द्वारका में एक ब्राह्मण के जीवन में छाया ऐसा अंधकार कि उसके नवजात पुत्र बार-बार मृत्यु के मुख में समा जाते हैं। जब कोई भी योद्धा उसकी सहायता न कर सका, तो अभिमान में चूर अर्जुन ने भरी सभा में प्रतिज्ञा ली कि वह यम से भी बच्चों को छीन लाएगा। लेकिन क्या अर्जुन अपने इस वचन को निभा पाए? जब स्वयं कृष्ण ने अपने मित्र और भक्त की लाज रखने का बीड़ा उठाया, तब हुआ ब्रह्मांड का सबसे अद्भुत सफर! 🚀 कृष्ण और अर्जुन ने कैसे पार किए मृत्युलोक के द्वार, पहुँचे महाविष्णु के धाम और वापस लाए उन अदृश्य बच्चों को? इस दिव्य गाथा में देखें श्रीकृष्ण की सर्वोच्च शक्ति और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Arjuna #MahaVishnu #Dwaraka #HinduMythology #S3Ep89 #Devotion #Spirituality
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00:00द्वार का नगरी, जो सोने और रतनों से जगम गाती थी, अपनी अध्भुत वास्तुकला और शांत वातावर्ण के साथ एक
00:08नए प्रभात की सुनहरी किर्णों में चमक रही थी, जहां जीवन की मधुर धुन गूंजती थी.
00:14इसी भव्य नगरी के एक शांत कोने में, एक धर्मनिष्ट और विद्वान ब्राहमन देवशर्मा अपनी गर्भवती पतनी के साथ अपने
00:23पहले संतान के आगमन की प्रतीक्षा में इश्वरिय प्रार्थना कर रहे थे, उनके हृदय में प्रेम और आशा का संचार
00:31था.
00:32कुछ ही समय में, उनके आंगन में किलकारी गुंजी और एक स्वस्थ सुन्दर पुत्र ने इस संसार में अपने पहले
00:40सांस ली, जिससे देवशर्मा और उनकी पतनी का हृदय अप्रतिम आनंद और कृतग्यता से भर उठा.
00:48किन्तु यह खुशीक्षन भंगुर साबित हुई, क्योंकि जन्म के कुछ ही पलों बाद शिशु रहस्यमय तरीके से अद्रिश हो गया,
00:56जैसे वह कभी था ही नहीं, मानो किसी अद्रिश शक्ती ने उसे क्रूरता से छीन लिया हो.
01:03देवशर्मा की आखों में विश्वास घात और पीडा का गहरा सागर उमड आया, उनके पहले पुत्र का इस प्रकार रहस्यमय
01:11धंग से गायब हो जाना उनके हृदय पर वजर्पात के समान था, जिसने उनकी आत्मा को जख जोर दिया.
01:19द्वारका की गलियों में जल्द ही यह भयावः खबर आग की तरह फैल गई और लोग इस अजीबोगरीब घटना पर
01:26फुस्पुसाते हुए, इसे किसी अशुब संकेत या अद्रिश शाप का परिनाम मानने लगे, जिससे नगरी में भैचा गया.
01:35समय बीता और देवशर्मा के घर एक बार फिर शिशु की किलकारी गुंजी, लेकिन पिछले जन्म की क्रूर नेती ने
01:42फिर से दस्तक दी और दूसरा पुत्र भी जन्म लेते ही अद्रिश हो गया, मानो कोई अद्रिश राक्षस उनके वंश
01:50को लील रहा हो.
01:52एक, दो नहीं, बलकी लगातार चार शिशुओं का इसी तरहे गायब होना देवशर्मा के धैर्य की चरम परीक्षा ले रहा
02:00था, और उनके चहरे पर अब दुख के साथ साथ गहरी निराशा और असहाय क्रोध भी जलकने लगा, उनकी आत्मा
02:07विचलित हो उठी.
02:09द्वारका के नागरिक इस ब्राहमन के लगातार बढ़ते दुख को देखकर विचलित थे, लेकिन कोई भी इस अंजानी शक्ती के
02:17आगे बेबस महसूस कर रहा था, जिसने उनके समाज में भय और अंधकार का साया फैला दिया था.
02:25आठवे गर्भधारन के साथ देवशर्मा और उनकी पतनी की आखों में एक शीन आशा की किरन जगी, परंतु साथ ही
02:33एक गहरे डर और चिंता का साया भी मंदरा रहा था कि कहीं यह क्रूर नेती फिर न दोहराई जाएं,
02:40उनका मन अशांत था.
02:43आशा और भय के बीच आठवे पुत्र का जन्म हुआ, उसकी ननहीसी मुस्कान ने एक पल के लिए ब्राहमन दमपती
02:50के सभी दुख भुला दिये, एक शनिक शांती और अपार प्रेम का अनुभव कराया, मानो स्वर्ग उतर आया हो.
02:59परंतु विधी का विधान अटल था, और उस छोटे से जीवन ने भी अपनी आखों को पूरी तरह खोला भी
03:05न था, कि वह भी पिछले सातों भाईयों की तरह अद्रिश्य लोक में विलीन हो गया, सारी आशाय धूल में
03:12मिल गई और हृदय चूर-चूर हो गया.
03:16अपने सभी पुत्रों को खोकर, देवशर्मा का हृदय चीतकार कर उठा, उन्होंने आकाश की ओर हाथ उठाकर देवताओं और नेती
03:24को कोस्ते हुए, अपने जीवन को एक अथा पीडा का सागर घोशित कर दिया, उनकी आत्मा बिलख रही थी.
03:33द्वारका नगरी ने अपने एक निश्पाप पुत्र की इस अकलपनिय व्यथा को महसूस किया, और एक सामुहिक आह ने पूरी
03:40नगरी को घेर लिया, जहां हर आत्मा ब्राहमन के दुख से संतप्त थी, मानो नगरी स्वय विलाप कर रही हो.
03:48इसी बीच द्वारका के राजप्रासाद में भगवान कृष्ण अपनी दिव्य आभासे मंडित शांत मुद्रा में विराजमान थे, उनके कानों तक
03:58ब्राहमन के हृदय विदारक क्रंदन और नगरी की निराशा की गूँच पहुँच रही थी, वे सब कुछ जानते थे.
