कुरुक्षेत्र के भव्य समागम के बाद, देवर्षि नारद द्वारका पधारते हैं! इस एपिसोड में, नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण की मुख्य रानियों से व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं और उनसे उनकी असाधारण प्रेम और विवाह की कहानियाँ सुनते हैं। रुक्मिणी, सत्यभामा, जामवंती, कालिंदी और अन्य रानियाँ कैसे बनीं द्वारकाधीश की पटरानी? जानिए प्रेम, पराक्रम और भक्ति से परिपूर्ण इन दिव्य गाथाओं को, और समझिये श्रीकृष्ण की लीलाओं का गहरा रहस्य! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Dwarka #QueensOfKrishna #NaradaMuni #HinduMythology #ShreeKrishna #Satyabhama #Rukmini #DivineLove #Puranas #SpiritualJourney
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00:00कुरुक्षेत्र के भव्य समागम और त्रिदेवों की परीच्षा के पश्चात देवर्शी नारद ने अपनी वीना को थामा और भगवान श्रीकृष्ण
00:08की असीमित लीलाओं तथा उनकी धर्म पत्नियों की अटूट भक्ती को निकट से अनुभव करने का संकल्ट लिया।
00:16ब्रहमांड के अनन्त विस्तारों को पार करते हुए, नारद अपनी दिव्य वीना के मधुर स्वरों के साथ आकाश गंगाओं के
00:23बीच से द्वारकापुरी की ओर तीवर्टा से अग्रसर हुए, उनके मन में केवल एक ही धे था लीलापुरुशोत्तम के दर्शन।
00:33शितिज पर अनन्त नीले सागर के मध्य से उठती, स्वर्णध्वल प्रकाश से दीप्तिमान द्वारकापुरी की भव्य छवी देवर्शी नारद के
00:42समक्ष प्रकट हुई, मानो स्वर्ग स्वयं प्रित्वी पर उतर आया हो।
00:47धीरे धीरे नारद आकाश से नीचे उतरे, उनके पैरों ने द्वारका की पवित्र भूमी को छुआ, और उनके रोमरोम में
00:55उस दिव्य नगरी की अलोकिक उर्जा का संचार होने लगा।
00:59द्वारका के प्रत्येक भवन की स्वर्णजडित भव्यता और उसके कनकन से विकिरित होती दिव्य आभा को देखकर देवर्शी मंत्रमुग्ध हो
01:08गए, मानो वे किसी स्वर्गिय स्वप्न में विचर्ण कर रहे हो।
01:13द्वारका के वास्तुकला की प्रत्येक नकाशी, प्रत्येक स्तंभ और प्रत्येक गुंबत भगवान श्रीकृष्ण के एश्वर्य और कलात्मक्ता का जीवन्त प्रमाण
01:22था, जो स्वर्णेम आभा से जिल मिला रहा था।
01:26नगरी में सर्वत्र प्रसन्ता, उल्लास और भक्ती का वातावर्ण व्याप्त था, जहां बच्चे खेलते, युवक्युवतियां आनंदित होती और वृद्धजन शान्ती
01:37से जीवन का उत्सव मनाते दिख रहे थे।
01:40द्वार्का की हर गली, हर चौराहे और हर घर से आती दिव्य सुगंध और मधुर संगीत ने नारत के मन
01:47को मुह लिया, जो यह दर्शाता था कि यह नगरी स्वयं भगवान के परम सानिध्य में हैं।
01:54अपने मन को श्री कृष्ण के दर्शन की ओर केंद्रित करते हुए, देवर्शी नारत ने द्वार्का के भव्य मार्गों से
02:02होते हुए उस परम महल की ओर प्रस्थान किया, जहां स्वयं ब्रहमांड के स्वामी निवास करते थे।
02:09सामने आया श्री कृष्ण का मुख्य महल जिसके विशाल का इस्वर्ण निर्मित द्वार सूर्य के प्रकाश में चमकते हुए स्वर्ग
02:17के प्रवेश द्वार की भांती प्रतीत हो रहे थे
02:21द्वार पर खड़े दिव्य द्वार पालों ने नारत को पहचान कर अत्यंत सम्मान पूर्वक उन्हें प्रणाम किया और उनके आगमन
02:29की सूचना भीतर पहुचाई
02:32जैसे ही नारद ने महल के विशाल आंगन में प्रवेश किया उनकी इंद्रिया दिव्य सुगंध और पक्षियों के मधुर कलरव
02:39से अभिभूत हो गई जो एक अद्वितिय शान्ती और सुन्दर्ता का स्रिजन कर रहा था
02:46आंगन में लगे कल्पवरिक्षों से आती मनमोहक सुगंध, कमल सरोवरों पर मंडराते भौरे और मंदमंद बहती पवन सभी कृष्ण की
02:55उपस्थिती का प्रमान दे रहे थे
02:58महल की दीवारों पर स्वर्ण और रत्नों से जड़ित भित्तिचित्रों में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लिलाएं, गोवर्धन धारण और रासलीला
03:06के मनमोहक ग्रिश जीवन्थो उठे थे
03:10नारद की आखों में भगवान श्रीकृष्ण के अंगिनत रूपों और उनकी रानियों की अनुपम भक्ती को समझने की तीवर उतकंठा
03:18थी, एक ऐसी कथा जो ब्रहमांड में अद्वितिय थी
03:23वे महल के आंतरिक गलियारों से होते हुए आगे बढ़े, जहां हर कोने से आती दैविय आभा और अलौकिक शान्ती
03:31उन्हें भगवान के और निकट खीच रही थी
03:34अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हुए, देवर्शी नारद ने अपने मन में श्री कृष्ण की महीमा और उनके प्रेन की
03:42गहनता का चिंतन किया, जिसके असंख्य रंग ब्रहमांड को आलोकित करते हैं
03:48तभी एक विनमर सेवादार ने आगया कर अत्यंत आदर पूर्वक नारद को अगले कक्ष की ओर मार्ग दिखाया, जहां से
03:56मधुर वार्तालाप और हसी की हलकी ध्वनी सुनाई दे रही थी
04:01नारद उसकक्ष के द्वार के समीप पहुँचे, जहां से अलोकिक प्रकाश की किरने फूट रही थी और वायुमंदल में अत्यंत
04:09मधुर संगीत का संचार हो रहा था
04:13जिग्यासु नारद ने उसकक्ष की ओर उचसुकता से देखा, जहां उन्हें विश्वास था कि स्वय भगवान श्रीकृष्ण अपनी परम्प्रिया रानियों
04:21के साथ विराज मान होकर दिव्य प्रेम की गाथा रच रहे होंगे
04:27उसकक्ष में प्रवेश करते ही, नारद मुनी ने देखा कि स्वय भगवान श्रीकृष्ण अपनी परम दिव्य कांती से वातावर्ण को
