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वृकासुर के विनाश के बाद, महाराजा परीक्षित के मन में एक गहरा प्रश्न उठता है: परम शक्तिशाली महादेव, जो स्वयं विष्णु के परम भक्त हैं, उन्हें क्यों भगवान कृष्ण के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी? इस एपिसोड में, शुकदेव गोस्वामी शिव और विष्णु की एकात्मकता, ब्रह्मांडीय लीलाओं के गूढ़ रहस्य और त्रिगुणों के स्वामी के दिव्य विधान को उजागर करते हैं। जानें कैसे भगवान के कार्य सामान्य बुद्धि से परे होते हैं और कैसे हरिहर का दर्शन हमें परम सत्य की ओर ले जाता है। यह दिव्य ज्ञान आपके सभी संदेहों को दूर करेगा और भक्ति मार्ग को दृढ़ करेगा। #BhagavataPurana #KrishnaLeela #ShivaVishnu #Harihar #Devotion #HinduMythology #SpiritualTruth #SanatanDharma #Mahadev #VishnuBhakti
Transcript
00:00महाराजा परीच्षित जिनकी आखों में गेहन जिग्यासा थी, शुकदेव गोस्वामी से पूचते हैं कि आखिर कैसे परम शक्तिशाली भगवान शिव
00:09जो देवताओं में अग्रगन्य हैं, एक साधारन असुर्व रिकासुर के वर्दान से संकट में पड़ गए और उन्ह
00:15स्वय भगवान विश्नु की शरन लेनी पड़ी। शुकदेव गोस्वामी ने परीच्षित की जिग्यासा को समझा और अपनी अलौकिक द्रिष्टी से
00:25भूतकाल के प्रिष्ट खोलते हुए उस अद्वितिय कथा को विस्तार से सुनाना आरंभ किया जो महादेव और नार
00:42कायन के गूड संबंध को दर्शाती है।
01:07जैसे ही व्रिकासुर ने अपने सिर का बलिदान देने का संकल्प किया।
01:32प्रसन हुए थे, भले ही उस असुर की नियत पवित्र नहीं थी।
01:37व्रिकासुर ने अपनी आखों में कपट भरे हुए, महादेव से ऐसा वर्दान मांगा कि वह जिसके भी सिर पर हाथ
01:44रखेगा, वह ततकाल भस्म हो जाएगा।
01:47और महादेव ने अपनी सरलता में तथास्तु कह दिया।
01:51वर्दान पाते ही व्रिकासुर के भीतर की असुर्ता जाग उठी और वह अपनी नव प्राप्त शक्ती पर इतना मोहित हो
01:59गया कि उसने उस वर्दान को सर्वप्रथम स्वयम महादेव पर ही आजमाने का दुष्ट विचार किया।
02:06अपनी मृत्यो को अपने ही दिये वर्दान में फंसा देखकर करुणा के सागर भगवान शिव जिनके गले में विश्धर सर्प
02:14और हाथों में त्रिशूल शोभा देता है वहां से तीवर गती से पलायन करने लगे।
02:21वरिकासुर भी अपनी नवनियुक्त शक्ती के मद में चूर होकर महादेव के पीछे-पीछे दौरता रहा जिससे तीनों लोकों में
02:29भय और अराजक्ता का वातावर्ण व्याप्थ हो गया।
02:33महादेव ने अपनी सुरक्षा के लिए ब्रहमा और इंद्र जैसे अन्य देवताओं के पास सहायता हे तुगए, किन्तु कोई भी
02:40इस विचित्र संकट से उन्हें बचाने में सक्षम नहीं था।
02:45असुर व्रिकासुर का पीछा निरंतर जारी था और महादेव जो कभी किसी से भय भीत नहीं होते, अपनी ही माया
02:53में फंसकर विवश्टा में इधर उधर भागते रहे।
02:57अंतह तीनों लोकों में किसी से भी सहायता न मिलने पर महादेव को यह स्पष्ट हो गया कि इस भीशन
03:04संकट से केवल परमपुरुष भगवान विश्णु ही उन्हें मुक्ती दिला सकते हैं।
03:10वरिकासुर से बचते हुए, त्रिलो की नाथ भगवान शिव अपने सभी गुनों और शक्तियों के साथ वैकुंठ धाम की ओर
03:18तीवर गती से अग्रसर हुए, जहां भगवान विश्णुक शीरसागर में विराजमान थे।
03:24शीरसागर में अनन्त नाग शयापर विराजमान भगवान विश्णु, जिनका श्याम सुन्दर वर्ण और चार भुजाय थी, इस संपूर्ण घटना को
03:33अपनी दिव्यद्रिष्टी से शांत भाव से देख रहे थे।
03:37महादेव अपनी गती को नियंत्रित करते हुए, भगवान विश्णु के समीप पहुँचे और नत्मस्तक होकर इस विचित्र संकट से मुक्ती
03:46पाने के लिए करबध प्रार्थना करने लगे।
03:49भगवान विश्णु जिनकी लीलाए अनन्त हैं, महादेव को इस प्रकार संकट में देखकर मंदमंद मुस्कुराएं और उन्हें आश्वस्त किया कि
03:59वे शीघ्रही इस दुष्ट असुर का वध कर उन्हें इस दुविधा से मुक्त करेंगे।
04:05परम पुरुशोत्तम भगवान विश्णु ने तुरंत ही अपनी अनन्त माया का प्रयोग कर एक अध्भुत योजना बनाई, जिससे व्रिकासुर को
04:13उसके ही वर्दान से छला जा सके।
04:16अपनी माया से मोहित होकर भगवान विश्णु ने एक युवा ब्रहमचारी का रूप धारण किया, जो अत्यंत सौमय, आकरशक और
04:25ज्ञानी प्रतीत हो रहा था, ताकि व्रिकासुर को भ्रमित किया जा सके।
04:31इसी ब्रहमचारी रूप में भगवान विश्णु ने उस क्रूर व्रिकासुर के मार्ग में प्रवेश किया, जो अभी भी महादेव का
04:38पीछा कर रहा था, अपने दुष्ट वर्दान को साकार करने की लालसा में।
04:44अपनी माया के अद्भुत प्रभाव में वह दिव्य ब्रहमचारी, शांत और गंभीर मुद्रा में व्रिकासुर के मार्ग में प्रकट हुए,
04:53मानोस्वय नेती ने उन्हें वहा स्थापित किया हो।
04:57शांतचित ब्रहमचारी ने व्रिकासुर को देखा, उसके क्रोध और ठकान को भापते हुए, और मधुरवाणी में उससे पूछा की वह