04:20एक वृद्ध और ज्ञानी रिशी, जिन्होंने इस त्रासदी का साक्षी था, ने राजदर्बार में आकर सुझाव दिया कि यह कोई
04:28साधारन घटना नहीं है, बलकि इसके पीछे कोई अज्यात और शक्तिशाली दैविय या आसुरी शक्ती का हाथ हो सकता है,
04:36जो नगरी क
04:37गेरे हुए है, ब्राहमन के चीतकार और नगरी के सामुहिक दुख को आत्म साथ करते हुए, भगवान कृष्ण के शांत
04:46मुखमंडल पर एक हलका सा परिवर्तन आया, एक अद्रिश्य संकल्प उनकी आखों में चमक उठा, जो उनके आने वाले पराक्रम
04:54का संकेत था,
04:57देवशर्मा की अंतिम हताश प्रार्थना, जिसमें उनके वंश की समाप्ती का भय था, मानो हवा में तैरती हुई, सीधे द्वारका
05:05अधीश के हृदय तक पहुँची, उनके दिव्य हस्तक्षेप की आचना कर रही थी, जो सभी आशाओं का अंतिम सहारा था
05:14द्वारका को इस रहस्यमय दुख से मुक्ती दिलाने के लिए भगवान कृष्ण ने अपने कर्तव्य का अनुभव किया और उनके
05:22मन में इस अद्रिश शत्रु का सामना करने की एक दिव्य योजना बनने लगी, एक सर्वोच शक्ती सक्रिय हो रही
05:29थी
05:30क्रोध और असीम शोक से भरे ब्राहमन देवशर्मा अपने आठवे मृत नवजात शिशु के शव को अपनी गोध में उठाए
05:38द्वारका की भव्य राज सभा में प्रवेश करते हैं
05:42द्वारका के खाली सिनहासन और राजा उग्रसेन के समक्ष उस निश्प्रान शिशु को रखकर देवशर्मा की आखों में दुहक की
05:51भयंकर ज्वाला धधक उठती है
05:54गले भर आयस्वर में ब्राह्मन ने चिल्ला कर द्वारका के यदुवंशी वीरों को उनकी कायरता और प्रजा की रक्षा नकर
06:02पाने के लिए धिक्कारना शुरू किया
06:05ब्राह्मन ने भरी सभा में राजा उग्रसेन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिस राज्य में मासूम बच्चों की
06:12अकाल मृत्यू होती है
06:14वहां का राजा अवश्य ही पापी और अकर्मन यहोता है
06:19सभा में उपस्थित महान यदुवन्शी योध्धा और व्रिद्ध मंत्री लज्जा से अपने सिर जुका लेते हैं क्योंकि उनके पास इस
06:27भयानक दुख का कोई उत्तर नहीं था
06:31देवशर्मा के करोण विलाप की गूंज महल की उची दीवारों से टकरा कर चारों और बिखर रही थी जिससे पूरी
06:38सभा में एक असहनिय और भारी सननाटा चा गया
06:43ठीक उसीक्षन द्वार का यात्रा पर आये महान पांडव धनूर्धर अर्जुन के भारी कदमों की चाप सभा भवन के प्रवेश
06:51द्वार पर गूंध उठी
06:53अर्जुन ने जैसे ही सभा में प्रवेश किया उनकी द्रिष्टी भूमी पर पड़े मृत शिशु और विलाप करते हुए पीडित
07:00ब्राहमन पर पड़ी
07:02सभा में व्याप्त असहनिय तनाव को महसूस करते हुए अर्जुन के मन में करुणा और एक शत्रिय होने के गर्व
07:10का तीवर मिश्रन उभर आया
07:13ब्राहमन ने नवागंतुक अर्जुन को देखते हुए कटुता से पूछा कि क्या इस आर्यावर्त में कोई ऐसा सच्चा वीर बचा
07:21है जो उसके आने वाले वंश की रक्षा कर सके
07:25ब्राहमन के इंतीखे और मर्मभेदी वचनों ने अर्जुन के स्वाभिमान को जख जोर दिया और उनकी आखों में अपनी अजे
07:33धनुर्विद्या का तेज चमक उठा
07:36अर्जुन तुरंट आगे बढ़े और उस शोका कुल पिता के सामने जाकर खड़े हो गए उनकी विशाल कदकाथी से आत्म
07:44विश्वास की दिव्य किरने फूट रही थी
07:47अपनी अध्वितिय धनुर्विद्या का बखान करते हुए अर्जुन ने घोषणा की की वे अपने दिव्य बानों से ऐसा अभेद्य पिंजर
07:56बना देंगे जिसे स्वयम्रत क्यू भी पार नहीं कर पाएगी
08:00आंकार और आत्म विश्वास के चरम पर पहुँच कर अर्जुन ने भरी सभा में प्रतिग्या की की वे ब्राहमन के
08:07नौवे पुत्र की रक्षा अपने प्राणों की बाजी लगा कर करेंगे
08:12अर्जुन ने आगे कहा कि यदी वे उस बालक की रक्षा करने में अस्फर रहे तो वे स्वयं को एक
08:19धधक्ती हुई चिता में जोगकर अपने क्षत्रिय धर्म का अंध कर देंगे
08:24अपनी प्रतिग्या को और अधिक ग्रेड करते हुए अर्जुन ने कहा कि नौवे बालक को ले जाने के लिए यदी
08:31स्वयं यम्राज भी आए तो वे उनसे भी युद्ध करने को ततपर है
08:37ब्राहमन देव शर्मा ने संशय भरी परंतु आशावान नजरों से इस तेजस्वी पांडव योध्धा को देखा
08:43मानो वह यह आकलन कर रहे हो कि क्या यह वीर वास्तव में नेती को चुनौती दे सकता है
08:51द्वारका के बुद्धिमान वृद्ध मंत्रियों और सभास्दों ने आपस में धीरे-धीरे बुद्बुदाना शुरू कर दिया
08:57क्योंकि वे अर्जुन के इस अत्यंत साहसी और अहंकारी संकल्प से चिंतित थे
09:04जब अर्जुन गर्व से सिर उठाए अपने वचन पर अडिक खड़े थे
09:08तब काल चक्र की एक अद्रिश्य सुक्ष्म लेहर ने उनके इस अहंकार की परीक्षा लेने की तयारी कर ली
09:16पूरी राजसभा में एक गंभीर और रहस्य में सन्नाटा चा गया
09:20मानो प्रकृति स्वयं इस बात की गवाह बन रही हो कि अर्जुन की यह प्रतिग्या उनके जीवन की सबसे बड़ी
09:27परीक्षा बनने जा रही है
09:30जैसे ही ब्राहमन ने कापते हुए अपनी पत्नी के प्रसव की सूचना दी अर्जुन का मस्तक गर्व से उचा हो
09:38गया और उन्होंने अपनी प्रतिग्या को पूरा करने का समया गया माना
