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Upload date: 30/01/26

उत्तर प्रदेश के ज़िला शामली के गाँव एलम में 25 जनवरी 2026 को किसानों और मजदूरों के साहित्यकार प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह के अपने ही गांव एलम में 'काल, तुझसे होड है मेरी' के रूप में शमशेर बहादुर कला मंच और जन संस्कृति मंच के द्वारा युवा संवाद कार्यक्रम किया। जिसमें कवि पराग पावन जी ने शमशेर बहादुर सिंह के कविताओं को लेकर अपना नजरिया रखा उन्हें सुनने के लिए बहुत से नौजवानों ने हिस्सा लिया ।
CCA की रिपोर्ट।
टीम – विशाल स्टोनवाल, राशिदा अख्तर सिद्दीकी ,मौ. सावेज़ चौहान, शाकिब यामीन रंगरेज़, इकरा अय्यूब सैफ़ी

On 25 January 2026, in the village of Ailum in the district Shamli of Uttar Pradesh, a youth dialogue program was organized by Shamsher Bahadur Kala Manch and Jan Sanskriti Manch in the form of 'Kaal, Tujhse Hod Hai Meri' in the village of Alam, the progressive poet Shamsher Bahadur Singh, the writer of farmers and laborers, in his own village Alam. In this program, poet Parag Paawan shared his perspective on Shamsher Bahadur Singh's poems, and many young people participated to listen to him.
CCA Report.
Crew - Vishal Stonewall, Rashida Akhtar Siddique, Mohd. Savez Chauhan, Shakib Yameen Rangrezz, Ikra Ayub Saifi

#YouthDialogue #ProgressivePoetry #ShamsherBahadurSingh #PoetryAndResistance #PeopleLiterature #FarmersPoet #LabourVoices #CulturalMovement

