द्वारका में ऋषियों की विदाई के बाद, भगवान श्रीकृष्ण एक ऐसी अद्भुत कथा का अनावरण करते हैं जो दान के महत्व और कर्म के सूक्ष्म नियमों को उजागर करती है। यह कहानी है धर्मात्मा राजा नृग की, जिनकी अपार दानशीलता के बावजूद एक छोटी सी त्रुटि ने उन्हें एक भयानक श्राप का भागी बना दिया। एक गाय के दान में हुई अनजाने में हुई गलती ने कैसे एक महान राजा को गिरगिट बनाकर एक कुएं में कैद कर दिया? और कैसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने आकर उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलाई? इस एपिसोड में देखें दान-धर्म की महिमा, ब्राह्मणों के अधिकार का महत्व, और भगवान की अपने भक्तों के प्रति करुणा का अलौकिक प्रदर्शन। क्या है राजा नृग के पुनरुत्थान का रहस्य? #BhagavataPurana #KrishnaLeela #RajaNrig #DonationStory #KarmaPhal #Moksha #HinduMythology #DivineJustice #Dwarka #ShriKrishna #Puranas #BhaktiDharma #KingNrig #AncientTales
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00:00नमिशारने से पधारे पूजनिय रिशिगन अपनी दिव्य यात्रा पूर्ण कर द्वार का नगरी से विदा लेते हुए भगवान श्री कृष्ण
00:08के समक्ष अंतिन प्रणाम करने को तत्पर थे।
00:12जगतपती ने अपने कमलन्यनों से आशिर्वाद बरसाते हुए उन तपस्वी रिशियों की विनमर विदाई को बड़े प्रेम और आदर से
00:20स्विकार किया, मानो ब्रहमांड स्वय उनकी भक्ती को नमन कर रहा हो।
00:26तत्पश्चात रिशियों का दल द्वारका के भव्य द्वारों से विदा हुआ, उनके चहरों पर श्री कृष्ण के साननिध्य का अलौकिक
00:33तेज चमक रहा था और उनके हृदय कृतज्यता से उत्परोत थे।
00:39रिशियों की विदाई के उपरांट द्वारका नगरी में एक शांत, गेहन निस्तब्धता चा गई, मानो पूरी स्रिष्टी ही उन दिव्य
00:46आत्माओं की महिमा को आत्म साथ कर रही हो।
00:50द्वारका के भव्य राज महल के एकांत कक्ष में भगवान श्री कृष्ण अपने सुसजित सिनहासन पर विराजमान थे, उनके मुख
00:59पर एक गेहन चिंतन और अलौकिक शांती का भाव स्पष्ट दिख रहा था।
01:04वे ब्रहमान की अनन्त लीलाओं पर विचार मगन थे, मानों उनके अंतर्मन में सृष्टी के गूढ रहस्य एक गेहन निरित्य
01:12कर रही हूँ।
01:14इसी गेहन चिंतन के क्षणों में उनके पुत्रसांब, प्रद्युम्न और अन्य प्रियजन धीरे-धीरे उस एकांत कक्ष में प्रवेश करते
01:22हैं, उनके चहरों पर पिता के प्रती गहरा आदर और उच्सुकता जहलक रही थी।
01:28वे पिता की मौन उपस्थिती से अभिभूत थे, किन्तु उनके हृदय में अनेक प्रश्न उमढ रहे थे, मानो वे अपने
01:37दिव्य जनक से ज्ञान का अमरित्पान करने को आतुर हूँ।
01:40श्री कृष्न ने अपने कमलन्यनों को खोला और उनके मुख पर एक मधुर स्नहिल मुस्कान छा गई, जिसने पूरे कक्ष
01:49को अपनी दिव्यता से प्रकाशित कर दिया।
01:52पुत्रों को अपने समीप देख, उनके हृदय में वातसल्य उमढ आया, और उन्होंने उन्हें अपने पास बैठने का संकेत दिया।
02:02सम्मान पूर्वक आसन ग्रहन करने के बाद साम्ब ने अपने पिता से कहा, पिता श्री आपके जीवन की अनेक लिलाए
02:09हमने सुनी हैं, जो हमें विस्मय से भर देती हैं।
02:14प्रद्युंग ने जोड़ा, आपके उपदेश और कार्य हमें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेणा देते हैं, परंतु हमें लगता
02:22है कि आपके ज्ञान का सागर असीमित है।
02:26सभी पुत्रों ने एक स्वर में अपनी उत्सुकता व्यक्त की, मानोवे ब्रहमांड के सबसे बड़े रहस्य से परदा उठाना चाहते
02:35हूं।
02:36उनकी आखों में एक ऐसी चमक थी, जो अनसुनी कहानियों और अनकहे सत्यों को जानने की तीवर इच्छा को दर्शा
02:44रही थी।
02:45सांब ने एक अग्यात रहस्य की ओर इशारा करते हुए कहा, क्या ऐसी कोई घटना नहीं, पिताश्री, जो आपके दिव्य
02:53जीवन के किसी अप्रकट पहलों को उजागर करती हो।
02:58पुत्रों की इस गहन जिग्यासा को देख, भगवान श्रीकृष्ण के मुख पर एक सुक्ष्म रहस्य में मुस्कान फैल गई, मानों
03:06वे पहले से ही उनके प्रशनों को जानते थे।
03:10उनकी आखों में एक विशेश चमक आई, जो यह संकेत दे रही थी कि अब समया गया है एक ऐसी
03:17कथा को प्रकट करने का जो युगों से छिपी हुई थी।
03:21उन्होंने धीरे से सिरहिलाया, मानो ब्रहमांड को एक नई दिशा देने का निर्णय ले चुके हो।
03:28श्री कृष्ण ने एक गहरी सांस ली और उनकी दिव्यवानी में एक अनूठी कथा का पूर्वाभास गूंजने लगा, जो सभी
