राजा नृग के उद्धार के बाद, द्वारका में एक गहरी आध्यात्मिक जिज्ञासा जागृत होती है। क्या है परम सत्य? वेदों का अंतिम लक्ष्य क्या है? इस अद्भुत एपिसोड में, भगवान श्रीकृष्ण स्वयं वेदों (श्रुतियों) द्वारा की गई अपनी महिमा का वर्णन करते हैं, जिसे 'श्रुति-स्तुति' के नाम से जाना जाता है। देखें कैसे वेद स्वयं भगवान को ब्रह्मांड का आधार, परम पुरुष और सभी अवतारों का स्रोत बताते हैं। यह ज्ञान आपको सृष्टि के गहन रहस्यों और भक्ति के सर्वोच्च मार्ग से परिचित कराएगा। जीवन के परम लक्ष्य को जानने के लिए तैयार हो जाइए! #भागवतपुराण #श्रीकृष्ण #वेद #श्रुतिस्तुति #भक्ति #परमज्ञान #हिन्दूधर्म #महाभारत #द्वारका #सनातनधर्म #S3Ep86 #अध्यात्म #आस्था #मोक्ष #यूट्यूबसीरीज #पौराणिककथा
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00:00राजा नरिक्के उद्धार की अलोकिक कथा सुनकर द्वारका की सभा में उपस्थित सभी ज्यानीजन और भक्त गण गहरे चिंतन में
00:07डूग गए, उनके हृदय भगवान श्री कृष्ण की असीम लीलाओं के प्रती और भी अधिक विस्मय से भर उठे.
00:15प्रत्येक भक्त के मन में यह विचार घर कर गया कि भगवान की हर लीला, चाहे वह कितनी भी साधारन
00:22क्यों न लगे, किसी न किसी गहन आध्यात्मिक रहस्य और परम सत्य को उद्घाटित करती है.
00:30उन्होंने महसूस किया कि इन लीलाओं के माध्यम से ही जीव जगत के क्लेशों से मुक्ती और परम आनंद की
00:37ओर अग्रसर हो सकता है, जो केवल मायाप्ती भगवान श्रीकृष्ण ही प्रदान कर सकते हैं.
00:44इन में विशेश रूप से उद्धव, जो भगवान के परम सखा और अनन्य भग्त थे, इस कथा के गूड अर्थों
00:51पर गहनता से विचार कर रहे थे, उनके हृदय में ज्यान की एक नई पिपासा जागरित हो रही थी.
00:59उद्धव ने अनुभव किया कि राजा निरिक की कथा केवल एक राजा के उद्धार की कहानी नहीं थी, बलकि यह
01:06जीव, कर्म और इश्वर के संबंध का एक सुक्ष्म विवेचन प्रस्तुत करती थी.
01:12उनके भीतर एक तीवर इच्छा उत्पन हुई की वे भगवान श्रीकृष्ण से परम सत्य के स्वरूप, उनकी माया की प्रकृती
01:20और उससे परे जाने के सर्वोत्तम मार्ग के विशय में और अधिक जाने.
01:25वे यह मानते थे कि भगवान के हर कार्य में उनके प्रत्येक वचन में ब्रहमांड के सबसे गूढ रहसियों का
01:33समाधान और भक्ती का परम मार्ग छिपा हुआ है.
01:37गहरे स्वाध्याय और चिंतन के पश्चात उद्धव ने स्वयं को भगवान श्री कृष्ण के समक्ष विनमरता पूर्वक प्रस्तुत किया, उनकी
01:46द्रिष्टी में एक अटूट विश्वास और असीन जिग्यासा का संगम था.
01:51उन्होंने सोचा की यह उचित समय है, जब वे अपने मन में उठ रहे, अनेक प्रशनों को स्वयं परम पुरुशोत्तम
01:59भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में समर्पित करें.
02:02धीरे से परग्रिड़ता के साथ उधव ने भगवान को संबोधित किया, उनके शब्दों में ज्ञान की लालसा और भक्ती की
02:10पराकाश्ठा थी.
02:12उनकी बातों को सुनकर सभा में उपस्थित, अन्यरिशी और ज्ञानीजन भी अपनी चिंतनधारा से बाहर आ गए और उनकी उधसुकता
02:21भी प्रबल हो उठी.
02:23उन्होंने भी महसूस किया कि उधव उनके ही मन की बात कह रहे हैं, क्योंकि नरिक की कथा ने उन
02:30सभी के भीतर परम ज्ञान की ऐसी ही प्यास जगा दी थी.
02:35अब संपूर्ण सभा में एक मौन उच्सुकता चा गई, जहां हर आत्मा भगवान से गहरे रहसियों को जानने की तीवर
02:42इच्छा से कम्पित हो रही थी.
02:46प्रत्येक भक्त और ज्ञानी जन भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को आत्मसात करने के
02:52लिए आतुर था, मानों वे अमरित्पान करने की प्रतीक्षा कर रहे हूं.
02:58यह केवल जिग्यासा नहीं थी, बलकी परम सत्य को अपने जीवन में उतारने की, स्वयंको भवसागर से तारने की एक
03:06सच्ची आकांक्षा थी.
03:08वे सभी यह जानना चाहते थे, कि इस नश्वर संसार में रहते हुए भी, शाश्वत भक्ती के माध्यम से भगवान
03:16के दिव्यस्वरूप को कैसे प्राप्त किया जा सकता है.
03:21उनकी आखों में एक अनकही प्रार्थना थी, एक मौन निवेदन था, कि भगवान अपने परम ज्यान से उनके हृदय के
03:28सभी संदेहों को दूर करें.
03:31भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से सभा के प्रत्येक व्यक्ती की आंतरिक भावना को समझा और उनके मुख पर एक
03:40शांत करुनामई मुस्कान आ गई.
03:43उनकी मौन स्वीकृती और प्रेंपूर्ण द्रिष्टी ने सभा में एक और भी गहन शांती और श्रद्धा का संचार किया, जिससे
03:51वातावर्ण दिव्य उर्जा से परिपूर्ण हो गया.
