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कुरुक्षेत्र के विशाल मेले में, जहां भगवान श्रीकृष्ण अपनी रानियों और परिजनों के साथ उपस्थित थे, वहां वृंदावन के समस्त निवासी - नंद महाराज, यशोदा मैया, गोप और गोपियां - भी एक सूर्य ग्रहण के अवसर पर आ पहुंचते हैं। इस भावुक एपिसोड में, वर्षों के विरह के बाद श्रीकृष्ण का अपने बचपन के साथियों और पालकों से अद्भुत पुनर्मिलन होता है। गोपियों का प्रेम, नंद और यशोदा का वात्सल्य और उद्धव व बलराम के ज्ञानवर्धक संवाद इस कथा को और भी मार्मिक बनाते हैं। देखिए कैसे भक्ति, प्रेम और ज्ञान का संगम कुरुक्षेत्र की इस भूमि पर एक अविस्मरणीय लीला रचता है। #KrishnaLeela #Kurukshetra #Vrindavan #BhagavataPurana #NandYashoda #Gopis #UddhavGyan #Balaram #HinduMythology #SpiritualJourney #DivineReunion #SrimadBhagavatam #AncientIndia #BhaktiYoga #LordKrishna #MythologyExplained
Transcript
00:00कुरुक्षेत्र की पावन भूमी का विहंगम और भव्यद रिश जहां सूर्य ग्रहन के अफसर पर पवित्र स्नान के लिए देश
00:07के कोने-कोने से आए लाखों श्रद्धालूओं का असीन जनसमू एकत्रत हुआ है।
00:14आकाश में सूर्य देव पर धीरे-धीरे ग्रहन का साया मंदराने लगता है, जिससे पूरे कुरुक्षेत्र पर एक रहस्यमेई, दिव्य
00:22और सुनहरी बैंगनी आभा फैल जाती है।
00:25पवित्र समंत पंचक सरोवर के तट पर बैठे तपस्वी रिशिमुनी अपने हाथ में कुश और पात्र लेकर सूर्य देव की
00:34आराधना में गंभीर वैदिक मंत्रोच्चार कर रहे हैं।
00:39आर्यावर्थ के कोने-कोने से आये प्रतापी राजाओं के भव्यरत, सजेद्य विशाल हाथी और लहराते हुए स्वर्णध्वज इस धार्मिक समागम
00:48की गरिमा को बढ़ा रहे हैं।
00:51भारतवर्ष के विभिन राज्यों से आये साधारन नागरिक, महिलाये और बच्चे अपने हाथों में पूजन, सामगरी और दान की वस्तुए
00:59लिए भक्तिभाव से सरोवर की ओर बढ़ रहे हैं।
01:04कुरुक्षेत्र के पश्चिमीक शितिच पर उर्ती हुई स्वर्ण धूल और दिव्य चमक इस बात का संकेत देती हैं कि द्वारका
01:12से यादवों की विशाल सेना और राजपरिवार का आगमन हो रहा है।
01:17चार श्वेत घोडो द्वारा खीचे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक रत के पहियों की गड़गडाहट से संपूर्ण कुरुक्षेत्र की
01:26भूमी गूंच उठती है।
01:28रत पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण अपने सामवले और दिव्य रूप में कुरुक्षेत्र की पावन धरा को देखकर मंदमंद मुस्कुरा रहे
01:37हैं।
01:39भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम अपने श्वेत वर्ण, नील वस्त्रों और हाथ में विशाल स्वर्ण हलधारन किये अपने दिव्यरत
01:48पर सवार होकर उनके साथ चल रहे हैं।
01:52पत्रानी रुक्मिनी अपने अलौकिक सौंदर्य और स्वर्ण आभूष्णों से सुसजजित होकर पालकी के गवाक्ष से कुरुक्षेत्र की इस पावन और
02:01एतिहासिक भूमी को निहार रही हैं।
02:05अद्वितिय सौंदर्य और तेज से परिपूर्ण महारानी सत्यभामा अपने दिव्यरत पर सवार होकर कुरुक्षेत्र के इस अद्भुत धार्मिक मेले की
02:14शोभा बढ़ा रही हैं।
02:17द्वारका की अन्यपटरानिया जामबवती, कालिंदी और लक्षमना अपनी अपनी सुसजित पालकियों में बैठकर इस पवित्र तीर्थ स्थल की ओर अग्रसर
02:26हो रही हैं।
02:29भगवान श्रीकृष्ण के प्रतापी पुत्र प्रद्युम्न अपने सुवर्ण कवच और धनुषबान से सुसजित होकर यादव सेना की अग्रिम टुकडी का
02:37बड़ी वीर्ता से नेत्रित्व कर रही हैं।
02:41यादवों के परम आदरणिय महाराज उग्रसेन और व्रिद्ध वासुदेव विशाल एवं भव्य हाथियों पर सवार होकर अत्यंत शांत और गंभीर
02:50मुद्रा में आगे बढ़ रही हैं।
02:54भगवान श्रीकृष्ण की ममतामई माता देव की अपने रत की खिड़की से बाहर देखकर कुरुकशेत्र में उम्डे इस अपार जनसमुद्र
03:02को विस्मय से निहार रही हैं।
03:05द्वारका की अनुशासित और पराक्रमी सेना अपने हाथों में गरूर अंकित स्वन ध्वज लेकर पूरी गरिमा और शांती के साथ
03:14मार्ग पर आगे बढ़ रही है।
03:17द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की सूचना मिलते ही कुरुकशेत्र में उपस्थित संपूर्ण जनसमुव श्रद्धा और आदर से उनके स्वागत
03:26के लिए दोनों और खड़ा हो जाता है।
03:30महर्शी व्यास, विश्वामित्र और देवर्शी नारद जैसे महान संत जल के कलश और कुशा लेकर द्वारका के राजपरिवार का स्वागत
03:39करने के लिए आगे बढ़ते हैं।
03:42भगवान श्रीकृष्ण अपने रत से उतर कर जैसे ही कुरुक्षेत्र की पावन मृदा पर अपना चरण रखते हैं, संपूर्ण वातावर्ण
03:51में एक अपूर्व आध्यात्मिक उर्जा का संचार हो जाता है।
03:56सूर्य ग्रहन के इस परम पावन क्षण में कुरुक्षेत्र में उपस्थित सभी राजा, रिशी और आमजन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख
04:04श्रद्धा पूर्वक नत्मस्तक हो जाते हैं।
