विकास के फैसले रहे ठंडे बस्ते में, अब चुनाव में जनता मांगेगी हिसाब
हर तीन माह में बैठक जरूरी, लेकिन पांच साल में महज पांच बार जुटा बोर्ड
सवाईमाधोपुर. नगर निकाय चुनाव की आहट के साथ शहर की सियासत फिर गरमाने लगी है। गली-मोहल्लों में प्रत्याशियों और दावेदारों की चर्चा शुरू हो गई है। ऐसे में नगरपरिषद के पिछले पांच साल के कामकाज का हिसाब भी अब शहरवासियों के बीच चर्चा का विषय बनने लगा है। सबसे बड़ा सवाल बोर्ड की बैठकों को लेकर है। पांच साल के कार्यकाल में नगरपरिषद बोर्ड की महज पांच बैठकें ही हो सकीं, जबकि नियमानुसार प्रत्येक तीन माह में बोर्ड की बैठक होना जरूरी है।
उधर, बोर्ड की बैठकें ही नियमित नहीं हुईं तो शहर के विकास से जुड़े प्रस्तावों और जनसमस्याओं पर चर्चा किस तरह आगे बढ़ी, यह सवाल अब चुनावी माहौल में अहम हो गया है। स्थायी सभापति नहीं होने और नगरपरिषद में लगातार बनी रही राजनीतिक उठापटक का असर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी दिखाई दिया। नतीजा यह रहा कि कई मुद्दे चर्चा और निर्णय के इंतजार में अटके रहे। बैठकें कम, सवाल ज्यादा दिसम्बर 2020 में कांग्रेस का नगरपरिषद बोर्ड बनने के बाद फरवरी 2021 में पहली बोर्ड बैठक हुई। इसके बाद अगली बैठक मार्च-अप्रेल 2022 में हुई। तीसरी बैठक 20 मई 2023 को, चौथी 19 नवम्बर 2024 को और अंतिम बैठक दिसम्बर 2025 में हुई। यानी पांच साल के पूरे कार्यकाल में बोर्ड केवल पांच बार ही औपचारिक रूप से बैठक कर सका। नियम के मुताबिक साल में कम से कम चार बैठकें होनी चाहिए। इस हिसाब से पांच साल में करीब 20 बैठकें होनी चाहिए थीं, लेकिन हुई केवल पांच। ऐसे में अब चुनावी मौसम में यह आंकड़ा शहर की राजनीति में बड़ा सवाल बनकर सामने आ सकता है।
विकास के फैसले अटके, समस्याएं बढ़ीं
बोर्ड बैठकें नियमित नहीं होने का असर शहर के विकास कार्यों पर भी पड़ा। वार्डों में निर्माण कार्य, टेंडर प्रक्रिया, भूमि नीलामी, रोडलाइट व्यवस्था, पार्किंग, सीवरेज लाइन की समस्या और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर समयबद्ध चर्चा और निर्णय नहीं हो सके। शहर में कई स्थानों पर सड़कें क्षतिग्रस्त हैं, रोडलाइटों की समस्या बनी रहती है और अतिक्रमण व गंदगी की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि जिस बोर्ड को शहर के विकास की दिशा तय करनी थी, उसकी बैठकें ही नियमित नहीं हुईं तो जनसमस्याओं पर प्रभावी निर्णय कैसे होते? पांच साल का कार्यकाल, लेकिन फैसलों का इंतजार नगरपरिषद का बोर्ड बनने के बाद शहरवासियों को विकास कार्यों की उम्मीद थी। लेकिन बोर्ड की बैठकों की स्थिति ने इन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए। खासकर पिछले साल पूरे साल में केवल एक बैठक होना नगरपरिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। अब जब निकाय चुनाव नजदीक हैं तो राजनीतिक दल और संभावित प्रत्याशी शहर के विकास का रोडमैप लेकर जनता के बीच पहुंचेंगे। ऐसे में शहरवासी भी पिछले पांच साल के कामकाज और बोर्ड की बैठकों का हिसाब मांग सकते हैं। चुनावी वादों के बीच यह सवाल अहम होगा कि जिस बोर्ड ने पांच साल में पांच बैठकें कीं, वह शहर की समस्याओं पर कितने प्रभावी फैसले ले पाया?
अब चुनाव में मुद्दा बनेगा बोर्ड का कामकाज निकाय चुनाव में सड़क, सफाई, पानी, रोडलाइट, सीवरेज और अतिक्रमण जैसे स्थानीय मुद्दे हमेशा अहम रहते हैं। इस बार नगरपरिषद बोर्ड की बैठकों की संख्या और पिछले पांच साल में लिए गए फैसलों का रिकॉर्ड भी प्रत्याशियों के सामने सवाल बन सकता है। शहर की जनता के सामने अब केवल यह सवाल नहीं होगा कि अगला बोर्ड क्या करेगा, बल्कि यह भी होगा कि पिछले बोर्ड ने पांच साल में क्या किया और क्यों नहीं किया। .....................
आंकड़ों में बोर्ड का पांच साल का सफर... दिसम्बर 2020- कांग्रेस का नगरपरिषद बोर्ड बना।
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