03:55जैसे ही भगवान ने अपने अमरित्मय वचन कहने के लिए होट खोले, पूरी सभा ने अपनी सासे थाम ली एक
04:02नए रहस्योधाटन की प्रतीक्षा में.
04:06अपनी मंद मुसकान को अमरित्मय वानी में बदलते हुए, भगवान श्री कृष्ण ने गंभीर और मेगगर्जना के समान मधुर स्वर
04:14में सभा को संबोधित किया.
04:17उन्होंने बताया कि समस्त ब्रहमांडिय ज्ञान का आदी और अंत वेदों में ही नहित है, जो वास्तव में निराकार परब्रहम
04:25की दिव्यश्वास से उत्पन हुए हैं.
04:28श्री कृष्ण ने रहस्योधाटन किया कि यद्यपी वेद विभिन यग्यों और देवताओं का वर्णन करते हैं, परंतु उनका वास्तविक और
04:37गुप्त लक्षे केवल मेरी ही आराधना करना है.
04:41इस परं सत्य को समझाने के लिए भगवान ने उस प्राचीन और गोपनिय काल का स्मरण किया जब स्रिष्टी के
04:49प्रारंभ में वेदों ने स्वयं उनका स्तवन किया था.
04:53स्रिष्टी के उस आदी काल में जब न तो प्रिथवी थी, न सूर्य और नहीं आकाश केवल अनंत अंधकार और
05:01कारणजल व्याप्त था.
05:03उस महाशून्य के भीतर, शेशनाग की शयापर योग निद्रा में लीन भगवान महाविष्णु विश्राम कर रहे थे, जिनका विग्रह करोडों
05:12सूर्यों के समान दीप्तिमान था.
05:15जैसे ही सृष्टी का समय निकट आया, भगवान की दिव्यश्वास से वेदों की अधिश्थात्री देविया, जिन्हें शृतिया कहा जाता है,
05:24साकार रूप में प्रकट हुई.
05:26इन दिव्य देवियों ने जो ज्ञान और भक्ती की साक्षात प्रतिमूर्ती थी, परमेश्वर के उस विराट और शांत स्वरूप को
05:35देखा.
05:36अपने स्वामी और आदिपुरुष को निद्राली इन पाकर, उन्होंने अत्यंत विन्यपूर्वक हाथ जोडे और उन्हें जगाने तथा उनकी महिमा का
05:45गान करने के लिए ततपर हुई.
05:48उनकी दिव्य और सुरीली आवाजों से संपूर्ण महाशून्य गूंद उठा, मानो ब्रहमांड का कंकन उनकी संगीत बद्ध प्रार्थना से स्पंदित
05:57होने लगा हो.
05:59शुरुतियों ने स्टुती की है अजे, आपकी जय हो. आप समस्त माया और अंधकार के नाशक हैं तथा अपनी असीम
06:09शक्ती से इस जगत का कल्यान करते हैं.
06:13उन्होंने गाया की आप ही वह परम सक्ता हैं, जो अपनी केवल एक ग्रिष्टी मात्र से इस सुप्थ प्रकृती में
06:20चेतना और त्रिगुनों का संचार करती हैं.
06:24जैसे जैसे वेदों की रिचाय गूंजती रहीं, वैसे वैसे संपूर्ण अंतरिक्ष में दिव्य प्रकाश और पवित्र मंत्रों के अक्षर तैरने
06:33लगे.
06:34देवियों ने स्पष्ट किया कि जो मूर्ख अन्य नश्वर देवताओं की शरण लेते हैं, वे बार-बार जन्म और मृत्यू
06:41के चक्र में भटकते हैं, परन्तु आपकी भक्ती करने वाले इस संसार सागर को पार कर जाते हैं.
06:49अत्यंत विनीत भाव से शुरुतियों ने अपने मस्तक भगवान के चर्णों में जुका दिये और उनके मुकुटों की मनिया प्रभु
06:57के नक्षों की कांती से मिलकर एकाकार हो गई.
07:01अपनी इन सनातन शक्तियों की निश्कपट और ज्ञानमई स्तुती सुनकर भगवान महा विष्णु ने मंदमंद मुस्कुराते हुए अपने विशाल कमल
07:10नेत्र खोले.
07:12उनके जागरित होते ही उनके दिव्यनेत्रों से एक ऐसा आलोक फैला जिसने अंधकार में ब्रहमांड को दिव्यज्ञान और नवस्रिष्टी की
07:21उर्जा से सराबोर कर दिया.
07:24द्वारका की सभा में वापस आते हुए श्रीकृष्ण का मुख मंडल उसी दिव्य तेज से चमक उठा, मानोवे स्वय उस
07:32प्राचीन सत्य की साक्षात मूर्ती हुँ.
07:35सभा में उपस्थित सभी रिशी, महाराज उग्रसेन और श्रीकृष्ण के पुत्र इस दिव्य रहस्य को सुनकर भक्ती के पर्मानंद में
07:44लीन हो गए.
07:46भगवान श्रीकृष्ण ने अंत में बल दे कर कहा कि वेदों का परम और अंतिम धे केवल मेरी अनन्य भक्ती
07:53प्राप्त करना है, जो सभी दुखों का अंत करती है.
07:58जैसे ही श्रीकृष्ण के होठों से ज्ञान की अंतिम वानी समाप्त हुई, द्वारका की भव्य सभा में एक अनादी और
08:05अनन्त ओम की ध्वनी गूंजने लगी, जिसने वायुमंडल को पूरी तरह से पवित्र और निश्चल कर दिया.
08:13तक्षन सभा के मध्य से एक अध्भूत स्वर्णिम प्रकाश का पुंच प्रकट हुआ, जो शीतल और दिव्य था, और धीरे
08:20-धीरे एक अलौकिक सुवासित धुंध में बदलने लगा.