04:08भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सम्मुख नत्मस्तक हुए राजाओं, रिशियों और जनसामान्य को प्रेमपूर्वक उठाते हुए, अपनी दिव्य द्रिश्टी से कुरुक्षेत्र
04:18के विशाल जनसमुख का अवलोकन किया।
04:21उनकी द्रिश्टी विशाल पंडाल के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमती रही, मानो कोई अंदेखा सूत्र उन्हें किसी परिचित
04:30उपस्थिती की ओर खीच रहा हो।
04:33अचानक उनके हृदय में एक चिर परिचित मधूर स्मृती कौंध गई, जिसने उनके चहरे पर एक हलकी सी मुस्कान और
04:41आखों में गहरी को मलताला दी।
04:44इसी बीच कुरुक्षेत्र के मेले में व्रिंदावन से आय सरल हृदय गोपों और गोपियों का समूह भी अपने प्रिय कानहा
04:52की एक जलक पाने की उतकंठा में विशाल जन समूह के बीच से मार्ग बना रहा था।
04:59उनके अग्रिन पंक्ती में नंद महाराज और यशोदा मया थे, जिनकी आखों में वर्षों की प्रतीक्षा और अब मिलन की
05:07तीवर अभिलाशा साफ जलक रही थी।
05:11लंबी यात्रा की ठकान उनके चहरों पर स्पष्ट थी, किन्तु कानहा से मिलने की उम्मीड ने उनके हृद्यों में असीम
05:18उच्साह भर दिया था।
05:21व्रिंदावन की गोपिया हर एक चहरे पर वर्षों का विरह लिये अपनी आखों में कृष्ण की छवी को फिर से
05:28बसाने की लालसा से भीड में श्याम को ढूंड रही थी।
05:32भगवान बलराम जो श्री कृष्ण के बगल में खड़े थे, ने अपने भाई के बदलते भावों को भापते हुए उनकी
05:40दिशा में देखा और उनके हृदय में भी एक परिचित स्पंदन महसूस हुआ।
05:46उसी क्षण श्री कृष्ण की आखें भीड में से होकर उस छोटे से समोह पर स्थिर हो गई। और उन्हें
05:52महसूस हुआ कि उनका हृदय चिरकाल से जिस प्रेम की प्रतीक्षा कर रहा था। वह अब उनके सामने हैं।
06:01दूर से ही नंद महाराज, यशोदा मया और गोपियों की निगाहें भी श्री कृष्ण और बलराम पर पड़ गई। और
06:08उनके चहरे पर वर्षों का विशाद एक पल में उल्लास में बदल गया।
06:14हजारों लोगों की भीर के बीच भी समय मानो थम सा गया, क्योंकि आत्माओं का यह मिलन भौतिक दूरियों से
06:21परे एक अद्रिश्य बंधन से जुड़ा था।
06:25भगवान श्री कृष्ण की दिव्य नीली आखों से वर्षों के प्रेम और विरह के अश्रुधाराय बहने लगी, जो उनके हृदय
06:33की असीम पीरा और प्रेम को व्यक्त कर रही थी।
06:37उधर्प नंद महाराज के व्रिध चहरे पर अपने प्रिय कानहा को इतने वर्षों बाद देखकर एक पिता का असीम प्रेम
06:45और संतोष पष्ट रूप से उमड़ पड़ा।
06:49यशोदा मया का हरिदय जो इतने वर्षों से विरह की अगनी में जल रहा था, अब अपने लाल को देखकर
06:55मात्रि प्रेम की शीतल धारा में डूब गया और उनकी आखों से अश्रु बहने लगे।
07:02गोपिया जो वर्षों से कृष्ण के प्रेम में विवल थी, अपने श्याम को सामने देखकर भाव विभोर हो गई, उनके
07:09हुठों पर मधुर कृष्ण नाम और आखों में अश्रुधाराय बहने लगी।
07:15उन दोनों समुहों के बीच की दूरी, जो अभी तक अथाह लग रही थी, अब एक क्षण में मिटने वाली
07:22प्रतीत हुई, जैसे कोई अद्रिश शक्ती उन्हें एक दूसरे की ओर खीच रही हो।
07:28भगवान श्री कृष्ण अपनी सारी राजसी मर्यादाय भूल कर अपने वरिंदावन वासियों की ओर एक कदम बढ़ाया, उनके चर्णों में
07:37अपने बचपन की यादें और प्रेम उमड पड़ा।
07:41बलराम ने एक प्रेमिल मुस्कान के साथ श्री कृष्ण के कंधे पर हाथ रखा, मानों कह रहे हों की यह
07:47मिलन चिरकाल से नियत था।
07:50वरिंदावन के निवासी अब एक अटूट प्रवाह की तरह भीड को चीरते हुए श्री कृष्ण की ओर तेजी से बढ़ने
07:58लगे, उनके कदम में वर्षों की उच्सुकता और प्रेम का आवेग था।
08:03धीरे धीरे उनके और भगवान श्री कृष्ण के बीच का मार्ग स्पष्ट होने लगा, जैसे स्वयम प्रकृती भी इस पवित्र
08:11पुनर्मिलन की प्रतीक्षा कर रही हो।
08:14सबसे पहले समस्त वरिंदावन वासियों के बीच से नंद महाराज और यशोदा मया, जिनकी आखें वातसल्य और प्रतीक्षा से डबडबा
08:24रही थी, अपने प्रिय कानहा की ओर बढ़े।
08:27भगवान श्रीक्रिष्न अपनी दिव्य मुस्कान को त्याग कर अपने मातापिता को देखते ही एक बालक की भाती भावुखो उठे और
08:36उनकी कमलवत आखें सने से भर गई।
08:40जैसे ही नंद और यशोदा ने अपनी गती बढ़ाई, उनके पुत्र तीनों लोकों के स्वामी होते हुए भी व्याकुलता में
08:48उनकी ओर पहला कदम बढ़ाने से खुद को रोक न सके।
08:53सहसा नंद महाराज ने अपनी सभी मर्यादाएं तोर दी और एक पिता के आवेग के साथ अपने पुत्र की ओर
09:00दोड़े, उनके आसूओं ने प्रतीक्षा की सदियों को धोडाला।
09:05श्रीकृष्ण ने अपने पिता को अपनी शक्तिशाली भुजाओं में भर लिया, जहां नंद महाराज ने उनके कंधों पर सिर रख
09:13कर फूट फूट कर रोते हुए वर्षों का संचित विरह बहा दिया।
09:18नंद महाराज से मिलने के उपरांत, श्रीकृष्ण ने अपनी द्रिष्टी यशोदा मया पर डाली, जो अब शांत प्रेम की मूर्ती
