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00:30फसल के रंग के साथ बदलता है किसान का चेहरा पर अफसोस किसान के चेहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं
00:40आत्मत्या तक
00:50मैं क्रिकेट के भगवान को भी अपना आदश नहीं मानती हूँ जो भारत रत्न को सीने से लगाए घूमता है
00:57और कभी भारत के लिए नहीं बोलता
00:59मैं कभी समसेर की मुँ अजोर हसी को याद करूंगी याद करूंगी कातिक में खिले सरपत के फूलों को दुख
01:10किताब को कहकर रोते हुए इस्तियां जहां रहती हैं मेरे भी जीने खाने भर की जगह वहीं है
01:16उसकी जो एक उदासी है उस उदासी को भी इस कविता में इस्थिर है शव सी यह बात यह कौन
01:30सी बात है जो शव की तरह इस्थिर है जिसमें जिन्दगी के चिन्द दिखाई नहीं देते हैं
01:37हमारा नरक सा जीवन बुरा यू भी है और यू भी मरें भूके मरें लड़कर सजा यू भी है और
01:51यू भी
02:13हुँ!
02:25कुचच धसके
02:31कुचच धसके
02:34कुछ ऐसा खेल हां रचो साती
02:47कुछ ऐसा खेल हां रचो साती
02:58कुछ जीने का आनंद मिले
03:03कुछ जीने का आनंद मिले
03:08कुछ मरने का आनंद मिले
03:13दुनिया के सुने आगन में कुछ ऐसा खेल
03:20हां रचो साती
03:49वो कहते हैं कि इस कठनाई में क्या करना चाहिए
03:52तो वो लिखते हैं जीवन की कमान
03:54आप लोगों ने वो कविता पढ़ी होगी
03:57उसकी दोलाई मैं आपको बता रहा हूं
03:59धीली इस जीवन की कमान कस्नी है
04:02छूटेंगे जिस पर कड़े प्रान के तीर
04:06जो की भे देंगे सातो आसमान
04:09वो वहां तक सोचते थे कि कश्ट है लेकिन ये कश्ट दूर होगा
04:16और एक दिन जीवन की कमान को इस तरीके से कसेंगे
04:20कि वो सातो आसमानों को चीर फार देगा उसको उससे तीर बुजर जाएगा
04:28हकीकत को लाए तकहयूल से बाहर मेरी मुश्किलों का
04:34मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए कहीं सर्द खूं से तडपती है विजली
04:40जमाने का रद्दों बदल को इलाए और इसी उमीद से यही हमारा विशे भी है
04:49हकीकत का हकीकत का मर सपना और समसेर की कविता चाहूंगा कि दिगंबर जी आए और अपनी बात्चीत रखें
05:04समसेर कवियों के कविय है और समसेर के अंदर निश्चित तोर पे जिस कहा जाता है कि उनमें दुरूरता है
05:14या कठिनाई है उन बहुत कठिन कभी है कि लिश्चिता है तो ये चीजें उनकि सारी कविताओं के बारे में
05:27नहीं कही जा सकती है
05:28उनकी कविताओं में उनके बिंब परदीक और शिल्पगत जो विशेस्ताइए हैं और वो शमसेर की खुब सूरती है
05:49बम का जवाब बम से नहीं दिया जाता बच्छे पर तुम अपनी किताब में छपे बम को चिपका सकते हो
05:55अगर तुम यही चाहते हो
05:58इस बचे खुचे मुलक में तुम्हारे लायक अकेला काम बचा है यह सोने से पहले बुदबदाओ इंतिफादा और सोचो तुम
06:08एक मजबूत कंबल में हो जिसे खुदा भी नहीं भेद सकता कयामत के रोज तला
06:12आंको मैं आमन्तृत करता हूं राजेश जी का भी हाल में कविता संग्रवी आया है और ही सूछना में लीए
06:18एक नया कविता संग्रवी आने वाला है तो उसके लिए ग्रिम बधाई राजेश western
06:25फसल आने पर सभी मनाते हैं तेहार वे भी जो नहीं जानते फसले पकने तक कितने रंग बदलती हैं
06:35मौसम के साथ मिट्टी का रंग बदलता है और गंद भी जो किसान की आत्मा में बसता है
06:48फसल के रंग के साथ बदलता है किसान का चहरा पर अफसोस किसान के चहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं
07:04आत्मा त्या तक