04:35आलोकित कर रहे थे, जिनके चारों और उनकी परम्प्रिया रानिया अत्यंत भक्तिभाव से सेवा में लीन थी
04:43भगवान श्रीकृष्ण के अलोकिक सौंदर्य और उनकी दिव्य आभा को देखकर नारद मुनी क्षण भर के लिए अपनी सुध बुद्खो
04:51बैठे, मानो समस्त ब्रहमांड का प्रकाश एक ही बिंदु पर केंद्रित हो गया हो
04:57उन्होंने देखा कि कैसे प्रक्तियकरानी अपने प्रियतम की ओर एक तक निहारते हुए उनके प्रती अनन्य प्रेम और समर्पन से
05:05उत्प्रोत थी, जिससे उस कक्ष का वातावर्ण और भी मधुर तथा पवित्र बन गया था
05:12नारद को देखते ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर मुस्कान के साथ उनका अभिवादन किया और अपने कमल जैसे नेत्रों
05:21से उन्हें सम्मान पूर्वक आसन ग्रहेन करने का संकेत दिया
05:25श्रीकृष्ण के मधुर निमंतरण को स्वीकार करते हुए नारद मुनी ने अत्यंत विन्यपूर्वक निर्दिष्ट आसन पर विराजमान हुए जिससे उनके
05:35हृदय में अपार आनंद और शांती का अनुभव हुआ
05:39आसन ग्रहेन करने के पश्चात नारद मुनी ने तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण को श्रधापूर्वक प्रणाम किया उनके दिव्य
05:48चर्णों में अपना मस्तक जुका कर अगाध भक्ती प्रकट की
05:53श्रीकृष्ण ने नारद का कुशलक्षेम पूछा और उन्हें आश्वासन दिया कि वे बिना किसी संकोच के अपने हृदय की समस्त
06:01जिग्यासाओं को व्यक्त कर सकते हैं जैसे कोई शिश्य अपने गुरु से पूछता है
06:07नारद ने अपनी वीना को एक ओर रख कर भगवान से प्रश्ण किया कि इस स्रिष्टी के पालनकर्ता के रूप
06:15में उनकी लीलाए कितनी अध्भुत और अगमे हैं जो संपूर्ण ब्रहमांड को मोहित करती हैं
06:22भगवान श्री कृष्ण ने मधूर्ता से मुस्कुराते हुए नारद के प्रश्ण का उत्तर देना प्रारम्भ किया अपनी विविध लीलाओं का
06:30संक्षेप में वर्णन करते हुए बताया कि वे किस प्रकार धर्म की स्थापना और भगतों का उध्धार करते हैं
06:38नारद ने फिर पूछा कि भगवान अपने भगवान अपने भगतों से इतना प्रेम क्यों करते हैं उनकी भगती के प्रती
06:45उनका यह असीम्स ने किस प्रकार प्रकट होता है जो हर हृदय को छू लेता है
06:51श्री कृष्ण ने विस्तार से समझाया कि वे अपने भक्तों की निस्वार्थ भक्ती को सर्वोच मानते हैं और उनके प्रती
06:59उनका प्रेम केवल उनकी शुद्ध श्रद्धा और समर्पन का प्रतिफल है
07:05उन्होंने बताया कि कैसे भक्त के एक छोटे से भाव से भी वे संतुष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उनके लिए
07:12भक्तों का हृदय ही सबसे बड़ा मंदिर है, जहां वेवास करते हैं
07:18नारद मुनिक भगवान की इन गूड बातों को सुनकर और भी अधिक जिग्यासा से भर उठे, उनके मन में और
07:25भी अनेक प्रश्न उमडने लगे, जिन्हें वे भगवान के समक्ष रखना चाहते थे
07:31श्री कृष्ण ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से नारद के हृदय की बातों को जान लिया और उन्हें सहर्ष अनुमती दी कीवे
07:39अपने सभी संदेह और जिग्यासाय निर्भीक होकर प्रस्तुत करें
07:44इस प्रोच साहन से बलपाकर नारद मुनी ने अपनी आखों में एक शरार्ती चमक के साथ द्वारका नगरी की अतुलनिय
07:52सुन्दर्ता और महिमा के बारे में पूछने का निर्णय लिया जो भगवान के निवास का प्रतीक थी
07:59भगवान श्रीकृष्ण नारद के मुखमंडल पर उभे इस विशिष्ट भाव को देखकर मंदमंद मुस्कुराएं क्योंकि वे त्रिकालदर्शी थे और नारद
08:08के हृदय की वास्तविक इच्छा को भली भानती जानते थे
08:13श्रीकृष्ण ने नारद की भक्ती और उनकी सतत यात्राओं की प्रशंसा की यह कहते हुए कि वे तीनों लोकों में
08:21भगवान की महिमा का गुनगान करते हुए घूमते रहते हैं
08:26भगवान ने संक्षेप में द्वारका की अलोकिक महिमा का वर्णन करना शुरू किया
08:31इसे देवताओं की नगरी और ब्रहमांड के रतनों से सुसजित एक अध्वितिय धाम बताया
08:38नारत की आखों में उत्सुपता और आनंद की चमक साफ दिखाई दे रही थी
08:43जैसे किसी बच्चे को एक जादूई कहानी सुनाई जा रही हो और वे द्वारका के प्रत्येक कोने को देखने के
08:50लिए आतुर हो उठे
08:52श्री कृष्ण ने नारत को संकेत दिया कि वे शीध्र ही अपनी आखों से द्वारका की भव्यता और प्रत्येक रानी
09:00के महल में उनके दिव्य प्रेन को प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे
09:04श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ नारत मुनी की जिग्यासा को समझा और उन्हें द्वारका के प्रत्येक दिव्य महल
09:12में प्रवेश की अनुमती प्रदान की ताकि वे स्वया उनके अध्भुत एश्वर्य और लीलाओं का अनुभव कर सकें
09:20अनुमती मिलते ही नारत मुनी का हृदय असीम आनन्द से भर गया और उनकी आखों में द्वारका के अकलपनिय रहस्यों
09:28को जानने की तीवर उतकंठा स्पष्ट जलक रही थी
09:32देवर्शी नारत ने ततकाल अपनी वीना को संभाला और द्वारका के भव्य पथों पर अपनी दिव्य यात्रा का आरंभ किया
09:40उनके मन में एक अध्वितिय रहस्य को उजागर करने की तीवर इच्छा थी
09:46द्वारका नगरी जिसे स्वय विश्वकर्मा ने निर्मित किया था