08:24उस अलौकिक प्रकाश के मध्य से चार परमतेजस्वी दिव्य स्वरूप प्रकट हुए, जो साक्षात वेदों के चारो रूपों, रिगवेद, यजुरवेद,
08:34सामवेद और अथर्ववेद की साकार मूर्तिया थे.
08:38सबसे पहले रिगवेद के प्रतीक स्वरूप ने, जिनका मुखमंडल बालसूर्य के समान देदी प्यमान था, अत्यंत गंभीर और गंभीर स्वर
08:47में सृष्टी के आदी सत्य का गान करना आरंभ किया.
08:52उनके मुख से निकलते ही मंत्रों के शब्द अंतरिक्ष में घूमते हुए ब्रहमांडिय नक्षत्रों और आकाश गंगाओं के रूप में
08:59दिखाई देने लगे, जो आदिपुरुष के विराट रूप की महिमा को दर्शा रहे थे.
09:05तत्पश्चात यजुर्वेद के प्रतीक रूप आगे आए, जिनका शरीर यग्य की धधक्ती हुई पावन अगनी के समान देधी प्यमान था
09:13और उन्होंने कर्म एवन यग्य की शुद्धता का वर्णन किया.
09:18उन्होंने अपने दिव्यस्वर में यह घोशित किया कि संसार में किये जाने वाले समस्त्य यग्य और कर्म अंत्य केवल भगवान
09:26श्री कृष्ण के चर्णों में ही समर्पित होकर पूर्ण होते हैं.
09:31तभी सामवेद के प्रतीक स्वरूप ने अपनी सुरीली वीना के तारों को जंकृत किया, जिनका शरीर नीलकमल के समान को
09:39मल और कांतिमान था, और भक्ती का मधुर संगीत बस उठा.
09:44उस दिव्य संगीत के प्रभाव से सभा के स्तंभों पर खुदी हुई कलाकृतियां भी मानो चैतन्य होकर भक्ती के रस
09:52में जुमने लगी और संपूर्ण प्रकृती मौन होकर सुनने लगी.
09:57अंत में अथर्ववेद के स्वरूपने, जो अत्यंत गंभीर, तेजस्वी और एक रक्षक के रूप में प्रकट हुए थे, सांसारिक दुखों
10:06के निवारण और आत्मज्ञान के रहसियों को उजागर किया.
10:10चारो वेदों के इन दिव्य स्वरूपों ने मिलकर भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख अपने मस्तक जुकाए और हाथ जोड़कर उनकी
10:18स्तुती करना आरंभ किया.
10:21उन्होंने गाया कि है प्रभु, आप ही वह निराकार, अजन्मा और अनन्त ब्रह्मा हैं, जो केवल भक्तों पर कृपा करने
10:29के लिए इस अत्यंत सुन्दर मानवरूप में प्रकट हुए हैं.
10:34रिशियों ने विस्मय से देखा कि जब वेदों ने यह गान किया, तब श्रीकृष्ण के शरीर से अनन्त ब्रह्मांड उत्पन
10:42होकर पुना उन्ही में लीन होते हुए दिखाई दे रहे थे.
10:46वेदों ने स्पष्ट किया कि बड़े-बड़े ज्यानी और तपस्वी भी अपनी तीक्षन बुद्धी से जिन्हें नहीं जान पाते, उन्हें
10:54एक निश्चल और प्रेमी भक्त अपनी अनन्य भक्ती से सुगमता से बांध लेता है.
11:00इस परम सत्य को सुनकर देवर्शी नारद और सभा में बैठे सभी ज्यानी पुरुष पर्मानंद के महासागर में डूग गए
11:08और उनकी आखों से प्रेमाशुरूं की धारा बहने लगी.
11:13वेदों ने आगे गाया कि आपकी वहमाया, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी भ्रमित कर देती है, आपके भक्तों के
11:20सामने एक दासी की भांती लजजित होकर हाथ जोड़ कर खड़ी रहती है.
11:26वे कहने लगे कि हैं माधवत, आपके चरण कमलों की रज को अपने मस्तक पर धारन करने के लिए स्वयं
11:34ब्रह्मा और महादेव भी युगों-युगों तक प्रतीक्षा करते हैं.
11:39जैसे ही स्तुती पूर्ण हुई, वेदों के चारों दिव्य स्वरूप अत्यंत सौमय भाव से एक दिव्य अखंड प्रकाश पुंज में
11:47परिवर्तित हो गए और धीरे-धीरे श्री कृष्ण के हरिदय में समा गए.
11:52इस अलोकिक दृष्य के समाप्थ होने के बाद, सभा में एक अत्यंत गहरा, शांत और ध्यानमग्न मौन्छा गया, मानो समय
12:00की गती भी थम गई हो.
12:03भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत वात्सल्य और करुणा से भरी मुस्कान के साथ अपनी आखें खोली और उनके भक्तों को
12:11ज्यान एवा भक्ती का साक्षात अनुभव हो गया.
12:15भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत सौमय वानी में सभा को सम्बोधित करते हुए उस अनादी और अव्यक्त तत्व का वर्णन
12:23करना आरंभ किया, जो स्रिष्टी से भी पूर्व विद्यमान था.
12:28उन्होंने समझाया कि स्रिष्टी के प्रारंभ से पूर्व न सत्था, न असत्थ केवल एक परम चेतना ही थी जो सम्पून
12:35अंधकार में शांत और अव्यक्त रूप में विद्यमान थी.
12:40उसी परम पूरुष के संकल्प मात्र से इस शून अंधकार में एक दिव्य स्वर्णमे ब्रहमान दिय अंड प्रकट हुआ, जिससे
12:48समस्थ स्रिष्टी का प्रस्पुटन होना था.
12:51उस स्वर्णमे कमल के आसन पर परम्पिता ब्रहमा प्रकट हुए, जिन्होंने स्रिष्टी के निर्मान की शक्ती प्राप्त करने के लिए
12:59भगवान के मूल रूप का ध्यान किया.
