द्वारका में समय की बदलती धारा के बीच, भगवान श्रीकृष्ण अपने अंतिम और सबसे गहरे उपदेश प्रदान करते हैं। इस अद्भुत एपिसोड में, ऋषि-मुनि और उनके अपने परिवार के सदस्य कालचक्र, कर्म और शुद्ध भक्ति के परम रहस्यों को जानने के लिए आतुर हैं। श्रीकृष्ण अपनी दिव्य लीलाओं का सार प्रकट करते हैं और बताते हैं कि कैसे हर घटना, हर अवतार एक ही परम लक्ष्य की ओर ले जाता है – भगवान के प्रति अटूट प्रेम। क्या हैं वो अंतिम रहस्य जो द्वारका के पतन से पहले श्रीकृष्ण ने उजागर किए? और कैसे कलयुग के लिए उन्होंने दिया मुक्ति का सबसे सरल मार्ग? जानिए इस गहन और भावुक यात्रा में। #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Dwarka #BhaktiYoga #HinduMythology #SpiritualWisdom #KaliYuga #Moksha #Dharma #SanatanDharma
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00:00द्वारका नगरी अपनी चिर्परिचित शान्ती में डूबी हुई थी, जहां समुद्र की लहरें भी एक मधुर लोरी सी गाती प्रतीत
00:07होती थी.
00:09किन्तु उस गहरी शान्ती के भीतर, आकाश के रंगों में एक सुक्ष्म विचलन और वायू में एक अस्पष्ट भारीपन धीरे
00:17-धीरे घुलने लगा था.
00:19एक वृद्ध नाविक जो वर्षों से द्वारका के तटों पर अपने अनुभव की गहरी चाप छोड़ चुका था, ने पहली
00:27बार समुद्र की उस चिरपरिचित ध्वनी में एक अजीब सी खामोशी महसूस की.
00:33नगरी के मध्यस्थित पवित्र कुंडो का जल जो सदा निर्मल और स्पूर्ति दायक रहता था, उसमें भी एक हलकी सी
00:40कंप-कंपी और उसकी आभा में एक अंजाना मलिंता स्पष्ट दिखने लगी.
00:46गलियों में खेलते हुए बच्चे जिनकी हसी सदा गूंजती रहती थी, अब कम मुखर थे, उनकी आखों में एक अनकहा
00:54भय तैर रहा था.
00:56नगर के ज्यानी ब्राहमन और रिशिजन, जिन्होंने अपनी तपस्या से अनेकों युगों के रहसियों को जाना था, अब अपने आश्रमों
01:05में गहन चिंतन में लीन, भविश्य के संकेतों को समझने का प्रयास कर रहे थे.
01:11द्वारका के राजदर्बार में भी एक अजीब सी चुप्पी छाई हुई थी, जहां महाराजा उग्रसेन और अन्ययादफ प्रमुखों के मुख
01:19पर एक अस्पष्ट चिंता की रेखाएं स्पष्ट थी.
01:24यहां तक की भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात साननिध्य में भी द्वारकावासियों के मन में एक अज्यात भय और गेहन चिंतन
01:32का वातावर्ण गहराता जा रहा था, जो उनकी अविचलित दिव्य आभा को भी एक क्षण के लिए धूमिल करने की
01:39क्षमता रखता था.
01:55यादव कुल के युवा योध्धा, जो अपनी शौर्य और पराक्रम के लिए विख्यात थे, अब अपनी तलवारों और गदाओं को
02:03धारन किये हुए भी अन्मने से अभ्यास कर रहे थे, उनके चहरों पर गेहन विचार की परच्छाई थी.
02:11द्वारका की रानिया, जो अपने अलोकिक सौंदर्य और भक्ती के लिए जानी जाती थी, अब अपने महलों के जरोखों से
02:18बाहर देखती, उनके नेत्रों में एक अच्छूते प्रश्न की चाया स्पष्ट जलक रही थी.
02:25पवित्र गोवर्धन परवत से लाए गए गौवंश, जो द्वारका की शोभा थे, अब कम दूढ देते थे, और उनकी आखों
02:33में भी एक अजीब सी उदासी थी, मानों वे भी आने वाले समय के संकेतों को भांप गए हो.
02:40नगर के मुख्यद्वार पर स्थित विशाल घंटिया, जो सामान्यता उच्सवों पर बज़ती थी, अब अकारण ही कभी कभी मंद ध्वनी
02:49करती, जैसे कोई अद्रिश शक्ती उन्हें हिला रही हो.
02:53कई नागरिक रात में उठकर अपने घरों के बाहर एकत्रित होते, एक दूसरे से कानाफूसी करते और आकाश की ओर
03:02देखते, जहां तारे भी अपनी चमक खोते से प्रतीत हो रहे थे.
03:07एक व्रिधरिशी, जिन्होंने अपना जीवन वेदों के अध्ययन में समर्पित किया था, अब अपने पवित्र ग्रंथ से मुख मोड कर
03:15दूर क्षितिच की ओर देखते हुए, अपने माथे पर चिन्ता की गहरी रेखाए लिये हुए थे.
03:22नगर के सबसे उचे शिखर पर स्थित ध्वज, जो सामान्यत है गर्व से लहराता था, अब मन्ध हवा में भी
03:29जुका हुआ प्रतीत होता था, मानो वह भी भारी मन से जुक गया हो.
03:34द्वारका की भूमी पर लगे व्रिक्षों के पत्ते अकारण ही पीले पढ़ने लगे थे, उनकी हरियाली में एक उदासी चाने
03:42लगी थी, जो आने वाले परिवर्तनों का एक और मुख संकेत थी.
03:47मंदिर के पुजारी, जो नित्य अपनी पूजा अर्चना में लीन रहते थे, अब पूजा के उपरांत भी शान्त और गंभीर
03:55मुद्रा में बैठे रहते, उनके मन में भविश्य की अज्यात आशंकाय व्याप्त थी.
04:02इन सभी बदलती परिस्थितियों के बीच, द्वारका का भव्य महल, जो पहले आनंद और उत्साह का केंद्र था, अब एक
04:10शान्त गहन चिंतन के स्थल में परिवर्तित हो चुका था, जिसकी भव्यता के बावजूद एक उदासी भरी गंभीरता व्याप्त थी.