09:50अपने स्वर्णिन द्वारों रत्नों से जड़े महलों और सुगंधित उध्यानों से नारत को मोहित कर रही थी
09:56मानो धर्ती पर स्वर्ग उतर आया हो
10:00प्रत्येक मोर पर उन्होंने द्वारका की अद्वितिय सुन्दर्ता और सम्रिध संस्कृती का अनुभव किया, जिससे उनकी यात्रा और भी अधिक
10:09रहस्यमेई और रोमाचक बन गई
10:12अंतर नारद मुनी राज महिशी रुकमिनी के महल के भव्यसवर्ण द्वारों के समक्ष पहुँचे, जो अपनी अलौकिक शोभा से सूर्य
10:21के प्रकाश को भी मात दे रहा था
10:24महल के भीतर प्रवेश करते ही, उन्हें एक शांत और पवित्र वातावर्ण का अनुभव हुआ, जहां दिव्य सुगंध और मधुर
10:32संगीत की धीनी गूंज व्याप्ट थी
10:35उनकी आखें एक ऐसे द्रिश्य पर टिक गई, जिसने उन्हें विस्मय से भर दिया, वहां स्वया भगवान श्रीकृष्न महारानी रुक्मिनी
10:44के साथ दिव्य प्रेन लीला में लीन थे
10:48भगवान श्रीकृष्न जो अभी अभी नारत को विदा कर चुके थे, एक और रूप में अपनी प्रियरानी के साथ उपस्थित
10:55देखकर मंद मंद मुस्कुराएं और अपने देवर्शी भक्त को देखकर आदर पूर्वक्षीश जुकाया
11:03महारानी रुक्मिनी ने भी अपनी मधुर मुस्कान के साथ नारत मुनी का स्वागत किया और उन्हें अपने समीप आसन ग्रहें
11:11करने के लिए विंती की
11:13रुक्मिनी की दिव्याभा और उनका स्नेहमई व्यवहार नारत के हृदय को छू गया और उन्होंने उनके आतिथ्य को स्विकार किया
11:23नारत का मन अभी भी इस रहस्य में उल्जा था कि भगवान श्रीकृष्ण एक ही समय में अनेक स्थानों पर
11:30कैसे उपस्थित हो सकते हैं यह सोचकर वे चकित रह गए
11:35नारत मुनी ने भगवान श्रीकृष्ण की ओर देखा जिनकी आखों में एक ब्रहमांडिय रहस्य छिपा था और सीधे उनसे अपने
11:43प्रश्ण का समाधान मांगा
11:46श्रीकृष्ण ने अपने भग्त की सच्ची जिग्यासा को देख कर एक रहस्यमई मुस्कान बिखेरी जो उनकी अनन्त शक्तियों का मौन
11:55संकेत था
11:57भग्वान ने अपनी अचिंत्य शक्ती का संक्षेप में वर्णन किया यह समझाते हुए कि वे अपनी योगमाया से एक साथ
12:04अनेक रूपों में प्रकट हो सकते हैं जिससे ब्रहमांड का संतुलन बना रहता है
12:11महारानी रुकमिनी ने अपनी दासी से सुगंधित जल और दिव्यफल लाने का आदेश दिया ताकि नारद मुनी अपनी यात्रा की
12:19ठकान मिटा सकें
12:21नारद मुनी ने भगवान की अकलपनी लीलाओं को और रुकमिनी के अगाध प्रेन को हृदय में धारन करते हुए आतित्य
12:29स्विकार किया
12:30उनके मन में और भी प्रश्न उमड रहे थे
12:34उन्होंने देखा कि कैसे श्री कृष्न और रुकमिनी का प्रेम एक दूसरे में समाया हुआ था
12:40उनकी हर ग्रिष्टी, हर स्पर्ष एक गहन आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक था
12:45इस दिव्य प्रेम गाथा को अपनी आखों से देख कर नारद मुनी का हृदय भक्ती और आनंद से उतप्रोथ हो
12:53गया
12:53और उन्हें परम सत्य का एक नया आयाम मिला
12:58संतोष और नई जिग्यासा के साथ देवर्षी नारद ने रुक्मिनी के महल से विदा लेने का निश्चय किया
13:04ताकि वे श्री कृष्ण की अन्य पत्रानियों के महलों का भी भ्रमन कर सकें और उनकी लीलाओं को जान सकें
13:13देवर्शी नारद ने रुकमिनी के महल से विदा लेने का मन बनाया ही था कि उनके मन में एक और
13:19गेहन जिग्यासा जागरित हुई जिसने उनके कदमों को क्षण भर के लिए रोक दिया
13:25वे वापस मुडे जहां महारानी रुकमिनी अपनी दिव्य आभा के साथ विराजमान थी और उनके मुख पर एक अलोकिक शांत
13:33मुस्कान थी जैसे वे नारद के प्रश्न को पहले ही जान चुकी हो
13:39अत्यंत विनमर्ता से नारद मुनी ने महारानी रुकमिनी से उनके और द्वारकाधी श्री कृष्ण के विवाह की अद्वितिय और रहस्यमेई
13:48गाथा सुनाने का अनुरोध किया
13:51महारानी रुकमिनी ने एक गहरी, मधूर सांस ली और अपने मन के कक्षों में छिपी उस दिव्य प्रेन कहानी के
13:58प्रिष्ठों को धीरे-धीरे खोलना आरंब किया, जिसकी शुरुवात विदर्भ राज्यसे हुई थी
14:05उन्होंने बताया कि कैसे वे विदर्भ नरेश भीश्मक की पुत्री थी, जो अपनी सुन्दर्ता, गुन और भक्ती के लिए चारों
14:13दिशाओं में विख्यात थी
14:16बाल्यकाल से ही उन्होंने भग्वान श्रीक्रिष्ण की अध्भुत लिलाओं और अनुपम सौंदर्य की कहानिया सुनी थी, जिससे उनका हृदय द्वारकाधीश
14:25के प्रती अगात प्रेम से भर उठा था
14:29अपने मन ही मन में, रुक्मिनी ने श्रीक्रिष्ण को ही अपना जीवन साथी मान लिया था, यह जानते हुए भी
14:36कि उनके भाई रुक्मी के मन में कुछ और ही योजनाय थी
14:41उनका बड़ा भाई रुक्मी, एक अहंकारी राजकुमार, अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से कराना चाहता था, जो की चेदी देश
14:49का क्रूर और घमंडी राजा था
14:52रुक्मिनी का हृदय इस अंचाहे विवाह के विचार से विचलित हो उठा, और उन्होंने अपनी अंतिम आशा श्री कृष्ण पर
15:00केंद्रित की, जिनसे उन्होंने पहले कभी नहीं मिली थी
15:05उन्होंने एक अत्यंत गोपनिय पत्र लिखा, जिसमें अपने प्रेम और अपनी विकट स्थिती का वर्णन किया, और उसे एक विश्वस्निय
15:14ब्राहमन दूत के हाथ द्वार का भेजा
15:17वह ब्राहमन दूत, जिसने राजसी गोपनियता की शपत ली थी, तीवर गती से यात्रा करते हुए, अंत्ता द्वार का पहुँचा