05:05इस तरह व्याकुल क्यों भाग रहा है।
05:09क्रोधित व्रिकासुर, जो महादेव का पीछा करते-करते ठक गया था, अचानक रुप गया और अपनी लालची आखों से उस
05:17शांत ब्रहमचारी को घूरने लगा।
05:20अपनी अज्यानता और वर्दान के मद में चूर होकर, व्रिकासुर ने गर्व से ब्रहमचारी को बताया कि उसने भगवान शिव
05:28से एक शक्तिशाली वर्दान प्राप्त किया है।
05:32उसने समझाया कि इस वर्दान के अनुसार वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा, वह ततकाल भस्म हो जाएगा।
06:02तब ब्रहमचारी ने चतुराई से वरिकासुर से कहा कि शिव जिन्हे भूत प्रेतो का स्वामी माना जाता है, कभी कभी
06:09असत्य भी बोल सकते हैं, जिससे वर्दान की सत्यता पर संदेह उत्पन्न हो गया।
06:16उन्होंने सुझाव दिया कि इस शक्तिशाली वर्दान की वास्तविक्ट शमता को प्रमानित करने के लिए एक सीधा परीच्षन आवश्चक है,
06:24ताकि कोई संदेह न रहे।
06:27ब्रहमचारी ने सुझाया कि व्रिकासुर स्वय अपने सिर्पर हाथ रखकर वर्दान की शक्ती का परीच्षन करे, जिससे उसे बिना किसी
06:36आशंका के इसकी सत्यता का प्रत्यक्ष अनुभव हो सके।
06:40इस अप्रत्याशित सुझाव से वरिकासुर्क शन्भर के लिए स्तब्ध रह गया, उसके भीतर एक हिचकी चाहट और भ्रम की लेहर
06:49दोड़ गई
06:50परंतु ब्रहमचारी ने अपनी मधुर और तार्किक वानी से उसे आश्वस्त किया कि यह परीच्षन पूर्णत सुरक्षित और आवश्चक है,
06:59जिससे उसकी सारी आशंकाय दूर हो जाएंगी
07:03भगवान विश्णों की अदमय माया से पूरी तरह मोहित होकर, व्रिकासुर ने अंत्ह उस घातक परीच्षन को करने का निर्णय
07:11लिया
07:13एक आत्मविश्वासी, फिर भी मूर्ख तापूर्ण मुसकान के साथ, व्रिकासुर ने अपने वर्दान की शक्ती का परीच्षन करने के लिए
07:21अपना हाथ अपने ही सिर की ओर बढ़ाया
07:25ठीक उसी क्षन जैसे ही व्रिकासुर का हाथ उसके सिर से छूटा, वर्दान की प्रचन शक्ती उसके ही विरुध सक्रिय
07:33हो उठी
07:34एक क्षन में उसके शरीर से अगने की प्रचन ज्वालाय फूट पड़ी और वह दानव ततकाल भस्म होकर राख के
07:42ढेर में बदल गया
07:45जैसे ही व्रिकासुर भस्म हुआ, ब्रहमांडिय वातावर्ण शुद्ध हो गया और स्वर्ग में देवताओं के बीच हर्ष और संतोष की
07:53लहर दोड़ गई
07:55अपने संकट से मुक्थ होकर महादेव जो अब तक पीछा किये जा रहे थे, कैलाश परवत की अपनी दिव्य शान्ती
08:03में शान्त और मैजेस्टिकली खड़े थे
08:06शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को समझाया कि यह साधारन दिखने वाला कार्य वास्तव में भगवान की दिव्य इच्छा और
08:14ब्रहमांडिय न्याय का एक गहरा प्रक्टिकरण था
08:19शुकदेव ने बल दिया कि ये दिव्य लीलाए यद्यपी नश्वर मनों के लिए विस्मयकारी और जटिल प्रतीत हो सकती हैं
08:26हमेशा ब्रहमांडिय व्यवस्था और परम सत्य के उच्छ उद्देश की सेवा करती हैं
08:33शुकदेव गोस्वामी ने आगे समझाया कि भगवान विष्णु जो समस्त ब्रहमांड के परम अधिश्थाता हैं
08:40स्वयन तीनों गुनों सत्व रजस और तमस से परे एक शुद्ध अविकारी और दिव्य सत्ता हैं
08:48उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां भगवान विष्णु ब्रहमांड के पालन के सत्व गुन के अधिश्थाता हैं जो प्रेम, शान्ती और
08:56व्यवस्था का प्रतीक हैं वहीं ब्रहमा स्रिजन के रजस गुन से युक्त हैं
09:02और फिर उन्होंने समझाया कि भगवान शिव जिन्हें अकसर संहारक के रूप में देखा जाता है तमस गुन के अधिश्थाता
09:10हैं जो विनाश और विग्टन की लौकिक शक्ती का प्रतिनिधित्व करते हैं
09:16शुकदेव ने इस बात पर विशेश बल दिया कि ये तीनों गुन यद्यपी उनके संबंधित देवताओं द्वारा नियंत्रित होते हैं
09:24अन्ता भगवान विश्णू की इच्छा और ब्रहमांडिय योजना के अधीन ही कार्य करते हैं
09:31उन्होंने महाराज परीच्षित को समझाया कि भले ही भगवान शिव सहार और तमस से जुड़े हों वे वास्तव में भगवान
09:39विश्णू के परम भक्त हैं और उन्ही की सर्वोच इच्छा से समस्त स्रिष्टी का सहार करते हैं
09:46शुकदेव ने व्रिकासुर की कथा का पुनसंदर्व दिया यह समझाते हुए कि शिव का उसक्षनिक संकट में पढ़ना उनकी कमजोरी
09:55नहीं बलकि भगवान विश्णू की लीला का एक भाग था
09:59उन्होंने बताया कि यह लीला इसलिए रची गई थी ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि स्वयन महादेव भी जब
10:07संकट में होते हैं तो वे एक मात्र परम आश्रे भगवान विश्णू की शरण में जाते हैं
10:14महाराज परिच्षित ने इस गहन रहस्य को आत्मसाथ करते हुए महसूस किया कि यह घटना केवल एक वर्दान की कहानी
10:22नहीं थी बलकि ब्रहमांडिय पदानुक्रम और सर्वोच्च भक्ती का एक जीवन्त पाठ था
10:30शुकदेव ने अपनी वानी में और अधिक द्रिड़ता लाते हुए कहा कि शिव की विश्णू के प्रती यह अटूट निष्ठा