09:43सांत्वना देते हुए अर्जुन ने रोते हुए ब्राह्मन से कहा कि उनके बानों की शक्ती के सामने स्वयन यम्राज भी
09:51पैर रखने का साहस नहीं कर पाएंगे
09:54अपने महान धनुष गांडीव को थामे हुए अर्जुन उस ब्राह्मन के साधारन घर के बाहर पहुँचे जहां वातावर्ण में एक
10:02अजीब सी भारी शांती पसरी हुई थी
10:06अर्जुन ने अत्यंत एक आगरता से अपनी आखें बंद की और दिव्य मंत्रों का उच्चारन करते हुए अपने अस्त्रों में
10:13ब्रहमांडी उर्जा का आहवान करना आरंभ किया
10:18गांडीव की प्रत्यंचा से तीवर गती से छूटते हुए स्वर्णिम बाणों ने आकाश को चीर दिया और चारों और एक
10:25अभूत पूर्व प्रकाश फैल गया
10:28देखते ही देखते उन अंगिनत बाणों ने आपस में जुड़ कर उस प्रसव कक्ष के चारों और एक विशाल, चमकीले
10:36और अभेद्य पिंजरे का निर्मान कर दिया
10:39अर्जुन ने अगनी, वायू और जल अस्त्रों का आहवान कर उस सुरक्षा घेरे को बहुस्तरिय और दिव्य शक्तियों से पूरी
10:47तरह सुद्रिट बना दिया
10:49अपने बनाए इस अभेद्य बान पिंजरे के बाहर खड़े होकर अर्जुन गर्वित भाव से पहरा देने लगे, मानोवे साक्षात मृत्यू
10:58को चुनौती दे रहे हूँ
11:00प्रसव कक्ष के भीतर दीपकों के मंद प्रकाश में ब्राह्मन की गर्भवती पत्नी असहनिय पीडा में थी और धाय माये
11:08पूरी ततपरता से उसकी सहायता कर रही थी
11:12तभी उस अभेद्य घेरे के भीतर से एक नवजात शिशु के रोने की कोमल ध्वनी सुनाई दी, जिसे सुनकर बाहर
11:20खड़े अर्जुन के चहरे पर संतोष की लहर डौड गई
11:24अपनी प्रतिग्या को सफल होते देख अर्जुन अत्यंत गर्व से मुस्कुराएं और सोचने लगे कि उन्होंने नेती के क्रूर चक्र
11:32को सदा के लिए परास्त कर दिया है
11:36परंतु उसी क्षन प्रित्वी की गहराई से एक रहस्यमई और काली अलौकिक धुंध उठने लगी जो बानों के उस दिव्य
11:44घेरे को बिना स्पर्ष किये सीधे अंदर प्रवेश कर गई
11:47उस काली शक्ती के स्पर्ष मात्र से अर्जुन के दिव्य बानों की स्वर्णिम चमक फीकी पढ़ने लगी और संपूर्ण सुरक्षा
11:56कवच थर्थराने लगा
11:58अचानक प्रसव कक्ष के भीतर से एक अत्यंत तीवर और अंधाकर देने वाला अलौकिक प्रकाश चमका जिसने क्षण भर के
12:07लिए सब को स्थब्ध कर दिया
12:09जब वह रहस्य में प्रकाश शान्त हुआ तो धाय माओं के देखते ही देखते वह नवजात शिशु केवल खाली वस्त्र
12:17छोड़कर हवा में विलीन हो गया
12:20अपने नवजात पुत्र को फिर से अद्रिश्य पाकर वह ब्राहमन पागलों की तरहे विलाप करता हुआ बाहर दोड़ा और उसने
12:28अर्जुन पर अपनी पूरी शक्ती से चिलाना शुरू कर दिया
12:32अर्जुन अविश्वास और गहरे आघात के साथ उस अभेद्य बानपिंजरे के भीतर भागे जहां सारा सुरक्षा कवच पूरी तरह सुरक्षित
12:41था परन्तु शिशु गायब था
12:44व्याकुल होकर अर्जुन ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से पाताल से लेकर आकाश तक हर दिशा में उस बालक को खोजने का
12:51प्रयास किया किन्तु उन्हें निराशा के अतरिक्त कुछ न मिला
12:56क्रोध और शोक से उन्मत्त होकर ब्राहमन ने अर्जुन के अहंकार की घोर भर्टसना की और उनके महाशक्तिशाली गांडीव धनुष
13:05को एक व्यर्थ खिलोना कहकर कोसा
13:08अपनी करारी हार और नेती के क्रूर खेल के सामने पूरी तरह असहाय होकर पराजित योध्धा अर्जुन ने अत्यंत लजजित
13:16होकर अपना सिर जुका लिया
13:19अर्जुन की गहरी निराशा और गलानी को देखकर लीलाधर श्रीकृष्ण अत्यंत करुणापूर्वक आ गयाए और उन्होंने अपने मित्र के कापते
13:28हुए कंधे पर अपना कोमल धांधस बंधाने वाला हाथ रख दिया
13:34भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत मधुर और शांत स्वर में अर्जुन से कहा कि संसार में कुछ घटनाएं पूरी तरह से
13:41मानविय पुरुशार्थ और क्षमता की सीमाओं से परे होती हैं इसलिए उन्हें स्वयं को दोशी नहीं मानना चाहिए
13:50अपनी पराजय से अत्यंत लज्जित अर्जुन ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने प्रिय सखा क्रिष्ण की ओर देखा जिनकी शांत और
13:58स्नहमई द्रिष्टी ने उनके भीतर के अंधकार और गलानी को तुरंत दूर करना प्रारंभ कर दिया
14:05ततपश्चात द्वारकाधी श्रीक्रिष्ण उस विलाप करते हुए ब्राहमन की ओर मुडे और अत्यंत गंभीर वानी में उसे आश्वस्त किया कि
14:14वे उसके सभी नवजात पुत्रों को मृत्यु लोग से सुरक्षित वापस लाकर सौंपेंगे
14:21श्रीक्रिष्ण के इस अप्रत्याशित और परम शक्तिशाली आश्वासन को सुनकर दुखी ब्राहमन के अश्रुत हम गए और उसके चहरे पर
14:29संशय तथा आशा का एक मिलाजुला भाव उभर आया
14:34माधव ने अर्जुन को समझाते हुए कहा कि यह घटना किसी साधारन दानव का कृत्य नहीं है बलकि इसके पीछे
14:42एक गहरा दैविय रहस्य और परमेश्वर की इच्छा छिपी हुई है
14:47अपने वचनों को सिध्ध करने के लिए योगेश्वर श्री कृष्ण ने अपने दिव्य संकल्प मात्र से अपने परम प्रतापी और
14:55स्वर्णमे रथ को तुरंक वहां प्रकट होने का आदेश दिया