09:26बनकर उनकी ओर बढ़ रही थी।
09:29माता यशोदा के आगमन पर श्रीकृष्ण ने नंद महाराज को धीरे से छोड़ा और अपनी ममतामई जन्नी की ओर ऐसे
09:37मुड़े जैसे कोई बालक अपनी मा के सांत्वना पूर्ण स्पर्ष की लालसा कर रहा हो।
09:43यशोदा मया ने अपने कानहा को अपनी ममतामई बाहों में भर लिया, उनके हृदय से बातसले की अविरल धारा बह
09:51निकली, जिसने सारे विरह को धोडाला।
09:55मा यशोदा बार-बार अपने पुत्र के मुख को चूमती रही, जैसे वह अपने बचपन के कानहा की मीठी गंध
10:02और स्पर्ष को फिर से महसूस करना चाहती हो।
10:06अपने पुत्र के द्वारका के वैभव से अप्रभावित यशोदा मया ने उसकी आखों में, उसके कपोलों पर, उसके मुख की
10:14हर रेखा में अपने शरार्ती बालक को ढूंडना चाहा।
10:18दूर खड़े होकर श्री कृष्ण की रानिया, रुकमिनी से लेकर सत्यभामा तक इस निश्चल वादसल्यपून प्रेम को देखकर भावविभोर थी,
10:28जिसने उनके हृदय को भी चूलिया।
10:31मेरे लाल, तुम्हे याद है, जब तुम माखन चुराते थे और मैं तुम्हे रस्सी से बांध देती थी, यशोदा मया
10:39ने मीठी शिकायत भरे स्वर में पूछा, उनकी आखों में पुरानी यादों की चमक थी।
10:45श्री कृष्ण ने अपनी मया के हाथों को अपने हाथों में लिया और एक मंद लजजापूर्ण मुस्कान से स्विकार किया,
10:53मानो उन अनमोल बचपन की यादों को पुनरजीवित कर रहे हूँ।
10:57इस बीच नंद महाराज अपने आसूओं को पोँचते हुए गर्व और वातसले से फूल कर अपनी पतनी और पुत्र के
11:06इस पवित्रक्षण को शांत भाव से निहार रहे थे।
11:10कितने वर्ष हो गए, कानहा, तुम्हें देखे बिना।
11:14हर दिन हर पल तुम्हारी याद में बीता। यशोदा मया ने अपने पुत्र के माथे को सहलाते हुए दुहक और
11:22प्रेम से कहा।
11:23मया, अब मैं वापस आ गया हूँ और तुम्हें कभी अकेला नहीं छोडूँगा।
11:29श्री कृष्ण ने उन्हें आश्वासन देते हुए, उनके हाथों को अपने विशाल हाथों में कसकर थाम लिया, मानों उन्हें युगों
11:37की शांती प्रदान कर रहे हूँ।
11:39धीरे धीरे व्रिंदावन के अन्य गोपी और गोप जो इस पवित्र मिलन के साक्षी थे, आदर पूर्वक कुछ और पास
11:47आ गए, उनकी आखों में भी उच्सुकता और अपार प्रेम उमड रहा था।
11:53नंद और यशोदा के चहरे पर मिलन की अलौकिक प्रसन्ता थी, पर कहीं गहरे में वर्षों की बिदाई का एक
12:00मंद सा विशाद भी छिपा था, जो उनकी आखों में जलक रहा था।
12:06भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मातापिता को पुनह अपनी बाहों में समेटा, मानो उन्हें यह विश्वास दिला रहे हो कि अब
12:13वे कभी उनसे दूर नहीं होंगे, और यह मिलन चिरस्थाई है।
12:19प्रेन के इस अतिरेक के बीच, श्रीकृष्ण ने धीरे से अपने मातापिता को हाथ पकड़ कर सभा के एक शांत
12:26अधिक अंतरंग स्थान की ओर ले जाना शुरू किया, जहां वे अपने हृदय की बातें खुल कर कर सकें।
12:34श्री कृष्ण अपने मातापिता को लेकर सभा के एक शांत कोने की ओर बढ़ रहे थे जहां को लाहल कम
12:41था और हृदय के मौन समवाद को स्थान मिल सके
12:45तभी गोपियों की भीड में से किसी की आखें कृष्ण पर पड़ी और एक अनकहा कमपन पूरे समोह में फैल
12:53गया जैसे किसी शांत जल में पहला कंकड गिरा हो
12:57बरसों का विरहत हर रात की बेचैनी हर दिन का इंतजार वह सब एक ही पल में आखों के सामने
13:04घूम गया और उनके हृदय में प्रेम की एक अविरल धारा उमड पड़ी
13:10कुरुक्षेत्र की विशाल सभा में जहां अनेकों देवता और रिशी उपस्थित थे वहां कृष्ण ने अपनी दिव्यद रिष्टी से गोपियों
13:18को पहचान लिया और उनके अधरों पर एक मंद मुस्कान खिल उठी
13:24गोपिया पहले हिचकिचाई, मानो उन्हें अपनी आखों पर विश्वास न हो, फिर एक साथ उनकी आत्माए कृष्ण की ओर खिंची
13:32चली गई, हर बंधन तोड़कर
13:35हजारों की भीड में भी उनकी आखें केवल कृष्ण को ही खोज रही थी, और उनके कदम स्वतह ही उस
13:42दिव्य आकरती की ओर बढ़ने लगे, जैसे नदी समुद्र की ओर बहती है
13:48कृष्ण ने मातापिता से बात करते हुए भी गोपियों की व्याकुलता को महसूस किया और उन्हें आश्वासन देने के लिए
13:57एक और गहरी प्रेमपूर्ण मुस्कान बिखेरी
14:01अंतह सबसे आगे वाली गोपी, जिसकी आखे वर्षों की प्यास से सूखी थी, कृष्ण के सामने आखडी हुई और उसकी
14:09आखों से अश्रूओं की वर्षा होने लगी
14:13उसके अश्रूओं में न केवल विरह का दर्थ था, बलकि अटूट प्रेम असीन भक्ती और सम्पूर्ण समर्पन का भाव भी
14:20समाहित था, जो शब्दों से परे था
14:24श्री कृष्ण ने अपने शांत और दिव्य रूप से उनकी पीड़ा को सहर्ष स्विकार किया, मानों उनके हर आसू को
14:31अपनी आत्मा में समेट रहे हुँ
14:35फिर एक-एक कर सभी गोपिया, एक पवित्र नदी की धाराओं के समान, कृष्ण के चारों और एकत्रित हो गई,
14:42उनके प्रेम और भक्ती का सागर उमड़ पड़ा
14:46उसक्षन कुरुक्षेत्र की भूमी पर व्रिंदावन का प्रेम जीवन्थ हो उठा, एक ऐसा मौन समवाद छेड़ गया जो किसी भी
