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श्रीमद्भागवत महापुराण के १०वें स्कंध के अंतिम अध्याय (अध्याय ९०) में प्रवेश करें! जानिए कैसे द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपनी १६,१०८ रानियों के साथ दिव्य क्रीड़ाएँ कीं और कैसे रानियों का प्रेम परम दिव्य उन्माद (Prem-Unmada) में बदल गया। इस एपिसोड में हम देखेंगे यदुवंश का वह असीमित विस्तार जिसने देवताओं को भी विस्मित कर दिया, और कैसे अब धीरे-धीरे सृष्टि के चक्र में एक नया और रहस्यमयी मोड़ आने वाला है। Canto 10 Concludes! #BhagavataPurana #KrishnaLila #Dwarka #YaduVansh #HinduMythology #Spiritual
Transcript
00:00महा विष्णु के परमधाम से लोटते हुए अर्जुन ने श्री कृष्ण की ओर अत्यंत विस्मय और भक्तिभाव से देखा.
00:08अंतरिक्ष के अगाध विस्तार को चीर्ता हुआ दिव्यरत प्रित्वी लोग की ओर तीवर गती से बढ़ने लगा.
00:15सफर के दौरान अर्जुन को अपने उस अहंकार का स्मरण हो आया जब उसने ब्राह्मन के पुत्र को अपने बानों
00:23से बचाने का दंभ भरा था.
00:26उसे भली भानती बोध हो गया कि उसकी गांडीव धनुष की शक्ती श्री कृष्ण की कृपा के बिना सर्वता व्यर्थ
00:33और तुछ है.
00:35रत की पिछली शया पर सुरक्षित बैठे ब्राह्मन के दस नवजात शिशु श्री कृष्ण के अलौकिक सनरक्षन में मंदमंद मुस्कुरा
00:43रहे थे.
00:45अर्जुन ने अपने मस्तक को श्री कृष्ण के चर्णों में जुका दिया और उसकी आखों से पश्चाताप के अश्रुबह निकले.
00:54परमेश्वर श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अर्जुन की ओर देखा और उसके गर्व का अंत देखकर उसे प्रेमपूर्वक
01:02उठाया.
01:03अर्जुन ने कापते स्वर में स्वीकार किया कि महा भारत के युद्ध में उसकी समस्त विजय केवल प्रभू की असीम
01:11अनुकमपा का फल थी.
01:13उसे समझ आ गया कि इस संसार में मनुष्य केवल एक निमित मात्र है और वास्टविक करता केवल सर्वशक्तिमान इश्वर
01:22ही हैं.
01:23श्री कृष्ण ने अर्जुन को सांत्वना देते हुए समझाया कि अहंकार ही जीवात्मा और पर्मात्मा के बीच का सबसे बड़ा
01:32आवर्ण है.
01:34स्वर्णिन बादलों के आवर्ण को चीरता हुआ वह अलौकिक रथ द्वारका नगरी के भव्य कंगुरों के उपर मंदराने लगा.
01:43द्वारका के नागरिकों ने आकाश में जग्मगाते दिव्य प्रकाश को देख कर हर्श उल्लास के साथ जैकारे लगाने शुरू कर
01:50दिये.
01:52रत अत्यंत मंद गती से नीचे उतर कर उस दुखी ब्राहमन के द्वार पर आकर ठहर गया जहां सब प्रतीक्षा
01:59कर रहे थे.
02:11ब्राहमन की पत्नी दौरती हुई बाहर आई और अपने बच्चों को सीने से लगा कर फूट-फूट कर रोने लगी.
02:19अपनी भूल और प्रभो की अप्रतिम लीला को समझ कर वह ब्राहमन श्री कृष्ण के चर्णों में दंडवत प्रणाम करने
02:26लगा.
02:27अर्जुन ने आगे बढ़कर ब्राहमन से अपने पूर्व अहंकार की ख्षमा मांगी और उसका गर्व पूरी तरह से शान्थ हो
02:35चुका था.
02:37श्री कृष्ण ने अपनी अभय मुद्रा में हाथ उठा कर उस ब्राहमन परिवार को शाश्वत सुख और समरिधी का आशिरवाद
02:45दिया.
02:46इस अलोकिक घटना के पश्चात अर्जुन के हृदय में प्रभू श्री कृष्ण के प्रती सखा और ईश्वर दोनों भाव प्रगाड
02:54हो गए.
02:55दोनों परम्मित्र द्वार का के राजप्रासाद की ओर बढ़ चले और उनके इस दिव्य प्रेम की जोती युगों-युगों के
03:03लिए अमर हो गई.
03:05द्वार का के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही श्री कृष्ण और अर्जुन ने स्वयन को स्वर्ण से निर्मित रत्नों
03:12से जड़े हुए विशालकाय तोरण के सामने पाया, जिसकी शोभा अलौकिक थी.
03:18राजप्रासाद के भीतर प्रवेश करते ही उनकी द्रिष्टी ऐसे भवनों पर पड़ी जो शुद्ध सोने से बने थे और मनियों
03:26की आभासे जगम गाते थे, मानो स्वयन स्वर्ग धर्ती पर उतर आया हो.
03:32हर एक भवन के शिखर पर लगे स्वर्ण कलश और ध्वजाय पवन में लहराते हुए द्वारका के शाश्वत वैभव का
03:39गान कर रही थी.
03:41प्रासाद के अंदरूनी आंगन में कदम रखते ही, उन्हें ऐसे दिव्य उपवन दिखाई दिये जहां कल्पवरिक्ष अपनी स्वर्ण शाखाओं से
03:49इच्छाएं पूर्ण करने वाले फल बरसा रहे थे.
03:53इन कल्पवरिक्षों के नीचे द्वारका के नागरिक आनन्दित होकर विचर्ण कर रहे थे, उनके चहरों पर एक अवर्णनिय शांती और
04:02संतुष्टी का भाव था.