14:59पलक जपकते ही चारों दिव्य और अत्यंत वेगवान घोडो, शैव, सुग्रीव, मेखपुष्प और बलाहक से जुता हुआ भगवान का अलौकिक
15:08रथ गगन से उतर कर भूमी पर स्वर्णिम प्रकाश बिखेरते हुए उपस्थित हो गया
15:14उस सूर्य के समान देदी प्यमान रथ को अपने सम्मुख देखकर पराक्रमी अर्जुन का बुझा हुआ हुआ हृदय एक बार
15:22फिर से असीम उत्साह और विस्मय से भर उठा
15:26जगन्नात श्री कृष्ण ने अत्यंत स्नेह पूर्वक अपना दाहिना हाथ अर्जुन की ओर बढ़ाया और उन्हें अपनी सर्वोच दिव्य शक्ती
15:35का प्रत्यक्ष साक्षातकार करने के लिए इस ब्रहमांडिय यात्रा पर साथ चलने का निमंतरन दिया
15:42अपने सखा का आमंतरन पाकर अर्जुन ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक उनका हाथ थामा और अपने गांडीव धनुष को धारण कर उस
15:50दिव्य रत पर सवार हो गए
15:53जैसे ही श्रीकृष्ण ने रत की सुनहरी बागदोर संभाली वह अलौकिक रत तीवर गती से प्रित्वी की सीमाओं को लांग
16:01कर नीले आकाश की उंचाईयों की ओर वेग से उर्चला
16:06वायुमंडल को चीरते हुए वह रत बादलों और सूर्य की तप्त किर्णों के पार निकल गया जहां से नीचे विस्त्रित
16:13प्रित्वी एक छोटे से नीले गोले की भांती प्रतीत हो रही थी
16:18नक्षत्रों और घूमते हुए ग्रहों के मार्ग से होते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन का वह रत तीवर गती से ब्रहमांड
16:26के अंतिम छोर की ओर बढ़ने लगा जहां केवल अनंत अंतरिक्ष व्याप्ट था
16:32यात्रा करते करते वे भौतिक स्रिष्टी की उस अंतिम सीमा पर पहुँच गए जहां के बाद केवल एक अत्यंत भयावह,
16:40सघन और अभेद्य अंधकार का सामराज्य फैला हुआ था
16:44उस घोर और भयानक अंधकार को सामने देखकर रध के चारों दिव्य घोडे भयभीत हो गए और उनकी गती अचानक
16:52धीमी पड़ने लगी
16:55घोरो को व्याकुल और मार्ग को पूरी तरह से अंधकार में देखकर परमिश्वर श्री कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ में
17:02अपने परम तेजस्वी सुदर्शन चक्र का स्मरण किया
17:07भगवान के स्मरण करते ही करोडों सूर्यों की कांती वाला महातेजस्वी सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ और उसने अपनी तीवर प्रजवलित
17:15किर्णों से उस अनंत और भयानक अंधकार को चीरना प्रारंभ कर दिया
17:21सुदर्शन चक्र के दिव्य प्रकाश द्वारा निर्मित एक सुगम मार्ग का अनुसर्ण करते हुए श्री कृष्ण का वहरत अत्यंत सुगमता
17:29से उस भयावा अंधकार में लोग को पार कर गया
17:33अंधकार की सीमाओं को लांगते ही वे दोनों भौतिक ब्रहमान से परे उस परम दिव्य, स्वयम प्रकाशित और आनंदमई गोलुक्वे
17:41कुंठ धाम की अलोकिक आभा में प्रवेश कर गए जहां परम पुरुष महा विश्नु निवास करते हैं
17:49वहां उन्होंने देखा की एक विशाल अद्भुत कमल के भीतर नील्मणी के समान कांती वाले चतुर्भुज भगवान महाविश्नु शेशनाग की
17:58शयापर दिव्य शान्ती में विराजमान थे जिनके शरीर से करोडों सूरियों की आभा निकल रही थी
18:06भगवान श्रीकृष्न और अर्जुन ने उस अध्भुत द्रिशको निहारा जहां उस परम धाम के सभी सिध पुरुष और मुक्त जीव
18:14अपने आराध्य की स्तुती कर रहे थे और उनके हृदय आश्चर्य तथा भक्ती से भर गए
18:21श्रीकृष्न और अर्जुन ने अत्यंत विनय और आदर भाव से उस परम पुरुष महा विश्नु के चर्णों में दंडवत प्रणाम
18:28किया जिनकी महिमा का वर्णन वेदों में भी दुलब है
18:33महा विश्नु ने अपनी सहसर फनों वाले शेशनाग की शया से उठकर प्रेम पूर्वक कृष्न और अर्जुन को अपने पास
18:41बिठाया और उनसे मधुर शब्दों में समबाद किया
18:45करुणा और वात्सले से भरे महा विश्नु ने श्री कृष्न से कहा हे देव की नंदन मुझे तुम से मिलना
18:52था इसलिए मैंने उन ब्राहमन के पुत्रों को यहां अपने पास बुला लिया था
18:58उन्होंने आगे कहा यह सब मेरी ही एक दिव्य लीला थी ताकि तुम्हारे परमभक्त अर्जुन के साथ तुम स्वय इस
19:06परमधाम में पधारो और अपनी शोभा से इसे और भी प्रकाशित करो
19:12महा विष्णु के ऐसे वचन सुनकर कृष्ण और अर्जुन ने उनके चर्णों में पुना नमन किया उनके हृदय कृत अग्यता
19:19और प्रेन से परिपूर्ण हो गए
19:22तभी महा विष्णु ने अपने दिव्य हाथों से उन सभी ब्राहमन के पुत्रों को प्रकट किया जो एक एक करके
19:30उनके समीप आकर खड़े हो गए उनकी आत्माई शुद्ध और कांतियुक्त थी
19:36महा विष्णु ने उन सभी पुत्रों को श्री कृष्ण को सौंपते हुए कहा
19:40हे कृष्ण ये सभी तुम्हारे ही अंश है और अब तुम इनहें इनके पिता को वापस लोटा सकते हो
19:48श्री कृष्ण ने अत्यंत प्रेम और वादसल्य से उन सभी पुत्रों को अपने दिव्यहरिदय से लगा लिया, जैसे कोई पिता
19:56अपने खोए हुए बच्चों को वापस पाता है
20:00इस प्रकार महा विष्णु की लीला पूर्ण हुई और भगवान कृष्ण ने उनके समक्ष कृतग्यता पूर्वक नकमस्तक होकर अर्जुन और
20:09ब्राह्मन के पुत्रों के साथ वापसी की अनुमती लिद्ध