04:19और इन सब के केंद्र में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य आसन पर विराजमान उनकी शांत आखें कालचकर के प्रत्येक सुक्ष्म
04:28गती को देखते हुए, आने वाले महान परिवर्तन को अपने भीतर आत्म साथ कर रही थी.
04:34कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
04:39समय के इन परिवर्तनों को भाम्पते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
04:49वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
04:57को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
05:01कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
05:04समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
05:15वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
05:23को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
05:27कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
05:31समय के इन परिवर्तनों को भाम्पते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
05:41वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
05:49को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
05:53कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
05:56समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
06:06वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
06:15को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
06:19कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
06:22समय के इन परिवर्तनों को भाम्पते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
06:33वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
06:41को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
06:45कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
06:49समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
06:59वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
07:07को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
07:11कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
07:15समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
07:25वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
07:33को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
07:37कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
07:41समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
07:51वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
07:59को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
08:03कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
08:07समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
08:17वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
08:26को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
08:29कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
08:32समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
08:42वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
08:52को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
08:55कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
08:59समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
09:09वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
09:18को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
09:21कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
09:25समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
09:35वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
09:44को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
09:47कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
09:51समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
10:01वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
10:10को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
10:13कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
10:17समय के इन परिवर्तनों को भाम्पते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
10:27वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
10:36को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
10:39कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
10:42समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
10:53वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
11:02को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
11:05कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
11:09समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
11:19वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
11:28को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
11:31कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
11:35समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