10:37उनके तमस गुन से भी अधिक गहरी है क्योंकि यह प्रेम और समर्पन पर आधारित है
10:44उन्होंने जोर देकर कहा कि भगवान शिव समस्त योगियों के परम गुरू अपने हृदय में सदैव भगवान विश्णू के दिव्य
10:52रूप का ध्यान करते हैं और उन्हीं की आग्या से स्रिष्टी में संतुलन बनाये रखते हैं
10:59शुकदेव ने स्पष्ट किया की ब्रह्मा विश्णू और शिव के रूप में जो विभिन कार्य दिखाई देते हैं वे एक
11:06ही परमसत्ता की विभिन लिलाए हैं जो ब्रहमांडिय विधान को संचालित करती हैं
11:13उन्होंने समझाया कि यह संपूर्ण स्रिष्टी अपने स्रिजन, पालन और सहार के चक्रों सहित भगवान विश्णू की अमोग शक्ती और
11:21इच्छा शक्ती के अधीन ही कार्य करती है
11:26परीक्षित ने अपनी द्रिष्टी में एक नई चमक के साथ व्रिकासुर की कथा के नहितार्थों को समझा की कैसे दिव्य
11:33हस्तक्षेप ने न केवल महादेव की रक्षा की बलकी ब्रहमांडिय संतुलन को भी बनाय रखा
11:40शुकदेव ने स्पष्ट किया कि शिव का तमस्वरूप केवल भौतिक जगत की नश्वर्ता को दर्शाता है जो नए स्रिजन के
11:48लिए पुराने का विग्टन आवश्चत बनाता है
11:52उन्होंने आगे कहा कि भगवान शिव के सहार का कार्य उनकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं बलकी भगवान विश्णू की सर्वोच्च इच्छा
12:00द्वारा निर्देशित ब्रहमांडिय आवश्चता है
12:05शुकदेव ने जोर दिया कि यह दिव्यलीला यह सुनिश्चित करने के लिए थी कि सभी प्राणी, देवताओं सहित, यह समझें
12:13कि सभी समस्याओं का अंतिम समाधान और सुरक्षा भगवान विश्णू के चर्णों में ही नहित है
12:20उन्होंने महाराज परीच्षित को समझाया कि ऐसे गूड सत्य को समझने से ही मन में वास्तविक शान्ती और ब्रहमांडिय व्यवस्था
12:28के प्रती गहरी आस्था उत्पन होती है
12:32शुकदेव ने अंतह निशकर्ष निकाला की यद्यपी ब्रहमा, विश्णू और शिव के रूप में विभिन कार्य प्रतीत होते हैं
12:40परम सत्य में वे सभी एक ही परंब्रम की अभिव्यक्तिया है
12:45इस गहरे ज्यान को प्राप्त कर परीक्षित का हृदय कृतग्यता और भक्ती से भर उठा और उन्होंने शुकदेव गोस्वामी के
12:53चर्णों में श्रधा पूर्वक प्रणाम किया
12:57उनकी आत्मा में अब एक स्पष्ट और अटूट विश्वास स्थापित हो गया था कि परम पुरुशोत्तम भगवान विश्नुही सभी कारणों
13:05के कारण और समस्ट अस्तित्व का आधार हैं
13:09परम पुरुशोत्तम भगवान विश्नुही समस्ट स्रिष्टी के मूल आधार हैं इस अटल विश्वास के साथ महाराज परीक्षित का हृदय गहन
13:18शांती और अटूट भक्ती से भर गया जिससे उनकी आत्मा प्रकाश्मान हो उठी
13:25महाराज के मुख पर परिलक्षित इस दिव्यता को देख कर शुकदेव गोस्वामी ने उन्हें भक्ती के और भी गूढ रहसियों
13:33से अवगत कराने का निश्चय किया जो साधारन ज्यान से परे थे
13:38तब शुकदेव ने शिव के परम वैशनव स्वरूप का वर्णन करना प्रारंब किया यह रहसियोध घाटन करते हुए कि महादेव
13:46स्वयन किस प्रकार भगवान विश्णू के अनन्य और परम भक्त हैं
13:51उन्होंने बताया कि कैसे कैलाश परवत की बरफीली चोटियों पर शिव अनन्ट काल से निर्विकार भाव से भगवान नारायन के
13:59कमल चर्णों का ध्यान करते हुए समाधी में लीन रहते हैं
14:05महादेव की यह तपस्या केवल वैराग्य की पराकाश था नहीं
14:09अपितु परम पुरुशोत्तम भगवान विश्णू के प्रती उनकी अटूट और गहन भक्ती का प्रत्यक्ष प्रमाण है
14:17उनकी प्रिय संगिनी, भगवती पारवती, महादेव की इस अध्वितिय भक्ती को सदैव विस्मय और श्रद्धा से निहारती रहती हैं
14:25उनके प्रेम की गहराई को समझती हुई
14:29यहां तक की कैलाश पर उपस्थित अन्यरिशिमुनी और गणभी महादेव के इस परम वैश्णव स्वरूप को देखकर भावविभोर हो जाते
14:38हैं
14:38उनकी भक्ती की महिमा का गुनगान करते हुए
14:42शुकदेव ने बताया कि शिव के भीतर निरंतर भगवान विश्णु के सहस्र नामों का गुनजन होता रहता है और वे
14:49स्वयन को भगवान का परम दास मानते हैं
14:54उनके इस अनवरत ध्यान और सेवाभाव के कारण ही महादेव को समस्त वैश्णवों का परम गुरू और शिरोम ने कहा
15:01जाता है
15:03उनकी तपस्या और वैराग्य किसी कामना से नहीं बलकी केवल भगवान विश्णु के प्रती उनके शुद्ध प्रेम और समर्पन से
15:11प्रेरित हैं जो उन्हें सभी बंधनों से मुक्त रखता है
15:16कैलाश परवत की असीम शान्ती और अलौकिक सौंदर्य महादेव की इस उच्चतम भक्ती और वैराग्य का शाश्वत साक्षी है
15:26शिव की यह निश्ठापूर्ण भक्ती केवल उन्हें ही नहीं बलकि सम्पूर्ण ब्रहमांड को स्थायत्व और संतुलन प्रदान करती है जिससे
15:35सभी लोकों में शान्ती बनी रहती है
15:39जो भी भक्त सच्चे हरिदय से भगवान विश्णू की आराधना करता है महादेव उसे अपनी विशेश क्रिपा से धने करते
15:47हैं उसकी भक्ती को सफल बनाते हुए