20:12उनकी आज्या पाकर श्री कृष्ण अपने सार्थी अर्जुन और ब्राह्मन के पुत्रों को लेकर उसी दिव्यरत पर सवार हुए जो
20:21पुनह करोडों सूरियों की आभासे प्रज्वलित हो उठा
20:25वह दिव्यरत पुनह उस अनन्त अंधकार्मय क्षेत्र में प्रवेश कर गया जहां सुदर्शन चक्र का तेज मार्ग बनाता हुआ आगे
20:34बढ़ रहा था
20:35वे तीनों ब्रहमांड के सातों आवरणों को भेदते हुए साथ पाताल लोकों और साथ महासागरों के उपर से होते हुए
20:43पुनह भौतिक जगत की ओर अग्रसर हुए
20:47शन भर में ही वे सभी द्वार का नगरी के राज महल में प्रकट हुए जहां की भव्यता और शांती
20:54ने उनके आग्मन को और भी विशेश बना दिया
20:58ब्राहमन जो अपने पुत्रों के वियोग में अत्यन्त दुखी और व्याकुल थे अपने कक्ष में बैठे इश्वर का स्मरण कर
21:06रहे थे जब उन्हें अपने सामने एक दिव्य प्रकाश पुन्च दिखाई दिया
21:11उस प्रकाश के बीच से श्री कृष्ण, अर्जुन और उनके प्यारे पुत्र प्रकट हुए जिन्हें देखकर ब्राहमन का हृदय आनंद
21:19और विस्मय से फट पड़ा
21:22अपने मृत माने गए पुत्रों को जीवित और श्री कृष्ण के साथ देखकर ब्राहमन अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान के चर्णों
21:30में गिर पड़े उनकी कृतग्यता की कोई सीमा न थी
21:34श्री कृष्ण ने ब्राहमन को उठाया और उन्हें आश्वस्त किया कि उनके पुत्र अब सुरक्षित हैं और उनके साथ ही
21:42रहेंगे उनके कश्टों का अंथुआ
21:46इस प्रकार मृत्यो लोक से महा विश्णु धाम तक की यह असाधारन यात्रा समाप्थ हुई जिसने ब्राहमन के दुख का
21:53निवारण किया और भगवान श्री कृष्ण की सर्वशक्तिमानता को पुनह सिद्ध किया
22:00द्वारका के प्रशांत महल में बैठे अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की ओर विस्मय से देखते हुए उस दिव्ययात्रा के
22:07अध्भुत अनुभवों को स्मरण किया
22:10श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अर्जुन को कार्णोदक सागर की शाश्वत प्रकृती और ब्रहमांड के उद्गम का परम
22:18सक्य समझाना प्रारंभ किया
22:21श्री कृष्ण के शब्दों के स्पर्ष से अर्जुन के मानस पटल पर ब्रहमांड के उस सुदूर छोर का द्रिश जीवन्थो
22:28उठा जहां भौतिक जगत का प्रकाश समाप्थ हो जाता है
22:33उस घोर अंधकार को भेद कर जब वे आगे बढ़े तब उन्हें आध्यात्मिक आकाश की अनंत जोती का दर्शन हुआ
22:41जो भौतिक चक्षूँं से सर्वता परे है
22:45अर्जुन ने देखा कि कैसे सम्पूण भौतिक प्रकृती उस परम कार्णोदक सागर के दिव्य जल में विलीन होने के लिए
22:52आतुर खड़ी थी
22:53उस परम सागर की पवित्र तरंगे किसी साधारन जल की नहीं बलकी साक्षात पर्मानंद और चैतन्य की बहती हुई दिव्य
23:02धाराय थी
23:04इस अनन्त जलराशी के मध्य अर्जुन को उस परम दिव्य पुरुष के दर्शन हुए जिनके रोम रोम से कोटी कोटी
23:11ब्रहमांड उत्पन हो रहे थे
23:14वहां अनन्त शेशनाग की शया पर विश्राम करते हुए महा विश्नु का वह स्वरूप प्रकट हुआ जो संपून स्रिष्टी का
23:21मूल आधार है
23:24महा विश्नु के विशाल अंगों से बहती हुई दिव्यकान्ती पूरे आध्यात्मिक गगन को आलोकित कर रही थी जिसके सामने अर्बों
23:32सूर्यों का तेज भी फीका था
23:35उनके मस्तक पर सुशोभित की रीट और वक्षस्थल पर कौस्तुभ मनी की चमक से पूरा कार्णोदक सागर जग्मगा रहा था
23:44अनंत देव के सहस्र फनों पर चमकते हुए दिव्यमनिरत्न उस अंधकार विहीन धाम में अध्भुत जोती बिखेर रहे थे
23:52जैसे ही महा विश्णु ने अपनी करुणापूर्ण नेत्र खोले संपूर्ण ब्रहमांडिय उर्जा में एक मधुर कमपन उत्पन हो गया
24:02अर्जुन ने विस्मय से देखा कि प्रत्येक श्वास के साथ महा विश्णु के श्रिविग्रह से अंगिनत ब्रहमांड बुलबुलों की भांती
24:09बाहर आ रहे थे और पुना विलीन हो रहे थे
24:13उस परमधाम के शांत कोने में ब्रहमांड के वे मृत बालक पूर्णत सुरक्षित होकर महा विश्णु के चर्णों के समीप
24:21खेल रहे थे
24:23महा विश्णु ने गंभीर और मधुरवानी में कृष्ण और अर्जुन का स्वागत करते हुए उनके पृत्वी पर अवतार लेने के
24:31उद्देश की सराहना की
24:33उन्होंने प्रकट किया कि वे अर्जुन और कृष्ण को अपने समक्ष देखने के लिए ही उन ब्रहमन बालकों को यहां
24:41लेकर आये थे
24:42इस सत्य को जानकर अर्जुन ने समझ लिया कि द्वारका के श्री कृष्ण और क्षीर सागर के स्वामी महाविष्णु में
24:50कोई भेद नहीं है
24:52अर्जुन ने दोनों हाथ जोड कर महाविष्णु के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया और उनके अनन्त एश्वर्य की स्तुती की
25:01जैसे ही श्री कृष्ण ने अपनी लीला समेटी वह भव्य आध्यात्मिक दर्शन अर्जुन के मन में एक अमिट छाप छोड़ते
25:09हुए शान्त हो गया
25:10इस प्रकार श्री कृष्ण की असीम महिमा को जानकर अर्जुन का हरिदय उनके प्रती अनन्य भक्ती और अगाध श्रद्धा से
25:19पुनह परिपूर्ण हो गया
25:22अनन्त शेशनाग की दिव्यशया पर विराजमान भगवान महा विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन की ओर