03:36श्रोताओं के हृदय में उच्सुकता भर रहा था।
03:39इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने अपने परिवार और प्रिय भक्तों को एकत्रिप किया, उन्हें एक प्राचीन और शिक्षाप्रत गाथा
03:49सुनाने के लिए, जो एक राजा की नियती और दान के महत्व पर प्रकाश डालेगी।
03:55श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने प्रिय जनों को बताया कि प्राचीन काल में इक्षवा को वंश में परम तेजस्वी
04:02राजानरिग हुए, जिन्होंने अनर्क देश में धर्म पूर्वक शासन किया।
04:08राजानरिग केवल एक शक्तिशाली समराठ ही नहीं थे, बलकि वे सत्य, करुणा और निश्चल दानशील्ता के साक्षात प्रतीक माने जाते
04:17थे।
04:18उनके समरिध राज्य में न तो कोई दरिद्र था और नहीं कोई दुखी, क्योंकि राजा सदैव रिशियों, अनाथों और निर्धनों
04:27के कल्यान में लीन रहते थे।
04:29राजा निर्ग की सबसे बड़ी ख्याती उनके द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले असीम और अध्भुत गोदान के कारण तीनों लोकों
04:37में फैली हुई थी।
04:39वे प्रतिदिन भोर की प्रतम किरण के साथ सहसरों सुन्दर और पुष्ट गायों को दान के लिए विशाल राजसी प्रांगण
04:47में एकत्रत करते थे।
04:49दान के लिए चुनी गई प्रत्येक गाय युवा, स्वस्थ, शांत स्वभाव वाली और प्रचुर मात्रा में मधुर दूध देने वाली
04:58होती थी।
04:59राजा नरिक के आदेश पर कुशल स्वणकारों द्वारा प्रत्येक गाय के नुकीले और सुन्दर सिंगों को शुद्ध स्वण के आवरणों
05:08से मढ़ा जाता था।
05:09इतना ही नहीं, उन अलोकिक गायों के खुरों को भी अत्यंत कलात्मक चांदी के आभूशनों से सुसज़ित किया जाता था
05:18जो धूप में जगमगा उठते थे।
05:21गायों की पीठ पर रेश्मी वजरी के कीमती वस्त्र पहनाय जाते थे, जिनसे उनकी सुन्दर्ता और भी अधिक निखर उठती
05:29थी।
05:30उनके गलों में ताजे सुगंधित पुश्पों की मालाएं और बहुमुल्य मोतियों के हार पहनाय जाते थे, जिससे वे साक्षात कामधेनों
05:39के समान प्रतीत होती थी।
05:42हर एक गाय के साथ उसका चंचल बच्छडा भी मौजूद होता था, जिसे भी उसी प्रकार छोटे स्वन आभूशनों से
05:50सजाया जाता था।
05:52गायों के साथ साथ राजानरिक ब्राहमनों को अपार स्वन मुद्राएं, उपजाव भूमी और नए वस्त्रभी सहर्ष भेंट में प्रदान करते
06:00थे।
06:01इस महान दान को स्वीकार करने के लिए वेदर्य ब्राहमन और तपस्वी रिशिगन दूर-दूर से आकर अनुशासित पंक्तियों में
06:10बैठते थे।
06:31दिव्य शंकध्वनी वेदमंत्रों के सस्वर गूंज और आकाश से होती पुषपवर्षा के बीच पूरा प्रांगन अलौकिक आनन्द से भर उठता
06:40था।
07:02वर्षों तक राजा नरिग ने बिना किसी अहंकार के इसी प्रकार निशकाम भाव से निरंतर धर्म का पालन किया और
07:09अंगिनत गोदान किये।
07:31जिसकी आखों में एक अप्रत्याशित नेती की छाया जलक रही थी।
07:37उसे एक व्रिध पुन्यात्मा ब्राहमन को दान में दिया गया, जिनका नाम था सोमदेव, जिनकी विनमरता और निर्मल भक्ती राजा
07:46नरिक की दानशीलता के समान ही प्रतिष्ठित थी।
07:49ब्राहमन सोमदेव अपनी लाठी के सहारे उस नई गाय को अपनी छोटी सी कुटिया की ओर ले चले, जहां उनके
07:57अन्य गौधन ने एक मीठी हुकार के साथ उसका स्वागत किया।
08:01कई हफ्तों तक वह गाय सोमदेव के आश्रम में सुखपूर्वक रही, भरपूर दूध देती और उनके परिवार के लिए एक
08:11सच्चा वर्दान सिध्ध हुई।
08:13एक भीशन गर्मी की दोपहर में, जब वह गाय एक विशाल चरागाह में चर रही थी, तो उसे अचानक एक
08:21बेचैनी हुई, मानो कोई अंजाना आकर्शन उसे दूर के हरेभरे घास के मैदानों की ओर खीच रहा हो।
08:29सोमदेव के ध्यान में लीन होने पर, वह गाय धीरे-धीरे अपने छोटे जुन से अलग होती गई और चरागाह
08:36के किनारे पर स्थित घने जंगल की ओर बढ़ने लगी।
08:41शाम धलने पर, वह गाय खुद को पूरी तरह अकेला पाती है, अपने परिचित जुन से बिछडी हुई, उसकी बड़ी,
08:49मासूम आखों में एक हलकी सी चिंता जहलक रही थी।
08:53सहज प्रवृत्ती से प्रेरित होकर, वह अंजाने में एक बड़े गौशाला की ओर बढ़ती हुई, अपरिचित शेत्र में और गहराई
09:01तक भटकती गई, जिसकी रोशनी दूर से टिम्टिमाती दिख रही थी।
09:23प्रायन ब्राहमन ने उस नई गाय को देखा, यह मानते हुए कि यह राजा नरिक द्वारा दिया गया एक और
09:30उपहार है, क्योंकि ऐसे कई पशु प्रति दिन आते रहते थे।