15:25और भगवान श्री कृष्ण के समक्ष उपस्थित हुआ
15:29कृष्ण ने ब्राहमन के हाथ से पत्र लिया, और जैसे ही उन्होंने रुकमिनी के हृदय की पुकार पढ़ी, उनके मुख
15:37पर एक गंभीर द्रड संकल्प और प्रेम की कोमलता एक साथ जलक उठी
15:43बिना किसी विलंब के, द्वार काधीश ने अपनी सेना को कुंडिनपुर की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया, अपने बड़े
15:51भाई बलराम के साथ स्वय रुकमिनी को लेने के लिए निकल पड़े
15:56इधर कुंडिनपुर में अपने विवाह के दिन रुकमिनी का हृदय तीवर धड़क रहा था और उन्होंने देवी अंबिका के मंदिर
16:04में जाकर अश्रुपूर्ण नैनों से श्री कृष्ण के आगमन की प्रार्थना की
16:09जैसे ही रुक्मिनी देवी अम्बिका के मंदिर से बाहर निकली, उनकी आखें अधीर्ता से चारों और श्रीकृष्ण को खोजने लगी,
16:18भीड में हर चहरे पर उनका ध्यान भटक रहा था
16:22ठीक उसीक्षन एक दिव्यरत, जिस पर स्वय भगवान श्रीकृष्ण विराज मान थे, अपनी गर्जना के साथ भीड को चीर्ता हुआ
16:31मंदिर के द्वार पर आ पहुँचा
16:33कृष्ण की द्रिष्टी जैसे ही रुकमिनी पर पड़ी, उन्होंने पलक जपकते ही उन्हें अपने दिव्यरत पर आरूड कर लिया, जैसे
16:41कोई शिकारी अपने शिकार को अचूक रूप से उठा लेता है
16:47यह देख रुकमी और अन्य राजा क्रोध से आगब भूला हो उठे और ततकाल अपने रथों पर चड़कर श्री कृष्ण
16:54का पीछा करने लगे, जिससे युद्ध का बिगुल बज उठा
16:59प्रेम के इस अध्भुत हरण ने कुंदिनपूर की भूमी पर एक अभूत पूर्व हल्चल मचा दी, जहां एक और क्रोध
17:06की ज्वाला भड़क रही थी, तो दूसरी और एक दिव्य प्रेम कहानी का नया अध्याय आरंभ हो चुका था
17:14रुक्मिनी ने नारत को बताया कि कैसे श्री कृष्ण ने उनके भाई रुक्मी सहित सभी विरोधियों को परास्त किया और
17:22इस तरह उनके प्रेम और भक्ती ने सभी बाधाओं को पार कर अपनी विजय पता का लहराई
17:28रुक्मिनी की मनमोहक गाथा सुनने के पश्चात महर्शी नारत ने मुस्कुराते हुए उनसे विदाली और द्वारका के अगले भव्य महल
17:37रानी सत्यभामा के निवास की ओर प्रस्थान किया जहां एक और दिव्य प्रेम कहानी प्रतीक्षा कर रही थी
17:45नारत मुनी शीघर ही द्वारका के उस अनूठे और भव्य महल में पहुँचे जहां से दिव्य आभूशनों की जग्मगाती चमक
17:53और सुगंधित पुश्पों की मादक महक आ रही थी यह स्वया रानी सत्यभामा का असाधारन निवास था
18:01अपने महल में पधारे देवर्शी का स्वागत करने हेतु अत्यंत तेजस्वी और आत्म विश्वास से परिपूर्ण रानी सत्यभामा स्वया आगे
18:10आईं उनके मुख पर एक अनोखा तेज चमक रहा था जो उनके दिव्य सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था
18:18आसन ग्रहेन करने के पश्चात सत्यभामा ने मंद मुस्कान के साथ नारग मुनी से अपने विवाह और श्री कृष्ण के
18:26साथ अपने अध्भुत प्रेम की गाथा सुनानी आरंभ की जिसमें स्यमंतक मनी का एक महत्वपूर्ण स्थान था
18:34उन्होंने बताया कि यह गाथा केवल प्रेम की नहीं बलकि एक दिव्य मनी स्यमंतक की भी है जिसने उनके जीवन
18:42और द्वार का नगरी में अप्रत्याशित घटनाय घटित की और उनकी नेती को श्री कृष्ण से जोड़ा
18:49उनके पिता राजा सत्राजित ने भगवान सूर्य की घोर तपस्या कर एक ऐसी चमतकारी स्यमंतक मनी प्राप्त की थी जिसकी
18:58आभा स्वयन सूर्य के तेज को भी मात देती थी और जो असीन सम्रिध्धी का स्रोत थी
19:05यह स्यमंतक मनी प्रति दिन आठ भार सोना प्रदान करती थी और जहां भी यह रहती वहां कोई दुर्भाग्य, आपदा
19:13या रोग नहीं आता था जिससे द्वार का नगरी असीन सम्रिध्धी और शांती से परिपूर्ण हो गई थी
19:20एक दिन उनके अहंकारी भाई प्रसेन ने मनी को धारण कर जंगल में शिकार करने की इच्छा व्यक्त की, जबकि
19:28श्री कृष्ण ने उसे ऐसा करने से मना किया था, जिसके परिणामों से वह अन्भिग्य था
19:36दुर्भाग्यवश जंगल में एक विशाल और क्रूर सिंह ने प्रसेन पर हमला कर दिया और उसे मार कर उसके शरीर
19:43से चमकती हुई स्यमंतक मनी छीन ली, जिससे एक दुखद अध्याय का सूत्र पात हुआ
19:50परंतु उस क्रूर सिंह को स्वयं पराक्रमी जामवंत ने मार डाला, जिसने अपनी अदमय शक्ती से उसे धराशाई कर दिया
19:58और उसके मुख से वह दिव्य मनी बलपूर्वक निकाल ली
20:03जामवंत उस अध्वितिय स्यमंतक मनी को अपनी गुफा में ले गया, जहां उसने उसे अपने शिशु पुत्र को खेलने के
20:10लिए दे दिया, जो उसकी दिव्य चमक से मोहित हो उठा और उसे एक साधारन खिलोना समझा
20:18जब प्रसेन लोटकर नहीं आया और मनी भी लापता हो गई, तो कुछ स्वार्थी लोगों ने भगवान श्री कृष्ण पर
20:25ही उस बहुमुल्य रत्न को चुराने का जूठा आरोप लगा दिया, जिससे द्वारका में भ्रम और चिंता फैल गई
20:33अपने निर्दोष होने का प्रमान देने और सत्य का पता लगाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने ततकाल मनी की
20:40खोज में निकल पढ़ने का द्रिड संकल्प किया, यह जानते हुए भी कि मार्ग में अनेक बाधाय होंगी
20:47श्री कृष्ण ने मनी की अनोखी दिव्या आभा का अनुसर्ण करते हुए घने जंगलों, दुरगम परवतों और गहरी घाटियों को
20:56पार किया, हर कदम पर सत्य की खोज में अडिक भाव से आगे बढ़ते रहे