13:02जब ब्रहमा जी ने ध्यान लगाया, तब भगवान के दिव्यनेत्रों के उनमीलन से सत, रज और तम नामक तीन त्रिगुनमई
13:10प्रवृतिया ब्रहमान्ड में प्रवाहित होने लगी.
13:13इसके पश्चात, भगवान की दिव्यमाया से आकाश, वायू, अगनी, जल और प्रित्वी जैसे पंचमहा भूतों का क्रमिक प्राकट्य हुआ जो
13:23भौतिक जगत का आधार बने.
13:25इन पंचमहा भूतों के सन्योग से ब्रहमान्डिय पिंडों, नक्षत्रों और अंगिनत सौर्यमंडलों का निर्मान हुआ, जो भगवान के विराट स्वरूप
13:34के भीतर ही गतिमान थे.
13:37इस दिव्य ज्यान की अनुभूती पाकर, देवर्शी नारत सभा में खड़े होकर, अपनी वीना के तारों पर भगवान की इसी
13:45अनंत महिमा का गान करने लगे.
13:48तभी वहाँ चारों वेदों की दिव्य अधिष्ठात्री देविया प्रकट हुई, और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान को सृष्टी के एक मात्र
13:56शाश्वत आधार के रूप में प्रणाम किया.
14:00वेदों ने स्तुती करते हुए कहा कि कालचक्र भी भगवान की ही भौहों के संकेट पर घूमता है, जो संपूर्ण
14:07सृष्टी को निरंतर परिवर्तित करता रहता है.
14:12महाराज उग्रसेन और वासुदेवजी ने विस्मय और परम भक्ती के साथ अपने हाथ जोड़े क्योंकि उन्हें साक्षात अनुभव हो गया
14:20था कि उनका पुत्र ही परम सत्य है.
14:24भगवान ने आगे बताया कि जिस प्रकार वर्षा का जल वापस बादलों में लौट जाता है, उसी प्रकार सभी योनियों
14:32के जीव अंत्ता उन्ही से जीवन पाकर उन्ही में पोशन प्राप्त करते हैं.
14:38जब स्रिष्टी का अंत्काल आता है, तब महाप्रलय के समय संपून ब्रहमांड पुनह उसी अव्यक्त परमात्मा में समाहित होकर शांत
14:46हो जाता है.
14:48इस सहार के दौरान भी भगवान श्रीकृष्ण निराकार और निर्गुन रहकर समस्थ गुनों से परे अपनी मूल्चित शक्ती में स्थित
14:56रहते हैं.
14:59कैलाश परवत्पर ध्यानमगन भगवान शिव ने भी अपने मानस पटल पर श्रीकृष्ण के इसी परब्रहम स्वरूप का दर्शन किया और
15:07वे गहरे समाधिसुख में लीन हो गए.
15:10द्वारका की सभा में बैठे सभी भक्त इस ज्ञान को सुनकर अत्यंत भाव विभोर हो गए और उनका हृदय सांसारिक
15:18मोह से मुक्त होकर भक्ती के सागर में डूब गया.
15:22तब भग्वान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को आश्वासन दिया कि केवल अनन्य भक्ती के मार्क से ही कोई भी जीव
15:30इस मायावी संसार रूपी सागर को सरलता से पार कर सकता है.
15:35सभा में चारों और ज्यान की एक ऐसी पावन तरंगें उठीन मानो पूरा महल ही भग्वान की दिव्य उपस्थिती से
15:43जोतिर्मय हो उठा हो.
15:45सभी रिशियों और प्रियजनों ने उठकर भग्वान श्रीकृष्ण के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया और उन्हें सभी कारणों का मूल
15:54कारण स्विकार किया.
15:56भगवान श्री कृष्ण ने मंदमंद मुस्कुराते हुए सभी को आशिरवाद दिया और इस प्रकार स्रिष्टी के इस महान रहस्य का
16:04ज्यान सबके हृद्यों में सदा के लिए अनकित हो गया
16:08सभा में उपस्थित सभी ज्यानी रिशी और भक्तगण अब उस परम सत्य की गहराईयों में उतरने लगे जहां भगवान की
16:16योगमाया का अध्भुत खेल आरंभ होता है
16:20वेद पुरुषों की दिव्यवानिया गूंज उठीन जो अध्रिश्य रूप से उस सच्चिदानंद परमात्मा की महिमा का गान कर रही थी
16:29जो स्रिष्टी का करता होकर भी उससे सर्वथा परे है
16:33वे बताते हैं कि कैसे भगवान अपनी पराशक्ती योगमाया को जागरित करते हैं जिसके स्पर्ष मात्र से शांत पड़ी प्रकृती
16:42में हलचल मच जाती है
16:45वह योगमाया जो अत्यंत विस्मेकारी और असीमित शक्तियों से संपन्न है संपून ब्रहमांड के तानेबाने को बुन्ना शुरू करती है
16:56इस प्रकार महा विश्नु के संकल्प मात्र से अनन्तनन्त ब्रहमांड उनके रोम कूपों से बुलबुलों की भानती प्रकट होने लगते
17:04हैं
17:05परंतु इस विराट स्रिजन के बीच भी महा विश्नु अपनी अनन्त शया पर पूर्णत शान्त और इस प्रपंच से सर्वता
17:13निरलिप्थ होकर सोते हैं
17:16रिशी कहते हैं कि जिस प्रकार इस नश्वर जगत के गुन और दोश मनुश्यों को बांधते हैं वे भगवान को
17:23छू भी नहीं पाते
17:25इस निरलिप्थता को समझाने के लिए वेद एक अत्यंत सुन्दर उपमा देते हैं आकाश में चमकते हुए प्रदीप्त सूर्य की
17:35सूर्य अपनी तीवर किर्णों से पूरी प्रिथवी को प्रकाशित करता है और उसकी किर्णे हर अच्छी और बुरी वस्तु पर
17:42समान रूप से पढ़ती हैं