09:53अशंका के साथ महसूस किया कि उनकी प्रिये गाय जुंड में नहीं है।
09:59एक व्याकुल खोज शुरू हुई, सोमदेव अपनी गाय का नाम पुकारते हुए उनकी आवाज में बढ़ती चिंता जलक रही थी,
10:07क्योंकि वह अपने निवास के आसपास के क्शेत्रों को छान रहे थे।
10:12उन्होंने अपने पडोसियों से पूच ताच की, जिनके सहानु भूती पूर्ण चेहरों पर उनकी ही चिंता जलक रही थी, पर
10:20किसी ने भी उनकी विशिष्ट गाय को दूर भटकते नहीं देखा था।
10:25अदमे होकर सोमदेव ने अपनी खोज जारी रखी, घंटों तक चांदनी रात में चलते रहे, उनका हृदय भारी था, और
10:34उम्मीद धीरे-धीरे क्शीन होती जा रही थी।
10:55और फिर भ्रम से मिली राहत की लहर दोड गई, जब उन्होंने अपनी ही विशिष्ट गाय को एक अद्वितिय निशान
11:01के साथ, उस विशाल नए जुन्ड के भीतर शान्ती से चरते देखा।
11:07आनंद और आक्रोश के मिश्रण के साथ, ब्राहमन सुमदेव उस युवा ब्राहमन की ओर बढ़े जो दूध निकालने का परिवेक्षन
11:15कर रहा था।
11:16उनकी आवास द्रिड पर सम्मान पूर्ण थी, यह मेरी गाय है ब्राहमन। युवा ब्राहमन चौंक कर और फिर रक्षात मक
11:25होकर जवाब देता है, यह गाय राजा निरिक द्वारा मुझे दान की गई थी, आप इसे अपनी कैसे कह सकते
11:32हैं, उसके माथे पर सच्ची हैरान
11:34की लकीरें उग्री हुई थी, दोनो धर्म प्रायन ब्राहमनों के बीच एक तीवर बहस छिड़ गई, उनकी आवाजें गौशाला में
11:44गूंज उठीन, प्रत्येक अपनी पवित्र गाय के उचित स्वामित्व में द्रिडता से विश्वास रखता था, एक ऐसा विवाद ज
11:56बीच गर्मागर्म बहस ने शीघर ही एक खुले संघर्ष का रूप ले लिया, जहां प्रत्येक अपनी गाय के पवित्र स्वामित्व
12:03पर अटल था, उनकी आवाजे गौशाला की दीवारों से टकरा कर गूंज रही थी
12:10वृद्ध ब्राह्मन सुम्देव ने द्रिड़ता से कहा, यह गाय मेरी संपत्ती है, जो वर्षों पहले मेरे पास थी, और मैं
12:18इसे अपने परिवार के हिस्से के रूप में जानता हूँ
12:22युवा ब्राह्मन ने राजा न्रिक के दान की पवित्रता पर जोर देते हुए अपनी बात का बचाव किया, महाराज ने
12:29मुझे यह गाय दान की थी, भला आप इस दिव्यदान पर प्रश्न कैसे उठा सकते हैं
12:36जैसे जैसे उनकी बहस बढ़ती गई, गौशाला में अन्य सेवक और ब्राह्मन भी उच्सुकता से देखने लगे, उनके चहरों पर
12:45असमंजस और चिंता के भाव थे
12:48स्थिती की गंभीरता को समझते हुए, दोनों ब्राह्मनों ने अंतह न्याय के लिए स्वया राजा नरिग के समक्ष अपनी गुहार
12:56लगाने का निश्चय किया
12:58राज दर्बार में प्रवेश करते हुए दोनो ब्राह्मनों के मन में न्याय की आशा और अपनी स्थिती की अनिश्चित्ता दोनों
13:06थी
13:08महाराज नरिग अपने भव्य सिनहासन पर विराजमान अपने मंत्रियों और दर्बारियों से घिरे हुए थे
13:14उनकी उपस्थिती में एक शांत और प्रभावशाली आभा थी
13:19जब दोनों ब्राहमनों को राजा के समक्ष प्रस्तुत किया गया
13:23तो उनके चहरे पर व्याप्त चिंता ने दर्बार में एक असहच सन्नाटा भर दिया
13:30आदरपूर्वक जुपते हुए व्रिध ब्राहमन सुमदेव ने राजा नरिक को अपनी व्यथा सुनाई
13:35अपनी खोई हुई गाय के विशय में विस्तार से बताया
13:40ततपश्चात युवाब राहमन ने विनमर्ता से अपनी बात रखी
13:44इस बात पर जोर दिया कि गाय उसे महाराज नरिक द्वाराही दान में दी गई थी
13:51दोनों धर्म प्रायन व्यक्तियों की परसपर विरोधी कहानियों को सुनकर राजा नरिक असमंजस में पढ़ गए
13:57उनके चहरे पर न्याय की जटिलता का बोज स्पष्ट दिखाई दे रहा था
14:03राजा ने तुरंक अपने मुख्य पुजारी और राजकोश के अधिकारी को बुलाया ताकि दान की गई गायों के सभी अभिलेखों
14:11की जाच की जा सके
14:14अभिलेखों की गहन जाच के बाद राजकोश के अधिकारी का चेहरा पीला पड़ गया क्योंकि उसे वही गंभीर तुटी मिली
14:22थी जिसकी आशंका राजा को थी
14:25स्पष्ट रूप से वही गाय जिसे पहले सुम्देव को दान किया गया था भटक गई थी और अंजाने में राजान
14:33रिक द्वारा दूसरे ब्राहमन को दान कर दी गई थी
14:37यह जानकर राजान रिक का हरिदय दुहक और आत्मगलानी से भर गया कि उसने अंजाने में धर्म का उलंधन किया
14:45था
14:46उन्होंने अपने आखे बंद कर ली अपने माथे पर हाथ रख लिया मानो अपने ही अंजाने पाप के भारी बोच
14:53को महसूस कर रहे हो
14:56दोनों ब्राहमनों ने राजा की विवश्टा और अपने साथ हुए अन्याय से क्रोधित होकर न्याय के लिए स्वर्ग की ओर
15:04देखा