21:02गहन खोज के पश्चात, श्री कृष्ण एक अंधकार में विशाल गुफा में पहुँचे, जहां उन्होंने देखा कि जामवंत का पुत्र
21:10उस चमक्ती हुई स्यमंतक मनी से खेल रहा था, जिससे गुफा का अंधेरा भी कुछ पल के लिए छंट गया
21:18जैसे ही श्री कृष्ण ने मनी लेने का प्रयास किया, जामवंत अपने शिशु की सुरक्षा के लिए भगवान से भयंकर
21:25युद्ध करने लगा, जिससे गुफा के भीतर गर्जना और भयंकर ध्वनी गूंज उठी
21:3228 दिनों तक चले उस अप्रतिम युद्ध के दौरान, जामवंत ने अंत्ह श्री कृष्ण में अपने आराध्य प्रभु श्री राम
21:40का दर्शन किया, और वह भक्तिभाव से उनके चर्नों में गिर पड़ा, अपने पूर्व जीवन की स्मृती को पहचानते हुए
21:4729 अपनी भूल का पश्चाताप करते हुए, जामवंत ने स्यमंतक मनी के साथ साथ अपनी सुन्दर पुत्री जामवती को भी
21:56श्री कृष्ण को सहर्ष अर्पित कर दिया, यह जानते हुए कि वे ही उनके योग्यपती हैं
22:03श्री कृष्ण स्यमंतक मनी और नई पतनी जामवती के साथ द्वार का लोटे, जहां उन्होंने सारी सच्चाई का खुलासा कर
22:11अपने उपर लगे कलंग को हमेशा के लिए मिटा दिया और अपनी प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित की
22:19सत्यभामा ने अंत में बताया कि कैसे उनके पिता सत्राजित अपनी गलती का बोध होने पर अत्यंत लज्जित होकर उन्हें
22:27और स्यमंतक मनी को श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया, जो उनकी दिव्य न्यायप्रियता और सत्यभामा के प्रतिप्रेन का सर्वोच
22:35प्रमार �
22:37सत्यभामा की अध्भुत कथा सुनकर देवर्शी नारद उनके महल से आगे बढ़ते हुए द्वार्का की दिव्य शोभा और श्री कृष्ण
22:45की महिमा का चिंतन कर रहे थे
22:48द्वार्का के स्वर्णजडित मार्ग जहां कमल कुंडो में खिले पुष्प और मधुर संगीत की ध्वनी से वातावर्ण सुगंधित था, नारद
22:56को अगले महल की ओर आकर्शित कर रहे थे
23:00अंतर नारद जामवन्ती के महल के भव्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे, जिसकी भव्यता श्री कृष्ण की प्रिय पत्नी के निवास
23:08को दर्शा रही थी
23:10महल में प्रवेश करते ही, नारद ने जामवन्ती को उनके शाही कक्ष में विराजमान देखा और उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया
23:20जामवन्ती ने नारद का सहर्ष स्वागत किया और अपनी गहरी आखों में एक अद्भुत कथा की चमक लिए अपनी प्रेम
23:28गाथा सुनानी आरंभ की
23:31जामवन्ती ने बताना शुरू किया कि कैसे स्यमंतक मनी के रहस्य को सुलजाने के लिए श्री कृष्ण उनके पिता जामवान
23:39की गुफा में पहुँचे थे
23:41उन्होंने बताया कि उनके पिता जामवान ने स्यमंतक मनी को अपनी संतान मान कर श्रीकृष्ण को एक साधारन चोर समझ
23:50कर भीशन युद्ध किया
23:5228 दिनों के अविस्मनिय युद्ध के बाद जामवान को श्रीकृष्ण के दिव्य रूप का बोध हुआ और उन्हें अपने आराध्य
24:00भगवान राम के रूप में पहचाना
24:03अपने आराध्य को पहचान कर लजजित जामवान ने न केवल स्यमन तक मनी बलकि अपनी प्रिय पुतरी जामवन्ती को भी
24:11श्रीकृष्ण को प्रेमपूर्वक अर्पित कर दिया
24:14इस प्रकार मैं अपने स्वामी श्रीकृष्ण की पत्नी बनी और उनकी अनंत लिलाओं का एक अंश बनकर धन्य हुई
24:23जामवन्ती ने प्रेमपूर्ण आखों से नारध को बताया
24:27जामवन्ती की कथा सुनकर नारध ने उन्हें धन्यवाद दिया और अपने अगले पड़ाव कालिंदी के महल की ओर प्रस्थान किया
24:37द्वारका के भव्य उध्यानों और शांत सरोवरों के बीच से गुजरते हुए नारध अपनी वीना पर मधुर धुन छेड़ते हुए
24:44आगे बढ़ रहे थे
24:46कुछ देर बाद नारध उस अनुपम महल के सामने पहुँचे जहां यमुना की पुत्री सुर्यदेव की लाडली कालिंदी निवास करती
24:55थी
24:56कालिंदी के महल में प्रवेश करते ही नारध ने उन्हें एक शांत कक्ष में देखा और आधर पूर्वक उनका अभिवादन
25:04किया
25:06कालिंदी ने नारध का आत्मिय स्वागत किया और अपनी तपस्या और प्रेम की अद्भुत कथा सुनानी आरंभ की
25:14कालिंदी ने बताया की कैसे उन्होंने अपने पिता सूर्यदेव की इच्छा के विरुद्ध भगवान श्री कृष्ण को पती के रूप
25:22में पाने के लिए यमुना के तटपर वर्षों तक घोर तपस्या की
25:27अपनी अविचल भक्ती से प्रसन्न होकर अंत्य योगेश्वर श्री कृष्ण उसके सामने एक दिव्य रूप में प्रकट हुए जिससे यमुना
25:35तटका कंकन प्रकाशित हो उठा
25:38श्री कृष्ण के साक्षात दर्शनकर कालिंदी ने अपनी अनंत काल की अभिलाशा व्यक्त की उनसे बिंती करते हुए की वे
25:47ही उनके शाश्वत पती बने
25:50कालिंदी की अटूट भक्ती से द्रवित होकर, श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी प्रिय पत्नी के रूप में स्विकार किया और
25:57उनसे द्वार का आने का बचन दिया
26:00और इस प्रकार मेरी तपस्या सफल हुई और मैं अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण की होकर धन्य हुई, कालिंदी ने अपनी
26:08कथा का समापन करते हुए कहा
26:11कालिंदी की कथा पूर्ण होने पर देवर्शी नारद ने द्वार का पुरी की अद्वितिय सुन्दर्ता और श्री कृष्ण की लीलाओं
26:19का अवलोकन करते हुए अपने अगले दर्शन की अभिलाशा व्यक्त की
