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Upload date: 29/01/26

ज़िला शामली के क़स्बा एलम में प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह की जयंती पर शमशेर बहादुर कला मंच व जसम और चलचित्र अभियान ने कवि सम्मेलन और विचार गोष्ठी किया। जिसमें उनके साहित्य और उनकी रचनाओं को लेकर चर्चा की गई और दूर दराज से आये साहित्यकारों और युवा कवियों ने अपने वक्तव्यों से कार्यक्रम को दिशा दी ।
CCA की ग्राउंड रिपोर्ट।
टीम – विशाल स्टोनवाल, राशिदा अख्तर सिद्दीकी ,मौ. सावेज़ चौहान, शाकिब यामीन रंगरेज़, इकरा अय्यूब सैफ़ी

In Ailum town of Shamli district, on the occasion of the birth anniversary of progressive poet Shamsher Bahadur Singh, the Shamsher Bahadur Kala Manch, JSM, and Chalchitra Abhiyaan organized a poetry symposium and youth dialogue. Discussions were held on his literature and works, and writers and young poets from far and wide contributed to the program with their speeches.
CCA Ground Report.
Crew - Vishal Stonewall, Rashida Akhtar Siddique, Mohd. Savez Chauhan, Shakib Yameen Rangrezz, Ikra Ayub Saifi

#ShamsherBahadurSingh #ProgressivePoetry #PoetrySymposium #YouthDialogue #HindiLiterature #LiteraryMovement #PeopleCulture #shamli #uttarpradesh #westup