15:05क्रोधित होकर वृद्ध ब्राह्मन सुम्देव ने राजा को एक भयानक शाप दिया
15:10तुम्हें अपने इस महान पाप का फल भुगतना होगा
15:14तुम एक नीच प्राणी का जन्म लोगे
15:17युवा ब्राह्मन ने भी अपने हिस्से के अन्याय से आहत होकर
15:22शाप की कठोरता को और बढ़ाया और जब तक तुम्हें उद्धार नहीं मिलेगा
15:27तुम उसी रूप में रहोगे
15:30ततकाल राजानरिक का विशाल और गौरवशाली रूप एक विशाल काय
15:34रंगीन गिर्गिट में बदलने लगा
15:36जो उनके पिछले जीवन के भव्य वैभव के विपरीद था
15:41शाप के प्रभाव से राजानरिक का विशाल शरीर पूरी तरह से
15:45एक विशाल और रंग बिरंगे गिर्गिट में बदल गया
15:48और वे अत्यंत दीन होकर महल से दूर एक गहरे निर्जन कुए में गिर गए
15:54कई युग बीत गए त्रेता से द्वापर युग आ गया
15:58लेकिन वह गिर्गिट अपने पूर्व जन्म के पुनियों और इश्वर के निरंतर स्मरण के कारण उस अंधकार में कुए में
16:05जीवित रहा
16:07द्वापर युग के उत्तराध में द्वार का नगरी भगवान श्री कृष्ण के पावन सानिध्य में अपने वैभव और एश्वर्य के
16:14चरम शिखर पर जग्मगा रही थी
16:16एक सुखद दोपहर को यदुकुल के युवा राजकुमार जिन में साम्ब और प्रद्युम्न प्रमुख थे क्रीडा और आखेट के लिए
16:26द्वारका के घने और सुन्दर जंगलों में गए
16:29तीवर धूप में खेलते खेलते जब राजकुमारों को प्यास लगी तो वे पानी की खोज में जंगल के भीतर भटकने
16:37लगे और अन्ता उन्हें एक पुराना कुआ दिखाई दिया
16:41जब राजकुमारों ने कुएं के भीतर जाक कर देखा तो वे पानी के बजाए वहां बैठे एक विशाल और अद्भुत
16:49गिर्गिट को देखकर आश्चर्यचकित रह गए
16:52परम दयालू राजकुमारों ने उस विशाल जीव को कुएं से बाहर निकालने का निश्चय किया और पास पड़ी लताओं और
17:00चम्डे के रसों को जोड कर एक मजबूत रस्सी बनाई
17:04उन्होंने रस्सी को गिर्गिट के शरीर में बांध कर पूरी ताकत से खीचना शुरू किया लेकिन वह रहस्यमेई जीव तस
17:12से मस न हुआ
17:13मानो वह किसी अद्रिश्य दैविय शक्ती से बंधा हो
17:17अपनी सारी शक्ती विफल होते देख चकित और ठके हुए राजकुमार तुरंत द्वार का लौट आये और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण
17:26को इस अनोखे जीव के बारे में बताया
17:30राजकुमारों की विस्मयकारी बात सुनकर सर्वग्य भगवान श्रीकृष्ण के अध्रों पर एक मंद और रहस्य में मुस्कान तैर गई क्योंकि
17:39वे राजानरिक के उद्धार का समय जान चुके थे
17:43भगवान श्रीकृष्ण अपने पुत्रों और यदुवन्शी वीरों के साथ उस प्राचीन वन की ओर बढ़े जहां वह कुआस्थित था और
17:51उनके चर्णों की धूल से वन पावन हो गुठा
17:55कुई के मुहाने पर पहुँचकर परमदयालू प्रभु ने अपनी करुणामई द्रिष्टी से उस दीन तडपते हुए गिर्गिट को देखा जो
18:03अपने स्वामी के दर्शन पाकर धन्य हो रहा था
18:08श्रीकृष्ण ने अपना कोमल और दिव्यबाया हाथ कुए के भीतर बढ़ाया और उस विशाल गिर्गिट के खुर्ग्रे शरीर को अत्यंत
18:16स्ने से स्पर्श किया
18:18जैसे ही परमेश्वर के पावन करक्मलो का स्पर्श हुआ एक तीवर दिव्यब्रकाश उत्पन हुआ जिसने गिर्गिट के उस नीच शरीर
18:27को क्षण भर में विलीन कर दिया
18:29उस दिव्यब्रकाश के शान्त होने पर गिर्गिट के स्थान पर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी देवपुरुष प्रकट हुआ जो साक्षात
18:38देवताओं के समान चमक रहा था
18:41अपनी दिव्य चेतना वापस पाते ही राजा नरिग ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्री कृष्ण को पहचान लिया और वे
18:49तुरंत प्रभु के चर्णों में साश्टान दंडवत प्रणाम करने लगे
18:54हाथ जोड कर खड़े होकर राजा नरिग ने अत्यंत विनीत स्वर में अपनी भूल स्विकार की जिसके कारण दान में
19:02दी गई एक गाय अंजाने में दूसरे ब्राह्मन को मिल गई थी
19:06राजा ने बताया की कैसे ब्राह्मनों के उस भयंकर शाप ने उन्हें सदियों तक गिर्गिट बना कर रखा लेकिन आज
19:14साक्षात इश्वर के दर्शन पाकर उनका जीवन धन्य हो गया
19:19भगवान श्री कृष्ण ने राजा की भक्ती से प्रसन्न होकर उन्हें आशिर्वाद दिया और उपस्थित यदुवन्शियों को ब्राह्मनों के धन
19:28और संपत्ती के प्रती अत्यंत आदर रखने की शिक्षा दी
19:32तदुप्रांथ स्वर्ग से एक अत्यंत दिव्य और जोतिर्मय विमान उत्रा जिसमें बैठकर राजा नरिक श्री कृष्ण की जयजयकार करते हुए
19:41परमधाम को प्रस्थान कर गए