26:25देवर्शी नारद अपने चहरे पर एक मंद मुस्कान लिये द्वार का के वैभव और वहां के निवासियों की प्रसन्नता को
26:32देख अत्यंत आनंदित हुए जहां हर कण में श्री कृष्ण की दिव्यता का वास्था
26:38श्री कृष्ण के लीलाक्षेत्र में और अधिक गहरे उतरने की लालसा से प्रेरित होकर वे उनके भव्य महल की ओर
26:46अग्रसर हुए जहां दिव्य प्रेम की अंगिनत कथाए प्रतीक्षित थी
26:51महल के प्रवेश द्वार पर नारत का स्वागत श्री कृष्ण के विनमर द्वार पालों ने किया जिन्होंने उन्हें परम आदर
26:59के साथ भीतर प्रवेश करने का मार्ग दिखाया
27:03राजमहल के भीतर प्रवेश करते ही नारत की भेंट श्री कृष्ण की प्रियरानी परम सुन्दरी और शांत चित्त वाली मित्रविंदा
27:11से हुई जो एक भव्य कक्ष में विराज मान थी
27:16मित्रविंदा ने अपनी आखों में गहरी भक्ती का भाव लिये नारत का आदर पूर्वक अभिवादन किया उनके दिव्य आगमन से
27:24कक्ष में एक नई उर्जा का संचार हो उठा
27:28नारत ने कालिंदी की कथा के बाद अब मित्रविंदा से उनके जीवन की अलोकिक प्रेन गाथा सुनने की इच्छा व्यक्त
27:36की जिससे वे प्रेना ले सकें
27:39रानी मित्रविंदा ने अपनी मधुर वानी में अपने हृदय की गहराई से निकली कथा का आरंभ किया, जिसमें उनके प्रेम
27:47और नेती का अनूठा संगम था
27:50उन्होंने अपनी युवावस्था का स्मरण किया, जब वे अवन्ती देश की राजकुमारी थी और उनके हृदय में बच्पन से ही
27:58श्रीकृष्ण के प्रती अगाध प्रेम अंकुरित हो चुका था
28:02मित्रविंदा ने बताया कि उनके भाई विंदा और अनुविंदा जो दुर्योधन के कट्टर समर्थक थे, श्रीकृष्ण के प्रती उनके प्रेम
28:11और विवाह की इच्छा के घोर विरोधी थे
28:15अपने स्वार्थवश भाईयों ने एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया, जिसका मुख्य उद्देश अपनी बहन का विवाह किसी शक्तिशाली राजा
28:24से करना था, पर श्रीकृष्ण से नहीं
28:27मित्रविंदा ने भावुक होकर कहा कि उनका हृदय तो पहले ही श्रीकृष्ण को समर्पित था, किसी और से विवाह करना
28:35उनके लिए अकलपनिय था
28:38जब श्रीकृष्ण को स्वयमवर और मित्रविंदा की विवशता का समाचार मिला, तो वे बिना किसी विलंब के स्वयमवर स्थल पर
28:46पहुँचने का निर्णय कर लिया
28:49श्रीकृष्ण अपने अनुपम सौंदर्य और पराक्रम के साथ स्वयमवर सभा में प्रवेश किये, जहां उनकी उपस्थिती से संपून वातावर्ण में
28:58एक दिव्य उर्जा का संचार हो उठा
29:01विन्दा और अनुविन्दा के तीवर विरोध के बावजूद, श्रीकृष्ण ने सभा में उपस्थित सभी शक्तिशाली राजाओं को चुनोती दी, उनके
29:10चहरे पर अदमय साहस और ग्रिड संकल्प था
29:14तत्पश्चात एक भीशन युद्ध छिड़ गया, जहां श्रीकृष्ण ने अकेले ही सभी विरोधियों को पराजित कर अपने अप्रतिम शौर्य का
29:23प्रदर्शन किया
29:25इस विजय केक्षण में मित्रविंदा का मुखमंडल आनंद से प्रफुलित हो उठा और उन्होंने निडर्ता से श्रीकृष्ण के गले में
29:33वर्माला डाल कर उन्हें अपना पती स्विकार कर लिया
29:37उन्होंने बताया कि कैसे श्रीकृष्ण सभी विरोधों को शांत कर उन्हें ससम्मान द्वार का ले आए जिससे उनके हृदय की
29:46वर्षों पुरानी अभिलाशा पूर्ण हुई
29:48नारद ने मित्रविंदा की अध्भुत गाथा सुनकर उनके अटूट विश्वास और श्रीकृष्ण के अदमय पराक्रम की मुक्तकंट से प्रशंसा की
29:59ततपश्चात नारद ने मित्रविंदा को आशिरवाद दिया और अपने दिव्यवीना पर एक मधुर धुन छेड़ते हुए अगली रानी लक्षमना की
30:08कथा सुनने को आतुर हो उठे
30:11नारद मुने अपनी दिव्यवीना के मधुर स्वरों को गुँजाते हुए लक्षमना के भव्य महल की ओर अग्रसर हुए जहां द्वारपालों
30:20ने उन्हें ससम्मान भीतर प्रवेश कराया
30:24लक्षमना रूप और गुणों में अद्वितिये एक भव्य आसन पर विराज मान थी जिन्होंने नारत का अत्यंत आदरसतकार किया और
30:32उन्हें अपने समीप बैठने का आग्रह किया
30:36लक्षमना ने अपनी कथा प्रारंभ की जिसमें उन्होंने अपने स्वयंबर की अद्वितिय शर्त का वर्णन किया जहां कई वीर राजा
30:45विफल रहे थे
30:47उनकी शर्त थी कि जो पानी में देखकर उपर घूमती हुई मचली की आख को भेद देगा वही उनका बरण
30:54करेगा जिसे किसी भी राजकुमार या राजा ने पूर्ण नहीं किया था
30:59जब सभी बलशाली राजाओं ने हार मान ली तब समस्त लोकों के स्वामी भगवान श्री कृष्ण ने उस स्वयंबर में
31:07प्रवेश किया जिनसे एक दिव्य आभा निकल रही थी
31:12लीलाधर श्री कृष्ण ने अत्यंत सहज्ता से धनुष उठाया, जल में प्रतिविंब देखकर लक्षे पर एकाग्र हुए और एक ही
31:20बान से घुमती हुई मचली की आख को भेद दिया
31:24इस अकलपनिय पराक्रम को देखकर सभी उपस्थित जन विस्मय में डूब गए, जबकी पराजित राजा क्रोध और इर्श्या से भरकर
31:33श्री कृष्ण पर आक्रमण करने दोड़े
31:36किन्तु भगवान श्री कृष्ण ने अपने अद्वितिय बल और युद्ध कौशल से उन सभी अहंकारी राजाओं को सहच्ता से परास्त
31:44कर दिया और रनभूमी में शान्ती स्थापित की
31:49ततपश्चात उन्होंने विजी रूप में राजकुमारी लक्ष्मना का हाथ ठाम कर उन्हें ससम्मान द्वार का ले गए जहां उनका विवाह
31:57अत्यंत धूमधाम से संपन हुआ