14:54शब्द से अधिक गहरा था
14:57उनके वर्षों का दर्द अब अनुपम आनंद में बदल गया था, जैसे काली घटाएं छंटकर सूर्य की सुनहरी किरने फूट
15:04पड़ी हो
15:06इस अलौकिक मिलन को देखकर सभा में उपस्थित रिशी, देवता और यहां तक की बड़े-बड़े समराट भी आश्चर यचकित
15:14रह गए, ऐसे प्रेम की कलपना उन्होंने कभी न की थी
15:19देवर्शी नारद अपने वीना के तारों पर उंगलिया फिराते हुए, इस अद्भुत द्रिश्य को देखकर मुस्कुराएं और उनके हृदय से
15:27हरी बोल का उद्गोश निकला
15:30गोपियों ने बिना किसी संकोच के, अपनी आखों में भरी अश्रुधाराओं के साथ, कृष्ण के प्रती अपनी अनन्य भक्ती और
15:38अखंड प्रेन को व्यक्त किया
15:41जैसे 85 धर्ती वर्षा की बूंदों को सोख लेती है, वैसे ही श्री कृष्ण ने उनकी भक्ती की गहराई को
15:48अपनी दिव्य उपस्थती में समाहित कर लिया
15:52कुरुक्षेत्र की वह भूमी जो आमतोर पर युद्ध और धर्म के विचारों से भरी रहती थी, उस दिन व्रिंदावन के
15:59सबसे शुद्ध, सबसे निर्भीक प्रेम की साक्षी बन गई
16:04कृष्ण ने अपनी दिव्यवानी में बिना शब्द कहे, गोपियों को यह विश्वास दिलाया कि वे सदा उनके हृदय में वास
16:11करते हैं, और यह मिलन चिरस्थाई है
16:15अंत्र वर्षों की प्रतीक्षा का अंठ हुआ, और गोपियों के हृदय में शान्ती, संतोश और शाश्वत प्रेम का अनमोल अनुभव
16:23भर गया, जैसे सूखी धर्ती पर अमरित वर्षा हुई हो
16:28श्री कृष्ण अपनी करुणामई द्रिष्टी से व्याकुल गोपियों की ओर देखते हैं, जिससे उनके विरहदक धरिद्यों को सांत्वना और शितलता
16:37का अनुभव होने लगता है
16:40प्रभु अपने दिव्य होठों पर एक मंद मुस्कान लाते हुए अपनी बांसुरी जैसी मधुर और गंभीर वानी में गोपियों को
16:48सम्बोधित करना प्रारंभ करते हैं
16:51वे गोपियों से कहते हैं कि भौतिक दूरी केवल एक भ्रम है और वे कभी भी अपने प्रेतम से अलग
16:58नहीं हुई हैं क्योंकि वे सदैव उनके अन्तहकरण में वास करते हैं
17:03भगवान श्री कृष्ण अपने दाहिने हस्त को ज्ञान मुद्रा में उठाते हैं और अत्यंत सौमयता से उन्हें आत्मा के अविनाशी
17:12और सर्वव्यापी होने का रहस्य समझाते हैं
17:16प्राधारानी और अन्यगोपिया अपने आसूँ से भीगे नेत्रों को उठाकर कृष्ण के परम तेजस्वी मुख मंडल को एक तक देखती
17:25हैं
17:25उनके मुख से निकले हर शब्द को अपने हृदय में संजोती हैं
17:31वे समझाते हैं कि जिस प्रकार आकाश, वायू, अगनी, जल और प्रित्वी संपून स्रिष्टी के कणकण में समाए हैं
17:39उसी प्रकार परमात्मा भी संसार के प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान हैं
17:45श्री कृष्ण के इस दिव्य ज्यानोप देश को सुनकर गोपियों के मन का अंधकार दूर होने लगता है
17:51और उन्हें यह आभास होता है कि उनका प्रेन कोई भौतिक बंधन नहीं बलकि एक शाश्वत आध्यात्मिक सत्य है
18:01राधारानी का हरिदय जो वर्षों से विरह की अगनी में जल रहा था
18:05कृष्ण के वचनों रूपी अमरित वर्षा से शांत होकर परम आनन से सराबोर हो जाता है
18:13गोपियों के चहरों पर छाया हुआ उदासी का कुहासा धीरे-धीरे छटने लगता है
18:18और उनके मुखमंडल पर आत्मिक शांती और ज्यान की एक नई आभा चमकने लगती है
18:25प्रभु अपने हाथ से अनंत आकाश और प्रकृती की ओर संकेत करते हुए
18:30उन्हें दिखाते हैं कि किस प्रकार उनकी ही चेतना संपून ब्रहमांड को संचालित और पोशित करती है
18:38सभी गोपियां अपने नेत्र बंद कर लेती हैं और अपने ही हिदय के भीतर श्री कृष्ण की दिव्यबांसुरी की ध्वनी
18:46और उनकी उपस्थिती को प्रत्यक्ष महसूस करने लगती है
18:51इस अलोकिक दृष्ण को देखकर श्री कृष्ण के मुख पर संतोष का भाव उभर आता है क्योंकि उनकी प्रिय गोपियों
18:59की चेतना अब लोकिक आसकती से उपर उठकर परम भक्ती में लीन हो चुकी है
19:05वे आदे कहते हैं कि गोपियों का यह निश्चल और अनन्य प्रेम संसार के समस्त वेदों के अध्ययन, कठिन तपस्याओं
19:13और यग्यों से भी कहीं अधिक श्रिष्ट और पूजनिय है
19:18इस पावन उपदेश के क्षणों में श्री क्रिष्ण के विग्रह से एक अत्यंत दिव्य सुनहरी और नीली रश्मिया निकल कर
19:26पूरे वातावर्ण को आलोकित कर देती है
19:30गोपियों को अब पूर्ण विश्वास हो जाता है कि उनका प्रियतम उनसे कभी दूर नहीं गया था
19:36बलकि वह तो उनके प्राणों की हर धड़कन में निरंतर स्पंदित हो रहा था
19:42उनके नेत्रों से बहने वाले विरह के अश्रु अब विलीन हो जाते हैं और उनका स्थान परम आनंद एवं आध्यात्मिक
19:50जागरिती के अश्रु ले लेते हैं
19:53द्वारकाधी श्रीकृष्ण अपने हरिदय पर हाथ रखकर गोपियों को आश्वस्थ करते हैं कि उनका स्थान उनके हरिदय में सदा के
20:01लिए सुरक्षित और सर्वोच्च है
20:05थोड़ी दूरी पर खड़े नंद महाराज और माता यशौदा इस अलौकिक मिलन और ज्ञानोक देश को देखकर अत्यंत भावुखो उठते