19:44राजा नरिक के परमधाम गमन के उपरांथ भगवान श्री कृष्ण ने उपस्थित रिशियों और यदुवन्शियों को उस अनोखी घटना का
19:52विस्तरित वृत्तांत सुनाना आरंभ किया जिसने एक महान धर्मात्मा राजा को अंजाने में ही ऐसे भयंकर शाप का भागी
20:29बना दिया था।
20:30एक बार दान की गई एक गाय किसी तरह भूलवश वापस राजा की गौशाला में लौट आई जो उनके सेवकों
20:38की अनभिग्यता के कारण पुना उनकी विशाल जुन्ड का हिस्सा बन गई।
20:43अंजाने में और घोर असावधानी से राजा नरिग ने उसी गाय को एक दूसरे योग्य ब्राहमन को दान कर दिया
20:51जिससे एक गंभीर धार्मिक उलंधन का बीज बोया गया।
20:55कुछ समय बाद उस गाय के पहले स्वामी एक तपस्वी ब्राहमन ने उसे दूसरे ब्राहमन के घर के पास चरते
21:03हुए देखा और तुरंत ही उसे पहचान लिया।
21:06उन्हें यह देखकर अत्यधिक क्रोध आया कि उनकी दान की गई गाय किसी और के पास है और उन्होंने तुरंत
21:15दूसरे ब्राहमन से अपनी गाय वापस लोटाने की मांग की।
21:20दूसरा ब्राहमन जिसे राजानरिग ने स्वयं वह गाय दान में दी थी, अपने अधिकार पर ग्रिड था और उसने गाय
21:27को छोड़ने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
21:31दोनों ब्राहमनों के बीच गाय के स्वामित्व को लेकर एक तीवर विवाद छिड़ गया, जिसमें दोनों अपनी अपनी बात पर
21:39अड़े रहे और कोई भी पीछे हटने को तयार नहीं था।
21:42इस भयंकर विवाद की खबर जल्द ही राजा नरिक के कानों तक पहुँची, जिससे वे तुरंत ही स्थिती की गंभीरता
21:51को समझ गए।
21:53राजा को अपनी अंजाने में हुई भूल का भान होते ही, उनका मन गहन चिंता और पश्चाताप से भर उठा,
22:00क्योंकि वे जानते थे कि ब्राहमन के धन का उलंधन कितना भयंकर हो सकता है।
22:07उन्होंने तुरंत दोनों ब्राहमनों को अपने राजदर्बार में बुलाया, ताकि इस धर्म संकट का समाधान किया जा सके और उन्हें
22:15शांत किया जा सके।
22:17राजा न्रिग ने दोनों ब्राहमनों के समक्ष विनम्रता पूर्वक अपने अपराध को स्विकार किया और अपनी अंजाने में हुई त्रोटी
22:26के लिए हृदय से क्षमा याचना की।
22:29समस्या के समाधान हेतु, उन्होंने पहले ब्राहमन को उस एक गाय के बदले हजारों अन्य सुन्दर और पवित्र गायों को
22:37दान करने का प्रस्ताव रखा, जो अतुलनिय थी।
22:41इतना ही नहीं, राजा ने उन्हें अपार धन, स्वर्ण, रत्न और मूल्यवान भूमी भी देने का प्रस्ताव किया, ताकि वे
22:49अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी चुन सकें और संतुष्ट हो सकें।
22:54किन्तु पहला ब्राहमन अपने अधिकार पर अटर रहा और उसने उन हजारों गायों या किसी भी धन को स्विकार करने
23:02से इनकार कर दिया, बस अपनी वही विशिष्ट गाय वापस चाहता था।
23:08राजा नरिग ने तब दूसरे ब्राहमन से विनमरता पूर्वक अनुरोध किया कि वह अपनी ओर से उस गाय को छोड़
23:15दे ताकि इस धर्म संकट का शांति पूर्ण समाधान हो सके।
23:21परंतु दूसरे ब्राहमन ने भी राजा के अनुरोध को अस्विकार कर दिया। यह कहते हुए कि एक बार दान की
23:28गई वस्तु पर उसका पूर्ण अधिकार है और उसे वापस नहीं लिया जा सकता।
23:33इस प्रकार राजा नरिक दो द्रिधनिश्चेई ब्राहमनों के बीच फंस गए, उनकी सारी कोशिशें व्यर्थ हो गई और वे इस
23:41जटिल समस्या का कोई समाधान नहीं निकाल पाए, जिससे उनका मन गहन निराशा में डूब गया।
23:48जब कोई रास्ता नहीं सूझा और दोनों ब्राहमन अपनी अपनी मांग पर अडिग रहे, तब उनकी धैर्य की सीमा तूट
23:56गई और उन्होंने राजा की अंजाने में हुई भूल के लिए एक भयंकर शाप देने का निर्णै लिया।
24:03क्रोध से तम्तमाय हुए पहले ब्राहमन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, उनकी आखों से मानो न्याय और धर्म की धधक्ती
24:12ज्वाला फूट रही थी जो राजानरिक के संपूर्ण अस्तित्व को जखजोरने वाली थी।
24:18उसी क्षण दूसरे ब्राहमन ने भी अत्यंत क्रोध में भर कर अपने कमंडलू को कसकर पकड़ लिया और उनके मुख
24:25पर गहरी नाराजगी के भाव उभराये।
24:28अपने सिनहासन से उठकर राजानरिक ने अत्यंत दीनतापूर्वक दोनों रिशियों के चर्णों में अपना सिर रख दिया और अश्रुपूर्ण नेत्रों
24:37से क्षमा की भीख मांगने लगे।
24:40राजा की प्रार्थनाओं को अनसुना करते हुए पहले ब्राहमन ने मंत्रों चार शुरू कर दिया जिससे राजसभा की वायू में
24:48एक भयानक और अध्रिश्य आध्यात्मिक कमपन उत्पन्न हो गया।