15:50एक बार देवर्शी नारद तीनों लोकों में ध्रमन करते हुए कैलाश पहुँचे और महादेव को भगवान विश्णू के ध्यान में
15:59मगन पाया
16:00नारद ने भगवती पारवती से पूछा कि महादेव जो स्वयं परम शक्तिशाली है क्यों निरंतर भगवान विश्णू का स्मरण करते
16:09हैं
16:10पारवती ने उत्तर दिया कि भगवान विश्णू ही समस्थ स्रिष्टी के मूल कारण और आश्रे हैं इसलिए महादेव भी उन्हीं
16:19की भक्ती में लीन रहते हैं
16:21भगवती ने स्पष्ट किया कि महादेव की भक्ती सभी भक्तों के लिए एक आदर्श है जो यह दर्शाती है कि
16:30परमिश्वर ही सर्वोच पूज हैं
16:33शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि महादेव ही सभी वैश्णवों के परम गुरु हैं जो अपनी तपस्या और भक्ती के माध्यम
16:41से सभी को सही मार्ग दिखाते हैं
16:45यह सत्य सुनकर परीक्षित का हृदय और भी अधिक श्रधा और प्रेम से भर गया उन्हें यह ज्यात हुआ कि
16:52भक्ती का सर्वोच शिखर क्या है
16:56शुकदेव ने समझाया कि यद्यपी महादेव अत्यंत शक्तिशाली हैं और स्वयन देवताओं के भी आराध्य हैं
17:03फिर भी वे भगवान विश्णू की शरण में ही रहते हैं जो यह सिद्ध करता है कि परमेश्वर ही सभी
17:10के एक मात्र आश्रय हैं
17:13शुकदेव गोस्वामी ने अपनी दिव्यवानी में कहा कि परम सत्य के कई नाम और रूप हो सकते हैं परन्तु उनकी
17:20मूल शक्ति और चेतना सदा एक ही रहती है अविभाज्य और अखंडित
17:26उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन पात्रों के जल में अनेक रूप में प्रतिबिम्वित होता है उसी
17:34प्रकार एक ही परमेश्वर शिव और विश्णू जैसे विभिन देव रूपों में प्रकट होते हैं
17:40यह संसार अपने विभिन रूपों और कारियों के साथ उसी एक परम चेतना की लीला है, जहां शिव और विश्नु
17:48उसके ही स्रिष्टी, स्थिती और सहार के पहलू है
17:53इस प्रकार हरिहर का दर्शन हमें सिखाता है कि समस्त ग्वैत केवल द्रिष्टी का भ्रम है, जबकि मूलतै सब कुछ
18:01अग्वैत परम भ्रहमा का ही स्वरूप है
18:05यह हरिहर स्वरूप जहां एक अर्ध भाग भगवान विश्नु का नील्मनी समान श्याम वर्ण धारन करता है और दूसरा अर्ध
18:13भाग महादेव का करपूर गौर वर्ण उस परम एकात्मक्ता का प्रत्यक्ष प्रमान है
18:20एक और चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा और पद्म धारन की ये भगवान हरी हैं जो विश्व के पालक
18:27हैं वहीं दूसरी और त्रिशूर और दमरु धारन की ये महादेव हैं जो स्रिष्टी का सहार कर नवीन तालाते हैं
18:36शुकदेव ने विस्तार से बताया कि जिस प्रकार शरीर के विभिन अंग एक ही जीवन शक्ती से संचालित होते हैं
18:43उसी प्रकार समस्थ देवगण उसी एक परम शक्ती की विभिन अभिव्यक्तिया हैं
18:50इसलिए जब व्रिकासुर की कथा में भगवान विश्णु ने महादेव की रक्षा की तो यह एक अंग द्वारा दूसरे अंग
18:58की रक्षा करने जैसा ही था न कि किसी उच्छतर शक्ती द्वारा निम्नतर शक्ती को बचाना
19:05परिक्षित ने ध्यानपूर्वक सुना उनके मन से द्वायत का प्रत्येक विचार धीरे-धीरे विलीन होता जा रहा था और उन्हें
19:12एक नए गहरे आध्यात्मिक सत्य का अनुभव हो रहा था
19:18शुकदेव ने पुनह बल देते हुए कहा कि जो भक्त शिव में विश्नु को और विश्नु में शिव को देखता
19:24है वही सक्चा ज्यानी है और उसे ही परम शान्ती प्राप्थ होती है
19:30यह समझाना आवश्चक था कि महादेव की शर्नागती कोई कमजोरी नहीं बलकि परमेश्वर की ही लीला का एक भाग है
19:38जो भक्तों को विनय और परम आश्रे की शिक्षा देती है
19:44परीक्षित ने महसूस किया कि उनके हृदय में जो सूक्षम भेद का बीज था वह अब पूर्णता मिच्चुका था और
19:51केवल शुद्ध भक्ती और एकात्मक्ता का बोध शेश रह गया था
19:57महादेव की लीलाओं को अब वे विश्णु की ही लीलाओं का विस्तार समझते थे जहां हर क्रिया, हर घटना, उसी
20:04एक परम सत्ता की अभिव्यक्ती थी
20:08यह सत्य सुनकर परीच्षित का हरिदय पूर्णत श्रद्धा और प्रेम से भर गया, उन्हें ग्यात हुआ की भक्ती का सर्वोच्च
20:16शिखर द्वैत से परे एकात्मक्ता का अनुभव ही है
20:21शुक्देव ने अंत में समझाया की जो इस हरिहर स्वरूब को समझता है, वह जन्मुमृत्यु के चक्र से मुक्त होकर
20:28परम्पद को प्राप्ट करता है
20:31यह ज्ञान अज्ञान के अंधकार को मिटा कर भक्तों के हृद्यों में सत्य का प्रकाश भर देता है जिससे वे
20:38परमिश्वर के वास्तविक स्वरूप को जान पाते हैं
20:43परीक्षित का संदेह अब पूरी तरह से समाप्थ हो गया था उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि विश्णु द्वारा शिव
20:50को बचाना शरीर के एक अंग द्वारा दूसरे अंग को बचाने जैसा ही है एक ही परम सत्ता की सहच्क्रिया
20:58उनके मन में अब कोई प्रश्णशेश नहीं था केवल गुरु के प्रती असीम श्रद्धा और उस परम सत्य के प्रती