04:04उनके नेत्रों में कोई चिन्ता या दुहक नहीं था, केवल प्रभु श्री कृष्ण के साननिध्य से उपजा शाश्वत हर्ष स्पष्ट
04:12जलक रहा था.
04:14बालक मृदंग और जाज बजाते, युवतिया मधुर स्वर में गीत गाती और वृद्धजन प्रभु की लीलाओं का गुनगान करते हुए
04:22दिन बिताते.
04:24द्वारका में दरिद्रता, रोग या भय का नामों निशान नहीं था, हर प्राणी अश्ट सिध्धी और नवनिधी के एश्वर्य में
04:32लीन था.
04:34वायुमंडल में सदैव दिव्य सुगंध व्याप्त रहती थी, मानो स्वर्ग के पुष्पों की वर्षा निरंतर हो रही हो.
04:41प्रभु श्री कृष्ण की उपस्थिती मात्र से पूरी नगरी एक जीवंत आध्यात्मिक उर्जा से स्पंदित होती थी, जो हर कण
04:49में महसूस की जा सकती थी.
04:52अर्जुन अपने धनुष और बानों को विस्मृत कर इस अनुपम द्रिश को अपलक निहारते रहे, उनका मन प्रभु के एश्वर्य
05:00में डूब गया था.
05:02कहीं श्री कृष्ण की अश्टप्तरानिया दिव्य उद्यानों में विचर्ण करती दिखाई दी, जिनकी शोभा स्वन आभूशनों और सेलेस्टियल वेशभूशा से
05:12द्विगुनित हो रही थी.
05:14उनके प्रत्येक हावभाव में प्रेम, भक्ती और परम शांती जलक्ती थी, जो उनके स्वामी के दिव्य साननिध्य का परिनाम थी.
05:24गंधर्व और अपसराय दिव्य वाद्यों के साथ मनमोहक संगीत की वर्शा कर रहे थे, जो आत्मा को शांत और पुलकित
05:32करता था.
05:33हवन कुंडों से वैदिक मंत्रों की पवित्र ध्वनी गूंज रही थी, जो पूरे वातावर्ण को शुद्ध और पवित्र बना रही
05:41थी.
05:42एक बालक ने कल्पवरिक्ष से फल की इच्छा की और देखते ही देखते उसकी हथेली में स्वर्णिम आभालिये वह फल
05:50प्रकट हो गया.
05:52स्वर्ण कमलों से भरे स्वटिक के समान स्वच जलाशे शहर के सौंदर्य को और बढ़ा रहे थे, जहां हन्स और
05:59सारस विहार करते थे.
06:02अनेक दिव्यपक्षी और पशुभी नगरी में स्वतंत्र विचर्ण करते थे, जो स्वयं प्रभो की कृपा के प्रतीक थे.
06:10संध्या के मंद प्रकाश में द्वार का और भी अधिक अलौकिक प्रतीत होती थी, जब स्वर्ण भवन तारों की भांती
06:18टिम्टि माते थे.
06:20अर्जुन ने अनुभव किया कि द्वार का केवल एक नगरी नहीं, अपितु स्वयं वैकुंठ धाम का एक प्रित्वी पर अवतार
06:28है, जहां काल का भी कोई प्रभाव नहीं.
06:32रात्री के अंतिन पहर में जब उशाकाल की प्रथम किरने समुद्र की लहरों को स्पर्श कर रही थी, तब द्वारका
06:39में ब्रहम मुहूर्थ का पावन समय आरंभ हुआ.
06:43राजप्रासादों के शिखरों पर बैठे अलौकिक पक्षियों की मथुरवानी और मंगल वाध्यवरिंद की ध्वनियों ने संपूर्ण वातावर्ण को भक्तिमय बना
06:52दिया.
06:53परम पावन क्षण आते ही जगत गुरु श्री कृष्ण ने अपनी योग निद्रा का त्याग किया और मंद मुस्कान के
07:00साथ शया त्याग दी.
07:03सर्वप्रथम श्री हरी ने अपने ही अनादी, अनन्त और निराकार ब्रहमा स्वरूप का ध्यान धर्ते हुए स्वय में लीन होने
07:10का अनुपम अभिनय किया.
07:13तदंतर जगतपती ने शुद्ध शीतल जल से स्नान कर अत्यंत पवित्र और उजज्वल श्वेत वस्त्रधारन किये.
07:21सध्यावंदन की विधी संपन करते हुए उन्होंने गायत्री मंत्र का जब किया और जगत की स्थिती एवं कल्यान हेतु पूर्व
07:29दिशा को प्रणाम किया.
07:32ततपश्चात प्रभु अपनी विशाल गौशाला में पधारे जहां सहस्त्रों सुर्भी गाये उनका दर्शन पाने के लिए उच्सुक्ता से बाट जोह
07:40रही थी.
07:41श्री कृष्ण ने स्वय अपने कमलन्यनों के सामने हजारों उत्तम लक्षनों से युक्त गायों को स्वर्ण और रत्नों के आभूशनों
07:49से अलंकृत किया.