24:54दूसरे ब्राहमन ने अपने कमंडलू से अभिमंत्रित जल निकाला जो राजा की नेती को सदैव के लिए बदलने के लिए
25:01तयार था।
25:03क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचकर ब्राहमनों ने राजा नरिक को श्राप दिया कि वे अपने इस विशाल राजसी वैभव
25:11को खोकर धर्ती पर रेंगने वाले एक जीव बन जाएंगे।
25:15उन्होंने आगे कहा कि राजा को एक अंधकार मई सूखे कुए में गिरकर युगों-युगों तक तड़पना होगा, जब तक
25:23किस वयम पर मिश्वर उनका उध्धार करने नहीं आते।
25:27जैसे ही श्राप के शब्ध हवा में गूजे, राजा नरिक के चारों और एक अत्यंत तीवर और चमकीला लालबैंगनी प्रकाश
25:35का बवंडर उठ खड़ा हुआ।
25:37श्राप के प्रभाव से राजा का बहुमूल्य मुकुट उनके सिर से फिसल कर संगमर्मर के फर्ष पर गिर पड़ा, जो
25:45उनके सामराज्य के अंत का प्रतीक था।
25:48राजा नरिक का विशाल और गौरवशाली मानव शरीर धीरे-धीरे सिकुडने लगा और उनकी त्वचा कठोर और खुरदरी होने लगी।
25:57उनके रेश्मी राजसी वस्त्र और स्वन आभूशन उनके शरीर से अलग होकर धूल में बिखर गए, जैसे उनका सारा वैभव
26:06हवा में विलीन हो रहा हो।
26:09राजसभा में उपस्थित सभी मंत्री, रानिया और सैनिक इस भयानक द्रिश्य को देखकर अत्यंत भैभीत हो गए और अपनी आखे
26:18बंद कर ली।
26:19शन भर में राजा नरिग पूरी तरह से एक विशालकाय, दरावने और विचित्र गिर्गिट के रूप में परिवर्तित हो गए,
26:27जिनका मानव अस्तित्व समाप्थ हो चुका था।
26:31दोनों ब्राहमन अपने क्रोध को शांत कर, बिना पीछे मुड़े मौन राज सभा से बाहर चले गए, जिससे वहा केवल
26:38सन्नाटा पसर गया।
26:41अचानक एक रहस्यमई और तीवर आंधी चली, जिसने उस विशालकाय गिर्गिट को हवा में उठा लिया और महल से दूर
26:49उडाले गई।
26:50वह विशाल गिर्गिट आकाश से होते हुए दूर एक निर्जन, सूखी और पत्रीली भूमी पर जागिरा, जहां हरियाली का कोई
26:59नामो निशान नहीं था।
27:01गिर्गिट सीधे एक पुराने, सूखे और पत्थरों से बने गहरे कोई के अंदर जागिरा, जहां चारों और केवल अंधकार था।
27:11उस संकियन कोई के तल पर बैठ कर, गिर्गिट ने उपर की ओर देखा और उसकी आखों में पश्चाताप और
27:18मुक्ती की प्रतीक्षा के आसु तैरने लगे।
27:21समय बीतने के साथ उसकुए के चारों और कटीली जाडिया और सूखी घास उगाई, जिससे वह स्थान पूरी दुनिया से
27:30पूरी तरहे कट गया।
27:32अंधकार में डूबा वह विशालकाई जीव अपनी आखें बंद कर मौन साधना में लीन हो गया, और मन ही मन
27:39भगवान श्री कृष्ण के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
27:43सदिया बीती और कई युग बदल गए, पर उस धके हुए सूखे कुएं के उपर से वसंत, ग्रीश्म और पच्छड
27:51के चकर बिना रुके बीटते रहे।
27:53कुए के उस घुप अंधेरे तल में स्थिर पड़ा, वह विशालकाय गिरगिट बिना हिलाडुला अपनी चेतना को पूरी तरहे भीतर
28:02समेटे बैठा रहा।
28:04गिरगिट के शरीर में कैद राजानरिग अपनी पूर्वस्मृती में उस भव्यस्वर्ण मंडप को याद करते हैं, जहां वे हजारों अलंकृत
28:12गायों का दान किया करते थे।
28:15अपनी मानसिक द्रिष्टी में वे दोनों क्रोधित ब्राहमनों के उस तीखे विवाद को पुनजीवित होते देखते हैं, जो उनके पतन
28:23का कारण बना था।
28:25राजा नरिग मन ही मन स्वीकार करते हैं कि अनजाने में हुआ एक छोटा सा अपराध भी महान पुनियों के
28:32विशाल फल को पल भर में नश्ट कर सकता है।
28:37यद्यपी गिरगिट की कठोर और खुरदरी त्वचाकुएं की तीखी गर्मी में जुलस रही थी, फिर भी उन्होंने किसी रिशिया इश्वर
28:45को दोश नहीं दिया।
28:46वे अपने इस नीच सरपिलाकार शरीर को अपने कर्मों का स्वाभाविक शोधन मानते हुए भक्तिभाव से मौन सहन करते रहे।
28:56उनके हृदय के भीतर भगवान विश्णुका वह दिव्य आश्वासन एक अटूट जोती की तरहे जलता रहा, जो हर अंधकार को
29:05मिटा देता था।
29:07जब कुए के उपर मूसलाधार मानसूनी वर्षा होती, तब भी उसकी एक बूंद भी उस प्राणी के सुखे कंठ तक
29:14नहीं पहुँच पाती थी।
29:17कड़कडाती ठंड के दिनों में जब शीत लहर कुए के भीतर उतरती, तब उसका गिर्गिट जैसा शीतरती शरीर पत्थर की
29:25भाती जकड जाता था।
29:27ग्रीश्म काल की भीशन तपन में धर्ती चटकने लगती, किन्तु राजा नरिक का अंतर्मन प्रभु भक्ती के शीतल अमरित में
29:35गोते लगाता रहता।
29:37कटीई जाडियों से ढके उसकुएं के पास से जंगली पशुओं की न जाने कितनी पीढिया गुजरी पर किसी को उस