21:06गेहन प्रेम था जो उन्होंने अभी अभी समझा था
21:10राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी के चर्णों में श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया उनके हृदय में परम शान्ती और आनंद का
21:18अनुभव हो रहा था
21:20यह एकात्मक्ता का दर्शन एक अमर संदेश बन गया जो भक्तों को यह सिखाता है कि सभी देवी देवता एक
21:28ही परम शक्ती के विभिन रूप हैं और उनकी सेवा में ही जीवन का परम लक्ष है
21:35ततपश्चात शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित को एक नई कथा सुनानी आरंभ की जो व्रिकासुर और देवों के अध्भुत समन्वय
21:44की दिव्य लीला को उजागर करती है
21:47एक समय की बात है व्रिकासुर नामक एक भयंकर असुर था जिसके हृदय में अपार शक्ती और अमर्ता प्राप्त करने
21:56की तीवर अभिलाशा प्रज्वलित थी
21:59अपनी इच्छा पूर्ती के लिए उसने भगवान शिव को प्रसंद करने हेतु एक अत्यंत कठोर तपस्या करने का निश्चय किया
22:07जो की किसी भी साधारन प्राणी के लिए अकल्पनिय थी
22:12असुर की अविचल भक्ती से प्रसंद होकर अंत्ता भगवान शिव उस घोर तपस्या स्थल पर प्रकट हुए जिनकी दिव्य उपस्थिती
22:21से समस्त वातावर्ण प्रकाशमान हो उठा
22:24दर्शन पाकर व्रिकासुर ने हर्षित मन से त्रिलो की नाथ को प्रणाम किया और उनसे एक ऐसा वर्दान मांगा जो
22:32उसे अजे बना दे और तीनों लोकों में भय उत्पन करे
22:37अपनी भोलेपन में शिव ने व्रिकासुर को वर्दान दिया कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह ततकाल भस्म
22:44हो जाएगा बिना किसी बाधा के
22:48वर्दान पाते ही व्रिकासुर के मन में कपटपूर्ण विचार उत्पन हुआ और उसने उस वर्दान की शक्ती का परीच्षन स्वय
22:56धगवान शिव पर ही करने का दुस्साहस किया
22:59अपने ही वर्दान के कारण उत्पन इस विचित्र संकट से बचने के लिए भूत भावन शिव कैलाश से निकल कर
23:07त्वरित गती से भागने लगे
23:10व्रिकासुर भी उस वर्दान के मद में चूर होकर अपने क्रोधित गुरु का पीछा करते हुए तीनों लोकों में उन्हें
23:17ढूंडता रहा एक भयंकर शिकारी की तरह
23:21अंतह अपनी इस विकट स्थिती में भगवान शिव ने स्रिष्टी के पालक भगवान विश्णू की शरण में जाने का निर्णय
23:28किया ताकि वे इस संकट से मुक्ती पा सकें
23:32उनकी पुकार सुनकर भगवान विश्णू अपने अध्भुत चतुर्भुजी स्वरूप में प्रकट हुए शांत गंभीर और अपनी समस्त दिव्य शक्तियों से
23:42सुसजजित
23:44भगवान शिव से व्रिकासूर की कथा सुनकर श्रीहरी ने एक अध्भुत दिव्य लीला रचने का निश्चय किया और स्वयन को
23:51एक साधारन ब्राहमन बालक के रूप में परिवर्तित कर लिया
23:57चद्मवेशी विश्नु उस स्थान पर पहुँचे जहां व्रिकासूर क्रोध और ठकान में शिव का पीछा कर रहा था और उसे
24:04रोक कर शांति पूर्वक संबोधत किया
24:07ब्राहमन बालक ने व्रिकासूर से अत्यंत मधूर और तारकिक शब्दों में पूछा कि वह किस कारण से इतना क्रोधित और
24:15भैभीत होकर भाग रहे देव का पीछा कर रहा है
24:20व्रिकासूर ने अपनी सारी कथा वर्दान की शक्ती और शिव पर उसे आजमाने की अपनी दुष्ट इच्छा उस ब्राहमन बालक
24:28को बताई बिना किसी संकोच के
24:31ब्राहमन बालक विश्णूक ने अत्यंत चतुराई से कहा कि शिव अक्सर भ्रमित रहते हैं और उनका वर्दान शायद सच न
24:39हो क्योंकि वे स्वय अपने वर्दान से पीडित हैं
24:44उसने व्रिकासुर को चुनौती दी कि यदि वह अपने वर्दान की शक्ती पर इतना ही विश्वस्थ है तो उसे स्वय
24:52अपने सिर पर हाथ रखकर उसे परखना चाहिए
24:56अपने हंकार और मूर्खता के वशी भूत होकर व्रिकासुर ने ब्राह्मन बालक की बात मान ली और अपने ही सिर
25:04पर हाथ रख दिया
25:06शन भर में व्रिकासुर का विशाल शरीर भयानक ज्वालाओं में भस्म हो गया और वह धूल में मिलकर अनंतकाल के
25:13लिए शान्त हो गया
25:14इस प्रकार भगवान विश्णु ने अपनी अद्भुत लीला से भगवान शिव को संकट से बचाया और धर्म की पुनरस्थापना की
25:24जिससे देवताओं में हर्ष का संचार हुआ
25:28व्रिकासुर के भस्म होते ही तीनों लोकों में व्याप्त भय का काला साया छंट गया और देवताओं के हिदय में
25:35परमशांती और कृतग्यता का संचार हुआ
25:39भगवान शिव अपनी शांत और तेजस्वी मुद्रा में भगवान विश्णों की ओर मुडे जिनकी आखों में ब्रहमांडिय ज्यान और दयालुता
25:47का असीन सागर लहरा रहा था एक गहरी अलौकिक समझ उनके बीच स्थापित हुई
25:54देवताओं और रिशियों ने इस अद्भुत लीला के साक्षी बनकर अपनी ध्वनी और मन से दोनों महाशक्तियों की जैजैकार की
26:02जिनसे स्रिष्टी का संतुलन सदैव बना रहता है
26:07देव गणों में फुस्फुसाहट शुरू हुई कुछ चिन्तित थे कि महादेव अपनी सहच क्रिपा से क्यों कभी-कभी ऐसे वर्दान
26:15दे देते हैं जो स्रिष्टी के लिए संकट बन जाते हैं