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Transcript
00:00CCA की और वीडियोज देखने के लिए सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन को दबाएं
00:30फसल के रंग के साथ बदलता है किसान का चेहरा पर अफसोस किसान के चेहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं
00:40आत्मत्या तक
00:50मैं क्रिकेट के भगवान को भी अपना आदश नहीं मानती हूँ जो भारत रत्न को सीने से लगाए घूमता है
00:57और कभी भारत के लिए नहीं बोलता
00:59मैं कभी समसेर की मुँ अजोर हसी को याद करूंगी याद करूंगी कातिक में खिले सरपत के फूलों को दुख
01:10किताब को कहकर रोते हुए इस्तियां जहां रहती हैं मेरे भी जीने खाने भर की जगह वहीं है
01:16उसकी जो एक उदासी है उस उदासी को भी इस कविता में इस्थिर है शव सी यह बात यह कौन
01:30सी बात है जो शव की तरह इस्थिर है जिसमें जिन्दगी के चिन्द दिखाई नहीं देते हैं
01:37हमारा नरक सा जीवन बुरा यू भी है और यू भी मरें भूके मरें लड़कर सजा यू भी है और
01:51यू भी
02:13हुँ!
02:25कुचच धसके
02:31कुचच धसके
02:34कुछ ऐसा खेल हां रचो साती
02:47कुछ ऐसा खेल हां रचो साती
02:58कुछ जीने का आनंद मिले
03:03कुछ जीने का आनंद मिले
03:08कुछ मरने का आनंद मिले
03:13दुनिया के सुने आगन में कुछ ऐसा खेल
03:20हां रचो साती
03:49वो कहते हैं कि इस कठनाई में क्या करना चाहिए
03:52तो वो लिखते हैं जीवन की कमान
03:54आप लोगों ने वो कविता पढ़ी होगी
03:57उसकी दोलाई मैं आपको बता रहा हूं
03:59धीली इस जीवन की कमान कस्नी है
04:02छूटेंगे जिस पर कड़े प्रान के तीर
04:06जो की भे देंगे सातो आसमान
04:09वो वहां तक सोचते थे कि कश्ट है लेकिन ये कश्ट दूर होगा
04:16और एक दिन जीवन की कमान को इस तरीके से कसेंगे
04:20कि वो सातो आसमानों को चीर फार देगा उसको उससे तीर बुजर जाएगा
04:28हकीकत को लाए तकहयूल से बाहर मेरी मुश्किलों का
04:34मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए कहीं सर्द खूं से तडपती है विजली
04:40जमाने का रद्दों बदल को इलाए और इसी उमीद से यही हमारा विशे भी है
04:49हकीकत का हकीकत का मर सपना और समसेर की कविता चाहूंगा कि दिगंबर जी आए और अपनी बात्चीत रखें
05:04समसेर कवियों के कविय है और समसेर के अंदर निश्चित तोर पे जिस कहा जाता है कि उनमें दुरूरता है
05:14या कठिनाई है उन बहुत कठिन कभी है कि लिश्चिता है तो ये चीजें उनकि सारी कविताओं के बारे में
05:27नहीं कही जा सकती है
05:28उनकी कविताओं में उनके बिंब परदीक और शिल्पगत जो विशेस्ताइए हैं और वो शमसेर की खुब सूरती है
05:49बम का जवाब बम से नहीं दिया जाता बच्छे पर तुम अपनी किताब में छपे बम को चिपका सकते हो
05:55अगर तुम यही चाहते हो
05:58इस बचे खुचे मुलक में तुम्हारे लायक अकेला काम बचा है यह सोने से पहले बुदबदाओ इंतिफादा और सोचो तुम
06:08एक मजबूत कंबल में हो जिसे खुदा भी नहीं भेद सकता कयामत के रोज तला
06:12आंको मैं आमन्तृत करता हूं राजेश जी का भी हाल में कविता संग्रवी आया है और ही सूछना में लीए
06:18एक नया कविता संग्रवी आने वाला है तो उसके लिए ग्रिम बधाई राजेश western
06:25फसल आने पर सभी मनाते हैं तेहार वे भी जो नहीं जानते फसले पकने तक कितने रंग बदलती हैं
06:35मौसम के साथ मिट्टी का रंग बदलता है और गंद भी जो किसान की आत्मा में बसता है
06:48फसल के रंग के साथ बदलता है किसान का चहरा पर अफसोस किसान के चहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं
07:04आत्मा त्या तक
07:06पर अपसोस किसान के चेहरे बैंकों में गिर्वी पड़े हैं आत्मक्त्या तक तो अब मैं इलहाबाद से चल कर आई
07:17विल्कुल युवतम पीड़ी की कवीत्री कवी पूजा कुमारी को मैं बुलाता हूँ
07:25गलत आदर्श मैं सदी के महानायक को अपना आदर्श नहीं मानती हूँ क्योंकि खराब से खराब इस्थितियों में भी वह
07:37कभी कुछ नहीं बोलता
07:39मैं क्रिकेट के भगवान को भी अपना आदर्श नहीं मानती हूँ जो भारत रत्न को सीने से लगाये घूमता है
07:46और कभी भारत के लिए नहीं बोलता
07:50मैं दलित लेखक डॉक्टर तुलसी राम को भी अपना आदर्स नहीं मानती हूँ
07:54जो जाती सोसर पर तो खूब बोले
07:56पर अपनी ही व्याहता की सुध न ली
07:59पलट कर वापस मुर्दहिया की वोर न देखा
08:02जहां एक त्यागी गई इस्त्री अपनी मूख पुकार में कहती रही
08:07इस्त्री भी तेक सताई गई जाती ही है
08:10मैं कभी समसेर की मुँ अजोर हसी को याद करूंगी
08:14याद करूंगी कातिक में खिले सरपत की फूलों को
08:19दुख किताब को कहकर रोती हुई इस्त्रियां जहां रहती हैं मेरे भी जीने खाने भर की जगव वही है
08:28उसी डगर से स्कूल जाती हैं डिवा के मुसहर टोले की लड़किया
08:33उनकी सपने पारी आखों के लिए ही तो ललहीय ताल में कुझ बेरा खिलते हैं
08:52अब बहुत बात है आपके सामने रखूं लेकिन धीरे धीरे पत्य खोलूंगा धीरे धीरे बात रखूंगा आइस्ता आइस्ता सभाथ अपने
09:02मुकाम तक पहुचेगी
09:03मैं बुलाना चाहूंगा प्रोफिसर आसुतोष कुमार जी जो हमारे बीच हैं
09:12बात में शैलेंडर ने अपने गीत में रोटी की तरह चांद को देखा था एक मजज़ूर की नजर से
09:18और उनका था कि रोटीयों सा गोल गोल चांद मुस्कुरा रहा है
09:23तो चांद को कांसे के कटोरे की तरह देखना या रोटी की तरह देखना
09:29ये एक बिल्कुल नहे किसम की अलगते रहकी अनुभूती है अहसास
09:35अब इसको आप सिध्धान्तों के फ्रेम में नहीं कर सकते लेकिन आप उस जिंदगी से जोड़के अगर देखेंगे
09:41और उसके साथ एक किसान की जिंदगी की जो इस्थिरता है
09:47जो लंबे समय तक चीजें बदलती हुई दिखाई नहीं परती एक किसान की जिंदगी में
09:54जिसका एक साचा है जीने का जो बदलता नहीं है उसकी जो एक एक उदासी है
10:08उस उदासी को भी इस कविता में इस्थिर है शवसी यह बात
10:13है यह कौन सी बात है जो शव की तरह इस्थिर है जिसमें जंदगी के चिन्न दिखाई नहीं देते है
10:22अंधार आक्षस परवश्ता का
10:38पच्छी मुत्तर प्रदेश में अपनी कई समस्यों को लेगे
10:43कर हम आगे बढ़े और साथ ही संपरदाइक इंसा जाती है इंसा और जो हासिये पर जो समाज है उनकी
10:49कहानी हम लोग लाने की कोशिस करते
10:52है यहां जैसे हमने देखा है कि कल्चर के नाम पर एगरी कल्चर की लोग सीमीत हो जाते हैं उसी
11:00कल्चर को
11:00हम को सांस्कृति माद्यों से जैसे फिल्म स्क्रीनिंग मुप्त पुस्तकालियों के जरिए आगे लाने कोशिस हम लगतार कर रहे हैं
11:11यह कोशिए जारी मेरी नई किताब आई है नई करता हूं की इस में से मैंने करताब को सुनाई थी
11:17और एक गजल मैं आपको सुनाता हूं
11:22हमारा नरक सा जीवन बुरा यू भी है और यू भी
11:38मरें भू के मरें लड़कर सजा यू भी है और यू भी
11:54के हम खेतों के बेटे हैं तो तुम महलों की संताने
12:02के हम खेतों के बेटे हैं तो तुम महलों की संताने
12:09हमारी दास्तां तुम से जुदा यू भी है और यू भी
12:18इस Q-R कोट पर स्कैन करें और CCA के दोस्त बनें
12:49झाल झाल
13:15झाल झाल
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