17:45वह किर्ण चाहे किसी अपवित्र कीचड को सुखाए या किसी पवित्र गंदाजल को स्पर्श करे सूर्य स्वयन कभी मलिन या
17:53अशुद्ध नहीं होता
17:56ठीक उसी प्रकार सर्वव्यापक पर्मात्मा इस संसार की हर वस्तु में वास करते हुए भी इसके विकारों से सदैव अच्छूते
18:04रहते हैं
18:06स्रिष्टी के कणकण में उनकी सत्ता है फिर भी वे इस द्रिश्य जगत के मायावी बंधनों से परे अपने परम
18:13धाम में स्थित है
18:16रिशियों के हृदय इस ज्ञान को पाकर आनंद से भर गये की वे जिस कृष्ण की शरण में हैं वे
18:22ही साक्षात परम ब्रह्मा है
18:26वेद आगे समझाते हैं कि जो मनुष्य इस सत्य को नहीं जानता वह माया के मोहक जाल में फंसकर बार
18:33-बार जन्मुम्रत्यू के चक्र में भटकता है
18:37माया का यह परदा इतना सुक्ष्म और आकरशक है कि बड़े-बड़े ज्यानी भी बिना इश्वर की कृपा के इसे
18:44पार नहीं कर पाते
18:47परंतु जैसे ही कोई जीव अनन्य भाव से भगवान श्री कृष्ण की शरण में आता है वह माया का मायावी
18:54परदा स्वतह ही छिन्न भिन हो जाता है
18:58भगवान श्री कृष्ण जो द्वारका के राजसिनहासन पर विराजमान है इस अगाध ज्यान को मंद मुस्कान के साथ अपने प्रीजनों
19:06को प्रदान कर रही है
19:09द्वारका का भव्य राजदरबार इस समय उपनिश्दों और वेदों के दिव्य सत्यों से स्पंदित हो रहा था
19:16मानो साक्षात ज्यान का सागर उमड आया है
19:20सभी ने यह जान लिया कि श्रीकृष्ण की भक्ती ही वह एक मात्र नौका है जो इस संसार रूपी भवसागर
19:27को सुगमता से पार करा सकती है
19:31इस प्रकार वेद गाते हैं श्री कृष्ण की महीमा और यह दिव्यकथा भक्तों के हृध्यों में भक्ती का परम प्रकाश
19:39सदा के लिए प्रजवलित कर देती है
19:42श्रुतिया उपनिश्दों के उस परम सत्य को उजागर करती हैं जहां जीवात्मा और परमात्मा को एक ही वृक्ष पर बैठे
19:50दो सुंदर पक्षियों के रूप में वर्णित किया गया है
19:54इन में से पहला पक्षी अर्थात जीवात्मा इस संसार रूपी व्रिक्ष के खट्टे मीठे फलों को चकता है और कर्मों
20:02के बंधनों में बंध जाता है
20:05जबकी दूसरा दिव्यपक्षी जो स्वयं परमात्मा है बिना कोई फल चक्खे केवल शांत भाव से सब कुछ देखता रहता है
20:15जीवात्मा स्वयं को इस पंचभातिक शरीर का करता मान कर जन्म और मृत्यू के अंथीन चक्र में भटकती रहती है
20:24माया का गहरा आवर्ण जीवात्मा की बुद्धी को इस प्रकार ढख लेता है कि वह अपने अविनाशी और आनंदमई स्वरूप
20:32को भूल जाती है
20:35इस अज्यानता के कारण जीव सुख में हर्शित और दुख में व्याकुल होकर संसार के क्षणभंगुर दुखों को ही अपना
20:43भाग्य मान लेता है
20:45परन्तु इसी समय पर मात्मा हर जीव के हरिद्यत्मल के भीतर एक शांत, दैविय और स्वयम प्रकाशित जोती के रूप
20:53में सदैव विराजमान रहते हैं
20:56वे जीवात्मा के प्रत्येक अच्छे बुरे विचार, गुप्व संकल्प और कर्म के एक मात्र साक्षी हैं जो कभी उससे दूर
21:04नहीं होते
21:06प्रमात्मा ही कर्मफल दाता के रूप में ब्रह्मान्डिय न्याय की रक्षा करते हुए जीव को उसके कर्मों के अनुसार उचित
21:14फल प्रदान करते हैं
21:16जब सांसारिक दुखों से त्रस्थ होकर जीवात्मा अन्तह अपने भीतर बैठे उस मौन साक्षी परमात्मा की ओर अपनी द्रिश्टी घुमाती
21:25है
21:27तब भक्ती और ज्ञान की पहली किरण उसके अंतहकरण में फूटती है जिससे अहंकार और मोह का अंधकार धीरे-धीरे
21:35समाप्थ होने लगता है
21:38जीव को यह बोध होने लगता है कि यह नश्वर शरीर तो केवल एक वस्त्र है जिसे उसने इस संसार
21:45की यात्रा के लिए धारण किया है
21:48यह आत्मज्यान वेदों के दिव्यमंत्रों और भगवान श्रीकरिश्न की अनन्य भक्ति के माध्यम से साधक के हृदय में जाग्रत होता
21:57है
21:58जैसे ही माया का पर्दा हटता है, जीवात्मा को अपने ही भीतर परम पुरुशोत्तम भगवान श्री कृष्ण के चतुर्भुज रूप
22:07के साक्षात दर्शन होते हैं
22:10द्वैत का वह जूठा भ्रम सुभा के कोहरे की तरह चंट जाता है और जीव को समझ आता है कि
22:17वह और परमात्मा मूलता एक ही हैं
22:21जिस प्रकार नदिया अपने नाम और रूप को त्याग कर महासागर में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा
22:29में एकाकार हो जाती हैं
22:32द्वारका के राजदर्बार में बैठे सभी रिशिमुनी और भक्त इस परम सत्य को सुनकर आनंद के अश्रूँ से सराबोर हो
22:40जाते हैं