20:13हैं और उनका मन अगाध शान्ती से भर जाता है
20:18कुरुक्षेत्र की वह पवित्र भूमी जो कभी शस्त्रों की जंकार से गूजने वाली थी उसक्षन व्रिंदावन के सबसे गूड आध्यात्मिक
20:27दर्शन और दिव्य प्रेम के शान्त वातावर्ण में डूब जाती है
20:32इस प्रकार श्रीकृष्ण के ज्यानोप देश से परम संतोष पाकर गोपिया सदा के लिए उनके आत्मिक स्वरूप से जुड़ जाती
20:40है और उनका अटूट विश्वास इस जगत में अमर हो जाता है
20:45भगवान श्रीकृष्ण के ज्यानोप देश से हृदय में अगाध शान्ती धारण कर चुकी गोपियों को देखकर परम ज्यानी उद्धव उनके
20:54समक्ष ध्यानमगन अवस्था में उपस्थित हुए उनके मुख पर गेहन करुना और संतोष का भाव जलक रहा था
21:02उद्धव जिन्होंने स्वया भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य सेवा की थी गोपियों की शुद्ध और निस्वार्थ प्रेम भक्ती को देखकर अचंभित
21:10रह गए और उनके हृदय में उन पर श्रद्धा का भाव उमड पड़ा
21:15उनके समक्ष उद्धव ने नमरता पूर्वक अपने स्थान से उठकर प्रेम से विहवल उन गोपियों के सम्मुक हाथ जोड कर
21:23प्रणाम किया जिनकी भक्ती ने उन्हें भी विस्मित कर दिया था
21:29गोपियों ने जो पहले से ही कृष्ण के आत्मिक स्वरूब को हृद्यंगम कर चुकी थी उद्धव को कृष्ण का परम
21:36भक्त जानकर उन्हें अत्यंत आदर और स्नेह से देखा
21:40उद्धव ने अपनी शांत वाणी में कहना आरंभ किया कि हे पूजे गोपियों आप धन्य हैं जिनके प्रेम ने स्वयं
21:48भगवान को मोहित कर लिया और जिन्होंने साक्षात ब्रह्मा का अनुभव अपनी आखों से किया
21:54उन्होंने समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण जो ब्रह्मांड के कणकण में विद्यमान हैं केवल एक भौतिक रूप तक सीमित नहीं हैं
22:03बलकि वे प्रत्येक आत्मा के भीतर प्रकाशमान हैं
22:08उद्धव ने अपनी सहज और सरल शैली में गोपियों को वेराग्य का मर्म समझाया बताते हुए कि सच्ची मुक्ती सांसारिक
22:16बंधनों से मुक्त होकर भगवान के निराकार स्वरूप में लीन होने में हैं
22:22गोपियों ने अपनी सहज़ता और कृष्ण के प्रती अटूट प्रेम के कारण वेराग्य की इस गहन बात को समझने में
22:29थोड़ी कठिनाई महसूस की उनके मन में अब भी शामसुंदर की रूप माधुरी का वास्था
22:36उद्धव ने उनकी मनोजशा को भामपते हुए अत्यन्त धैर्य और प्रेम से समझाया कि भगवान की निराकार्ता उनकी अनुपस्थती नहीं
22:45बलकि उनके अनन्त और सर्वव्यापी स्वरूप की पराकाश्था है
22:51उन्होंने जोर दिया कि भगवान का स्मरण ही सबसे बड़ी तपस्या है क्योंकि यह मन को हर क्षण उनसे जोरता
22:58है चाहे वे किसी भी रूप में प्रकट हो या नहों
23:02गोपियों की आखों में धीरे-धीरे एक नई चमक उतर आई उनके सरल हरिदय ने उद्धव के ज्ञान को अपनी
23:10अटूट भक्ती की कसोटी पर परख कर आत्मसात करना शुरू कर दिया
23:15उनकी भक्ती जो पहले ही अतुलनिय थी अब ज्ञान के प्रकाश से और भी निर्मल और सर्वव्यापी प्रेम के स्वरूप
23:23में धलने लगी
23:25उनके हरिदय में अब श्री कृष्ण केवल वरिंदावन के बालक या प्रेमी नहीं बलकी अनंत ब्रह्मा के रूप में प्रतिष्ठित
23:33हो गए थे जो हर कण में और हर प्राणी में वास करते हैं
23:38उद्धव ने देखा कि उनकी बात गोपियों के हरिदय में ऐसे उतर गई है जैसे वर्षा का जल सूखी धर्ती
23:46में समा जाता है जिससे उनके अंतर्मन में ज्ञान का बीज प्रस्पुटित हो गया
23:52यहाँ अनुभव किसी बौधिक तर्क से परे था यहाँ उनकी सहेज और शुद्ध प्रेमभक्ती का परिनाम था जिसने उन्हें ज्ञान
24:00के उच्चतम शिखर तक पहुचा दिया
24:03एक शांत और गहन उर्जा से परिपूर्ण वातावर्ण ने कुरुक्षेत्र की भूमी को घेर लिया जहां भौतिक और आध्यात्मिक मिलन
24:11एक अध्भुत सामन जस्य में बंध गए
24:15उद्धव ने स्वयं को धन्य महसूस किया कि उन्हें ऐसे भक्तों के दर्शन और उनके हृदय परिवर्तन का साक्षी बनने
24:23का सौभाध्य मिला जिनकी भक्ती से वे स्वयं भी प्रेरित हुए
24:28उन्होंने मन ही मन भगवान श्री कृष्ण का धन्यवाद किया कि उन्होंने गोपियों के माध्यम से प्रेम और ज्ञान की
24:35ऐसी अनूठी धारा प्रवाहित की, जिसने योगियों के भी हृदय को स्पर्ष किया
24:41गोपियों ने अब अपने प्रियश्याम सुन्दर को केवल बाहर नहीं, बलकि अपने ही अंतरात्मा में, हर श्वास में और स्विष्टी
24:49के हर कण में अनुभव करना सीख लिया था
24:53इस प्रकार उद्धव के ज्यान और गोपियों की सरल भक्ती के अध्वितिय संगम से व्रिंदावन का प्रेन कुरुक्षेत्र की भूमी
25:01पर अनन्त और शाश्वत ब्रहमज्यान के रूप में स्थापित हो गया
25:06कुरुक्षेत्र के उस विशाल धर्ममंडप में महाबली बलराम जी अत्यंत तेजस्वी रूप में सभी रिशियों और राजाओं के मध्या आगे
25:15आते हैं
25:17मेख के समान गंभीर और मधुर स्वर में बलराम जी ने सभा को संबोधित करते हुए श्री कृष्ण के साक्षात
25:24परम ब्रहमा होने की घोषणा की