29:45चुपे राजा का भान न हुआ।
29:47युग्चक्र घूमता रहा, त्रेता युग समाप्थ हुआ, भगवान राम निजधाम लोटे और फिर पुन्य भूमी भारत पर द्वापर युग का
29:56आगमन हुआ।
29:58द्वापर युग के आरंभ होते ही गिर्गिट रूपी नरिक को चेतना में एक अलौकिक कमपन महसूस हुआ की परम पुरुष्णे
30:05मथुरा में अवतार ले लिया है।
30:08उसके नीरस गिर्गिठरदय की धड़कने इस आस में तेज हो गई कि साक्षात श्री कृष्ण अब इस पृत्वी पर लीला
30:16रच रहे हैं।
30:18वर्षों के बीतने के साथ द्वारका के पास का वह क्षेत्र घने जंगलों से ढखा रहा और वह कुआ सूखी
30:25पत्तियों के नीचे और गहरा छुप गया।
30:29राजा अन्रिग अपनी भारी पल के मूध कर अपने मनमंदिर में केवल श्यामसुंदर श्री कृष्ण के बाल रूप और किशोर
30:36रूप की जाकी संजोते रहे।
30:38वे अपने गिर्गिट जीवन की प्रत्येक सांस को उन अज्यात चरंकमलों में अर्पित करते हुए अंतिन मुक्ती का मार्ग जोहते
30:46रहे।
30:48तभी एक दिन द्वारका के युवा यादव राजकुमार खेलते कूदते उस निर्जन वन में पहुँचे और उस छिपे हुए कुए
30:56के निकट आने लगे।
30:58कुए के अथाह अंधेरे तल में पड़े राजानरिग ने अपने उद्धार करता के आगम की वह दिव्य आहट सुन ली
31:05और उनका अनन्त इंतजार समाप्थ होने को आया।
31:10द्वारका के वे चंचल और तेजस्वी राजकुमार अपनी क्रीडा में मगन होकर उस प्राचीन सुखे कुए के समीप एक चमकीली
31:18गेन से खेल रहे थे।
31:21अचानक वह क्रीडा कंदुख हवा में लहराते हुए उस गहरे अंधकार में कुए के भी तरजा गिरा जिससे बालकों का
31:28खेलक्षन भर में रुप गया।
31:30जब राजकुमारों ने कुए के अथाह अंधकार में जाका तो उन्हें वहाँ एक परवत सद्रिश विशालकाय गिर्गिट दिखाई दिया जिसकी
31:39आखें करुना और वेदना से चमक रही थी।
31:43उस विचित्र और भीमकाय प्राणी को संकट में देख दयालू राजकुमारों ने चमडे के रस्से और मजबूत लताय कुए में
31:51डाल कर उसे बाहर खींचने का प्रयास आरंभ किया।
31:55किन्तु वह गिर्गिट इतना भारी और जडवत था कि राजकुमारों का सामुहिक बल और उनकी तमाम युक्तिया उस महाकाय जीव
32:04को एक इंच भी हिलाने में अस्फर रही।
32:07इस अलौकिक रहस्य से चकित और भयभीत होकर वे बालक दोड़ते हुए द्वारका के दिव्य राजप्रासाद की ओर बढ़े ताकि
32:16वे अपने परम्पिता को इस घटना की सूचना दे सकें।
32:20राजसभा में पहुँचकर बालकों ने हापते हुए जगनात श्रीकृष्ण को वन के उस निर्जनकुए और उसमें फंसे उस अद्भुत परवताकार
32:29जीव के विशय में विस्तार से बताया।
32:32उनकी बाते सुनकर लीलाधर श्रीकृष्ण के अध्रों पर एक मंद रहस्य में मुस्कान तैर गई क्योंकि वे भलीभानती जानते थे
32:41कि अब राजानरिक के उध्धार का वह पावन क्षण आ चुका है।
32:46भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत सौमयगती से अपने सिनहासन से उठे और उन उचसाहित बालकों के साथ उस घने धूल भरे वन
32:55मार्ग की ओर चल पड़े।
32:58जब जगदीश्वर उस जीन शीन कुएं के पास पहुँचे तो उनकी दिव्य आभा से वह संपून बीहड और अंधकार में
33:06वन अचानक आलोकित हो उठा।
33:08कुई की गहराई में पड़े राजानरिग ने जैसे ही अपने उपर उस परंब्रम के मुखमंडल का अलोकिक प्रकाश देखा, उनकी
33:17सदियों की पीड़ा पल भर में विलीन हो गई।
33:21करुणावतार श्री कृष्ण ने बिना किसी प्रयास के अपने बाएं हाथ को कुए के अंधकार में गर्द की ओर बढ़ाया,
33:28जिससे उनकी उंगलियों से दिव्य रश्मिया फूटने लगी।
33:32जैसे ही भगवान के कोमल और कांतिमय हस्तक्मल ने उस भयानक गिर्गिट के शरीर को छुआ, वैसे ही एक तीवर
33:40स्वर्णिम प्रकाश का विस्फोट हुआ जिसने पूरे वन को धक लिया।
33:44श्री कृष्ण ने अत्यंत सुगमता से उस विशालकाय जीव को हवा में उठा कर कुए से बाहर निकाला और उसे
33:52हरीभरी कोमल दूर्वा पर स्थापित कर दिया।
33:56स्पर्शमात्र से ही उस प्राणी की कंटीली और भयानक त्वचा पिघलने लगी, मानो कोई मैला वस्त्र उतार कर दिवयकांती धारन
34:04कर रहा हो।
34:06शन भर में वहतुच गिर्गिट का रूप पूर्णत विलीन हो गया और उसके स्थान पर एक परमतेजस्वी देवतुल्य महापुरुष प्रकट
34:15हुआ जो स्वन आभूशनों से सुसजित था।
34:19श्राप मुक्त होकर राजानरिग ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से साक्षात परमेश्वर श्री कृष्ण के चर्णों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया, जिससे