22:42सिनहासन पर विराजमान भगवान श्री कृष्ण अपने शांत और करोनामई मंधास से वेदों के इस शाश्वत सिध्धान्त की पुष्टी करते
22:50हैं
22:52परमात्मा और जीवात्मा का यह अभेज संबंधी समस्थ आध्यात्मिक ज्यान का शिखर है जो मनुष्य को सदा के लिए मुक्त
23:00कर देता है
23:02इस प्रकार वेद गाते हैं श्री कृष्ण की महीमा और यह दिव्यकथा भक्तों के हृध्यों में भक्ती का परम प्रकाश
23:10सदा के लिए प्रजवलित कर देती है
23:14ततपश्चात शृतिया मधूर स्वरों में वेदों के गूड रहसियों को उजागर करती हैं
23:19यह बताते हुए कि विभिन यग्य और कर्मकांड केवल आरंभिक सीधिया है परम सत्य तक पहुँचने के लिए
23:27वेद कहते हैं कि अगनिहोत्र जैसे कर्मकांड मनुष्य को लौकिक सुख, समरिध्धी और स्वर्गिक लोकों की प्राप्ती कराते हैं
23:36जो एक भक्त की शुरुवाती अभिलाशाय हो सकती हैं
23:41परंतु यह क्षनिक सुख, आत्मा को बांधने वाले कर्मों का ही परिनाम है जो अन्ता जीव को पुनरजन्म के चक्र
23:48में ही फनसाय रखता है
23:52शुटिया स्पष्ट करती हैं कि इंद्र, वरुन, अगनी और सूर्य जैसे विभिन देवताओं की स्तुती और उपासना भी एक प्रकार
24:00से परमेश्वर की ही विविद शक्तियों का सम्मान है
24:04इन देवताओं के माध्यम से भक्त धीरे-धीरे एक उच्चतर सत्ता की और उन्मुक होता है, जो इन सभी शक्तियों
24:12का मूल स्रोत है
24:14वास्तव में वेदों का कर्मकांडिय भाग जीव को शुद्ध करने, उसके अहमकार को मिटाने और उसे भक्ति के उच्च मार्ग
24:23के लिए तयार करने का एक साधन मात्र है
24:27जब मन और आत्मा वेदों के गूड संदेशों को आत्म साथ करने योग्य हो जाते हैं, तब उसे निर्गुन और
24:34सगुन दोनों रूपों में भगवान की महिमा का अनुभव होता है
24:40शुतियों का सार यही है कि यग्यों और तपस्याओं का अंतिम लक्ष्य उस परमात्मा को जानना है जो समस्त स्रिष्टी
24:47का आधार और परम नियंत्रक है
24:51वेदों में वर्नित सभी देवी देवता और उनके कार्य अंत्ता उसी एक परम सत्य भगवान श्री कृष्ण की शक्ती और
24:59इच्छा के विभिन पहलू मात्र है
25:03जैसे एक महान व्रिक्ष की अंगिनत शाखाए और पत्तिया एक ही जड़ से पोशित होती हैं वैसे ही समस्त ब्रहमांड
25:11और उसके देवता श्री कृष्ण से ही उर्जा प्राप्त करते हैं
25:16यह गेहन ज्यान प्राप्त होते ही भक्त का मन कर्म कांडों की जटिलताओं से मुक्त होकर केवल प्रेम और अनन्य
25:23भक्ती में लीन हो जाता है
25:26फिर चाहे वह किसी भी विधी से उपास ना करे उसका हरिदय स्वतह ही भगवान श्री कृष्ण के कमल चर्णों
25:33में समर्पित हो जाता है
25:36शुरुतिया घोशित करती हैं कि समस्त वेदों का परम उद्देस्य और लक्ष एक मात्र भगवान श्री कृष्ण की भक्ती प्राप्त
25:44करना ही है
25:46वेदों के प्रत्येक मंत्र, प्रत्येक यग्य और प्रत्येक तपस्या का अंतिन परिनाम वही है परमिश्वर के प्रती अटूट प्रेम और
25:54शर्नागती
25:56जिस प्रकार नदिया अन्तह सागर में विलीन होती हैं, उसी प्रकार समस्त धार्मिक कर्म और ज्यान अन्तह श्री कृष्ण में
26:04समाहित हो जाते हैं
26:07यह अद्वैट ज्यान की पराकाश्था है, जहां जीवात्मा स्वयं को परम सत्ता से अभिन्न अनुभव करती है, फिर भी भक्ती
26:16का माधोर्य बना रहता है
26:18इस प्रकार वेद केवल नियम और विधिया नहीं बताते, बल्कि वे आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का परम मार्ग प्रशस्त
26:27करते हैं
26:29भक्ती ही वह सेतु है, जो कर्म और ज्यान के द्वैत को पार कर जीव को शाश्वत आनंद और मुक्ती
26:35के तट तक ले जाती है
26:38और यही वह सत्य है, जो समस्त वेदों का निचोड है, समस्त दर्शनों का सार है, श्री कृष्ण ही परम
26:45सत्य है, परम आराध्य है
26:49इस प्रकार वेदों के गूढ मंत्रों से श्री कृष्ण की महिमा का गान होता है, जो अनंत काल तक भक्तों
26:56के हृद्यों में गूंजता रहेगा
26:59उन्ही वेदिक मंत्रों की गूंज में, परम सत्य की खोज में लीन जीव को अब एक नए युग कलियुग की
27:05कठिन चुनोतियों का सामना करना था, जहां सत्य और धर्म की राह धुंधली होती जा रही थी
27:13ज्यान मार्ग जहां सूक्ष्म दर्शन और गेहन चिंतन से परम सत्य को जानने का प्रयास किया जाता है, इस युग
27:20में अत्यंत जटिल और दुरलब होता जा रहा था, क्योंकि मन चंचल और बुद्धी मोहगरस्थ थी
27:27कर्म मार्ग जहां यग्य तप और कठोर अनुष्ठानों से पुन्य अर्जित कर मुक्ती पाने का विधान था, वह भी कलियुग