07:51उन्होंने प्रत्येक गाय के साथ स्वर्ण मुद्राय और वेश्मी वस्त्र रखकर उन्हें वेदों के ज्याता श्रिष्ट ब्राहमनों को सहर्ष दान
08:00किया
08:02ब्राहमनों ने गदगद कंड से जगत के स्वामी को आशिर्वाद दिया और प्रभु ने भी अत्यंत नमर्ता पूर्वक उनके चरण
08:09स्पर्ष किये
08:11दानकार्य के उप्रांत प्रभु ने स्वयन अपने हाथों से गायों, बच्छडों और पक्षियों को मधुराहार और नवनीक परोसा
08:20ततपश्चात प्रभु ने शास्त्रविधी के अनुसार शुद्धगी, दर्पन और मांगलिक वस्तुओं में अपने सर्वसुन्दर स्वरूप का दर्शन किया
08:29फिर वे अपने वयोवरिध पिता वसुदेव और उग्रसेन के पास गए और उनके चर्णों में प्रणाम कर उनका आशिर्वात प्राप्त
08:38किया
08:39अब प्रभु ने अपनी नित्य सभा के लिए राजसी वेशभूशा धारण की, जिसमें कौस्तुभ मनी और वैजन्ती माला की अलोकिक
08:48आभा चमक रही थी
08:50उसी समय उनका मुख्य सार्थी दारुक सुसजित दिव्य रथ लेकर द्वार पर उपस्थित हुआ, जिसमें चार दिव्य घोडे जुते हुए
08:58थे
09:00श्री कृष्ण बड़े लालित्य और वैभव के साथ रथ पर सवार हुए और उन्होंने स्वय अपने करक्मलों में घोडों की
09:07रास थामी
09:09जैसे ही रथ नगर के मुख्य मार्ग पर निकला, द्वार कावासियों ने सडकों के दोनों ओर खड़े होकर पुष्पवर्शा से
09:16उनका स्वागत किया
09:19रानियों और नागरिकों का हृदय प्रभु के इस मोहिनी रूप को देखकर आनन्द की पराकाष्ठा को प्राप्त कर रहा था
09:27सुधर्म सभा भवन में प्रवेश करते ही समस्त यादव वीर और मंतरीगन प्रभु के सम्मान में अपने स्थानों से खड़े
09:35हो गए
09:36इस प्रकार सर्वव्यापी होकर भी श्री कृष्ण एक साधारन ग्रिहस्थ की भाती नित्य कर्म करते हुए पूर्णत है अनासक्त और
09:45परम सत्य में स्थित रहे
09:47प्रभु श्री कृष्ण के अत्यंत समीप बैठकर भी महारानी रुक्मिनी और अन्य पत्रानियों के हृदय में क्षणभर के वियोग का
09:55भय निरंतर एक मीठा उद्वेग उत्पन्न कर रहा था
09:59श्री कृष्ण के मोहिनी मुखारविंद को निहारते हुए रुक्मिनी जी की आखों से प्रेमाश्रूओं की धाराबह निकली जो उनके अनिर्वचनिय
10:08विरहभाव को स्पष्ट प्रकट कर रही थी
10:12महारानी सत्यभामा प्रभू के नटखट और प्रेमामरित स्वभाव के विचारों में इस प्रकार खो गई कि उनका हृदय पलभर की
10:20दूरी की कलपना मात्र से काप उठता था
10:24जामबवती और कालिंदी राजसी वाटिका में बैठी पक्षियों और व्रिक्षों से समवाद करते हुए पूछ रही थी कि क्या वे
10:31भी श्यामसुंदर के विरह में तड़पते हैं
10:35द्वारका के सरोवरों में खिले हुए कमलों और मंध हवा की सरसराहट को रानिया अपने प्राणप्री श्रीकृष्न के प्रेमपून संदेश
10:44की भाती अनुभव कर रही थी
10:47अपने अंतहपुर में महारानी मित्रविंदा प्रभू श्री कृष्ण के पीतामबर को अपने हृदय से लगा कर उनकी सुगंध और स्पर्ष
10:55का अनुभव करती हुई ध्यानमगन हो गई
10:59महारानी लक्षमना द्वारका के समुद्र की गर्जना से कह रही थी कि क्या वह भी उनकी तरह श्यामसुंदर के विरह
11:06में रात भर जागता रहता है
11:09महारानी भद्रा पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा को देखकर कहने लगी कि प्रभु की मंद मुस्कान के बिना यह शीतल चांदनी
11:17भी उनके हृदय को संतप्त कर रही है
11:21समस्त रानिया एक साथ एकत्रित होकर श्रीकृष्ण के दिव्य नाम और लिलाओं का संकीर्तन करने लगी जिससे संपूर्ण महल दिव्य
11:30उनमाद में डूग गया
11:32आकाश मार्ग से गुजरते हुए देवर्शी नारद रानियों के इस अध्वितिय प्रेम और विर्हभाव को देखकर स्तब्ध और भक्तिरस से
11:40सराबोर हो गए
11:42दिव्य उनमाद की स्थिती में महारानी रुकमिनी एक पुष्पित कदंब के व्रिक्ष को ही श्री कृष्ण समझ कर उससे लिपट
11:50गई और प्रेम विवल हो गई
11:52तभी भक्तों के संकठारी प्रभु श्री कृष्ण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने अत्यंत वात्सल्य पूर्वक रुकमिनी के प्रेमाश्रूओं को अपने
12:01कमलहस्ट से पोंच दिया
12:04सत्यभामा प्रभु के श्री चर्णों में कमल पुष्प अर्पित करते हुए गदगद कंट से बोलने लगी कि प्रभु के बिना
12:11उनका जीवन निश्प्राण है
12:14रानियों के कंट से निकले विरहगीत की मधुर ध्वनी द्वारका के विशाल स्वर्ण निर्मित गलियारों और महलों में गूंजने लगी