25:27उन्होंने स्मरन कराया कि कैसे बाल्यावस्था में ही श्री कृष्ण ने पूतना और शक्तासुर जैसे महान असुरों का सहार करके
25:35गोकुल की रक्षा की थी
25:38बलराम जी ने साथ दिनों तक गोवर्धन परवत को उंगली पर धारन करने वाली लीला का वर्णन कर सभी को
25:45श्री कृष्ण की असीम शक्ती का बोध कराया
25:49उन्होंने स्पष्ट किया कि श्री कृष्ण के प्रतेक कार्य का उद्देश केवल धर्म की स्थापना और निश्काम भक्तों की रक्षा
25:57करना रहा है
25:59यमुना के विशैले जल को कालिया नाग का मरदन करके पावन बनाने वाली अद्भुत बाललीला का स्मरण कर संपूर्ण सभा
26:07भाव विभोर हो उठी
26:09मथुरा में क्रूर कंस के अत्याचारों का अंतकर प्रजा को अधर्म से मुक्ती दिलाने की पराक्रमी गाथा का बलराम जी
26:17ने ओजस्वी बखान किया
26:19उन्होंने कहा कि द्वार काधीश बनने और बड़े-बड़े युद्ध जीतने के बाद भी श्रीकृष्ण जल में कमल की भाती
26:26पूर्णत है अनासक्त रहते हैं
26:30महर्शी नारद, वेदव्यास और अन्य ब्रहमर्शी बलराम जी के मुक्से श्रीकृष्ण महिमा सुनकर अत्यंत आनन्दित होकर मस्तक जुकाने लगे
26:40बलराम जी ने उद्गोषित किया कि श्रीकृष्ण केवल यदुवंश के राजकुमार नहीं, बलकि समस्त ब्रहमांडों के मूल और जगन्यनता है
26:51उन्होंने व्रिंदावन में गोपियों और नंदय शोदा के साथ की गई लीलाओं को परमात्मा के विशुद्ध प्रेम का सर्वोच प्राकट्य
26:58बताया
27:00सभा में उपस्थित आर्यावर्थ के प्रतापी राजाओं का अहंकार बलराम जी के वचनों को सुनकर पूरी तरह नश्ट हो गया
27:09उन्होंने बताया कि श्री कृष्ण का अवतार संसार के प्राणियों को अज्ञान के अंधकार से निकाल कर परम ज्ञान का
27:16मार्ग दिखाने के लिए हुआ है
27:19अपने जेश्ट पुत्र बलराम के मुख से श्री कृष्ण के इस परात पर स्वरूप की महिमा सुनकर वसुदेव और देवकी
27:27के नेत्रों में अश्रु छलक आए
27:30स्वयल श्री कृष्ण अत्यंत विनमरभाव से मुस्कुराते हुए अपने बड़े भाई बलराम जी के इस भ्रात्र प्रेम और स्तुती का
27:37रसास्वादन कर रहे थे
27:40बलराम जी ने कहा कि कठोर तपस्या या ज्यान से भी परे श्री कृष्ण को केवल और केवल निर्मल प्रेम
27:47से ही प्राप्त किया जा सकता है
27:50बलराम जी के इन वचनों से प्रसन्न होकर देवताओं और गंधरवों ने आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा करना प्रारंभ
27:58कर दिया
27:59कुरुक्षेत्र का वह विशाल प्रांगन कुरुग्यान वैदिक रिचाओं और व्रिंदावन के प्रेमाम्रित के अनोखे संगम से आलोकित हो उठा
28:08अपने कथन के अंत में महाबली बलराम जी ने स्वया हाथ जोड कर श्रीकृष्ण के चरंकमलों में परम ब्रहमा मानकर
28:16प्रणाम किया
28:18श्रीकृष्ण ने आगे बढ़कर अपने प्रियभ्राता बलराम को गले से लगा लिया और इस अलोकिक दृष्ण ने पूरी सभा को
28:26परमशान्ती और भक्ती से भर दिया
28:29इस अध्धुत मिलन के पश्चात पिता वसुदेव के हिदय में अपने पुत्रों के कल्यान और समस्थ पापों के नाश हेतु
28:37एक भव्य यग्या आयोजित करने की प्रबल इच्छा जागरत हुई
28:42ततकाल ही कुरुक्षेत्र के उस विशाल प्रांगण में यग्यशाला के निर्मान की दिव्यत अयारिया आरम हो गई
28:48जहां पवित्र वेदियों को स्वन और कुशा से अलंकृत किया जाने लगा
28:54वसुदेव ने अपने दूतों को दिशाओं में भेजा ताकी वे महान रिशियों, तपस्वियों, वेदपारंगत ब्राहमनों और समस्थ ज्यानी जनों को
29:03इस पावन यग्य में पधारने का निमंत्रन दे सकें
29:07शीघ्र ही दिगंत से पधारे हुए अंगिनत रिशियों, तेजस्वी ब्राहमनों और आचारियों से यग्यशाला का प्रांगन उनकी दिव्य आभा से
29:16प्रकाशित हो उठा
29:18अपने पुत्रों और समस्थ परिवार के साथ वसुदेव ने स्वया आगे बढ़कर प्रत्येक रिशी और ब्राहमन का अत्यंत श्रद्धा और
29:27विनैसे स्वागत किया
29:28शुभ महूर्त में मुख्य पुरोहितों ने वैदिक मंत्रों चार के साथ पवित्र अगनी प्रजवलित की जिसकी लप्तें आकाश की ओर
29:37उठकर शुद्धता और दिव्य उर्जा का प्रतीक बन गई
29:41चारों दिशाओं में फैलते हुए हजारों वेद मंत्रों की गूंच से यग्यशाला का प्रतेक कोना पवित्र हो उठा जिससे वातावर्ण
29:50में अलौकिक शान्ती और दैविय स्पंदन भर गया
29:54जी समिधा औश्धियों और विभिन अनाजों की आहुतिया निरंतर पवित्र अगनी में समर्पित की जा रही थी जिससे एक सुगंधित
30:03और शुद्ध धूम्र राशी आकाश में उठ रही थी
30:07इस दिव्य यग्य को देख रहे भगवान श्री कृष्ण के मुखमंडल पर एक मंद मुस्कान थी जो उनके पिता के
30:14इस पावन संकल्प की सफलता का संकेट दे रही थी
30:18यग्य के मध्य में वसुदेव ने स्वय उठकर प्रत्येक ब्राहमन के पास जाकर उन्हें सादर प्रणाम किया और उनके चर्णों
30:27में जुपकर आशिर्वात प्राप्त किया
30:30इसके उप्रांत वसुदेव ने ब्राहमनों को बहुमुल्य गौय, स्वर्ण मुद्राय, रेश्मी वस्त्र और अन्य अनेक प्रकार की उत्तम दक्षिनाय भेंट