11:45वे भगवान श्रीकरेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
11:54को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
11:57कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
12:02समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
12:11वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अन्तिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
12:20को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
12:23कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
12:28समय के इन परिवर्तनों को भाम्पते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्यकई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
12:38वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
12:46को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
12:49कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है.
12:54समय के इन परिवर्तनों को भामपते हुए, देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्य कई महान रिशिमुनिद्वार का पधारते हैं.
13:04वे भगवान श्रीक्रेन से मिलने आते हैं, उनके मन में कालचक्र, स्रिष्टी के अंतिम उद्देश्य और आगामी कलेट के धर्म
13:12को लेकर गहरी जिग्यास आये हैं.
13:16द्वारका के भव्य प्रवेश द्वार पर देवर्शी नारद, महर्शी वेदव्यास और अन्य रिशियों का आगमन एक दिव्य आभा से युक्त
13:24था, जो वातावर्ण में गहन आध्यात्मिक स्पंदन भर रहा था, जैसे ही वे भगवान श्रीक्रिश्न से साक्षातकार क
13:42के लिए आगे बढ़ते हैं, उनके आगमन से प्रसन्न होकर, उनकी सेवा में लीन होकर, भगवान श्रीक्रिश्न ने विनमरता पूर्वक
13:51एक एक रिशी के चरंध होए, उनके हिदय में प्रेम और सम्मान की वर्शा करते हुए, जो उनकी परम भक्ती
13:58का प्रतीक था, पश्
14:12से वे देवलोक से पधारे हों, फिर उन्होंने अपने ही हाथों से उन्हें मीठे फल और शीतल जल भेंट किया,
14:20एक साधारन ग्रिहस्त की भाती सेवा करते हुए, जिससे रिशियों के हरिदय कृतग्यता और प्रेम से भर उठे, उनकी पत्रानिया,
14:30जिन में रुक्मिनी औ
14:31और सत्यभामा प्रमुख्थी, भी श्रधा पूर्वक रिशियों की सेवा में सनलगन थी, उनकी हर आवश्शक्ता का ध्यान रखते हुए, जिससे
14:39द्वारका का वातावर्ण भक्तिमय हो उठा।
14:43सेवा उप्रांत, भगवान श्री कृष्ण ने रिशियों से उनके कुशलक्षेन और तपस्या के विशय में अत्यंत आत्मेता से समवाद किया,
14:52जैसे वे उनके परिवार के सदस्य हों।
14:55रिशिगन उनकी उदार्ता और दिव्य शक्ती से अभिभूत होकर स्वय को धन्य महसूस कर रहे थे, मानो उन्हें साक्षात परब्रम
15:04के सान्निध्य में शाश्वत शांती प्राप्थ हुई हो।
15:08देवर्शी नारद अपने हृदय में उमरते प्रेम और कृतग्यता के साथ सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण की महिमा का बखान
15:16करने लगे, उनके परम गुनों की स्तुती करते हुए।
15:20ततपश्चात महर्शी वेदव्यास ने भी अपनी कृतग्यता व्यक्त की, यह कहते हुए कि श्री कृष्ण के दर्शन से उनके समस्थ
15:29संदे और चिन्ताय शांत हो गई हैं, और उनके मन को परम शांती प्राप्थ हुई हैं।
15:36किन्तु इस तातकालिक शांती के बावजूद सभी रिशिगन अपने भीतर युग परिवर्तन की गेहन बेचैनी महसूस कर रहे थे, आगामी
15:45कालचक्र के भयानक प्रभावों से चिन्तित होकर।
15:49तब देवर्शी नारग ने अत्यंत विनमर्ता से भगवान श्रीकृष्ण से इस क्षण भंगुर संसार में शाश्वत सुख और मोक्ष के
15:57वास्तविक मार्ग के विशय में प्रश्न करना आरंभ किया।
16:01महर्शी वेदव्यास ने भी इस चर्चा को आगे बढ़ाया, आगामी कल्यक के धर्महींता और चुनोतियों पर प्रकाश डालते हुए और
16:10यह पूछते हुए कि ऐसे समय में धर्म की रक्षा कैसे होगी।
16:15समस्त्र शिग्णों ने एक स्वर में अपनी गहरी चिंता व्यत्त की, यह मानते हुए कि बिना इश्वरिय मार्ग दर्शन के
16:22मानव जाती इस युग परिवर्तन की उथल पुथल से पार नहीं पा सकेगी।
16:45एक अत्यंत शांत और गंभीर मुद्रा में बैठ गए, उनके मुख मंडल पर दिव्य शांती और ज्ञान की आभा जलक
16:52रही थी।
16:53धीरे धीरे उनके दिव्य मुख मंडल से एक अध्भुत सौमय प्रकाश फैलने लगा, जो न केवल कक्ष को बलकी रिशियों
17:01के मन को भी प्रकाशित कर रहा था, मानो स्वय ज्यान का सूर्य उदे हो रहा हो।
17:08वायो मंडल में एक अलोकिक सुगंध व्याप्थ हो गई और एक अध्रिश्य उर्जा तरंगों के रूप में कक्ष में प्रवाहित
17:15होने लगी, जिससे सभी उपस्थित जन आध्यात्मिक रूप से जागरित महसूस करने लगे।
17:22भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आखों को धीरे से खोला, उनकी दृष्टी में अनंत ब्रहमांडों का ज्यान समाया हुआ था,
17:30और उन्होंने कालचक्र के गूढ रहसियों पर बोलना आरंभ किया।
17:35समस्त्र शिग्नों ने अपने मन और इंद्रियों को एकागर कर उसक्षनिक संसार और शाश्वत मोक्ष के बीच के भेद को
17:43समझने के लिए पूर्ण तनमयता से उनके एक एक एक शब्द को सुनना शुरू किया।
17:49श्री कृष्ण ने अपनी असीम करुणा और दिव्य मुस्कान के साथ माया के उस रहस्य में आवर्ण को भेदना आरंभ
17:56किया जो इस संसार को बांधे हुए है।