32:00नारद मुनी ने लक्ष्मना की कथा सुनकर श्रीकृष्ण के अनुपम पराक्रम और उनके प्रेम की गहराई की हृदय से प्रशंसा
32:08की और उन्हें सुखमय दामपत्य जीवन का आशिर्वाद दिया
32:13अपना आशिर्वाद प्रदान करने के बाद नारद श्री कृष्ण की अन्यरानियों की कथाए सुनने की उतकंठा से परिपूर्ण होकर नागनजिती
32:22के भव्य महल की ओर प्रस्थान कर गए
32:26नागनजिती कौशलराज नगनजित की पुत्री नारद का सम्मान पूर्वक स्वागत करती हैं उनके महल में एक दिवेशान्ती और सम्रध्धी का
32:35आभास होता है
32:38नारद के अनुरोध पर नागनजिती ने अपने विवाह की अनूठी कहानी सुनाना शुरू किया जिसमें उनके पिता की कठोर शर्क
32:46छिपी हुई थी
32:48उन्होंने बताया कि उनके पिता कौशल राज नगनजित ने शर्ट रखी थी कि जो साथ अत्यंत क्रूर और शक्तिशाली बैलों
32:56को एक साथ नियंत्रित करेगा वही उनसे विवाह करेगा
33:01कई शुर्वीर राजाओं और राज कुमारों ने उन बैलों को वश में करने का प्रयास किया, किन्तु सभी विफर रहे
33:08और गंभीर रूप से घायल होकर वापस लोट गए
33:12तभी समस्त स्रिष्टी के पालनहार भगवान श्री कृष्ण अपनी दिवियर शक्ति और अप्रतिन सौंदर्य के साथ कौशल राज के दर्बार
33:21में पधारे
33:23भगवान श्री कृष्ण ने बिना किसी संकोच के चुनोती स्वीकार की और अपने अध्भुत पराक्रम से उन साथ भयंकर बैलों
33:31को एक एक करके आसानी से नियंत्रित कर लिया
33:35कौशल राज नगनजित और नागनजिती इस अध्वितिय पराक्रम को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए उनके हृदय में श्री कृष्ण के प्रती
33:44श्रद्धा और प्रेम उमड पड़ा
33:46इसी दिव्यक्षण में कौशल राज नगनजित ने अपनी पुत्री नागनजिती का हाथ भगवान श्री कृष्ण को सौंप दिया और उनका
33:55विवाह बड़े ही धुमधाम से संपन हुआ
33:59नागनजिती की कथा सुनकर नारद मुनी ने उन्हें आशिरवाद दिया और अपनी यात्रा को जारी रखते हुए अब वे रानी
34:07भगदरा के महल की ओर बढ़ चले
34:10नागनजिती की कथा के उपरांट देवर्शी नारद ने अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखी और अब वे द्वारका में रानी भगदरा
34:18के अत्यंत भव्य महल की ओर अग्रसर हुए उनके मन में और भी लीलाओं को जानने की उच्छुकता थी
34:26भदरा के महल में पहुँचते ही नारद का भव्य स्वागत किया गया जहां स्वय रानी भदरा ने एक भव्य राजसी
34:33सभा में उनका आदर सतकार किया उनकी आखों में श्री कृष्ण के प्रती गेहन भक्ती का प्रकाश था
34:41स्वागत के उपरांत नारद ने भदरा से उनके विवाह की अलोकिक गाथा सुनाने का आगरह किया यह जानने की जिग्यासा
34:49से की कैसे वे भगवान श्री कृष्ण की अरधांगिनी बनी
34:53रानी भद्रा ने विनमरता पूर्वक अपनी कथा का आरंभ किया, जिसमें उन्होंने अपने के क्या, के कै राज्य के राजकुमार
35:02भाईयों का वर्णन किया, जो अत्यंत पराक्रमी और श्रीकृष्ण के परम भक्त थे
35:08भद्रा ने बताया कि उनके भाईयों की प्रबल इच्छा थी कि उनकी बेहन का विवाह केवल परम पुरुशोत्तम भगवान श्री
35:15कृष्ण से ही हो क्योंकि वे जानते थे कि वही सबसे योग्यवर हैं
35:21उनके भाईयों ने स्वयन द्वारका जाकर भगवान श्रीकृष्ण को विवाह का प्रस्ताव भेजा जिसे श्रीकृष्ण ने प्रसनता पूर्वक स्विकार कर
35:31लिया इस प्रकार भगरा के भाग्य में दिव्य मिलन सुनिश्चित हुआ
35:36श्रीकृष्ण अपनी द्वारका से चल कर केक्या, केकय, राज्य पहुँचे जहां उनका शाही स्वागत किया गया और विवाह की तैयारिया
35:45पूरे वैभव के साथ आरंभ हुई
35:48भद्रा और श्रीकृष्ण का विवाह केकया, केकय, राज्य में बड़े ही धूमधाम, वैदिक मंत्रो चार और दिव्य आशिरवादों के साथ
35:57संपन हुआ, जो स्वर्ग से भी भव्य प्रतीत हो रहा था
36:01भद्रा की मधूर कथा सुनकर, देवर्शी नारद ने उन्हें दिव्य आशिरवाद प्रदान किया और उनके प्रेम वभक्ती की सराहना की,
36:10उनका हृदय भगवान की अध्भुत लीलाओं से और भी भर गया
36:15अपनी यात्रा के अगले पड़ाव पर नारद मुनी अब द्वारका की एक और रानी, राजकुमारी लक्षमना के भव्य और कलात्मक
36:23महल की ओर अपने चरण बढ़ा चले, उच्सुकता से उनकी कहानी जानने को
36:30लक्षमना के महल में पहुचने पर नारद का उसी प्रेम और आदर के साथ स्वागत किया गया, जहां रानी लक्षमना
36:37ने स्वयं आगे बढ़कर देवर्शी का अभिननदन किया
36:42नारद ने लक्षमना से भी उनके असाधारन विवाह की कथा सुनाने का अनुरोध किया, जिसने सभी रानियों के बीच अपनी
36:50अनूठी परिस्थिती के लिए प्रसिधी पाई थी
36:54लक्षमना ने अपनी कहानी आरंभ की, जहां उन्होंने बताया कि वे मद्रा, मद्र, देश के महाराजा ब्रिहत्सेन की परम सुन्दरी
37:02पुत्री थी, जिनकी ख्याती चारों दिशाओं में फैल चुकी थी
37:07उनकी असाधारन सुन्दर्ता और गुनों के कारण, दूर-दूर के सभी राजकुमार और राजा उन्हें अपनी पत्नी बनाने के इच्छुक
37:16थे और उन्हें पाने के लिए आतुर रहते थे
37:20महाराज ब्रिहत सेन ने अपनी पुत्री लक्षमना के लिए एक भव्य स्वयमबर का आयोजन किया, जहां अनेक पराक्रमी राजा और
37:28राजकुमार उपस्थित हुए, सभी अपनी किस्मत आजमाने के लिए तत्पर थे