30:39की
30:41ब्राहमनों ने वसुदेव के इस उदारता पूर्ण दान को सहर्ष स्वीकार किया, जिससे उनके मुखमंडल पर संतोष और प्रसन्निता का
30:49भाव जलक उठा
30:52यग्य की पवित्रता और वसुदेव के दान की महत्ता से प्रभावित होकर आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी,
31:00जो उस अफसर की दैविय स्वीकृती का प्रमाण थी
31:04अपने हृदय में परमशान्ती और कृतग्यता का अनुभव करते हुए वसुदेव ने महसूस किया कि उनके सभी पाप धुल गए
31:12हैं और आत्मा शुद्ध हो गई है
31:16उन्होंने अपने प्रिय पुत्रों, श्रीकृष्ण और बलराम के दीरगायू और कल्यान के लिए मन ही मन प्रार्थना की, जिससे उनके
31:24पिता का प्रेम और भक्ती झहलक रही थी
31:28कई दिनों तक चलने वाले इस महायग्य के प्रमुख अनुष्ठान अब पूर्णता की ओर अग्रसर थे, जिससे बातावर्ण में एक
31:36गेहन और पवित्र उर्जा का संचार हो रहा था
31:40अंत में पुरोहितों ने पूर्णाहुती की अंतिम आहुती समर्पित की, जिससे अगनी की लप्तें एक बार फिर तीवर गती से
31:48उठकर सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश कर गई
31:52वसुदेव ने फिर एक बार समस्त रिशियों और ब्राह्मनों का हाथ जोड कर आभार व्यक्त किया, जिनके आशिर्वात से उनके
32:01जीवन में नव चेटना का संचार हुआ था
32:04प्रसन्यचित ब्राह्मनों ने वसुदेव और उनके समस्त परिवार को दीरगायु, सुक्सम्रिद्धी और आध्यात्मिक उनती का आशिर्वात दिया
32:14इस महायग्य के प्रभाव से न केवल वसुदेव को परम शांती मिली, बलकि कुरुक्षेत्र का वह पावन स्थल भी सदा
32:22के लिए भक्ती और कल्यान की उर्जा से उतप्रोत हो गया
32:27यग्य की पवित्रता से उतप्रोत उस पावन कुरुक्षेत्र स्थल पर अब एक असाधारन दिव्य समागम की शोभा बढ़ने लगी थी,
32:36जहां ब्रहमांड के कोने-कोने से रिशिमुनी और राजा महाराजा एकत्र हुए थे
32:41तभी आकाश मार्ग से अपने शुभर वीना को जंक्रित करते हुए देवर्शी नारत का आगमन हुआ, जिनके दर्शन मात्र से
32:50सभा में एक नई चेतना और दिव्य संगीत का संचार हो गया
32:55नारत मुनी जिनकी वीना की ध्वनी तीनों लोकों में गुंजती है, अपनी दिव्य द्रिश्टी से इस अध्वितिय समागम की महत्ता
33:03को तुरंत समझ गए और वे भगवान श्री कृष्ण की लीला का गुनगान करने लगे
33:09उनके पीछे-पीछे वेदों के परमग्याता और पुरानों के रच्चिता, भगवान वेदव्यास भी अपनी गंभीर मुद्रा में उस दिव्य सभा
33:18में उपस्थित हुए, जिनकी उपस्थिती मात्र से ज्ञान की आभा फैल गई
33:24वेदव्यास ने अपनी अगाध अंतरग्रिष्टी से श्री कृष्ण के प्रत्येक लीला के पीछे छिपे गूढ रहस्यों और उनके दिव्य उद्देशों
33:32को देखा और उनकी महिमा का चिंतन करने लगे
33:37अत्री, वशिष्ठ, ध्रेगु, अंगिरा जैसे अन्यकई महान रिशी भी इस समागम में उपस्थित थे, जिनकी तपस्या और ज्ञान की आभासे
33:46कुरुक्षेत्र का वातावर्ण और भी दिव्य हो उठा था
33:51प्रत्यक्रिशी अपनी अंतरग्रिष्टी और योग शक्ती से श्रीक्रिष्ण के अलौकिक रूप और उनकी दिव्य उपस्थिती को अपनी आखों से देख
33:59रहे थे, मानोवे साक्षात वैकुन्ठप्ती को ही निहार रही हूँ
34:05युधिष्थिर, उग्रसेन और अन्य अनेक धर्मात्मा राजा महा राजा भी इस सभा में उपस्थित थे, जो श्रीक्रिष्ण के प्रेम और
34:13उनके न्यायपूर्ण शासन को अपनी आखों से देख कर भाव विभोर हो रहे थे
34:19समस्थ राजा महा राजा अपने अपने सिनहासनों पर बैठे, श्रीक्रिष्ण की अनुपम सुन्दर्ता और उनके दिव्य तेज को अपलक निहार
34:27रहे थे, मानो उनके जीवन का यही परम लक्ष्य हो
34:32भगवान श्रीक्रिष्ण अपनी समस्थ दिव्य महीमा और अनुपम सौन्दर्य के साथ इस भव्य समागम के केंद्र में विराजमान थे, जिनसे
34:41अलोकिक प्रेम और आनंद की धारा प्रवाहित हो रही थी
34:46वसुदेव और देव की अपने पुत्र को इस दिव्य रूप में देखकर आनंद और गर्व से भर उठे, उनकी आखों
34:53से प्रेमाश्रूओं की धारा बह रही थी
34:57श्री कृष्ण ने अपने मातापिता और बड़े बुजुर्गों को सम्मान पूर्वक प्रणाम किया, यह दर्शाते हुए कि वे भले ही
35:05भगवान हो, पर संबंध की मर्यादा का पालन करते हैं
35:09उनकी रानिया, रुपमिनी, सत्यभामा और जामबवती सहित समस्त 16,008 पत्रानिया अपनी अनुपम सुन्दर्ता और भक्तिभाव के साथ उपस्थित थी,
35:21जिनकी आभा से सभा मंडप जगमगा उठा था
35:25ये रानिया, जो साक्षात लक्ष्मी के विभिन अंश थी, अपने पती श्रीकृष्ण के प्रत्येक हावभाव पर अपनी द्रिष्टी गढ़ाय थी,
35:34उनकी भक्ती अतुलनी थी
35:37देवर्शी नारद और वेदव्यास जैसे ज्यानी रिशियों ने श्रीकृष्ण के मनुष्य रूप में उनकी दिव्य लीलाओं और अवतार के पीछे
35:46के गहन दार्शनिक महत्व पर चर्चा की
35:49नारद मुनी ने समझाया कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य रूप में प्रकट होकर भी अपनी दिव्यता को कभी नहीं छोड़ते,