12:23द्वारका का संपूर्ण वातावर्ण प्रेमभक्ती और अलौकिक सुगंध से भर गया जैसे पूरा नगर ही प्रभु के प्रेमामृत में लीन
12:31हो गया हो
12:33श्री कृष्ण ने एक ही समय में अपनी समस्त सोलह हजार रानियों के अंतहपुर में उपस्थित होकर उनके चंचल मन
12:40को आश्वस्थ किया
12:43रानियों को यह परम ज्यान हुआ कि उनके प्रानप्रिय श्यामसुंदर केवल उनके सामने ही नहीं बलकि उनके प्रत्यक श्वास और
12:51हृदै स्पन्दन में बसते हैं
12:54देवर्शी नारद ने अपनी वीना की तान पर रानियों के इस निशकाम और अमर प्रेन का गान करते हुए देवलोग
13:02की ओर प्रस्थान किया
13:04संध्याकाल की वेला में द्वार का नगरी एक अलोकिक प्रकाश से जग्म का उठी और चारों और केवल वन्शी की
13:11मधुरतान का आभास होने लगा
13:14इस प्रकार रानियों का यह दिव्य विर्हभाव श्री कृष्ण के प्रती अनन्य भक्ती की पराकाश्था बन गया जो संपूर्ण संसार
13:23को प्रेन का मार्ग दिखाता है
13:26विर्ह की तीवर वेदना से व्याकुल होकर महारानी रुक्मिनी अपने विशाल महल की संगमर्मर की अट्टालिका पर आई और समुद्र
13:34की गरच्ती लहरों को देखकर अत्यंत भावुखो उठी
13:39उसी क्षण अश्रुपूरित नेत्रों के साथ महारानी सत्यभामा भी वहां पहुची और उन्होंने भी समुद्र की अशांत लहरों में अपने
13:48प्रियतम श्यामसुंदर की खोज शुरू कर दी
13:51द्वारका की अन्यरानिया भी इस दिव्य विर्हभाव में मगन होकर छत पर एकत्रित हो गई और उनका हृदय गोविंद के
13:59प्रेम के उन्माद से पूरी तरह भर गया
14:03रुक्मिनी जी ने तडपते हुए विशाल सागर की और अपनी कोमल भुजाएं फैलाईं और उससे पूछा की क्या वह भी
14:10गोविंद के मधुर स्पर्ष के बिना रात भर जाता रहता है
14:16सागर की उठती और गिर्ती हुई लहरें मानो रानियों के हृदय की गहरी आहों और विरह की तीवर ज्वाला को
14:23ही प्रतिबिम्बित कर रही थी
14:24तब सत्यभामा जी ने आकाश में उमरते हुए काले बादलों की ओर देखा और अत्यंत व्याकुल स्वर में उन्हें पुकारना
14:33प्रारंभ कर दिया
14:36उन्होंने बादलों से पूछा की क्या उन्होंने भी उनके प्रिय श्याम सुन्दर के सुन्दर और सघन नीले शरीर के रंग
14:43को चुरा कर स्वयन को इस रूप में ढाला है
14:47रानियों के इस दिव्य विलाप को सुनकर बादलों ने भी महल के उध्यानों पर धीरे-धीरे बुन्दाबांदी शुरू कर दी,
14:54जैसे वे भी उनके दोहक में आसु बहा रहे हूं
14:58इसके बाद महारानी रुकमिनी ने गगन में चमकते हुए पूर्ण चंद्रमा की ओर देखा, जिसकी शीतल किरने आज उन्हें विरह
15:07की अगनी के समान प्रतीत हो रही थी
15:10उन्होंने चंद्रमा से प्रश्ण किया कि क्या वह भी मुकुंद की उस मंद मुस्कान को न देख पाने के कारण
15:17इतना पीला और निस्तेज हो गया है
15:21तभी समुद्र तट पर रोते हुए चक्रवात पक्षियों के एक जोडे ने इन विर्विकल रानियों का ध्यान अपनी और आकरशित
15:29किया
15:30सत्यभामा जी दोड कर बालकनी के किनारे गई और उन पक्षियों से पूछने लगी कि क्या वे भी अपने परमेश्वर
15:38से बिछड कर इस कदर विलाप कर रहे हैं
15:41उसी समय महल के गलियारों से होकर कंदंब के फूलों की सुगंध लेकर एक मंद और शीतल वायू बहने लगी
15:50रुक्मिनी जी ने पवन्देव से मनुहार करते हुए पूछा कि क्या वे प्रभो के श्री अंगों को छुकरा रहे हैं
15:57और क्या उनके लिए कोई संदेश लाए हैं
16:01तभी छत पर बैठे मोरों ने अपने सुन्दर पंख फैला दिये और रानियों को उन पंखों के चंदोवे में श्री
16:08कृष्ण के मुकुट का दिव्य आभास होने लगा
16:12सत्यभामा जीने भाव विहवल होकर चमेली की एक बेल को गले से लगा लिया और रोते हुए पूछा की क्या
16:19वह भी केवल हरी के आलिंगन की प्रतीक्षा में खिल रही है
16:24इस प्रकार द्वारका के चारों ओर की पूरी प्रकृती, सागर, गगन, वायू और पक्षी केवल श्री कृष्ण के नाम की
16:32ध्वनी से गूझ उठे
16:34इस अलौकिक और चरम आध्यात्मिक प्रेमों माद की स्थिती में रानियों और प्रकृती के बीच का सारा भेद पूरी तरह
16:42समाप्थ हो गया
16:44उनके पवित्र अश्रों ने उनके हृदै से सांसारिक चेतना के अंतिम अंश को भी धो दिया और वहां केवल अनन्य
16:52भक्ती का प्रकाश चमकने लगा
16:55जैसे ही वे रानिया पूर्ण आत्मस्मर्पन के भाव में धर्ती पर बैठीन श्रीकृष्ण की अलोकिक उपस्थिती का आभास उन्हें एक