37:34स्वयमबर के बीच अप्रत्याशित रूप से भगवान श्रीकृष्ण वहां प्रकट हुए और सभी उपस्थित राजाओं को चकित करते हुए, लक्षमना
37:43को अपने साथ लेकर चले गए, एक अध्भुत पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए
37:49अन्य राजाओं ने क्रोधित होकर श्रीकृष्ण का पीछा करने का प्रयास किया, किन्तु भगवान की माया और पराक्रम के सम्मुख
37:57उनका कोई भी प्रयास सफल न हो सका और वे निराश लोट गए
38:02इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने लक्षमना को द्वार का ले जाकर उनसे विधिपूर्वक विवाह किया, और यह विवाह भी उनकी
38:11असीमित लीलाओं और प्रेन का एक और अध्भुत प्रमान बन गया
38:16सभी रानियों की अनोखी प्रेन गाथाए सुनकर देवर्शी नारद विस्मय से भर उठे उन्हें श्रीकृष्ण की अनन्त लीलाओं, प्रत्येक भक्त
38:25के प्रती अग्वितिय प्रेम और उनकी सर्वशक्ति मानता का गहरा अनुभव हुआ
38:31नारद ने समझा की श्रीकृष्ण प्रत्येक प्रानी से उनके भाव के अनुसार संबंध स्थापित करते हैं और उनके प्रत्येक विवाह
38:39का सार केवल दिव्य प्रेम और उनकी असीन शक्ति का प्रदर्शन है जो सभी को आनन्दित करता है
38:47नारद ने अब पूर्णता आत्मसात कर लिया था कि भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला, प्रत्येक संबंध और प्रत्येक क्रिया केवल
38:56और केवल धर्म की स्थापना, भक्तों के उद्धार और दिव्य प्रेम के सर्वोच्च प्रदर्शन हेतु ही होती है
39:04उनके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रती अथा, भक्ती और कृतग्यता का एक ऐसा प्रबल प्रवाह उमड पड़ा, जिसने उन्हें आनंद
39:12के परम शिखर पर पहुँचा दिया
39:15देवर्शी नारद ने अपने मन में श्रीकृष्ण की असीमित लीलाओं, उनकी प्रत्येक रानी के प्रती अध्वितिय प्रेम और उनकी सर्वशक्ति
39:24मानता की दिव्य स्मृती को शांत भाव से पुनह स्थापित किया
39:28अब संतुष्टी और आध्यात्मिक पूनता का अनुभव करते हुए, देवर्शी नारद ने द्वारका से अपने प्रस्थान का निश्चय किया, ताकि
39:38वे अपने दिव्य संगीत और भगवन नाम का गुनगान ब्रहमान्ड में जारी रख सकें
39:44द्वारका के राजसी कक्ष में प्रवेशकर, नारद ने नमरता पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से अपने आगे के यात्रा की अनुमती मांगी
39:54भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मधुर मुस्कान के साथ नारत की प्रार्थना स्विकार की, उनके मुख पर संतुष्टी और प्रेम
40:02का दिव्य भाव छलक रहा था
40:04नारत ने अत्यंत भावुक होकर भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में अपना शीष जुकाया और अपनी असीम कृतग्यता व्यक्त की,
40:13जिन्होंने उन्हें यह अद्भुत दिव्य अनुभव प्रदान किया था
40:17श्री कृष्ण ने नारत को प्रेम पूर्वक उठाया और उनके सिर पर अपना वरध हस्त रखकर उन्हें आगामी यात्रा के
40:25लिए आशिरवाद प्रदान किया
40:28रानी रुकमिनी, सत्यभामा और अन्य सभी रानियों ने भी नारत को सम्मान पूर्वक विदा किया, उनके मुखमंडल पर दिव्य प्रेम
40:37और श्रद्धा के भाव थे
40:39अपने प्रस्थान से ठीक पहले, नारत ने अपनी दिव्य वीना को धीरे से उठाया और उसकी तारों को अपनी उंगलियों
40:47से सहलाते हुए, अगले मधुर गुनगान के लिए तयार किया
40:52उन्होंने एक अंतिम बार द्वार का नगरी के भव्य महलों और स्वर्ण शिक्रों को देखा, उनके नेत्रों में आनंद और
41:00स्मृतियों का गहरा भाव जलक रहा था
41:03उनके मन में अब कोई प्रश्न, कोई संदेह नहीं था, केवल भक्ती और शान्ती का एक गहन सागर था, जो
41:11उन्हें पूर्णता का अनुभव करा रहा था
41:14अंतर देवर्शी नारद ने अपने आराध्य भगवान श्रीक्रिश्न, उनकी रानियों और पूरी द्वार का नगरी को हृदय से प्रणाम करते
41:23हुए, अपने अगले लोग की ओर प्रस्थान करने की तैयारी की
41:28भगवान श्रीक्रिश्न और रानियों की दिव्यच्षवी को अपने हृदय में संजोए, नारद ने अपनी वीना बजाते हुए आकाश की ओर
41:36धीरे-धीरे उपर उठना प्रारंब किया
41:39जैसे जैसे नारद उपर उठते गए, द्वार का नगरी धीरे-धीरे नीचे एक स्वर्ण बिंदु में परिवर्तित होती चली गई,
41:47लेकिन उसकी चमक उनके हृदय में अक्षोन रही
41:52देवर्शी नारद अब ब्रह्मांड के अनंत विस्तार में विचर्ण कर रहे थे, उनके चहरे पर वही अलौकिक आनंद और उनके
41:59हृदय में श्रीकृष्ण के प्रती अटूट भक्ती थी
42:04उनके रोमरोम में भग्वान श्रीकृष्ण के दिव्यगुन, प्रेम और सर्वशक्तिमान्ता का अनुभव समाया हुआ था, जो उन्हें निरंतर आनंदित कर
42:12रहा था
42:14नारत की वीना से निकलने वाला मधूर संगीत ब्रह्मान्ड के कोने-कोने में गूंज रहा था, जो सभी लोकों को
42:21भगवन नाम के अमरित से सिंचित कर रहा था
42:25यह अद्भुत यात्रा और अनुभव नारत के संकल्प को और भी द्रिड कर गया कि वे निरंतर भगवान के गुनों
42:32का गान करते रहेंगे, अपनी वीना के माध्यम से हर जीव तक उनका संदेश पहुचाते रहेंगे
42:39इस प्रकार देवर्शी नारद अपनी दिव्य यात्रा पर अग्रसर हुए, भक्ती, ज्यान और वैराग्य के एक अध्भुत प्रतीक के रूप
42:48में समस्त ब्रहमांड में भगवान श्री कृष्ण के नाम का निरंतर गुनगान करते हुए