26:20तब त्रिकालदर्शी देवर्शी नारद ने अपनी वीना पर एक मधुर जंकार के साथ आगे बढ़कर इस गंभीर प्रशन को सब
26:28के सामने रखा
26:30महादेव ने अपने दिव्य आसन से उठकर समस्त देवताओं और रिशियों को सम्बोधित किया उनके मुखमंडल पर एक अगाध शांती
26:39और गहन ज्यान प्रतिबिम्बित हो रहा था
26:43उन्होंने समझाया कि उनका स्वभाव आशुतोष का है अर्थात वे शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों को बिना किसी भेदभाव
26:52के इच्छित वर्दान दे देते हैं
26:55महादेव ने स्पष्ट किया कि उनके लिए कोई भी भक्त बुरा या अच्छा नहीं होता सभी उनके बच्चे हैं और
27:03उनकी भक्ती ही उन्हें वर्दान देने के लिए प्रेरित करती है
27:08तब स्रिष्टी के रच्चिता भग्वान ब्रह्मा ने आगे आकर इस रहस्य को और भी गहराई से उजागर करने का निश्चय
27:15किया
27:15उनके चार मुखों से दिव्य ज्यान की धारा प्रवाहित हुई
27:20उन्होंने समझाया कि शिव के वर्दान भले ही कभी कभी चुनौती भरे प्रतीत हो
27:25वास्तव में भग्वान विश्णू की लीलाओं को प्रकट करने का एक माध्यम बनते हैं
27:32ये वर्दान ही ऐसी परिस्थितिया निर्मित करते हैं
27:36जहां परमेश्वर विश्णू को अपनी सर्वशक्ति मानता और धर्म की रक्षा की अद्भुत क्षमता प्रदर्शित करने का अफसर मिलता है
27:45विश्णू की लीलाएं जो धर्म की पुनरस्थापना और अधर्मियों के विनाश के लिए होती हैं
27:51अकसर शिव के इन ही वर्दानों के परिणाम स्वरूप ही सामने आती हैं
27:57महादेव अपनी गहन समाधी और वैराग्य के कारण कर्मों के परिणामों से पूरी तरह से निरलिप्त रहते हैं
28:04उनका ध्यान केवल भक्तों की श्रधा पर केंद्रित होता है
28:09इस प्रकार भले ही वर्दान कभी दुष्टों के हाथ पढ़कर समस्याय उत्पन करें
28:15वे अंत्य धर्म की विजय और इश्वरिय न्याय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करते हैं
28:22यह ब्रह्मांडियन रित्य है जहां शिव का वर्दान और विश्णु की लीला मिलकर स्रिष्टी के विधान को सुचारू रूप से
28:29चलाते हैं
28:32देवताओं ने इस गहन रहस्य को आत्मसात किया और उनके मन से शिव के वर्दानों को लेकर सभी आशंकाय दूर
28:39हो गई
28:41इस प्रकार स्रिष्टी में संतुलन बनाये रखने के लिए त्रिदेवाओं की भूमिकाय एक दूसरे से इतनी गहराई से जुड़ी हुई
28:49हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता
28:53देवता अब समझ चुके थे कि शिव की करुणा भी अन्तह परमेश्वर विष्णों की महिमा का ही एक रूप है
29:00जो धर्म की स्थापना को सुनिश्चित करती है
29:04एक शांत दिव्य आनंद की लहर समस्त ब्रह्मांड में फैल गई जब सभी ने इस गहन दार्शनिक सत्य को स्वीकार
29:12किया
29:12इस प्रकार शुकदेव मुनी ने इस कथा के माध्यम से महादेव की असीम करुणा और भगवान विष्णों की सर्वव्यापक लीला
29:21का मर्म समझाया
29:24शुकदेव मुनी ने अपनी गंभीर वानी में आदे कहा कि ये सभी द्रिश लिलाए जिन में देवता भी कभी कभी
29:31उलज जाते हैं
29:32वास्तव में भगवान विष्णों की महामाया का ही खेल है जो सत्य को एक क्षण के लिए ढख देती है
29:41देवतागन जिन्होंने व्रिकासुर की कथा के माध्यम से इस सत्य का अनुभव किया था
29:46अब अपनी दिव्य द्रिश्टी से उसक्षनिक ध्रम के पीछे छिपे गहन आध्यात्मिक पाठ को समझ रहे थे
29:54शुकदेव ने समझाया कि यह महामाया जिसके प्रभाव से बड़े-बड़े योगी और तपस्वी भी विचलित हो जाते हैं
30:01वास्तव में परमेश्वर की ही शक्ती है जो स्रिष्टी के अध्भुत खेल को संभव बनाती है
30:08स्वयम ब्रहमदेव जो स्रिष्टी के रचिता हैं भी इस परम सत्य को जानते हुए शुपदेव की व्याख्या पर सहमती में
30:16अपना सिर हिलाते हैं क्योंकि उन्होंने अनेक बार इस माया के विस्तार को देखा था
30:23माया का यह खेल परमेश्वर विष्णू के ही संकल्प से चलता है जो स्वयंक्षीर सागर में अनंत नाग पर योगनिद्रा
30:31में लीन रहते हुए भी समस्त ब्रहमांड का संचालन करते हैं
30:36यह महा माया एक मनमोहक आवर्ण की तरह है जो सत्य के असीमित प्रकाश को एक क्षण के लिए ढख
30:43देती है जिससे द्वंद्व और अनेक्ता का भ्रम उत्पन होता है
30:48बड़े-बड़े तपस्वी और सिद्ध रिशी भी अपनी गहन साधना में इस आवर्ण को भेदने का निरंतर प्रयास करते हैं
30:56ताकि वे परम सत्य का साक्षात कार कर सकें
31:00कभी-कभी गहन तपस्या के क्षणों में उन्हें माया के इस आवर्ण के पार जाग कर ब्रह्मा के एकत्व का
31:07एक क्षणिक अनुभव होता है
31:11शुकदेव ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मा का वास्तविक स्वरूप इन द्वंदवों से परे है वह निर्गुन, निराकार और सर्वव्यापी है
31:19समस्त स्रिष्टी का मूल आधार
31:22उन्होंने समझाया कि त्रिदेव, ब्रह्मा, विश्नु और महेश उसी एक परम ब्रह्मा के विभिन्न पहलू और शक्तिया हैं, जो स्रिष्टी