18:00उन्होंने समझाया कि यह चराचर जगत जो हमें सत्य प्रतीत होता है वस्तुता मेरी ही अचिंत्य शक्ती का एक भ्रमजाल
18:09है एक ऐसा नाटक जहां हर जीव अपनी भूमिका निभाता है।
18:14इस माया के आवर्ण से ढके हुए जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल कर स्वयंको शरीर, मन और इंद्रियों तक
18:22ही सीमित समझने लगते हैं और सुखदुख के द्वंदों में उलज जाते हैं।
18:28कालचक्र भी मेरी ही माया का एक अभिन अंग है, जो जन्म, जीवन और मृत्यू के अटूट बंधन में सभी
18:36प्राणियों को बांधे रखता है, निरंतर परिवर्तन का खेल रचता हुआ।
18:41मैं ही इस संपूवन स्रिष्टी का सूत्रधार हूँ, जो इस ब्रहमांडिय नाटक के हर पात्र को, हर घटना को अपनी
18:49इच्छा से संचालित करता हूँ, परंतु स्वयें इन सब से अलिप्त रहता हूँ।
18:54समय स्मय पर धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश हे तू, मैं अपनी इसी माया शक्ती के बल पर
19:01विभिन रूपों और अवतारों में इस प्रिथवी पर प्रकट होता हूँ।
19:06जैसे जब प्रलय काल आया और सत्यवरत मनु को बचाया गया, तब मैंने मत्स्य रूप धारन कर वेदों की रक्षा
19:14की और स्रिष्टी के बीज को सुरक्षित रखा।
19:18उस लीला का उद्देश केवल वेदों का संरक्षन ही नहीं, बलकि धर्म के मूल सिधानतों को पुनह स्थापित करना और
19:26आने वाली स्रिष्टी को एक नई दिशा देना था।
19:30और जब हिरन्याक्ष ने प्रिथवी को रसातल में डुबो दिया था, तब मैंने विशालकाय वराह का रूप धारन कर अपने
19:37दातों पर प्रिथवी को उठा कर उसे पुनह स्थापित किया था।
19:42यह लीला केवल प्रिथवी को बचाने के लिए नहीं थी, अपितो यह अधर्म के प्रतीक को नश्ट करने और स्रिष्टी
19:49में संतुलन की पुनह स्थापना का संदेश देती थी।
19:54मेरी हर लीला का मूल उद्देश यही है कि जब-जब धर्म का हरास होता है और अधर्म का बोलबाला
20:01बढ़ता है, मैं स्वयं को प्रकट कर धर्म की पुनह स्थापना करूँ।
20:06यह सुख और दुहक, लाभ और हानी, यश और अप्यश ये सभी माया के द्वंद्व हैं, जो जीव को भ्रमित
20:13कर उसके मन को विचलित करते हैं।
20:17परंतु जो मुझ में अटूट श्रधा रखता है और मेरे नाम का निरंतर स्मरण करता है, वह मेरी इस माया
20:24के पार जाकर परमशान्ती को प्राप्त करता है।
20:29भक्ती का मार्ग ही सबसे सरल और सीधा मार्ग है, जहां कर्म, ज्यान और योग सब मेरे प्रेम में समाहित
20:36हो जाते हैं।
20:38जब जीव भक्ती के द्वारा माया के आवर्ण को हटाता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, कि
20:46वह आत्मा है, अविनाशी मुझ में ही एक अंश।
20:50यही परम लक्ष है, मुझ में लीन हो जाना, द्वायत के भ्रम से मुक्ती पाकर अद्वैत की शाश्वत अवस्था को
20:57प्राप्त करना।
20:59यह मार्ग किसी जटिल अनुष्थान या कठिन तपस्या का मोहताज नहीं, अपितु केवल शुद्ध हरिदय और निश्कपट प्रेम की मांग
21:08करता है।
21:10श्री कृष्ण के इन गूड वचनों को सुनकर समस्त्रिशिगन अवाक रह गए, उनके हृदय में भक्ती और ज्ञान का एक
21:17नया प्रकाश जगम का उठा।
21:19उस क्षण उन्हें न केवल माया के रहस्य समझ में आये, बलकि अपने जीवन का परम उद्धेश भी स्पष्ट रूप
21:27से दिखाई देने लगा, एक असीम शान्ती उनके भीतर भर गई।
21:32इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने माया के आवर्ण, काल्चक्र के गूढ रहस्यों और अपनी लीलाओं के परम उद्धेशों का विशद
21:41वर्णन कर अपने उपदेश को विराम दिया।
22:02उन्होंने अपनी मधुरवानी में कहा कि है श्रिष्ट रिशियों, समस्त कामनाय और कर्मों का परम लक्ष केवल मुझ में शुद्ध
22:10प्रेम और अटूट भक्ती प्राप्त करना ही है, इसके अतिरिक्ट और कुछ नहीं।
22:16उन्होंने समझाया कि मनुष्य की हर छोटी बड़ी इच्छा, चाहे वह सांसारिक सुख हो, स्वर्ग का भोग हो या मोक्ष
22:23की कामना, अन्ता उसी मार्ग की ओर ले जाती है, जहां केवल मेरा ही आश्रय है।
22:30जब कोई भक्त अपनी सभी इच्छाओं को मेरे चर्णों में अर्पित कर देता है, तो मैं उन इच्छाओं को परिश्कृत
22:38कर उसे ऐसी शांती और आनंद प्रदान करता हूँ जो किसी भी भौतिक कामना से परे हैं।
22:45उन्होंने आगे कहा कि मेरी क्रिपा से ही भक्त की हर मनोकामना पूर्ण होती है, क्योंकि मेरी इच्छा से बढ़कर
22:53इस स्रिष्टी में कुछ भी नहीं, और मेरी क्रिपा ही परम आश्रय है।
22:58भगवान ने अपने भक्तों के अनेक उदाहरन देने आरंभ किये, जिनके अटूट विश्वास और प्रेम ने उनकी हर असंभव मनोकामना
23:07को साकार कर दिया था।
23:10उन्होंने बाल ध्रूव का स्मरण किया, जिसने अपने सौतेली मा के वचनों से आहत होकर कठोर तपस्या की इच्छा से
23:17जंगल की ओर प्रस्थान किया था, जिसकी एक मात्र कामना अपने पिता से उचे स्थान पर विराज मान होना था।
23:25छोटे ध्रूव की अटूट श्रद्धा और अविचल तपस्या ने देवर्शी नारत को भी विस्मित कर दिया, जिन्होंने उन्हें ओम नमो
23:33भगवते वासुदेवाय मंत्र का उपदेश दिया और भगवान की क्रिपा प्राप्ती का मार्क सुझाया।
23:40ध्रूव के प्रचंड तपसे तीनों लोग कमपायमान हो उठे और अन्ता भगवान विश्नु अपने शंक, चक्र, गदा और पद्म के
23:49साथ प्रकट हुए, बालक की भक्ती से अभिभूत होकर।
23:54भगवान ने ध्रूव को उसकी कामना से भी उचा ध्रूव लोग प्रदान किया। यह दर्शाते हुए कि शुद्ध भक्ती से