17:03दिव्य सुनहरे आलिंगन की भाती घेरने लगा
17:07इस अलोकिक आलिंगन के पश्चात श्रीकृष्ण अपनी प्रेमविवल रानियों के हृदय की जलन को शांत करने के लिए उन्हें द्वारका
17:15के विशाल और कमल से भरे दिव्य सरोवर की ओर ले चले
17:20सरोवर से उठती शीतल मंद सुगंधित वायू ने जैसे ही रानियों के अंगों को छुआ, उनके विर्हताप से तप्त मन
17:28में एक अभूत पूर्व शीतलता का संचार होने लगा
17:32जैसे ही श्री कृष्ण ने अपने दिव्य चरंकमलो को उस निर्मल जल में रखा, संपूर्ण सरोवर स्वर्णिम तरंगों और अलौकिक
17:40प्रकाश से जगमगा उठा
17:43अपने प्राणप्रिय स्वामी का अनुसर्ण करते हुए रानिया भी मुस्कुराते हुए जल में उत्री और उनके स्पर्ष से सरोवर का
17:51जल और भी अधिक पवित्र और शीतल हो गया
17:54श्री कृष्ण ने अत्यंत स्नेहपूर्वक अपनी अंजुली में शीतल जल भरकर महारानी रुकमिनी के उपर छिड़का जिससे उनके मुखमंडल पर
18:04लज्या और आनंद की सुन्दर लालिमा छा गई
18:08महारानी सत्यभामा ने भी चंचलता से भरकर अपने कमनीय हाथों से जल की धारा श्री कृष्ण पर फेंकी और उनकी
18:16मधुर किलकारी से संपूर्ण तट गुंज उठा
18:20देखते ही देखते अन्यरानिया भी इस दिव्य जलक्रीडा में सम्मिलित हो गई और हाथों में सुगंधित कमल लेकर अपने प्रभु
18:28पर जल की फुहारे बरसाने लगी
18:31श्री कृष्ण ने एक नटखट बालक की भाती सरोवर की गहराईयों में डुपकी लगाई और अगले ही क्षण एक विशाल
18:39नीले कमल की भाती जल की सतह पर प्रकट हुए
18:43जल के भीतर ही रानियों ने अपने कोमल हाथों से ताजे कमलों की सुन्दर मालाय बनाई और अत्यंत भाव विभोर
18:50होकर अपने स्वामी के गले में पहना दी
18:54इस अलोकिक द्रिश को देखने के लिए आकाश में बादलों का समू उमड़ पड़ा और स्वर्ग लोक का संपूर्ण वातावर्ण
19:02स्वर्णिन कांती से भर गया
19:05ब्रहमा शेव इंद्र आदी समस्त देवता अपने अपने अलोकिक विमानों पर सवार होकर इस परम पवित्र प्रेमलीला के साक्षी बनने
19:13के लिए एकत्रित हो गए
19:16गंधर्वों ने अपने मधुर वीनावादन से संपूर्ण दिशाओं को गुंजाय मान कर दिया और अपसराय आकाश में दिव्यन रित्य करते
19:24हुए आनंदमगन हो गई
19:27देवताओं ने अपने हाथों से मंदार और पारिजात के अलौकिक पुष्पों की वर्षा आरंभ की जो आकाश से गिरकर सरोवर
19:35के जल पर तैरने लगी
19:38पुष्पों की इस अलौकिक वर्षा ने सरोवर को एक महकते हुए दिव्य कालीन में बदल दिया जिसके मध्य श्री कृष्ण
19:45और उनकी रानिया साक्षात प्रेन का प्रतीक लग रहे थे
19:50श्री कृष्ण ने जल में से एक विशाल कमल का डंठल उठाया और उससे जल की बूंदे छिटका कर अपनी
19:57रानियों पर अलौकिक आनंद की बौचार कर दी
20:01इस दिव्य जलक्रीडा के प्रभाव से रानियों का विर्हता पूर्णता शांत हो गया और उनका हृदय परमशांती और आध्यात्मिक उल्लास
20:10से भर उठा
20:12महर्शी नारद भी अपने विमान में बैठकर इस अलौकिक ग्रिश्य को देख रहे थे और अपनी वीना पर नारायन नारायन
20:20का नाम जबते हुए अश्रुपात कर रहे थे
20:23अस्ताचल गामी सूर्य की स्वर्णिम किर्णों ने जल की सतह पर श्री कृष्ण के श्याम वर्ण के साथ मिलकर एक
20:30अध्भुत नीले और सुनहरे रंग का संगम रच दिया
20:34जल क्रीडा पूर्ण होने के पश्चात श्री कृष्ण और उनकी रानिया परम त्रिप्थ होकर सरोवर के तट पर बाहर आई
20:42जहां प्रकृती स्वयं उनके स्वागत में जुकी हुई थी
20:46इस प्रकार द्वारका का यह अंतिम वैभव और प्रेम का जल उत्सव संपूर्ण ब्रहमांड में भक्ती और आध्यात्मिक आनंद के
20:55सर्वोच शिखर के रूप में अमर हो गया
20:58जलक्रीडा के उस दिव्य उत्सव के उपरांत द्वारका की स्वर्णम्धित सडकों पर यदुवन्शियों की असीमित भीड का एक नया कोलाहल
21:07गूंजने लगा
21:08जैसे जैसे समय बीटता गया द्वारका के गगन्चुम्भी स्वर्ण महलों की संख्या लाखों में पहुँच गई जिससे यह दिव्य नगरी
21:17अनंत्ता का प्रतीक बन गई
21:20राजप्रासादों के विशाल आंगनों में नील्मनी और सोने के खिलोनों से खेलते लाखों दिव्य यदुवन्शी बालक साक्षात देवताओं के समान
21:29प्रतीत होते थे
21:31नगर के चारों और बने विशाल और भव्य गुरुकुलों में वेदपाथी रिशियों द्वारा लाखों राजकुमारों को एक साथ शास्त्रों का
21:39ज्यान दिया जा रहा था
