00:00पिछले साल की बात है, वैज्यानिक सरकारी अधिकारी और बॉध्ध भिक्षु, सब मिलकर 5000 मीटर की उचाई पर चड़े, किसी
00:09शिखर को फतह करने नहीं, किसी मंदिर के दर्शन को नहीं, वे एक अंतिम संसकार करने गए थे, एक ग्लेशियर
00:15का अंतिम संसकार, एशिया में �
00:18पहली बार, जगह जानते हैं कौन सी थी, नेपाल का वही जिला, जिसे अभी इस बाढ़ने उजाडा है, वहाँ एक
00:25ग्लेशियर है, या कहिए था, 1970 के दशक से अब तक वो अपना दो तिहाई हिस्सा खो चुका है, करीब
00:33800 मीटर पीछे हट चुका है, और अनुमान है कि 2040 क
00:37के दशक तक वो पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, यानि उसकी मृत्यू की तारीख लिखी जा चुकी है, इसी लिए
00:43जीते जी श्राद्ध कर दिया गया, और उस संसकार में एक पटिका लगाई गई, चटान में, हमेशा के लिए, उस
00:51पर उस महीने की हवा का एक अंक दर्ज
00:54है, 426 ppm carbon dioxide, अब ठहर कर सोचिए, वो पटिका है क्या, माप तो वो है नहीं, माप तो
01:03रोज मशीने लेती हैं, और मशीने किसी के लिए शोक नहीं करती, वो पटिका एक स्वीका रोकती है, अपराध स्थल
01:11पर पत्थर में खुदा हुआ एकबालिया बयान, उन लोगों का ज
01:24सामने आये, और उन्हें मिलाने के लिए मृत्यू की जरूरत पड़ी, पर प्रश्न ये है, एक का संसकार कराए आगे
01:31क्या, हिमालय में 60,000 ग्लेशियर हैं, और इसी सदी में उनमें से अधिकांश जाने वाले हैं, कितनी पटिकाएं लगाएंगे,
01:41कितने इश्राध करेंगे
01:43और मृत्यू ग्लेशियर की अकेले नहीं होती, ग्लेशियर मरता है तो नदी मरती है, नदी मरती है तो खेत मरता
01:49है, खेत मरता है तो वो सब मरते हैं जो खेती पर निर्भर हैं, हम किसी प्राकृतिक दृष्य का श्राध
01:57नहीं कर रहे हम अपने ही जल स्रोत की अर्थी उठा
02:05की है मरने वाले का संसकार धर्म है पर मारते जाना और साथ साथ संसकार करते जाना ये कौन सा
02:12धर्म है उस पट्टिका पर 426 लिखा है अगली पट्टिका पर जो अंक होगा वो इस समय आपकी और मेरी
02:21भोग तय कर रही है
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