34:28उनका मुकुट प्रभु के नखों की आभासे आलोकित हो गया।
34:33रोमांचित शरीर और गदगद कंट से राजानरिग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और भगवान की असीम अनुकमपा का गान
34:40करते हुए अपनी पूर्व भूल और दान की महिमा का बखान करने लगे।
34:46कृपानिधान श्रीकृष्ण ने अभ्यमुद्रा में अपना दाहिना हाथ उठाया और उस धर्मात्मा राजा को सदैव के लिए वैकुंठ धाम और
34:55शाश्वत मोक्ष का वर्दान प्रदान किया।
34:59ततपश्चात एक दिव्यस्वर्णिम विमान आकाश से अवतरित हुआ और समस्थ देवताओं की पुश्पवर्शा के बीच राजानरिक अनंत शांती को प्राप्त
35:08करने के लिए परमधाम की ओर प्रस्थान कर गए।
35:12राजानरिक के परमधाम प्रस्थान के पश्चात उस स्थान पर उपस्थित समस्थ यादव राजकुमार और प्रजाजन आश्चर्य और भक्तिभाव के गहन
35:21सागर में निमग्न हो गए।
35:24सर्वग्य भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत गंभीर और करुणामई द्रिष्टी से अपने पुत्रों तथा द्वारका के युवाओं की ओर देखा।
35:33श्रीकृष्ण ने अपने पुत्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जब निर्ट जैसे महान और दानी नरेश को अंजाने में
35:41हुए एक छोटे से दोश के कारण गिरगिट का शरीर धारन करना पड़ा, तो जानबूच कर अधर्म करने वाले की
35:48क्या गती होगी।
35:49भगवान ने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिती में ब्राह्मन या पूजनिय जन की संपत्ती को हडपना सबसे विनाशकारी पाप
35:58माना गया है।
36:00उन्होंने आगे उपदेश दिया कि साधारन विश केवल पीने वाले व्यक्ति के प्राण हरता है, परन्तु किसी का अनुचित रूप
36:09से छीना हुआ धन संपूर्न कुल का सर्वनाश कर देता है।
36:14श्री कृष्ण के इन वजरसम और कड़े वचनों को सुनकर प्रद्युम्न, सांब और अन्य राजकुमारों के हृदय में धर्म और
36:21न्याय का भय समा गया।
36:24परमिश्वर ने चेतावनी दी की राजसत्ता और शक्ती के अहंकार में कभी भी किसी ज्यानी, संट अथवा निर्बल व्यक्ती के
36:32अधिकार का हनन नहीं करना चाहिए।
36:35उन्होंने दान की परम पवित्रता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दान सदैव निशकाम भाव, अहमकार रहित और पूर्ण स्वामित्व
36:44के साथ ही दिया जाना चाहिए।
36:46श्री कृष्ण ने उन घोर नरकों का वर्णन किया, जहां पराई संपत्ती या दान की वस्तु को चुराने वाले पापियों
36:54को युगों तक दारुन यातनाए भोगनी पड़ती हैं।
36:58जैसे जैसे श्री कृष्ण का उपदेश आगे बढ़ता गया, उनके श्री अंगों से प्रस्पुटित होता हुआ दिव्य प्रकाश पूरे परिसर
37:06को आलोकित करने लगा।
37:09प्रभु ने यह भी समझाया कि भक्ती और सत्यनिष्ठा से समर्पित किया गया एक छोटा सा पत्ता या जल की
37:16एक बूंद भी अनंत पुनेफल प्रदान करती हैं।
37:20श्री कृष्ण के भ्याता शक्तिशाली बलराम भी इस गहन धर्मोपदेश को सुनकर सहमती में अपना मस्तक हिला रहे थे और
37:28सभा को धर्म की मर्यादा याद दिला रहे थे।
37:32द्वार काधीश ने अपने पुत्रों को निर्देश दिया कि वे जीवन भर संतों की सेवा करें, सत्य का पालन करें
37:40और दूसरों की संपत्ती के प्रती सदा निशकाम रहें।
37:44पिता के इस अलौकिक और अमूल्य ज्यान को सभी राजकुमारों ने अपने हृदय की गहराईयों में धारन कर लिया।
37:52उपस्थित समस्त मुनियों और प्रजाजनों ने जय श्री कृष्णा के गगनभेदी जय घोष के साथ भगवान के सर्वोपरी ज्यान का
38:00अभिननदन किया।
38:01श्री कृष्ण ने पुनह बल देकर कहा कि सच्चा भक्त वही है जो केवल वचनों से ही नहीं बलकि अपने
38:09आचर्ण और कर्मों से भी धर्म का पालन करता है।
38:14संध्या की स्वर्णिन किर्णों में द्वारका की दिव्य नगरी और भी अधिक देदी प्यमान हो उठी, मानो संपूर्ण प्रकृती इस
38:22धर्मोपदेश का उत्सव मना रही हो।
38:25इसके पश्चात भगवान श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और पुत्रों के साथ राजप्रासाद की विशाल सभा की ओर लौट
38:33चले।
38:35राजा नरिक की यह कथार इस बात का सनातन प्रमान बन गई की इश्वर अपने भक्त के एक भी छोटे
38:41धर्मकार्य को व्यर्थ नहीं जाने देते।
38:44इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने न केवल एक महान राजा का उद्धार किया।
38:50अपितु आने वाली समस्त पीढियों के लिए सत्य और निशकाम दान का अमर संदेश स्थापित कर दिया।