणाम किये बिना अभिमान पूर्वक उनके समक्ष प्रवेश किया, तो ब्रहमाजी के
31:40मन में क्षनभर के लिए क्रोध उत्पन हुआ, पर उन्होंने उसे अपने ही भीतर दबा लिया
31:47ततपश्चात धेगु रिशी ने कैलाश परवत की और अपनी यात्रा का वर्णन किया, जहां भगवान शिव अपनी शक्ती माता पारवती
31:55के साथ नंदी पर विराज मान थे, उनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही थी
32:01उन्होंने बताया कि जब वे शिव जी के समक्ष उनके ध्यान में बाधा डालते हुए पहुँचे, तो क्रोधित शिव जी
32:08ने उन्हें दंडित करने के लिए अपना त्रिशूल उठाया, उनके नेत्रों से अगनी प्रजवलित हो उठी
32:16भ्रेगु ने इस घटना को बड़ी व्यथा के साथ सुनाया, यह बताते हुए की कैसे माता पार्वती ने बीच बचाव
32:23कर शिव जी के क्रोध को शांत किया, जिससे वे एक बड़े प्रकोप से बच गए
32:28अंत में उन्होंने वैकुंठ लोग की भव्यता का वर्णन किया, जहां भगवान विश्नु अपनी अनंत शक्ती देवी लक्ष्मी के साथ
32:37शेशनाग पर आरामदायक मुद्रा में विराजमान थे, और समस्त ब्रहमांड उनसे उद्भूत हो रहा था
32:45भ्रेगु ने कापते हुए स्वर में बताया कि कैसे उन्होंने अपनी अंतिम परीक्षा में भगवान विश्नु की छाती पर पैर
32:53का प्रहार किया, और विश्नु ने बिना किसी क्रोध के उन्हें क्षमा कर दिया
32:58उन्होंने आखों में अश्रु भरकर कहा कि भगवान विश्णु ने न केवल उनके अपराध को क्षमा किया बल्कि उनके चर्णों
33:06को सहलाते हुए अपने हृदय में उत्पन पीडा के लिए क्षमा मांगी यह अद्भुत दयालुता का प्रतीक था
33:14घ्रेगु रिशी ने अपनी आवाज को उचा करते हुए घोशना की इस प्रकार मैंने तीनों लोकों में भ्रमण कर यह
33:22निश्कर्ष निकाला है कि भगवान विश्णु ही सर्वोच देवता हैं जो असीम शांती, शमा और प्रेम के प्रतीक है
33:31जह सुनकर सरस्वती के तटपर उपस्थित सभी रिशिमुनी अवाक रह गए, उनके मन से सभी संदेह मिट गए और एक
33:39नए दिव्य ज्ञान के प्रकाश से उनके हृदय भर उठे
33:43एक स्वर में सभी रिशियों ने भगवान विश्णु की जैजयकार की, उनकी सर्वोच चता को स्वीकार करते हुए और उनके
33:51गुनों का गुनगान करते हुए, जिससे संपूर्ण वातावर्ण दिव्य उर्जा से भर गया
33:58धरेगु रिशी के प्रकर उद्गोश और रिशियों की जैजयकार के पश्चात, सरस्वती के तटपर पसरा सन्नाटा अब एक गहरी, अंतरध्यान
34:07करने वाली शान्ती में बदल गया, जहां प्रत्येक हृदय सत्य की नवीन किरन से प्रकाशित हो उठा था
34:14एक व्रिध तपस्वी रिशी, जिनकी दाढ़ी उनकी चाती तक लटक रही थी, ने धीरे से आखें खोली और अपनी आवाज
34:23में गहरा सम्मान भरते हुए बोले, हमने इतने युगों तक जिस परम सत्य की खोज की, वह आज भेगु के
34:30तप और साहस से हम सभी के समक्ष प्
34:43जिनके हृदय में स्रिष्टी के प्रती असीम करुणा और क्षमा का अथा सागर लहराता है, जबकि अन्य देवता अपनी अपनी
34:51मर्यादाओं में बंधे रहे।
35:13एक दिव्य आभा से घिरे हुए बैठे थे, उनके मुखमंडल पर संतोश और शांती का एक अवर्णनिय तेज चमक रहा
35:21था, मानो उन्होंने स्रिष्टी का सबसे बड़ा रहस्य उजागर कर दिया हो।