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Transcript
00:00CCA की और वीडियोज देखने के लिए सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन को दबाएं
00:30एक तीसरे की आँख में भी उख सकती है दो घंटे की चमक और तो और इस तरकीव से पूरी
00:39तरह रोका जा सकता है प्रधान मंत्री का शोषन
00:42मैं बेरोजगार हूँ और सोचता हूँ कि आदमी होना इतना अपमान जनक कैसे हुआ लोगों मुझे मदमक्खी गिलहरी और मशली
00:54का जीवन चाहिए
00:55प्यार भी अपने पैर खींच लेगा पीछे की और रित्यू और बेरोजगारी चीज ही ऐसे हैं
01:04अगर तुम बेरोजगार हो तो तुम्हारा पहला और पूरा परिचय यही है कि तुम बेरोजगार हो तुरा के साथ लिख
01:13रहे हैं उसके सबसे प्रमुख पृतिनिधी पराग हैं पराग अपनी कविताएं पढ़े
01:27नमस्कार
01:31कविता का से शेशक है
01:34चूले की राग
01:39उन दिनों चूले लीब दिये जाते और चौका एक हल्की सी नमी के नीचे कितना पवित्र दिखने लगता था
01:52सब कुछ साप कर दिया जाता पर मा बचा कर रख लेती थी दो मुठी राग
02:00सुबह की राग शाम के लिए
02:07जब डिक्ची चड़ जाती आग पर और शुरू हो जाता था पकाने का कारे ब्यापार
02:15हम दोनों भाई मा की बगल में बैठ जातें तब मा हमारे सामने फैला देती थी वही बचाई हुई दो
02:25मुठी राग
02:27उस पर बनाती थी अपनी भाशा का पहला अक्षर हमें कहती थी पीछा करो इन अक्षरों का
02:37दोस्तों हमने पीछा किया अक्षरों का और कविता के सुदूर इलाकों तक आए
02:43अब हमारी उम्र मा की उम्र होती जा रही है
02:48हम भी बचाना चाहते हैं दो मुठी राग और फैला देना चाहते हैं दुनिया के सामने
03:02कविता का शिशक है इस्त्रिया
03:08वे मुझे जन में देती थी, मेरी हत्या करती थी
03:14वे मुझे जीवन सिखाती थी और इंतिजार
03:18और जो कुछ सिखाती थी, उसकी समुद्र तक जाती हुई सूची थी
03:24उनकी देह से अमरता लिप्टी रहती थी
03:28उनकी आवाज टीन की छट पर धीमी बारिश की तरह मुझे लपेटती थी
03:35जब हिदेहिं सांसरेक्टा ने मुझे से पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए
03:40मैंने कहा मुझे इस्त्रियों के पास रहने दो, नदी के पास रहने दो
03:46साहसिक असफलताओं और प्रबुद्ध उदासियों के पास रहने दो
03:51मुझे एक ऐसी प्रित्वी के पास रहने दो
03:54जहां नरेंद्र दामोदर्दास मोदी की आवाज न पहुंचती हो
04:00इस्त्रियों के निकट रहकर
04:03स्त्रियों के निकट रहकर मुझे विश्वास होता है
04:06कि मित्टी की नमी जरूर लोटेगी
04:09और घास अपनी लगुता पर फिर से मुगध हो सकेगी
04:15जिस शताबदी में मैं पैदा हुआ
04:18स्त्रियों पर नई बहसे शुरू हो चुकी थे
04:21मैं भी उन बहसों का एक वाग्य था
04:25मेरे आगे पुर्ण विराम नहीं प्रश्णमाचक था
04:30छुपाऊंगा नहीं
04:32मैं उनका प्रेम पाना चाहता था
04:35पर इतना शाश्वत था उनका दुख
04:38किसी नियम की तरह
04:40उनके प्रेम से पहले
04:42पहुंचती थी उनकी पीड़ा
04:44और मेरा सारा संसार
04:46एक पनियाई जिलमिलाहत
04:48में डूप जाता था
04:58मैं भी रोजगारी सीरीज से कुछ करता हूँ
05:01पहले इसमें
05:0230 कविताएं थी या 50 कविताएं हैं
05:04अब ये सरकार की जिम्मेदारी के से बढ़ने से रोकें
05:10बेरोजगार एक
05:13तुम किसी की संतान नहीं हो
05:16न किसी देश के सम्मानित नागरित
05:20तुमने कभी कुछ नहीं हो गाया
05:22किसी भी गीत में पंक्ति तक तुम्हारी नहीं
05:27अगर तुम बेरोजगार हो
05:29तो तुम्हारा पहला और पूरा परिचय यही है कि तुम बेरोजगार हो
05:36बेरोजगार दूँग
05:37पहले रिष्टेदार विदा होंगे
05:40फिर दोस्त कहेंगे विदा
05:42उनके पीछे पीछे जाएगी तुम्हारी आस्था
05:46प्यार भी अपने पैर खींच लेगा पीछे की ओर
05:51मृत्यू और विरुजगारी चीज ही ऐसी है
05:57विरुजगार तीन
05:59तारीखें याद नहीं रहती
06:01दिन भूल जाता हूं
06:03सिर्फ मौसम बदलने पर महीनों का पता चलता है
06:08किसी की प्रतिक्षा नहीं
06:10न कहीं पहुँचने का अनुशाशन या बुढ़ापा नहीं है विरुजगारी है
06:18विरुजगार चाल
06:20फूल खिल रहे हैं मधमक्खी विरुजगार नहीं है
06:26दाने जड़ रहे हैं गिलहरी विरुजगार नहीं है
06:30पानी बह रहा है मचली विरुजगार नहीं है
06:34मैं बेरोजगार हूँ और सोचता हूँ कि आदमी होना इतना अपमान जनक कैसे हुआ
06:42लोगों मुझे मदमक्खी, गिलहरी और मचली का जीवन चाहिए
06:51बेरोजगार पांच
06:54हमारी बेरोजगारी पर भाशन देता है प्रधान मंत्री
06:58पर हमें काम नहीं देता
07:01वह अठारे घंटे करता है काम
07:05जबकि हम मानते हैं कि आठ घंटे से अधिक काम किसी भी व्यक्ति का शोशन है
07:13यदि अठारे घंटे को बाटा जाए
07:15यदि अठारे घंटे को बाटा जाए
07:18तो कम से कम दो लोगों को मिल सकता है काम
07:23एक तीसरे की आँख में भी उख सकती है दो घंटे की चमक
07:28और तो और इस तरकीव से पूरी तरह रोका जा सकता है प्रधान मंत्री का शोशन
08:01कहते थे लोग की रुढ़ाये निनुआ की तरह लटका रहता था हमारा चेहरा
08:08हमारे साथ मनहोसियत का धुआ चला आता था जैसे डिबिरी के साथ चली आती है कालिक
08:17हमें ऐसे देखते थे लोग जैसे सलाद में तितको निकलाया हो खीरा
08:23पर हमें सपने आते थे जैसे पेड को आते हैं बारिश में नहाने के सपने
08:31हमें भी आते थे काम पर जाने के सपने
08:35आज की रात सिर्फ यह सोच कर हम पागल हो सकते हैं
08:42कि एक दिन हमारे पास नौपरी होगी
08:45शुक्रिया
09:30झाल
09:50झाल झाल
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