07:06पर अपसोस किसान के चेहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं आत्मक्त्या तक तो अब मैं इलहाबाद से चल कर आई
07:17विल्कुल युवतम पीड़ी की कवीत्री कवी पूजा कुमारी को मैं बुलाता हूँ
07:25गलत आदर्श मैं सदी के महानायक को अपना आदर्श नहीं मानती हूँ क्योंकि खराब से खराब इस्थितियों में भी वह
07:37कभी कुछ नहीं बोलता
07:39मैं क्रिकेट के भगवान को भी अपना आदर्श नहीं मानती हूँ जो भारत रत्न को सीने से लगाये घूमता है
07:46और कभी भारत के लिए नहीं बोलता
07:50मैं दलित लेखक डॉक्टर तुलसी राम को भी अपना आदर्स नहीं मानती हूँ
07:54जो जाती सोसर पर तो खूब बोले
07:56पर अपनी ही व्याहता की सुध न ली
07:59पलट कर वापस मुर्दहिया की वोर न देखा
08:02जहां एक त्यागी गई इस्त्री अपनी मूख पुकार में कहती रही
08:07इस्त्री भी तेक सताई गई जाती ही है
08:10मैं कभी समसेर की मुँ अजोर हसी को याद करूंगी
08:14याद करूंगी कातिक में खिले सरपत की फूलों को
08:19दुख किताब को कहकर रोती हुई इस्त्रियां जहां रहती हैं मेरे भी जीने खाने भर की जगव वही है
08:28उसी डगर से स्कूल जाती हैं डिवा के मुसहर टोले की लड़किया
08:33उनकी सपने पारी आखों के लिए ही तो ललहीय ताल में कुझ बेरा खिलते हैं
08:52अब बहुत बात है आपके सामने रखूं लेकिन धीरे धीरे पत्य खोलूंगा धीरे धीरे बात रखूंगा आइस्ता आइस्ता सभाथ अपने
09:02मुकाम तक पहुचेगी
09:03मैं बुलाना चाहूंगा प्रोफिसर आसुतोष कुमार जी जो हमारे बीच हैं
09:12बात में शैलेंडर ने अपने गीत में रोटी की तरह चांद को देखा था एक मजज़ूर की नजर से
09:18और उनका था कि रोटीयों सा गोल गोल चांद मुस्कुरा रहा है
09:23तो चांद को कांसे के कटोरे की तरह देखना या रोटी की तरह देखना
09:29ये एक बिल्कुल नहे किसम की अलगते रहकी अनुभूती है अहसास
09:35अब इसको आप सिध्धान्तों के फ्रेम में नहीं कर सकते लेकिन आप उस जिंदगी से जोड़के अगर देखेंगे
09:41और उसके साथ एक किसान की जिंदगी की जो इस्थिरता है
09:47जो लंबे समय तक चीजें बदलती हुई दिखाई नहीं परती एक किसान की जिंदगी में
09:54जिसका एक साचा है जीने का जो बदलता नहीं है उसकी जो एक एक उदासी है
10:08उस उदासी को भी इस कविता में इस्थिर है शवसी यह बात
10:13है यह कौन सी बात है जो शव की तरह इस्थिर है जिसमें जंदगी के चिन्न दिखाई नहीं देते है
10:22अंधार आक्षस परवश्ता का
10:38पच्छी मुत्तर प्रदेश में अपनी कई समस्यों को लेगे
10:43कर हम आगे बढ़े और साथ ही संपरदाइक इंसा जाती है इंसा और जो हासिये पर जो समाज है उनकी
10:49कहानी हम लोग लाने की कोशिस करते
10:52है यहां जैसे हमने देखा है कि कल्चर के नाम पर एगरी कल्चर की लोग सीमीत हो जाते हैं उसी
11:00कल्चर को
11:00हम को सांस्कृति माद्यों से जैसे फिल्म स्क्रीनिंग मुप्त पुस्तकालियों के जरिए आगे लाने कोशिस हम लगतार कर रहे हैं
11:11यह कोशिए जारी मेरी नई किताब आई है नई करता हूं की इस में से मैंने करताब को सुनाई थी
11:17और एक गजल मैं आपको सुनाता हूं
11:22हमारा नरक सा जीवन बुरा यू भी है और यू भी
11:38मरें भू के मरें लड़कर सजा यू भी है और यू भी
11:54के हम खेतों के बेटे हैं तो तुम महलों की संताने
12:02के हम खेतों के बेटे हैं तो तुम महलों की संताने
12:09हमारी दास्तां तुम से जुदा यू भी है और यू भी
12:18इस Q-R कोट पर स्कैन करें और CCA के दोस्त बनें
12:49झाल झाल
13:15झाल झाल
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