21:41अस्त्रशस्त्र की शिक्षा प्राप्ट करते हुए लाखों तरोन यदुवन्शी योध्धा अपने धनुशों की टंकार से दिशाओं को कम्पित कर रहे
21:49थे
21:51स्वर्नधूल से भरे अखाडों में मल्लयुध का अभ्यास करते हुए अंगिनत पराक्रमी योध्धाओं के विशाल शरीर सूर्य की किर्णों में
21:59चमक रहे थे
22:01द्वारका के चौड़े मार्गों पर पंक्तिबध खड़े लाखों स्वर्न रत और विशाल का एरावत जैसे हाथी इस सामराज जिके असीन
22:09वैभव की गवाही दे रहे थे
22:13यदुवंश के वृद्ध राजा उग्रसेन अपने विशाल रत्नजरित सिनहासन पर बैठ कर इस असीमित विस्तार को देख कर विस्मय और
22:21संतोष से भर गए
22:23अनंतशेश के अवतार महाबली बलराम अपने विशाल कंधे पर हल और मुसल धारन कर लाखों योधाओं को युद्ध की अचुपकला
22:31सिखा रहे थे
22:33अपने दिव्य प्रासाद के जरोखे से पूर्ण पुरुशोत्तम श्री कृष्ण इस असीमित सामराज्य को निहारते हुए एक रहस्यमई और गंभीर
22:42मुस्कान बिखेर रहे थे
22:45आकाश मार्ग से गुजरते हुए देवर्शी नारत द्वारका की इस अभूत पूर्व जनसंख्या और समरिध्धी को देखकर वीना बजाते हुए
22:54ठिठक गए
22:55दिव्य आभूष्णों और रेश्मी वस्त्रों से सुसजित लाखों यदुवंशी रानिया अपने समरिध्ध ग्रिहस्थी को इंद्र की अमरावती से भी सुन्दर
23:04बना रही थी
23:06इस सामराज्य की सैने शक्ती इतनी प्रचंड हो चुकी थी कि संपूर्ण ब्रह्मांड की कोई भी आसुरी या दैविय शक्ती
23:14इनका सामना करने का साहस नहीं कर सकती थी
23:18द्वारका के विशाल शस्त्रागारों में दिव्य अस्त्रों की चमक से रात का अंधकार भी सूर्य के समान प्रखर प्रकाश में
23:26बदल जाता था
23:28करोडों बलशाली यदुवंशियों के एक साथ चलने से प्रित्वी देवी भी उनके चरण प्रहार से व्याकुल होकर उनके भारी बोच
23:36को महसूस करने लगी थी
23:38जब यदुवंश की सेना गरुड के अंकित ध्वच को लेकर मार्च करती तो पूरा आकाश उनके विजयगोश और शंकनाज से
23:47गूंज उठता था
23:49द्वारका के अन्नभणारों से प्रतिदिन लाखों लोगों के लिए चप्पन भोग तयार किये जाते थे जहां भूख और दरिद्रता का
23:57नामों निशान भी न था
24:00संध्याकाल में जब लाखों यदुवन्शी एक साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते तो उसकी दिव्यध्वनी सीधे वैकुंठ लोग तक पहुँच
24:08जाती थी
24:10स्वर्ग के देवता भी इस अजे वन्श की बढ़ती हुई शक्ती को देख कर चिन्ता और विस्मय के मिलेजुले भाव
24:17से द्वारका की ओर निहारते थे
24:21समुद्र की लहरों से घिरी द्वारका का यह असीमित विस्तार और अजे वैभव अपने चरम शिखर पर था जो भौतिक
24:28जगत के इतिहास में अमर होने जा रहा था
24:32गंगा के पावन तट पर जहां संध्या की स्वर्णिम किरने जल को स्पर्श कर रही थी
24:38वहां राजा परीच्षित और महर्शियों की सभा शुकदेव गोस्वामी के दिव्य वचनों को सुनने के लिए अत्यंत एकाग्रचित होकर बैठी
24:46थी
24:47शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अमरत्मई द्रिष्टी राजा परीच्षित पर डाली और अत्यंत गंभीर स्वर में दशम सकंध की परम महिमा
24:56का गान आरंब किया जिसने संपूर्ण वातावर्ण को वैकुन्ठ के समान पवित्र बना दिया
25:03महर्शी ने घोशना की की भगवान श्रीकृष्ण के दिव्यचरित्रों से सुसज्जित यह दशम सकंध वास्तव में श्रीमध भागवत महापुरान का
25:11हरिदय है जो जीव के सारे दुखों का समूल नाश कर देता है
25:17उन्होंने राजा को समझाया कि जो कोई भी श्रधापूर्वक गिर्धर गोपाल की इन लीलाओं का श्रवन करता है वह इस
25:25संसार के सबसे भयंकर रोग यानी काम और वासना के जाल से तुरंत मुक्त हो जाता है
25:32संसार की भौतिक वासनाओं को एक धधकती हुई दावानल बताते हुए शुकदेव जी ने कहा कि श्री हरी की कथाएं
25:40उस पर बरसने वाली अमरित की शीतल वर्षा के समान है
25:45जैसे ही राजा परीक्षित इन वचनों को सुन रहे थे उनके भीतर से तक्षक नाग के डसने का भय पूरी
25:52तरह लुक्त हो गया और उनका हृदय पूर्णत है क्रिश्न प्रेम के आनंद में डूग गया
25:58शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा कि द्वार का और व्रिंदावन की ये मधुर लिलाएं केवल मनोरंजन नहीं बलकि जीवात्मा को
26:06परमात्मा से जोडने वाला परम दिव्य सेतु है
26:11सभा में उपस्थित महान रिशिमुनीभी शुकदेव जी के एक-एक शब्द को ऐसे पी रहे थे मानोवे साक्षात वैकुंट के