31:31के कार्य को संचालित करते हैं
31:34देवतागन इस गहरी दार्शनिक व्याख्या को सुनकर, अपने मनों में एक नई समझ और विस्मय के साथ एक एकीकृत ब्रह्मान्दिय
31:43दर्शन को ग्रहन कर रहे थे
31:46शुकदेव ने पुना महादेव शिव के वरिकासुर कथा में निभाई गई भूमिका को उजागर किया, जहां उन्होंने माया के बंधन
31:54को तोड़ कर परम सत्य की ओर मार्ग प्रशस्त किया
31:57और भगवान विश्नो की लीला को समझाया, जो अपनी महामाया के माध्यम से स्रिष्टी को नियंतरित करते हैं और धर्म
32:05की स्थापना के लिए विभिन रूप धारन करते हैं
32:10ब्रहमा जो इस अनंट स्रिष्टी के स्रिजन करता है भी उसी परम ब्रहमा की शक्ती से प्रेरित होकर सभी लोकों
32:18और जीवन रूपों को आकार देते हैं
32:21इस प्रकार देवों ने समझा कि इं त्रिदेवों की भूमिकाएं एक दूसरे की पूरक हैं, न की विरोधा भासी और
32:29सभी एक ही परम सत्य की अभिव्यक्ती हैं
32:34ब्रहमांड का यह नरीत्य जिसमें स्रिजन, पालन और सहार निरंतर चलता रहता है, उसी एकात्म ब्रहमा की लीला का ही
32:42एक भव्य प्रदर्शन है
32:45शुकदेव ने बल दिया कि इस माया के आवर्ण को भेद कर आत्म ज्यान प्राप्त करना ही मोक्ष का एक
32:52मात्र मार्ग है, जिससे जीव जन्मुमृत्यू के चक्र से मुक्थ होता है
32:57यह सत्य समझना ही वास्तविक द्रिष्टी है, जो जीवन के सभी द्वंद्वों को भंग करके शाश्वत शांती प्रदान करती है
33:07देवतागन इस गेहन ज्यान को हरिद्यंदम कर शुकदेव मुनी के प्रती अत्यंत कृतग्यता ज्यापित करते हैं, जिन्होंने उन्हें भ्रम के
33:15पार का मार्ग दिखाया
33:18और इस प्रकार एक गेहन शांती और समझ समस्त ब्रह्मांडिय लोकों में चाजाती है, जहां प्रत्येक आत्मा परम सत्य की
33:26एक जलक पाने की आशा में जागरित होती है
33:31देवतागन और रिशियों ने शुकदेव मुनी के प्रवचनों से प्राप्ट अध्वितिय शांती में लीन होकर परम सत्य की गहराईयों को
33:39अनुभव किया, जहां सभी भेद मिटकर केवल एकत्व की अनुभूती शेश रह जाती है
33:46शुकदेव मुनी ने अपनी दिव्यवानी को पुनह स्वर दिया, यह समझाते हुए कि किस प्रकार समस्त ब्रह्मांडिय शक्तियों और दिव्यताओं
33:54का मूल एक ही परमसत्ता, श्री हरी विश्नु से उध्भूत होता है
34:00उन्होंने स्पष्ट किया कि इंद्र, अगनी, वायु, वरुन जैसे सभी देवता अपनी अपनी शक्तिया और कार्य करने की ख्षमताएं उसी
34:09एक सर्वोच परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, जैसे सूर्य से किरने निकलती है
34:15शुकदेव मुनी ने इस बात पर बल दिया कि सच्चे साधक को इन देवताओं का सम्मान करते हुए भी अपनी
34:22अनन्य भक्ती केवल श्री हरी के चर्णों में ही समर्पित करनी चाहिए, क्योंकि वे ही सभी के स्रोथ हैं
34:30यह ज्यान हृदय में उतरते ही, समस्त स्रिष्टी में एक अध्भुत संतुलन और सामन जस्य स्थापित हो गया, जहां हर
34:38जीव अपनी भूमिका को समझते हुए परमशांती का अनुभव करने लगा
34:44इसी परम सत्य को समझाने के लिए शुकदेव मुनी ने एक प्राचीन कथा का वर्णन करना आरंभ किया, जिसमें महादेव
34:52को भी एक असुर के भैसे स्वयन श्री हरी की शरण लेनी पड़ी थी
34:57बहुत समय पहले वरिकासुर नामक एक भैंकर असुर ने अपनी क्रूर तपस्या से तीनों लोकों को थर्रा दिया, जिसका उद्देश्य
35:06भगवान शिव को प्रसंद कर एक अजे वर्दान प्राप्त करना था
35:11वरिकासुर ने अपनी देह को विदीन कर रक्त की धाराएं अर्पित की और भैंकर अगनिहोत्र किये, जिससे कैलाश परवत पर
35:19स्थित महादेव का आसन डोल उठा
35:23अंतह अपनी सहेच करुना से द्रवित होकर, त्रिलो की नाथ भगवान शिव अपने दिव्यतेज के साथ उस भैंकर असुर के
35:31समक्ष प्रकट हुए, जिनकी छवी करोरो सूरियों के समान प्रकाशित थी
35:37शिव के सामने खड़ा वरिकासुर, जिसके मन में कपट और अहंकार भरा था, ने वह वर्दान मांगा कि जिस किसी
35:45के भी सिर पर वह हाथ रखे, वह ततकाल भस्म हो जाए
35:50भोलेनाथ शिव ने बिना किसी संशय के, अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करने के स्वभावानुसार, उस भयंकर वर्दान को तथास्तु
35:58कहकर प्रदान कर दिया
36:01वर्दान पाते ही, उस मूर्ख वरिकासुर के मन में कुटिल विचार आया, और उसने सर्वप्रथम स्वयन महादेव पर ही उस
36:08वर्दान की शक्ती का परीक्षन करने का दुस्सा हस किया
36:13यह देख, तीनों लोकों के स्वामी भगवान शिव भी विस्मय में पढ़ गए और उस उद्दंड असुर से अपनी रक्षा
36:20के लिए ततकाल पलायन करने लगे
36:23वरिकासुर अपनी नश्वर शक्ती के अभिमान में अंधा होकर कैलाश से लेकर सुमेरु तक हर लोक में भगवान शिव का
36:31पीछा करता रहा, जिससे ब्रहमांड में हाहाकार मच गया
36:36अंतह अपने परम्मित्र और समस्थ जगत के पालक श्री हरी विश्नु की शरण में जाने के अतिरिक्त महादेव के पास