24:01लौकिक इच्छाय भी परम आध्यात्मिक फल में बदल जाती हैं।
24:06फिर श्री कृष्ण ने गजेंद्र मोक्ष की कथा सुनाई, जिसमें एक गजराज ने मगरमच की पकड़ से छूटने के लिए
24:14अपनी संपून शक्ती हारने के बाद केवल भगवान का स्मरण किया था।
24:19जब गजराज ने कमल का पुष्प उठा कर ओम नमो भगवते वासुदेवाय का उच्चारन किया, तब उसकी वह अंतिम पुकार
24:27सीधे वैकुंठ में भगवान विश्नु तक पहुँची, जिसने उन्हें तुरंत प्रित्वी पर उतरने के लिए विवश कर दिया।
24:34ततकाल भगवान विश्नु अपने गरूर पर सवार होकर प्रकट हुए और अपने सुदर्शन चक्र से उस पापी मगरमच का वधकर
24:43गजराज को मोक्ष प्रदान किया, यह उनकी शर्नागत वतसलता का अनुपम उदाहरन था।
24:50भगवान श्रीकृष्न ने भक्त प्रहलाद का भी स्मरण किया, जिसकी असीम भक्ती ने उसे अपने दानवी पिता हिरनेकशप के अत्याचारों
24:59से बचाया और स्वय भगवान को नरसें रूप में प्रकट होने पर विवश किया।
25:04छोटे प्रहलाद की निशंक भक्ती ने उसे विश, अगने, जल और उंचे परवतों से गिराने के प्रयासों से भी अचुता
25:13रखा, क्योंकि उसका हर श्वास केवल भगवान विश्नु के नाम का जाप करता था।
25:19जब हिरन्यकशप ने अपने स्तंभ में भगवान का अस्तित्व पूछा, तो उसी क्षन भगवान नरसिन्ह आधे नर और आधे सिह
25:27के रूप में प्रकट हुए अपने भक्त की लाज रखने और धर्म की रक्षा के लिए।
25:33नरसिह भगवान ने हिरन्यकशप का वध कर प्रहलात की भक्ती को चरितार्थ किया, यह सिद्ध करते हुए कि भक्त की
25:41रक्षा के लिए वे किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं और किसी भी नियम को तोर सकते हैं।
25:48भगवान श्री कृष्ण ने जोर दे कर कहा कि ये सभी उदाहरण इस बात के साक्षी हैं कि मेरी भक्ती
25:55ही वह परम्मार्ग है जो सभी इच्छाओं को पूर्ण कर अंता जीव को मुझसे एकाकार कर देती हैं।
26:03वे बोले मेरी कृपा से ही सब कुछ संभव है और जो मुझे शुद्ध भाव से स्मरण करता है। मैं
26:11उसके सभी भय और चिंताओं को हर लेता हूं और उसे परमशांती प्रदान करता हूं।
26:17इस प्रकार भगवान ने सिद्ध किया कि सच्ची इच्छा पूर्ती केवल भौतिक सुखों में नहीं, बलकि उन सुखों को भी
26:25अतिक्रमित करने वाली शुद्ध भक्ती में नहित है।
26:30समस्त रिशिगन भगवान के वचनों को हृदय में धारण कर उल्न रूप से त्रिप्त और शांत महसूस कर रहे थे,
26:37मानों उन्हें जीवन का परम सक्य प्राप्थ हो गया हो, जिसकी वे युगों से प्रतीक्षा कर रहे थे।
26:43भगवान के वचनों से परम त्रिप्ती पाकर, रिशियों ने विन्मर भाव से उनसे उनकी अविनाशी महिमा का और गहन वर्णन
26:52करने का अनुरोध किया।
26:54समस्त रिशियों की इस उतकंठा को भापते हुए, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मधुर मुस्कान से उन्हें आश्वस्त किया, मानों
27:02वे उनकी जिग्यासा का सम्मान कर रहे हूं।
27:06तब भगवान ने गंभीर और शांत स्वर में अपनी परम महिमा का उद्धाटन करते हुए कहा, मैं ही इस समस्त
27:13स्रिश्टी का आदिकारण हूं, मुझसे ही सब कुछ उत्पन होता है।
27:19उन्होंने समझाया कि कैसे पंचभूत, प्रित्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश सब उन्ही से प्रकट हुए हैं और उन्ही में
27:28लीन हो जाते हैं।
27:30भगवान ने बताया कि कैसे वे ही इस विशाल ब्रहमांड के प्रत्येक कन का पालन और पोशन करते हैं और
27:38बिना उनके सहयोग के कोई भी अस्तित्व नहीं टिक सकता।
27:42उन्होंने रहस्यो धाटन किया कि जब स्रिष्टी का अंत आता है तब वे ही रुद्र रूप धारन कर समस्त संसार
27:50को अपने में समाहित कर लेते हैं और प्रलय का कारण बनते हैं।
27:55श्री कृष्ण ने समझाया कि चाहे वह एक छोटा सा कीठ हो या विशाल का अब्रह्मा प्रत्येक जीव में उन्हीं
28:02की दिव्यशक्ती और चेतना का अंश व्याप्त है।
28:07उन्होंने बताया कि प्राणियों के भीतर जो चेतना है, जो ज्यान है, वह भी उन्हीं का ही स्वरूप है, जो
28:14उन्हें अस्तित्व का बोध कराती है।
28:17श्री कृष्ण ने कहा कि वे ही महान रिशियों की तपस्या में, देवताओं के एश्वर्य में और दैतियों के बल
28:24में भी स्वयं को प्रकट करते हैं।
28:28उन्होंने आगे कहा मैं ही बलवानों का बल और सुन्दर वस्तूओं की अनुपम सुन्दरता हूँ, जो भी श्रेष्ट है, वह
28:36मेरे ही अंश से हैं।
28:38श्री कृष्ण ने बताया कि बुद्धिमानों की बुद्धी, तपस्वियों का तप और ज्यानियों का ज्यान भी उन्हीं की ही अभिव्यक्ती
28:46है।
28:48उन्होंने प्रकट किया कि वे ही ब्रह्मा के स्रिजन में, विश्नु के पालन में और शिव के सहार में भी
28:54वही एक परमसत्ता है
28:57भगवान ने बताया कि वे ही अनादी कालचक्र के प्रवर्तक हैं, जो हर युग, हर कल्प के आरंभ और अंत
29:04को नियंत्रित करते हैं
29:07उन्होंने कहा मैं ही जलकारस हूँ, सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ, जो स्रिष्टी को जीवन और उर्जा प्रदान करता
29:15है
29:17श्री कृष्ण ने समझाया कि वे ही समस्त वैदिक मंत्रों के मूल में नहित दिव्यध्वनी हैं, जो ज्ञान और मोक्ष
29:24का मार प्रशस्त करती हैं
29:27उन्होंने द्रिडता से कहा कि इस ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं है, चाहे वह जड़ हो या चेतन जो