26:19अमरित रसका स्वाद ले रहे हो
26:22तभी आकाश मार्ग से देवराज, इंद्र, ब्रह्मा और अन्य देवता भी इस अद्भुत सत्सन को देखने के लिए अपने दिव्य
26:30विमानों में वहां एकत्र होने लगे
26:33स्वर्ग से कल्पवरिक्ष के सुगंधित फूलों की वर्षा होने लगी, जिससे गंदा का तट अत्यंत मनमोहक सुगंध और अलोकिक कांती
26:41से सराबोर हो उठा
26:44शुकदेव जी ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य निश्काम भाव से भगवान श्री कृष्ण के चर्णों का ध्यान करता है,
26:51उसके हृदय में साक्षात भक्ती देवी का प्राकट्य होता है
26:56उन्होंने समझाया कि जो ग्यानी जन मोक्ष की इच्छा रखते हैं, वे भी अंत्य भगवान की इन रस्मई लिलाओं के
27:04आगे नत्मस्तक होकर भक्ती मार्ग को ही स्विकार करते हैं
27:09वहां उपस्थित देवर्शी नारद ने भी अपनी वीना की मधुर्तान छेड़ दी, जिससे संपूर्ण ब्रहमाड में केवल हरी नाम की
27:17ही पावन गुंच सुनाई देने लगी
27:20राजा परीक्षित ने हाथ जोड कर अपने गुरुदेव शुकदेव के चर्णों में शीश नवाया और कहा कि आज उनका जीवन
27:28पूरी तरह सफल और धन्य हो गया है
27:32राजा के हृदय में अब श्रीक्रिष्न की छवी अत्यंत स्पष्ट रूप से अनकित हो चुकी थी जो एक नील कमल
27:39के समान अत्यंत सुन्दर और प्रकाश्मान दिखाई दे रही थी
27:44शुकदेव गोस्वामी ने अन्तिम उपदेश देते हुए कहा कि जो लोग इस कथा को दूसरों को सुनाते हैं वे भी
27:52भगवान के परमधाम गो लोग को प्राप्त करते हैं
27:56अब सूर्य पूरी तरह अस्थ हो चुका था और गंगा के जल में तारों की परचाई ऐसी लग रही थी
28:03मानो आकाश स्वयंधर्ती पर उतर आया है
28:07संपूर्ण सभा ने एक स्वर में हरी बोल और श्रीमत भागवत महापुरान की जय का उद्धोश किया जिससे दसों दिशाए
28:15गुंजायमान हो उठी
28:17इस प्रकार राजा परीक्षित ने मृत्यू के भय से मुक्थ होकर अपने मन को पूर्ण रूप से परम पुरुशोत्तम भगवान
28:25श्री कृष्ण के चर्णों में लीन कर दिया
28:29दशम सकंध का यह अंतिम वैभव प्रत्येक श्रद्धालू को यह विश्वास दिलाता है कि कृष्ण की शरण में आने वाले
28:36को संसार का कोई भी कष्ट स्पर्श नहीं कर सकता
28:40अनन्त ऐश्वर्य और शांती से दमक्ती द्वार का नगरी की विशाल प्राचीर पर खड़े होकर भगवान श्री कृष्ण शांत भाव
28:48से समुद्र की उठती लहरों को निहार रहे थे
28:52कुरुक्षेत्र के विनाशकारी युद्ध के पश्चात प्रित्वी का भारी बोज उतर चुका था जिसका विचार करते हुए श्री कृष्ण के
29:00मन में कालचक्र की भावी दिशा स्पष्ट होने लगी
29:04द्वारका की जग्मगाती स्वर्ण गलियों में घूमते यादवलोक अपनी अपार शक्ती और सम्रिध्धी के मद में डूबे हुए आगामी परिवर्तन
29:13से सर्वथा अंजान थे
29:15परम पुरुशोत्तम श्री हरी ने अंतर्मन में अनुभव किया कि उनके भूलोक पर अवतरण का मुख्य उद्देश अब पूर्णता की
29:24ओर अग्रसर हो रहा है
29:27महाकाल की सुख्ष्म तरंगे द्वारका के चारों और फैले नीलमनी जैसे विशाल समुदर के जल में शान्थ हलचल उत्पन्न करने
29:35लगी थी
29:37श्रीकृष्ण भली भानती जानते थे कि प्रित्वी को निशकंटक बनाने के लिए यदुवंश के अदमय बलको भी काल के नियम
29:44के अधीन समेटना अनिवार्य था
29:47उच्छ देवलोक से भगवान ब्रहमा और देवराज इंद्र अगाद श्रद्धा से श्रीकृष्ण की ओर देख रहे थे
29:54यह जानते हुए की द्वापर युग का अंतिम अध्याय निकट आ रहा है
30:00इसी बीच दिव्यमुनी नारद जी अपनी वीना बजाते हुए द्वारका के भव्य प्रांगण में अवतरित हुए
30:06जिनके मुख पर समय के बदलाव की आशंका अंकित थी
30:11नारद मुनी ने श्री कृष्ण के चर्णों में नत्मस्तक होकर उनके मुख मंडल पर छाई एक गूड और रहस्यमें वैराग्यमें
30:19मुस्कान को देखा
30:21प्रभु श्री कृष्ण ने नारद जी की ओर देखते हुए मंद स्वर में संकेत दिया कि काल का पहिया अब
30:28अंतिम चरण की ओर तीवर गती से घूम रहा है
30:33जरोखे से यह सब देखती हुई महारानी रुकमिनी के हृदय में श्री कृष्ण के इस अलौकिक वैराग्य को देखकर एक
30:40अज्यात उथल पुथल मच गई
30:43सत्यभामा और अन्य प्रमुखरानियों ने भी प्रभु की आखों में दूरस्थ क्षितिज की ओर्टी की वह अलौकिक भावुक्ता और दिव्यता
30:51भाम्पली
30:53संपूर्ण राजमहल में एक ऐसा दिव्य उन्माद और अलौकिक सन्नाटा चाने लगा जिसने सभी अन्तहपुर की नारियों के मनों को
