00:00चलें सीधा मौजू की गहराई में उतरते हैं।
00:02आज के इस जाइजे में हम एक ऐसे कदीम और गहरे कलाम को समझने की कोशिश कर रहे हैं
00:07जो नेकी की हमारी रिवायती तारीफ को बिलकुल हिला कर रख देता है।
00:11हम अकसर समझते हैं कि बस नमाज पढ़ ली, जाहरी अबादत कर ली तो काफी है।
00:15लेकिन ये माख़ज हमें एक बहुत ही हिरान कुन तजाद एक पैरडॉक्स से मिलवाता है।
00:20और बताता है कि आमाल में सच्चा इखलास आखिर क्यों इतना जरूरी है।
00:25जरा सोचिए, क्या ऐसा हो सकता है कि एक मुकद्दस कलाम उन्हीं लोगों को सخت अन्भी करे जो बाकाइदगी से
00:32अबादत करते हैं।
00:33सुनकर अजीब लगता है न।
00:34ये वो मरकजी राज है जिसे आज हम खोलने वाले हैं।
00:37ये सवाल हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि जब अंदर की इंसानियत और सच्चा इखलास ही गाइब हो
00:43तो दिखावे की मजभी रिसुमात किस तरह मुकमल तोर पर बेमकसद और नाकाम हो जाती हैं।
00:49जिस कलाम की हम बात कर रहे हैं वो सुरत अलमावून है, कुरान की एक सो साथमी सुरत और इसमें
00:54सिर्फ साथ आयात हैं।
00:56लेकिन इसकी छुटाई पर मत जाएए, इबादत और हमदर्दी के मिलाब पर इसका पैगाम इतना ताकतवर है कि ये इनसान
01:03के जाहिर और बातिन दोनों को पूरी तरह जुझोड देता है।
01:26ये को बुनियादी तोर पर बदल देता है। जब ये एहसास ही खत्म हो जाये के अमाल का हिसाब देना
01:31है, तो फिर इनसान का हर अमल, हर रवया तबदील हो जाता है।
01:56ये समाजी रस्मन कर रह जाती है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए देखते हैं कि इस खोकलेपन का असर
02:02कमजोरों के साथ सलूक पर कैसे पढ़ता है।
02:05जरह दिल खराश मंजर का तस्वर करें, एक बच्चा जिसके सर पर बाप का साया नहीं, वो मदद की उमीद
02:11से आता है और उसे बेरहमी से दुतकार दिया जाता है।
02:15ये कलाम हमें बताता है कि यतीम के साथ ये सखती सिर्फ एक मौशरती बुराई नहीं हैं, बलके ये एक
02:21बीमार रुहानी हालत की सबसे वाज़े आलामत है।
02:24यहां इखलास की कमी बिलकुल साफ नजर आती है, क्योंकि सची हमदर्दी का मतलब सिर्फ चंद सिक्के थमा देना नहीं
02:31होता।
02:32इनसान सिर्फ रोटी पर जिन्दा नहीं रहता, उसे इज़त, मुहबत और तवज्यू भी चाहिए होती है।
02:38यतीम के साथ इज़त से बात करना, उसे कम तर महसूस ना होने देना, यह उसकी वो असल जरूरियात हैं
02:44जो सिर्फ एक जिन्दा और मुखलिस दिल ही पूरी कर सकता है।
02:48और फिर अगले ही लफजों में फरमाया गया और वो मिस्कीन को खाना खिलाने की तरगीब नहीं देता।
03:18आज के दोर में ये वो मजदूर है जिसे दिन भर की मजदूरी नहीं मिली, ये वो बुजर्ग है जिसे
03:23दवाई चाहिए, या वो खानदान है जो महंगाई में अपना किराया दानी कर पा रहा। ये वो असली लोग हैं
03:29जो हमारे आसपास रोजाना जिदुजध कर रहे हैं�
03:31अब आते हैं इस जाइजे के सबसे हैरान कुन हिस्से के तरफ, खोकली अबादत का तजाद, ये वो मकाम है
03:39जहां सुनने वाला सच में चौक जाता है, नमाज जो के एक अजीम तरीन अबादत मानी जाती है, उसे अदा
03:45करने वालों के लिए खराबी या वईद का जिक्र है,
03:48ये बहुत ही चौका देने वाली बात है के अबादत गुजारों को बराए रास निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन
03:54क्यों? अगली ही आयत में जवाब मौजूद है, जो अपनी नमाज से गाफल है, यहां तन्बीह नमाज बढ़ने के अमल
04:02पर नहीं, बलके इस से गाफल हो
04:05गफलत का मतलब ये है के नमाज को एक सोची समझी रूहानी मश्क के बजाए, बगेर सोचे समझे की जाने
04:11वाली एक रूटीन, एक मेकानिकी रस्म बना दिया गया है, एक ऐसा अमल जो इخलाकी जमदारी से पूरी तरह कट
04:17चुका हो।
04:34इخलास के बगेर हकीकी बदलाओ आही नहीं सकता।
04:38और यहां से शुरू होता है दिखावे का खत्रा, जो इस खोकलेपन की सबसे बड़ी वज़ा है।
04:43अगर अबादत किरदार नहीं बदल रही, तो इसकी बन्यादी वज़ा एक मखसूस रोहानी बीमारी है, जिसे रिया या दिखावा कहते
04:49हैं।
04:50यह वो खतरनाक बीमारी है जो सच्चाई को जड़ से उखाड फैंकती है।
04:53जब कोई अमल सिर्फ इसलिए किया जाए के लोग देखें और तारीफ करें, तो जिस लम्हे तालिया बजाने वाला कोई
04:59नहीं होता, वो अमल भी वहीं दम तोड़ देता है।
05:02सच्चा इखलास ना हो तो नेकी की रूह मर जाती है।
05:34जैसे कि आखरी आयत में फरमाया गया और वो मामूली इस्तमाल की चीज़ें भी रोक लेते हैं।
05:39ये इन्सानी फित्रत की एक इंतहाई अजीब और तलख खामी को बेनकाब करती है।
05:44ये आयत बताती है कि इखलास से खाली दिल किस कदर खुदगर्जी की गहराई में गिर सकता है।
05:50इन मामूली चीज़ों को अलमाऊन कहते हैं जैसे घर का कोई छोटा सबर्तन, कोई औजार या कोई ऐसी मामूली सी
05:57मदद जिस पर एक पैसा भी खर्च नहीं होता।
05:59अगर किसी इनसान का दिल इस कदर बंद हो चुका है कि वो ये छोटी और बेजरर सी मदद देने
06:05से भी इनकार कर दे तो इसका साफ मतलब है कि उसके अंदर खैर का कोई कत्रा बाकी नहीं रहा।
06:10इन छोटी नेकियों को कभी हलके में नहीं लेना जाहिए।
06:12एक मस्कुराहट किसी प्यासे को पानी का गलास देना, किसी दुख में डूबे इनसान को तसली देना या किसी यतीन
06:19के सर पर शफकत से हाथ रखना।
06:21ये वो छोटे मगर इंतहाई मुखलिसाना आमाल हैं जो एक इनसानी दिल को जिन्दा रखते हैं।
06:27ये ही वो सच्चा इखलास है जो हमें असली मानों में इनसानीत से जोड़े रखता है।
06:31इन सब को मिला कर देखें तो अबादत और इनसानीत का एक खुबसूरत मिलाप समने आता है।
06:38ये ही तो इमान की मुकमल तस्वीर है।
06:41एक मतوازन रोहानी जिन्दगी का तकाजा है कि जाहरी अबादतें बहतरीन किरदार की शकल में जाहर हों।
06:47नमाज अगर कुर्बत देती है तो सदका और रोजा इस कुर्बत को हमदर्दी में बदलते हैं।
06:53और मौशरे के सबसे कमजूर अफराद की देखभाल ही इस बात का हत्मी सबूत है कि अंदर सच्चा इखलास मौजूद
07:00है।
07:01इबादत और इनसानियत को एक साथ हाथ में हाठ डाल कर चलना चाहिए।
07:05तो इस जाइजे को हम एक बहुत ही गेरे सवाल पर खतम करते हैं।
07:09अगर इस वक्त कोई आपसे एक मामूली सी मदद मांगे तो क्या पहला रद्दे आमल सच्ची मदद करने का होगा
07:15या जहन में ये सवाल आएगा कि इसमें मेरा क्या फाइदा है।
07:19सोचने की बात ये है कि क्या आमाल सिर्फ एक खोकली रूटीन और दिखावे का नम बन चुके हैं या
07:24हमारे अंदर वो सच्चा इखलास और हमदर्दी जिन्दा है जो छोटी सी नेकी को भी अजीम बना देती है।
07:31ये एक ऐसा सवाल है जो हर लमहा घौर तलब है।