25:30देखा जिससे संपूर्ण वैकुन्ठ लोक में एक परमशान्ती व्याप्थ हो गई
25:36महा विश्णु ने अपनी गंभीर और बादलों की गर्जना जैसी दिव्यवानी में बोलना आरंभ किया जिससे वैकुन्ठ के कणकण में
25:44एक अलोकिक आध्यात्मिक कमपन उत्पन हो गया
25:48भगवान महा विश्णु ने रहस्य खोलते हुए बताया कि उन्होंने ही उस निर्दोष ब्राहमन के नवजात पुत्रों को मृत्य लोक
25:56से सुरक्षित लाकर अपने इस परम दिव्यधाम में रखा था
26:01उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अध्भुत घटना का एक मात्र उद्देश्य अर्जुन के भीतर छिपे हुए सुक्ष्म अभिमान को नश्ट
26:09करना और उसे उसकी वास्तविक सीमा का बोध कराना था
26:14महा विष्णु ने श्री कृष्ण की ओर संकेत करते हुए कहा कि वे दोनों वास्तव में नर और नारायन हैं
26:21जो प्रित्वी का भार हरन करने के लिए इस युग में अवतरित हुए हैं
26:27परमेश्वर ने अर्जुन को समझाया कि श्री कृष्ण ही स्रिष्टी के आदी और अंत हैं और उनकी परम शक्ती का
26:34अनुभव कराना ही इस संपूर्ण लीला का मुख्य धे था
26:38श्री कृष्ण जो स्वयन पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान हैं महा विश्णु के इन गंभीर वचनों को सुनते हुए अत्यंत शांत, सौमय
26:47और रहस्यमय मुस्कान के साथ खड़े रहे
26:51वैकुंठ लोग की उस्पावन और प्रकाश्मय भूमी पर ब्राह्मन के सभी मृत बालक अत्यंत स्वस्थ, तेजस्वी और प्रसन्न होकर आपस
26:59में खेल रहे थे
27:01महा विष्णु ने अपनी कृपाद्रिष्टी उन ननहे बालकों पर डालते हुए उन्हे श्री कृष्ण और अर्जुन के साथ वापस प्रित्वी
27:10लोग पर भेजने की अनुमती दे दी
27:13अर्जुन का हृदय कृतग्यता और विस्मय से भर गया और उसने अश्रुपूर्ण नेप्रों से महा विष्णु के चर्णों में पुनह
27:20साष्टान प्रणाम किया
27:23श्री कृष्ण ने अपनी योगमाया के प्रभाव से उन सभी बालकों को अपने साथ अत्यंत सुरक्षित और सुलब रूप से
27:31अपने दिव्य रत में बिठा लिया
27:34प्रस्थान के क्षण में भगवान महा विष्णु ने दोनों दिव्य वीरों को अपनी अलोकिक जोतिर्मय तरंगों से अभिसिंचित करते हुए
27:42विदा किया
27:43श्री कृष्ण का अलोकिक रत ब्रहमांड के विभिन लोकों, अंधकार्मई सीमाओं और सब्तद्वीपों को पार करते हुए अत्यंत तीवर गती
27:52से प्रित्वी लोक की ओर बढ़ने लगा
27:55उधर द्वारका नगरी में, अपने मृत पुत्रों के वियोग में व्याकुल वह ब्रहमन अपनी पत्नी के साथ यद्यशाला के समीप
28:03बैठकर अत्यंत विलाप कर रहा था
28:07अचानक द्वारका के आकाश में एक तीवर दिव्य प्रकाश चमका और श्री कृष्ण के रत की घर घराहट की ध्वनी
28:14से संपूर्ण दिशाए गूँच उठी
28:17रत से उतर कर श्री कृष्ण और अर्जुन ने अत्यंत आदर पूर्वक उस ब्रहमन के सामने उसके सभी खोये हुए
28:24जीवित और तेजस्वी पुत्रों को लाकर खड़ा कर दिया
28:28अपने सभी पुत्रों को जीवित और पूर्णत है स्वस्थ देखकर ब्रहमन और उसकी पत्नी के हर्ष का ठिकाना न रहा
28:36और उन्होंने रोते हुए उन्हें गले से लगा लिया
28:40अपनी अज्यानता पर पश्चाताप करते हुए वह ब्रहमन श्री कृष्ण के चर्णों में गिर पड़ा और अपनी पूर्व की कड़वी
28:48बातों के लिए क्षमा मांगने लगा
28:51अर्जुन ने भी हाथ जोड़कर स्विकार किया कि श्री कृष्ण की माया अनन्थ है और उनके बिना ब्रहमांड का कोई
28:59भी पत्ता हिल नहीं सकता
29:01इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की इस अध्भुत लीला ने सभी के संशियों को मिटा दिया और संपूर्ण द्वार का
29:09नगरी उनकी परम महिमा के गान से आनन्दित हो उठी
29:13परमधाम वैकुंठ में भगवान महा विश्णु ने अत्यंत मंद मुस्कान के साथ श्री कृष्ण और अर्जुन की ओर देखा जिससे
29:22संपूर्ण ब्रहमांड में शान्ती का संचार हो गया
29:26भगवान महा विश्णु के संकेत मात्र से उस परम दिव्य लोक में ब्रहमन के वे मृत पुत्र अत्यंत तेजस्वी और
29:33स्वस्थ युवावस्था में प्रकट हो गए
29:37परमेश्वर महा विश्णु ने उन दिव्य बालकों को श्री कृष्ण के हाथों में सौंप दिया, जो जीवन और मृत्यु के
29:44चक्र पर उनकी पूर्ण सत्ता को दर्शाता था
29:47श्री कृष्ण ने उन तेजस्वी बालकों को स्नेह पूर्वक स्विकार किया और उन्हें अपने दिव्य सनरक्षन में ले लिया, जिससे
29:55उनकी त्वचा सोने की तरहे चमकने लगी
29:59इस अलौकिक द्रिश को देखकर अर्जुन का हृदय अगाद श्रधा से भर गया और उन्होंने महा विष्णु के चर्णों में
30:07जुपकर अपनी पराजय और उनकी अनंत माया को स्विकार किया
30:12महा विष्णु ने अपना दक्षिन हस्त उठा कर श्री कृष्ण, अर्जुन और बालकों को आशिरवाद दिया, जिससे पूरा वैकुंठ लोक
30:20दिव्यध्वनियों से गुंजाइमान हो उठा
30:23श्री कृष्ण और अर्जुन उन चारों दिव्यध्वालकों को साथ लेकर दारुक द्वारा संचालित रथ की ओर बढ़े, जो प्रस्थान के
30:32लिए पूरी तरह तयार था