27:35में शुद्ध भावना के अभाव और जटिल विधियों के कारण दुश्कर प्रतीत हो रहा था
27:40और अश्टान योग जिसमें इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण और मन को एकागर करने की साधना आवश्चक थी, वह भी जीव
27:49के लिए लगभग असंभवसा हो गया था, क्योंकि चंचल मन उसे निरंतर भटकाता रहता था
27:56किन्तु इन सभी क्लिष्ट मार्गों के बीच समस्त वेदों ने एक सरल और सहज मार्ग का उद्गोश किया, वह था
28:03शुद्ध भक्ती जो हरिदय की सरलता से प्रभू श्री कृष्ण के चर्णों में समर्पन सिखाती है
28:10यह भक्ती मार्ग किसी भी बाह्य आडंबर या कठिन साधना की अपेक्षा नहीं करता, अपितु केवल हरिदय के सच्चे प्रेम
28:18और अटूट विश्वास से ही परम सत्य को प्रकट करता है
28:24जैसे एक नदी बिना किसी अवरोध के सागर से मिलती है, वैसे ही शुद्ध भक्ती जीव को सीधे परमिश्वर श्री
28:31कृष्ण से जोड़ देती है, समस्त कर्मों और ज्यान की उलजनों से परे
28:37भक्ती के प्रवाह में जीव अपने अहंकार, कामनाओं और मोह को त्याग कर कृष्ण प्रेम में इतना डूब जाता है
28:44कि उसे संसार की कोई चिन्ता नहीं सताती
28:48इस मार्ग में न तो जाती का भेध है, न वर्ण का बंधन और नहीं किसी विशेश स्थिती की आवश्शक्ता,
28:56क्योंकि प्रेम का मार्ग सभी के लिए खुला है
29:00और यही भक्ती, जीव को जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्त कर, उसे परमधाम भगवान श्रीकृष्ण के शाश्वत लोग की ओर
29:08ले जाती है, जहां केवल आनंद और प्रेम का सामराज्य है
29:13परम सत्य स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण स्वया अपने भक्तों के हृदय में प्रकट होते हैं, उन्हें अपने दिव्य रूप का साक्षात
29:21दर्शन कराते हैं, जो अनंत सौंदर्य और माधुर्य से परिपूर्ण है
29:27समस्थ उपनिशद और पुराण, जो स्रिष्टी के गूड रहसियों को उजागर करते हैं, अन्ता भक्ती को ही परम साधन के
29:35रूप में स्थापित करते हैं, जो हृदय को शुद्ध करती हैं, और आत्मा को परमात्मा से जोडती है
29:43स्वयन देवर्शी नारद, जो सदैव नारायन के नाम का गान करते हैं, भक्ती के महत्व को हर युग में प्रचारित
29:50करते रहे हैं, यह बताते हुए कि यह सरलतम मार्ग है
29:55भक्ती में लीन भक्त को किसी भी प्रकार का भय, शोक या मोह स्पर्ष नहीं कर पाता, क्योंकि उसका मन
30:02और इंद्रिया पूर्ण रूप से भगवान की सेवा में समर्पित हो जाती है
30:09विशेशकर कलियुग में, जहां जीव के पास अलपायू और साधना के लिए कम समय है, हरी नाम संकीर्तन अर्थात भगवान
30:17के पवित्र नामों का जप और कीर्तन ही उध्धार का एक मात्र सहज साधन है
30:23यह संकीर्तन मन को पवित्र करता है, पापों का नाश करता है और भगवान के प्रती अगाध प्रेन को जागरित
30:31करता है, जिससे जीव सहजी परम सत्य का अनुभव कर पाता है
30:37असंख्य भक्तजन इस सरल मार्ग को अपना कर भक्ती के आनंद में लीन होकर जीवन के हर पल को महोत्सव
30:44की तरह मनाते हैं दुख और क्लेशों से उपर उठकर
30:48इस प्रकार समस्त वेदों और शास्त्रों का यही परमसार है कि भगवान श्री कृष्ण ही एक मात्र आश्रय है और
30:57शुद्ध भक्ती ही उन्हें प्राप्त करने का सर्वोच्छ और सर्वसुलब साधन है
31:03इस गहन सत्य का अनुभव कर जीव जन्मजन मांतर के बंधनों से मुक्थ हो जाता है और अनंत काल के
31:10लिए परम आनंद एवन श्री कृष्ण के निध्य साननिध्य को प्राप्त करता है
31:16और इस प्रकार वेदों की ध्वनी अन्वरत गूंजती रहती है जो हर हृदय को भक्ती के परम्मार्ग पर चलने के
31:23लिए प्रेरित करती है ताकि हर जीव कृष्ण प्रेम में डूब कर अपना जीवन सफल कर सके
31:30और अब अपनी गेहन स्थुती के अंत में समस्त वेदों की साकार शक्तिया भगवान श्री कृष्ण के समक्ष अपनी अंतिम
31:38अर्ध्य लेकर प्रस्तुत हुई
31:41वेदों ने अपनी वानी को विनमर करते हुए स्विकार किया कि भगवान की असीम और अगमे महिमा का पूर्णता वर्णन
31:48करना उनके लिए असंभव है
31:52उनके प्रत्येक शब्द, प्रत्येक मंत्र और प्रत्येक सूक्ती ने केवल उनकी अनन्ता की एक सुक्ष्म जलक ही प्रदान की थी,
32:00उन्होंने नमरता पूर्वक यह स्विकार किया कि भौतिक शब्दों और सीमित बुद्धी से परम ब्रह्मा की अगाध गहराई को मापा
32:10न
32:20तरक या विशलेशन से नहीं. पूर्ण समर्पन के साथ वेदों की साकार मूर्तिया भगवान श्री कृष्न के दिव्य चर्णों में