35:57वे केवल अपने भक्तों के प्रेन के कारण अपनी लीलाओं का विस्तार करते हैं
36:04वेदव्यास ने भी इस बात की पुष्टीकी की श्रीकृष्ण का मानव रूप धारन करना केवल उनकी परम करुणामय लीला है,
36:12जिससे वे धर्म की स्थापना और दुष्टों का सहार कर सकें
36:16राजा महाराजा और समस्त उपस्थित जन इन रिशियों के वचनों को सुनकर श्रीकृष्ण की महिमा को और भी गहराई से
36:24समझने लगे, उनके हृदय श्रधा से भर उठे
36:29कुरुक्षेत्र का वहस्थल अब एक विशाल भक्ती सागर में परिवर्तित हो गया था, जहां हर आत्मा श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम
36:36और आनन्द की लहरों में गोता लगा रही थी
36:40सभी उपस्थित जन, चाहे वे रिशी हो या राजा, श्रीकृष्ण की अद्वितिय सुन्दरता, उनके प्रेम और उनके ज्ञान को देखकर
36:49आश्चर्यच्कित और आनन्दित होते हुए, उनकी भक्ती में पूर्णता लीन हो गए
36:55श्रीकृष्ण के दिव्य आलोप में समस्थ कुरुक्षेत्र एक अद्वितिय उर्जा से सराबोर था, जहां हरकन प्रेम, ज्ञान और पर्मानंद की
37:04अलोकिक सुगंद से महक रहा था
37:07उस परम पावनक्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मधुरवानी में सभी उपस्थित भक्तों को आशिर्वाद देते हुए, उन्हें धर्म और
37:16प्रेम के शाश्वत संदेश का स्मरण कराया
37:20महान रिशिगण, जिन में व्यास और नारत प्रमुख थे, अपने हृदय में श्रीकृष्ण के प्रती अगाद श्रधालिये, हाथ जोड कर
37:28उनकी स्तुती करते हुए, उन्हें अंतिम नमन अर्पित कर रहे थे
37:33विभिन सामराज्यों के राजा महाराजा और सभी उपस्थित भक्तगण, श्रीकृष्ण के चर्णों में श्रधावन्त होकर, उनके दिव्यदर्शन के अनुपम अनुभव
37:43को अपने जीवन का सर्वोच धन मान रहे थे
37:47धीरे-धीरे सूर्य अपनी सुनहरी किर्णों को समेटते हुए क्षितिज की ओर बढ़ने लगा, मानो यह दिव्य समागम भी अब
37:55अपने समापन की ओर अग्रसर हो रहा हो
37:59भगवान श्री कृष्ण ने एक शांत और दिव्य मुस्कान के साथ सभी को अपने अपने धाम लोटने का संकेत दिया,
38:07उनके इशारे में अनन्त प्रेम और कृतग्यता समाहित थी
38:11मिलन के सुख और विदाई के विशाद से भरे, भक्तों के हृदय में भावनाओ का एक अध्भुत संगम उमड रहा
38:19था, जो श्री कृष्ण के प्रेम में डूबे हुए थे
38:23अपनी दिव्यता को क्षण भर के लिए विस्मृत कर, श्री कृष्ण ने वातसल्य और प्रेम से भर कर सीधे अपने
38:30प्रिय माता यशोदा, पिता नंद और गोपी सक्खियों की ओर कदम बढ़ाए
38:36नंद और यशोदा ने अपने लाडले कृष्ण को बाहों में भर कर हृदय से लगा लिया, उनकी आखों से प्रेमाश्रूओं
38:43की अविरल धारा बह रही थी, मानो वर्षों का विरह आज समाप्थ हुआ हो
38:49श्री कृष्ण ने अपने मातापिता के शीश पर हाथ फेर कर उन्हें सांत्वना दी, उनके हर स्पर्ष में अटूट वात्सल्य
38:56और आश्वासन था कि वे सदैव उनके साथ हैं
39:02गोपिया अपनी आखों में अनकही विरहव्य था और प्रेम लिये एक तक अपने प्राणप्रिय कृष्ण को निहार रही थी, उनके
39:10हरिदय में प्रेम का अनंत सागर उमड रहा था
39:14श्री कृष्ण ने गोपियों को स्नेह पूर्वक देख कर कहा कि वे सदा उनके हरिदय में वास करते हैं और
39:21उनकी भक्ती ही उनका सच्चा मिलन है, जिससे वे कभी विलग नहीं हो सकते
39:26विदा की अंतिम बेला में, कृष्ण और व्रिंदावन वासियों के बीच एक मौन समवाध हुआ, जहां आखों ही आखों में
39:34अटूट प्रेम और विश्वास का आदान प्रदान हो रहा था
39:39भारी मन से परहिदय में श्रीकृष्ण के शाश्वत प्रेम को संजोए हुए, नंद यशोदा और गोपियों सहित समस्त व्रिंदावन वासी
39:47धीरे-धीरे कुरुक्षेत्र से अपने गाउं की ओर प्रस्थान करने लगे
39:53द्वारकावासी और अन्य सभी राजा महाराजा भी श्रीकृष्ण को अंतिम प्रणाम कर उनके दिये गए दिव्य ज्यान और आशिर्वात को
40:01लेकर अपने अपने राज्यों को लोटने लगे
40:05शन भर में वह कुरुक्षेत्र का विशाल मैदान जो भक्तों के जैगोश और दिव्य उर्जा से गूंज रहा था अब
40:12एक गहन शान्ती और अलौकिक मौन में डूब चुका था
40:17विरिंदावन के निवासी अपनी बैलगाडियों में बैठे मार्ग में चुपचाप श्री कृष्ण के साथ बिताए गए हर पल को याद
40:25कर रहे थे उनके हृदय में मधूर स्मृतिया गूंज रही थी
40:29उनकी आखों के सामने कृष्ण की बाल लीलाए रासलीला के क्षण और उनके साथ हुई हर दिव्यवार्तालाप एक चल्चित्र की
40:38तरह घूम रहा था जो उन्हें असीम आनंद दे रहा था
40:43उनके चहरों पर अब केवल विरह का दुख नहीं था बलकि श्री कृष्ण के शाश्वत प्रेम को अनुभव करने की
40:50एक गहरी शान्ती और आध्यात्मिक चमक विद्यमान थी
40:55अंतह विरिंदावन की सीमा में प्रवेश करते हुए वे जानते थे कि देह से कृष्ण भले ही दूर हो परन्तु
41:02उनका प्रेम और उनकी दिव्यता सदा उनके हृदय में वास करती रहेगी जो उन्हें सदैव प्रेरित करती रहेगी
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