29:34उनकी शक्ती और इच्छा के बिना अस्तित्व में आ सके
29:38और फिर उन्होंने परम सत्य उजागर किया कि केवल शुद्ध और निश्काम भक्ती के माध्यम से ही कोई उनकी इस
29:46सर्वव्यापी महिमा को वास्तव में जान और अनुभव कर सकता है
29:52भगवान के इन असीम वचनों को सुनकर समस्त रिशिगन विसमय से भर उठे उनकी आत्माय परम आनंद और दिव्यता से
30:00आपलावित हो गई
30:01मानो उन्हें स्वयम ब्रहमांड का रहस्य ज्यात हो गया हो
30:05श्री कृष्ण ने अपने उपदेश का समापन करते हुए कहा कि उनकी महिमा अनंद है जिसे शब्दों में पूर्णत व्यक्त
30:14करना असंभव है और जो केवल अनुभवग में है
30:18उस क्षण द्वारका का वह पवित्र कक्ष अलोकिक उर्जा से भर गया और रिशिगन स्वयं को भगवान के अनंद प्रेम
30:26और उनकी परम महिमा के साक्षी पाकर धन्य महसूस कर रहे थे
30:31भगवान श्रीकृष्ण ने एक क्षण के लिए अपनी गंभीर द्रिश्टी समूचे कक्ष में उपस्थित रिशियों पर डाली मानों उन्हें भविश्य
30:39के रहस्यों को समझने के लिए तैयार कर रहे हूँ
30:43फिर उन्होंने अपनी दिव्यवानी में काल्चक्र की सनातन गती का वर्णन आरंभ किया जो ब्रहमांड के प्रत्येक अनु और महासागर
30:52के हर बून्द को नियंत्रित करता है
30:55उन्होंने समझाया की काल ही स्रिजन, पालन और सहार का अविनाशी सूत्र है जिसके अधीन तीनों लोक और समस्थ जीव
31:04निरंतर परिवर्टन की प्रक्रिया से गुजरते हैं
31:08तब उन्होंने चतुर्युगों, सत्य, त्रेता, द्वापर और अंतमे कल्युग की परंपरा का विस्तार से वर्णन किया, जिन में धर्म और
31:17अधर्म का संतुलन भिन होता जाता है
31:20श्री कृष्ण ने समझाया कि सत्युग में धर्म के चारों चरण पूल्न होते हैं, मनुष्य दीरगायु, सत्यनिष्ठ और तपस्वी होते
31:29हैं, तथा पृत्वी स्वयन स्वर्गसी पवित्र होती है
31:34त्रेता युग में धर्म का एक चरण घट जाता है, जिसमें लोग यग्य और कर्मकांडों पर अधिक निर्भर हो जाते
31:41हैं, फिर भी सत्य और धर्म का प्रभाव बना रहता है
31:46द्वापर युग में धर्म के दो चरण ख्षीन हो जाते हैं, और द्वेश, संशय तथा भौतिक इच्छाय बढ़ने लगती हैं,
31:54जिससे मनुश्यों को धर्म की स्थापना के लिए अधिक संधर्ष करना पड़ता है
32:00अंत में श्री कृष्ण ने एक गहरी, गंभीर सास ली, और उनकी द्रिष्टी में एक अधिभुत करुणा और द्रिड़ता भराई,
32:08जैसे वे आने वाले सबसे चुनोती पूर्ण युग का अनावरण करने जा रहे हूँ
32:14ततपश्चात आएगा कल युग, उन्होंने कहा, जहाँ धर्म केवल एक चरण पर खड़ा होगा, और पाखंड कलह तथा अज्ञान का
32:22सामराज्य चहू और फैल जाएगा
32:25उन्होंने बताया कि इस युग में मनुश्यों की भौतिक इच्छाए असीन हो जाएंगी, धन, शक्ती और खशनिक सुखों के पीछे
32:33वे अंधाधुंध दौरते रहेंगे, भूलकर अपनी वास्तविक पहचान
32:39सत्यर्दया, पवित्रता और क्षमा जैसे दैविये गुनक्षीन होते चले जाएंगे, और छल, कपट तथा स्वार्थी समाज के मुख्य आधार बन
32:48जाएंगे
32:50मनुष्यों की आयू अल्प हो जाएगी, शारेरिक और मानसिक शक्ती कमजोर पढ़ जाएगी, और वे सहज ही रोगों और व्याधियों
32:58का शिकार होंगे
33:00व्रिद्धों और गुरुजनों का अनादर होगा, पवित्र ग्रंथों और वैदिक ज्यान को उपहास का पात्र बनाया जाएगा, और नास्तिक्ता का
33:08बोलबाला बढ़ेगा
33:10चारों और भय, चिन्ता और अशान्ती का वातावर्ण व्याप्त रहेगा, जहां मनुष्य अपने ही बनाय माया जाल में उलचकर निरंतर
33:19दुहक भोगेंगे
33:21भगवान के इन गहन वचनों को सुनकर रिशियों के मुखमंडल पर चिन्ता की गहरी लकीरें उभराईं, परंतु उनकी आखें अभी
33:30भगवान में ही मोक्ष का मार्ग खोज रही थी
33:34तब भगवान श्री कृष्ण के मुखमंडल पर पुनह एक दिव्य मुस्कान फैल गई, जो समस्ट अंधकार को भेदने वाली आशा
33:42की किरण थी
33:44परंतु हे रिशियों, उन्होंने मधूर्टा से कहा, कल्युक का यह घोर अंधकार ही उसके भीतर छुपी सबसे बड़ी विशेष्टा को
33:52जन्द देता है भक्ती का मार्ग
33:54इस युग में मोक्ष प्राप्त करने का सबसे सरल और शक्तिशाली साधन है, मेरे नामों का निरंतर जप और मुझ
34:02पर अखंड प्रेम्पूर्ण भक्ती
34:05उन्होंने समझाया कि अन्य युगों में कठिन तपस्या और यग्यों से जोग्पुन्य प्राप्त होते हैं, वह केवल नामसंकीर्तन और शुद्धर्दै
34:14से की गई भक्ती से कल्युग में ही मिल जाते हैं
34:18इस परम सत्य को सुनकर समस्त रिशिग्णों की आत्माय संतोष और परम शांती से भर उठीन मानों उन्हें कल्युग के
34:26अंधकार में भी प्रकाश का शाश्वत मार्ग मिल गया हो
34:31भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यद रिश्टी शांत रिशियों पर घूमती है उनकी आखों में असीन करुणा और शाश्वत ज्यान का सागर
34:39लहरा रहा है जो कल्युग के भविश्य को देख रहा है
34:44उन्होंने अपनी मधुरवानी में कहा ये तपस्वियों युग परिवर्तनशील हैं परिस्थितिया बदलती हैं किन्तु कुछ शाश्वत मूल्य हैं जो प्रत्येक
34:54मनुष्य के लिए मार्ग दर्शक प्रकाश स्थम्भ के समान है
34:59सर्वप्रथम सत्य वह आधार्शिला जिस पर धर्म का भव्य प्रासाद निर्मित होता है क्योंकि सत्य के बिना कोई भी कार्य,
35:07कोई भी संबंध स्थाई नहीं हो सकता
35:11ततपश्चात धर्म जो केवल कर्मकांड नहीं, अपितु प्रत्येक जीव के प्रती न्याय, कर्तव्य और उचित आचर्ण का प्रतीक है, जो
