00:00CCA की और वीडियोज देखने के लिए सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन को दबाएं
00:30एक तीसरे की आँख में भी उख सकती है दो घंटे की चमक और तो और इस तरकीव से पूरी
00:39तरह रोका जा सकता है प्रधान मंत्री का शोषन
00:42मैं बेरोजगार हूँ और सोचता हूँ कि आदमी होना इतना अपमान जनक कैसे हुआ लोगों मुझे मदमक्खी गिलहरी और मशली
00:54का जीवन चाहिए
00:55प्यार भी अपने पैर खींच लेगा पीछे की और रित्यू और बेरोजगारी चीज ही ऐसे हैं
01:04अगर तुम बेरोजगार हो तो तुम्हारा पहला और पूरा परिचय यही है कि तुम बेरोजगार हो तुरा के साथ लिख
01:13रहे हैं उसके सबसे प्रमुख पृतिनिधी पराग हैं पराग अपनी कविताएं पढ़े
01:27नमस्कार
01:31कविता का से शेशक है
01:34चूले की राग
01:39उन दिनों चूले लीब दिये जाते और चौका एक हल्की सी नमी के नीचे कितना पवित्र दिखने लगता था
01:52सब कुछ साप कर दिया जाता पर मा बचा कर रख लेती थी दो मुठी राग
02:00सुबह की राग शाम के लिए
02:07जब डिक्ची चड़ जाती आग पर और शुरू हो जाता था पकाने का कारे ब्यापार
02:15हम दोनों भाई मा की बगल में बैठ जातें तब मा हमारे सामने फैला देती थी वही बचाई हुई दो
02:25मुठी राग
02:27उस पर बनाती थी अपनी भाशा का पहला अक्षर हमें कहती थी पीछा करो इन अक्षरों का
02:37दोस्तों हमने पीछा किया अक्षरों का और कविता के सुदूर इलाकों तक आए
02:43अब हमारी उम्र मा की उम्र होती जा रही है
02:48हम भी बचाना चाहते हैं दो मुठी राग और फैला देना चाहते हैं दुनिया के सामने
03:02कविता का शिशक है इस्त्रिया
03:08वे मुझे जन में देती थी, मेरी हत्या करती थी
03:14वे मुझे जीवन सिखाती थी और इंतिजार
03:18और जो कुछ सिखाती थी, उसकी समुद्र तक जाती हुई सूची थी
03:24उनकी देह से अमरता लिप्टी रहती थी
03:28उनकी आवाज टीन की छट पर धीमी बारिश की तरह मुझे लपेटती थी
03:35जब हिदेहिं सांसरेक्टा ने मुझे से पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए
03:40मैंने कहा मुझे इस्त्रियों के पास रहने दो, नदी के पास रहने दो
03:46साहसिक असफलताओं और प्रबुद्ध उदासियों के पास रहने दो
03:51मुझे एक ऐसी प्रित्वी के पास रहने दो
03:54जहां नरेंद्र दामोदर्दास मोदी की आवाज न पहुंचती हो
04:00इस्त्रियों के निकट रहकर
04:03स्त्रियों के निकट रहकर मुझे विश्वास होता है
04:06कि मित्टी की नमी जरूर लोटेगी
04:09और घास अपनी लगुता पर फिर से मुगध हो सकेगी
04:15जिस शताबदी में मैं पैदा हुआ
04:18स्त्रियों पर नई बहसे शुरू हो चुकी थे
04:21मैं भी उन बहसों का एक वाग्य था
04:25मेरे आगे पुर्ण विराम नहीं प्रश्णमाचक था
04:30छुपाऊंगा नहीं
04:32मैं उनका प्रेम पाना चाहता था
04:35पर इतना शाश्वत था उनका दुख
04:38किसी नियम की तरह
04:40उनके प्रेम से पहले
04:42पहुंचती थी उनकी पीड़ा
04:44और मेरा सारा संसार
04:46एक पनियाई जिलमिलाहत
04:48में डूप जाता था
04:58मैं भी रोजगारी सीरीज से कुछ करता हूँ
05:01पहले इसमें
05:0230 कविताएं थी या 50 कविताएं हैं
05:04अब ये सरकार की जिम्मेदारी के से बढ़ने से रोकें
05:10बेरोजगार एक
05:13तुम किसी की संतान नहीं हो
05:16न किसी देश के सम्मानित नागरित
05:20तुमने कभी कुछ नहीं हो गाया
05:22किसी भी गीत में पंक्ति तक तुम्हारी नहीं
05:27अगर तुम बेरोजगार हो
05:29तो तुम्हारा पहला और पूरा परिचय यही है कि तुम बेरोजगार हो
05:36बेरोजगार दूँग
05:37पहले रिष्टेदार विदा होंगे
05:40फिर दोस्त कहेंगे विदा
05:42उनके पीछे पीछे जाएगी तुम्हारी आस्था
05:46प्यार भी अपने पैर खींच लेगा पीछे की ओर
05:51मृत्यू और विरुजगारी चीज ही ऐसी है
05:57विरुजगार तीन
05:59तारीखें याद नहीं रहती
06:01दिन भूल जाता हूं
06:03सिर्फ मौसम बदलने पर महीनों का पता चलता है
06:08किसी की प्रतिक्षा नहीं
06:10न कहीं पहुँचने का अनुशाशन या बुढ़ापा नहीं है विरुजगारी है
06:18विरुजगार चाल
06:20फूल खिल रहे हैं मधमक्खी विरुजगार नहीं है
06:26दाने जड़ रहे हैं गिलहरी विरुजगार नहीं है
06:30पानी बह रहा है मचली विरुजगार नहीं है
06:34मैं बेरोजगार हूँ और सोचता हूँ कि आदमी होना इतना अपमान जनक कैसे हुआ
06:42लोगों मुझे मदमक्खी, गिलहरी और मचली का जीवन चाहिए
06:51बेरोजगार पांच
06:54हमारी बेरोजगारी पर भाशन देता है प्रधान मंत्री
06:58पर हमें काम नहीं देता
07:01वह अठारे घंटे करता है काम
07:05जबकि हम मानते हैं कि आठ घंटे से अधिक काम किसी भी व्यक्ति का शोशन है
07:13यदि अठारे घंटे को बाटा जाए
07:15यदि अठारे घंटे को बाटा जाए
07:18तो कम से कम दो लोगों को मिल सकता है काम
07:23एक तीसरे की आँख में भी उख सकती है दो घंटे की चमक
07:28और तो और इस तरकीव से पूरी तरह रोका जा सकता है प्रधान मंत्री का शोशन
08:01कहते थे लोग की रुढ़ाये निनुआ की तरह लटका रहता था हमारा चेहरा
08:08हमारे साथ मनहोसियत का धुआ चला आता था जैसे डिबिरी के साथ चली आती है कालिक
08:17हमें ऐसे देखते थे लोग जैसे सलाद में तितको निकलाया हो खीरा
08:23पर हमें सपने आते थे जैसे पेड को आते हैं बारिश में नहाने के सपने
08:31हमें भी आते थे काम पर जाने के सपने
08:35आज की रात सिर्फ यह सोच कर हम पागल हो सकते हैं
08:42कि एक दिन हमारे पास नौपरी होगी
08:45शुक्रिया
09:30झाल
09:50झाल झाल
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