36:43कोई अन्यमार्ग शेश नहीं रहा
36:47शीरसागर में विराजमान अनंत शेशनाग पर शयन करते हुए, भगवान विश्नु अपनी चतुर्भुज दिव्य छवी में प्रकट हुए, जिनका शांत
36:56मुखमंडल सभी चिन्ताओं को हरने वाला था
37:00जगत्पालक श्री हरी ने महादेव की व्यथा सुनी और अपनी मोहिनी माया का प्रयोग कर व्रिकासुर को परास्त करने का
37:08एक अध्भुत उपाय सुझाया
37:10भगवान विश्णु ने एक सुन्दर तेजस्वी ब्रहमचारी बालक का रूप धारण किया और व्रिकासुर के पास पहुँचकर अपनी मधुरवानी से
37:19उसे चलने का प्रयास किया
37:22विश्णु ने उस असुर को महादेव के वर्दान की सत्यता पर संदेह करने के लिए उकसाया और उसे स्वयं के
37:29सिर पर हाथ रखकर परीक्षन करने का सुझाव दिया
37:34अंकार में चूर और विश्णु की माया से भ्रमित व्रिकासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने ही सिर पर रखा
37:41वह ततकाल अगनी में भस्म होकर धूल में मिल गया
37:45व्रिकासुर के भस्म होते ही भगवान शिव जो असुर के भैसे त्रस्थ थे गहन शांती और राहत का अनुभव करते
37:53हैं
37:55उसी क्षनक ब्रह्मचारी बालक का दिव्यरूप तिरोहित हो जाता है और भगवान विश्नु अपने चतुर्भुच स्वरूप में प्रकट होते हैं,
38:04मंदमंद मुस्कान बिखेरते हुए
38:07भगवान शिव अपने परमसखा और संरक्षक को देख नत्मस्तक होते हैं और हृदय से श्री हरी के प्रती कृतग्यता व्यक्त
38:15करते हैं
38:17भगवान विश्नु महादेव को समझाते हैं कि कैसे असुरों को वर्दान देते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि वे प्रायह
38:26अपनी शक्ती का दुरुपयोग करते हैं
38:29इस असाधारन घटना के साक्षी बनने के लिए ब्रह्मा, इंद्र और अन्य सभी देवगन आकाश मार्ग से कैलाश परवत पर
38:38उतरते हैं आश्चर्य और श्रद्धा से भरे हुए
38:42ब्रह्मा जी अपनी चारो दिशाओं में मुख किये हुए भगवान विश्नु की माया शक्ती और स्रिष्टी के पालन में उनके
38:50अध्भुत सामर्थ्य की स्तुती करते हैं
38:54भगवान शिव वरिकासुर प्रसंग से यह गेहन सत्य समझते हैं कि भगवान विश्नु की माया इतनी प्रबल है कि वह
39:02स्वय देवों को भी भ्रमित कर सकती है
39:06शिव विश्नु रहस्य अब स्पष्ट हो जाता है यद्यपी उनकी भूमिकाए भिन्न हैं वे एक ही परम सत्य के दो
39:13अभिन्न पहलू हैं स्रिजन, पालन और सहार के चक्र को संतुलित करते हुए
39:19देवर्शी नारद अपनी वीना बजाते हुए इस अद्भुत लीला का गुनगान करते हैं और सभी उपस्थित देवों को भगवान विश्नु
39:28की सर्वव्या पक्ता का स्मरण कराते हैं
39:32लीला संपन्होने के पश्चात सभी देवगण, भगवान ब्रह्मा और इंद्र सहित, श्रीहरी और महादेव को प्रणाम कर अपने अपने लोकों
39:41को प्रस्थान करते हैं
39:44एक क्षण के लिए केवल श्री हरी और महादेव ही कैलाश के एकांत में रह जाते हैं, एक दूसरे को
39:51देख मंद मंद मुस्कुराते हुए, मानो एक गहरी समझ साजा कर रही हूँ
39:57वरिकासुर की कथा समाप्थ होने पर शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित की ओर मुर्ते हैं, जिनके चहरे पर अब गहन जिग्यासा
40:06और संतोष का मिश्रन दिखाई देता है
40:10परीक्षित महाराज इस कथा से शिव और विश्नु के सामंजस्यपून संबंध को एक नवीन द्रिष्टिकों से समझना प्रारंभ करते हैं,
40:18जो उनके पूर्व के सभी संदेहों को दूर करने लगता है
40:23शुकदेव गोस्वामी फिर विस्तार से बताते हैं कि कैसे भगवान विश्नु अपनी अग्वितिय लीलाओं के माध्यम से सभी देवों के
40:32आश्रय और परम संरक्षक के रूप में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करते हैं
40:38वे समझाते हैं कि भगवान शिव स्वय भगवान विश्नु के परम भक्त हैं और उनकी प्रत्येक लीलाश्री हरी की महिमा
40:46को ही दर्शाती है
40:49गोस्वामी जी तरिमूर्ती के अध्वुत सामन जस्य का वर्नन करते हैं, जहां ब्रहमा स्रिजन करते हैं, विष्नू पालन करते हैं
40:57और शिव सहार करते हैं, सभी एक ही परमसक्ता की इच्छा से संचालित होते हैं
41:04शुकदेव गोस्वामी के इन गेहन स्पष्टी करणों से महाराज परीच्षित के हृदय से शिव और विश्णु के भेज से सम्बंधित
41:12सभी संदेह पूर्णतर दूर हो जाते हैं।
41:16परीच्षित अब पूर्ण रूप से प्रबुद्ध हो जाते हैं। दिव्य ज्यान की प्राप्ती कर उन्हें परम सत्य की अविनाशी प्रकृती
41:24का साक्षातकार होता है।
41:27कृतग्यता से भरे हृदय से परीच्षित महाराज शुकदेव गोस्वामी के चर्णों में नत्मस्तक होते हैं। उनके दिव्य उपदेशों के लिए
41:36असीमित धन्यवाद अर्पित करते हुए।
41:39इस प्रकार भागवत पुरान का मूल संदेश पुन स्थापित होता है। भगवान विश्णों की महिमा सर्वोप्री है और भक्ती मार्गी
41:48सर्वोच्य सत्य तक पहुँचने का एक मात्र साधन है।

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