35:20समाज को सुव्यवस्था प्रदान करता है
35:23फिर दया, जो हृदय को कोमल बनाती है, और हमें सभी प्राणियों में स्वयं को देखने की प्रेणा देती है,
35:31जहां पीडा होती है, वहां उप्चार बन जाती है
35:35और अंत में प्रेम वह सर्वोच शक्ती जो सभी भेदों को मिटा देती है, आत्माओं को जोडती है और मुझे
35:43प्राप्त करने का सबसे सीधा मार्ध है
35:46वे मूल्य ही हैं जो मनुष्य को बाहरी सुख दुख से परे, अंतरात्मा में सच्ची शान्ती और संतोष प्रदान करते
35:54हैं, एक ऐसी शान्ती जो कभी भंग नहीं होती
35:59उन्होंने समझाया कि ये सत्य, धर्म, दया और प्रेम ही वास्तविक भक्ती के मूल आधार हैं, इनके बिना केवल बाहरी
36:07कर्मकांड निश्वल हैं
36:10ये मूले किसी एक युग या काल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये त्रिकाल सत्य हैं, जो हर युग में,
36:17हर परिस्थिती में मनुष्य को अपने शाश्वत स्वरूप से जोडते हैं
36:23समस्त्रिशिगण उनकी वानी को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे, उनके चहरों पर गहन समच, आत्मज्यान और परम आनंद की जलक
36:31स्पष्ट दिखाई दे रही थी
36:34भगवान श्रीकृष्ण की वानी में एक अध्भुत सम्मोहन था, जो सीधे आत्मा की गहराईयों में उतर कर जीवन के परम
36:42रहसियों को उजागर कर रहा था
36:45उन्होंने सभी को आहवान किया कि इन मूलियों पर ग्रिड़ता से अडिग रहें, चाहे मार कितना भी कठिन क्यों न
36:52हो, क्योंकि यही सच्ची मनुश्यता का प्रतीक है
36:57उन्होंने समझाया कि भले ही संसार में अनेक बाधाय हों, किन्तु जो इन सिध्धान्तों पर चलता है, उसे अंत्य परम
37:05सुख और मेरा सान्निध्य अवश्य प्राप्थ होता है
37:09जैसे ही उन्होंने अपने उपदेशों का अंतिन अंश कहा, उनके चारों और एक अलोकिक स्वर्णनी आभा और भी तीवर हो
37:17गई, जिसने पूरे कक्ष को दिव्य उर्जा से भर दिया
37:22उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सिध्धान्तों का पालन करने वाला व्यक्ति मुझे ही प्राप्थ होता है, क्योंकि मैं ही सत्य,
37:30धर्म, गया और प्रेम का सार हूँ
37:33कक्ष में उपस्थित सभी रिशियों और गण्मान्य व्यक्तियों ने महसूस किया कि जैसे स्वयं ब्रहमांड का रहस्य उनके सामने अनावरित
37:42हो गया हो, एक गहन शान्ती चारों ओर छा गई
37:46समस्त्र शिग्णों ने एक स्वर में परम भक्ती और श्रधा के साथ भगवान श्री कृष्ण को बारंबार प्रणाम किया, उनके
37:54हृदय कृतज्यता और प्रेन से परिपूर्ण थे
37:58भगवान श्री कृष्ण ने अपने उपदेशों का समापन एक मोहक सरवग्य मुस्कान के साथ किया, जैसे उन्होंने काल और कर्म
38:07के सभी सूत्रों को सरल शब्दों में बांध दिया हो
38:11एक गहन पूर्णता और शाश्वत ज्यान का भाव पूरे वातावर्ण में व्याप्थ हो गया, जिसने हर हृदय में चिरस्थाई भक्ती
38:19और शान्ती का बीज बो दिया
38:22द्वार्का के इस दिव्य उपदेश ने न केवल रिशियों को, बलकि आने वाली पीढियों के लिए भी सत्य, धर्म और
38:29भक्ती का अविनाशी मार्ग प्रकाशित कर दिया
38:33भग्वान श्री कृष्ण के उपदेशों की प्रतिध्वनी अभी भी द्वार्का के दिव्य वायुमंडल में गूंज रही थी, प्रत्येक श्रोता के
38:41हृदय को गेहन शान्ती और आत्म ज्यान से भर रही थी
38:46रिशियों की आखों में उस परम सत्य का प्रकाश स्पष्ट दिखाई दे रहा था, जिसे उन्होंने युगों की तपस्या के
38:53बाद अनुभव किया था, और अब साक्षात प्रभु के मुख से सुना
38:58द्वारका के यादव भी अपने प्रभु के इन अन्तिम शब्दों के महत्व को धीरे-धीरे आत्म साथ कर रहे थे,
39:05उनके मन में भक्ती और आगामी काल के प्रती एक असपष्ट बोध जागरित हो रहा था
39:12यह केवल उपदेश नहीं था, बलकी कालचक्र के एक महत्वपूर्ण मोर पर युग परिवर्तन की सुक्ष्म आहट थी, जिसे केवल
39:20अंतरग्रिष्टी वाले ही महसूस कर सकते थे
39:24भगवान श्रीक्रिष्ण अब भी अपने सिनहासन पर विराज मान थे, एक अविचल शांत मुस्कान के साथ दूरक्षितिच को निहार रहे
39:33थे, मानों वे आने वाले समस्त भविश्य को पहले से जानते हूं
39:38उनकी द्रिष्टी में अनन्त काल की गहराया समाई थी, और उनकी शांत उपस्थिती में युगों का समापन और नए युग
39:46का आरंभ दोनों एक साथ अनुभव हो रहे थे
39:50रिशिगण अब आपस में उन गूढ रहसियों पर विचार विमर्ष कर रहे थे, जिनकी पर्तों को श्री कृष्ण ने अपने
39:58दिव्य शब्दों से खोल दिया था, और द्वारका के भविश्य को लेकर उनकी चिंताएं गहरा रही थी
40:05नगर के प्राचीरों से परे, समुद्र की लहरों में एक अनसुनी खामोशी थी, और वायू में एक ऐसी शीतलता घुल
40:13गई थी, जो सामान्य से अधिक गंभीर थी
40:17यहार एहसास की श्री कृष्ण के ये उपदेश केवल ज्यान नहीं, बलकि एक अंतिम विदाई का पूर्व संकेत भी थे,
40:25धीरे धीरे हर समवेदनशील हृदय में जड़े जमा रहा था
40:30द्वारका की गलियों में भी एक अलौकिक निरवता चा गई थी, जैसे स्वयन समय थम गया हो और आने वाली
40:37घटनाओं की प्रतीक्षा कर रहा हो
40:40श्रीकृष्ण एकांत में अपने कक्ष में बैठे थे, उनकी द्रिष्टी ब्रहमांड के गूढ रहस्यों में लीन थी और उनके चहरे
40:48पर एक हलकी अव्यक्त करुना जहलक रही थी
40:52उन्होंने अपनी दिव्यद्रिष्टी से देखा कि किस प्रकार काल्चक्र अपनी गती को तीवर कर रहा था और धर्म की स्थापना