30:34वह अलोकिक रथ, जो सहस्र सूरियों के समान दीप्तिमान था, वैकुंठ लोक की सीमाओं को छोड़कर अनंत ब्रहमांडिय सागर में
30:43तैरने लगा
30:45ब्रहमांड की साथ परतों को पार करते हुए, श्री कृष्ण का रथ जल, अगनी, वायू और आकाश के तत्वों से
30:52घिरे दिव्य मार्गों से तीवर गती से आगे बढ़ा
30:56सुदर्शन चक्र की प्रचंड और शीतल ज्योती ने उनके मार्ग के अंधकार को चीर दिया और रथ को सुरक्षित रूप
31:04से भौतिक जगत की ओर निर्देशित किया
31:07आकाश मार्ग से उतरते हुए, वह अलोकिक रत धीरे-धीरे स्वर्ण में द्वारका नगरी के विशाल और भव्य द्वारों की
31:15ओर बढ़ने लगा
31:17द्वारका के नागरिकों ने जब आकाश में एक अलोकिक स्वर्ण प्रकाश देखा, तो वे सभी आश्चर्यचकित होकर अपने घरों से
31:25बाहर निकलाए
31:27राजमहल के प्रांगण में वह पीडिक ब्राहमन अपनी आखों में आसू लिये और हृदय में आशा की किरण संजोए उचसुपता
31:36से प्रतीक्षा कर रहा था
31:38रत ने अत्यंत कोमलता से द्वारका की पवित्र भूमी को छुआ, जिससे चारों और पुष्पों की वर्षा होने लगी और
31:46दिव्य सुगंध फैल गई
31:48श्री कृष्ण सबसे पहले रत से नीचे उतरे, उनका मुखमंडल परम शांती से आलोकित था और उन्होंने सने से उन
31:56बालकों के हाथ थामे हुए थे
31:59अपने पुत्रों को जीवित, स्वस्थ और पहले से कहीं अधिक तेजस्वी देखकर उस ब्राहमन की आखे फटी की फटी रह
32:07गई और वह अवाग खड़ा रह गया
32:10वे बालक दोड़कर अपने पिता के पास पहुँचे और ब्राहमन ने उन्हें अपनी बाहों में कसकर भीच लिया, जिससे उसके
32:18वर्षों का शोक पल भर में समाप्थ हो गया
32:22अर्जुन ने रत के समीब खड़े होकर हाथ जोड़कर इस हृद्यस परशी मिलन को देखा और उनकी आखों से भी
32:29भक्ती के अशुरुच छलक पड़े
32:31वह ब्राहमन दोड़कर श्री कृष्ण के चर्णों में गिर पड़ा और अपनी पिछली अज्यानता तथा कड़वे वचनों के लिए बार
32:39-बार क्षमा मांगने लगा
32:42द्वार का के सभी लोगों ने भगवान श्री कृष्ण की इस असीन महिमा का जयगोश किया जिसने प्रमानित कर दिया
32:49कि वे ही काल और मृत्यू के परम स्वामी है
32:53परम दयालू श्री कृष्ण ने रोते हुए व्रिध ब्राहमन के सिर पर अपना अभय हस्त रखा और अत्यंत मधूर स्वर
33:01में उन्हें भूमी से उपर उठाया
33:04ब्राहमन ने अपने चारों नव्युवक पुत्रों को सकुषल देख भाव विहवल होकर उन्हें अपने गले से लगा लिया और उनकी
33:12आखों से हरशाश्रु धारा प्रवाह बहने लगे
33:15श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ ब्राहमन से कहा कि जन्म और मृत्यू तो संसार की प्राकृतिक नियती हैं
33:23जिसे केवल इश्वर की माया ही संचालित करती है
33:28गदगद कंट से ब्राहमन ने हाथ जोड़कर श्री कृष्ण की स्तुती की और कहा कि आप ही कालचक्र के स्वामी
33:35हैं जो असंभव को भी संभव कर सकते हैं
33:40द्वारकावासी इस अध्भुत द्रिश्य को देखकर जैजैकार करने लगे और प्रभु के चर्णों में रंगविरंगे सुर्भित पुष्पों की वर्षा होने
33:49लगी
33:50अर्जुन चित्रलिखित से खड़े रहकर अपनी भूल पर स्तब्ध थे और उनका अभिमान से भरा गांडीव धनुष धीरे से उनके
33:58हाथ से छूटने लगा
34:01अर्जुन को अपनी उस प्रतिग्या का स्मरण हुआ कि वे ब्राह्मन के पुत्रों की रक्षा न कर पाने पर अग्निसमाधी
34:08ले लेंगे और उन्हें अपनी तुछता का पूर्ण बोध हुआ
34:12अपने अहंकार के पूर्ण विनाश के साथ अर्जुन रोते हुए श्री कृष्ण के कमल चर्णों में दंडवत प्रणाम कर पड़े
34:21श्री कृष्ण ने अत्यंत वातसल्य भाव से जुखकर अपने प्रियमित्र अर्जुन की बाहपकड़ी और उन्हें प्रेमपूर्वक उठा कर गले से
34:29लगा लिया
34:31भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि संसार में कोई भी शूर्वीर केवल अपने बल से नहीं अपितु इश्वर
34:39की इच्छा और कृपा से ही सफलता पाता है
34:43अर्जुन ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर यह स्वीकार किया कि उनकी पूर्व की सभी विज्जे वास्तव में प्रभु कृष्ण
34:50की ही गुप्ट शक्ती का परिनाम थी
34:54स्वर्गलोक से देवराज, इंद्र और ब्रहमाजी आदी देवताओं ने श्री कृष्ण की इस अलोकिक लीला की जैजैकार करते हुए पारिजात
35:02के दिव्यपुष्प बरसाएं
35:05आकाश में देवदुन्दुभिया बज उठीन और समस्त ब्रहमांड में भगवान श्री कृष्ण के परंपुरुष होने के उद्धोष गूझने लगे
35:14प्रसन्चित होकर वह ब्रहमन अपने चारों पुत्रों की उंगली पकड़े हुए अपने घर की ओर प्रस्थान कर गया और उसका
35:22हृदय सदा के लिए कृष्ण भक्ती से भर गया
35:26अर्जुन अब श्री कृष्ण को केवल एक पार्थिव संबंधी न देखकर उन्हें समस्त्व सृष्टी का सर्वशक्तिमान मूलाधार मानने लगे
35:36संध्या की सुनहरी किर्णों के बीच श्री कृष्ण और अर्जुन मंद गती से द्वारका के राजप्रासाद की ओर बढ़ने लगे
35:44भगवान बलराम ने मुस्कुराते हुए इस लीला की सराहना की और बताया की प्रभु अपने भक्तों के अभिमान को दूर
35:52करने के लिए ही ऐसी विचित्र कथाएं रचते हैं