35:44उनके शब्दों ने रिशियों के मन में धर्म के सिध्धानतों की एक नई व्याख्या दी, जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो
35:51गया कि वास्तविक धर्म केवल पूजा पाठ में नहीं, बलकि सार्वभावमिक प्रेम और अहिंसा में नहित है।
35:59सभी ने एकमत होकर संकल्प लिया कि वे इस शाश्वत सत्य को तीनों लोकों में फैलाएंगे, ताकि प्रत्येक प्राणी भगवान
36:07विश्नु की सच्ची महिमा को जान सके और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सके।
36:13इसी क्षणक वीना के मधूर तारों से एक दिव्य संगीत गुंजाय मान हुआ और नारद मुनी अपनी वीना लिये हुए,
36:21सभा के बीच आप पहुँचे, उनके मुख पर एक दिव्य मुस्कान और आखों में गहरा ज्यान जलक रहा था।
36:28नारद ने सभी रिशियों को प्रणाम किया और भक्तिभाव से बोले हे पूज रिशियों।
36:57प्रचारक होगे, तुम्हारी यात्रा सफल हो।
37:01नारद ने खुशी से अपने सिर को जुकाया, अपनी वीना को उठाया और एक अंतिन प्रणाम के साथ आकाश की
37:09ओर उर चले, उनका हृदय एक महान उद्देश के साथ प्रजवलित था।
37:14नारद के प्रस्थान के बाद, शेश रिशियों ने भगवान विश्नु की महिमा को और अधिक गहराई से समझने के लिए
37:22अपनी चर्चा जारी रखी, विभिन शास्त्रों और पुराणों से उदाहरन प्रस्तुत करते हुए।
37:28सरस्वती के तटपर एक पवित्र और शांत वातावर्ण छा गया, जहां हवा में भी ज्ञान और भक्ती का स्पर्श महसूस
37:36किया जा सकता था।
37:37तक पश्चात सभी रिशियों ने एक साथ मिलकर भगवान विश्नु के पवित्र नामों का जाप करना शुरू किया, जिससे समपून
37:46वातावर्ण हरी ओम की ध्वनी से गूंज उठा और एक शक्तिशाली दिव्यकंपन उत्पन हुआ।
37:53उनके अटूट विश्वास और भक्ती से प्रसन होकर स्वर्ग से सुगंधित दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी, मानो स्वयन देवगण
38:02भी इस अग्भुत क्षण के साक्षी बन रहे हूं।
38:05धीरे धीरे संपूर्ण सभा से एक सुख्ष्म स्वर्णिम प्रकाश निकलने लगा, जो न केवल रिशियों के चहरों को बलकी उनके
38:14आसपास की भूमी और जल को भी प्रकाशित कर रहा था।
38:19अद्रिश लोकों से भी कई दिव्य प्राणी और गंधर्व इस पावन द्रिश को श्रधापूर्वक निहार रहे थे, इस सत्य की
38:27उद्गोशना को अपने हृदय में अनकित कर रहे थे।
38:31प्रित्वी स्वयन इस नवस्थापित सत्य की उर्जा से कमपन कर रही थी, जैसे कि स्रिष्टी के कणकण ने भगवान विश्णू
38:39की परम श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया हो।
38:42अंतिम रूप से सभी रिशियों ने एक साथ उठकर भगवान विश्णू के नाम का जैगोश किया और प्रतिज्याली की वे
38:50अपने शेश जीवन में इस परम ज्ञान का प्रचार करेंगे, ताकि जगत में धर्म की स्थाप ना हो सके।
38:57सभी रिशियों के जैगोश के शान्थ होने पर महर्शी भेगु ने एक गंभीर और शान्थ मुद्रा में आगे बढ़कर सभा
39:05को सम्बोधित किया, उनके नेत्रों में गहरे ज्ञान की चमक थी।
39:10भ्रेगु रिशी ने अपनी यात्रा का उद्देशिस पश्ट किया कि उनका लक्षित रिदेवों के गुनों को समझना था, ताकि जगत
39:18को परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का ज्यान प्राप्थ हो सके।