41:00के लिए युग का परिवर्तन अनिवार यहो चला था
41:04महर्शियों ने भी महसूस किया कि ये गहन शिक्षाय द्वारका के लिए एक अन्तिम आध्यात्मिक तयारी थी जो आने वाले
41:12महत्वपून परिवर्तनों के लिए आवश्चक थी
41:16प्रत्यक रिशी के हरिदय में एक गहन स्वीकार्यता का भाव जागरित हुआ
41:21यह समझते हुए कि कोई भी शक्ती ईश्वर के निर्धारित कालचक्र को नहीं रोक सकती
41:28द्वार का नगरी अपने स्वन शिखरों और भव्य महलों के साथ इस समय एक शांत उदास आभा में लिप्टी हुई
41:35लग रही थी
41:36जैसे वह अपने गौरवशाली अतीत को अंतिम बार संजो रही हो
41:42श्री कृष्ण ने अपने कुछ निकट्स्थ यादव प्रमुखों को बुलाया और उन्हें शांतचित रहते हुए धर्म के मार्ग पर अडिग
41:50रहने का अंतिम उपदेश दिया
41:52यह जानते हुए कि उनकी भूमिका अब समाप्थ होने वाली है
41:57रिशियों ने विदाई के लिए अपनी अंतिम तयारिया शुरू कर दी
42:01उनके चहरों पर एक अजीब शांती और द्रिड़ता थी
42:05श्री कृष्ण ने एक एक करके सभी रिशियों को अपने दिव्य हाथों से आशिरवाद दिया
42:11उनकी आखों में भविश्य की एक स्पष्ट जलक थी
42:16उनके आशिरवाद में केवल सने ही नहीं बलकी एक युग के समापन और नए युग के आगमन की अटल नेती
42:23की स्विकृती भी समाहित थी
42:26इस प्रकार द्वारका में भक्ती और ज्यान के अंतिम अध्याय का मंचन हुआ
42:32जो युगों तक धर्म, सत्य और इश्वरिय प्रेम का अविनाशी संदेश देता रहेगा
42:38उनकी दिव्यद्रिष्टी ने प्रत्येक आत्मा के भीतर जाका
42:42जहां भक्ती की लौअब और भी प्रजवलित हो उठी थी और हर हृदय में इश्वरिय प्रेम का अमरित घुल रहा
42:49था
42:50रिशियों ने जिनके हृद्यों में परम ज्यान का बीज बोया गया था
42:55विनमरता से अपने शीष जुका लिए उनके मुख मंडल पर असीम कृतज्यता का भाव स्पष्ट दिख रहा था
43:03द्वारकावासी इस अलोकिक दृष्य के साक्षी बन असीम श्रध्धा और विस्मय से भर उठे मानो समय थमसा गया हो और
43:11केवल दिव्य प्रेम का प्रवाही शेश रह गया हो
43:15भगवान श्रीकृष्ण अपने होठोन पर एक कोमल प्रहस्यमई मुश्कान लिए सभी को अपने शाश्वत प्रेम का आश्वासन दे रहे थे
43:24जो ब्रहमान की हरकन में व्याप्त था
43:28उसक्षण द्वारका की वायू में शांती, कृतग्यता और एक अनकही उदासी का एक घना मिश्रन घुल गया था जो हर
43:36हृदय को स्पर्श कर रहा था
43:38फिर एक जेश्ट रिशी, जिनका चहरा वर्षों के तब से दमक रहा था, आगे बढ़े और अपनी कंट से निकली
43:46भक्तिपूर्ण वानी में अनंत कृतग्यता व्यक्त की
43:50उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण के शब्दों ने केवल ज्यान ही नहीं दिया, बलकि मोक्ष का मार्ग भी प्रकाशित किया है,
43:57जो युगों-युगों तक मार्ग दर्शक रहेगा
44:01भगवान श्रीकृष्ण ने धैर्य पूर्वक सुनते हुए, अपने सिर को धीरे से हिला कर उनकी भक्तिपूर्ण स्थुती को स्विकार किया,
44:09मानो यह सब पूर्वनिश्चित ही था
44:12समस्त रिशिग्णों ने एक साथ अपने हाथ जोड़कर परमेश्वर के प्रती अपनी गहन श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया, उनकी आखें
44:21प्रेम और आभार से चमक रही थी
44:25द्वारका के निवासियों ने मन ही मन श्रीकृष्ण के बताय मार्ग पर चलने और उनके सिध्धान्तों को आत्मसाथ करने का
44:33संकल्प लिया, जिससे उनके जीवन में नया अर्थ भर गया
44:38अब वहक्षण आ गया था जब रिशियों ने अपने दिव्य अनुभव को समेटे हुए, प्रस्थान की तैयारी शुरू की, उनके
44:45चहरों पर एक नई शान्ती चाचुकी थी
44:49श्री कृष्ण ने प्रस्थान करते रिशियों पर अपनी अन्तिम करुना भरी द्रिश्टी डाली, मानों उन्हें भविश्य की चुनोतियों के लिए
44:57तैयार कर रहे हों और अपना आशिर्वाद दे रहे हों
45:01विदा होने से पूर्व प्रत्येक रिशी ने अन्तिम बार मुड़कर भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में अपना शीष जुकाया, उनकी
45:09भक्ती का यह अन्तिम विनमर प्रदर्शन था
45:14द्वारकावासियों ने विनमरता से रिशीयों के लिए मार्ग प्रशस्त किया, उनकी उपस्थिती से अभी भी पवित्रता का अनुभव हो रहा
45:21था, जो वातावर्ण में व्याप्त थी
45:25धीरे धीरे रिशीयों की आकरितिया क्षितिच की ओर बढ़ती गई, उनके साथ एक युग के ज्ञान का प्रकाश भी दूर
45:32होता गया, परंतु उसकी चाप अमिक थी
45:36रिशीयों के प्रस्थान के बाद द्वारका में एक गहरी, अर्थपूर्ण चुप्पी छा गई, मानो प्रकृती भी इस क्षण को महसूस
45:44कर रही हो और मौन धारन किये हो
45:46इस गहन शांती के बावजूद द्वारका वासियों में एक नया आध्यात्मिक संकल्प और कर्तव्य प्रायंता की भावना जागरित हुई थी,
45:56उनके चहरे पर ग्रिड़ता थी
45:59तथा पी उनके हरिद्यों में एक अनकहा, सुक्षम भाव छिपा था, एक ऐसी आहट जो आने वाले परिवर्तन और नेती
46:07की अटल घड़ी का संकेत दे रही थी
46:11भगवान श्री कृष्ण अब अकेले खड़े होकर दूरक्षितिच को निहार रहे थे, उनकी आखों में युगों का ज्यान और नेती
46:19का स्विकार्य भाव था, मानो वह सब जानते हूँ
46:23उनकी दिव्य उपस्थिती ने द्वारका की भूमी पर प्रेम, ज्यान और आध्यात्मिक उर्जा का एक अमिट छाप छोड़ दिया, जो
46:31लुगों-लुगों तक प्रकाशित रहेगा और प्रेना देगा