31:01गहराई से जखजोर दिया
31:04धलते सूर्य की रक्तिम किरने द्वारका के विशाल स्वन शिकरों पर पढ़कर समुद्र में एक अचरज भरी उदासी की परचाई
31:12धाल रही थी
31:14महामुनी नारद ने प्रभू की अलौकिक लीला के इस भावी स्वरूप को नमन किया और गंभीर चित्प से आकाश मार्ग
31:22की ओर प्रस्थान किया
31:24श्रीकृष्ण अपने दिव्य उपवन की ओर बढ़े जहां पारिजात के पुश्पों की सुगंध में भी काल के आने वाले परिवर्तन
31:32की सुगंध महसूस हो रही थी
31:35संपूर्ण आर्यावर्त के महान रिशियों को भी अपनी तपस्या में प्रकृती के भीतर उठती एक अजीब जंजनाहट और काल का
31:43पच्चाप सुनाई देने लगा था
31:46यदुवन्शी वीर अपने भव्य भवनों में विजोटसव मनाने में व्यस्थ थे इस बात से बेखबर की उनकी असीम शक्ती ही
31:54उनके सहार का माध्यम बनेगी
31:57श्री हरी ने स्वेच्चा से अपनी योगमाया को संकेत दिया कि द्वापर युग के समापन और कलिव के आगमन की
32:04भूमिका तयार की जाएं
32:07द्वारका की रातरी के प्रथम पहर में जगमगाते तारों के नीचे श्रीकृष्न शान्तचित होकर बैठे रहे और काल के सुक्ष्म
32:15निमंतरन को सहर्ष स्वीकार किया
32:18प्रभात की प्रथम किरण के साथ ही द्वारका के तटवर्ती समीर में एक अजीब सा भारीपन और रहस्य में निस्तब्धता
32:26घुलने लगी
32:28सुदूर तपोवन में महान रिशियों को सुरिष्टी के सुक्षम स्पंदनों में युग परिवर्तन का अंतिम संदेश प्राप्थ होने लगा था
32:37ब्रहमर्शी विश्वामित्र ने अपनी उग्र तपस्या को विश्राम देकर काल के अटल आदेश को शांत भाव से स्विकार किया
32:46महर्शी दुरवासा ने अपने प्रदीप्त नेत्रों से नक्षत्रों की गती को देखा और समच गए कि यदुवन्ष के समापन की
32:53घड़ी समीप आ चुकी है
32:56महर्शी कण्व ने अपने शिश्यों को एकत्रित किया और प्रभास छेत्र की ओर प्रस्थान करने का गंभीर संकेत दिया
33:05तीनों महान रिशी एक पवित्र संगम तट पर मिले जहां उनके गंभीर चहरे कालचकर के अवश्यमभावी परिणाम की कहानी कह
33:14रहे थे
33:15जब रिशियों का यह समोह आगे बढ़ा तो वन के हिंसक जीव भी अपनी स्वाभाविक शत्रुता भूलकर मौन प्रणाम में
33:23जुप गए
33:24उच्च लोकों में विराजमान देवता और देवर्शी नारत सांस रोक कर काल की इस मुख बिसात के बिचने का अवलोकन
33:32कर रहे थे
33:34अंतर रिशियों के चरण द्वारका के समीप पिंडारक तीर्थ की पवित्र भूमी पर पड़े जिससे वहां का बायुमंडल अलौकिक तपोबल
33:42से भर गया
33:44सागर की नमकीन लहरेंग पिंडारक के तट पर अचानक शांत हो गई
33:48मानो वे भी आने वाले तूफान की पूर्वाहट को सुन रही हो
33:54द्वारका के राजप्रासादों में क्रीडारत युवा यदुवन्शी राजकुमारों के मनों में अंजाने ही एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी
34:03श्रीकृष्ण के तेजस्वी पुत्र साम्ब ने एक अमंगलकारी शकुन को देखकर हंसकर टाल दिया जो उनके अहंकार की शुरुवात थी
34:13महर्शियों ने नगर की सीमा के बाहर अपने अस्थाई आश्रम की स्थापना की जहां से प्रचंड तपोगनी की उर्जा प्रवाहित
34:21हो रही थी
34:23महर्शी विश्वामित्र ने द्वारका के जगमगाते स्वन शिखरों को देखा और उनके मन में भौतिक वैभव की क्षन भंगुर्ता पर
34:31करुणा जाग उठी
34:33महर्शी दुर्वासा ध्यान मुद्रा में बैठे रहे और उनके चारों और जलती नारंगी आभा ने सांसारिक भ्रमों को भस्न करना
34:41प्रारंभ कर दिया
34:43महर्शी कण्व ने यग्यकुंड में अंतिम आहुती दी और उसका पवित्रधुआ सीधे आकाश की ओर उठकर कालमेघों में विलीन हो
34:51गया
34:53अपने निजकक्ष में विश्राम करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने रिशियों की उपस्थिती को अनुभूत किया और उनके होठों पर एक
35:01मंद दिव्यमुस्कान तैर गई
35:04योगमाया ने सुख्ष्म रूप से यदुवंशी योकों की मती पर अपना आवर्ण बिछा दिया जिससे उनके हृदय में चंचल अहंकार
35:12का बीजार ओपन हुआ
35:15द्वारका के स्वर्ण प्राचीरों से टकराती समुद्र की प्रचंड लहरें मानो किसी आने वाले महाविनाश की टिक-टिक कर रही
35:22उल्टी गिन्ती थी
35:25पिंदारक की इस पवित्र भूमी पर अब रिशियों का तपोबल और यदुवंश का अहंकार एक एतिहासिक मोर पर आमने सामने
35:33खड़े थे

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