39:22उन्होंने समझाया कि भगवान विश्णों की परम सहनशीलता और शांत स्वभाव ही उनकी सर्वोच्चता का प्रमान है, क्योंकि वे समस्त
39:31स्रिष्टी को बिना किसी भेदभाव के धारन करते हैं।
39:36महर्शियों ने इस नवीन अंतरग्रिष्टी को स्विकार किया, यह समझते हुए कि वास्तविक शक्ती अहंकार में नहीं, बलकि शांत, धैर्य
39:45और सर्वव्यापी प्रेन में नहित है।
39:49इस घटना ने न केवल देवताओं और रिशियों के मन में, बलकि तीनों लोकों में भी परमिश्वर की भक्ती के
39:56सही अर्थ को स्थाई रूप से स्थापित कर दिया।
40:00दूर-दूर के आश्रमों और गुफाओं में बैठे तपस्वी भी इस दिव्य संदेश को अपनी अंतरात्मा में महसूस कर रहे
40:07थे, मानो वायू में एक नई पवित्र उर्जा व्याप्त हो गई हो।
40:13भक्ती का मार्ग अब स्पष्ट हो गया था, यह न तो कठोर तपस्या में था और नहीं जटिल अनुष्ठानों में
40:20बलकी हृदय की पवित्रता और ईश्वर के प्रती अटूट समर्पण में था।
40:25जो जीव अहमकार और क्रोध से परे होते हैं, वही वास्तव में परमेश्वर के प्रिय होते हैं और उनहीं को
40:33परमशांती की प्राप्ती होती है।
40:36यह ज्यान जन्वरी से जन्वरी तक फैलने लगा, जैसे वसंत रितु में एक सुगंधित पवन हर दिशा में फैल जाती
40:44है, हर हृदय को शुद्ध करती हुई
40:47श्रद्धालू ने अब भगवान विश्णू के प्रती अपनी भक्ती को और भी द्रिड़ता से प्रकट करना शुरू किया, उनकी करुणामय
40:55प्रकृती का स्मरण करते हुए
40:58विश्णू की परम सहिश्णुता और प्रेम ही वह शक्ती है, जो जीव को माया के बंधन से मुक्त कर परम्ती
41:05प्रदान कर सकती है
41:08यह सत्य की परमेश्वर केवल प्रेम और सहिश्णुता से ही प्राप्थ होते हैं, सभी आध्यात्मिक मारगों का अंतिन निशकर्ष बन
41:16गया
41:17इस रहस्य को समझने वाले भक्त जन्मण के चक्र से मुक्त होकर भगवान विश्णु के परम धाम वैकुंठ की ओर
41:24अग्रसर हुए
41:27वैकुंठ जहां हर कण में भगवान विश्णु की उपस्थिती है, वह परम आनंद और शान्ती का स्थान है जहां जीव
41:34को शाश्वत मोक्ष मिलता है
41:37स्वया भगवान विश्णु ने वैकुंठ में अपने परम स्वरूप में विराज मान होकर इस भक्तिमय उद्गोशना पर मंदमंद मुस्कुराते हुए
41:46संसार पर अपनी क्रिपा बरसाई
41:49यह प्रकरण भक्तों को यह शिक्षा देता है कि परमिश्वर का स्वभाव, शान्त, करुणामे और सर्वस हिश्णु होता है और
41:57यही वह गुन है जो उन्हें सबसे प्रिय है
42:02वास्तविक भक्ती का मार्ग केवल उन्ही के चर्णों में है, जो अहंकार और क्रोध से परे होकर सभी प्राणियों के
42:09प्रती प्रेम और दया रखते हैं
42:13भगवान विश्णों की ऐसी परम सहिश्णुता और प्रेम ही जीव को इस भौतिक संसार के बंधन से मुक्त कर परम्ती
42:20प्रदान करने में सक्षम है
42:23और इस प्रकार भेगु रिशी की अगनिप्रीक्षा ने यह अटल सत्य स्थापित किया कि ब्रहमांड के परमशासक, सहिश्णुता और प्रेम
42:32के प्रतीक भगवान विश्णु ही है
42:36चारों दिशाओं में इस परम ज्यान की गूंच फैल गई, जिससे भक्तों के हृदय में भगवान विश्णु के प्रती अटल
42:43श्रद्धा और प्रेन का दीपक प्रजवलित हो उठा