35:57अर्जुन को समझ आया कि श्री कृष्ण उन्हे भौतिक सागर के पार महा विष्णु धाम तक केवल इसलिए ले गए
36:03थे ताकि उनके सुक्ष्म अहंकार का अंध हो सके
36:08महर्शी शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीच्षित से कहा कि जो मनुष्य श्री कृष्ण की इस परम पवित्र लीला का श्रवन
36:15करता है वह संसार के समस्त भयों और मोह से मुक्थ हो जाता है
36:21इस प्रकार द्वार काधीश भगवान श्री कृष्ण की यह दिव्य विजय लीला संपन हुई जो अनन्त काल तक भक्तों के
36:28हृद्यों को विशुद्ध ज्यान और भक्ती से आलोकित करती रहेगी
36:34ततपश्चात परमज्यानी महर्शी शुकदेव गोस्वामी ने महाराजा परीक्षित को समझाया कि भगवान श्री कृष्ण की प्रतेक लीला मात्र एक घटना
36:43नहीं
36:43अपितु ब्रहमांड के गूढ रहसियों को उदघाटित करने वाली दिव्य शिक्षा है
36:50महाराजा परीक्षित कृष्ण की महिमा को आत्मसाथ करते हुए अपने हृदय में एक गहन जिग्यासा का अनुभव कर रहे थे
36:58की कैसे एक ही परमेश्वर विभिन रूपों में प्रकट होकर संसार का संचालन करते हैं
37:05उन्होंने हाथ जोड़कर शुकदेव गोष्वामी से प्रार्थनाकी कीवे उन्हें पुरुशोत्तम के रहस्य को संज़ाएं उस सर्वोच सत्ता को जिसने ब्राहमन
37:14के पुतरों को मृक्योलोक से लोटाया
37:18शुकदेव गोस्वामी ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से ब्रहमांड के परमसत्य को देखते हुए, समझाना आरंभ किया कि पुरुशोत्तम का अर्थ वह
37:26सर्वोच ब्रहमा है, जो निराकार होते हुए भी सभी सगुन रूपों का मूल है
37:33वे बोले की ब्रहमा ही परमसत्य है, जो समस्थ सीमाओं से परे, असीम और निर्गुन है, जिसका अनुभव केवल गेहन
37:41ध्यान और आत्म बोध से ही किया जा सकता है
37:45इसके उपरांथ उन्होंने परमात्मा के सिध्धान्त को सपष्ट किया, जो ब्रहमा का ही एक अंश है और प्रत्येक जीव के
37:54हृदय में अंतर्यामी रूप से निवास करता है, समस्थ क्रियाओं का साक्षी बनकर
38:00फिर शुकदेव गोस्वामी ने भगवान शब्द का अर्थ समझाया, जो ब्रहमा का साकार, सर्वशक्तिमान और सर्वग्य रूप है, जिसमें समस्थ
38:09ऐश्वर्य, शक्ति, यश, श्री, ज्यान और वैराग्य पूर्णत विद्यमान है
38:15उन्होंने द्रिर्टा से कहा कि द्वार काधीश भगवान श्री कृष्ण ही पुरुशोत्तम है, वह परम पुरुशोत्तम जो तीनों गुनों, सत्व
38:24रजस्त, तमस और कालचक्र से भी परे हैं
38:28श्री कृष्ण की प्रत्येक लीला, चाहे वह कितनी भी साधारन क्यों न लगे, वास्तव में एक दिव्य नाटक है, जिसका
38:36उद्देश्य भक्तों को ज्यान प्रदान करना और संसार को धर्म का मार्ग दिखाना है
38:42उनकी लीलाए माया पर उनके पूर्ण नियंत्रन को दर्शाती हैं, क्योंकि वे स्वयम माया के स्वामी हैं और उसे अपनी
38:50इच्छानुसार संचालित करते हैं
38:54शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि पुरुशोत्तम की महिमा का एक और पहलु हरीहर की एक्ता में नहित है, जहां भगवान
39:02विश्णु और भगवान शिव एक ही परम सत्य के दो भिन्न स्वरूप हैं
39:08उन्होंने स्मरण कराया कि ब्राहमन के पुत्रों को मृत्यु लोग से लोटाने की लीला में स्वय भगवान शिव ने श्री
39:15कृष्ण को महा विश्णु धाम तक जाने की अनुमती दी, जिससे हरीहर की एकात्मक्ता और भी स्पष्ठ हुई
39:21यह लीला दर्शाती है कि भगवान शिव भले ही स्वयंपरम शक्तिशाली हो, भगवान विश्णु को सर्वोच्च इश्वर के रूप में
39:31स्विकार करते हैं और उनकी लीलाओं में सहायक होते हैं
39:36शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा कि पुरुशोत्तम केवल स्रिष्टि करता, पालक और संहारक ही नहीं, अपितुवे समस्त ब्रह्मांड के नियंत्रक
39:45हैं, जिनकी इच्छा से ही कालचक्र और प्रकृती के नियम संचालित होते हैं
39:52उन्होंने बल दिया कि जो मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है कि हरी और हर एक ही हैं, वह
39:58भ्रम और द्वैत की सभी श्रिंखलाओं से मुक्थ होकर परमशान्ती प्राप्त करता है
40:05सभा में उपस्थित अन्य रिशिमुनी और देवतागन शुकदेव गोस्वामी के वचनों को अत्यंत श्रद्धा और एकागरता से श्रवन कर रहे
40:13थे, उनके चहरों पर गहन संतोश और आनंद जलक रहा था
40:19महाराजा परीक्षित का चहरा अब दिव्य ज्यान से आलोकित हो उठा था, उनकी आखों में संतोश और कृतग्यता के अश्रु
40:27थे, जैसे उन्हें अपने सभी प्रशनों का परम उत्तर मिल गया हो
40:32शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अमरित्वानी को विराम देते हुए, अंत में कहा कि भगवान श्री कृष्ण ही परम पुरुशोत्तम हैं,
40:41समस्त अवतारों के स्रोत और ब्रहमांड के एक मात्र आश्रय
40:46वही एक मात्र शरण हैं, जो इस मायावी संसार के भयों और मोह से मुक्ती दिलाकर जीवात्मा को परम धाम
40:53तक पहुचा सकते हैं
40:56इस प्रकार श्री कृष्ण की इन दिव्य लीलाओं का श्रवण और मनन ही मोक्ष का मार्ध है, जो भक्तों को
41:03शाश्वत आनंद और परम प्रेम की प्राप्ती कराता है