32:29श्रधा पूर्वक नत्मस्तक हुई, अपने अहंकार को त्याग कर. उन्होंने भगवान से अपनी स्तुतियों में किसी भी प्रकार की अ
32:50उन्हें अनंत काल तक भगवान के चर्णों में बांध सके. उन्होंने प्रार्थना की की भगवान की शाश्वत कृपा सभी जीवों
32:58को भगती के इस परम्मार्क पर चलने के लिए सदा प्रेरित करे. जैसे ही वेदों की स्तुति अपने चरम पर
33:06पहुँची, संपूर्ण �
33:08एक अकलपनिय भक्तिमय उर्जा और दिव्यता से भर उठा. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी असीम करुणा से भरे एक शांत,
33:17मोहक मुस्कान के साथ उनकी ओर देखा, उनकी भक्ती को स्विकार करते हुए. उनके दिव्य रूप से एक कोमल, स्वर्णिन
33:27प्रकाश चार
33:31प्रदान कर रहा था. वेदों की साकार शक्तियों ने इस दिव्य कृपा का अनुभव कर एक गहन शांती और परंत्रिप्ती
33:40का अनुभव किया, मानों उनका अस्तित्व सार्थक हो गया हो. उनकी साकार शक्तिया धीरे धीरे ब्रहमांडिय ध्वनी ओम की अविनाशी
33:50तरं�
33:50विलीन होने लगी, अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करती हुई. ओम की यह पवित्रध्वनी, अनादी और अनन्त संपूर्ण ब्रहमांड में
34:00गूंज उठी, स्रिष्टी के हर कन को दिव्य ज्यान से भरती हुई. इस विलीनी करण ने एक ऐसी पूलनता और
34:08आध्यात्म
34:20खामोशी से कहीं बढ़कर थी, वह स्वय दिव्य उर्जा से उतप्रोत थी. वहां उपस्थित सभी देवगण और रिशिमुनी इस अध्भुत
34:30क्षन के साक्षी बनकर भक्ती और विस्मय से अभिभूत हो गए. संपूर्ण ब्रहमांड एक क्षन के लिए एक अनुपम आ�
34:50श्रीक्रिश्न की सर्वोच्चता और शुद्ध भक्ती को परम मार्क के रूप में ब्रहमांडिये चेतना में स्थाई रूप से स्थापित कर
34:57दिया. श्रीक्रिश्न जिनके मुख पर असीम शांती और दिव्य प्रकाश जलक रहा था, अब अपनी मधुरवानी में ब्रहमा
35:19के साथ कहा कि वेदों ने अभी अभी मेरी परातपर्ता को अपनी शाशवत स्तुतियों से प्रकाशित किया है. वास्तव में
35:28समस्त वेदों का परम और एकमातर उद्देश मेरी असीम महिमा और मेरे वास्तविक स्वरूप को जानना है. कर्मकान और यग्यकेवल
35:38साधन है, �
35:39जो जीवात्मा को मुझ तक पहुँचने के लिए एक मार्ग प्रदान करते हैं, न किस वय में साध्य.
35:47परमज्ञान वह है जो मेरी सर्वोप्रिता को पहचानता है, जो यह समझता है कि मैं ही समस्थ स्रिजन, पालन और
35:54सहार का मूल हूँ.
35:57वेदों के गूढ मंत्र और दर्शन अन्तह मेरी ही अद्वितिय सत्ता और मेरे अचिंत्य गुनों की ओर संकेत करते हैं,
36:05लेकिन इन सब में शुद्ध भक्ती ही वह सीधा और सरल्मार्ध है, जो मुझे अत्यंत प्रिय है और मुझे प्राप्त
36:14करने का सर्वोत्तम उपाय है.
36:26मेरा सच्चा भक्त वह है जो निहस्वार्थ प्रेम, उर्ण शर्णागती और निरंतर स्मरण के साथ मेरे चरण कमलों में लीन
36:34रहता है.
36:36ऐसे भक्त जो मुझे ही अपना सर्वस्व मानते हैं, वे मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और मैं सदैव
36:44उनकी रक्षा करता हूँ.
36:46भक्ती की अमरित धारा से आत्मा के समस्त मल धुल जाते हैं और वह संसार के समस्त बंधनों से मुक्त
36:53हो जाती है.
36:55जो कोई इस परम सत्य को हरिदय से स्वीकार करता है और भक्ती मार्ग का अनुसर्ण करता है, उसे मेरा
37:03विशेश आशिरवात प्राप्त होता है.
37:06ऐसे भक्त को संसार के समस्त दुखों से मुक्ती मिलती है और वह परमशान्ती, आनंद तथा निर्भयता को प्राप्त करता
37:15है
37:16वेदों के इन गूड रहसियों को भक्तिमय हृदय से समझने वाला जीवात्मा अन्ता मोक्ष को प्राप्त कर जन्ममृत्यू के चक्र
37:24से मुक्त हो जाता है
37:27यह ज्यान केवल सुनने या पढ़ने के लिए नहीं है, अपितु इसे अपने जीवन में उतारने और हर कर्म में
37:34इसे प्रकट करने के लिए है
37:37भगवान श्री कृष्ण के इन दिव्य वचनों को सुनकर वहा उपस्थित सभी भक्त और पुत्रकन एक गेहन आध्यात्मिक अनुभाव से
37:46भर उठे
37:47उनके हृद्यों में भक्ती की ज्वाला और भी प्रजवलित हो गई, जिससे उन्हें परमशान्ती और असीम आनंद की अनुभूती हुई
37:57सभी ने एक स्वर में भगवान श्री कृष्ण की जैजैकार करते हुए उनके श्री चर्णों में साष्टान प्रणाम किया, इस
38:04दिव्य ज्यान को धारण करते हुए
38:07और इस प्रकार द्वारका की उस पवित्र भूमी पर भक्ती ही परमज्यान और मोक्ष का शाश्वत मार्ग बन कर ब्रहमांडिये
38:15चेतना में सदा के लिए अनकित हो गया